आमुख
ब्रिटिश लोग 200-225 साल पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के प्रति रेसिस्ट थे। ऑस्ट्रेलिया उनका देश नहीं था, वहां के लोग मतलब आदिवासी उनके अपने देश या समाज के लोग नहीं थे। यहां तक कि उनकी तरह दिखने वाले तक नहीं थे, रंग भी अलग था। इन सबके बावजूद ऑस्ट्रेलिया समाज आज कहां खड़ा है। हम अपने भारतीय समाज व लोगों के गिरेबां में भी झांकें ताकि हमें यह अंदाजा हो सके कि, हम व हमारा समाज अपने ही लोगों के लिए कितना अधिक रेसिस्ट व हिंसक मानसिकता से भयंकर रूप से ग्रस्त है। वह भी तब, जब हमारा देश हमारा ही है/था, हमारा समाज हमारा ही है/था, हमारे लोग अपने ही लोग हैं/थे।
हमारे कुंठित मन को जब ऑस्ट्रेलिया को गाली देने के लिए कुछ विशेष नहीं मिल पाता तो हम टेरना शुरू कर देते हैं कि ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की बर्बर हत्याएं कीं, ऐसा किया वैसा किया। जबकि अधिकतर होता यह है कि हम अपने पूर्वाग्रह से मनचाही कल्पना करते हुए तर्कशीलता का प्रयोग करते हुए तर्क गढ़ते हैं, गूगल करके कुछ अधकचरे तथ्य जोड़ते हैं, और अपनी मानसिक हिंसक प्रवृत्ति के द्वारा नियंत्रित हो लेते हैं।
हम यह सब साबित कुछ यूं करते हैं, मानो दुनिया में आज से 200-225 वर्ष पहले के देश, सभ्यताएं व समाज बहुत अधिक अहिंसक, मानवता-वादी हुआ करते थे; उस समय जब सबकुछ आदर्शवादी होता था, मानवीय मूल्य चरम पर थे तब भी ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया में ऐसा किया।
हम यह भूल जाते हैं कि भारत में सैकड़ों राजे-रजवाड़े थे। जो छोटी-छोटी बात में आपस में युद्ध करते रहते थे। इन्हीं सब में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की हत्याएं होती थीं। जितने लोगों की हत्याएं हमारा भारतीय समाज प्रतिवर्ष करता था, उतनी तो संभवतः उस समय ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी जनसंख्या भी न होगी।
हम यह भूल जाते हैं कि, ब्रिटिश लोगों ने लगभग 200-225 वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जितनी हत्याएं की। उससे बहुत-बहुत अधिक हत्याएं तो हम भारतीयों ने आजाद होने के बाद के वर्षों में ही खुद अपने ही समाज के दलितों व आदिवासियों की हत्याएं कर दी हैं, आजतक करते आ रहे हैं।
हमारे दोहरेपन की हालत यह है कि अपने समाज व अपने अंदर की आज की बर्बरता के बारे में भी बात नहीं करना चाहते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में 200-225 साल पहले हुई घटनाओं को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं।
हमारी कुंठा हमें यह भी नहीं देखने देती है कि 200-225 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया के समाज ने कितनी अधिक लोकतांत्रिक परिपक्वता हासिल की है, मानवाधिकारों की किन ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। कैसे एक बेहतर समाज का निर्माण किया है। यह सब हो पाना दोहरेपन, आदर्शों की बतोलेबाजी, मानसिक हिंसा व बर्बरता इत्यादि से संभव नहीं होता। यह सब हो पाने का सीधा अर्थ यही है कि समाज ने समय के साथ-साथ अपने आपको परिष्कृत किया है, परिपक्व किया है, सीखा है, समझा है, गलतियों को स्वीकार किया है।
हमारे दोहरेपन से यह भी साबित होता है कि हमारे अंदर ऑस्ट्रेलिया जैसे लगातार परिपक्व व बेहतर होते जाने वाले समाजों से कुंठा है, द्वेष है, ईर्ष्या है, जलन है। यही कारण है कि, जब कुछ नहीं मिलता तो 200-225 वर्ष पहले पहुंच कर तथ्यों को तोड़-मोड़कर अपनी कुंठा को खाद-पानी दे लेते हैं। तर्क/वितर्क देकर अपनी मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति को जी लेते हैं।
ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में यह लेख कम से कम उन लोगों को तो लाभ पहुंचा ही सकता है, जो अंदर से मानसिक बीमार नहीं हैं, पूर्वाग्रह से भयंकर स्तर तक कुंठित नहीं हैं, देखने समझने की संभवानाएं शेष हैं। यह लेख शोधपत्र नहीं है, इसलिए यह लेख कामनसेंस के आधार पर ही पढ़ा जाए। लेख लंबा है लेकिन यदि आप पढ़ने में रूचि रखते हैं तो आपको पूरा लेख पढ़ना चाहिए। धन्यवाद।
1788 के पूर्व ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी
जिस समय दुनिया की सभी सभ्यताओं ने बड़े-बड़े साम्राज्य बना लिए थे। हजारों वर्षों से नगरीय सभ्यताओं में जी रहे थे। तोपों, बंदूकों का सैकड़ों वर्ष पहले प्रयोग करना शुरू कर चुके थे। स्टीम इंजन का कामर्सियल प्रयोग शुरू हो चुका था। सैकड़ों-हजारों प्रकार के कपड़ों का प्रयोग हो रहा था। बड़े-बड़े समुद्री जहाजों का प्रयोग हो रहा था। लोग हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री यात्राएं करते थे। घड़ी का प्रयोग हो रहा था। परमाणु होता है ऐसी कई वैज्ञानिक सिद्धांत आ चुके थे। दूरदर्शी व सूक्ष्मदर्शी यंत्रों का प्रयोग हो रहा था। दुनिया का पहला कैमरा डिजाइन हो चुका था। पूरी दुनिया में शताब्दियों पहले से ही बड़े-बड़े महल, किले व पूजागृह खड़े हो रहे थे।
उस समय ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता यह तक नहीं जानती थी कि एक जगह पर गांव या नगर बनाकर स्थाई रूप से रहना क्या होता है। कपड़ा क्या होता है। ब्रोंज क्या होता है। लोहा क्या होता है। जबकि दुनिया हजारों वर्षों पहले ही ब्रोंज व आयरन युगों को पार कर चुकी थी। ऑस्ट्रेलिया आदिवासी पाषाण युग में ही जी रहे थे, जबकि शेष दुनिया बहुत अधिक आगे आ चुकी थी।
नगर/गांव इत्यादि नहीं थे
ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं जानते थे कि स्थाई रूप से एक ही जगह पर रहना क्या होता है, इसलिए नगर/गांव इत्यादि नहीं होते थे। जब ब्रिटिश पहुंचे तब पूरे आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या कम अधिक लगभग पांच – सात लाख थी। लिपि नहीं थी। संपत्ति नहीं थी। 700 से अधिक बोलियां थीं। मतलब यह कि हर 700 – 900 लोगों पर बोली बदल जाती थी। स्थाई कबीलाई संस्कृति भी नहीं थी क्योंकि लोग स्थाई तौर एक स्थान पर नहीं रहते थे। समूहों के मुखिया बड़े बुजुर्ग होते थे, अनुभव मायने रखता था।
भोजन व कृषि
व्यवस्थित कृषि नहीं थी। पशुपालन नहीं था। शिकार करते थे।
धातुओं का प्रयोग
पाषाण युगीन जीवन था। धातु का प्रयोग करना नहीं जानते थे।
हथियार
बिना धातु वाले लकड़ी व पत्थर के हथियार।
कला, संगीत इत्यादि
पाषाण युगीन स्टोन पेंटिंग, वाद्ययंत्र इत्यादि।
ब्रिटिशर्स का आना
1788 से ऑस्ट्रेलिया आदिवासी
ऑस्ट्रेलिया दिवस/ 26 जनवरी
ऑस्ट्रेलिया दिवस का सिर्फ मतलब यह कि 26 जनवरी 1788 को ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पहली बार 11 जहाजों व 1500 लोगों की ब्रिटिश फ्लीट का पदार्पण हुआ। वैसे यह फ्लीट ऑस्ट्रेलिया 20 जनवरी 1788 के आसपास पहुंच चुकी थी लेकिन समुद्र में तरंगो के बहुत विकराल होने व अन्य कारणों के कारण ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण 26 जनवरी 1788 को हो पाया। इसी दिन 26 जनवरी 1788 को पहली बार ब्रिटेन का झंडा ऑस्ट्रेलिया में गाड़ा गया।
ऐसा नहीं था कि ब्रिटिश लोगों ने पहले कई वर्षों या दशकों तक ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का कत्लेआम किया या उनके साथ युद्ध लड़े, फिर समूचे ऑस्ट्रेलिया पर विजय प्राप्त होने पर 26 जनवरी 1788 को विजय पताका लहराई, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया-दिवस मनाते हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया दिवस की बात की जाए तो ऑस्ट्रेलिया दिवस का ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के साथ हिंसा का नाता नहीं। यह दिवस सिर्फ यह इंगित करता है कि इस दिन पहली बार ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण किया।
26 जनवरी को ऑस्ट्रेलिया दिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाएगा और इस दिन पूरे देश में पब्लिक-हालीडे होगा। यह भी तय हुआ 1994 में, महज लगभग 24 वर्ष पूर्व वह भी लोकतांत्रिक तरीके से। ऐसा नहीं है कि सरकार का मना आया और तय कर दिया कि इसको पूरे देश में ऑस्ट्रेलिया-दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई दिवस सार्वजनिक रूप से सरकारी तौर पर नहीं मनाया जाता, जिससे यह साबित हो कि कब पूरा ऑस्ट्रेलिया कब्जाया गया या कब वहां ऑस्ट्रेलिया को गुलाम के रूप में इंग्लैंड का संविधान लागू हुआ, इत्यादि-इत्यादि। उल्टे ऑस्ट्रेलिया में प्रतिवर्ष नेशनल सॉरी डे मनाया जाता है। यह सब होना भी आज के ऑस्ट्रेलिया समाज की लोकतांत्रिक परिपक्वता व संवेदनशीलता को ही दर्शाता है।
बीमारियों से मौतें
ऑस्ट्रेलिया एक हजारों वर्षों से अछूती जमीन थी, वहां के लोग जंगलों में पाषाण युग की ही तरह रहते थे। बिना वैज्ञानिक विकास के। इसलिए प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार की कोई भी छेड़छाड़ नहीं हुई। इसका परिणाम यह रहा कि आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के शरीर में बाहरी दुनिया की बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाई। उनके शरीर दुनिया की सभ्यताओं में मनुष्यों को होने वाली बीमारियों को जानते तक नहीं थे।
ब्रिटिश जब ऐसी अछूती जगह पहुंचे तो उनके शरीरों से ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के लिए बीमारियां अपने आप हावी होती गईं। आदिवासियों की कुल हुई मौतों में से अधिकतर लगभग 95% मौतें बीमारियों से हुईं। उस समय तकनीक इतनी व्यवस्थित नहीं थी कि बिना बैकफायर हुए खड़यंत्र करके बीमारियों के कीटाणुओं को इंजेक्ट करके सामूहिक हत्याएं वह भी स्थितियों में नियंत्रण रखते हुए की जा सके। आदिवासी लोगों में नगरीय सभ्यता का विकास तक नहीं था कि उन्हें किसी घेरे में आइसोलेट करके बीमारियों के कीटाणुओं से मारा जा सके।
ब्रिटिश लेखकों की संवेदनशीलता व लेखन-ईमानदारी ही है कि वे बीमारियों से होने वाली मौतों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते थे/हैं। जबकि उस काल में ऐसा कर पाना नियंत्रित तरीके से संभव नहीं था, कि आदिवासियों को जबरदस्ती बीमारियों के कीटाणु पिला कर उनकी सामूहिक हत्याएं किया जाना संभव हो। लेकिन ब्रिटिश लेखक यह मानते थे/हैं कि यदि वे लोग नहीं आते तो बीमारियां नहीं फैलतीं और लोग नहीं मरते, इसीलिए वे कहते हैं कि हमने बीमारी फैलाकर आदिवासियों को मारा।
संघर्ष में मौतें
ब्रिटिश 1788 में ऑस्ट्रेलिया आए। पहला सामूहिक हत्याकांड 1838 में हुआ जिसमें 28 आदिवासियों की हत्याएं हुईं।1884 में 200 से अधिक आदिवासी मारे गए। ऑस्ट्रेलिया में आने के बाद आदिवासियों के साथ लगभग 200-225 वर्षों के संघर्ष में प्राइवेट हत्याओं को जोड़ते हुए आदिवासियों की लगभग 10 से 20 हजार मौतें हुईं। लगभग डेढ़ से दो शताब्दियों में इतनी हत्याएं दुनिया के इतिहास को देखते हुए तथा ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी व ब्रिटिश के लोगों के विकास व सभ्यताओं के स्तर के भयंकर अंतर को देखते हुए, नगण्य संख्या ही है। पाषाण-काल में जीने वाले ऑस्ट्रेलिया-आदिवासियों की तुलना में ब्रिटिश इतना विकसित थे कि पूरी आदिवासी सभ्यता को ही कुछ महीनों में ही चुन-चुन कर खतम कर सकते थे।
वर्तमान ऑस्ट्रेलिया व आदिवासी समाज
जिन लोगों ने वास्तव में कभी भी कहीं भी जमीन पर समाज के लिए गंभीर व बड़े स्तर पर सामाजिक काम किया है, जिन लोगों के पास मौलिक सामाजिक सोच है, जो घृणा, पूर्वाग्रह इत्यादि पर आधारित नहीं है। ऐसे लोगों ने यदि योरप, अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया देशों के समाजों को नजदीक से देखा है। तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वे इस बात से सहमत होंगे कि ऑस्ट्रेलियन्स विनम्र, अहिंसक, लोकतांत्रिक व गैर-सामंती मानसिकता के लोग हैं।
ऑस्ट्रेलियाई समाज की एक विशिष्टता और है, कि आज ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या के लगभग 65% लोग अनीश्वरवादी हैं। दुनिया में देश की जनसंख्या का प्रतिशत जो अनीश्वरवादी है, ऑस्ट्रेलिया चौथे/पांचवे स्थान पर आता है। मैं यहां चीन जैसे देशों को नहीं जोड़ रहा हूं जहां लोगों की अधिकतर इच्छा अनिच्छा स्वैच्छिक न होकर सरकार के जबरदस्ती थोपे गए नियमों के आधार पर होता है। यदि चीन के सरकारी-गुंडई के दावों को छोड़ दिया जाए तो चीन की जनसंख्या का लगभग 20% लोग ही अनीश्वरवादी हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया के उन लोगों के आकड़े न जोड़े जाएं जो लोग भारत व चीन जैसे देशों से जाकर बसे हैं तो आस्ट्रेलिया दुनिया का पहला या दूसरा ऐसा देश हो सकता है जिसकी जनसंख्या का सबसे अधिक प्रतिशत लोग अनीश्वरवादी हैं।
किसी भी हिंसक, बर्बर व क्रूर मानसिकता के लोकतांत्रिक समाज के लोग विनम्र, अहिंसक, गैर-सामंती व लोकतांत्रिक मूल्यों के लोग नहीं हो सकते हैं। बहुत बड़ी संख्या में स्वेच्छा से अनीश्वरवादी नहीं हो सकते हैं। लेख में आगे की बातों को समझने व महसूस करने के लिए यह एक मूलभूत तत्व है।
आदिवासियों का दूतावास
26 जनवरी 1972 को ऑस्ट्रेलिया दिवस की शाम को चार आदिवासी युवाओं माइकल अंडरसन, बिल्ली क्रैगी, बर्ट विलियम्स और टोनी कूरे ने ऑस्ट्रेलिया संसद के सामने एक बीच छाता लगाकर उसे आदिवासी दूतावास का नाम दे दिया। इस दूतावास को ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी व गैर-आदिवासी नागरिकों का सहयोग मिला, विभिन्न उतार चढ़ाव देखते हुए यह दूतावास 1995 में ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्वपूर्ण स्थानों के रूप में पंजीकृत हुआ।
आदिवासियों को विशिष्ट सुविधाएं
आदिवासियों की वर्तमान जनसंख्या लगभग साढ़े सात लाख है। सरकार ने बेहतरीन गुणवत्ता के लगभग दो लाख घर, डेढ़ लाख से अधिक स्विमिंग पूल, पौने दो लाख से अधिक आउटडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग डेढ़ लाख इनडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग पौने दो लाख सामुदायिक/सांस्कृतिक केंद्र तथा लगभग दो लाख अतिरिक्त सुविधाएं आदिवासी समाज के लिए उपलब्ध कराए हैं।
आदिवासियों को अनेक प्रकार के विशेष भत्ते मिलते हैं।
— आदिवासियों को आवास
आदिवासियों को आरक्षण
बेहतरीन सुविधाओं के अतिरिक्त जितना प्रतिशत आदिवासियों की संख्या है, उतना प्रतिशत उनको विभिन्न स्तरों पर आरक्षण भी प्राप्त है। चूंकि समय के साथ आदिवासियों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए आरक्षण भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते रहने के बावजूद आरक्षण का गैर-आदिवासियों द्वारा विरोध नहीं होता, उल्टे आरक्षण को सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हैं। यह सामाजिक परिपक्वता ही है कि लगभग 200 वर्ष पहले तक पूरी तरह पाषाण युग में जीने वाले लोगों के लिए मेधाविता, योग्यता इत्यादि कारण बताते हुए आरक्षण का विरोध करने की बजाय, सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हुए, आरक्षण का स्वागत करते हैं। आदिवासियों को दोयम नजरों से नहीं देखा जाता है। उनका अपमान नहीं किया जा सकता है। दबंगों द्वारा उनको चौराहों में नंगा करके पीटा नहीं जाता है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं किया जाता है। जबकि भारत में दलितों के साथ आज भी ऐसा होता है, प्रतिवर्ष ऐसी हजारों घटनाएं होती हैं।
नेशनल सॉरी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) 26 मई
बाहरी सभ्यता के ब्रिटिश लोगों के आने के कारण ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की बीमारियों के कारण लगातार मौतें हो रहीं थीं। उनकी संख्या कम होती जा रही थी। ब्रिटिश पुरुषों के संपर्क में आने के कारण आदिवासी महिलाओं से संकर-जाति के आदिवासी बच्चे भी पैदा हो रहे थे।
1906 के लगभग आस्ट्रेलिया सरकार ने यह निर्णय लिया कि जो संकर बच्चे हैं उनको उनकी आदिवासी माताओं से लेकर सरकार के संरक्षण में रखा जाए। उनको पढ़ाया लिखाया जाए, प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे आधुनिक सभ्यताओं के साथ तालमेल बना कर जी सकें। ये बच्चे 16 से 18 वर्ष की आयु तक सरकारी संरक्षण में रखे जाते थे। उसके बाद उनको उनके आदिवासी परिवार का परिचय दिया जाता था, उनको अपनी आदिवासी माता का सरनेम लगाने का अधिकार भी दिया जाता था। इन बच्चों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती थी लेकिन उनके पास अपना परिवार नहीं होता था। इस नीति के कारण लगभग 60 वर्षों में लगभग 25,000 बच्चे अपनी आदिवासी माता से अलग करके सरकारी संरक्षण में पाले गए।
लेकिन कुछ दशकों बाद सरकार को यह महसूस हुआ कि यह तरीका उचित नहीं है, अमानवीय है तथा जो भी होता आया है वह गलत है। तब सरकार ने 1967 में यह नीति बंद कर दिया। आगे चलकर सरकार ने यह स्वीकार किया कि यह आस्ट्रेलिया के लिए सबसे शर्मिदगी वाली नीति रही। ऐसा नहीं होना चाहिए था।
सरकार ने पूरे देश की ओर से आदिवासियों से क्षमायाचना करने के लिए 26 मई 1998 को पहली बार आधिकारिक तौर पर नेशनल सारी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) के रूप में मनाया, तब से प्रतिवर्ष 26 मई नेशनल सारी डे के रूप में मनाया जाता है। हजारों-लाखों लोग मार्च करते हैं।
प्रधानमंत्री ने संसद व सरकार की ओर से आधिकारक रूप से क्षमा मांगी
आस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री ने पूरे देश की ओर से आधिकारिक तौर पर आदिवासियों से 13 फरवरी 2008 को पुरानी सरकारों व संसदों की ओर से क्षमायाचना की।
यह आधुनिक ऑस्ट्रेलिया-समाज की परिपक्वता ही है कि उन्होंने समय के साथ परिष्कृत होते हुए, गलतियों को स्वीकारते हुए, एक ऐसा देश बनाया जिसमें लोग अभय के साथ बेहतर जीवन जीते हुए रहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मौका देखकर आदिवासी व गैर-आदिवासी एक दूसरे की हत्याएं कर रहे होते। जगह-जगह पुलिस व सेना के बैरियर लगे रहा करते। ऑस्ट्रेलिया एक बेहद शांतिप्रिय व लोकतांत्रिक देश नहीं होता।
हमारा भारतीय समाज
यदि हम भारतीय भी चिंतन व दस्तावेजी लेखन में ईमानदार होते तो हमारे पास भी दस्तावेज होते जिनमें लिखा होता कि हमारी जाति व्यवस्था के कारण अछूतों को ऐसी गंदी जगहों में रहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि हर साल बीमारियों से हजारों लाखों अछूत मरता रहा। यह भी लिखते कि जमीनों में अधिकार न होने, लेकिन उन्हीं जमीनों में रात दिन बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के कारण, अकाल में लाखों अछूतों की हत्याएं की जाती रहीं। लेकिन इतना ईमानदार होने के लिए जिस समझ दृष्टि व जिगर की जरूरत होती है, वह न तब थी और न ही अब उन लोगों के पास है। जो लोग अपने गिरेबां में झांकने की बजाय पूरी बेशर्मी के साथ ऑस्ट्रेलिया को 200-225 वर्ष पहले के लिए गाली देते हैं, उनके अपने ही पूर्वजों व उनके अपने ही समाज ने ऑस्ट्रेलिया की तुलना में सैकड़ों-हजारों गुना अधिक हत्याएं की हैं, वह भी अपने ही समाज के लोगों की।
जाति-व्यवस्था के द्वारा संस्थागत हत्याएं
भारतीय समाज ने लाखों शूद्रों की हत्याएं संस्थागत रूप से की हैं। यहां तक की आजादी के बाद भी प्रतिवर्ष सैकड़ों हजारों हत्याएं हमारा समाज करता आ रहा है, अब भी कर रहा है। सैकड़ों हत्याएं तो केवल अलग-अलग जाति के लड़का लड़की के प्रेम के कारण आनर किलिंग के कारण होती हैं।
बीमारियों से मौतें
यदि हम यह मानते हैं कि ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याएं बीमारियां फैला कर जानबूझकर कीं। तो यही बात हमें अपने समाज पर भी लागू करनी पड़ेगी क्योंकि हैजा, चेचक, मलेरिया जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों में से अधिकतर मौतें शूद्रों की ही होती थीं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शूद्रों की हत्याएं करने के लिए ऐसी बीमारियां फैलाई जातीं थीं। भारत में प्रतिवर्ष विभिन्न माध्यमों से लाखों शूद्रों की हत्याएं होतीं थीं।
अकाल से मौतें
भारत में पिछले लगभग 150 वर्षों में अकाल से लगभग 6 करोड़ मौतें हुईं। इनमें से अधिकतर मौतें शूद्रों की हुईं। जाति व्यवस्था के कारण सामाजिक आर्थिक ढांचा ऐसा रहा कि अकाल के कारण करोड़ों शूद्रों की मौतें हुईं।
स्त्री-भ्रूण हत्याएं
हम और हमारा समाज इतना रेसिस्ट है कि केवल लिंगभेद के कारण ही सख्त कानूनों व जागरूकता के बावजूद केवल पिछले 20 वर्षों में ही एक करोड़ से अधिक स्त्री-भ्रूण हत्याएं की हैं। मतलब यह कि हमारा समाज प्रति वर्ष उतनी स्त्रियों की हत्या उनके जन्मने के पहले ही कर देता है, जितनी लगभग ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जनसंख्या थी, जब 1788 में ब्रिटिशर्स ऑस्ट्रेलिया पहली बार पहुंचे थे। हमें ब्रिटिशर्स का रेसिज्म दीखते है लेकिन अपना रेसिज्म नहीं दीखता है, जबकि हमारा रेसिज्म बेहद अधिक घिनौना व भयानक है।
दहेज हत्याएं
हमें यह दीखता है कि संपत्ति के लिए ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की हत्याएं 200-225 वर्ष पहले कीं। हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने आजादी के बाद दहेज में संपत्ति के लिए कितनी महिलाओं की हत्याएं कीं। जितनी हत्याएं ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की कुल हत्याएं की, उस संख्या से तो तुलना ही नहीं हो सकती क्योंकि हमने केवल दहेज के चक्कर में ही ऑस्ट्रेलिया में कुल आदिवासियों की संख्या से अधिक हत्याएं की हैं।
धार्मिक-दंगों में हत्याएं
आजादी के समय, 1964 में गुजरात दंगे, 1984 में सिखों के विरुद्ध दंगे (20,000 से अधिक सिख मारे गए) 50,000 से अधिक सिख-घर जलाए गए।
माओवादियों द्वारा हत्याएं
1970 के बाद भारत में माओवादियों की जमात ने पिछले लगभग 50-60 वर्षों में अपने ही देश के हजारों लोगों व आदिवासियों की हत्याएं की हैं। इससे बहुत ही कम हत्याएं 200-225 वर्ष पहले ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की थी, वह भी तब जब ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी न तो ब्रिटिश थे न ही गोरे लोग थे। भारत में माओवादियों ने भारतीय आदिवासी समाजों की संस्कृति लगभग पूरी तरह नष्ट कर दी, उनको अपना मानसिक गुलाम बना रखा है। छोटी-छोटी बात पर प्रतिवर्ष अनेकों आदिवासियों की हत्याएं आज भी कर रहे हैं।
चीन में माओवाद/वामपंथ की हिंसा
(माओवाद के प्रति रोमांस रखने वालों के लिए)
यदि माओ द्वारा सत्ता प्राप्ति की प्रक्रिया में व सत्ता प्राप्ति के बाद करवाई जाने वाली करोड़ों हत्याओं की चर्चा न भी की जाए, तब भी चीन ने केवल 1989 में ही अपने ही देश के दसियों बीसियों हजार युवाओं को तियाननमेन चौक पर गोलियों से भून दिया। यह संख्या उन कुल हत्याओं से भी अधिक है जो ब्रिटिश ने ऑस्ट्रेलिया में 200-225 वर्ष पूर्व के समय से लगभग 150 वर्षों में कीं।
जितनी हत्याएं चीन ने 1989 में केवल तियाननमेन चौक पर कीं, उसकी तुलना ब्रिटिशर्स द्वारा की गई ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याओं से हो ही नहीं सकती, जबकि वे ऑस्ट्रेलिया में बाहर से आकर कब्जा कर रहे थे।
चलते-चलते
हमारे भारतीय समाज में सोशल मीडिया का प्रयोग करने वाले ऐसे बहुत लोग हैं, जिनके पेट भरे हैं, भारी भरकम वेतन व सुविधाएं पाते हैं। जीवन में कभी भी समाज में जाकर कोई भी ठोस व गंभीर काम/प्रयास तक नहीं किए होते हैं। ठोस व गंभीर काम/प्रयास छोड़िए दूसरों के गंभीर कामों/प्रयासों में सक्रिय भागीदारी तक नहीं किए होते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि समाज क्या है, समाज के लोग क्या हैं, इत्यादि को जानने समझने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं, कोई जीवंत अनुभव नहीं। समाज को समझने के लिए अपने अनुभव का कुछ न कुछ तो आधार होना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं तो जो कुछ भी है वह सिवाय तर्कबाजी या बतोलेबाजी के कुछ भी नहीं। बिना वस्तुनिष्ठता के तर्कों का कोई भी वास्तविक मोल नहीं, बौद्धिक विलासिता जरूर होती है।
ऐसा भी नहीं कि ये लोग जमीन पर ठोस व गंभीर काम/प्रयास नहीं करते हैं, तो गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय ही करते हों। पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहते हैं, अपने मन में पहले से अपनी पसंद नापसंद के आधार पर तय कर लेते हैं। इसके बाद गूगल में सर्च करते हैं या कुछ किताबों को सरसरी दृष्टि से पढ़ लेते हैं। फिर कुछ अपना टटपुंजिया कमेंट के रूप में कुछ शब्दों या कुछ लाइनों का एडिटर्स नोट टाइप लगाते हुए कोई लिंक उठाकर चिपका देते हैं या कभी कभार कुछ फालतू समय हुआ या आफिस में बैठे-बैठे ऊबऊ महसूस कर रहे हों तो गूगल में कहीं कुछ मनचाहा मिल गया हो तो उसका हिंदी अनुवाद करके चिपका देते हैं, दो चार शब्दों या लाइनों का अपने ज्ञान का तड़का भी लगा सकते हैं।
इसमें से कहीं भी, कुछ भी ऐसा नहीं, जिसमें समाज को जानने समझने के प्रति गंभीरता, वस्तुनिष्ठता, ईमानदारी, संवेदनशीलता इत्यादि होती हो।
करेला ऊपर से नीम चढ़ा वाली स्थिति यह होती है कि, भारतीय समाज में कोरी भावुकता सबसे अधिक प्रभावी रहती है। अधकचरी व यहां वहां से नकल उतारी जानकारी को उटपटांग तरीके से तोड़मोड़ देना ज्ञानी होना होता है। अहंकार भी इतना कि मानसिक व भावनात्मक हिंसा की हदों की सीमा ही नहीं। तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता के साथ चर्चा हो ही नहीं सकती है। जब गंभीरता है ही नहीं, तो जानने समझने का गंभीर व ईमानदार प्रयास हो ही नहीं सकता, संभव ही नहीं। सबकुछ पूर्वाग्रह व व्यक्तिगत पसंद नापसंद व रोमांटिज्म के द्वारा ही नियंत्रित होता है, इस प्रकार के चरित्र से तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करना ही व्यर्थ होता है।
यह पोस्ट पेट भरे, सुरक्षित व सुविधाओं से युक्त लग्जरियस जीवन जीने वाले उन वामपंथी व माओवादी सोच के लोगों के लिए भी है जिनके खाते में सिर्फ बतोलेबाजी के सिवाय, ईमानदार गंभीर सामाजिक सक्रियता व योगदान नहीं आते हैं। यदि किंचिंत मात्र सा भी चिंतन करने, देखने समझने, महसूस करने का ईमानदार शऊर होगा, तो उनको इस पोस्ट से कुछ सीखने समझने को मिल ही जाएगा। अन्यथा जैसा उनकी सोच व चरित्र है, वह तो है ही।
चिंतन व विश्लेषण पूर्वाग्रह, व्यक्ति पसंद नापसंद से इतर वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। ऐसा होना तभी हो पाता है जब समझने में जीवन विभिन्न स्तरों में जीवन लगाया गया हो। नहीं तो क्षुद्र चिंतन तो हजारों वर्षों से अनेक लोग करते चले आ रहे ही हैं, इतिहास पुरुषों के रूप में प्रायोजित भी होते रहते हैं, जबकि समाज उत्तरोत्तर अधिक सड़ता रहता है। हम वास्तव में कैसे हों, हमारी सोच व मानसिकता कैसी हो, हमारी समझ का स्तर क्या हो, हमारे ज्ञान का स्तर क्या हो, यह निर्णय तो हमें ही लेने होते हैं।