Category: सामाजिक यायावर

  • प्रतिहिंसा आधारित विकृत नारीवाद बनाम हिंसक व विकृत मातृत्व — Vivek Umrao

    प्रतिहिंसा आधारित विकृत नारीवाद बनाम हिंसक व विकृत मातृत्व — Vivek Umrao

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    आमुख

    दरअसल समाज विकास की ओर दो तरीके से चलता है।

    • स्वयं के भीतर से इवाल्व होते हुए, या
    • विकसित समाजों की नकल उतारते हुए, ढोंग करते हुए, ढकोसले का आवरण ओढ़ते हुए।

    जो समाज अपने भीतर से इवाल्व होते हैं, वे पीढ़ी दर पीढ़ी बहुत कुछ सीखते समझते परिमार्जित होते हुए चलते हैं। उनमें तर्कसंगतता, वस्तुनिष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समाधान व सततता के प्रति समझ व दृष्टि भी स्वतः सीखने समझने की लंबी प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप विकसित होती चली जाती है।

    जो समाज नकल उतारते हैं। उनमें तर्कसंगतता, वस्तुनिष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समाधान व सततता का बुरी तरह अभाव रहता है। जिनके पास कुछ दिमाग हुआ वह अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए तर्क-तर्क की पुंगी बजाते रहते हैं, इन मूर्खों व दंभियों को यह भी समझ नहीं होती कि बिना वस्तुनिष्ठता के तर्क का कोई मायने नहीं होता, ऐसा तर्क कूड़े के ढेर में डालने लायक भी नहीं होता, क्योंकि कूड़े की जैविकता को नष्ट करके विषैला बना देता है।

    लोकतंत्र हो या आर्थिक विकास या वैज्ञानिक विकास, भारतीय समाज ने अपने भीतर से धीरे-धीरे इवाल्व नहीं किया है, बल्कि नकल करके ढकोसले करते हुए ऊपरी आवरण ओढ़ लिया है। ऊपरी आवरण ओढ़ने के बाद भीतरी विकास की बात इसलिए बेमानी हो जाती है क्योंकि जिस बीमार मानसिकता के कारण ऊपरी आवरण ओढ़ा जाता है, वही मानसिकता ऊपरी आवरण की कशमकश में लिप्त रहती है। ऊपरी आवरण को बनाए व बचाए रखने के लिए भीतरी असलियत को वीभत्स तरीके से ढकने मूंदने का काम होता है। इसलिए मन में यह भ्रम बनाया जाता है कि आवरण ही असलियत है।

    यह कुछ उसी तरह है जैसे जब कोई विदेशी बड़ा राजनेता आता है तो हम ईटों या फलेक्स या कपड़ों या ऐसी दीवारें बनाते हैं जिससे हमारे देश की गरीबी न दिखे, हमारा लीचड़पना न दिखे। हम इस गलतफहमी में रहते हैं कि हमने आवरण से ढक दिया है, हमने ढोंग कर लिया है ढकोसला कर लिया है तो हमारी असलियत छुप गई है बदल गई है, हम ऐसे व्यवहार करने लगते हैं मानो हमारी असलियत यही आवरण हो।

    हम अपने आवरण व ढोंग को अपनी प्रतिष्ठा, गौरव, पहचान का मुद्दा बना लेते हैं। क्योंकि ज्यों ही हम आवरण व ढोंग को हटाते हैं तो हम बुरी तरह नंगे हो चुके होते हैं। इसलिए हम आवरण व ढोंग को ही अपनी उपलब्धियां व जीवन शैली मानने लगते हैं, अपने आपको आवरण व ढोंग के साथ बुरी तरह से जकड़ लेते हैं। तर्क गढ़ते हैं। सततता, वस्तिनिष्ठता की संभावनाओं के भ्रूण तक को नष्ट करने की जुगत में लग जाते हैं।

    योरप समाज व्यक्तिनिष्ठ नहीं है, वह वस्तुनिष्ठता पर आधारित चिंतन व विचारशीलता से चलता है। हमारा समाज व्यक्तिनिष्ठ है, हमारा चिंतन मनन विचारशीलता व्यक्तिनिष्ठता से चलता है, हमारी तर्कशीलता वस्तुनिष्ठ नहीं होती। योरप मार्क्स को ईश्वर नहीं मानता क्योंकि योरप समाज जानता है कि मार्क्स के विचार जादू से या आसमानी ताकत से नहीं आए, बल्कि मार्क्स के पैदा होने से भी बहुत पहले से ही ऐसे चिंतन शुरू हो चुके थे, मार्क्स के चिंतन से बेहतर चिंतन हो चुके थे, मार्क्स के समय संयोग व अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य ऐसा रहा कि मार्क्स की मार्केटिंग अच्छी हो गई।

    मार्क्स की जबरदस्त मार्केटिंग के बावजूद योरप समाज भ्रम या दुविधा में नहीं रहा। जब दुनिया के कई देश मार्क्स-मार्क्स, कम्युनिज्म-कम्युनिज्म का ढोंग चिल्ला रहे थे, और कम्युनिज्म का खोखला चोला ओढ़ कर केंद्रीय सत्ताओं का वीभत्स व भुरभुरा माडल खड़ा कर रहे थे।

    तब योरप समाज अपने भीतर बेहतर लोकतंत्र की ओर धीरे-धीरे समझते बूझते लड़खड़ाते सीखते इवाल्व हो रहा था। आज योरप के समाज में लोकतंत्र लगातार परिष्कृत हो रहा है। इनके लोकतंत्र में समाजवाद भी है, साम्यवाद भी है, लोकतंत्र भी है।

    प्रतिहिंसक विकृत नारीवाद

    ऐसा ही नारीवाद के मसले पर हुआ। योरप में नारीवाद अपने भीतर से इवाल्व हुआ, जबकि हमारे भारत जैसे देशों में समाज ने नारीवाद की नकल उतारी, आवरण पहना, ढोंग किया, ढकोसला किया। योरप का नारीवाद प्रतिहिंसा पर आधारित नहीं है। जबकि हमारा नारीवाद प्रतिहिंसा पर ही आधारित है। योरप के नारीवाद में वस्तुनिष्ठता है, हमारे नारीवाद में व्यक्तिनिष्ठता है।

    द सेकंड सेक्स की लेखिका योरप की थी, लेकिन उसे योरप में नारीवाद का आदर्श नहीं माना गया। लेकिन दुनिया के कई देशों के समाजों में सीमोन को नारीवाद का आदर्श माना गया, द सेकंड सेक्स किताब को नारीवाद की गीता के रूप में स्थापित किया गया। कारण वही था, क्योंकि हमारा नारीवाद हमारे भीतर से इवाल्व नहीं हुआ था, हमने नकल किया ढोंग किया ढकोसला किया।

    हमारा नारीवाद भी नकल, आवरण, ढोंग व ढकोसले पर आधारित है। यही कारण है कि हमारे भारतीय समाज में नारीवादी-स्त्री का नारीवाद घृणा, प्रतिक्रिया व प्रतिहिंसा पर आधारित है। नारीवादी-पुरुष का नारीवाद लफ्फाजी, ढोंग व सतहीपन पर आधारित है। दोनों तरफ से भयंकर रूप से विकृत है। ऐसा विकृत-नारीवाद सस्टेनेबल व हारमोनिक समाज की ओर कतई नहीं बढ़ सकता, बढ़ता ही नहीं है।

    योरप का नारीवाद नारी की महानता व विशिष्टता के मिथकों पर आधारित न होकर समानता पर आधारित है, तालमेल पर आधारित है, यही कारण है कि स्त्री पुरुष के संबंधो में दबाव नहीं है, प्रतिहिंसा नहीं है, घृणा नहीं है। प्रतिहिंसा व घृणा न होने के कारण ही नारीवाद विकृत-मातृत्व का वाहक नहीं बन पाता।

    योरप के नारीवाद का आधार मनुष्य को समान मानना है। स्त्री मनुष्य है, पुरुष मनुष्य है, इसलिए दोनो समान हैं, सीधा सरल सपाट विचार। यही कारण है कि स्त्री को ही नहीं नवजात शिशुओं तक के अधिकार का हनन नहीं। नवजात शिशु छोड़िए गर्भ में रहने वाले बच्चों के प्रति संवेदना रहती है, उनके साथ प्राकृतिक अन्याय नहीं हो, इसका ध्यान रखा जाता है।

    प्रतिहिंसा पर आधारित नारीवाद इतना विकृत होता है कि बच्चों के प्रति गहरी संवेदनशीलता नहीं विकसित होने देता है, उल्टे उन्हें हिंसक बनाता है। जैसे नारीवाद नकल, ढोंग व आवरण पर आधारित होता है वैसे ही बच्चों के प्रति विचारशीलता व संवेदनशीलता भी नकल व ढोंग आधारित होती है। बिना मौलिक समझ व्यवहार में प्रामाणिकता के ही लोग अपने आपको बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ मानकर खूब ज्ञान बांटते रहते हैं। लेकिन यदि इनके जीवन की सुरक्षा व व्यवस्था-तंत्र में छेड़छाड़ कर दीजिए, बच्चों के प्रति संवेदनशीलता व विचारशीलता की असलियत बाहर आकर फूटने लगती है।

    हिंसक विकृतमातृत्व

    प्रतिहिंसा आधारित नारीवाद न केवल विकृत मातृत्व को पोषित करता है, वरन हिंसक व अप्राकृतिक प्रसव को भी प्रतिष्ठित करता है। विकृत नारीवाद का आधार मनुष्य रूपी समानता की बजाय प्रतिहिंसा होने के कारण स्त्री को इतना कुंठित, विकृत व हिंसक बना देता है कि स्त्री अपने ही बच्चों के प्रसव के लिए हिंसक व अप्राकृतिक तरीकों का प्रयोग करती है और गौरव महसूस करती है। उसको अपने बच्चों के प्राकृतिक विकास व तालमेल से मतलब नहीं होता, क्योंकि उसे तो प्रतिहिंसा को प्राथमिकता के साथ जीना होता है।

    योरप का समाज जिसने नारीवाद, लोकतंत्र, व्यक्तिगत निजता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लगभग शून्य से विकसित करते हुए बहुत अधिक परिमार्जित किया, विकसित किया। जबकि भारत जैसे देशों के समाज नकल, ढोंग व ढकोसले इत्यादि को ही जीवन शैली मानकर लिप्त हो गए।

    योरप समाज वैज्ञानिक व तकनीकी रूप से अकल्पनीय आगे है। चाहे तो हर महिला आपरेशन से बच्चा पैदा कर सकती है, बहुत ही सामान्य सी बात है। इसके बावजूद योरप समाज बच्चों के प्रसव की प्राकृतिक व्यवस्था में छेड़छाड़ तब तक नहीं करता जब तक कि जच्चा-बच्चा के जीवन को वास्तव में खतरा न हो।

    योरप के अनेक देश तो ऐसे हैं जो प्रसव वाली महिला के घर में नर्स भेजते हैं जो प्राकृतिक तरीके से बच्चा पैदा करवाती है। ये देश चाहें तो अस्पतालों में भी प्राकृतिक प्रसव करा सकते हैं, लेकिन इन देशों का मानना है कि मां व बच्चे के मनोविज्ञान से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। योरप के अनेक देश ऐसे हैं जो महिला को अस्पतालों में कई दिन भर्ती रखते हैं लेकिन प्रसव प्राकृतिक तरीके से होता है। 

    तकनीकी रूप से इतना अधिक विकसित समाज, आर्थिक रूप से बहुत ही अधिक विकसित समाज, ऐसा क्यों करता है? जिस समाज की महिलाओं ने नारीवाद का बिगुल फूंका, दुनिया को नारीवाद की समझ दी, कि आज नारीवाद बहुत ही अधिक ऊंचे पायदानों पर खड़ा है। महिलाएं पुरुषों के साथ ही नहीं, आगे बढ़कर खड़ी हैं। ऐसा समाज व ऐसे समाज की महिलाएं नारीवाद के नाम पर प्राकृतिक प्रसव की बजाय, बिना शारीरिक पीड़ा वाला आपरेशन करके बच्चा पैदा करने को प्रतिष्ठित क्यों नहीं करतीं हैं?

    कारण सिर्फ यह है कि योरप का नारीवाद समाज के भीतर से इवाल्व हुआ है, किसी दूसरे समाज की बेढंगी नकल नहीं है, फूहड़ ढोंग नहीं है, सतही आवरण नहीं है, ढकोसला नहीं है, प्रतिहिंसा व शोषण पर आधारित नहीं है। इसी कारण योरप का समाज अपनी पीढ़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहता है। जिम्मेदारी महसूस करता है, ईमानदारी महसूस करता है।

    हिंसक अप्राकृतिक प्रसव

    गर्भावस्था, भ्रूण में बच्चे का विकास व प्रसव यह सब कुछ प्राकृतिक नियमों व व्यवस्थाओं के तहत होता है, जब तक कि जानबूझकर छेड़छाड़ न किया जाए।

    प्रसव की लंबी व व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। प्रसव में होने वाली विभिन्न प्रकार की असुविधाओं व पीड़ाओं को छोड़कर भारत जैसे समाजों के स्त्री व पुरुषों को, प्रसव से जुड़े विज्ञान व प्राकृतिक व्यवस्था की समझ ही नहीं होती है। जो होती भी है वह मिथकों पर आधारित होती है, बहुत चलताऊ होती है। परिणाम यह होता है कि प्राकृतिक-प्रसव का संबंध गर्भाशय के फैलने सिकुड़ने व योनिद्वार के खुलने इत्यादि के कारण से होने वाली शारीरिक पीड़ाओं तक ही सीमित कर दिया जाता है।

    गर्भ में बच्चे का विकास व प्रसव प्रकृति की अद्वितीय व ऑटोमेटेड व्यवस्थाओं में से है। प्रसव के समय विभिन्न प्रकार की फैलने सिकुड़ने की भाषाओं व कोडों के आधार पर शरीर बहुत प्रकार के ऐसे तत्व बच्चे को स्थानांतरित करता है जो उसके पूरे जीवन का विकास तय करते हैं। प्रकृति ने स्त्री के शरीर को प्रसव के समय व बाद में ऐसे कई प्रकार के अद्वितीय हार्मोन्स व तत्वों की सुविधा दी है जो उसके शारीरिक दर्द को सहन करने की ताकत देते हैं।

    बच्चा जब प्राकृतिक रूप से पैदा होता है तो शरीर व बच्चे के बीच तालमेल होता है, हर एक पल की गतिविधि व्यवस्थित तरीके से संपन्न होती है। बच्चे को माता से झटके से अलग नहीं किया जाता है, बच्चे व माता के शरीर के साथ समन्वय रहता है। दोनों एक दूसरे को हर पल महसूस करते रहते हैं।

    योरप समाज तो बच्चे व माता के मध्य तालमेल व प्राकृतिक नियमों को कम से कम छेड़ने के लिए कई कदम और आगे बढ़ चुका है। बच्चे के योनि से बाहर आते ही, तुरंत उसी पल माता के नंगे शरीर के ऊपर डाल दिया है ताकि बच्चा माता के शरीर की सुगंध, गर्माहट व अहसास पाता रहे।

    आपरेशन के द्वारा पैदा होने वाले बच्चों की माता के शरीर का बच्चे के प्रसव के साथ प्राकृतिक तालमेल नहीं हो पाता। प्राकृतिक ऑटोमेटेड ढांचे व व्यवस्था को तोड़ दिया जाता है। आपरेशन के समय माता को इंजेक्शन दिए जाते हैं, आपरेशन के बाद माता ढेरों दवाएं खाती रहती है, जिनमें से अधिकतर हाई-डोज वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं होती हैं। इंजेक्शन से लेकर दवाओं तक यह सभी अप्राकृतिक तत्व माता के शरीर से दूध के माध्यम से नवजात शिशु को पहुंचते रहते हैं। बहुत बार ऐसे आपरेशनों का साइड-इफेक्ट महिला आजीवन किसी न किसी बीमारी या शारीरिक असुविधा के रूप में झेलती रहती है।

    योरप की अधिकतर महिलाएं तो प्राकृतिक प्रसव के बाद पेन-किलर तक नहीं लेती हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों को मिलने वाले दूध में इन दवाओं का प्रभाव नहीं पड़ने देना चाहतीं हैं। यह महिलाएं ऐसा इसलिए सोच व कर पाती हैं क्योंकि उनका नारीवाद नकल नहीं है, ढोंग नहीं है, ढकोसला नहीं है, प्रतिहिंसा पर आधारित नहीं है।

    भारत जैसे देशों में तो आपरेशन से पैदा होने वाले बहुत बच्चों को मां का स्पर्श तक नहीं प्राप्त होता है, कई-कई दिनों तक मां का दूध तक नहीं प्राप्त होता है। कई-कई दिनों तक नवजात शिशुओं को आईसीयू में रखा जाता है। मां का पेट काटकर बच्चे को जबरदस्ती खींच कर बाहर निकालने के बाद बच्चे व माता का संबंध ही तोड़ दिया जाता है, यही कारण है कि अधिकतर बच्चों को आईसीयू में रखने जैसा घिनौना कुकृत्य करना पड़ता है।

    जिन लोगों को प्रसव विज्ञान, जच्चा-बच्चा विज्ञान की वास्तव में समझ है, और वे लोग ईमानदार हैं, ढोंगी नहीं हैं, ढकोसलेबाज नहीं हैं। उनको पता है कि प्रसव के समय प्राकृतिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करना कितना वीभत्स, हिंसक व हानिकारक है। बच्चे के जीवन का पूरा का पूरा मनोविज्ञान तक बदल जाता है, भले ही हमें आभास न हो।

    जिस समाज में बच्चा बढ़ा होकर नौकरी पा जाए, पैसा कमाने लगे, यही जीवन का लक्ष्य हो, सबकुछ यही सब से तय होता हो। उस समाज व माता-पिता को क्या अहसास होगा कि उनके बच्चे ने प्रसव के समय आजीवन के लिए क्या खो दिया?

    स्त्री हो या पुरुष या समाज, यदि प्राकृतिक प्रसव की बजाय कृत्रिम प्रसव की वकालत करते हैं, तो ये लोग बहुत ही अधिक हिंसक, विकृत व मनोवैज्ञानिक बीमार मानसिकता के लोग होते हैं। और ऐसी बीमार मानसिकता की प्रतिष्ठा का मुख्य कारक-आधार प्रतिहिंसा आधारित विकृत-नारीवाद होता है। 

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Video: Aadi reads words himself (वीडियो: आदि शब्द स्वयं पढ़ लेते हैं)

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    साढ़े तीन वर्षीय आदि पूरी एबीसीडी जानते हैं, किस अक्षर को किस ध्वनि के साथ पढ़ते हैं, यह भी जानते हैं। इसलिए अब शब्दों को एबीसीडी अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ लेते हैं। एबीसीडी के अक्षरों को पहचानने, ध्वनि को समझना व शब्दों को अक्षरों व ध्वनि से संयुक्त करके पढ़ना। यह सब आदि ने अपने आप सीखा है। मैंने या डा० क्लेयर ने कभी आदि को कुछ रटाया नहीं है, न ही आदि ऐसे किसी स्कूल जाते हैं जहां यह सब सिखाया पढ़ाया रटाया जाता हो।

    आदि ने यह सबकुछ अपने आप खेल-खेल में सीखा है। आदि पिछले कई महीनों से अपना नाम लिख लेते हैं। आजकल अपने आप एबीसीडी लिखने का अभ्यास भी करते रहते हैं। अंको को भी लिखने का अभ्यास करते रहते हैं। आदि यह सब अपने आप खेल-खेल में मस्ती से सीखते समझते रहते हैं। मैं या डा० क्लेयर कभी भी आदि पर कभी भी किसी प्रकार का दबाव नहीं डालते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश महासंघ : असंभव नहीं केवल ईमानदार भावना व दूरदृष्टि चाहिए

    भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश महासंघ : असंभव नहीं केवल ईमानदार भावना व दूरदृष्टि चाहिए

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    दरअसल हम भारतीयों में से अधिकतर लोग अपने मन के अंदर नफरत व तिरस्कार की बहुत गहरी परतों को बनाते हुए अपना जीवन जीते हैं। हमारे रोजमर्रा के जीवन का आधार प्रेम न होकर ईर्ष्या द्वेष जलन इत्यादि होता है। यही कारण है कि वयस्क होने के पहले ही भाई-भाई, भाई-बहन, बहन-बहन तक में ईर्ष्या जलन व नफरत इत्यादि बहुत गहरे तक पैठ जाता है। इतना गहरे पैठता है कि हमारा पूरा जीवन ही नफरत, ईर्ष्या, द्वेष जलन इत्यादि से ही नियंत्रित होने लगता है। परिणामतः हम ढोंग, फरेब व दिखावे में जीवन जीने लगते हैं, और इसी तरह जीने को जीवन जीने का सलीका मान लेते हैं।

    जब अपने ही परिवार, अपने सगों के प्रति हम ऐसे भाव रखते हैं तो कल्पना कीजिए कि जिनको हम अपना दुश्मन मानने की मानसिकता के साथ बचपन से पले-बढ़े होते हैं, उनके प्रति कितने भयंकर ऋणात्मक भाव रखते होंगे। यही ऋणात्मकता हमें मनुष्य के तौर पर बहुत ही अधिक पीछे धकेलती चली जाती है। हमें पता ही नहीं चलता लेकिन हम मानसिक, भावनात्मक व वैचारिक रूप से अधिक और अधिक कुरूप मनुष्य बनते चले जाते हैं।

    पाकिस्तान हो या बांग्लादेश भारत में जो भी वैध-अवैध शरणार्थी आए हैं, उनका बहुत बड़ा हिस्सा गैर-मुस्लिमों का रहा है। इसका कारण संभवतः यह हो सकता है कि पाकिस्तान व बांग्लादेश आधिकारिक तौर मुस्लिम देश हैं और वहां गैर-मुस्लिमों को सामान्य नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

    कारण कई हैं, आपस में बहुत अधिक गढ्ढमढ्ढ भी हैं। हमारी सामाजिक कंडीशनिंग, नफरत, अजानकारी तथा जानकारी के प्रति उपेक्षा की मानसिकता, पूर्वाग्रह इत्यादि कई आवेगों इत्यादि के कारण हमारे मन में यह चित्रण रहता है कि पाकिस्तान व बांग्लादेश निहायत ही सड़ियल देश हैं जहां के लोग घिसटते हुए जीवन जीते हैं।

    इसी तरह की मानसिकताओं के कारण, पूर्वाग्रहों के कारण हम लोगों को यह लगता है कि ऊंची बिल्डिंगे खड़ी करने, सड़के बनाने, चकाचौंध होने से हम विकसित देश बनने की ओर लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं। परिणामतः हम विकसित देशों के विकास को ढंग से, गहराई से जाने समझे बिना, भोंढे तरीके से सतही तौर पर नकल करने में पूरी ऊर्जा के साथ जुटे रहते हैं। हम अपने जीवन, परिवार, समाज व देश को बेहतर बनाने के लिए जीवन के प्रति समझ व दृष्टि विकसित करते ही नहीं हैं।

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि पाकिस्तान हो, बांग्लादेश हो या भारत सभी के समाजों व लोगों की मानसिकता व कंडीशनिंग का चरित्र समान है। तीनों देशों के समाज व लोग सामंती व भ्रष्ट मानसिकता के हैं। तीनों ही देशों के समाज, परिवार, लोग, व्यवस्थाएं व तंत्र कागजी लोकतंत्र हैं, न कि चारित्रिक तौर पर लोकतंत्र।

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि जैसे हमने अपने आपको बाजार बना लिया वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश भी तो अपने आपको बाजार बना सकते हैं। जैसे हमारे यहां करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं, वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं। जैसे हमारे यहां विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया, उसी तरह पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया।

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि जैसे भारत से पढ़े लिखे इंजीनियर व अन्य लोग विदेश जाते हैं वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश से भी जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि जैसे हम अपने बच्चों को घर, जमीन जायदाद बेचकर या गिरवी रखकर या बेईमानी निर्लज्जता झूठ फरेब भ्रष्टाचार से कमाए गए पैसों से विकसित देशों के संस्थानों में डिग्री पढ़ने के लिए भेजते हैं, वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश के लोग भी अपने बच्चों को भेजते हैं। विकसित देशों में भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश से आने वाले छात्रों का बहुत ही कम प्रतिशत छोड़कर जाते हैं भारी भरकम फीस देकर पढ़ने लेकिन माता-पिता झूठ बोलते हैं कि छात्रवृत्ति पर पढ़ने गए हैं। बचपन से लेकर मृत्यु तक पूरा जीवन ढोंग, झूठ व दोहरेपन में ही लिप्त रहता है, इसी तरह जीने को हम लोगों ने व्यवहारिकता मान लिया है, स्मार्टनेस मान लिया है। 

    हम यह देखना व स्वीकारना नहीं चाहते हैं कि पूजा-पाठ के तौर तरीकों इत्यादि जैसी कुछ बातों को छोड़ भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के समाज व लोगों में चारित्रिक अंतर नहीं है। सैकड़ो-हजारों वर्षों की कंडीशनिंग को जीवन के प्रति सोच में आमूलचूल परिवर्तन किए बिना परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि अलग-अलग देश बन जाने के बावजूद, कई दशक गुजर जाने के बावजूद मानसिकता व कंडीशनिंग में चारित्रिक अंतर नहीं आया है। 

    हम कोरे व सतही राष्ट्र-गौरव के दंभ में इस कदर डूबे रहते हैं कि हम देखने व सोचने समझने की दृष्टि का विकास ही नहीं होने देते हैं, इतना ही नहीं दूसरों के द्वारा इस ओर किए जाने वाले प्रयासों का उपहास करते हैं, तिरस्कृत करते हैं, उपेक्षित करते हैं। ऊपर से हमारी राजनैतिक-साक्षरता मतलब करेला ऊपर से नीम चढ़ा जैसी स्थिति। हम यह समझना व स्वीकारना ही नहीं चाहते कि तीनों देशों के समाजों व लोगों का मूल चरित्र समान है, जबकि तीनों देशों के लोगों के चरित्र की स्थिति अपवाद छोड़ स्थिति-गति-परिस्थिति कमोबेश एक जैसी है, बाहरी आवरणों में कुछ अंतर भले ही हो सकता है।

    चूंकि समाज एक ही था, तानेबाने का चरित्र कैसा भी रहा हो लेकिन बहुत गहराई से सामाजिक तानाबाना बुना हुआ था। देशों का अलग होना राजनैतिक सीमाओं का अलगाव था। समाज व लोगों का मूल चरित्र दशकों के राजनैतिक सीमाओं में अंतर के बावजूद समान ही रहा है। सामंती नौकरशाही, भ्रष्टाचार इत्यादि का चरित्र भी कमोबेश समान है। 

    विज्ञान, आधुनिक बाजार व आर्थिक तंत्रों ने जाति-व्यवस्था को कमजोर होने के लिए विवश किया है, भले ही शोषक वर्गों/जातियों का षणयंत्र व पुरजोर प्रयास रहता हो कि समाज व लोग जाति-तंत्रों में ही फसे रहें। यदि राजनैतिक दुराग्रहों से परे हम जाति व धर्म की गुलामी से स्वयं को मुक्त करके अपनी अगली पीढ़ियों, अपनी संतानों, अपने समाज व अपने देश के बारे में ईमानदारी से वस्तुनिष्ठता से विचार करें व निर्णय लें तो भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के महासंघ की स्थापना सरलता से संभव है। यदि ये तीन देश महासंघ की स्थापना करते हैं तो यह सुनिश्चित है कि निकट भविष्य में इस महासंघ में नेपाल, म्यमनार, श्रीलंका, मालद्वीप व अफगानिस्तान भी स्वयं को सम्मिलित करना चाहेंगे।

    भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • बांग्लादेश — इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास

    बांग्लादेश — इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ढाका, राष्ट्रीय राजधानी बांग्लादेश

    बांग्लादेश का नाम आते ही हम भारतीयों के जेहन में ऐसा चित्रण आता है जैसे भारत के किसी बहुत पिछड़े हुए गांव, जहां कोई सुविधाएं नहीं, लोग बाग किसी तरह घिसटते हुए जीवन गुजार रहे होते हैं। रहने के लिए ढंग के घर नहीं, ढंग की सड़के नहीं। स्कूल नहीं, यूनिवर्सिटी नहीं, सुख सुविधा नहीं। ऐसा ही कुछ चित्रण बनता है हमारे जेहन में।

    पड़ोसी देशों विशेषकर मुस्लिम-धर्म की बहुतायत वाले पड़ोसी देशों के प्रति बचपन से ही हमारा माइंडसेट ही ऐसा बना दिया जाता है कि हमें लगता है कि भारत बहुत अधिक विकसित है और पाकिस्तान व बांग्लादेश अति पिछड़े देश हैं, वहां बैलगाड़ियों पर लोग चलते हैं। इसके अतिरिक्त बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थियों व घुसपैठियों से जुड़े मुद्दों को दशकों से इस प्रकार का राजनैतिक रूप दिया जाता रहा है कि हम भारतीयों को लगता है कि मानो बांग्लादेश में लोग अभी भी गुफाओं या झोपड़ियों या मिट्टी के बने घरोंदो या छोटे-मोटे घरों में रहते हैं।

    हम यह नहीं सोच पाते हैं कि जैसे हम भारत में विदेशी कंपनियों की कार्यशालाओं के लिए सस्ती जमीनें, सस्ता कच्चा माल, प्राकृतिक संसाधन व सस्ता मानव श्रम उपलब्ध कराते हैं, उसी तरह पाकिस्तान व बांग्लादेश भी तो उपलब्ध करा सकते हैं। हम यह सोचने की बजाय विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में स्थापित कार्यशालाओं में बनी वस्तुओं व उपकरणों के बारे में यह सोचते हैं कि यह हमारे देश की उपलब्धि है और हम राष्ट्र-गौरव का दंभ जीने की कोशिश में जुट जाते हैं। जबकि इन कंपनियों की कार्यशालाएं भारत के अलावा अनेक अन्य देशों में भी होती हैं, जहां भी उन्हें सस्ता कच्चा माल, सस्ता मानव श्रम उपलब्ध हो जाता है।

    हम यह नहीं सोच पाते हैं कि जैसे हमने अपने आपको बाजार बना लिया वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश भी तो अपने आपको बाजार बना सकते हैं। जैसे हमारे यहां करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं, वैसे ही पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी करोड़ों लोग उपभोक्ता के रूप में उपलब्ध हैं। जैसे हमारे यहां विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया, उसी तरह पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी विदेशी कंपनियों ने अपना बाजार स्थापित करने के लिए चकाचौंध का विकास किया।

    1947 से 1971 तक मतलब जब तक बांग्लादेश स्वयंभू राष्ट्र नहीं बना था, तब तक तो बांग्लादेश की स्थिति बहुत ही अधिक खराब थी। 1971 को पाकिस्तान से अलग होने के बाद बांग्लादेश ने धीरे-धीरे खड़ा होना शुरू किया। जनसंख्या घनत्व बहुत होने, निरक्षरता बहुत अधिक होने तथा प्राकृतिक आपदाओं से भयंकर रूप ग्रस्त इस देश बांग्लादेश ने धीरे-धीरे जूझते हुए अपना बहुत अधिक विकास किया है। शिक्षा व स्वास्थ्य पर बेहतर करने के लिए प्रयासरत है।

    आइए इस फोटो-लेख में फोटो के माध्यम से बांग्लादेश में इन्फ्रास्ट्रक्चर वाले विकास को जानने समझने का प्रयास करते हैं साथ ही भारत व बांग्लादेश में विकास के प्रति मानसिकता की चारित्रिक समानता को भी समझने का प्रयास करते हैं। फोटो बांग्लादेश के विभिन्न इलाकों की हैं।

    भवन

    शिक्षण संस्थाएं

    स्कूल
    यूनिवर्सिटीज

    अस्पताल

    माल्स/सुपर मार्केट्स

    सड़कें

    जल यातायात

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    भारतीय हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति नफरत व गलतफहमी से बाहर आना होगा : पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    समय-समय पर भारत में नेताओं के बयान आते रहते हैं व आम लोग बातचीत में कहते रहते हैं कि पाकिस्तान भेज दो या पाकिस्तान चले जाओ। इसका मतलब यह निकलता है कि जैसे पाकिस्तान में लोग खानाबदोश की तरह रहते हैं। पाकिस्तान में सड़कें नहीं हैं, सुविधाएं नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं, शिक्षा नहीं है, नागरिक सुविधाएं नहीं हैं। ऐसा ही और भी बहुत कुछ।

    हम भारतीय विशेषकर हिंदू-धर्म के अनुयाई इस कल्पना में जीते हैं कि पाकिस्तान में विकास का ककहरा तक नहीं होगा, बहुत बुरी गत से लोग रहते होंगे। हम यह भूल जाते हैं कि भारत व पाकिस्तान का समाज एक ही था। इसलिए धार्मिक मामलों को छोड़कर समाज की मानसिकता व कंडीशनिंग कमोबेश समान ही रही है। विभाजन के बाद मानसिकता व कंडीशनिंग में कुछ बहुत बदलाव आए हो सकते हैं, लेकिन चारित्रिक मूल-आधार समान है।

    जैसे भारत ने तीन-तिकड़म से परमाणु बम, मिसाइल इत्यादि बनाए। पाकिस्तान ने भी उसी तरह के तीन-तिकड़म से परमाणु बम, मिसाइल इत्यादि बनाए। जैसे भारतीय समाज ने अपने लिए गैर-वैज्ञानिकों को महान वैज्ञानिकों के रूप प्रायोजित किया ताकि राष्ट्र-दंभ को तृप्त किया जा सके। उसी तरह पाकिस्तान समाज ने अपने लिए गैर-वैज्ञानिकों को महान वैज्ञानिकों के रूप में प्रायोजित किया ताकि राष्ट्र-दंभ को तृप्त किया जा सके।

    विकसित देशों में भारतीयों की संख्या पाकिस्तानियों की तुलना में कुछ अधिक हो सकती है, लेकिन यदि जनसंख्या का कितना प्रतिशत विकसित देशों में अनिवासी के रूप में रहता है तो पाकिस्तान के लोगों का प्रतिशत अधिक निकलेगा। भारतीयों की तरह पाकिस्तानी भी विकसित देशों में बड़े व प्रतिष्ठित पदों पर काम करते हैं। विकसित देशों में पाकिस्तानियों को जिम्मेदार व मेहनती लोगों के रूप में माना जाता है।

    जहां विकसित देशों के लोग खूबसूरत लकड़ी के घरों में रहना पसंद करते हैं, घर छोटा भी हो तब भी बागवानी रखते हैं, घरों को हवादार व प्रकाश से भरपूर बनाते हैं। वहीं हम भारतीय इन्फ्रास्ट्रक्चरल-चकाचौंध को विकास मानते हैं। हम पेड़-पौधों को काट-काट कर कांक्रीट के जंगल खड़ा करने को विकास मानते हैं। चकाचौंध को विकास व उपलब्धि मानने के कारण हमारा समाज भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है, क्योंकि पैसे से चकाचौंध खरीदी जा सकती है। ऐसी ही मानसिकता पाकिस्तान-समाज की है। पाकिस्तान-समाज चकाचौंध वाले विकास के मामले में भारत-समाज से कुछ कदम आगे ही है। चूंकि दोनों देशों के समाजों की मानसिकता व मूल चरित्र समान है इसीलिए सामाजिक विकास इत्यादि के मामलों में दोनों देशों की दुनिया में रैंकिंग कुछ कम-अधिक एक जैसी रहती है।

    यदि हम भारतीय-समाज यह सोचते हैं कि सौ दो-सौ साल बाद भारत दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी में आए तो हमें मौलिक होना पड़ेगा, हमें लोकतांत्रिक सोच का होना पड़ेगा, हमें विजनरी होना पड़ेगा। भारत के हिंदू-समाज को पाकिस्तान के प्रति कूट-कूट कर भरी नफरत से बाहर आना होगा।

    यह लेख मूलतः पाकिस्तान में विकास के मामले पर है। इसलिए इस लेख को फोटो-लेख के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। फोटो पाकिस्तान के विभिन्न शहरों की हैं।

    भवन

    माल्स/सुपर-मार्केट्स

    सड़कें

    हवाई अड्डा

    शिक्षण संस्थाएं

    अस्पताल

    इस्लामाबाद

    राष्ट्रीय राजधानी — प्राकृतिक सौंदर्य व इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास का समन्वय


    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • विविध व विस्तृत स्वाध्याय बनाम विभिन्न प्रकार की भक्तई

    विविध व विस्तृत स्वाध्याय बनाम विभिन्न प्रकार की भक्तई

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    दरअसल भारतीय समाज में स्वाध्याय करने की आदत नहीं है। माता-पिता, परिवार, रिश्तेदार व समाज स्वाध्याय को बच्चों के बचपन से ही भयंकर रूप से हतोत्साहित करता है, हतोत्साहित ही नहीं करता तिरस्कृत भी करता है, उपहास भी उड़ाता है। यहां तक कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों के साथ भी यही होता है, वैसे भी ऐसे माहौल में पलने बढ़ने के कारण तथा रोजगार के बेहतरीन अवसरों पर देश के चंद यूनिवर्सिटियों का सामंती चरित्र के साथ कब्जा होने के कारण भी स्वाध्याय हतोत्साहित होता है। स्वाध्याय करते हुए घर वालों की गालियां व जूते खाएं या रोजगार के लिए मशक्कत करें।

    उसी जगह देश की जो चंद यूनिवर्सिटियां जबरदस्ती सामाजिक मसलों के चिंतन का ठेकेदार बनीं हुईं हैं। उनमें सिर्फ यह है कि वहां यदि छात्र चाहे तो स्वाध्याय के कुछ अवसर उपलब्ध हैं। लेकिन चूंकि छात्र की बचपन से स्वाध्याय की प्रवृत्ति नहीं होती इसलिए स्वाध्याय के इन अवसरों का प्रयोग पूर्वाग्रह या फैशन या कंडीशनिंग के कारण विकृत जो जाता है, व्यक्तित्व व संभावनाओं का प्रष्फुटीकरण नहीं हो पाता। इस कारण स्थिति यह हो जाती है कि इन चंद यूनिवर्सिटी के छात्र व शिक्षक देश के स्वयंभू कर्णधार व ठेकेदार बन जाते हैं। जो मन में आए, या जो इनके हित का या स्वार्थ का एजेंडा हो या पूर्वाग्रह हों या जो भी उटपटांग चिंतन स्तर हो या जो भी सतही समझ हो,  उसमें ही लिप्त हो जाते हैं। समाज की कंडीशनिंग ही ऐसी है कि यही सबकुछ इनकी महानता भी बन जाती है।

    चूंकि अधिकतर लोग स्वाध्याय बिलकुल भी नहीं करते हैं। इसलिए ये लोग चिंदी सा भी स्वाध्याय कर लेते हैं तो आदर्श बन जाते हैं, यहां तक कि महान के रूप में भी प्रायोजित हो जाते हैं, क्रांतिकारी व प्रगातिशील व जागरूक के रूप में प्रायोजित हो पाना तो बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली का खेल हो जाता है। ये लोग इतने धूर्त व सामाजिक बेईमान होते हैं कि पूरी मशक्कत के साथ खुद को समाज व देश का कर्णधार व महान चिंतक व प्रगतिशील के रूप में प्रायोजित करते हैं। इनका पूरा जीवन ढोंग व खोखलेपन में ही गुजरता है। यह लोग स्वतंत्र व ईमानदार चिंतकों से खार खाते हैं, उनके खिलाफ बाकायदा अदृश्य नेक्सस बनाते हैं।

    खतरनाक स्थिति यह होती है कि ये लोग खुद को महान मानते हैं, भारतीय समाज के आम लोगों की तो कंडीशनिंग ही ऐसी होती है कि इन चंद यूनिवर्सिटियों के लोगों को महान मानने के दायरे के बाहर कुछ सोच ही नहीं सकते।

    कोई भी देश या समाज किन्हीं नरेंद्र मोदी या अमित शाह या किन्हीं अन्य राजनेताओं के कारण चिंतन, विचार, वस्तुनिष्ठता, समझ व दृष्टि के मामले में पीछे नहीं जाता। क्योंकि कोई भी समाज राज-सत्ताओं पर कभी भी पूरी तरह अंध-विश्वास नहीं करता। सत्ताओं पर अंध-विश्वास करना संभव ही नहीं, असंभव है।

    लेकिन आम लोग उन लोगों पर विश्वास करते हैं जो लोग बुद्धिजीवी व चिंतको के रूप में प्रायोजित होते हैं। खतरनाक यह है कि भारत की चंद यूनिवर्सिटियों को बुद्धिजीवी व चिंतको को पैदा करने का छापाखाना मान लिया गया है। यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है, इससे भी खतरनाक यह है कि इसको खतरनाक मानने की बजाय, हितकारी माना जाता है, उद्धारक माना जाता है।

    जब कोई समाज खोखलाहट को, दोहरेपन को, ढोंग को, सतहीपन को आदर्श मानने लगता है, तब उस समाज को मूर्ख बनाना बहुत सरल हो जाता है। भारतीय समाज में यही हो रहा है। यही कारण है कि राजनैतिक सामाजिक मुद्दों पर आम आदमी के निर्णय प्रभावित होते आ रहे हैं। भारतीय समाज की राजनैतिक सामाजिक जागरूकता आगे बढ़ने की बजाय पीछे की ओर जा रही है, उल्टा चल रहे हैं।

    स्वाध्याय के सतहीपन का स्तर यह है कि कोई ओशो की कुछ किताबें पढ़ लेता है तो सबकुछ ओशो की बातों के आधार पर ही देखना शुरू कर देता है। कोई इतिहास की कुछ किताबें पढ़ लेता है तो इतिहासविद बन जाता है, भले ही इतिहास के नाम पर जो किताबें उसने पढ़ीं हों वे कूड़ा रहीं हों। ऐसा ही समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र व अन्य विषयों के लिए भी है। अधकचरापन बेहद खतरनाक होता है, ऊपर से यदि अधकचरेपन में इगो व अहम का तड़का लग जाए तो स्थिति बहुत ही अधिक खतरनाक हो जाती है।

    स्वाध्याय के द्वारा एक आम आदमी किसी विषय या अनेक विषयों पर भारत की सबसे बेहतरीन मानी जानी वाली यूनिवर्सिटी से पीएचडी किए छात्र या प्रोफेसर से भी अधिक व बेहतर समझ रख सकता है, यूं कहा जाए कि रखता ही है। स्वाध्याय व्यक्ति को स्वतंत्र बनाता है। स्वाध्याय व्यक्ति को अंदर से मजबूत बनाता है, सामाजिक ईमानदार बनाता है, दृष्टिवान बनाता है। बशर्ते स्वाध्याय का स्तर विविधतापूर्ण व विस्तृत हो।

    दुनिया के विकसित देशों की यूनिवर्सिटियों में तो ऐसी व्यवस्था होती है कि यदि कोई व्यक्ति योग्य है तो उसके पास डिग्री हो या न हो, वह शोध यहां तक कि पीएचडी कर सकता है, यूनिवर्सिटी बाकायदा स्कालरशिप देतीं हैं। यही कारण है कि विकसित देशों की यूनिवर्सिटियों के शोधों व पीएचडी का अलग ही स्तर होता है।

    भारतीय समाज को अपने बच्चों को बचपन से ही विविधतापूर्ण स्वाध्याय की ओर प्रोत्साहित करना चाहिए, अनगिनत अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। स्वाध्याय कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। भारतीय समाज यदि अपने बच्चों को विविधतापूर्ण व विस्तृत स्वाध्याय के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दे, अवसर उपलब्ध कराना शुरू कर दे। केवल दो दशकों में ही आमूलचूल अंतर दीखना शुरू हो जाएगा।

    नहीं तो विकसित देशों की भोंडी नकल करने या गरियाने में ही अपना विकास व प्रगतिशीलता व चिंतनशीलता का गौरव अनुभव करता रहेगा। जो समाज सतहीपन व खोखलाहट व ढोंग से भी गौरव महसूस करने की मानसिकता में जीने लगते हैं, उनको सड़ने से बचाया नहीं जा सकता है, असंभव होता है क्योंकि सड़ांध ही उनके चरित्र के मूल में होता है।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • प्रदूषण बनाम समाज

    प्रदूषण बनाम समाज

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    अपने भारतीय समाज में प्रदूषण की बात कीजिए तो लोग बहुत चौड़े से बताते हैं कि वे बहुत जागरूक हैं, इसलिए साल में दस-बीस-पचास पेड़ों को गढ्ढा खोदकर पौधारोपड़ कर देते हैं। कुछ लोग अपने घरों में दस-बीस-सौ-पचास गमलों में फूल व सब्जी भी उगा लेते हैं। स्कूलों में अंताक्षरी करवा देते हैं। किसी अधिकारी या नेता या सेलिब्रिटी को बुलवा कर भाषण करवा देते हैं, झंडा फहरवा देते हैं। टीवी चैनलों में प्रवचन देते हैं। कभी कभार झाड़ू लेकर खड़े हो गए। वर्कशाप आयोजित कर लीं। कुछ टीवी एंकर तो केवल इसलिए महान हो गए क्योंकि वे विभिन्न मुद्दों पर सरकारों की बुराई कर लेते हैं, क्योंकि उनके द्वारा ऐसा करना हमारे समाज के लोगों की सामंती मानसिकता व कुंठा को तृप्त करता है। जमीन पर बिना ठोस प्रयास किए केवल बुराई करना व समाधान के नाम पर हवाई लफ्फाजी ही महानता की कसौटी बन जाती है।

    कुछ लोग तो ऐसे भी हैं कि किसी नदी किनारे बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता, कुछ भाषण प्रतियोगिता, घर में चाय नास्ता करते हुए पर्यावरण पर कुछ चर्चा, पत्रकारों से वार्ता, बैनर लगवा दिया, पोस्टर चिपका दिए व किसी मैगसेसे पुरस्कृत या अन्य सेलिब्रिटी के आगे-पीछे डोलने को बहुत बड़ा पर्यावरण काम व विशेषज्ञता मान कर भयंकर दंभ में जीते हैं। दो-चार विदेशियों से हाथ मिला लिए तो और महान हो गए।

    लेकिन क्या सच में ही इतने तामझाम वाले ये लोग, प्रदूषण को जानते समझते हैं… या स्वयं इन लोगों की भी जीवन शैली ऐसी होती है कि ये लोग भी पर्यावरण को भरपूर नुकसान पहुंचाते हैं, ऊपर से विडंबना यह कि यही लोग पर्यावरणविद होने की वाहवाही भी लूटते हैं।

    दरअसल प्रदूषण फूल, पत्ती व जनसंख्या सेलिब्रिटिज्म इत्यादि से इतर वस्तु है। इसका समाज व लोगों की जीवन शैली, जीवन के प्रति सोच, मानसिकता व चले आ रहे सामाजिक संस्कारों से बहुत गहरा संबंध होता है। तकनीक, विज्ञान व सुविधाओं इत्यादि के प्रयोग करने के ढंग से होता है।

    नीचे दिए गए एक मोटा-मोटी उदाहरण से कुछ मोटा-मोटी समझने का प्रयास करते हैं।

    मध्यप्रदेश, भारत

    क्षेत्रफल के अनुसार भारत का मध्यप्रदेश राज्य ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय राजधानी राज्य कैनबरा से लगभग 130 गुना बड़ा है। दोनों राज्यों के जनसंख्या घनत्व में बहुत अधिक अंतर नहीं है, मध्यप्रदेश का जनसंख्या घनत्व 240 प्रति वर्ग किलोमीटर तथा कैनबरा का जनसंख्या घनत्व 190 प्रति वर्ग किलोमीटर।

    मध्यप्रदेश राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत बड़ा है, खूब पेड़ हैं, खूब जंगल हैं। राज्य के अधिकतर हिस्से में विकास पहुंचा ही नहीं है। सैकड़ों गांव विकास से अछूते हैं। मध्यप्रदेश में बहुत अधिक उद्योग भी नहीं हैं। अनेक नदियां हैं, चौड़ी व बड़ी नदियां भी हैं। ऊंची पर्वत श्रंखलाएं हैं। हजारों एकड़ क्षेत्रफलों वाले अनेक नेशनल रिजर्व हैं।

    कैनबरा (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र), ऑस्ट्रेलिया

    कैनबरा की जनसंख्या लगभग सवा चार लाख है। निवासियों के पास तीन लाख से अधिक कारें हैं। राष्ट्रीय राजधानी है तो सरकारी विभागों की गाड़ियां भी हैं। कई हजार बसें हैं। सामान लदाई ढुलाई व अन्य व्यवसायिक वाहन हो गए। मोटरसाइकिलें हो गईं।

    लगभग हर घर व हर आफिस के हर कमरे में एसी लगे हैं। लगभग हर घर में घर को गर्म रखने वाले हीटर लगे हैं। लगभग हर घर में (जो भी जमीन पर बने हैं) लान-मोवर्स हैं जिनमें से अधिकतर पेट्रोल या डीजल से चलने वाले हैं। लगभग हर घर में कई-कई कम्प्यूटर व मोबाइल हैं। लगभग हर घर में रेफ्रीजेरेटर है, लगभग हर घर में वाशिंग मशीन है, लगभग हर घर में माइक्रोवेव व ओवन हैं।

    बिजली कटौती बिलकुल नहीं होती। दस-बीस सालों में मेंटीनेंस के लिए कुछ देर के लिए की जाने वाली कटौती को छोड़कर एक सेकंड के लिए भी नहीं होती। पानी की सप्लाई एक सेकंड के लिए नहीं रुकती। घर या आफिस कितनी भी ऊंचाई पर हो, पानी की सप्लाई तेजगति से होती है।

    कैनबरा में एयरपोर्ट है, रेलवे स्टेशन है। राजधानी होने के कारण प्रतिदिन सैकड़ों डोमेस्टिक फ्लाइट्स आती जाती हैं। प्रतिदिन लगभग दस हजार यात्री हवाई यात्रा करता है कैनबरा एयरपोर्ट पर।

    कैनबरा के द्वारा ऊर्जा की खपत व गैस इमिशन की कल्पना कीजिए। कैनबरा के इस तरह के रहन-सहन के बावजूद पर्यावरण व प्रदूषण के संदर्भ में भारत का मध्यप्रदेश जैसा बहुत बड़ा व बहुत पिछड़ा राज्य भी कैनबरा से तुलना नहीं कर सकता। जबकि मध्यप्रदेश बहुत बड़े आकार में फैला हुआ है।

    बहुत बड़े आकार में फैले हुए मध्यप्रदेश राज्य व कैनबरा राज्य की प्रदूषण तुलना नहीं की जा सकती बावजूद इसके कि जनसंख्या घनत्वों में थोड़ा सा ही अंतर है। मध्यप्रदेश में प्रदूषण की स्थिति कैनबरा की तुलना में बहुत अधिक भयावह है। फोटो में जिस समय व तापमान भी लगभग समान ही हैं। तापमान व समय भी कारण नहीं कहे जा सकते हैं।

    जनसंख्या घनत्व व क्षेत्रफल प्रदूषण की भयावह स्थिति के लिए बहुत अधिक मायने नहीं रखता। बल्कि लोगों की सोच, मानसिकता, जीवन शैली मायने रखती है। यदि भारत को बचना है तो पूरे भारत के लोगों को पर्यावरण के प्रति अपनी सोच, मानसिकता व जीवन जीने के ढंग को बदलना होगा।

    हमें यह भी समझना होगा कि अंतिम स्टेज का कैंसर सर-दर्द की सामान्य गोलियों से ठीक नहीं होता।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundwork & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • प्राथमिक शिक्षा का मतलब चकाचौंध नहीं

    प्राथमिक शिक्षा का मतलब चकाचौंध नहीं

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    इस फोटो-लेख में दी गईं फोटो ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय राजधानी कैनबरा के एक स्कूल की हैं। यह स्कूल पांच साढ़े-पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए है। छोटे बच्चों के लिए कैनबरा ही नहीं ऑस्ट्रेलिया के सबसे बेहतरीन स्कूलों में से एक।

    इस स्कूल ने आलीशान भवन नहीं खड़ा किया। लकड़ी से बने एक पुराने घर को स्कूल में बदल दिया गया। बच्चों के लिए आलीशान व बहुत संख्या में टायलेट नहीं हैं। तामझाम व चकाचौंध नहीं है। महंगे व चमकीले टाइल्स से बना फर्श नहीं है। बच्चों के बैठने के लिए आलीशान कुर्सियां नहीं हैं। चमक-दमक, तड़क-भड़क व चकाचौंध जैसा शायद ही कुछ हो इस स्कूल में।

    बच्चों की क्रियाशीलता, रचनात्मक गतिविधियों इत्यादि के लिए रद्दी, बेकार, टूटी-फूटी वस्तुओं को रुचिकर बनाते हुए करते हुए सीखने समझने वाली क्रियाशील-शिक्षा के रूप में सदुपयोग कर लिया गया। जब प्रबंधन व शिक्षक क्रियाशील व रचनाशील होंगे तभी तो बच्चों की क्रियाशीलता व रचनाशीलता को सहेज पाएंगे, प्रोत्साहित कर पाएंगे। ऐसा होने के लिए किसी मेकेनिज्म या किताबी पढ़ाई की जरूरत नहीं होती। समझ व दृष्टि होने की जरूरत होती है।

    इस स्कूल में बच्चों व शिक्षकों का रिश्ता सिखाने/रटाने/घोंट कर पिलाने या शिक्षक सबकुछ जानता है या जो शिक्षक कहे वही सही है या छात्रों को शिक्षकों का अनुसरण करना है, इत्यादि-इत्यादि की बजाय शिक्षक व छात्र के बीच का संबंध मित्रता का होता है, दोनों मित्रवत भाव से करते हुए एक दूसरे से/को सीखते/सिखाते हैं।

    छात्रों को खुली छूट कि वे क्या करना चाहते हैं, कैसे करना चाहते हैं, कब करना चाहते हैं। शिक्षक की भूमिका जब बच्चे को जरूरत हो जितनी जरूरत हो तब सहयोगी के रूप में उपलब्ध। किताबों व कापियों का बोझ नहीं, होमवर्क नहीं। बच्चे का बैग नहीं जिसमें किताबों व कापियों का बोझ हो। क्लासरूम जैसा कुछ नहीं। शिक्षकों द्वारा ज्ञान बांटना/बांचना जैसा कुछ नहीं।

    प्राथमिक शिक्षा का मतलब बड़े-बड़े भवन, एसी कमरे, चमकीली कुर्सियां, इलेक्ट्रानिक-ब्लैकबोर्ड, टाइल्स के फर्श, चकाचौंध इत्यादि नहीं होता। जिन लोगों को शिक्षा की कतई समझ नहीं, उनके लिए यही सब बाजारू उटपटांग, बाहरी चमक-दमक, दिखावा जैसी मूर्खता ही प्राथमिक शिक्षा है; देखने वाले इसी सब की वाहवाही करते है व करने वाले वाहवाही लूटते हैं। जबकि गंभीर व दूरदर्शी शिक्षा प्रणाली का दूर-दूर तक नाता नहीं।

    प्राथमिक शिक्षा का संबंध संसाधन से कम समझ, सोच, मानसिकता, विचारशीलता व दूरदर्शिता से अधिक होता है। प्राथमिक शिक्षा बच्चे की सहजता, सहज बुद्धि, सहज विश्लेषण क्षमता, प्रश्न व प्रश्नों के उत्तर स्वयं करते खोजने की प्रवृत्ति का विकास, प्रकृति के साथ जुड़कर नियम व संबद्धता को सहज रूप में समझने का प्रयास। इत्यादि-इत्यादि प्राथमिक शिक्षा है।

    बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास व आविष्कारक क्षमता का विकास किताबें रटने से या किताबों में छपे नियमों व फार्मूलों को रटने व रटकर किसी परीक्षा में कापी में लिख देने से नहीं होता। रटने को बुद्धिमत्ता, मेधाविता, योग्यता इत्यादि की कसौटी व मूल्यांकन मानना भयावह होता है। जो समाज व देश रटने को कसौटी मानता है, रटने की क्षमता के आधार पर मूल्यांकन करता है, वह समाज कभी भी विकसित हो ही नहीं सकता। क्योंकि रटना व मौलिकता दो विपरीत ध्रुव हैं। मौलिकता बिना वास्तविक विकास संभव ही नहीं। 

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • हम भारतीय लोग पानी के संदर्भ में निरक्षर हैं व मिथकों द्वारा संचालित हैं — Vivek Umrao Glendenning

    हम भारतीय लोग पानी के संदर्भ में निरक्षर हैं व मिथकों द्वारा संचालित हैं — Vivek Umrao Glendenning

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    आमुख

    अनुपम मिश्र जी से मेरी पहली मुलाकात लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व हुई थी। बहुत विनम्र व्यक्तित्व थे। पहली मुलाकात के बाद हम लोगों की सैकड़ों मुलाकातें हुईं, बहुत बार तो हम लोग दिन-दिन भर साथ रहे, लंबी चर्चाएं होतीं थीं। बहुत बार ऐसा हुआ कि वे गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कार्यालय में अपनी मेज पर लिखापढ़ी वाला कामकाज निपटा रहे होते थे और मैं चुपचाप उनके साथ बैठा हुआ, उनको देश विदेश से आए दस्तावेजों का अध्ययन कर रहा होता था।

    अनुपम जी की दो पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुईं, “राजस्थान की रजत बूंदे” व “आज भी खरे हैं तालाब”। जब भी मेरे पास उनकी दी हुई प्रतियां खतम हो जातीं थीं, उपलब्ध होने पर वे मुझे और प्रतियां दे देते थे। मैंने उनकी इन दो पुस्तकों की प्रतियां बहुत लोगों को बांटीं। इन पुस्तकों का लेखन व शिल्प बहुत ही अधिक सुरुचिपूर्ण व सादगीपूर्ण था। इन पुस्तकों से ही अनुपम जी की सौन्दर्यबोध की गहरी समझ का पता चल जाता था।

    अनुपम जी की इच्छा के कारण ही मैंने स्वीडन के सहयोग से राजेंद्र सिंह द्वारा स्थापित की गई “तरुण जल विद्यापीठ” में भूमिका निभाने का कार्य किया था। अनुपम जी व उनकी पत्नी दिल्ली से तरुण भारत संघ तक मुझे छोड़ने भी गए थे।

    तरुण जल विद्यापीठ में पहुंचने के कुछ महीने बाद “जल-बिरादरी” के राष्ट्रीय अधिवेशन में मुझे व अरुण तिवारी जी को संयुक्त-राष्ट्रीय-संयोजक का उत्तरदायित्व भी दिया गया था।

    तरुण जल विद्यापीठ व जलबिरादरी के बाद मैं भारत के कई राज्यों में ऐसे प्रयासों व कार्यों से सक्रिय रूप से संबद्ध रहा जिनके कारण सैकड़ों गावों में पानी का जलस्तर बढ़ा, दशकों से सूखी पड़ी मर चुकी नदियां भी पुनर्जीवित हुईं। सैकड़ों तालाबों को पुनर्जीवित किया गया। इन प्रयासों व कार्यों के अतिरिक्त एक लेखक, पत्रकार व संपादक के रूप में भी कुछ ऐसे क्षेत्रों में भी गया जहां स्थानीय लोगों ने पानी की समस्याओं को अपने बूते हल किया।

    पानी से जुड़े वैश्विक संस्थानों के अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों के निर्माण में मैंने सहयोग भी दिया। दस्तावेजों में मुझे विशेष रूप से सम्मान के साथ धन्यवाद ज्ञापित भी किया गया। दुनिया की नामचीन विश्वविद्यालयों के जल-विज्ञान विभागों के प्रोफेसरों व शोधार्थियों से भी समय-समय पर मेरी लंबी चर्चाएं होती रही हैं।

    मेरी जीवनसाथी नदियों की विशेषज्ञ हैं, जल-विज्ञान से स्नातक करने के बाद उन्होंने नदियों के व्यवहार व पुनर्जीवन पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पीएचडी की। उनकी पीएचडी-थीसिस का मूल्यांकन दुनिया के कई देशों के प्रकांड जल-विज्ञानी लोगों ने किया। कई योरपीय देशों की विख्यात विश्वविद्यालयों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में इनके द्वारा लिखे गए अध्याय जोड़े गए हैं। आजकल ऑस्ट्रेलिया सरकार के नदियों वाले राष्ट्रीय विभाग में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। ऑस्ट्रेलिया वर्षाजल-प्रबंधन व भूजल प्रबंधन के मामलों में दुनिया के सबसे अग्रणी देशों में है। जीवनसाथी से भी मुझे जल के संदर्भ में बहुत कुछ जानने समझने का अवसर मिलता रहता है।

    पानी के मिथक बनाम आर्गनाइज्ड सामाजिक अपराध

    जमीनी धरातल पर काम करने, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन इत्यादि से मैं एक तथ्य बहुत अच्छी तरह समझ पाया कि भारतीय समाज ने पानी के संदर्भ में बहुत ही अधिक गलतियां की हैं, गलतियों की श्रंखला। इसके अतिरिक्त भी बहुत बड़ा मुद्दा यहा है कि पानी के संदर्भ में भारतीय समाज के लोगों की सोच व मानसिकता अनेक मिथकों द्वारा नियंत्रित होती है। पानी से जुड़े कई भयंकर मिथकों के कारण जाने-अनजाने भारतीय समाज के लोगों से लगातार बढ़ते हुए क्रम में पानी के संदर्भ में सामाजिक अपराध होते जा रहे हैं। यह लेख ऐसे ही कुछ मिथकों पर चर्चा करने का प्रयास है।

    भूजल पेयजल होता है, ताजा होता है — मिथक

    भूजल का मतलब होता है, धरती के अंदर का पानी। गांव हो या शहर, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ भारतीय समाज में अपवाद छोड़कर सभी का यही मानना है कि भूजल पेयजल होता है, सबसे अधिक शुद्ध होता है। इससे भी बड़ी बात यह कि पानी जितना गहराई से निकाला जाता है, उसको उतना ही शुद्ध माना जाता है। जबकि होता इसके विपरीत है। धरती के अंदर के पानी को ताजा भी माना जाता है। जबकि यदि धरती के अंदर का पानी ताजा हुआ तो फिर गैर-ताजा पानी क्या हुआ।

    दरअसल भूजल को पेयजल व ताजा मानने के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। एक — पानी का रंग, दो — पानी का तापमान, तीन — आलस्य/कामचोरी।

    लोगों ने तालाब, बरसाती नाले, नदियां भ्रष्ट कर दीं या नष्ट कर दीं या प्रदूषित कर दीं। इसलिए इनका पानी गंदा दीखता है। भूजल साफ दीखता है। लीजिए भूजल पेयजल सिद्ध हो गया, इतिश्री।

    भूजल सर्दी में गर्म व गर्मी में ठंडा महसूस होता है। भूजल का तापमान पूरे वर्ष लगभग कमोवेश उतना ही रहता है, लेकिन बाहरी वातावरण के तापमान के कारण हमें गर्म व ठंडा महसूस होता है, इसलिए हमारी स्वादेंद्रियों को लगता है कि पानी ताजा है। लीजिए भूजल ताजा-पानी सिद्ध हो गया, इतिश्री।

    जब मशीन लगाकर बोर खोदकर घर के भीतर पानी का स्रोत बनाया जा सकता है तो तालाब बनाने, वर्षा-जल संग्रहण करने, तालाब से घरों तक पानी की आपूर्ति व्यवस्था करने जैसी व्यवस्थाओं को करने की क्या जरूरत है। आलस्य/कामचोरी ने भूजल को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिया, इतिश्री।

    भूजल अनन्त है — मिथक

    पौराणिक कथाओं में पाताललोक व धरती का शेषनाग के फन पर रखे होने जैसी काल्पनिक मान्यताओं इत्यादि के कारण परंपरा में स्थापित होकर भारतीय समाज की संस्कृति की सोच का अभिन्न भाग बन चुका है कि धरती के अंदर का पानी अनन्त है। चूंकि धरती के भीतर का पानी अनंत है इसलिए कितना भी पानी निकाला जा सकता है।

    यही कारण है कि जब जलस्तर नीचे जाता है तो लोग पानी के लिए चिंतित नहीं होते, वे चिंतित होते हैं कि उनको और गहरा बोर करना पड़ेगा। पानी के संदर्भ में विज्ञान व तकनीक का प्रयोग और गहरे जाकर पानी निकालने की सुविधा तक सीमित है। भूजल को पेयजल मानने का मिथक जब भूजल को अनन्त मानने वाले मिथक के साथ जुड़ जाता है तो स्थिति बहुत ही अधिक अनियंत्रित व भयावह हो जाती है। इन दो मिथकों का जुड़ना भी पानी के संदर्भ में भारतीय समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है।

    पानी बचाओ नारा — मिथक

    पानी जीवन के लिए अतिआवश्यक तत्व है। केवल मानव शरीर के जीवित रहने के लिए ही नहीं, शाकाहारी व मांसाहारी सभी तरह के भोजन उत्पादन, कपड़ा उत्पादन, कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन, जंगल, जीव-जंतु, पर्यावरण इत्यादि-इत्यादि के लिए भी पानी मूलभूत तत्व है। कितना भी शोर मचाया लिया जाए, व्यवहारिकता यह है कि पानी की खपत कम नहीं की जा सकती है। चूंकि पानी की खपत कम नहीं की जा सकती है तो पानी को बचाया भी नहीं जा सकता है, संभव ही नहीं।

    पानी बचाने के नाम पर यदि कुछ किया जा सकता है तो वह केवल यह कि पानी का दुरुपयोग कम किया जा सकता है। पानी के दुरुपयोग के संदर्भ में यदि गहराई से तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए तो भारत के 70% से अधिक लोग पानी का दुरुपयोग करना तो दूर, सामान्य आवश्यकता के लिए पानी की उपलब्धता तक नहीं रखते हैं, दुरुपयोग कर पाने की संभावना तक नहीं रखते हैं। लेकिन चूंकि हम भारतीय समाज के लोग सामंती मानसिकता से बेहद ग्रस्त हैं, इसलिए हर समस्या की जड़ जो लोग हाशिए पर हैं, उन्हीं को मानने की बीमार, कुंठित व बर्बर मानसिकता में रहते हैं।

    पानी का स्वतंत्र-अस्तित्व है — मिथक

    भूजल पेयजल होता है, भूजल अनन्त है, पानी बचाया जा सकता है, इत्यादि-इत्यादि मिथकों के कारण यह मानसिकता स्वतः बन जाती है कि पानी का स्वतंत्र अस्तित्व होता है। इसीलिए पानी, पेड़, जंगल, पर्यावरण, तालाब, बरसाती नालों, नदियों, समुद्र इत्यादि-इत्यादि के अंतःसंबंध क्या हैं, अंतःनिर्भरताएं क्या हैं, इत्यादि-इत्यादि की समझ भी नहीं विकसित हो पाती है। पानी को स्वतंत्र अस्तित्व मानने का मिथक भी बहुत ही अधिक भयावह मिथक है।

    भारतीय समाज की पानी की महान-परंपराएं — मिथक

    भारत में ऐसे बहुत लेखक हैं जो शताब्दियों पहले भारत में होने वाले वर्षा जल प्रबंधन को बहुत गौरव के साथ आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं, मानों दुनिया के दूसरे समाज मूर्ख थे और केवल भारतीय समाज ही ऐसा कर रहा था। इनमें से अपवाद छोड़कर अधिकतर लोगों ने पानी के लिए कोई ठोस काम जमीन पर नहीं किया होता, फिर भी अपने आपको पानी विशेषज्ञ मानते हैं। जबकि इनमें से अधिकतर लोगों की पानी के संदर्भ में ठोस व व्यापक समझ नहीं होती, हवाबाजी से समझ विकसित हो भी नहीं सकती, संभव ही नहीं।

    इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि केवल भारतीय समाज ही नहीं, अपितु दुनिया के हर समाज ने पानी के स्रोतों से स्वयं को जोड़ कर रखा, उस जमाने में और कोई रास्ता ही नहीं था, विकल्प नहीं थे। इसलिए ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि भारतीय समाज के अलावा दुनिया के अन्य समाजों ने पानी के संदर्भ में परंपराएं व सामाजिक नियम नहीं बनाए थे। बल्कि दुनिया के अनेक समाजों ने भले ही कितना विकास कर लिया हो, पानी के संदर्भ में परंपराओं व नियमों को अधिक परिष्कृत किया।

    यूं लगता है कि भारतीय समाज में पानी के संदर्भ में परंपराएं व सामाजिक नियमों की जड़े गहरी नहीं थीं, जो भी था वह मजबूरी में था। ठोस सामाजिक समझ व योजना के अंतर्गत नहीं था। दुनिया में भारत जैसे समाज अपवाद हैं जिन्होंने निर्दयता के साथ लगभग पूरे देश में पानी के स्रोतों को खतम किया वह भी बिना किसी ठोस कारण। केवल फूहड़ जीवन-शैली व बीमार मानसिकता के कारण, कुओं, तालाबों, बरसाती नालों को पाट दिया। यह सब किया भारतीय समाज के आम लोगों ने। व्यवस्था तंत्रों ने तो बहुत ही अधिक आगे जाकर नदियों को ही खतम करने व पाटने का काम किया।

    दरअसल जब सामाजिक परंपराओं व नियमों के साथ समाज के लोग स्वयं को सहजता व परिष्करण के साथ जोड़कर नहीं रख पाते, वरन् इनको मजबूरी मानते हैं। तो ऐसी सामाजिक परंपराओं व नियमों को समय के साथ-साथ तार-तार होने में देर नहीं लगती।

    यही कारण है कि भारत में राजस्थान राज्य सहित लगभग सभी समाजों में पानी से जुड़ी परंपराएं तार-तार हुई हैं। राजस्थान चूंकि रेगिस्तानी राज्य था इसलिए वहां विभीषिका बहुत स्पष्ट रूप में लोगों के सामने आना शुरू हो गई तो मजबूरी में लोगों को जल-संरक्षण वाली परंपराओं की ओर लौटना पड़ा। इस पर भी जिन लोगों के पास परंपराओं में लौटने की मजबूरी नहीं थी या जिनके जीवन में विभीषिका स्पष्ट रूप में नहीं परिलक्षित हुई, उनमें से अधिकतर लोगों ने जल-संरक्षण की परंपराओं की ओर लौटना बिलकुल जरूरी नहीं समझा।

    राजस्थान जैसे इलाके जहां वर्ष जल का संग्रहण करना जीवन की मजबूरी रही है, को छोड़कर वर्षा जल संग्रहण को अब भी जीवन का अभिन्न हिस्सा, जरूरत, जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व नहीं मानना, यह भारतीय समाज की बीमार सोच ही है। भारतीय समाज ने बेढंगे विकास के नाम पर पानी हर स्तर पर सबसे अधिक उपेक्षित व तिरस्कृत किया गया है। समाज व लोगों ने जिन परंपराओं से सबसे अधिक व शीघ्रता से नाता तोड़ा वे पानी से जुड़ी परंपराएं थीं।

    गैर-जिम्मेदार सरकार, फूहड़ बेहूदे जल-विभाग/संस्थान/विश्वविद्यालय

    भूजल के प्रति मिथकों को पालने पोषने का काम भारत की सरकारों, जल-इंजीनियरों, जल-संस्थानों, तकनीकी-संस्थानों व विश्वविद्यालयों इत्यादि ने भी धुआंधार तरीके से किया। इतना अधिक किया कि अब वापस लौटना तो असंभव है ही, दूर-दूर तक समाधान तक नहीं दीख रहा है। बेसिरपैर के बेहूदे शोध किए गए।

    लंबे समय से भारत की सरकारों, उद्योगों, कृषि व लोगों ने अंधाधुंध तरीके से भूजल का प्रयोग किया। भूजल का प्रयोग करने के चक्कर में धरती के ऊपर के पानी के महत्वपूर्ण स्रोतों को खतम कर दिया गया। स्थितियां इतनी अधिक खतरनाक कि सरकार ने खुद एक-एक गांव को अनेक-अनेक हैंडपंप बाटे। पेयजल के नाम पर सरकार हैंडपंप लगाती है या ट्यूबवेल लगाकर टंकियों में पानी भरकर आपूर्ति करती आई है। सरकार जब पेयजल के आकड़े देती है हो लगाए गए हैंडपंपों की संख्या बताती है। कृषि की बात कीजिए तो सरकार गर्व से बताती है कि कितने गहरे व कितनी संख्या में ट्यूबवेल लगवाए गए। भयंकर मूर्खता है, लगातार की गई है, अब भी की जा रही है, बेरोकटोक की जा रही है।

    समाधान

    पानी बचाना, पानी का समाधान नहीं है, हो ही सकता, बिलकुल ही असंभव है। पानी बचाने की बजाय, पानी पैदा करने की बात करनी चाहिए, यही एकमात्र विकल्प व एकमात्र समाधान है। जब लोग पानी पैदा करना सीख जाएंगे, पानी पैदा करना शुरू कर देंगे। तब अपने आप पानी का सदुपयोग करना भी सीख जाएंगे। अपने आप पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक हो जाएंगे।

    पानी पैदा करने की घटना से जुड़ी बहुत सी अंतःसंबंधित, अंतःनिर्भर घटनाएं होती हैं, उन सभी से भी स्वतः साक्षात्कार होना चला जाएगा। यही साक्षात्कार होना ही किसी समाज को पानीदार समाज बनाता है, न कि राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग एजेंसीज से फंड प्राप्त करने के तीन-तिकड़म या टीवी चैनलों में साक्षात्कार देना, न कि सोशल मीडिया में जो भी अधकचरा है उसको थूक देना, न कि मीडिया सेलिब्रिटिज्म।

    अंतिम बात, भयावह साामजिक-समस्या का समाधान सरल नहीं होता। बहुत ही अधिक साामजिक जीवटता, इच्छाशक्ति, दृढ़ता व दीर्घकालिक सामाजिक-योजनाएं लगतीं हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ​ऑस्ट्रेलिया में आग व बचाव सेवाएं कहा जाता है, बहुत महत्वपूर्ण व सम्मानित सेवा मानी जाती है। छोटे-छोटे बच्चों के लिए वर्ष में कई बार कार्यक्रम आयोजित होते हैं। छोटे-छोटे बच्चों जिनको ढंग से चलना व बोलना तक नहीं आता, उन बच्चों को भी आग व बचाव सेवाओं के वाहनों व यंत्रों से परिचित करवाया जाता है। पूरा का पूरा अत्याधुनिक वाहन बच्चों के हवाले कर दिया जाता है, बच्चे उसमें चढ़ सकते हैं, बटनें दबा सकते हैं, स्टियरिंग से खेल सकते हैं। खुद करते हुए अपनी जिज्ञासाएं शांत कर सकते हैं। बच्चों को इस सेवा से जुड़े खिलौने उपहार के रूप में दिए जाते हैं, ताकि बच्चे घर में भी सीख समझ सकें।

    आग व बचाव सेवाओं  के लोग बहुत ही मिलनसार होते हैं, यदि आपातकाल में नहीं जा रहे हैं तो किसी बच्चे की रुचि होने पर वाहन में बैठाकर घुमाने जैसी क्रिया कोई बड़ी बात नहीं। यदि आग व बचाव सेवाओं का कोई वाहन जा रहा है, तो रास्ते में मिलते बच्चों से सेवाओं के लोगों द्वारा हाय हेलो बोलना, मुस्कुराना इत्यादि सामान्य बात है।

    आग व बचाव सेवाएं बच्चों के लिए डरावनी नहीं है, न ही बच्चों की पकड़ व पहुंच से दूर। बच्चों के साथ विश्वास व सम्मान का रिश्ता कायम होता है, जो बड़े होने तक चलता रहता है।

    ​आग व बचाव सेवाओं के कई स्तर होते हैं, छोटी से लेकर बड़ी दुर्घटना से लड़ने व बचाव के लिए। यह सेवा केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है, यह सेवा पेड़-पौधों, जंगल, जानवर, पक्षी सभी प्रकार के जीव-जंतुओं की सेवा व सुरक्षा के लिए है। यह सेवा कुत्ता बिल्ली इत्यादि को भी बचाती है। यह सेवा किसानों की फसलों व किसानों के पशुओं को भी बचाती है। आग हो, बाढ़ हो, तूफान हो या अन्य मामले, यह सेवा लोगों व जीव-जंतुओं को बचाने का प्रयास करती है, ईमानदारी व प्रोफेशनल तरीके से करती है।

    ​मेरा पुत्र आदि जब एक वर्ष का था तब वह फायर ब्रिगेड के अत्याधुनिक वाहन के अंदर घुसकर सबकुछ देख चुका था। चालक की कुर्सी पर बैठकर स्टियरिंग घुमा चुका था। स्कूलों में यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी आग, आग का प्रयोग, सावधानी व बचाव के तरीके सिखाए जाते हैं।

    मेरा पुत्र लगभग पौने तीन वर्ष का है। बिना भवन व ढांचे वाले जंगल-पहाड़ स्कूल जाता है। जंगली जीव-जंतुओं, पहाड़, जंगल, नदी-नालों में उछलते-कूदते हुए सीखता समझता है। हजारों एकड़ का जंगल है, पहाड़ है, जाहिर है जहरीले सांप, चीटियां, लिजर्ड इत्यादि भी होते हैं। इनसे डरने की बजाय इन जीवों के साथ तालमेल व उनको हानि पहुंचाए बिना स्वयं को सुरक्षित रखना सिखाया जाता है।

    आजकल इस जंगल पहाड़ स्कूल में आदि व अन्य बच्चों को आग के बारे में सिखाया जा रहा है। कितने प्रकार से आग जलाई जा सकती है। धातुओं व पत्थरों के घर्षण, माचिस व अन्य तरीकों से आग जलाना सिखाया जाता है। आग जलाते समय चोट लगने पर क्या किया जाए, सिखाया जाता है। आग कैसे बुझाई जाए, सिखाया जाता है। कहां आग जलानी है, कहां नहीं जलानी है, यह सिखाया जाता है।

    प्राकृतिक-संरक्षित जंगल में बच्चे आग की जानकारी प्राप्त करते हुए

    ​आदि धातुओं के घर्षण से आग जलाना सीखते हुए

    बच्चे छोटे हैं, वे पूरी तरह से सीख नहीं पाते हैं, न ही याद कर पाते हैं। लेकिन उनका मस्तिष्क इन जानकारियों को ​संरक्षित तो करता ही है, स्टोर की गई इन जानकारियों का प्रयोग बच्चों के कुछ बड़े होने पर मस्तिष्क बेहतर तरीके से करता है, यदि सीखने सिखाने का क्रम चलता रहा।

    ऑस्ट्रेलिया में कई प्रकार के जंगल होते हैं। एक श्रेणी प्राकृतिक संरक्षित जंगल की होती है, प्राकृतिक संरक्षित जंगलों में आग नहीं जलाई जा सकती है, जंगल में कुछ छोड़ कर आना व जंगल से कुछ लेकर आना प्रतिबंधित होता है। प्रतिबंध का मतलब यह नहीं कि प्रवेशद्वार पर पुलिस लगती है या जांच होती है। एक छोटा सा सूचनापट लगा देना ही पर्याप्त होता है।
    आदि जिस जंगल-पहाड़ स्कूल में जाते हैं, वह प्राकृतिक संरक्षित जंगल है। वहां आग नहीं जला सकते तो बच्चों को घेरा बनाकर, लकड़ी रखकर काल्पनिक आग जलाने व काल्पनिक आग से जानकारी दी गई। अब अगले चरण में उनको ऐसे पार्क में ले जाया जाएगा जहां आग जलाने की सुविधा है। वहां बच्चे असल आग जलाना व सुरक्षा/सावधानी के साथ प्रयोग करना सीखेंगे।

    मस्ती की मस्ती, सीखना का सीखना।

    कोई भी व्यवस्था रातोंरात कानून बनाने से नहीं बनती है। समाज को जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, पीढ़ी दर पीढ़ी सीखने-सिखाने का काम बिना थके, बिना ऊबे करते रहना पड़ता है। अपने आप कुछ भी नहीं होता है। यदि समाज जागरूक नहीं, यदि समाज अपनी जिम्मेदारी नहीं महसूस करता उल्टे राजनैतिक/धार्मिक/आर्थिक सत्ताओं के हाथ में छोड़ देता है तो ऐसा समाज अपनी स्वतंत्रता, विकास व परिष्करण सबकुछ सत्ताओं के हाथों में गिरवी रख कर गुलाम बन जाता है।

    यदि समाज व लोग जागरूक व जिम्मेदार हैं तो व्यवस्था की इतनी औकात हो ही नहीं सकती कि सीढ़ी छोटी पड़ जाए, बैराज के पानी निकालने वाले छेद खुले रह जाएं और समाज के बच्चे अकाल मृत्यु प्राप्त करते रहें।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.