भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है

Vivek Umrao Glendenning

हम MBA की पढ़ाई करके, इंजीनियरी की पढ़ाई करके, व्यापार करते हुए भले ही व्यापार में हम किसी दुकान में बैठकर चूरन की पुड़िया ही बेचते हों, अर्थशास्त्र पढ़ते या पढ़ाते हुए इत्यादि इत्यादि करते हुए व्यापार, आय, लाभ हानि, श्रम, उत्पादन, सर्विस सेक्टर, लागत इत्यादि की बहुत चर्चाएं करते हैं, गुणा गणित करते हैं।

बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करते हुए लागत की गणना करते समय बारीक से बारीक चीज यहां तक कि किसी से बात करने, मीटिंग करने इत्यादि की भी गणना करते हुए  आय, लाभ, हानि व लागत इत्यादि का आंकलन करते हैं।

इस लेख में मैं बहुत ही सरल गणित से आपको भारतीय समाज की सबसे अधिक उपेक्षित मानी जाने वाली ईकाई ग्रामीण कृषक महिला के बारे में बताता हूँ, वह भी जीवंत उदाहरण के साथ। वह ग्रामीण महिला जो काम करती है, लेकिन उपेक्षित है, कुशल प्रबंधक है लेकिन दोयम स्तर की मानी जाती है, योग्यता के साथ उत्पादन करती है लेकिन मूर्ख मानी जाती है, देश की इकानोमी की रीढ़ (बैकबोन) है लेकिन GDP में उसकी गणना तक नहीं होती।

जो लोग शहरों में रहते हैं यहां तक कि महिलाएं भी, वे स्वयं को ग्रामीण महिलाओं की तुलना में श्रेष्ठ मानने, ग्रामीण कृषक महिलाओं को गवांर कहते हुए स्वयं से निम्नतर व दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीते हैं। जिन महिलाओं के पति सरकारी नौकरी या ऊंचे वेतनमानों वाली प्राइवेट नौकरी में हैं, वे महिलाएं तो ग्रामीण कृषक महिलाओं को बिलकुल ही दोयम स्तर का मानने की मानसिकता में जीती हैं। जो महिलाएं नौकरी करतीं हैं भले ही दो चार पांच हजार रुपए की ही नौकरी क्यों न हो, ग्रामीण कृषक महिलाओं के प्रति उनकी मानसिकता के तो कहने ही क्या।

यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात नहीं हो रही है, जो खाना बनाने, घर के दो चार कमरों में झाड़ू मारने, चार पांच कपड़े धोने में ही पूरा दिन गुजार देतीं हैं, हाय-तौबा ऊपर से। यहां उन ग्रामीण महिलाओं की बात हो रही है जो खाना बनाने, झाड़ू मारने, कपड़े धोने जैसे कामों को काम ही नहीं मानती हैं, इन कामों को चुटकी बजाते कर लेती हैं। इनकी दृष्टि में काम का मतलब उत्पादन से जुड़े हुए काम। श्रेणी अलग करने के लिए इस प्रकार की महिला को ग्रामीण कृषक महिला कह रहा हूँ।

मैं उत्तर प्रदेश के दो भिन्न इलाकों की जिन दो ग्रामीण कृषक महिलाओं की चर्चा उदाहरण के लिए इस लेख में करने जा रहा हूँ। वे दोनों मध्यवर्गीय किसान परिवार से हैं। उनके पति भी किसान हैं, नौकरी नहीं, व्यापार नहीं। कृषि के अतिरिक्त आय का स्रोत नहीं। एक महिला पश्चिमी उत्तर प्रदेश से है व एक महिला मध्य उत्तर प्रदेश से है। हर जिले में आपको इन जैसी सैकड़ों हजारों ग्रामीण कृषक महिलाएं मिल जाएंगी। खेती की जमीन, जानवरों की संख्या व अन्य कारकों के कारण उत्पादन व आय में अंतर हो सकता है। ईमानदारी से गुनिए कि भारत की वास्तविक इकोनोमी  की वास्तविक रीढ़ (बैकबोन) कहां है, कहीं ऐसा तो नहीं कि सबसे उपेक्षित, सबसे तिरस्कृत, सबसे दोयम मानी जानी वाली ईकाई ही वास्तविक बैकबोन है।

“धर्मवती” पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

Dharmvati

यह धर्मवती हैं, उम्र लगभग 52 साल है। गांव में रहतीं हैं। कभी कभार रिश्तेदारों से मिलने या कोई रिश्तेदार बीमार हुआ तो उसको देखने, उसकी सेवा करने इत्यादि के लिए शहर भले ही आ जाएं। पांचवीं तक पढ़ाई की है। घर में टीवी नहीं, फ्रिज नहीं, कार नहीं, एसी नहीं।

यहां केवल उस आय की चर्चा हो रही है जो शुद्ध रूप से धर्मवती जी की मेहनत का परिणाम है।

धर्मवती गाय भैंस पालती हैं, उनकी सेवा टहल अपने बच्चों की तरह करती हैं, उनके नखरे झेलतीं हैं। दूध, दही, घी, अचार, सिरका, छाछ व सब्जी का उत्पादन करतीं हैं। खेती के उत्पादन को नहीं जोड़ रहा हूँ क्योंकि उसमें घर के पुरुषों का भी सक्रिय सहयोग रहता है। जानवरों के खानपान की लागत को धर्मवती के खेती उत्पादन में श्रम के योगदान से पूरा किया जा सकता है, धर्मवती भी खेती में सक्रिय सहयोग करतीं हैं। इसलिए जानवरों के भोजन की लागत को आय में से नहीं घटा रहा हूँ।

यहां उस घी या दही की बात नहीं हो रही है जिसमें बाजार से दूध खरीद कर गर्म करके मलाई रखकर गर्म करके फुर्सत में घी बना लिया गया। यहां बात पूरे उद्योग की हो रही है। जानवर की सेवा टहल से लेकर दूध का उत्पादन फिर दूध को घर में पारंपरिक विधियों से प्रोसेस करके घी, मक्खन, छाछ इत्यादि के रूप में उत्पादित करना।

दूध, दही, छाछ, घी, मक्खन, सब्जी, सिरका, अचार इत्यादि का जितना भी उत्पादन बाजार में बेचने या घरेलू खपत के लिए धर्मवती अपनी मेहनत व कौशल से करतीं हैं। वह सालाना लगभग 750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए है। यदि खेती से होने वाली कुल आय में धर्मवती के श्रम योगदान की गणना को भी संज्ञा में लिया जाए तो यह आय और अधिक बढ़ जाएगी। लेकिन चूंकि बात केवल धर्मवती की आय की हो रही है। तो मैं केवल उस आय की बात कर रहा हूँ जो धर्मवती की मेहनत व कौशल के कारण होती है।

750,000 (साढ़े सात लाख) रुपए सालाना मतलब 60,000 (साठ हजार) रुपए महीने से भी अधिक जबकि खेती से होने वाली आय इसमें नहीं जुड़ी है। सरकारी प्राथमिक शिक्षक, सरकारी कर्मचारियों व ऊंची कंपनियों में नौकरी करने वाले प्रोफेशनल्स के वेतन से भी अधिक अर्थात 60,000 रुपए महीने से अधिक की आय करने वाली धर्मवती का अपना खर्च औसत लगभग 800 से 900 रुपए महीना है, जिसमें उनके कपड़े, जूते, चप्पल, लिपिस्टिक, क्रीम, बिंदी इत्यादि खर्च सम्मिलित हैं।

“मनोरमा” मध्य उत्तरप्रदेश की एक ग्रामीण कृषक महिला (आय 60,000 रुपए महीना से अधिक):

मनोरमा उम्र लगभग 40 वर्ष। गांव में रहतीं हैं। अपने छोटे भाई बहनों की परवरिश में मदद करतीं रहीं, उनके विवाह संपन्न कराए। सुबह चार बजे जगतीं हैं, रात में लगभग दस बजे सोती हैं। दिन में शायद ही कभी आराम करतीं हों। बारहवीं तक पढ़ाई की है।

बारहवीं तक पढ़े होने के बावजूद बहुत जागरूक महिला हैं। गांव में बिजली होने के बावजूद घर में बिजली नहीं ली, सोलर पैनल से पूरे घर का काम चलता रहा। घर में टीवी, कूलर, फ्रिज, मोटरसाइकिल, कार, एसी नहीं। अभी पिछले साल घर में बिजली लगवाई, फ्रिज लिया। केवल दो लड़कियां हैं, लड़के के लिए कभी मंशा नहीं रही, दो लड़कियों के साथ बेहद खुश।

[pullquote align=”normal”]दोनों लड़कियों को खूब मजे से रखतीं हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई का पूरा ध्यान। दोनों बच्चियां पढ़ने में बहुत अच्छी हैं। रोज गांव से साइकिल चलाकर दूसरे गांव में स्थापित स्कूल में पढ़ने के लिए भेजती रहीं। गांव के स्कूल में पढ़ने के बावजूद बड़ी लड़की ने दसवीं व बारहवीं की उत्तरप्रदेश बोर्ड परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए। दसवीं या बारहवीं में से किसी एक बोर्ड परीक्षा में शायद 90% के आसपास नंबर थे। आजकल आईआईटी इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही है। छोटी लड़की ने भी उत्तरप्रदेश बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में 85% से अधिक नंबर प्राप्त किए हैं। छोटी लड़की की इच्छा डाक्टरी पढ़ने की है। बड़ी लड़की को भारत सरकार से मेधावी छात्रों के लिए प्रोत्साहन वैज्ञानिकी पुरस्कार व छात्रवृत्ति भी मिल चुके हैं।  [/pullquote]

बहुत लोग बच्चों से पढाई करने के नाम पर घरेलू काम नहीं करवाते हैं। मनोरमा की दोनों बच्चियां घरेलू व कृषि के कामों में सक्रिय भागीदारी करतीं आई हैं, अपने कपड़े वह भी हैंडपंप से पानी निकाल कर हाथ से धोतीं आईं हैं। इन सब कामकाजों को करते रहने के बावजूद पढ़ने में भी बहुत मेधावी रही हैं। खेती से होने वाली आय का पूरा हिसाब किताब इनकी दोनों बच्चियां ही बचपन से करतीं व रखती आईं हैं। लाखों रुपए का सालाना हिसाब किताब देखने के बावजूद आजतक कभी भी एक रुपए का झोल नहीं। माता-पिता व बच्चियां सभी आपस में विश्वास के साथ जीवन जीते हैं।

मनोरमा की दोनों पुत्रियां खेतों में काम करते हुए

चूंकि घर में बंदूक थी इसलिए इन दोनों बच्चियों ने सात-आठ साल की उम्र से ही बंदूक चलाना सीख लिया था। दोनों लड़कियां शालीन हैं, अपने काम से मतलब रखतीं हैं लेकिन स्वाभिमानी व आत्मविश्वास की धनी हैं। यदि किसी ने उटपटांग की बात की तो शालीनता के साथ उसकी समझ में आने वाली भाषा में जवाब हाजिर। गांव में बाकायदा छोटे बच्चों व बच्चियों की वानर सेना बना रखी है। कोई भी स्कूल आने जाने वाले बच्चों बच्चियों को परेशान नहीं कर सकता है। टेंपो टैक्सी बस वाले बच्चा समझ कर अधिक किराया नहीं वसूल सलते हैं। वानर सेना हड़कंप मचाती है। रोज शाम को वानर सेना गीत व नृत्य का कार्यक्रम करती है। शाम के पहले पढ़ाई होती है, रात में पढ़ाई होती है, सुबह जल्दी जगकर पढ़ाई होती है। सबकुछ स्वेच्छा से, कोई दंड नहीं, कोई दवाब नहीं, सहजता व सरलता के साथ।

मनोरमा गाय भैंस पालती हैं। उनके घर की खेती इनके ही दम पर चलती है। केवल दूध, दही, घी, सब्जी इत्यादि के उत्पादन से ही घरेलू खपत व बाजार विक्रय की 70,000 रुपए से अधिक मासिक आय हो जाती है। इनका अपना व्यक्तिगत खर्च कपड़े, चप्पल, क्रीम, पाउडर इत्यादि का औसत 500 रुपए महीना है।   

मनोरमा जानवरों के भोजन का इंतजाम करते हुए
मनोरमा खेतों में काम करते हुए

चलते-चलते:

जब भी आपको अपने मन में यह लगे कि ग्रामीण कृषक महिला दोयम है, मूर्ख है, गवांर है, अजागरूक है या आपके किसी मित्र या जानने वाले की मानसिकता हो। आप अपने आसपास उपस्थित ऐसे हजारों उदाहरणों को देखकर अपने भीतर के अहंकार व विकृत मानसिकता को नियंत्रित कर सकते हैं। 

भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भारत की ग्रामीण कृषक महिला है, न कि बड़े-बड़े कारपोरेट। भारत की सरकारों, समाज व लोगों को ग्रामीण कृषक महिला के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। उनके हित में नीतियां बनाकर क्रियान्वयित करना चाहिए, सबसे प्रमुख प्राथमिकता के साथ।

भारत की ग्रामीण कृषक महिला बहुत बेहतर प्रबंधक, उद्यमी, कुशल व योग्य है। जरूरत केवल उसे सफल इंट्रेप्रेन्योर के रूप में स्वीकारने, सम्मानित करने व नीति निर्देशक के रूप में स्वीकारने की है।

 

Comments

4 responses to “भारत के विकसित, समृद्ध व वास्तविक विश्वगुरू होने की कुंजी भारत की ग्रामीण कृषक महिला है”

  1. Bahut hi accha lekh hai apka bahut bahut dhanyavad

  2. रोहतास राणा

    वास्तविकता को बताता लेख,हर गांव में महिलाएं काफी संख्या में पुरुषों से अधिक ही योगदान कर रही हैं।मेरी माताजी 73 वर्ष की उम्र में गायों से दूर खेत पर रहती है ।खेती का पूरा प्रबंधन ,बीज सहेजना ,लागत उत्पादन का सारा हिसाब,व गे बकरी की देखभाल ,खुद का कहना बनाना ,कोई आये उसका भी,बाकी घर के सारे काम। कहती हैं ,शहर में रहकर तो छह महीने भी नहीं जी पाएंगी।उनकी वजह से ही में खेती किसानी और गांव में हूं।

  3. Sachin Bhandari

    यही है भारत की असली सकल घरेलू आय। इन लेखों को लिखने और जानकारी, सोच को साझा करनेके लिए धन्यवाद

  4. बेहतरीन लेख है।गांव की महिलाओं के सम्मान को बढ़ाने बाला है। जो काम भारत की सरकार को करना चाहिए वो समय समय पर आप अपने लेखों के माध्यम से करते है।आप हमेशा चीजों को बारीकी से समझकर ही अपनी बात शेयर करते है। हवाबाजी नही करते आप जैसे तटस्थ लेखकों की आवश्यक्ता बहुत अधिक है।

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