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  • रामभरोसे जलेबी जासूस (कहानी )

    रामभरोसे जलेबी जासूस (कहानी )

    Gourang 

    रामभरोसे कई दिनों से उसे नोटिस कर रहा था। वह सवेरे ही आकर एक बेंच कब्जा लेता और जाने क्या अपने में सोचता रहता। उसके पीठ पीछे हरे रंग का एक झोला टंगा होता। झोला भी क्या मानो खूब इस्तेमाल किया हुआ। रंग बिलकुल उजड़ा हुआ था, मगर मजबूत था और कुछ वजनी भी था। कई दिनों से उसे देखते रहने से रामभरोसे को पता था कि उस बैग में एक लैपटाप था, जिसे वह निकालता और गोद में रख लेता। फिर कुछ टाईप भी करने लगता। मगर हमेशा नहीं। अमूमन तो वह अपने बेतरतीब बालों और दाढ़ी में हाथ फेरेते हुए कुछ सोचता ही रहता। रामभरोसे कुछ कौतुहुल से ही उस पर नजर रखता। वैसे रामभरोसे अकेला नहीं था, आस-पास के रेगुलर कस्टमर की भी उस पर नजर थी। वे आपस में छुपकर खुसुर-पुसुर से बतियाते। रामभरोसे के कान खूब तेज थे। हाथ काम करते मगर वह आस-पास के बातों पर कान रखता। उस दिन उसने सुना।
    एक ने कहा – “कोई रिसर्च वाला लगता है।” 
    दूसरे ने कहा – “मुझे तो कोई जासूस लगता है, ये लोग स्वांग धरने में माहिर होते हैं।”
    तीसरे को जासूस वाली आईडिया कुछ जमने लगी तो वह भी बात आगे बढ़ा दिया – “ठीक कह रहे हो भाई, आजकल इधर बहुत हलचल बढ़ गई है।”
    पहले को अपनी थ्योरी पिटती नजर आई। वह प्रोटेस्ट के सुर में बोला – “खामख्वाह? इसके बेतरतीब बाल, बढ़ी दाढ़ी, खद्दर के कुर्ते और उजड़े जींस, खोई-खोई आँखें देखो। फिर, खाने का भी कोई ठिकाना नहीं। अरे, मैं तो बोलूँ जिसे रामभरोसे के गरम-गरम दूध-जलेबी भी खींच न सके, वह दार्शनिक नहीं तो और क्या?” वह रामभरोसे को अपने पाले में खींचने की कोशिश में बोला। 
    रामभरोसे को उसके बात में कुछ दम भी नजर आया। आम कस्टमर से इसका एक बुनियादी फर्क था, वह कुछ खाता-पीता न था। कोई आर्डर भी नहीं। पहले दिन तो रामभरोसे को इस सरफिरे पर बड़ा गुस्सा आया, कोई आर्डर नहीं, बस बेंच कब्जाये बैठा है। मगर शाम को जाते-जाते वह रामभरोसे को पचास का एक नोट पकड़ाया और बड़े मुलायम स्वर में कह गया – “इस बेंच को मेरे लिए रिजर्व रख दीजिये।” तो एक एग्रीमेंट सा ही हो गया, दिहाड़ी का पचास रुपया। लोग भी उस बेंच पर बैठने से परहेज करते। जो हो, रामभरोसे ने पहले को देख हामी में सर हिलाया और फिर गरम जलेबियों को चीनी के चासनी में डुबोया।
    दूसरा अब भी जासूसी के दलील पर कायम था। फिर उसे दार्शनिक की थ्योरी में कोई थ्रिल भी अनुभव नहीं हुआ। वह कदरन ऊँचे आवाज में बोला – “यही तो करिश्मा है। जैसा मेक-अप वैसा ही एक्टिंग, अगर धर ही लिए तो जासूस क्या?”
    तीसरे ने भी दुक्की लगाई – “बिलकुल सही कहे, फिल्म में भी तो ऐसा ही दिखाता है।”
    पहला अच्छा तर्कवीर था। झट दूसरे को काट दिया – “मगर यहाँ जासूसी के लिए रखा क्या है? आधा गाँव आधा शहर में कौन सा तेल का कूँआ निकला है जो जासूस पग धरेगा? यहाँ तो बस एक हमारा रामभरोसे ही है दूध-जलेबी लेकर। फिर तो ये जलेबी जासूस ही है।” मौज हो गई। सब हँसने लगे। दूसरे की भद पिट गई। तीसरा भी मूँह छुपाने लगा। 
    बात कुछ तभी के लिए खत्म हो गई। मगर रामभरोसे के लिए खत्म न थी। आखिर यह आदमी सप्ताह भर से आकर यहाँ पड़ा क्यों है? कोई जवाब तो होना चाहिए। वह मन ही मन स्थिर कर लिया। शाम को जब परदेशी जाने को हुआ तो उससे रुपये लेने के बाद आखिर रामभरोसे ने पूछ ही लिया – “साहेब, यहाँ रहे कहाँ हैं?” 
    परदेशी मुस्कुराया। अपनी बैक-पैक को पीठ में एडजेस्ट करते हुए बोला – “नदी के उस पार।“ 
    “उस पार? अरे उधर तो जंगल है।” रामभरोसे अचकचाया। 
    “वहीं कुछ मछुआरे भी रहते हैं। वहीं रह रहा हूँ। हर दिन वे नाव से इस पार छोड़ देते हैं। फिर शाम ढले ले जाते हैं।” परदेशी का शांत मीठा आवाज भी रामभरोसे के हैरानी को कम न कर सका। 
    “अरे साहेब, आप इतना बड़ा आदमी, उस गंदी बस्ती में रहने की क्या जरूरत है? हमसे कहिए, हम यहाँ आपकी रहने की व्यवस्था कर देंगे। वैसे भी लोग न जाने क्या-क्या कह रहे हैं।” रामभरोसे को परदेशी से सहानुभूति हो गई थी। 
    परदेशी ने फिर मुसकुराते हुए जवाब दिया – “पता है। मगर मैं वहीं ठीक हूँ।” 
    रामभरोसे फिर फेर में पड़ गया। वह असमंजस में पूछा – “तो लोग सही कह रहे हैं?” 
    परदेशी बोला – “आधा सच। एक लेखक किसी जासूस से कुछ कम नहीं होता। वह किरदारों की जासूसी करता रहता है, फिर उसे कहानी में ढाल लेता है। मैं भी तो यही कर रहा हूँ।” 
    ब्रीफिंग पर रातों रात स्टोरी मुकम्मल हो गई। उस छोटे से शहर में हर जुबान पर एक ही कहानी थी – कोई परदेशी लेखक आया है जो राम भरोसे पर स्टोरी लिख रहा है। वह हर दिन घंटों आकर रामभरोसे को वाच करता रहता है।
    फिर अगले दिन रामभरोसे किसी हीरो से कम नहीं लग रहा था। खास हो गया था। दूध-जलेबी की बिक्री भी अचानक बढ़ गई। लोग जलेबी जासूस को देखने आने लगे। यही अब परदेशी का उपनाम हो गया। 
    उस दिन फिर एक कस्टमर ने रामभरोसे को छेड़ा – “तो रामभरोसे जी शूटिंग कब से शुरू है?” 
    “कैसा शूटिंग?” रामभरोसे आसमान से गिरा। 
    “अरे! आप छुपाएंगे और समझते है कि हमको कुच्छों पता नहीं चलेगा? अब हीरो बन ही गए हैं तो फिर इतना सीक्रेट वाला गेम काहे खेल रहे हैं?” 
    “कौन हीरो और कैसा सीक्रेट? ” रामभरोसे छटपटाया। 
    “अब हम ही से कहलवाना चाहते हैं? अब तो सारा शहर जान गया। आपका फिल्म बन रहा है, आप ही हीरो हैं। जलेबी जासूस यहाँ शूटिंग का लोकेशन तलाशने आया है। देखिये, हमारे लिए भी कोई छोटा-मोटा रोल निकलवाईए न, साईड वाला।” वह एक एक्टिंग का पोज लेते हुए बोला। 
    “अरे भंगी हो क्या? ई बे सिर पैर वाला बात कौन उड़ाया?” रामभरोसे बौखलाया। 
    मगर कौन सुने रामभरोसे की। लोग रामभरोसे को बधाई देने लगे। फिर कुछ ने जलेबी की आर्डर भी दे दिये और कहने लगे – “अपना राम भरोसे तो अब बंबई चला जाएगा, क्या पता फिर कभी उसके हाथों की बनी जलेबी मिले न मिले।”
    उलझन में भी खुशी तारी थी। धंधा जो चमक गया था। रामभरोसे दूकानदारी में पनाह खोजने लगा। मगर शाम को फिर बात और आगे निकल गई। कुछ लोगों ने परदेशी को घेर लिया। फिर खुशामद करने लगे – “एकाध रोल हमारे लिए भी निकालिए महाराज।“ कुछ तो बाकायदा पोज भी देने लगे। कुछ ने एक कदम आगे निकलकर दो चार फिल्म के हिट डायलाग भी सुना दिया। 
    परदेशी मुस्कुराया फिर मीठी आवाज में बोला – “वैसे तो ठीक है, मगर एक माईनोर सी टेंशन है। हिरोईन राजी नहीं हो रही। जो होगा हिरोईन का मामला सुलझने के बाद ही होगा। तब तक देखते हैं।” कहकर वह मुस्कुराकर निकल गया। लोगों ने खुशी से तालियाँ बजाई, शोर भी हुआ। 
    एक ने सुनते ही चुटकी लिया – “अरे हमसे कहे न, हम हिरोईन वाला रोल भी कर लेंगे। रामलीला में सीता वाला रोल तो किए ही हैं। फिर कौन मुश्किल काम है!” 
    शहर में अब कोई किन्तु, परंतु वाली बात ही न रही। अब रामभरोसे का दर्जा अब किसी स्टार से कम न था। लोग हीरोईन पर कयास लगाने लगे। रामभरोसे के भाग्य पर भी कुछ को ईर्ष्या हुई। रामभरोसे ने भी अगले दिन कुछ साफ और चमकदार कपड़े पहने, आखिर इतनी बातों से असर तो होता ही है। वह भी कुछ जोश में था, मगर उसे अपने बारे में परदेशी बाबू से पूछने में शर्म सी हो रही थी। वह कभी-कभी शरमाकर उसे देख लेता। कस्टमर छेड़ रहे थे, मगर आज उसे गुस्सा नहीं आ रहा था, वह कुछ लाजुक सा हँसते-हँसते ही दूकानदारी कर रहा था। 
    इसी तरह दिन बीता। जलेबी जासूस जाने को हुआ तो कुछ लोगों ने फिर घेर लिया – “हीरोईन का मामला सुलझा?” 
    परदेशी हँसते हुए बोला – “करीब-करीब।” 
    “फिर कब से शुरू कर रहे हैं?” एक आवाज आई। 
    “बस, अब कल फ़ाईनल हो जाएगा।” वह विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन बोला। 
    “हमारा ख्याल तो रखिएगा न!” कई आवाजें एक साथ आई। 
    “जरूर, जरूर।” कहता हुआ वह निकाल गया। 
    शहर भर में अब एक ही चर्चा थी। लोगों ने फिल्म का नाम भी दे डाला था – ‘रामभरोसे जलेबी जासूस’, वैसे तो यह दोनों के जुगलबंदी की बावद टाईटल बनी थी, मगर शहर वालों को भा गई थी। अगले दिन रामभरोसे के दुकान के आगे अच्छी-ख़ासी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। लोग उत्सुक थे, उन्हे भरपूर तमाशा की उम्मीद थी, कुछ को इसमें मौके भी नजर आ रहे थे। 
    मगर परदेशी न आया। रामभरोसे भी नदारद था। लोगों ने स्वाभाविक अनुमान लगाया कि फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। काफी देर लोग खड़े रहे। अपनी-अपनी राय जाहिर करने लगे। किसी ने कहा – मुहूर्त किसी मंदिर में रखा होगा, वहीं होंगे दोनों। दूसरे ने कहा – शूटिंग से पहले रिहर्सल करना पड़ता है, वही चल रहा होगा। तीसरे ने रोस प्रकट किया – हमारा तो ख्याल न रखा। किसी और ने कहा – जो हो, शहर का नाम रौशन हो गया। हर मुँह नए-नए कयास थे। दिन निकलता रहा, बातें जारी रही। मगर काफी देर तक कोई न आया। दोपहर हो गया। अब भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। कोई कितना धीरज धरे। इसी तरह शाम होने को आया। 
    आखिर रामभरोसे आया। वह काफी थका हुआ था। उसके चेहरे पर फटकार बरस रही थी, रंग उजड़ा हुआ था। वह भारी कदम जाकर परदेशी के बेंच पर ही बैठ गया, और ऊपर की ओर देखने लगा। उसे चन्दन राय की दुमंजिला साफ दिखने लगी। दुमंजिला इमारत की खिड़की अमूमन खुली रहती थी मगर आज बंद थी। इने-गिने लोग वहाँ फिर भी थे। उन्होंने उसे घेर लिया। वे भी पास बैठ गए। एक ने धीरे से पूछा – “शूटिंग बहुत मेहनत वाला काम है न!” 
    रामभरोसे कुछ न बोला। वह एकटक खिड़की को देखने लगा। 
    एक दूसरा आदमी बोला – “डिस्टार्ब मत करो इसको अभी, कल के शूटिंग का रिहर्सल कर रहा है।” 
    रामभरोसे से रहा न गया। वह क्रोध में फट पड़ा और बोला – “फराड है वह। चन्दन राय के लड़की को भगा के ले गया है। यहीं से हर दिन उससे लैपटॉप में चैट करता था। बंद खिड़की देख रहे हो, वहीं से इशारेबाजी होती थी।” सबने बंद खिड़की को देखा। 
    रामभरोसे फिर रूआंसे बोला – “अभी हम थाना से आ रहे है। सवेरे से बहुत खिंचाई हुई हमारी। बहुत हाथ-पैर धर कर छूटे हैं हम।“ 
    सब अवाक होकर कभी रामभरोसे कभी बंद खिड़की को देख रहे थे।

    Gourang


    Gourang

  • रिफ्यूजी — Neelam Swarnkar

    रिफ्यूजी — Neelam Swarnkar

    ​Neelam Swarnkar

    मेरी आँखों ने जो मंज़र देखे हैं
    वो सोने नहीं देते रात भर
    आँख बंद किये भी मैं जागता रहता हूँ।
    सपने में आने वाले हैवानों को हकीकत में देखा है
    वे इंसानों का चेहरा ओढ़े हमारे घर जला रहे थे।

    ​भागते हुए जिन लाशों को लांघा
    उनमे से कई चेहरे मेरे बेहद करीब थे
    मेरा छोटा भाई
    जो बिछड़ गया था मुझसे
    तीन दिन बाद मिला
    न रो पाया न हँस पाया।

    ​मेरा सबसे छोटा भाई
    जिसे बाँहों में कस कर पकड़ रखा था मैंने
    नाव पर चढ़ने के दौरान
    बहुत छोटा है, बोलता कुछ नहीं
    बस बड़ी-बड़ी आँखों से देखता है।
    वो पहले ऐसा नहीं था..

    ​माँ..
    जो पिता की याद और हमारे भविष्य की फ़िक्र में रोती है
    और खीझती है,
    वो भी ऐसी नहीं थी..

    ​दरअसल इस रिफ्यूजी कैंप का हर इंसान बदल गया है
    पहले ऐसा कहाँ था
    अब सब बदल गया
    मेरा मुल्क़, मेरे लोग
    ये दुनिया ही पूरी बदल गयी है।

    Neela​m Swarnkar

  • युध्द, राष्ट्र और राजा

    युध्द, राष्ट्र और राजा

    Bhanwar Meghwanshi

    एक दौर की बात है,
    एक देश था,एक राजा था
    चुना हुआ प्रतिनिधि
    पर उसे राजा होने का
    गुमान था।

    देश के लिए,देश के नाम पर
    उसने सब कुछ किया।
    कुर्बानियां दी,बलिदान किये
    शहादतें करवाई।
    वैसे ही,जैसे हर राजा करवाता है ।

    राजा –
    मरवाता रहा सैनिक
    प्रजा –
    देती रही श्रद्धांजलियाँ

    रह रह कर
    उठता रहा ज्वार 
    राष्ट्रभक्ति का ..

    चलती रही गोलियां 
    होते रहे विस्फोट
    मरते रहे सैनिक
    बहता रहा लहू 
    चीखते रहे चैनल्स

    प्रजा 
    मनाती रही शोक
    शहीदों को चढ़ाती रही पुष्प

    राजा 
    करता रहा राज 
    इसके अलावा वह 
    कर भी क्या सकता था बेचारा ?

    शहादत का ज्वार 
    उठता रहा,गिरता रहा
    कूटनीति का वार
    चलता रहा,छलता रहा।

    देशभक्त जनता
    सड़कों पर आ गई
    आक्रोश कर गया हद पार 
    युद्ध करो,युद्ध करो
    के नारे गूंजने लगे।

    जब युद्ध का उन्माद 
    फैल गया पूरे राष्ट्र में 
    तब राजा ने
    दुखी राष्ट्र को संबोधित किया
    आक्रोशित राष्ट्र के नाम सन्देश दिया

    राष्ट्र से की
    अपने मन की बात
    राष्ट्र के नाम पर खरीदे हथियार
    राष्ट्र के नाम पर लड़ा गया चुनाव
    और राष्ट्र ही के नाम पर जीता भी

    राजा बड़ा नेक था
    और राष्ट्रभक्त भी
    उसने सब कुछ
    राष्ट्र के नाम पर किया

    तब से राष्ट्र और राजा में 
    कोई फर्क ही नहीं बचा
    राजा ही राष्ट्र हो गया 
    और राष्ट्र ही राजा 
    इस तरह अवतरित हुआ
    ” राष्ट्र राज्य .”

    उसके बाद 
    फिर वहां 
    न चुनाव की जरुरत पड़ी
    न लोकतंत्र की,
    और न ही संविधान की
    सारे झमेलों से
    मुक्त हो गया राष्ट्र
    इस तरह राष्ट्र के लिए
    बहुत उपयोगी साबित हुआ युद्ध

    Bhanwar Meghwanshi

  • हमारी दुनिया — Anand Kumar

    हमारी दुनिया — Anand Kumar

    ​Anand Kumar

    ​ये कविता एक प्रयास है असमानता के दुनिया भर के कुछ उदाहरणों को साथ लेते हुए। इसे पढ़े तब कल्पना करें की कोई अश्वेत या दलित या महिला कुछ कहना चाह रहे हैं या जिन्होंने भी समानता के लिए कुछ किया या सोचा,  उनकी सोच कैसी रही होगी, बदले की और किस तरह के बदले की।

    कविता के तकनीकी पहलुओं में गड़बडियो के लिए माफ़ी चाहता हूँ, पहला प्रयास है। आशा है इसमें आपको बताये गये तीनो लोग, अश्वेत दलित व महिला मिल जायेंगे। कविता मे हुई भूल चूक के लिए माफ़ी।

    ​हमारी दुनिया

    ​तुम्हारी दुनिया में न मैं था न थे सपने मेरे
    पीढ़ी दर पीढ़ी दफ़्न कर रहे थे तुम निशां मेरे
    हक़, सम्मान और आवाज़ छीन चुके थे तुम
    रोटी,पानी और ज़मीन भी बीन चुके थे तुम
    अफ़्रीका से उठा बाज़ारों में बेचा
    श्रम को मेरे तुमने खूब नोचा
    गर्म तेल से नहला रहे थे
    शहरों से भगा रहे थे
    और इसी बीच
    अपने ग्रंथों में भी
    मेरे वजूद को अपनी दुनिया के लिए भद्दा बता रहे थे तुम।

    घर में कैद किया
    या छिपा के रख लिया  
    कमतर हुँ ये गाये जा रहे थे तुम
    कमर तोड़ दी और आशा भी
    पर छिपाने को परदे बहुत सुनहरे लगाये जा रहे थे तुम
    बस यूँ कहुँ की जाने किस आदर्श पे चलके
    न जाने किसकी दुनिया बसा रहे थे तुम।

    पर मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    तुम्हारे आदर्शों को ठेंगा दिखने वाली होगी
    कैद न हो कोई
    पीछे न रह जाये कोई
    फिर कोई अपने घरों से उजाड़ा न जाये
    प्रेम की हवा पे पहरा न लगाया जाये  
    धर्म के आगे कोई बहरा न हो जाये
    कुछ ऐसी ही बातों की मटकी फिर न टूटे
    इसकी गारन्टी देने वाली होगी
    मेरी दुनिया थोड़ी अय्याश और
    आदर्शों को ठेंगा दिखाने वाली होगी।

    तुमने जो सब करने से रोका मुझे
    जैसा मेरा वजूद सोचा तुमने
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा
    जैसा किया उसके उलट कर दूंगा।
    अपने हक़ को तो तुमसे लड़ूंगा ही
    तुम्हारे हक की भी बात करूँगा
    बोलना भुलाया तुमने मेरा
    मैं तुम्हारा बोलना न भूलने दूंगा
    न रहना इस ग़लत फ़हमी में की सहूँगा अब
    पर तुम्हे भी सहने नहीं दूंगा
    मैं तुमसे जी भरके बदला लूंगा।

    विज्ञानं साहित्य और कला के आगे किसी को आने नहीं दूंगा
    खुद को सिखाऊंगा सीखूंगा गिरूंगा उठूंगा फिर से लिखूंगा
    पर इस बार किसी को किसी का वजूद कमतर न लिखने दूंगा
    अब इस दुनिया से जी भर के बदला लूंगा।

    माना कुछ पुरानी बातें भी लिख दी है
    सुधरे है हालात काफ़ी
    पर ये भी सच है कि अभी चलना है और दूर और काफ़ी
    तुम्हारी दुनिया में मैं न था
    पर हमारी दुनिया मै ऐसा न होगा।

    Anand Kumar

  • भंगण मां — Vijendra Diwach

    भंगण मां — Vijendra Diwach

    Vijendra Diwach

    मैं एक औरत हूँ
    मेरी जाति मुझे भंगी बतायी गयी है,
    घर वालों ने बचपन से ही मुझे
    हाथों में झाड़ू पकड़ाई है,
    मेरी कमर में आभूषण के
    रूप में झाड़ू ही सजायी है।

    कोई मौसम नहीं देखते हैं
    बस निकल पड़ते हैं,
    कथित विद्वान चौक-रास्ते तो साफ करवाते हैं,
    लेकिन अपनी सामन्ती सोच पर कभी झाड़ू नहीं मारते हैं।

    गलियारे बुहारने पर मिल जाती है
    कुछ रोटियां और थोड़ा अनाज,
    कभी कोई बुलाकर पड़ोसियों को
    देता है पुराने कपड़ो का दान,
    खुला प्रदर्शन करके खुद ही खुद को
    समझता है बन्दा नवाज।

    एक सुबह
    जाने वाली बारात का बैंड-डीजे बज रहा था
    मेरी झाड़ू का तिनका-तिनका
    रात्रिभोज में कथित सभ्यजनों द्वारा फैलायी गयी
    गन्दगी पर चल रहा था,
    शादी की सफाई में
    कुछ हरी मिर्च और थोड़े टमाटर मिले,
    रात के थोड़े कचौरे-पकौड़े भी मिले,
    कुछ पकौड़े मुंह में डाले,
    कुछ परिवार के लिये थैले में डाले।

    एक बालक की नजर हम पर पड़ी,
    उसकी जुबान कुछ इस तरह से चली-
    मांजी ये कचौरे-पकौड़े बेसन के और कल के हैं,
    आप बीमार हो जाओगे,
    पेट बिगड़ जायेगा।

    मैंने भी उत्तर दिया-
    छप्पन भोग और खाने वालों के पेट खराब होते हैं,
    बेटा हमें कुछ नहीं होगा।

    वह फिर बोला-
    हरी मिर्च और टमाटर के बीज निकाल के खाना,
    सुना है इनके बीजों से पेट में पथरी बनती है,
    मैंने फिर जवाब दिया-
    बेटा जो पत्थर ही खाते हैं उनका क्या?
    ज़िन्दगी तो उनकी पत्थरों के सहारे ही चलती है।

    द्वार पर जाते ही
    सब कहते हैं भंगण मां आ गयी,
    ये मेरी तौहीन है या फिर मेरा सम्मान,
    मैं भी खुद को भंगण मां कहने लगी हूँ,
    भूल गयी मां-बाबा ने क्या रखा था मेरा असली नाम।

    आज भी हम शमशान घाट से कपड़े उठाते हैं,
    अर्थियों के कफनों से चादरें और कम्बले बनाते हैं,
    आधुनिक कहे जाने वाले युग में
    आज भी हम सामन्ती बेड़ियों में जकड़े जाते हैं,
    सभ्यता का ढोंग करके
    कुंठित लोग झूठे ही सभ्य होने का उत्सव मनाते हैं,
    ऐसे झूठे उत्सव केवल इंसानियत को छलाते हैं,
    एक नजर हम पर डालो
    देखों कैसे जीवन हम चलाते हैं।

    ये गलियारे तो हम सदियों से साफ कर रहे हैं,
    मगर समाज और देश के
    कथित विद्वानों अपने मन की भी सफाई करो,
    इंसान को इंसान समझों,
    सामान्य मानविकी को भी मानव स्वीकार करो,
    भंगी और हमारे जैसी अन्य मैला ढोंने वाली जातियों को,
    दिल अपना बड़ा करके
    माथे पर बल लाकर रोटी देने की जगह
    अपनेपन और शिक्षा का उपहार दो।
    हमने तुम्हारें घर गलियारों को बहुत साफ किया है,
    एक बार तुम भी हमारे घर गलियारों को देखों,
    अपनी आँखों की असली पट खोलो,
    हो यदि सच में तुम मानवीय तो
    देखकर हमारा ज़िंदगीनामा द्रवित हो तुम्हारा ह्रदय,
    तुम भी थोड़ा रो लो।

    हमारे बच्चों की कमर में झाड़ू की जगह
    कंधों पर किताबों का थैला हो,
    उनकी भी आँखों में सुंदर भविष्य का सपना हो,
    मानवता जगाने वाली शिक्षा से ही इनका वास्ता हो,
    ये चले हमेशा नैतिकता पर चाहे कैसा भी रास्ता हो।
    हमारी बेटियां भंगण मां नहीं अपने असली नामों से पहचानी जायें,
    हमारी बस्ती भी इंसानों की बस्ती समझी जायें।।

    Vijendra Diwach

  • ऑस्ट्रेलिया गांव-श्रंखला : मडजी-गांव

    ऑस्ट्रेलिया गांव-श्रंखला : मडजी-गांव

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ऑस्ट्रेलिया में केंद्र या राज्य सरकार की ओर से ग्राम-समाज के लिए नौकरशाही नियुक्त नहीं होता है। कोई नौकरशाह स्थानांतरण होकर नहीं आता है कि राज्य-सरकार या केंद्र-सरकार अपने द्वारा नियुक्त नौकरशाहों को ग्राम-समाज को संचालित करने के लिए भेजे।

    ग्राम समाज अपनी जरूरतों के लिए नौकरियां निकालता है, अपनी नौकरशाही की नियुक्ति स्वयं करता है तथा नौकरशाही पर संपूर्ण नियंत्रण ग्राम-समाज का होता है। ग्राम-समाज नौकरशाही को बर्खास्त कर सकता है। योग्यता के मानदंड सरकारें तय करतीं हैं, वेतन सरकारें देतीं हैं।

    ग्राम-समाज को अपनी सामाजिक संपत्तियों व लगाए गए करों पर अधिकार होता है। रेवेन्यू में से कुछ हिस्सा केंद्र सरकार, कुछ हिस्सा राज्य सरकार को जाता है, बड़ा हिस्सा ग्राम-समाज के पास रहता है। छोटी-छोटी बात के लिए ग्राम-समाज को राज्य या केंद्र सरकार के आगे भिखारी की तरह हाथ नहीं पसारने पड़ते हैं। ग्राम-समाज अपनी संपत्तियों का प्रयोग अपने अनुसार करता है।

    ग्राम-समाज को नियंत्रित करने के लिए ग्राम विकास अधिकारी, ब्लाक विकास अधिकारी, तहसीलदार, उपजिलाधिकारी, जिलाधिकारी जैसी सांमती, राजसी व अलोकतांत्रिक तथा केंद्र/राज्य सरकार केंद्रित नौकरशाही नहीं होती है।

    राज्य की राजधानी से लगभग 260 किलोमीटर तथा विधानसभा क्षेत्र के मुख्यालय से लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक गांव है मडजी। यह गांव समुद्र तट पर या समुद्र तट को जोड़ने वाले किसी मार्ग पर भी स्थित नहीं है, पर्यटन स्थल भी नहीं है। कहने का तात्पर्य यह कि यह गांव प्रिविलेज्ड गांव नहीं है, इसके बावजूद इस गांव की जीवन-शैली, जीवन-स्तर, सुविधाओं व सामाजिक-मूल्यों इत्यादि से ऑस्ट्रेलिया की व्यवस्थाओं, सरकारी व सामाजिक तंत्रों की जिम्मेदारी व जवाबदेही के संदर्भ में कल्पना तो की ही जा सकती है।



    लेख के सबसे अंत में हाईस्कूल व प्राइमरी स्कूल की अनेक फोटो हैं, अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया के गांव तक में सरकारी शिक्षा व्यवस्था का स्तर कैसा है।

    (लेख में प्रयुक्त सभी फोटो मडजी गांव की ही हैं)

    —जीवन-स्तर—

    मडजी की जनसंख्या ग्यारह हजार से कम है, लेकिन 60 से अधिक अच्छे रेस्त्रां व 6 से अधिक सुपरमार्केट हैं। 10 से अधिक पेट्रोल पंप हैं। कार कंपनियों के शोरूम हैं। लोग खूबसूरत व अत्याधुनिक सुविधाओं से संपन्न घरों में रहते हैं। घरों की कीमत लगभग एक करोड़ रुपए से शुरू होकर 15-20 करोड़ रुपए या अधिक तक है।

    • हवाई-अड्डा है। रेलवे स्टेशन है। लोकल बस सेवा है। लंबी दूरी बस सेवा है।
    • सीनियर सिटिजन के लिए मुफ्त स्थानीय व अंतःराज्यीय सामुदायिक-यातायात व्यवस्था है। 
    • सामुदायिक स्टेडियम है। गोल्फ-क्लब, क्रिकेट क्लब जैसे विभिन्न प्रकार के खेलों के अनेक क्लब हैं।
    • सामुदायिक तरणताल (स्विमिंग पूल) हैं।
    • सामुदायिक लाइब्रेरी है, सामुदायिक सिनेमा हाल है। थिएटर है।
    • न्यायालय है। अस्पताल हैं। पुलिस स्टेशन है, पोस्ट आफिस है।
    • बैंकों की शाखाएं व अनेक एटीएम हैं।
    • हाईस्कूल है। प्राइमरी स्कूल है।
    • बच्चों के लिए प्लेग्राउंड व पार्क हैं। फुटपाथ हैं।
    • साइकिल के लिए विशेष सड़के हैं। 
    • सेवज ट्रीटमेंट प्लांट है।
    • वर्षा जल-संग्रहण व शुद्ध पेयजल के लिए प्लांट है।
    • चौबीसो घंटे बिजली की आपूर्ति है।
    • चौबीसो घंटे पेयजल की आपूर्ति है।
    • 24 से अधिक बड़े पार्क हैं। 6 बड़े प्रदर्शनी स्थल हैं।

    निवास

    रेस्टोरेंट व सुपरमार्केट

    कार शोरूम

    —ग्राम-समाज के सामाजिक मूल्य—

    ग्राम-सूचना केंद्र

    अशक्त व अक्षम लोगों के लिए मुफ्त भोजन

    जो लोग बहुत कमजोर हैं या वृद्ध हैं या युवा लोग चलने में अक्षम हैं और पहियों पर भोजन की सेवा के लिए अहर्ता रखते हैं उनके लिए ग्राम-पंचायत गर्म व पौष्टिक व स्वादिष्ट भोजन उनके घर पर उपलब्ध कराती है। इसका योजना का नाम पहियों पर भोजन दिया गया है। समाज का मानना है कि सभी को अच्छे भोजन का अधिकार है, इसलिए इस सेवा के लिए जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनसे ही आर्थिक सहयोग लिया जाता है, जो सक्षम नहीं हैं उनको यह सेवा मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है।  

    सामुदायिक-यातायात

    ग्राम-पंचायत सामुदायिक-यातायात की सेवा उपलब्ध कराती है। यह सेवा मडजी के आसपास के इलाकों से लेकर राज्य की राजधानी तक ले जाने व वापस लाने तक की सेवा उपलब्ध कराती है। यात्रा का कारण पिकनिक मनाने जाना, मित्रों या रिश्तेदारों से मुलाकात करने जाना, चिकित्सा कारणों से संबंधित यात्रा, दूसरे शहर या दूसरे गांव की बाजार में खरीदारी करने जाना, पर्यटन इत्यादि कुछ भी हो सकता है।

    आवश्यकतानुसार इस सेवा के लिए कारों से लेकर बसें तक उपलब्ध हैं। चालक स्वयंसेवक होते हैं, उनको उनकी सेवा के लिए वेतन नहीं मिलता है। अरबपति खरबपति लोग भी इस सेवा के लिए सहर्ष स्वयंसेवक बनते हैं।

    इस सेवा के लिए कोई बंधा किराया नहीं है क्योंकि यह सेवा व्यापारिक लाभ के लिए नहीं होती। नाममात्र का मेंटीनेंस खर्च (औसत निकाल कर) व पेट्रोल/डीजल का खर्च। वाहन में जितने लोग यात्रा कर रहे होते हैं, यह खर्च उनमें बराबर बांट दिया जाता है।

    जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, उनके लिए यह सुविधा मुफ्त होती है, उनका खर्च ग्राम-पंचायत/सरकार वहन करती है।

    सामुदायिक-सब्जी-उद्यान

    जैविक सब्जियों व फलों के सामुदायिक उत्पादन के लिए मडजी में सामुदायिक उद्यान हैं। यहां उत्पादन में सक्रिय भागीदारी करते हुए सीखने सिखाने का काम होता है। जो भी उत्पादन में सक्रिय भागीदारी करता है उसके लिए उत्पाद मुफ्त उपलब्ध होता है।

    जल-स्रोतों की देखभाल

    ग्राम-पंचायत के क्षेत्र से निकलने वाली नदियों, बरसाती नालों, झीलों, तालाबों इत्यादि की साफ-सफाई, रिपरियन जोन व आसपास के क्षेत्र में पेड़-पौधों का रोपड़ व देखभाल की जिम्मेदारी गांव-समाज ईमानदारी से करता है।

    जल-स्रोतों की देखभाल करने के पीछे के प्रमुख कारण – पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, जलचरों के उत्पादन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, कृषि के लिए जल की शुद्धता व गुणवत्ता सुनिश्चित करना, प्राकृतिक सौंदर्य संरक्षण इत्यादि।

    राजमार्गों व सड़कों इत्यादि के निर्माण कार्य से होने वाली पर्यावरण की क्षति को राजमार्गों व सड़कों के आसपास वृक्षारोपड़ तथा वर्ष-जल-निकास इत्यादि के प्रबंधन की जिम्मेदारी।

    वृक्षारोपड़

    प्रतिवर्ष कई बार ग्राम-पंचायत द्वारा वृक्षारोपड़ अभियान चलाया जाता है। इसके अंतर्गत जल-स्रोतों के किनारों व आसपास, सड़कों, स्कूलों, सार्वजनिक आर्द्रिभूमि इत्यादि क्षेत्रों में पौधारोपड़ किया जाता है। जिसको जिस क्षेत्र में रुचि हो वह उस क्षेत्र के स्वयंसेवक समूह के साथ जुड़ सकता है।

    कूड़ा-प्रबंधन

    सामान्य कूड़ा, कागज-गत्ता वाला कूड़ा, टिन लोहा स्टील एल्म्युनियम कांच प्लास्टिक-बोतल इत्यादि कूड़ा, जैविक कूड़ा; इन चार प्रकार के कूड़ों के लिए हर घर को चार प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ मिलते हैं। सामान्य व जैविक दो प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ प्रति सप्ताह तथा अन्य दो प्रकार के कूड़ा-कोष्ठ पाक्षिक रूप से ग्राम-पंचायत द्वारा घर से उठाए जाते हैं।

    बच्चों के लिए प्लेग्राउंड व पार्क

    साइकिल के लिए विशेष मार्ग

    —सुविधाएँ—

    हवाई-अड्डा है, रेलवे स्टेशन हैं, लोकल बस सेवा है, सामुदायिक यातायात व्यवस्था है। हाईस्कूल है, प्राइमरी स्कूल हैं। सामुदायिक स्टेडियम है, सामुदायिक तरणताल हैं। गोल्फ-क्लब है। सामुदायिक लाइब्रेरी है, सामुदायिक सिनेमा हाल है। ग्राम-पंचायत का न्यायालय है। अस्पताल हैं, पुलिस स्टेशन है, पोस्ट आफिस है। कई बैंकों की शाखाएं व अनेक एटीएम हैं। फुटपाथ हैं, साइकिल के लिए विशेष सड़के हैं।

    सेवज ट्रीटमेंट प्लांट है। पीने के पानी के लिए प्लांट है। चौबीसो घंटे बिजली की आपूर्ति है। चौबीसो घंटे पेयजल की आपूर्ति है। 24 से अधिक बड़े पार्क हैं। 6 बड़े प्रदर्शनी स्थल हैं।

    सेवज-ट्रीटमेंट प्लांट

    मडजी का सारा सेवज-वाटर पहले ट्रीट किया जाता है, फिर स्थानीय नदी में पहुंचा दिया जाता है।

    वर्षा जल-संग्रहण व पेयजल

    पेयजल व घरेलू आपूर्ति के लिए दो बांध बनाकर बड़ी-बड़ी झीलें बनाई गई हैं। इन झीलों की पानी संग्रहण की क्षमता यह है कि यदि इनमें पानी पूरा भरा है और यदि पानी नहीं बरसे तो उस स्थिति में भी यदि हर परिवार हजार-दो हजार लीटर पानी भी प्रतिदिन प्रयोग करे, झीलों का पानी वाष्पित भी होता रहे तब भी पूरे मडजी को पंद्रह-बीस वर्षों से भी अधिक समय तक पानी की आपूर्ति की जा सकती है। धरती के अंदर के पानी को प्रयोग करने की जरूरत नहीं। पानी की आपूर्ति के पहले उसको पेयजल-वाटर-ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट किया जाता है।

    हवाई-अड्डा

    तकरीबन 250 एकड़ के क्षेत्रफल में मडजी का हवाई-अड्डा बना हुआ है। जिसके मुख्य-रनवे की लंबाई लगभग पौने-दो किलोमीटर है।

    रेलवे-स्टेशन

    चूंकि लोग कारों व छोटे हवाई जहाजों का प्रयोग यातायात के लिए अधिक करने लगे, इसलिए लगभग दो दशकों पूर्व स्थानीय लोगों की सहमति लेकर यहां के लिए रेलवे सेवा बंद कर दी गई। रेलवे-स्टेशन अब भी है, हेरिटेज के रूप में पंजीकृत है। आजकल रेलवे-स्टेशन के एक हिस्से का प्रयोग कला व शिल्प वीथि के रूप में किया जाता है।

    ऑस्ट्रेलियन रूरल एजुकेशन सेंटर

    ऑस्ट्रेलिया में ग्राम-पंचायतों में ऑस्ट्रेलियन रूरल एजुकेशन सेंटर होते हैं। जहां विभिन्न प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है। किसानों के उत्पादों तथा संबंधित विज्ञान, तकनीक इत्यादि के लिए मेले लगते हैं। मेले के दिनों में ग्राम-पंचायत की ओर से मुफ्त बस सेवाएं चलाई जाती है।

    लाइब्रेरी

    लाइब्रेरी में इंटरनेट, प्रिंटिंग, कम्प्यूटर, स्कैनिंग, सभा-कक्ष, प्रोजेक्टर-रूम इत्यादि की सुविधाएं हैं। नवजात शिशुओं से लेकर छोटे बच्चों के आयु-वर्ग के लिए लाइब्रेरी द्वारा हर सप्ताह दो दिन विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

    मोबाइल लाइब्रेरी की भी सुविधा है। मोबाइल लाइब्रेरी स्कूलों व चुने हुए सार्वजनिक स्थानों में हर तीसरे सप्ताह के अंतराल पर पहुंचती है। किस क्षेत्र में किस सप्ताह व किस तारीख को पहुंचेगी इसकी सूचना अग्रिम उपलब्ध रहती है।

    अस्पताल

    बैंक

    न्यायालय

    पुलिस-स्टेशन

    फायर-ब्रिगेड

    पोस्ट-आफिस

    स्टेडियम व थिएटर

    टेनिस क्लब

    थिएटर

    —शिक्षा—

    हाईस्कूल

    पुस्तकालय

    पुस्तकालय

    खेलकूद

    खेलकूद

    छात्रों द्वारा बनाया गया

    छात्रों द्वारा बनाया गया

    प्राइमरी स्कूल

    ऑस्ट्रेलिया में प्राइमरी का मतलब कक्षा 6 तक की पढ़ाई। इस प्राइमरी स्कूल में लगभग 600 छात्र/छात्रा हैं, जिनके लिए कुल 76 स्टाफ हैं। लगभग 150-200 कम्प्यूटर व आई-पैड हैं। वेतन व कैंटीन के खर्चों के अलावा स्कूल का सालाना खर्च लगभग 7.5 करोड़ रुपए है। वेतन व कैंटीन के खर्चों को जोड़कर कुल सालाना खर्च कई गुना अधिक रहता है।

    क्लासरूम

    क्लासरूम

    क्लासरूम

    खेलकूद

    खेलकूद

    खेलकूद

    खाना-पीना

    खेलकूद

    कला

    कला

    कम्प्यूटर

    कम्प्यूटर

    मुख्य-हाल

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • विस्तृत

    विस्तृत

    Dheeraj Kumar

    जो था स्वयं विस्तृत
    ज्यादा विस्तार पाता हुआ
    विस्तारित हो चला…..

    स्वयं के भीतर 
    गहरे चलने की मार्ग की खोज का
    मार्ग प्रशस्त होता गया

    यद्यपि कि
    विस्तार का मार्ग से
    या, विस्तारित होने का चलने से
    प्रत्यक्ष या परोक्ष 
    कोई भी संबंध जोड़ना मुश्किल था
    तो भी….
    एक अदृश्य और अबूझ बंधन से
    मजबूती से बंधे हुए थे वे

    गहरे भीतर की हरेक यात्रा का
    ठहराव का बिन्दु
    समय के तीर की दिशा मे
    बहता ही चला गया……

    बहते जाने के क्रम मे
    मष्तिष्क या स्पेस की छननी मे
    आसन्न अवशेष के बचे रह जाने की संभावित अवधारणा
    ज्यों ज्यों तिरोहित होता गया
    अनजाना और अनदेखा सा 
    एक तल उभरने की 
    प्रक्रियागत रूझान सामने 
    दिखने लगा …..

    एक तल 
    जिसपर रूकने या पैर टिकाने की
    कोई संभावना या प्रायिकता 
    नही होनी थी
    बस
    स्वयं चलकर
    विस्तारित होते हुये
    विस्तृत हो जाना था….

    Dhiraj Kumar

  • खून का दबाव व मिठास

    खून का दबाव व मिठास

    Mukesh Kumar Sinha

    जी रहे हैं या यूँ कहें कि जी रहे थे 
    ढेरों परेशानियों संग 
    थी कुछ खुशियाँ भी हमारे हिस्से 
    जिनको सतरंगी नजरों के साथ 
    हमने महसूस कर
    बिखेरी खिलखिलाहटें

    कुछ अहमियत रखते अपनों के लिए 
    हम चमकती बिंदिया ही रहे
    उनके चौड़े माथे की

    इन्ही बीतते हुए समयों में 
    कुछ खूबियाँ ढूंढ कर सहेजी भी 
    कभी-कभी गुनगुनाते हुए 
    ढेरों कामों को निपटाया 
    तो, डायरियों में 
    कुछ आड़े-तिरछे शब्दों को जमा कर 
    लिख डाली थी कई सारी कवितायेँ 
    जिंदगी चली जा रही थी 
    चले जा रहे थे हम भी 
    सफ़र-हमसफ़र के छाँव तले

    पर तभी 
    जिंदगी अपने कार्यकुशलता के दवाब तले 
    कब कुलबुलाने लगी 
    कब रक्तवाहिनियों में बहते रक्त ने 
    दीवारों पर डाला दबाव
    अंदाजा तक नहीं लगा

    इन्ही कुछ समयों में 
    हुआ कुछ अलग सा परिवर्तन 
    क्योंकि 
    ताजिंदगी अपने मीठे स्वाभाव के लिए जाने गए 
    पर शायद अपने मीठे स्वाभाव को 
    पता नहीं कब 
    बहा दिया अपने ही धमनियों में 
    और वहां भी बहने लगी मिठास 
    दौड़ने लगी चीटियाँ रक्त के साथ

    अंततः
    फिर एक रोज 
    बैठे थे हरे केबिन में 
    स्टेथोस्कोप के साथ मुस्कुराते हुए 
    डॉक्टर ने 
    स्फाइगनोमैनोमीटर पर नजर अटकाए हुए 
    कर दी घोषणा कि
    बढ़ा है ब्लड प्रेशर 
    बढ़ गयी है मिठास आपके रक्त में 
    और पर्ची का बांया कोना 
    135/105 के साथ बढे हुए 
    पीपी फास्टिंग के साथ चिढ़ा रहा था हमें

    बदल चुकी ज़िन्दगी में
    ढेर सारी आशंकाओं के साथ प्राथमिकताएँ भी
    पीड़ा और खौफ़ की पुड़िया
    चुपके से बंधी मुट्ठी के बीच 
    उंगलियों की झिर्रियों से लगी झांकने
    डॉक्टर की हिदायतें व
    परहेज़ की लंबी फेहरिस्त
    मानो जीवन का नया सूत्र थमा 
    हाथ पकड़ उजाले में ले जा रही 
    माथे पर पसीने के बूँद 
    पसीजे हाथों से सहेजे
    आहिस्ता से पर्स के अंदर वाली तह में दबा
    इनडेपामाइड और एमिकोलन की पत्तियों से 
    हवा दी अपने चेहरे को

    फिर होंठो के कोनों से 
    मुस्कुराते हुए अपने से अपनों को देखा 
    और धीरे से कहा 
    बस इतना आश्वस्त करो 
    गर मुस्कुराते हुए हमें झेलो 
    तो झेल लेंगे इन 
    बेवजह के दुश्मनों को भी
    जो दोस्त बन बैठे हैं

    देख लेना, अगले सप्ताह 
    जब निकलेगा रक्त उंगली के पोर से
    तो उनमे नहीं होगी 
    मिठास 
    और न ही 
    माथे पर छमकेगा पसीना 
    रक्तचाप की वजह से

    अब सारा गुस्सा 
    पीड़ाएँ हो जायेंगी धाराशायी 
    बस हौले से हथेली को 
    दबा कर कह देना
    ‘आल इज वेल’
    और फिर हम डूब जाएंगे 
    अपनी मुस्कुराहटों संग 
    अपनी ही खास दुनिया में

    आखिर इतना तो सच है न कि
    बीपी शुगर से 
    ज्यादा अहमियत रखतें हैं हम

    मानते हो न ऐसा !!

    Mukesh Kumar Sinha

  • भारत की कला लोक हितकारी क्यों नहीं है?

    Sanjay Shramanjothe

    कला और सृजन के आयामों में एक जैसा भाईचारा चाहिए जो कि भारत में नहीं है। ऐसा क्यों है? ऐसा होना नहीं चाहिए, लेकिन है। सृजनात्मक लोगों के बीच इस तरह मेलजोल और एकता क्यों नहीं है? एकता एक नैतिक प्रश्न है अगर आपकी नैतिकता विखण्डन और विभाजन के चारे से बनी है तो सृजनात्मक आयामों में भी एकता नहीं बन पाएगी।

    इतिहास में देखें समाज के सबसे शक्तिशाली आयाम – राजनीति के प्रति भी हमारी जनता में एक उपेक्षा फैलाई गई थी जो अभी भी बनी हुई है- “कोउ नृप होय हमे का हानि”, ये वक्तव्य सभ्यता और एकता वाले समाज में असंभव है हाँ विभाजन वाले और असभ्य समाज में ये न केवल संभव है बल्कि यही उसके सार्वजनिक और सामाजिक जीवन का एकमात्र नियम भी है। कोई भी राजा हो हमें क्या मतलब – इसका अर्थ है कि आपके राजा और राजगुरु, राजसत्ता आपके हितैषी नहीं हैं और आपको उनसे कोई लगाव नहीं है। मतलब कि देश, इतिहास, भूगोल सहित धर्म और समाज की धारणा ही यातो अभी यहां जन्म नही ले पायी है या मिटा दी गयी है।

    ये धारणा क्यों जन्म नहीं ले पायी? या क्यों मिटा दी गयी? इस प्रश्न के उत्तर में भारत के पूरे इतिहास और मनोविज्ञान का सार छुपा हुआ है। अभी किसी गाँव में जाइये किसी हेण्डपम्प या तालाब या कुवें के पास खड़े हो जाइये अगर वो सूख रहा है तो पूरे गाँव को एक जैसा दुःख नहीं होता। समाज के एक बड़े वर्ग के लिए पानी का ये स्त्रोत उपलब्ध ही नहीं, उसे इस स्त्रोत के पास फटकने ही नहीं दिया जाता। ये ताल या हेण्डपम्प सूख मरे तो वे लोग कहेंगे हमे क्या मतलब सूखे तो सूख जाए।

    इसी तरह जिन व्यापारों, व्यवसायों में आपका या आपके परिवार, रिश्तेदारों का दखल या हित नहीं है उनके बन्द हो जाने पर या उन पर हमला हो जाने पर आप कह सकते हैं कि हमें क्या मतलब आपका बिजनेस डूबता है तो डूबे। इसी तरह जिन जातियों में आपके लोगों का भोजन या विवाह नहीं होता वे गुलाम हों या दंगे में मरें, आपको कोई फर्क नही पड़ता। अगर आपके रिश्तेदार और हितैषी हर जाति हर वर्ग में हों तो आपको उन जातियों वर्गों की ख़ुशी या सुख से सहानुभूति होगी।

    लेकिन भारत में एक किस्म का “सामाजिक वैराग्य” बनाकर रखा जाता है ये वैराग्य नहीं बल्कि पलायन और छुआछूत है, जिम्मदारी से भागने का दूसरा नाम है। इससे समाज विभाजित कमजोर और जातिवादी बना रहता है। इसीलिये गौर से देखिये तो साफ़ समझ में आएगा कि ओशो, रविशंकर, जग्गी वासुदेव जैसे भारतीय धर्मगुरु, योगी, बाबा आदि ऐसे वैराग्य और मोक्ष की धारणा से भरा जहरीला अध्यात्म हर एक पीढ़ी को पिलाते रहते हैं।

    ये बाबा हर पीढ़ी को पलायनवादी वेदांत सिखाते चलते हैं। इनका एकमात्र फायदा इस बात में है कि भारत की गरीब दलित दमित जनता इस सामंती और पुरुषसत्तावादी धर्म से आजाद न हो जाए। कर्मकांड न सही तो अध्यात्म की रस्सी से ही ये धर्म के खूंटे से बंधी रहे। ताकि उनका कुआँ न सूखे।

    इसी तरह आज के फ़िल्मकार साहित्यकार चित्रकार और सृजनधर्मी लोग हैं। सबके अपने कुवें और हेण्डपम्प है किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। यहां अपनी झोली भर जाए तो मोक्ष मिल जाता है बाकी समाज और दुनिया जाये भाड़ में अपना कुटुंब ही वसुधैव कुटुंब है।

    हसन निसार ने एक चर्चा में थॉमस रो का उदाहरण देते हुए कहा है कि अंग्रेजी अधिकारियों ने जब भारत में पैर फ़ैलाने शुरू किये तो मुगल दरबार में किसी बादशाह के बीमार बेटे का उन्होंने एलोपैथी से इलाज किया बेटा स्वस्थ हुआ तो बादशाह ने खुश होकर कहा कि इस अंग्रेज के वजन के बराबर सोना तौलकर इसे दिया जाए। अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि बादशाह मुझे ये सोना नहीं चाहिए बस मुझे और मेरी कौम को हिंदुस्तान से व्यापार की इजाजत दे दीजिए।

    इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। हालाँकि इसका ये अर्थ नहीं कि उन अंग्रेजो की लूटमार भरी नैतिकता सर्वथा प्रशंसनीय है। लेकिन फिर भी कुछ श्रेष्ठता का तत्व तो उनमें है ही। उसी श्रेष्ठता ने भारत को आधुनिकता और सभ्यता दी है।

    अब देखिये, भारत में जब साहित्यकारों पर हमले होते हैं तो फिल्मकार बिरादरी को फर्क नहीं पड़ता। फिल्मकारों पर हमले होते हैं तो खिलाडियों को फर्क नहीं पड़ता। वो तो आजकल फिल्मकारों और खिलाड़ियों में प्रेम विवाह और अंतर्जातीय अंतरधार्मिक विवाह होने लगे हैं इसलिए उनके बीच एकता जन्म ले रही है। डॉ. अंबेडकर ने इसीलिये अंतर्जातीय विवाह की सलाह दी थी, बॉलीवुड और क्रिकेट के बीच वह सलाह बढ़िया काम कर रही है। लेकिन साहित्य, संगीत कला आदि में अभी भी मनुस्मृति ही चल रही है।

    अब बड़ा प्रश्न ये है कि साहित्य और खेल या साहित्य और फिल्म के बीच ये प्रेम क्यों नहीं पनप रहा है?

    इसका बहुत गहरा कारण है। साहित्य और फिल्म इतने गहराई से और सीधे सीधे समाज को संबोधित करते हैं कि उनके सन्देश से बड़ा बदलाव आ सकता है। इसीलिये इस देश के धर्म संस्कृति के ठेकेदारों को पता है कि साहित्यकार और फिल्मकार तबकों को कंट्रोल करके रखना है वरना यहां की जनता कला के सृजनात्मक आयामों की शक्ति से परिचित हो गयी तो इस देश पर शोषक धर्म की सत्ता खत्म हो जायेगी।

    इसीलिये बहुत सोच समझकर साहित्य में भी जन विमर्श को अदृश्य बनाकर देवी देवता, भक्ति, राजे रजवाड़े, मिथक, महाकाव्य आदि की चर्चा चलती रही है। हजारों साल से इस मुल्क के साहित्य में आम आदमी की कोई बात नहीं हो रही थी, 1935 तक मुख्यधारा के साहित्य में जिस तरह का नायिका विमर्श और श्रृंगार वर्णन चला उसे देख लीजिये। वो तो भला हो कार्ल मार्क्स और अन्य दार्शनिकों का जिन्होंने भारतीय विद्वानों को पहली बार जन हितैषी साहित्य रचना सिखाया। वरना आज तक नख शिख वर्णन और भजन कीर्तन स्तुतियाँ इत्यादि ही चलती रहती।

    हालाँकि मार्क्स के आने के बाद भी भारतीय भक्ति का आभामण्डल कम नहीं हुआ है। आज भी कला, संगीत, साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र उसी परलोकी, आत्मघाती अध्यात्म में जड़ जमाये हुए है। आज भी कला के आनन्द की उपमा ‘विदेही भाव, समाधी भाव और समय की स्तब्धता’ से दी जाती है। मतलब इस लोक से हटकर परलोक में ले जाने वाली कला ही महान कला है। बाकी सब बेकार है। ये सब उसी जहरीले कुवें से निकलने वाली शब्दावली है जिसने स्त्री अधिकार और स्त्री विमर्श की बजाय नायिका विमर्श पैदा किया था। या जिसने दलित साहित्य की बजाय “दास्य भक्ति साहित्य” पैदा किया था।

    साहित्य के बाद जब फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो भारत का यही देवता विमर्श या नायिका विमर्श भक्ति में और इश्क मुहब्बत की छिछोरी रंगीनियों में ट्रांसलेट हो गया। हालाँकि यूरोप में भी फ़िल्मी सफर ऐसे ही शुरू हुआ था। पहले धर्म फिर इश्क मुहब्बत। लेकिन बहुत जल्द उन्होंने अन्य विषय भी सीख लिए। बायोग्राफ़िकल, हिस्टोरिकल, डॉक्यूमेंट्री स्टाइल फिल्में वहां खूब सराही जाती हैं। इधर भारत में इसकी कल्पना ही असंभव है।

    यहां अभी भी रामलीला चल रही है। स्त्री विमर्श सास बहू विमर्श बना हुआ है। एक सभ्य और इंसानी समाज होने के नाते यूरोप में उन्होंने इंसानी अधिकारों की परिभाषा जल्द सीख ली और अपने साहित्य औऱ फिल्मों में उसे अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया। लेकिन हमारा देश धर्मप्राण होने के नाते आज भी देवी देवताओं और मिथकों महाकाव्यों में ही घुसा जा रहा है, बहुत हुआ तो इश्क मुहब्बत और शादी के वीडियो चला देते हैं या चलताऊ देशभक्ति के हैंडपंप उखाड़ने वाले “गदरीले नायक” रच देते हैं।

    भारत का साहित्य और फिल्म आज भी पूरी तरह जन विमर्श में नहीं उतर सका है। अभी भी पुराने सौन्दर्यशास्त्र का मोह ऐसा बना हुआ है कि समानता, प्रेम, स्त्री अधिकार, दलित अधिकार की प्रस्तावनाओं से डर लगता है। और तो और बच्चों को भी वैज्ञानिक तार्किक शिक्षा देने से डर लगता है कि कहीं वे अधर्मी न हो जाएं। इसीलिए सारे बाबा योगी और पंडित मिलकर बच्चो को ध्यान योग और प्राणायाम के नाम पर विभाजन और इंसानियत के विरोध के “संस्कार” सिखाते हैं।

    ये विभाजक संस्कार असल में भारत को पुराना भारत बनाये रखने की सनातन साजिश है। इसलिए सिनेमा, साहित्य, पत्रकारिता और सभी कलाओं में ठीक राजनीति, प्रशासन और न्यायपालिका की ही तरह सवर्ण द्विजों का ही आधिपत्य बना हुआ है। वे तय करते हैं कि किस गुण को किस भाषा में सद्गुण सिद्ध करना है। किस गुण को मानव हितैषी और “वसुधैव कुटुंब” के “अनुकूल” सिद्ध करना है या “प्रतिकूल” सिद्ध करना है।

    इन परिभाषाओं से अंततः वे कहाँ और कैसे पहुंचना चाहते है ये वे बहुत सावधानी से तय करते हैं। वे एक ऐसे सर्वोदय या रामराज्य की रचना करते हैं जिसमे वर्ण व्यवस्था भी जारी रहे और वर्णानुकूल कार्य करते हुए “स्वधर्म” पालन करने वाले “संस्कारी पुरुष” और “सुशीला स्त्री” सहित सभी बच्चे तर्क और मानव अधिकार भूलकर संस्कारी भी बनी रहें और यूरोपीय कला, साहित्य, सिनेमा, विज्ञान तकनीक आदि को ऊपर ऊपर सीखकर प्रगतिशील भी बने रहे। भीतर हनुमान चालीस चलती रहे और ऊपर ऊपर “वी शल ओवरकम” या “तुंकल तुंकल लिटिल इश्टार” भी चलता रहे। ऊपर टाई और भीतर जनेऊ चलती रहे। काउबॉय हैट के नीचे संस्कारी चोटी भी सरकती रहे।

    जब कला और कलाओं के प्राप्य या करणीय के प्रति आपके विद्वानों और “विद्वान षड्यंत्रकारियों” का ये रुख है तो आपकी कला और साहित्य भी विभाजन ही पैदा करेंगी और खुद भी विभाजित होंगी। उनमे आपसी मेलजोल से अंतर्जातीय विवाह नहीं होंगे बल्कि छुआछूत पैदा होगी इंटेरडीसीप्लिनरिटी या इनोवेशन का पुरस्कार या प्रेरणा नहीं होगा बल्कि व्यभिचार की टीस और “नीच वर्णसंकर” पैदा होने का भय होगा।

    ऐसी भयभीत और अनैतिक कौम से आप कैसे उम्मीद करेंगे कि वे कला या सृजन के नाम पर एकदूसरे के साथ खड़े हों? क्यों उम्मीद करेंगे? साहित्य, कला, सिनेमा और पत्रकारिता में भी जिन लोगों का दबदबा बना हुआ है क्या वे इन सृजनात्मक आयामों में कोई सार्थक एकता सिद्ध होने देंगे? क्यों होने देंगे? जबकि वे बखूबी जानते हैं कि इन आयामों में एकता का अर्थ होगा भारतीय शोषक संस्कृति का निर्णायक अंत। क्या वे इतने मूर्ख हैं कि अपनी परम्परागत सत्ता, आजीविका और भविष्य को नष्ट कर दें?

    इसीलिये भारतीय फिल्मकार पत्रकार और खिलाड़ी भारतीय समाज की समस्याओं पर कुछ नहीं बोलते। वे किस जाति या वर्ण से आते हैं ये देख लीजिए आपको उनकी चुप्पी और तटस्थता का कारण समझ में आ जायेगा। मुहम्मद अली ने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ बोलते हुए सरकार से और धर्म से कड़ी टक्कर ली थी, कई हॉलीवुड सितारों ने भी इसी तरह हिम्मत दिखाई। तत्कालीन यूरोप में चार्ली चैपलिन ने और सैकड़ों साहित्यकारों रंगकर्मियों ने ये साहस दिखाया था। लेकिन हमारे क्रिकेट के भगवानों और महानायको ने क्या किया? इन्होंने कभी गरीब मजलूम और स्त्री अधिकार की बात नही की। बल्कि हर दौर में बदलते राजनितिक आकाओं के सामने इन्होंने सकर्वजनिक रूप से साष्टांग प्रणाम किये हैं। इसका क्या मतलब है?

    धर्म सत्ता अर्थसत्ता और राजसत्ता के समीकरण की एक ही चाबी है उस चाबी को सब मिल जुलकर संभालते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे सौंपते जाते हैं। इस प्रवाह में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। इस बीच “शुद्रा दी राइजिंग” या “शरणम गच्छामि” जैसी फिल्में बनें या ऐसा साहित्य लिखा जाने लगे तो उसे बैन कर दिया जाता है। समाज के लिये घातक सिद्ध करके सेंसर कर दिया जाता है। लेकिन घर घर में मूर्खता और अनैतिकता फ़ैलाने वाले मिथक और महाकाव्यों आधारित सीरयल लगातार बढ़ते ही जाते हैं। ये सब अपने आप ही नहीं होता, इसके पीछे बहुत निर्णयपूर्वक सचेतन ढंग से कोई यांत्रिकी काम करती है।

    तो अंततः यह लिख कर रख लीजिए कि जब तक भारत में कला, संगीत, पत्रकारिता और सृजन के आयामों में स्वर्ण द्विजों और ब्राह्मणवादियों का कब्जा है तब तक साहित्य, गीत, संगीत, सिनेमा पत्रकारिता और खेल भी आम भारतीय के विरोध में ही काम करेंगे।

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • बृजलाल द्विवेदी स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे अरुण तिवारी

    बृजलाल द्विवेदी स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे अरुण तिवारी

    3 फरवरी, 2019 को ‘मीडिया विमर्श’ के आयोजन में होंगे सम्मानित


    हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘प्रेरणा’ (भोपाल) के संपादक अरुण तिवारी को दिया जाएगा। सम्मान समारोह 3 फरवरी, 2019 को गांधी भवन, भोपाल में दिन में 11 बजे आयोजित किया गया है। समारोह के मुख्यअतिथि वरिष्ठ पत्रकार डा. हिमांशु द्विवेदी होंगे तथा अध्यक्षता प्रख्यात समालोचक डा. विजय बहादुर सिंह करेंगे। कार्यक्रम में मुख्यवक्ता के रूप में कथाकार श्री मुकेश वर्मा, विशिष्ट अतिथि के नाते व्यंग्यकार गिरीश पंकज और एटीजी मीडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अरविंद तिवारी मौजूद रहेगें।

    अरुण तिवारी  साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ संस्कृतिकर्मी, कवि एवं लेखक भी हैं। 21 वर्षों से वे समकालीन लेखन को समर्पित साहित्यिक पत्रिका ‘प्रेरणा’ का संपादन कर रहे हैं। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार और मीडिया विद्यार्थी हिस्सा लेंगे। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव(पूर्व संपादकः नवभारत टाइम्स,मुंबई), रमेश नैयर (पूर्व निदेशकः छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी, रायपुर), तथा डा. सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिवः इंदिरा गांधी कला केंद्र,दिल्ली) शामिल हैं।

    इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज, सद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज, व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय, कला समय (भोपाल) के संपादक विनय उपाध्याय, संवेद (दिल्ली) के संपादक किशन कालजयी, अक्षरा (भोपाल) के संपादक कैलाशचंद्र पंत, अलाव (दिल्ली) के संपादक रामकुमार कृषक को दिया जा चुका है। सम्मान का यह ग्यारहवां वर्ष है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिल भारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रुपए, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है।

    Arun Tiwari