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दलित-नट जाति की सरिता भारत व जाट जाति के वीरेंद्र क्रांतिकारी ने जातीय प्रपंचों को रचनात्मक क्रियाशीलता व सांगठनिक कौशल से समाज के बीच रहते हुए तोड़कर आदर्श स्थापित किया

Vivek "सामाजिक यायावर"

सरिता भारत उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले के एक गांव की दलित नट जाति की हैं। वीरेंद्र क्रांतिकारी उत्तरप्रदेश के ही अमरोहा जिले के एक जाट बाहुल्य गांव सुल्तानपुर के जाट जाति के हैं। वीरेंद्र अक्खड़ व क्रांतिकारी प्रवत्ति के इसी कारण उनके मित्रों/सहपाठियों इत्यादि ने "क्रांतिकारी" कहना शुरू कर दिया। सरिता भारत भावुक व शोषित समाज व शोषित जाति के लोगों के लिए संवेदनशील। मेरी इन दोनों के साथ पहली मुलाकात लगभग चौदह (14) वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के एक गांव में हुई थी। यह तब की बात है जब स्वयं सरिता भारत व वीरेंद्र क्रांतिकारी भी नहीं जानते होंगे कि वे दोनों एक दूसरे के जीवन साथी बनेंगे, दूर-दूर तक ऐसी संभावना नहीं दीखती थी।

अंतर्जातीय विवाह:

भारतीय समाज में अंतर्जातीय विवाह करने वाले लोग हैं। इन उदाहरणों में से अधिकतर में पुरुष अपने से ऊंची जाति की लड़की से विवाह करते हैं। इनमें से भी अधिकतर पुरुष अच्छी सरकारी नौकरी करने वाले होते हैं या अच्छे वेतन की बेहतर नौकरी किसी अच्छी कंपनी में या अच्छा खासा व्यापार करते होते हैं। 

आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें सरकारी अधिकारी दलित-पुरुष, प्रोफेसर दलित-पुरुष या राजनेता या पढ़े लिखे आर्थिक रूप से संपन्न पुरुष इत्यादि के साथ ब्राह्मण स्त्री ने विवाह किया। आपको कुछ ऐसे भी उदाहरण भी मिल जाएंगे जिनमें ब्राह्मण पुरुष ने दलित स्त्री से विवाह किया, इनमें भी अधिकतर घटनाएं ऐसी कि दलित स्त्री संपन्न व प्रतिष्ठित दलित परिवार से होती है।

यदि इन उदाहरणों को ध्यान से देखा जाए तो इनमें एक महत्वपूर्ण उभयनिष्ठ-तत्व यह है कि इन अंतर्जातीय विवाहों में स्त्री पुरुष दोनों को ही समाज के उन दायरों में नहीं रहना पड़ता है जो जाति के इर्द गिर्द घूमते हैं। इन विवाहों में अधिकतर में पुरुष की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, सुरक्षित व बेहतर भविष्य व जीवन की आश्वस्ति होती है तथा पति-पत्नी किसी मेट्रो या बड़े शहर में निवास करते हैं। 

चूंकि अच्छी नौकरी है, अच्छी आय का बेेहतर ढांचा है, मेट्रो या बड़े शहरों में रहना है जहां पड़ोसी से भी अभिवादन महीनों में होता है, इसलिए इन अंतर्जातीय विवाहों में पारिवारिक व सामाजिक विरोध का खास मतलब नहीं होता है। विवाह के पूर्व व बाद में कुछ समय तक पारिवारिक विरोध हुआ, चूंकि परिवार व समाज के साथ रहना नहीं होता, उनके ऊपर आर्थिक निर्भरता नहीं होती इसलिए उनके विरोध का ठोस दुष्प्रभाव जीवन में नहीं पड़ता है। कुछ समय पश्चात परिवार ऊपरी नौटंकी व ढोंग इत्यादि दिखाकर विवाह को स्वीकार भी कर लेता है, यदि नहीं भी करता है तो भी जीवन में बहुत अंतर नहीं आता है।

लेकिन कुछ अंतर्जातीय विवाह अपवाद होते हैं, आदर्श होते हैं। इन विवाहों में जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने का चारित्रिक गुण होता है। सामाजिक मानदंडों को परिवर्तित करने का चरित्र रखते हैं। यह लेख ऐसे ही दम्पति की कहानी है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां प्रेम विवाह के कारण माताएं तक अपनी पुत्रियों की हत्याएं कर देतीं हैं। यह लेख इसी क्षेत्र के वीरेंद्र क्रांतिकारी व उनकी पत्नी सरिता भारत के विवाह के ऊपर है। इनका विवाह सही मायने में जाति को तोड़ने का आदर्श स्थापित करता है। यदि आप जाति व्यवस्था को नहीं स्वीकारते हैं तो आपको इनके विवाह के बारे में जानकर अच्छा लगेगा। इन दोनों ने अपना विवाह आम समाज के आम लोगों के समक्ष रचनात्मक तरीके से जाति व्यवस्था का समाधानात्मक विरोध करते हुए किया। ढंके की चोट पर समाज के सामने रचनात्मक तरीके से किए जाने के कारण तथा विवाह के बाद आम समाज के बीच में ही रहते हुए दाम्पत्य जीवन जीने के कारण प्रतिमान बन जाता है।

विवाह के लिए आपसी सहमति:

Virendra Krantikari and Sarita Bharat

मार्च 2008 में वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने गांव में देश भर के कई राज्यों से लोगों को आमंत्रित करके एक बड़ा आयोजन किया। शहीद भगत सिंह की प्रतिमा स्थापित की। यहीं से आगे चलकर वीरेंद्र व सरिता का झुकाव एक दूसरे की ओर होने लगता है। दिसंबर 2008 में दोनों तय करते हैं कि विवाह करेंगे तथा शोषितों के लिए, गरीबों के लिए एक दूसरे के साथ जीते हुए मिलकर जीवन लगाएंगे।

ये लोग चाहते तो बिना हंगामे के परिवार व समाज को बिना बताए चुपचाप विवाह करके सकून से दाम्पत्य जीवन जीते। चुपचाप वाले विवाह से जाति के घिनौनेपन में कोई प्रहार भी नहीं होना था, लोगों की मानसिकताएं भी नहीं टूटनीं थीं, एक तरह से जाति व्यवस्था के समक्ष समर्पण कर देने जैसी बात थी। वीरेंद्र क्रांतिकारी व सरिता भारत की क्रांतिकारी व सामाजिक न्याय वाली विचारधारा, जाति के कारण इस तरह की विवशता को स्वीकारने को तैयार नहीं थी कि चुपचाप विवाह किया जाए।

Virendra Krantikari

दिसंबर 2008 में विवाह का निर्णय लेने के बाद वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने परिवार को धीरे-धीरे तैयार किया। कुछ महीने चर्चाओं के दौर चले, विरोध झेलना पड़ा लेकिन वीरेंद्र ने अपने परिवार को इस विवाह के लिए तैयार कर लिया। समाज की सोच बदलने के लिए समय-समय पर जाति, समाज इत्यादि मु्द्दों पर चर्चाओं के कई आयोजन किए, एक तरह से गांव-समाज के बीच वैचारिक अभियान चलाया। 

सरिता भारत हरदोई जिले की दलित-नट जाति से हैं। इस जाति की अपनी जाति पंचायत होती है, अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं, जिनको तोड़कर इस विवाह के लिए सहमति देना सरिता के परिवार के लिए संभव रहा भी नहीं होगा। सरिता भारत के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। पिता के गुजरने के बाद जाति पंचायत ने सरिता भारत की माता का विवाह उनके देवर, सरिता के चाचा, के साथ कर दिया। इस तरह सरिता का पालन-पोषण उनके सौतेले पिता/चाचा के द्वारा हुआ। 

विवाह-समारोह:

वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने गांव, पड़ोसी गांवों व समाज के हजारों लोगों को आमंत्रित करते हुए विवाह का आयोजन किया।आर्यसमाज पद्धति से विवाह की रीति संपन्न हुई। लोगों को आमंत्रित करने के लिए बाकायदा पर्चा छपवाए, गांवों-गांवों में बांटे। गरीबों के मुद्दों के लिए काम करने के लिए सरिता व वीरेंद्र ने एक संगठन "भारतीय गरीब जन आन्दोलन" बनाया था, उसी के बैनर तले विवाह समारोह के लिए दो-दिवसीय जनसभा व सामाजिक चर्चा का आयोजन किया। अच्छी पुस्तकों व साहित्य को बांटा। 21 व 22 फरवरी 2009 के दो दिनों के इस आयोजन में 21 फरवरी को विवाह व सामूहिक भोज संपन्न हुआ, 22 फरवरी को जाति व अन्य सामाजिक मुद्दों पर खुलकर चर्चाएं कीं। विवाह में विभिन्न राज्यों व गांवों से आए दो हजार (2000) से अधिक लोगों ने भोजन ग्रहण किया।

Virendra Krantikari and Sarita Bharat (Marriage Ceremony, the first day)

Virendra Krantikari and Sarita Bharat (Marriage Ceremony, the second day)

विवाहोपरांत दलित-नट जाति-पंचायत से दंडित होना:

विवाह के बाद वीरेंद्र क्रांतिकारी व सरिता भारत दलित-नट जाति की जाति-पंचायत के सामने प्रस्तुत हुए तथा जाति-पंचायत की प्रक्रियाओं से गुजरे व जो दंड दिया गया उस दंड को स्वीकारा। अब इनका विवाह दोनों पक्षों के परिवारों की ओर से स्वीकृत है। इनकी एक संतान/पुत्र है जिसका नाम "संकल्प" है।

Sarita Bharat, Virendra Krantikari with Sankalp

सरिता भारत सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ शिक्षिका भी हैं। वीरेंद्र क्रांतिकारी पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, कहीं नौकरी नहीं करते हैं, कहीं से वेतन नहीं प्राप्त करते हैं। किसानों, जाति व साम्प्रदायिकता के मुद्दों पर उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा व अन्य राज्यों के गांवों में जमीन पर काम करते हैं। घर के कामकाज में खाना बनाने, कपड़े धोने व बच्चे की देखभाल तक सारे घरेलू कार्यों में पत्नी का पूरा सहयोग करते हैं।

वीरेंद्र की माता को कैंसर है, उनकी देखभाल दोनों पति-पत्नी मिलकर करते हैं। 21 फरवरी को उनके विवाह की वर्षगांठ है, आप चाहें तो उनको इस लेख में कमेंट्स के द्वारा इनको शुभकामनाएं दे सकते हैं, आपकी शुभकामनाएं सरिता व वीरेंद्र तक ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया द्वारा ससम्मान व सप्रेम पहुंचा दी जाएंगीं। मेरी ओर से दम्पति को कोटि-कोटि शुभकामनाएं।

Vivek Umrao Glendenning "SAMAJIK YAYAVAR"

He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

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