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  • कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

    कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं – कहानी

    Gourang

    अक्सर ऐसा ही होता है। लुढ़कते, झनझनाते पसिंजर ट्रेन जब सियालदह स्टेशन पर रुकती है, घड़ी तारीख के आखरी पड़ाव पर होने की संकेत देती है। मैंने भी आदत के जब्त में आ कलाई की घड़ी देखी। उम्मीद के अनुसार घड़ी ने रात के साढ़े ग्यारह के सुई दिखाये। बैक पैक पीठ में डाल मैं प्लैटफ़ार्म से बाहर निकलने के जुगत बनाने लगा। अजीब स्टेशन है, इस वक्त भी भीड़ बेशुमार है। लोग जगह बनाते हुए तेजी से गुजर रहे हैं। एक उम्र दराज औरत मुझसे तेज निकलकर आगे चली गई। जाते जाते बड़बड़ाई – ‘स्टेशन कोई टुरिस्ट प्लेस नहीं कि आराम से चलो, लोग समझते नहीं।’ इससे पहले कि मैं समझता यह डायलॉग किसके लिए गिफ्ट है, एक चालीस के करीब औरत ने ट्राली बैग से मुझे धक्का दिया। मैं गिरते गिरते बचा। वो बड़बड़ाई – ‘लगता है मैं स्टेशन में चलने का कोचिंग सेंटर खोल दूँ, खूब चलेगा।’ मैं अभी इस सदमें गोता खा ही रहा था कि टिकट कलेक्टर ने मुझे टोक दिया – “ए जरा टिकट दिखाईये।” 
    मैं और हड़बड़ाया। चालीस के करीब औरत ने फिर कहा – “टिकट बाबू, जरा ठीक से टाइट करियेगा, बहुत स्मार्ट बन रहा है।” 
    टिकट कलेक्टर मुझ पर और ज़ोर देकर देखा और बोला – ‘निकालो, निकालो।’ 
    मैं हकलाया फिर बोला – “मैं तो धन्य हो गया, इतने दिनों में पहली बार किसी ने टिकट देखने की मर्जी दिखाई।”
    वो बोला – “साईड में आओ।” 
    मैं उसके साथ किनारे पर आ गया। फिर मोबाइल निकालकर एम-टिकट दिखाया। वह चिढ़ गया और बोला – “टिकट है तो इतना नाटक क्यों किया?” 
    “कितना नाटक?” मैंने मजा लेते हुए कहा। 
    वह घूर कर मुझे देखा। मैंने उसकी परवाह न करते हुए बोला – “उस लड़की के पास टिकट नहीं थी, तुम गलत चुनाव कर बैठे।” फिर मैं लंबे डग भरते निकल आया। मुझे खूब अंदाजा था कि मेरे पीठ पीछे टिकट कलेक्टर के आँखों से अंगार निकल रहे होंगे।

    स्टेशन के बाहर आकर मैंने प्री पैड टैक्सी के काउंटर पर लाईन लगाई। पर कोई भी टैक्सी मौजूद नहीं थी। काउंटर बॉय बोला – “इंतजार करिए।” 
    मैंने आसमान की ओर देखा। बादलों ने तारों को छुपा लिया था। टैक्सी के न मिलने की वजह समझ आई। एक तो रात फिर बारिश के अंदेशे ने शहर को थमा दिया था। 
    कुछ सोचने के बाद मैंने मोबाइल निकाला, उबेर पर लोकेशन टाइप कर रिक्वेस्ट डाल दिया। आस पास कोई भी टैक्सी न दिखी ऐप्प में। समय कोई बीस मिनट। खैर, वही सही। मैंने कन्फ़र्म कर दिया। कोई आठ मिनट में सुमन नाम दिख गया, टैक्सी नंबर भी उभर आया। मैंने कॉल नंबर ढूंढ कॉल कर दिया। रिंग होता रहा पर उधर से उठाया नहीं। ऐसा ही होता है, शहर को अभी न्यूयार्क होने में बरसों देरी है। फिर मैंने आसमान की ओर देखा, बिजली चमकने शुरू हो गए थे। भीड़ बारिश देख स्टेशन कॉम्प्लेक्स पर ही ठहर गई थी। अभी मैं दुबारा रिंग करने ही वाला था कि बूँदा बाँदी शुरू हो गई। फिर बादल भी गरजने लगे। कुछ देर मैं ठिठका। अभी वापस स्टेशन कॉम्प्लेक्स में लौट जाऊँ कि नहीं सोच ही रहा था, ठीक तभी टैक्सी वाले ने कॉल बैक किया। क्या आश्चर्य !! यह तो पहली बार हुआ। मैंने कॉल रिसीव किया और कड़कते हुए पूछा – “कहाँ पर हैं?” इनसे कड़क व्यवहार ही काम आता है। 
    उधर से एक घरघराती सी आवाज आई – “ऐप्प आपसे दस मिनट की दूरी दिखा रहा है। उधर बारिश शुरू हो गई?” आवाज कुछ पतली सी थी। बारिश की आवाज में सुनने में तकलीफ हो रही थी। 
    मैंने रूखा सा जवाब दिया – “हाँ। मैं इधर शेड पर खड़ा हूँ।” मैं शेड की ओर बढ़ता हुआ बोला। 
    उधर से फिर आवाज आई – “दस मिनट।” और कॉल कट गई। 
    बारिश ज़ोरों से शुरू हो गई थी। इंतजार के अलावा और कुछ बचा न था। मैं मोबाइल पर मेसेज स्क्रोल करता हुआ वक्त काटने लगा। कुछ देर बाद एक टैक्सी थमने की आवाज आई। मैंने सर उठाया। नंबर वही था। किसी तरह दौड़कर बारिश में भींगते हुए मैं टैक्सी में बैठा। ड्राइवर ने कन्फ़र्म किया – “गौरांग? लोकेशन गड़िया? 
    मैं चौंककर सर उठाया। अब पतली आवाज का रहस्य खुला। वो कोई तीस साल की औरत थी। मेरा मुँह खुला रह गया। मैं बस पूछा – “आप?”
    “कोई तकलीफ?” आवाज आई। 
    मैं संभला और बोला – “नहीं।” चलिये।” अब मेरी आवाज नरम और मीठी थी। 
    मैंने बैक मिरर पर नजर डाली। वो भी मुझे ही देख रही थी। अच्छी सूरत थी। पर सूखी सी थी। शायद रात को खाया न हो, मैंने सोचा। मुझे याद आया, खाया तो मैं भी नहीं था।। मैंने गौर किया, बारिश में वो दक्षता से ड्राइव कर रही थी। मैं मुस्कुराया। वो नहीं मुस्कुराई। मुझे तकलीफ हुई। 
    मैं धीरे से बोला – “सॉरी।” 
    “किस बात का?” वो पूछी। 
    “मेरी आवाज बहुत रूखी थी। दरअसल किसी और का गुस्सा आप पर निकल आया।” मैंने संजीदगी से कहा। अब वो मुस्कुराई। तभी गाड़ी रेड सिग्नल पर खड़ी हो गई।
    “इतनी रात गए गाड़ी चलाते आपको………” 
    उसने बात बीच में ही काट दिया – “लड़की हूँ, टैक्सी ड्राइवर हूँ, मर्दाना काम है। देर रात के झमेले हैं। अच्छे बुरे पसिंजर भी मिलते हैं। ऑड लोकेशन्स भी होते हैं। सब है। पर मेरा पेशा मेरा चुना हुआ है, चैलेंज है तो है। सबको बार बार जवाब देते देते थक जाती हूँ।” मैं हड़बड़ाया। मैं फिर मुस्कुराया। मगर वो फिर नहीं मुस्कुराई। 
    सिग्नल हरा हो गया। उसने गियर बदला, ऐक्सिलेटर पर दबाव डाला। गाड़ी सड़क पर फिसलने लगी। खामोशी ने पाँव पसार दिये। 

    कुछ दूर जाते ही मुझे दूर से वह डॉमिनो का काउंटर दिख गया। मुझे पता था, यह देर रात तक खुला रहता है। मैं चिल्लाया – रोको, रोको। गाड़ी बाएँ रोको।” 
    वो हड़बड़ाते हुए कस कर ब्रेक मार गाडी साईड में खड़ी कर पूछी – “क्या हुआ?” 
    मैं डॉमिनो की ओर इशारा कर बोला – “बस एक मिनट। बहुत भूख लगी है।” वो कुछ गुस्सा, कुछ निराशा भाव लिए देखी। मगर कुछ बोली नहीं। मैंने कार का दरवाजा खोलते हुए उसे देखा, वो अपने होठों पर जीभ फिरा रही थी। 
    बारिश घट गई थी। बस कुछ बूँदा बाँदी ही चल रही थी। कोई दस मिनट में मैं लौटा। वो बहुत गुस्से में दिखी। इसके पहले कि कुछ कहती मैं उसे एक पैकेट और कोक के बोतल पकड़ाते हुये कहा – “बस दो मिनट ही लगेंगे। ये उन्होंने गर्म कर दिये हैं।” वो अब मुझे आश्चर्य से देखने लगी। 
    मैं अब पूरे अधिकार से कहा – “जल्द खा लीजिये। लड़कियों को भी लड़कों की तरह ही भूख लगती है।” उसने अब थाम लिया। उसके चेहरे की शिकन अब मिट चुकी थी। मैं अंदर बैठ खाने लगा और उसे मिरर में देखा। वो संतोष से खाने लगी, आँखें पनियाई हुई थी। वो भी सचमुच बहुत भूखी थी।

    कुछ देर बाद गाड़ी फिर चलने लगी। मैं बाहर रात के शहर को देखने लगा। अधिकतर दुकानें बंद ही थी। बत्तियों से रोशन सड़कें, बड़े बड़े होर्डिंग्स सब तेजी से गुजरने लगे। अचानक मैंने महसूस किया, वो मुझे मिरर से देख रही थी। मैंने उसे देखा। वो मुस्कुराई। मैं मुस्कुराया। फिर मैं रात के शहर को देखने लगा। कुछ देर बाद मेरा डेस्टिनेशन आ जाएगा। 

    यूँ ही सोचते सोचते ओवर ब्रीज क्रॉस हो गया। अचानक मैंने देखा वो मुझे फिर मिरर से देख रही थी। मैंने भी उसे फिर मिरर में देखा। मैं मुस्कुराया। वो झेंप कर मुस्कुराई जैसे चोरी पकड़ी गई हो। मैं भी मुस्कुराया। अब हम दोनों मुस्कुराते हुए मिरर में ही देखने लगे। वो कभी सड़क तो कभी मिरर पर देख रही थी। दोनों मुस्कुरा रहे थे।
    कुछ देर बाद अचानक गाड़ी रुक गई। मैंने मिरर में सवालिया निगाहों से देखा। वो हँसी और बोली – “कुछ सफर वाकई छोटे होते हैं।” 
    मैंने देखा, मेरा डेस्टिनेशन आ चुका था। टैक्सी से निकल उसके पैसे चुकाए। फिर उसकी आँखों में झाँक उसे कहा – “थैंक्यू।” वो भी मेरी नजरों से नजर मिलाई और सर हिलाई। 
    मैं घूमकर अपने कैंपस की ओर जाने लगा। कुछ दूर जा अचानक मुझे सुनाई दिया – “सुनिए!” 
    मैं सुन घूम खड़ा हुआ। वो पूछी – “आपकी शादी हो गई है?”
    मैं मुस्कुराया और हाँ में सर हिलाया। थोड़ी देर मुझे देखने के बाद वो भी मुस्कुराई और सर हिलाई। मैं खड़ा रहा।

    टैक्सी स्टार्ट हुई और तेजी से निकल गई।

    Gourang


    Gourang

  • मैं तुम हूँ

    मैं तुम हूँ

    Puneet Shukla

    मैं तुम्हें जानता हूँ
    मैं उसे भी जानता हूँ
    मैं सबको जानता हूँ।

    तुम उसे जानते हो
    तुम मुझे नहीं जानते
    तुम मुझे जान ही नहीं सकते।

    तुम मुझे नहीं जानते, 
    इसका मतलब यह नहीं कि तुम असमर्थ हो
    दरअसल मुझे जाना ही नहीं जा सकता।

    मुझे देखना
    तुम्हें देखना है
    तुम तुमको नहीं देख सकते।

    जो न देखा जा सके
    जो न जाना जा सके
    वह मैं हूँ।

    जहाँ शब्द मौन हो जाएँ
    जहाँ इन्द्रियाँ जवाब दे जाएँ
    वहाँ मैं हूँ।

    तुम 
    अपने तक पहुँच जाओ
    तो मुझ तक भी पहुँच जाओगे।

    मैं 
    वह सुगन्ध हूँ
    जो पुष्प के अन्तर में है।

    मैं 
    तुम 
    हूँ।

    Puneet Shukla

  • विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    विज्ञान से संस्कृति देवी और इतिहास बाबू के प्रश्न – भाग 1

    Sanjay Shramanjothe

    एक दिन पश्चिम का विज्ञान भारत घूमने आया. भारत के ज्ञानपुर में आते ही उसने भारत की “संस्कृति देवी” और भारत के “इतिहास बाबू” को कुश आसन पर पद्मासन में बैठे गहन धार्मिक (गधा) विमर्श करते हुए देखा. ये दोनों जुड़वा भाई बहन थे.

    थोड़ी देर उसने उनकी बातें सुनने की कोशिश की लेकिन संस्कृत भाषा के सूत्रों और मन्त्रों से भरी बातचीत वो समझ न सका. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने नवागंतुक को देखकर नमस्कार किया और उनका आपस में परिचय हुआ.

    विज्ञान से पूछा गया कि आप कहाँ से आये हैं आपका वर्ण कुल गोत्र और जाति क्या है?

    विज्ञान ये प्रश्न समझ नहीं सका… वर्ण जाति कुल गोत्र आदि के महान भारतीय आविष्कारों से परिचित न था।

    लेकिन संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने जिद पकड़ ली उन्होंने कहा कि “भद्रपुरुष जब तक हम वर्ण गोत्र और जाति न जान लें तब तक हमारी धमनियों में रक्त जमा रहता है, हमारा भोजन नहीं पचता हमारा मल मूत्र विसर्जन भी रुक जाता है”

    ऐसी भीषण अवस्था देखकर विज्ञान को दया आई, वो बोला “मैं पश्चिम देश से आया हूँ मेरे पिता का नाम प्रयोग और माता का नाम जिज्ञासा है. मैं असल में वर्ण संकर हूँ मेरे माता पिता के अन्य कई मित्र सहयोगी हैं जो एकसाथ रहते हैं, कौशल, साहस, सहकार, सभ्यता और खोज और आविष्कार ये सब हमारे परिवार में इकट्ठे रहते हैं, आप समझ लें मैं इन सबको माता पिता समान समझता हूँ”

    अब वर्ण संकर शब्द सुनते ही भारतीय संस्कृति और इतिहास ने नाक भौं सिकोड़ ली लेकिन ऊपर ऊपर सभ्य बने रहे, भारतीय मेजबानों को ये बात समझ न आई कि ये “प्रयोग” क्या होता है और “जिज्ञासा” क्या होती है, साहस, सहकार सभ्यता भी उनके लिए बिल्कुल नए नाम थे. फिर भी वे मूढ़ नजर नहीं आना चाहते थे इसलिए बनावटी हसी हंसते हुए बोले “अच्छा अच्छा हम इन्हें जानते हैं, खूब जानते हैं”.

    विज्ञान ने साहस बटोरते हुए मेजबानों के माता पिता का नाम पूछा तो दोनों मेजबान बोले “हमारे माता पिता दोनों एक ही हैं, न सिर्फ माता पिता बल्कि वे ही हमारे दादा दादी पितामह महापितामह इत्यादि भी हैं, वे ही हमारे अतीत हैं और वे ही हमारे भविष्य भी हैं.”

    अब विज्ञान चक्कर खाकर गिरने को हुआ. उसने पूछा ये क्या गजब की बात कर रह हैं आप ऐसा कैसे हो सकता है?

    संस्कृति देवी और इतिहास बाबू बड़ी सयानी हंसी हँसते हुए बोले “महाशय आप इस पुण्यभूमि पर नए नए आये हैं अभी तो चमत्कारों की शुरुआत भर है”. विज्ञान हाँफते हुए बोला कि ठीक है मैं सदैव नए ज्ञान को सीखने का प्रयास करता हूँ अब कृपया अपने माता पिता का नाम तो बताइये. तब संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने दोनों हाथों से अपने कान छूते हुए आँख बंद करके एक स्वर में कहा “पुराण हमारी माता है और पुराण ही हमारा पिता है, वही अतीत है वही भविष्य भी है”

    विज्ञान ने ये “पुराण” शब्द पहली बार सुना था, वो सहज जिज्ञासा करते हुए पूछने लगा कि ये उभयलिंगि प्राणी हमारे देश में नहीं होता ये प्राणी, मतलब अपने माता पिता करते क्या हैं? मेजबान बोले “ वे स्वयं कुछ नहीं करते बल्कि जो कुछ भी दूसरों का किया धरा है उसे अपने श्रीमुख से संस्कृत सुभाषित बनाकर बोल देते हैं. वे जो बोलते हैं उसी को हम वचनामृत समझकर गृहण करते हैं और उसी का चरणामृत इस पुण्यभूमि पर बांटते निकल पड़ते हैं”

    विज्ञान की उत्सुकता बढती गयी. उसने कहा कि ये तो गजब की बात है क्या आप मुझे पुराण जी से मिलवा सकते हैं? संस्कृति देवी और इतिहास बाबु बोले “हाँ-हाँ क्यों नहीं वे अभी लोटा लेकर जंगल मैदान गए हैं निपट के आ जाएँ फिर यहीं बैठकर तत्वचर्चा करते हैं”

    पांच मिनट बाद ही पुराण महाशय ढीली धोती, खडाऊ, लोटा और जनेऊ संभाले हुए और संस्कृत मन्त्र बुदबुदाते हुए चले आ रहे थे. उनके आज्ञाकारी पुत्र-पुत्री ने उनके चरण स्पर्श किये. विज्ञान ने उनसे हाथ मिलाना चाहा

    लेकिन मंत्रपाठी पुराण जी ने दूर से ही नमस्कार किया और जींस टीशर्ट पहने खड़े इस गौर वर्ण युवक को घूरने लगे. इतिहास बाबू ने परिचय दिया “ये विज्ञान महाशय हैं, पश्चिम देश से आये हैं. सौभाग्यवती जिज्ञासा देवी और चिरंजीव प्रयोग बाबु के सुपुत्र हैं यहाँ पुण्यभूमि पर आपसे तत्वचर्चा कर धर्मलाभ लेने आये हैं”

    जिज्ञासा और प्रयोग का नाम सुनकर पुराण जी भी कुछ समझ न पाए लेकिन विश्वगुरु की गर्वीली मुस्कान बिखेरते हुए बोले “अच्छा अच्छा … जिज्ञासा और प्रयोग … जानते हैं … खूब जानते हैं इन्हें … ये पहले भारत वर्ष में ही रहते थे, यहीं अपने सत्यनारायण महाराज के मंदिर के पीछे वाली गली में. हमने इन्हें अपनी गोद में खिलाया है” …

    विज्ञान बाबु ये सुनकर गदगद हो गये कि चलो परिचय का कोई तो सूत्र निकल आया, लेकिन वे इस चमत्कार को समझ न सके. वहीँ संस्कृति देवी और इतिहास बाबु ने अपने पिता के दुबारा चरण छुए और अपने चमत्कारी पिता पर गर्व से फूल बरसाए…

    क्रमशः…

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति

    Pushpraj

    भारतीय पत्रकारिता को भारतीय लोकतंत्र और भारत के लोक की रक्षा करनी है तो इस पत्रकारिता को अपने आईकॉन चुनने होंगे। भगत सिंह के लेख छापने वाले प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने भगत सिंह की शहादत के दो दिन बाद ही अपनी शहादत क्यों दी थी।क्या प्रताप के संपादक अपने एक स्तंभकार की शहादत से प्रेरित होकर दंगाईयों के सामने खड़े हो गए थे।अगर भगत सिंह ही गणेश शंकर विद्यार्थी की  शहादत के प्रेरक थे तो गणेश शंकर विद्यार्थी और भगत सिंह को अपना हीरो मानने वाले मुफस्सिल पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की शहादत को भारतीय पत्रकारिता किस तरह भुला सकती है। मैं पत्रकारिता के नियंताओं से करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूँ कि सिरसा में 21 नवंबर 2002 को हर हाल में सच कहने की जिद में शहीद हुए पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के शहादत दिवस को “पत्रकारिता प्रेरणा दिवस” के रूप में आयोजित किया जाए। शहीद छत्रपति के शहादत की 16 वीं वर्षी पर सिरसा(हरियाणा) में छत्रपति के अनुगामियों की ओर से एक स्मृति सभा जरूर आयोजित है पर भारतीय प्रेस परिषद, भारत के पत्रकार संगठन, संस्थान छत्रपति से अब तक अनजान क्यों हैं?

    अपनी शहादत के बाद 15 वर्षो बाद रामचन्द्र छत्रपति पिछले वर्ष 2017 के अगस्त माह में तब मुख्यधारा की मीडिया में चर्चे में आए थे, जब हरियाणा में देवताधारी-बलात्कारी को जेल भेजा गया था।तथाकथित देवता गुरमीत (राम-रहीम) के जेल जाने के बाद जिस तरह की हिंसा भड़काई गई और जिस तरह हिंसा को रोकने के लिए सेना की मदद ली गई, यह वाकया दुनियाँ की मीडिया में जितना चर्चित हुआ। काश, इस तथाकथित देवता को पहली बार बलात्कारी घोषित करने वाले रामचन्द्र छत्रपति की आवाज उनकी शहादत के बाद सुन ली गई होती। अंग्रेजी पत्रकारिता पर आरोप है कि अंग्रेजी पत्रकारिता अक्सर भारत की समस्याओं को अंग्रेज हुकूमत की तरह देखती है। लेकिन हम पूछते हैं कि हिंदी पत्रकारिता ने 16 वर्ष पूर्व सिरसा में शहीद हुए एक पत्रकार की शहादत को तब राष्ट्रीय महत्व क्यों नहीं प्रदान किया था।साध्वियों के साथ बलात्कार, साध्वी के भाई की हत्या,बलात्कार को उजागर करने वाले पत्रकार की हत्या,400 साधुओं को नपुंसक बनाने के सिद्ध हो चुके आरोपों के अभियुक्त राम रहीम को क्या भारतीय मीडिया अभी भी दुनियाँ का सबसे बड़ा खूनी राक्षस घोषित करने के लिए तैयार है?दुनियाँ में क्या इससे बड़े क्रूर, हवशी, राक्षस की कथा आपने सुनी है? क्या देवी-देवताओं वाले राष्ट्र में मीडिया के आकाओं के दिल में इस बलात्कारी -बाबा के प्रति कोई आस्था कायम है? भारत के नारीवादी संगठन जो मीटू अभियान में ज्यादा जोर लगा रहे हैं, वे सिरसा के इस मामले को दुनियाँ का सबसे बड़ा बलात्कार कांड घोषित करने में मुहूर्त का इंतजार क्यों कर रहे हैं?

    मैं 2003 में पहली बार मेधा पाटकर के साथ जनांदोलनों की एक राष्ट्रव्यापी यात्रा के दौरान सिरसा पहुँचा था तो प्रसिद्ध समाजशास्त्री योगेंद्र यादव जो हरियाणा में यात्रा के मगर्दर्शक थे, उन्होंने तब बताया था कि “सिरसा में हमारे मित्र रामचन्द्र छत्रपति ने इस तरह सच लिखने की जिद के साथ अपनी शहादत दी है।”मुझे तब यह जानकारी भी मिली कि तत्कालीन भारत के प्रसिद्ध संपादक प्रभाष जोशी ने रामचन्द्र छत्रपति की शहादत के बाद सिरसा की यात्रा की है और छत्रपति के कातिलों को ललकारते हुए कहा है कि “हमारी पत्रकारिता के समक्ष छोटे-छोटे हिटलर खड़े हैं, अगर हम इन हिटलरों से युद्ध नहीं रचेंगे तो हमारी यह प्यारी पत्रकारिता नष्ट हो जाएगी”।प्रभाष जोशी की चेतावनी को हमने अपनी चुनौती मान ली और हम 15 वर्षों से सिरसा को बकोध्यानम देख रहे हैं। 2004 में हिन्दुस्तान की प्रधान संपादक मृणाल पाण्डेय ने अपने अखबार के संपादकीय पृष्ठ में मेरा आलेख प्रकाशित कराया था, जिसकी हजारों प्रति तब हरियाणा में पाठकों की माँग पर अलग से भेजी गई थी। उस विशिष्ट आलेख का शीर्षक था-“रामचन्द्र छत्रपति की शहादत का मतलब पूरा सच।”संपादकीय पृष्ठ की अपनी सीमा होती है, बावजूद किसी हिंदी अख़बार ने पहली बार छत्रपति की शहादत को इस तरह प्रस्तुत किया था।मैंने 2004 में राम रहीम के सच्चा सौदा डेरा के अंदर प्रवेश करने का साहस जुटाया था। मैंने डेरा के अंदर एक-एक हिस्से को अपनी आँखों से देखने की कोशिश की थी पर देवता के गुफा के बाहर आकर मेरे कदम रूक गए थे या सिहर गए थे। देवता के मायालोक में तमाम विहंगम दृश्य, तिलिस्म, चमत्कार देखने के बावजूद मैंने गुफा द्वार से लौटकर आज से 14 वर्ष पूर्व जो डायरी लिखी थी, उसके कुछ हिस्से को रामबहादुर राय के संपादकत्व मेधा प्रथम प्रवक्ता और योगेंद्र यादव के संपादकत्व वाले सामयिक वार्ता ने प्रकाशित किया था। छत्रपति की शहादत के एक दशक पूरे होने पर संतोष भारतीय ने चौथी दुनियाँ में उस सिरसा डायरी को अक्षरशः प्रकाशित किया था, बावजूद मैं दावे के साथ कह रहा हूँ कि मेरी उस सिरसा डायरी को गंभीरता से नहीं लिया गया।शायद इस मान्यता की वजह से भी कि शहादत को पत्रकारिता का वसूल नहीं बनाना चाहिए या इस वजह से कि जिन्हें देवता मानकर राष्ट्र के प्रधानमंत्री नमन करते हों, उनके भाल पर हमारी पत्रकारिता की वजह से कोई खरोंच ना आए।

    रामचन्द्र छत्रपति खेती-किसानी से जुड़े एक मुफस्सिल पत्रकार थे। उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित कुछ राष्ट्रीय हिंदी दैनिकों के लिए जिला संवाददाता का कार्य किया था। वे संवाददाता के रूप में अपने शहर सिरसा स्थित “सच्चा सौदा डेरा” के झूठ को विशेष महत्व देना चाहते थे। राष्ट्रीय समाचार पत्रों में अपने प्राथमिक विषय को प्राथमिकता ना मिलने की वजह से उन्होंने खेती-किसानी के पसीने की ताकत से वर्ष 2000 में दैनिक समाचार पत्र”पूरा सच” की शुरूआत की थी। 30 मई 2002 को “पूरा सच” में छपा था -“धर्म के नाम पर किए जा रहे हैं,साध्वियों के जीवन बर्बाद”। इस खबर ने हरियाणा-पंजाब की वादियों में तूफान मचा दिया था। डेरा भक्तों के द्वारा हरियाणा-पंजाब के शहरों में हो रहे हिंसा के  प्रभाव में चंडीगढ़ उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पूरा सच की इस खबर के आधार पर सीबीआई जाँच का आदेश दिया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह एक अविस्मरणीय अध्याय है कि एक मुफस्सिल अखबार की खबर के आधार पर उच्च न्यायालय ने स्वतः स्फूर्त सीबीआई जाँच का आदेश दिया हो। इस घटना के बाद भी “पूरा सच” के संपादक की सुरक्षा के प्रति राज्य ने कोई सुध नहीं ली। रामचन्द्र छत्रपति को राम रहीम के द्वारा नियुक्त अपराधियों ने गोली मारी, शासन ने बेहतर ईलाज की जिम्मेवारी नहीं ली औऱ हमले के 27 दिन बाद 21 नवम्बर को छत्रपति ने अपोलो दिल्ली में दम तोड़ दिया। छत्रपति की हत्या के नामजद अभियुक्त गुरमीत राम-रहीम ने इस हत्या के विरूद्ध सीबीआई जाँच को बार-बार रोकने व प्रभावित करने की कोशिश की पर रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति के अनुरोध पर न्यायमूर्ति राजेन्द्र सच्चर  सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए तो अब सारी गवाहियों के बाद साध्वी बलात्कारों के अभियुक्त गुरमीत जल्दी ही छत्रपति की हत्या के अभियोग में 20 वर्षों की जेल या फाँसी की सजा पाने के लिए मजबूर होंगे। छत्रपति के न्याय के संघर्ष में विश्वास है कि जल्दी ही जीत हासिल हो।

    Ramchandra Chhatrapati (In Portrait) and His Son Anshul Chhatrapati

    “पूरा सच” के संस्थापक संपादक ने ढाई साल की छोटी सी अवधि में अपने अखबार को बहुत लंबी उमर दे दी। पुत्र ने संपादक पिता के बताए नक्से कदम पर अख़बार के संपादन के साथ-साथ मुकदमे की पैरवी को एकसूत्री लक्ष्य मान लिया। पूरा सच डेरा के कुकृत्यों को लगातार उजागर करता रहा। शहादत की विरासत पर खड़े अख़बार ने कभी मुड़ कर देखना जरूरी नहीं समझा। गुरू गोविंद सिंह जी का रूप धारण कर भक्तों को अमृत छकाने की खबर को भी पहली बार अंशुल छत्रपति के संपादन में पूरा सच ने ही उजागर किया। लेकिन अंशुल ने अपनी सुरक्षा के प्रति सावधानियां बरती। पूरा सच ने ही एक कामपिपासु बाबा के हवस में 400 साधुओं को नपुंसक बनाने की खबर को पहली बार उजागर किया। अंशुल ने विवेकपूर्ण सावधानी यह बरती की कि कभी दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर अपने किए से कीर्तिमान प्राप्ति करने की चेष्टा नहीं की।साध्वी बलात्कार मामला, अपने पिता की हत्या,साध्वी के भाई की हत्या सहित साधु नपुंसक मामलों में अलग-अलग सीबीआई जांच के लिए गवाही जुटाने, योग्य अधिवक्ताओं को तलाशने की जिम्मेवारी अंशुल ने अपने कंधे पर ली।जिम्मेवारियों के वजन से अंशुल का कंधा ना टूटा पर अंशुल का घर बिक गया। पूरा सच को अर्थाभाव की वजह से 4 साल पहले बंद करना पड़ा है।जो पत्रकारिता को सबसे कमजोर की आवाज मानते हैं, उनके लिए रामचन्द्र छत्रपति बेहतर आईकॉन हो सकते हैं। मैंने अपने आईकॉन से आपको परिचित कराया।यहाँ दुनियाँ की सबसे ऊँची मूर्ति तो आपको नहीं मिलेगी, दुनियाँ के सबसे बडे सेक्स स्कैंडल को उजागर करते हुए शहादत देने वाले एक संपादक की कीर्ति मिलेगी। पत्रकारिता को बदलने की लीक दिल्ली से नहीं, सिरसा से शुरू होती है। मेरे लिए सिरसा इस समय पत्रकारिता का तीर्थ हो चुका है, आईये आप भी मेरे तीर्थ को अपना तीर्थ बनाइये।

    आनंद बाजार के पत्रकार सुब्रतो बसु को 2018 का रामचन्द्र छत्रपति सम्मान

    शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के सुधि प्रशंसक पिछले 8 वर्षों से भारत में साहित्य और पत्रकारिता में जन-प्रतिबद्धता के लिए प्रतिबद्ध लेखक-पत्रकारों को रामचन्द्र छत्रपति की स्मृति में “छत्रपति सम्मान” से सम्मानित करते हैं। सिरसा के प्राध्यापक, अधिवक्ता, साहित्यकारों की पहल पर गठित “संवाद सिरसा” ने 2010 से छत्रपति के शहादत दिवस के अवसर पर सिरसा में छत्रपति की स्मृति सभा आयोजित कर छत्रपति सम्मान देने की परंपरा कायम की है। प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर 2012 में छत्रपति सम्मान से सम्मानित हुए थे। कुलदीप नैयर के साथ-साथ रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, ओम थानवी, उर्मिलेश, गुरदयाल सिंह, जगमोहन सिंह छत्रपति सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। सुब्रतो बसु को बिहार में सरिता -महेश की शहादत से पूर्व उनके सामाजिक कर्म को आनन्द बाजार में पहली बार कवरेज करने के लिए ” IFJ Award” मिल चुका है। सुब्रतो आनंद बाजार कोलकाता में स्थानीय क्षेत्रीय संपादक हैं और इन्होंने अपने अखबार में रामचन्द्र छत्रपति की शहादत से जुड़ी पृष्ठभूमि को कई किस्तों में लिखा था।

    कुलदीप नैयर को सिरसा आने से रोकने के लिए गुप्तचर एजेंसियों के द्वारा सूचना भिजवाई गई थी। कुलदीप नैयर के सम्मान प्राप्त कर दिल्ली पहुंचने के बाद डेरा भक्तों ने सिरसा में गुरुद्वारा के ग्रंथी की गाड़ी में आगजनी क़र शहर में कर्फ्यू कायम करवाया था। कुलदीप नैयर ने सिरसा में अभिभूत होकर कहा था-मैं छत्रपति को भारतीय पत्रकारिता के भीतर भगत सिंह की तरह देख रहा हूँ इसलिए कि मैंने लाहौर में भगत सिंह के शहादत स्थल पर खड़ा होकर जिस तरह महसूस किया था,उसी तरह का अहसास आज सिरसा आकर महसूस हो रहा है।

    पुष्पराज

    जनांदोलनों को लिखने वाले यायावर पत्रकार और चर्चित पुस्तक नंदीग्राम डायरी के लेखक

  • जबरन पढ़ाने की परिपाटी

    जबरन पढ़ाने की परिपाटी

    Chaitanya Nagar

    दक्षिण अफ्रीका के टॉलस्टॉय फार्म में पढ़ने वाले बच्चों में से एक बहुत ही उपद्रवी और अनुशासनहीन था| मजबूर होकर महात्मा गांधी ने एक दिन उसे छडी से मारा| बाद में उन्होंने लिखा कि उस बच्चे को मारते वक़्त वह भीतर तक काँप गए थे| उन्होंने लिखा कि उन्हें तुरंत यह अहसास हुआ कि उन्होंने बच्चे को ‘ठीक’ करने के इरादे से नहीं, बल्कि अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए मारा था| गांधी जी लिखते हैं कि वह बच्चा ही मेरा शिक्षक बन गया क्योंकि उसने मुझे सिखाया कि मैं क्रोध करता हूँ| गांधी जी के इस वक्तव्य को किसी भी विचारक की शिक्षा संबंधी गंभीरतम अंतरदृष्टियों में से शामिल किया जा सकता है| यह पूरी बात गांधी जी की जीवनी लिखने वाले फ्रेंच लेखक लुई फिशर ने बताई है। शिक्षा के क्षेत्र में टॉलस्टॉय फार्म गाँधी जी का एक प्रयोग था. सजा अक्सर अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए दी जाती है, न बच्चे को पढ़ाने या सुधारने के लिए। इसकी जड़ में स्वार्थ-केन्द्रित भावना होती है।        

    परंपरागत शिक्षा का आधार हमेशा से सजा और ईनाम रहा है| घरों में और स्कूलों में भी इसी आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती रही है| खास तौर पर बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को| लम्बे समय से विद्यार्थियों को नियंत्रित करने के लिए धमकी, जोर-जबरदस्ती, शारीरिक दंड और लालच का इस्तेमाल किया जा रहा है, बिना यह जाने और सोचे कि उसका बच्चे के कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे इन रास्तों को अपना कर हम एक अंततः एक भ्रष्ट और हिंसक समाज के निर्माण में जाने-अनजाने योगदान दे रहे हैं| जो बच्चा ईनाम के लालच में पढ़ेगा वह बड़ा होकर ईनाम के लालच में ही अपना काम भी करेगा और बुनियादी अर्थ में भ्रष्टाचार तो यही है| जो बच्चा भय के कारण पढ़ेगा उसका डर जीवन के कई क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से व्यक्त होगा। वह यह मान बैठेगा कि कुछ करने के लिए कुछ मिले. यह जरूरी है. जब वह सरकारी अधिकारी बनेगा तो वह इसी ईनाम की अपेक्षा करेगा. ‘कुछ हमें दो, अतिरिक्त कुछ, तभी हम ये काम करेंगे’। यही तो भ्रष्टाचार की मौलिक, स्थूल परिभाषा है।   

    डांटने-डपटने, सजा देने और सिखाने के बीच के फर्क को जानना जरूरी है। किसी खतरे के आने पर चीखना, डांटना, डपटना जरूरी भी है | पशु पक्षी भी खतरे में अपने बच्चों को आगाह करते हैं| बिजली के सॉकेट या आग के पास जाते इंसानी बच्चे को भी तेज आवाज़ में समझाना हिंसा नहीं है, न ही उसे वहां से जबरन हटाकर उसके रोने को बर्दाश्त करना क्रूरता है|

    बच्चे या विद्यार्थी को मार-पीट या डांट-धमका कर एक बार काबू में तो किया जा सकता है लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है| इसका दूसरा पहलू है कि अगर शिक्षक दंड न दे तो विद्यार्थी पूरी कक्षा में अव्यवस्था फैला देते हैं और पढ़ना-पढ़ाना ही मुश्किल हो जाता है| इसलिए इस समस्या को बड़ी बारीकी और धैर्य से समझना होगा|

    यह समझना आवश्यक है कि हम, शिक्षक और अभिभावक, भी बच्चे के साथ-साथ सीख सकते हैं और दोनों ही जीवन की गुत्थियाँ सुलझाते हुए आगे बढ़ सकते हैं| हम बड़े लोगों के पास कुछ ऐसा नहीं है जो बहुत ख़ास हो और उसे हमें बच्चे को सिखाने की जरूरत हो| स्कूल जाने के ठीक पहले की उम्र में जब किसी बच्चे को निहारें, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि ऐसा क्या है कि हम इसे सिखा देंगे? उसकी मासूमियत के सामने हमारा समूचा ज्ञान निरर्थक ही नहीं, खतरनाक भी है! क्या हम इस बात का विशेष ध्यान रख सकते हैं कि हमारे संस्कार, भय, आदतें और ढर्रे कहीं उस तक संप्रेषित न हो जाएँ| हमारे पास बस कुछ अधिक तकनीकी जानकारी, किसी ख़ास विषय संबंधी सूचनाएं हैं जो हमें उसे उपयुक्त तरीके से, समझदारी के साथ देते रहना चाहिए| पर ये जानकारियां हमें बच्चे से बेहतर नहीं बनातीं. शिक्षा छात्र और शिक्षक की साझा सहयात्रा है, जिसमे किसी विषय, जीविका और जीवन —सभी के बारे में साथ साथ सीखा जाना चाहिए| इस सीख की आवश्यकता शिक्षक को भी है और छात्र को भी.

    ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने के तरीकों, विद्यार्थी के मनोविज्ञान और इस क्षेत्र में किए जा रहे शोधों के बारे में अनभिज्ञ होते हैं| जीवनयापन के साधन के तौर पर वह अध्यापन को चुन लेते हैं, पर उनमें शिक्षण की कम समझ होती है और अपने काम के लिए उत्कटता का भी अभाव होता है| देश में आमतौर पर व्याप्त शिक्षा प्रणाली पर भी नजर डाली जाए तो उसमें आज भी बाबा-आदम के ज़माने के तरीके ही आजमाए जा रहें हैं| पढाई के वही पुराने तरीके हैं, रटो और परीक्षा में उगल दो| बढ़िया उगल दिया तो अच्छे अंक मिलते हैं पर कितना सीखा, कितना जाना, कितना नया करने की प्रेरणा मिली इसका महत्व नहीं होता| कहीं सूचनाओं को रटना शिक्षा है तो कहीं शिक्षक की चापलूसी, जुगाड़ और नकल सबसे बड़ी शिक्षा है| यह कोशिश नहीं की जाती कि छात्र सही अर्थ में अपनी रूचि, अपनी प्रतिभा का पता कर सके.

    तथाकथित ‘समस्या से पीड़ित’ और ‘अनुशासनहीन’ बच्चों के साथ संवाद टूट जाता है और चूँकि वे ‘सुनते ही नहीं’ इसलिए उनके साथ संवाद नहीं बन पाता| ऐसे बच्चों से कई अध्यापकों को  संवाद स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए| ऐसे बच्चों को खेल में लगाना भी उपयोगी हो सकता है| योग और ध्यान की कुछ तकनीकें भी लाभदायक हो सकती हैं| ऐसे मामलों में घर-परिवार के सदस्यों से बात करना जरुरी है| यह भी जरुरी है कि कुछ समय के लिए उन पर पढ़ाई का दवाब कम करके उनको दूसरी गतिविधियों में लगाया जाए| जो बातें अध्यापकों पर लागू होती हैं, वही अभिभावकों और माता पिता पर भी लागू होती हैं.

    ये सारे उपाय सिर्फ संकेत भर हैं| वास्तविक काम तो खुद उस अध्यापक या अभिभावक खुद ही करना होगा जिसे इन बच्चों से स्नेह है और वह जानता है कि बच्चों के इस तरह के व्यवहार का कोई गहरा कारण है और इसलिए उनको पढ़ाने का भी एक ख़ास तरीका जरूरी है| जब एक ‘स्पेशल एजुकेटर’ आक्रामक मानसिक रूप से अक्षम बच्चों को पढ़ा सकता है तो फिर अपने को शिक्षक कहने वाला इतनी आसानी से हार मान कर मारने-पीटने पर क्यों उतारू हो जाता है| शारीरिक दंड की एक स्नेहपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में कोई जगह ही नहीं होनी चाहिए| यदि शारीरिक दंड जरुरी भी लगे, तो यह उनके लिए ही होना चाहिए जो इसके हिमायती हैं!

    Chaitanya Nagar


    Chaitanya Nagar

  • ऑस्ट्रेलिया व ऑस्ट्रेलियाई-आदिवासी बनाम हमारा भारतीय समाज –Vivek Umrao Glendenning

    ऑस्ट्रेलिया व ऑस्ट्रेलियाई-आदिवासी बनाम हमारा भारतीय समाज –Vivek Umrao Glendenning

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    Headlines

    आमुख

    ब्रिटिश लोग 200-225 साल पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के प्रति रेसिस्ट थे। ऑस्ट्रेलिया उनका देश नहीं था, वहां के लोग मतलब आदिवासी उनके अपने देश या समाज के लोग नहीं थे। यहां तक कि उनकी तरह दिखने वाले तक नहीं थे, रंग भी अलग था। इन सबके बावजूद ऑस्ट्रेलिया समाज आज कहां खड़ा है। हम अपने भारतीय समाज व लोगों के गिरेबां में भी झांकें ताकि हमें यह अंदाजा हो सके कि, हम व हमारा समाज अपने ही लोगों के लिए कितना अधिक रेसिस्ट व हिंसक मानसिकता से भयंकर रूप से ग्रस्त है। वह भी तब, जब हमारा देश हमारा ही है/था, हमारा समाज हमारा ही है/था, हमारे लोग अपने ही लोग हैं/थे।

    हमारे कुंठित मन को जब ऑस्ट्रेलिया को गाली देने के लिए कुछ विशेष नहीं मिल पाता तो हम टेरना शुरू कर देते हैं कि ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की बर्बर हत्याएं कीं, ऐसा किया वैसा किया। जबकि अधिकतर होता यह है कि हम अपने पूर्वाग्रह से मनचाही कल्पना करते हुए तर्कशीलता का प्रयोग करते हुए तर्क गढ़ते हैं, गूगल करके कुछ अधकचरे तथ्य जोड़ते हैं, और अपनी मानसिक हिंसक प्रवृत्ति के द्वारा नियंत्रित हो लेते हैं।

    हम यह सब साबित कुछ यूं करते हैं, मानो दुनिया में आज से 200-225 वर्ष पहले के देश, सभ्यताएं व समाज बहुत अधिक अहिंसक, मानवता-वादी हुआ करते थे; उस समय जब सबकुछ आदर्शवादी होता था, मानवीय मूल्य चरम पर थे तब भी ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया में ऐसा किया। 

    हम यह भूल जाते हैं कि भारत में सैकड़ों राजे-रजवाड़े थे। जो छोटी-छोटी बात में आपस में युद्ध करते रहते थे। इन्हीं सब में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की हत्याएं होती थीं। जितने लोगों की हत्याएं हमारा भारतीय समाज प्रतिवर्ष करता था, उतनी तो संभवतः उस समय ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी जनसंख्या भी न होगी।

    हम यह भूल जाते हैं कि, ब्रिटिश लोगों ने लगभग 200-225 वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जितनी हत्याएं की। उससे बहुत-बहुत अधिक हत्याएं तो हम भारतीयों ने आजाद होने के बाद के वर्षों में ही खुद अपने ही समाज के दलितों व आदिवासियों की हत्याएं कर दी हैं, आजतक करते आ रहे हैं।

    हमारे दोहरेपन की हालत यह है कि अपने समाज व अपने अंदर की आज की बर्बरता के बारे में भी बात नहीं करना चाहते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में 200-225 साल पहले हुई घटनाओं को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं।

    हमारी कुंठा हमें यह भी नहीं देखने देती है कि 200-225 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया के समाज ने कितनी अधिक लोकतांत्रिक परिपक्वता हासिल की है, मानवाधिकारों की किन ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। कैसे एक बेहतर समाज का निर्माण किया है। यह सब हो पाना दोहरेपन, आदर्शों की बतोलेबाजी, मानसिक हिंसा व बर्बरता इत्यादि से संभव नहीं होता। यह सब हो पाने का सीधा अर्थ यही है कि समाज ने समय के साथ-साथ अपने आपको परिष्कृत किया है, परिपक्व किया है, सीखा है, समझा है, गलतियों को स्वीकार किया है। 

    हमारे दोहरेपन से यह भी साबित होता है कि हमारे अंदर ऑस्ट्रेलिया जैसे लगातार परिपक्व व बेहतर होते जाने वाले समाजों से कुंठा है, द्वेष है, ईर्ष्या है, जलन है। यही कारण है कि, जब कुछ नहीं मिलता तो 200-225 वर्ष पहले पहुंच कर तथ्यों को तोड़-मोड़कर अपनी कुंठा को खाद-पानी दे लेते हैं। तर्क/वितर्क देकर अपनी मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति को जी लेते हैं।

    ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में यह लेख कम से कम उन लोगों को तो लाभ पहुंचा ही सकता है, जो अंदर से मानसिक बीमार नहीं हैं, पूर्वाग्रह से भयंकर स्तर तक कुंठित नहीं हैं, देखने समझने की संभवानाएं शेष हैं। यह लेख शोधपत्र नहीं है, इसलिए यह लेख कामनसेंस के आधार पर ही पढ़ा जाए। लेख लंबा है लेकिन यदि आप पढ़ने में रूचि रखते हैं तो आपको पूरा लेख पढ़ना चाहिए। धन्यवाद।


    1788 के पूर्व ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी

    जिस समय दुनिया की सभी सभ्यताओं ने बड़े-बड़े साम्राज्य बना लिए थे। हजारों वर्षों से नगरीय सभ्यताओं में जी रहे थे। तोपों, बंदूकों का सैकड़ों वर्ष पहले प्रयोग करना शुरू कर चुके थे। स्टीम इंजन का कामर्सियल प्रयोग शुरू हो चुका था। सैकड़ों-हजारों प्रकार के कपड़ों का प्रयोग हो रहा था। बड़े-बड़े समुद्री जहाजों का प्रयोग हो रहा था। लोग हजारों किलोमीटर लंबी समुद्री यात्राएं करते थे। घड़ी का प्रयोग हो रहा था। परमाणु होता है ऐसी कई वैज्ञानिक सिद्धांत आ चुके थे। दूरदर्शी व सूक्ष्मदर्शी यंत्रों का प्रयोग हो रहा था। दुनिया का पहला कैमरा डिजाइन हो चुका था। पूरी दुनिया में शताब्दियों पहले से ही बड़े-बड़े महल, किले व पूजागृह खड़े हो रहे थे।

    उस समय ऑस्ट्रेलिया की सभ्यता यह तक नहीं जानती थी कि एक जगह पर गांव या नगर बनाकर स्थाई रूप से रहना क्या होता है। कपड़ा क्या होता है। ब्रोंज क्या होता है। लोहा क्या होता है। जबकि दुनिया हजारों वर्षों पहले ही ब्रोंज व आयरन युगों को पार कर चुकी थी। ऑस्ट्रेलिया आदिवासी पाषाण युग में ही जी रहे थे, जबकि शेष दुनिया बहुत अधिक आगे आ चुकी थी। 

    नगर/गांव इत्यादि नहीं थे

    ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं जानते थे कि स्थाई रूप से एक ही जगह पर रहना क्या होता है, इसलिए नगर/गांव इत्यादि नहीं होते थे। जब ब्रिटिश पहुंचे तब पूरे आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या कम अधिक लगभग पांच – सात लाख थी। लिपि नहीं थी। संपत्ति नहीं थी। 700 से अधिक बोलियां थीं। मतलब यह कि हर 700 – 900 लोगों पर बोली बदल जाती थी। स्थाई कबीलाई संस्कृति भी नहीं थी क्योंकि लोग स्थाई तौर एक स्थान पर नहीं रहते थे। समूहों के मुखिया बड़े बुजुर्ग होते थे, अनुभव मायने रखता था।

    भोजन व कृषि

    व्यवस्थित कृषि नहीं थी। पशुपालन नहीं था। शिकार करते थे। 

    धातुओं का प्रयोग

    पाषाण युगीन जीवन था। धातु का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

    हथियार

    बिना धातु वाले लकड़ी व पत्थर के हथियार। 

    कला, संगीत इत्यादि

    पाषाण युगीन स्टोन पेंटिंग, वाद्ययंत्र इत्यादि।


    ब्रिटिशर्स का आना
    1788 से ऑस्ट्रेलिया आदिवासी

    ऑस्ट्रेलिया दिवस/ 26 जनवरी

    ऑस्ट्रेलिया दिवस का सिर्फ मतलब यह कि 26 जनवरी 1788 को ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पहली बार 11 जहाजों व 1500 लोगों की ब्रिटिश फ्लीट का पदार्पण हुआ। वैसे यह फ्लीट ऑस्ट्रेलिया 20 जनवरी 1788 के आसपास पहुंच चुकी थी लेकिन समुद्र में तरंगो के बहुत विकराल होने व अन्य कारणों के कारण ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण 26 जनवरी 1788 को हो पाया। इसी दिन 26 जनवरी 1788 को पहली बार ब्रिटेन का झंडा ऑस्ट्रेलिया में गाड़ा गया।

    ऐसा नहीं था कि ब्रिटिश लोगों ने पहले कई वर्षों या दशकों तक ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का कत्लेआम किया या उनके साथ युद्ध लड़े, फिर समूचे ऑस्ट्रेलिया पर विजय प्राप्त होने पर 26 जनवरी 1788 को विजय पताका लहराई, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया-दिवस मनाते हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया दिवस की बात की जाए तो ऑस्ट्रेलिया दिवस का ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के साथ हिंसा का नाता नहीं। यह दिवस सिर्फ यह इंगित करता है कि इस दिन पहली बार ब्रिटिश के लोगों ने ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पदार्पण किया।

    26 जनवरी को ऑस्ट्रेलिया दिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाएगा और इस दिन पूरे देश में पब्लिक-हालीडे होगा। यह भी तय हुआ 1994 में, महज लगभग 24 वर्ष पूर्व वह भी लोकतांत्रिक तरीके से। ऐसा नहीं है कि सरकार का मना आया और तय कर दिया कि इसको पूरे देश में ऑस्ट्रेलिया-दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

    ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई दिवस सार्वजनिक रूप से सरकारी तौर पर नहीं मनाया जाता, जिससे यह साबित हो कि कब पूरा ऑस्ट्रेलिया कब्जाया गया या कब वहां ऑस्ट्रेलिया को गुलाम के रूप में इंग्लैंड का संविधान लागू हुआ, इत्यादि-इत्यादि। उल्टे ऑस्ट्रेलिया में प्रतिवर्ष नेशनल सॉरी डे मनाया जाता है। यह सब होना भी आज के ऑस्ट्रेलिया समाज की लोकतांत्रिक परिपक्वता व संवेदनशीलता को ही दर्शाता है।

    बीमारियों से मौतें

    ऑस्ट्रेलिया एक हजारों वर्षों से अछूती जमीन थी, वहां के लोग जंगलों में पाषाण युग की ही तरह रहते थे। बिना वैज्ञानिक विकास के। इसलिए प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार की कोई भी छेड़छाड़ नहीं हुई। इसका परिणाम यह रहा कि आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के शरीर में बाहरी दुनिया की बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाई। उनके शरीर दुनिया की सभ्यताओं में मनुष्यों को होने वाली बीमारियों को जानते तक नहीं थे।

    ब्रिटिश जब ऐसी अछूती जगह पहुंचे तो उनके शरीरों से ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों के लिए बीमारियां अपने आप हावी होती गईं। आदिवासियों की कुल हुई मौतों में से अधिकतर लगभग 95% मौतें बीमारियों से हुईं। उस समय तकनीक इतनी व्यवस्थित नहीं थी कि बिना बैकफायर हुए खड़यंत्र करके बीमारियों के कीटाणुओं को इंजेक्ट करके सामूहिक हत्याएं वह भी स्थितियों में नियंत्रण रखते हुए की जा सके। आदिवासी लोगों में नगरीय सभ्यता का विकास तक नहीं था कि उन्हें किसी घेरे में आइसोलेट करके बीमारियों के कीटाणुओं से मारा जा सके।

    ब्रिटिश लेखकों की संवेदनशीलता व लेखन-ईमानदारी ही है कि वे बीमारियों से होने वाली मौतों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते थे/हैं। जबकि उस काल में ऐसा कर पाना नियंत्रित तरीके से संभव नहीं था, कि आदिवासियों को जबरदस्ती बीमारियों के कीटाणु पिला कर उनकी सामूहिक हत्याएं किया जाना संभव हो।  लेकिन ब्रिटिश लेखक यह मानते थे/हैं कि यदि वे लोग नहीं आते तो बीमारियां नहीं फैलतीं और लोग नहीं मरते, इसीलिए वे कहते हैं कि हमने बीमारी फैलाकर आदिवासियों को मारा।

    संघर्ष में मौतें

    ब्रिटिश 1788 में ऑस्ट्रेलिया आए। पहला सामूहिक हत्याकांड 1838 में हुआ जिसमें 28 आदिवासियों की हत्याएं हुईं।1884 में 200 से अधिक आदिवासी मारे गए। ऑस्ट्रेलिया में आने के बाद आदिवासियों के साथ लगभग 200-225 वर्षों के संघर्ष में प्राइवेट हत्याओं को जोड़ते हुए आदिवासियों की लगभग 10 से 20 हजार मौतें हुईं। लगभग डेढ़ से दो शताब्दियों में इतनी हत्याएं दुनिया के इतिहास को देखते हुए तथा ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी व ब्रिटिश के लोगों के विकास व सभ्यताओं के स्तर के भयंकर अंतर को देखते हुए, नगण्य संख्या ही है। पाषाण-काल में जीने वाले ऑस्ट्रेलिया-आदिवासियों की तुलना में ब्रिटिश इतना विकसित थे कि पूरी आदिवासी सभ्यता को ही कुछ महीनों में ही चुन-चुन कर खतम कर सकते थे।


    वर्तमान ऑस्ट्रेलिया व आदिवासी समाज

    जिन लोगों ने वास्तव में कभी भी कहीं भी जमीन पर समाज के लिए गंभीर व बड़े स्तर पर सामाजिक काम किया है, जिन लोगों के पास मौलिक सामाजिक सोच है, जो घृणा, पूर्वाग्रह इत्यादि पर आधारित नहीं है। ऐसे लोगों ने यदि योरप, अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया देशों के समाजों को नजदीक से देखा है। तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वे इस बात से सहमत होंगे कि ऑस्ट्रेलियन्स विनम्र, अहिंसक, लोकतांत्रिक व गैर-सामंती मानसिकता के लोग हैं।

    ऑस्ट्रेलियाई समाज की एक विशिष्टता और है, कि आज ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या के लगभग 65% लोग अनीश्वरवादी हैं। दुनिया में देश की जनसंख्या का प्रतिशत जो अनीश्वरवादी है, ऑस्ट्रेलिया चौथे/पांचवे स्थान पर आता है। मैं यहां चीन जैसे देशों को नहीं जोड़ रहा हूं जहां लोगों की अधिकतर इच्छा अनिच्छा स्वैच्छिक न होकर सरकार के जबरदस्ती थोपे गए नियमों के आधार पर होता है। यदि चीन के सरकारी-गुंडई के दावों को छोड़ दिया जाए तो चीन की जनसंख्या का लगभग 20% लोग ही अनीश्वरवादी हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया के उन लोगों के आकड़े न जोड़े जाएं जो लोग भारत व चीन जैसे देशों से जाकर बसे हैं तो आस्ट्रेलिया दुनिया का पहला या दूसरा ऐसा देश हो सकता है जिसकी जनसंख्या का सबसे अधिक प्रतिशत लोग अनीश्वरवादी हैं।

    किसी भी हिंसक, बर्बर व क्रूर मानसिकता के लोकतांत्रिक समाज के लोग विनम्र, अहिंसक, गैर-सामंती व लोकतांत्रिक मूल्यों के लोग नहीं हो सकते हैं। बहुत बड़ी संख्या में स्वेच्छा से अनीश्वरवादी नहीं हो सकते हैं। लेख में आगे की बातों को समझने व महसूस करने के लिए यह एक मूलभूत तत्व है।

    आदिवासियों का दूतावास

    26 जनवरी 1972 को ऑस्ट्रेलिया दिवस की शाम को चार आदिवासी युवाओं माइकल अंडरसन, बिल्ली क्रैगी, बर्ट विलियम्स और टोनी कूरे ने ऑस्ट्रेलिया संसद के सामने एक बीच छाता लगाकर उसे आदिवासी दूतावास का नाम दे दिया। इस दूतावास को ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी व गैर-आदिवासी नागरिकों का सहयोग मिला, विभिन्न उतार चढ़ाव देखते हुए यह दूतावास 1995 में ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्वपूर्ण स्थानों के रूप में पंजीकृत हुआ।

    आदिवासी संरक्षित क्षेत्र

    ऑस्ट्रेलिया में अनेकों आदिवासी संरक्षित क्षेत्र हैं। इस आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी संस्कृति पूरे सम्मान के साथ जीवित व संरक्षित है। उनकी संस्कृति से न्यूनतम छेड़छाड़ किए हुए बेहतरीन नागरिक सुविधाएं देती है। इन क्षेत्रों में गैर-आदिवासी लोगों का प्रवेश बिना सरकार व बिना आदिवासियों की अनुमति के प्रवेश प्रतिबंधित रहता है।

    आदिवासियों को विशिष्ट सुविधाएं

    आदिवासियों की वर्तमान जनसंख्या लगभग साढ़े सात लाख है। सरकार ने बेहतरीन गुणवत्ता के लगभग दो लाख घर, डेढ़ लाख से अधिक स्विमिंग पूल, पौने दो लाख से अधिक आउटडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग डेढ़ लाख इनडोर क्रीड़ा-स्थल, लगभग पौने दो लाख सामुदायिक/सांस्कृतिक केंद्र तथा लगभग दो लाख अतिरिक्त सुविधाएं आदिवासी समाज के लिए उपलब्ध कराए हैं। 

    आदिवासियों को अनेक प्रकार के विशेष भत्ते मिलते हैं।

    — आदिवासियों को आवास

    सरकार द्वारा आदिवासियों को दिए गए घरों में से एक घर

    — आदिवासियों के लिए प्राथमिक चिकित्सा केंद्र
    — आदिवासियों के लिए शिक्षा
    — आदिवासी बच्चों के लिए स्विमिंग पूल
    आदिवासियों को आरक्षण

    बेहतरीन सुविधाओं के अतिरिक्त जितना प्रतिशत आदिवासियों की संख्या है, उतना प्रतिशत उनको विभिन्न स्तरों पर आरक्षण भी प्राप्त है। चूंकि समय के साथ आदिवासियों की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए आरक्षण भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते रहने के बावजूद आरक्षण का गैर-आदिवासियों द्वारा विरोध नहीं होता, उल्टे आरक्षण को सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हैं। यह सामाजिक परिपक्वता ही है कि लगभग 200 वर्ष पहले तक पूरी तरह पाषाण युग में जीने वाले लोगों के लिए मेधाविता, योग्यता इत्यादि कारण बताते हुए आरक्षण का विरोध करने की बजाय, सामाजिक न्याय व समता की ओर चलने का एक आवश्यक तरीका मानते हुए, आरक्षण का स्वागत करते हैं। आदिवासियों को दोयम नजरों से नहीं देखा जाता है। उनका अपमान नहीं किया जा सकता है। दबंगों द्वारा उनको चौराहों में नंगा करके पीटा नहीं जाता है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं किया जाता है। जबकि भारत में दलितों के साथ आज भी ऐसा होता है, प्रतिवर्ष ऐसी हजारों घटनाएं होती हैं।

    नेशनल सॉरी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) 26 मई

    बाहरी सभ्यता के ब्रिटिश लोगों के आने के कारण ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की बीमारियों के कारण लगातार मौतें हो रहीं थीं। उनकी संख्या कम होती जा रही थी। ब्रिटिश पुरुषों के संपर्क में आने के कारण आदिवासी महिलाओं से संकर-जाति के आदिवासी बच्चे भी पैदा हो रहे थे। 

    1906 के लगभग आस्ट्रेलिया सरकार ने यह निर्णय लिया कि जो संकर बच्चे हैं उनको उनकी आदिवासी माताओं से लेकर सरकार के संरक्षण में रखा जाए। उनको पढ़ाया लिखाया जाए, प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे आधुनिक सभ्यताओं के साथ तालमेल बना कर जी सकें। ये बच्चे 16 से 18 वर्ष की आयु तक सरकारी संरक्षण में रखे जाते थे। उसके बाद उनको उनके आदिवासी परिवार का परिचय दिया जाता था, उनको अपनी आदिवासी माता का सरनेम लगाने का अधिकार भी दिया जाता था। इन बच्चों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती थी लेकिन उनके पास अपना परिवार नहीं होता था। इस नीति के कारण लगभग 60 वर्षों में लगभग 25,000 बच्चे अपनी आदिवासी माता से अलग करके सरकारी संरक्षण में पाले गए।

    लेकिन कुछ दशकों बाद सरकार को यह महसूस हुआ कि यह तरीका उचित नहीं है, अमानवीय है तथा जो भी होता आया है वह गलत है। तब सरकार ने 1967 में यह नीति बंद कर दिया। आगे चलकर सरकार ने यह स्वीकार किया कि यह आस्ट्रेलिया के लिए सबसे शर्मिदगी वाली नीति रही। ऐसा नहीं होना चाहिए था। 

    सरकार ने पूरे देश की ओर से आदिवासियों से क्षमायाचना करने के लिए 26 मई 1998 को पहली बार आधिकारिक तौर पर नेशनल सारी डे (राष्ट्रीय क्षमा दिवस) के रूप में मनाया, तब से प्रतिवर्ष 26 मई नेशनल सारी डे के रूप में मनाया जाता है। हजारों-लाखों लोग मार्च करते हैं।

    प्रधानमंत्री ने संसद व सरकार की ओर से आधिकारक रूप से क्षमा मांगी

    आस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री ने पूरे देश की ओर से आधिकारिक तौर पर आदिवासियों से 13 फरवरी 2008 को पुरानी सरकारों व संसदों की ओर से क्षमायाचना की।

    यह आधुनिक ऑस्ट्रेलिया-समाज की परिपक्वता ही है कि उन्होंने समय के साथ परिष्कृत होते हुए, गलतियों को स्वीकारते हुए, एक ऐसा देश बनाया जिसमें लोग अभय के साथ बेहतर जीवन जीते हुए रहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो मौका देखकर आदिवासी व गैर-आदिवासी एक दूसरे की हत्याएं कर रहे होते। जगह-जगह पुलिस व सेना के बैरियर लगे रहा करते। ऑस्ट्रेलिया एक बेहद शांतिप्रिय व लोकतांत्रिक देश नहीं होता।


    हमारा भारतीय समाज

    यदि हम भारतीय भी चिंतन व दस्तावेजी लेखन में ईमानदार होते तो हमारे पास भी दस्तावेज होते जिनमें लिखा होता कि हमारी जाति व्यवस्था के कारण अछूतों को ऐसी गंदी जगहों में रहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि हर साल बीमारियों से हजारों लाखों अछूत मरता रहा। यह भी लिखते कि जमीनों में अधिकार न होने, लेकिन उन्हीं जमीनों में रात दिन बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के कारण, अकाल में लाखों अछूतों की हत्याएं की जाती रहीं। लेकिन इतना ईमानदार होने के लिए जिस समझ दृष्टि व जिगर की जरूरत होती है, वह न तब थी और न ही अब उन लोगों के पास है। जो लोग अपने गिरेबां में झांकने की बजाय पूरी बेशर्मी के साथ ऑस्ट्रेलिया को 200-225 वर्ष पहले के लिए गाली देते हैं, उनके अपने ही पूर्वजों व उनके अपने ही समाज ने ऑस्ट्रेलिया की तुलना में सैकड़ों-हजारों गुना अधिक हत्याएं की हैं, वह भी अपने ही समाज के लोगों की।

    जाति-व्यवस्था के द्वारा संस्थागत हत्याएं

    भारतीय समाज ने लाखों शूद्रों की हत्याएं संस्थागत रूप से की हैं। यहां तक की आजादी के बाद भी प्रतिवर्ष सैकड़ों हजारों हत्याएं हमारा समाज करता आ रहा है, अब भी कर रहा है। सैकड़ों हत्याएं तो केवल अलग-अलग जाति के लड़का लड़की के प्रेम के कारण आनर किलिंग के कारण होती हैं।

    बीमारियों से मौतें

    यदि हम यह मानते हैं कि ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याएं बीमारियां फैला कर जानबूझकर कीं। तो यही बात हमें अपने समाज पर भी लागू करनी पड़ेगी क्योंकि हैजा, चेचक, मलेरिया जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों में से अधिकतर मौतें शूद्रों की ही होती थीं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शूद्रों की हत्याएं करने के लिए ऐसी बीमारियां फैलाई जातीं थीं। भारत में प्रतिवर्ष विभिन्न माध्यमों से लाखों शूद्रों की हत्याएं होतीं थीं।

    अकाल से मौतें

    भारत में पिछले लगभग 150 वर्षों में अकाल से लगभग 6 करोड़ मौतें हुईं। इनमें से अधिकतर मौतें शूद्रों की हुईं। जाति व्यवस्था के कारण सामाजिक आर्थिक ढांचा ऐसा रहा कि अकाल के कारण करोड़ों शूद्रों की मौतें हुईं।  

    स्त्री-भ्रूण हत्याएं

    हम और हमारा समाज इतना रेसिस्ट है कि केवल लिंगभेद के कारण ही सख्त कानूनों व जागरूकता के बावजूद केवल पिछले 20 वर्षों में ही एक करोड़ से अधिक स्त्री-भ्रूण हत्याएं की हैं। मतलब यह कि हमारा समाज प्रति वर्ष उतनी स्त्रियों की हत्या उनके जन्मने के पहले ही कर देता है, जितनी लगभग ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की जनसंख्या थी, जब 1788 में ब्रिटिशर्स ऑस्ट्रेलिया पहली बार पहुंचे थे। हमें ब्रिटिशर्स का रेसिज्म दीखते है लेकिन अपना रेसिज्म नहीं दीखता है, जबकि हमारा रेसिज्म बेहद अधिक घिनौना व भयानक है।

    दहेज हत्याएं

    हमें यह दीखता है कि संपत्ति के लिए ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की हत्याएं 200-225 वर्ष पहले कीं। हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने आजादी के बाद दहेज में संपत्ति के लिए कितनी महिलाओं की हत्याएं कीं। जितनी हत्याएं ब्रिटिशर्स ने ऑस्ट्रेलिया-आदिवासी लोगों की कुल हत्याएं की, उस संख्या से तो तुलना ही नहीं हो सकती क्योंकि हमने केवल दहेज के चक्कर में ही ऑस्ट्रेलिया में कुल आदिवासियों की संख्या से अधिक हत्याएं की हैं।

    धार्मिक-दंगों में हत्याएं

    आजादी के समय, 1964 में गुजरात दंगे, 1984 में सिखों के विरुद्ध दंगे (20,000 से अधिक सिख मारे गए) 50,000 से अधिक सिख-घर जलाए गए।

    माओवादियों द्वारा हत्याएं

    1970 के बाद भारत में माओवादियों की जमात ने पिछले लगभग 50-60 वर्षों में अपने ही देश के हजारों लोगों व आदिवासियों की हत्याएं की हैं। इससे बहुत ही कम हत्याएं 200-225 वर्ष पहले ब्रिटिश लोगों ने ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की थी, वह भी तब जब ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी न तो ब्रिटिश थे न ही गोरे लोग थे। भारत में माओवादियों ने भारतीय आदिवासी समाजों की संस्कृति लगभग पूरी तरह नष्ट कर दी, उनको अपना मानसिक गुलाम बना रखा है। छोटी-छोटी बात पर प्रतिवर्ष अनेकों आदिवासियों की हत्याएं आज भी कर रहे हैं।


    चीन में माओवाद/वामपंथ की हिंसा
    (माओवाद के प्रति रोमांस रखने वालों के लिए)

    यदि माओ द्वारा सत्ता प्राप्ति की प्रक्रिया में व सत्ता प्राप्ति के बाद करवाई जाने वाली करोड़ों हत्याओं की चर्चा न भी की जाए, तब भी चीन ने केवल 1989 में ही अपने ही देश के दसियों बीसियों हजार युवाओं को तियाननमेन चौक पर गोलियों से भून दिया। यह संख्या उन कुल हत्याओं से भी अधिक है जो ब्रिटिश ने ऑस्ट्रेलिया में 200-225 वर्ष पूर्व के समय से लगभग 150 वर्षों में कीं।

    जितनी हत्याएं चीन ने 1989 में केवल तियाननमेन चौक पर कीं, उसकी तुलना ब्रिटिशर्स द्वारा की गई ऑस्ट्रेलिया आदिवासियों की हत्याओं से हो ही नहीं सकती, जबकि वे ऑस्ट्रेलिया में बाहर से आकर कब्जा कर रहे थे।


    चलते-चलते

    हमारे भारतीय समाज में सोशल मीडिया का प्रयोग करने वाले ऐसे बहुत लोग हैं, जिनके पेट भरे हैं, भारी भरकम वेतन व सुविधाएं पाते हैं। जीवन में कभी भी समाज में जाकर कोई भी ठोस व गंभीर काम/प्रयास तक नहीं किए होते हैं। ठोस व गंभीर काम/प्रयास छोड़िए दूसरों के गंभीर कामों/प्रयासों में सक्रिय भागीदारी तक नहीं किए होते हैं। कुल मिलाकर बात यह कि समाज क्या है, समाज के लोग क्या हैं, इत्यादि को जानने समझने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं, कोई जीवंत अनुभव नहीं। समाज को समझने के लिए अपने अनुभव का कुछ न कुछ तो आधार होना ही चाहिए। यदि ऐसा नहीं तो जो कुछ भी है वह सिवाय तर्कबाजी या बतोलेबाजी के कुछ भी नहीं। बिना वस्तुनिष्ठता के तर्कों का कोई भी वास्तविक मोल नहीं, बौद्धिक विलासिता जरूर होती है।

    ऐसा भी नहीं कि ये लोग जमीन पर ठोस व गंभीर काम/प्रयास नहीं करते हैं, तो गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय ही करते हों। पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहते हैं, अपने मन में पहले से अपनी पसंद नापसंद के आधार पर तय कर लेते हैं। इसके बाद गूगल में सर्च करते हैं या कुछ किताबों को सरसरी दृष्टि से पढ़ लेते हैं। फिर कुछ अपना टटपुंजिया कमेंट के रूप में कुछ शब्दों या कुछ लाइनों का एडिटर्स नोट टाइप लगाते हुए कोई लिंक उठाकर चिपका देते हैं या कभी कभार कुछ फालतू समय हुआ या आफिस में बैठे-बैठे ऊबऊ महसूस कर रहे हों तो गूगल में कहीं कुछ मनचाहा मिल गया हो तो उसका हिंदी अनुवाद करके चिपका देते हैं, दो चार शब्दों या लाइनों का अपने ज्ञान का तड़का भी लगा सकते हैं।

    इसमें से कहीं भी, कुछ भी ऐसा नहीं, जिसमें समाज को जानने समझने के प्रति गंभीरता, वस्तुनिष्ठता, ईमानदारी, संवेदनशीलता इत्यादि होती हो।

    करेला ऊपर से नीम चढ़ा वाली स्थिति यह होती है कि, भारतीय समाज में कोरी भावुकता सबसे अधिक प्रभावी रहती है। अधकचरी व यहां वहां से नकल उतारी जानकारी को उटपटांग तरीके से तोड़मोड़ देना ज्ञानी होना होता है। अहंकार भी इतना कि मानसिक व भावनात्मक हिंसा की हदों की सीमा ही नहीं। तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता के साथ चर्चा हो ही नहीं सकती है। जब गंभीरता है ही नहीं, तो जानने समझने का गंभीर व ईमानदार प्रयास हो ही नहीं सकता, संभव ही नहीं। सबकुछ पूर्वाग्रह व व्यक्तिगत पसंद नापसंद व रोमांटिज्म के द्वारा ही नियंत्रित होता है, इस प्रकार के चरित्र से तर्कसंगत वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करना ही व्यर्थ होता है।

    यह पोस्ट पेट भरे, सुरक्षित व सुविधाओं से युक्त लग्जरियस जीवन जीने वाले उन वामपंथी व माओवादी सोच के लोगों के लिए भी है जिनके खाते में सिर्फ बतोलेबाजी के सिवाय, ईमानदार गंभीर सामाजिक सक्रियता व योगदान नहीं आते हैं। यदि किंचिंत मात्र सा भी चिंतन करने, देखने समझने, महसूस करने का ईमानदार शऊर होगा, तो उनको इस पोस्ट से कुछ सीखने समझने को मिल ही जाएगा। अन्यथा जैसा उनकी सोच व चरित्र है, वह तो है ही।

    चिंतन व विश्लेषण पूर्वाग्रह, व्यक्ति पसंद नापसंद से इतर वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। ऐसा होना तभी हो पाता है जब समझने में जीवन विभिन्न स्तरों में जीवन लगाया गया हो। नहीं तो क्षुद्र चिंतन तो हजारों वर्षों से अनेक लोग करते चले आ रहे ही हैं, इतिहास पुरुषों के रूप में प्रायोजित भी होते रहते हैं, जबकि समाज उत्तरोत्तर अधिक सड़ता रहता है। हम वास्तव में कैसे हों, हमारी सोच व मानसिकता कैसी हो, हमारी समझ का स्तर क्या हो, हमारे ज्ञान का स्तर क्या हो, यह निर्णय तो हमें ही लेने होते हैं।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • तथाकथित ईश्वर की सरंचना – ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह –Sanjay Jothe

    तथाकथित ईश्वर की सरंचना – ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह –Sanjay Jothe

    Sanjay Shramanjothe

    भारत की सँस्कृति में ‘उर्ध्वमूल अश्वत्थ’ की धारणा है, जो कहती है कि जगत परमात्मा का पतन है, इसलिए जागतिक ज्ञान भी ईश्वरीय ज्ञान का पतन है, ईश्वरीय ज्ञान सब कुछ है.

    अब ईश्वरीय ज्ञान इतना हवा हवाई और सब्जेक्टिव है कि उसे किसी भी दिशा में किसी भी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. इतिहास बताता है कि धर्म-धूर्तों ने उसे कैसे इस्तेमाल किया है. उनके पास एक कर्मकांड या यहाँ तक कि एक मन्त्र पढ़कर भी इस ईश्वरीय ज्ञान को घोटकर पी जाने के उपाय हैं. वहीं वे धूर्त ये भी कहते हैं कि ये तो जन्मो जन्मों की साधना से मिलता है.

    जन्मों जन्मों के पुरुषार्थ के परिणाम में ये ज्ञान मिलता है तो लोग इस बात से डर जायेंगे, लेकिन उनके पास ईश्वरीय ज्ञान का क्रेश-कोर्स भी है. चार पुडिया खाकर भी आप परम स्वास्थय का लाभ ले सकते हैं. सिर्फ एक मन्त्र, एक दीक्षा एक कान फुन्कवाई या तीसरे नेत्र पर एक छूवन और आप इश्वरी ज्ञान के महल में अंदर!

    तब असल खेल शुरू होता है. अगर ईश्वरीय ज्ञान चुटकी बजाते मिल सकता है तो ‘नीच’ जागतिक ज्ञान की किसे और क्यों जरूरत है? वे ईश्वरीय ज्ञान का ढोल बजाकर लौकिक या भौतिक जगत के ज्ञान को दुत्कारते रहे हैं. ये एक भयानक पैरालिसिस है भारतीय मन का, इसने भारत मे सभ्यता के विकास को रोक रखा है.

    प्राचीन यूरोप में भी यही बीमारी थी, ज्ञान का फल चखना हव्वा और आदम का सबसे बड़ा अपराध माना गया है. लेकिन बाद में उस फल की फसल बोना, काटना और उसका अचार मुरब्बा जेली इत्यादि बनाना उन्होंने ठीक से सीख लिया और जिस इश्वर ने उन्हें अदन के बगीचे से निकाला था उसी इश्वर को उन्होंने अब अपने इंसानी बगीचे से धक्के देकर बाहर निकाल दिया है. नतीजा सामने है. अब ईश्वरीय ज्ञान के ठेकेदार जागतिक और भौतिक ज्ञान में अपने लिए समर्थन खोजते फिरते हैं.

    भारत में भी बाबाजी लोग क्वांटम फिजिक्स बखानते रहते हैं. वेद वेदान्त में घुसने से ठीक पहले क्वांटम फिजिक्स उनका अनिवार्य पड़ाव है. उन्हें पता है कि अब भौतिकशास्त्र इस स्तर पर आ गया है कि जगत और जीवन की उत्पत्ति सहित परम निर्वात पर भी बहुत ठोस जानकारी दे पा रहा है. वे इसी जानकारी का पूरा इस्तेमाल अपनी जहरीली इबारत लिखने में करते हैं. और आधुनिक विज्ञान जहां बात खत्म करता है या जिन प्रश्नों को भविष्य के लिए छोड़ देता है उन्ही प्रश्नों को आधार बनाते हुए हमारे जगतगुरु लोग भौतिक ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान से जोड़ देते हैं. पश्चिम के वैज्ञानिक ही नहीं पूरा पश्चिमी समाज इन पर हंसता है लेकिन इन्हें ज़रा शर्म नहीं आती.

    यूरोप के विपरीत भारत में इश्वर लगातार मजबूत हो रहा है. पूरब पश्चिम को एक करने की बात करने वाले अरबिंदो घोष से लेकर जोरबा दी बुद्धा की अजीब बहस चलाने वाले ओशो रजनीश और उनके बाद न जाने कहाँ कहाँ के सद्गुरु और विश्वगुरु अभी भी बहुत प्रभावशाली बने हुए हैं. इसका सीधा परिणाम भारत की शिक्षा व्यवस्था ही नहीं बल्कि शिक्षा और ज्ञान की मूलभूत अवधारणा के पतन में ही साफ़ नजर आता है.

    भारत के उपनिषद् ही नहीं बल्कि धार्मिक कानून (धर्मशास्त्र और स्मृतियाँ) ब्रह्म और ब्रह्मज्ञान की इस व्यर्थ की बहस से भरे पड़े हैं. उपनिषद् काल में एक ही ढंग का आदमी हुआ है जिसने इस पूरी परम्परा को कड़ी टक्कर दी थी.

    छान्दोग्य उपनिषद् के उद्दालक ने कार्य कारण और जीवंत प्रेक्षण के आधार पर जगत और जागतिक प्रक्रियाओं की व्याख्या का पहला वैज्ञानिक प्रयास किया था, जिसे पोंगा पुराण रचने वालों ने बर्बाद कर दिया. भारतीय दार्शनिक साहित्य में उस समय में और उसके बाद भी उद्दालक और याज्ञवल्क्य का आपसी विरोध बहुत महत्वपूर्ण है.

    उद्दालक ने हवा हवाई ज्ञान के खिलाफ कार्य कारण आधारित ज्ञान का पक्ष लिया था. लेकिन बाद के वर्षों में उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु के एक संवाद को इस तरह से रचा गया की उद्दालक के मुंह से ही ईश्वरीय ज्ञान की महिमा बुलवा ली गयी. यह कबीर के मुह से रामानन्द बुलवाने जैसी चाल है. ये कथा रची गयी की श्वेतकेतु जब गुरुकुल से घर लौटता है तो उसका पिता उद्दालक उसे ब्रह्मज्ञान सीखने को प्रेरित करता है. इस कथा को ओशो रजनीश ने बड़ी कुशलता से इस्तेमाल करते हुए हवा हवाई ब्रह्मज्ञान की महिमा को फिर से स्थापित किया है.

    यही उद्दालक, आधुनिक भारत के महान दार्शनिक देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय की नजरों में भारतीय भौतिकवाद के आदि पुरुष बन जाते हैं.और इन्ही को ओशो रजनीश जैसे पोंगा पंडित ब्रह्मज्ञानी बना डालते हैं. देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय ज्ञान के जिस फल की पूरी फसल को संरक्षित करके भारत के गरीबों में बाँट देना चाहते हैं उसे ओशो रजनीश जैसे लोग फिर से ईश्वरीय लोक के अदृश्य समन्दर में फेंक आते हैं.

    अभी भारत में शिक्षा ही नहीं बल्कि ज्ञान मात्र का जो तिरस्कार हो रहा है उसे समझना इतना आसान नहीं है. आपको ये समझने के लिए याज्ञवल्क्य जैसे ब्राह्मणवाद के पुराने चैम्पियंस को और ओशो रजनीश जैसे नये ब्राह्मणवादी चैम्पियंस को भी ठीक से समझना होगा.

    ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का ये एक सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह है. ये जहरीली नदी अगर बहती रहती है तो भारत की शिक्षा व्यवस्था याज्ञवल्क्य और ओशो रजनीश के मानस पुत्रों द्वारा बार बार बर्बाद की जायेगी. जब तक इस ईश्वरीय ज्ञान की बकवास को बंद नहीं किया जाता तब तक भारत सभ्य नहीं हो सकेगा.

    भारत की शिक्षा की दुर्दशा स्वयं में बड़ा विषय है लेकिन ये खुद भी अपने आपमें कहीं बड़ी बीमारी का लक्षण भर है.

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • गौतम बुद्ध और विपस्सना सिखाने वाले वेदांती –Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध और विपस्सना सिखाने वाले वेदांती –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    गौतम बुद्ध की परम्परा, उनके धर्म और संस्कृति को नष्ट करने के लिए बहुत गहराई से चाल चली गयी थी. पिछली सदी में डॉ. अंबेडकर सहित आज के इंडोलोजिस्ट्स भी यह बात सिद्ध कर चुके हैं कि एक धीमा और बहुत बारीक षड्यंत्र ब्राह्मणों के द्वारा फैलाया गया. श्रमण बौद्ध परम्परा जो कि इस शरीर और मन सहित इन दोनों के सम्मिलित परिणाम – व्यक्तित्व को अस्थाई मानती थी उस परम्परा में ऐसी मिलावट की गयी जो बाद में सनातन आत्मा को सही सिद्ध करने लगी.

    गौतम बुद्ध सनातन आत्मा के सिद्धांत को नकारते हैं. सनातन आत्मा असल में वेदान्त और ब्राह्मणवाद का केन्द्रीय सिद्धांत है. इसी से पुनर्जन्म और विस्तारित कर्म का सिद्धांत निकलता है. यह सिद्धांत यह बताता है कि कोई आदमी मरकर एक से दुसरे जन्म में अपने मन, व्यक्तित्व, प्रवृत्तियों इत्यादि को लेकर जाता है और दुसरे शरीर या जन्म में फिर से अपनी जीवन यात्रा शुरू करता है.

    इसके विपरीत गौतम बुद्ध सिखाते हैं कि ऐसी कोई आत्मा नहीं होती जो एक से दुसरे जन्म में अपने पूरे व्यक्तित्व और संस्कारों को लेकर जाती हो. बुद्ध तो यहाँ तक कहते हैं कि अभी इसी जिन्दगी में आप अपने शरीर और व्यक्तित्व को कई बार बदलते हैं वह शरीर और वह स्व पल पल बदलता है.

    यही बुद्ध का केन्द्रीय सिद्धांत – अनित्यता है. इस अनित्यता के सिद्धांत के अनुसार पूरी प्रकृति कम्पायमान है. भौतिक पदार्थ, चार महाभूत (धरती, जल,वायु, अग्नि) सब निरंतर कम्पायमान हैं और शरीर और मन भी निरंतर बदलता रहता है. ऐसे में हमारे सामने नजर आ रहे किसी एक व्यक्ति का कोई ठोस व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती. वह व्यक्ति कोई नयी भाषा नया व्यवहार सीखकर अपने आपको पूरी तरह बदल सकता है. अभी वह व्यक्ति सामान्य बातचीत कर रहा है और दो मिनट में वह क्रोधी और हत्यारा बन सकता है. उसका शरीर भी रोज किये जा रहे भोजन से निरंतर बदल रहा है.

    ऐसे में बदलते शरीर और बदलते मन के परिणाम में जन्मा यह स्व या यह आत्म या यह व्यक्तित्व सनातन कैसे हो सकता है?

    वेदान्त इसके विपरीत जाते हुए कहता है कि आत्मा सनातन होती है. जो कुछ पिछले जन्म में किया गया वह उस आत्मा के साथ पूरी तरह जुड़ जाता है इसीलिये पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम भुगतना होता है. इसीलिये आज जो गरीब बीमार और शोषित है उसे अपने कर्म ठीक करने चाहिए. उसने किसी पिछले जन्म में कोई पाप कर्म किया होगा इसलिए वह गरीब और दुखी है. वेदांती यह भी बताते हैं कि पूर्व जन्मों की अनंत श्रंखला में किये गए महापाप के कारण ही कोई व्यक्ति शूद्र या चांडाल बनता है और पूर्व जन्मों के दान पुण्य वृत तप इत्यादि के कारण ही कोई व्यक्ति ब्राह्मण बनता है.

    यह सिद्धांत भारत में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को बनाये रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता आया है. ऐसे सिद्धान्तकारों से पूछना चाहिए कि पिछले जन्म में पुण्यकर्म करने वाले लोग ही अगर ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य बनते रहे हैं तो उनके सैकड़ों जन्मों में किये गये दान, तप और पुण्य के बावजूद इस वर्तमान जन्म में आकर वे छुआछूत,घृणा, शोषण और दमन क्यों करने लगते हैं? उनकी अपनी सनातन आत्मा के पूर्व जन्म के सभी अच्छे संस्कार इस जन्म में अचानक निरस्त क्यों हो जा रहे हैं? उनका दान पुण्य उनका सदाचरण अचानक इस जन्म में घृणा और जातीय हत्याओं और बलात्कारों में क्यों बदल जा रहा है?

    ऐसे सवालों के जवाब आज तक कोई वेदांती बाबा नहीं दे पाया है.

    दुर्भाग्य से ऐसे वेदांती बाबा बहुत पुराने समय से ही दलितों बहुजनों और आदिवासी समाज में भी घुसकर सनातन आत्मा का सिद्धांत सिखाते रहे हैं. पहले वे अनपढ़ लोगों को कर्मकांड व्रत उपवास मान मनौती सिखाते हैं. और इन्ही में से शिक्षित हो रहे और जागरूक हो रहे लोगों को वे ध्यान समाधि साधना के जाल में फसाते आये हैं. दलित बहुजन और आदिवासी समाज के शिक्षित सम्पन्न वर्ग को अध्यात्म और ध्यान समाधी के नाम पर फिर से वाही सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखाया जा रहा है. यह बहुत पुरानी चाल है. यह आज फिर से सफल होती नजर आ रही है.

    अभी हमारे समय में भी कई बाबा और आचार्य सक्रीय हैं. आजकल कुछ लोग विपस्सना के नाम पर फिर से सनातन आत्मा का वेदांती सिद्धांत दलितों बहुजनों को सिखा रहे हैं. कई किस्म के सद्गुरु और बाबा दलितों बहुजनों के शिक्षित युवाओं को ध्यान समाधि सिखाने के लिए बुला रहे हैं और आजकल बुद्ध के नाम का और विपस्सना के नाम का भी भारी उपयोग कर रहे हैं. ऐसे विपस्सना सिखाने वाले गुरु असल में बुद्ध और डॉ अंबेडकर ज्योतिबा फूले के आन्दोलन को बहुत गहराई से कमजोर कर रहे हैं.

    आजकल के ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव सहित कुछ विपस्सना गुरु और उनके हजारों विपस्सी साधक दावा कर रहे हैं कि बुध्द पूर्व जन्म के ब्राह्मण थे। वे कह रहे हैं कि सिर्फ बुध्द ही नहीं बल्कि डॉ. अंबेडकर और आप, मैं भी कई जन्मों में ब्राह्मण रह चुके हैं। इस पूरी चर्चा में जो केंद्रीय प्रश्न उभरता है वो ये कि जब बुध्द और डॉ अंबेडकर सहित ज्योतिबा फूले और पेरियार आदि ने स्व के अस्तित्व और स्व के पुनर्जन्म को सीधे सीधे नकार दिया है तो ये विपस्सी लोग किसके समर्थन में खड़े हैं? क्या ये बुध्द, डॉ आंबेडकर और फूले के समर्थक हैं? क्या ये उनके मिशन के सहयोगी हैं?

    आज तक एक भी विपस्सी साधक ने अभी तक यह व्याख्या नही की है कि जब आत्म या स्व है ही नहीं तो उसका पुनर्जन्म कैसे होता है? इधर उधर की बात करके समय बर्बाद करते हैं। ये विशुध्द ब्राह्मणवादी तकनीक है जो बुद्ध और अंबेडकर के आंदोलन को कमजोर करने के लिए बुनी गयी है।

    डॉ आंबेडकर के अपने आंदोलन में उनके अपने लोगों के बीच वेदांती और ब्राह्मणवादी गुरुओ की शिक्षा का असर नजर आने लगा है। ये लोग बुध्द के मुंह से वेदांत बुलवा रहे हैं और डॉ आंबेडकर की स्थापनाओं का विरोध कर रहे हैं। आप लोग अपनी आंखों के सामने देख सकते हैं कि किस तरह दलित बहुजन समाज के भीतर के अंधविश्वास लोग अपने ही हाथों से अंबेडकरी आंदोलन को बर्बाद कर रहै है।

    आज बाबा साहेब अंबेडकर और भगवान बुद्ध के आन्दोलन को इन्हें “अंदरूनी” दुश्मनों से खतरा है जो विपस्सना के नाम पर सनातन आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखा रहे हैं. और सबसे बड़ी दुःख की बात ये है कि इस षड्यंत्र की कहीं कोई चर्चा ही नहीं हो रही है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • पालक, टमाटर व आलू की रसीली सब्जी –सामाजिक यायावर

    पालक, टमाटर व आलू की रसीली सब्जी –सामाजिक यायावर

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    पालक
    आलू
    टमाटर
    मिर्च
    प्याज
    लहसुन
    अदरक
    नींबू
    जीरा
    मेथी
    हींग
    आमचूर
    धनिया पाउडर
    सेंधा नमक

    विधि:

    पालक की पत्तियां तोड़ कर धो लीजिए। एक बर्तन में थोड़ा सा पानी डालकर उसमें पालक की धुली हुई पत्तियां डालकर कुछ मिनट तक उबाल लीजिए। उबली हुई पालक को सामान्य तापमान में आने के बाद पीसकर एक पात्र में रख लीजिए।

    टमाटर को भी पीस कर एक पात्र में रख लीजिए। प्याज व मिर्च को भी एक साथ पीस कर एक पात्र में रख लीजिए। लहसुन अदरक का पेस्ट बना लीजिए।आलू को छोटे टुकड़ों में काट कर एक पात्र में रख लीजिए।

    पात्र में तेल डालकर आलू के टुकड़ों को भून लीजिए, आलू के तेल में भुने हुए टुकड़ों को निकाल कर रख लीजिए।

    इसी तेल में हींग, मेथी व जीरा डालकर भूनिए, फिर इसमें लहसुन अदरक का पेस्ट डालकर भूनिए, फिर इसमें पीस कर रखी गई प्याज व मिर्च डालकर भूनिए, फिर इसमें पीस कर रखा गया टमाटर डालकर भूनिए।

    अब इसमें पीसी हुई पालक व तेल में भुनी हुई आलू डाल दीजिए। कुछ देर बाद सेंधा नमक, आमचूर व धनिया पाउडर डाल दीजिए। कुछ मिनट पकने दीजिए। अब आंच बंद करके नीबूं का रस डाल कर मिला दीजिए।

    लीजिए आपकी आलू, पालक व टमाटर की रसीली सब्जी तैयार है। खाइए व खिलाइए।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • कात्सु बहन (कात्सु होरिउची), गांधी शांति-दर्शन, काका कालेलकर व भारत

    कात्सु बहन (कात्सु होरिउची), गांधी शांति-दर्शन, काका कालेलकर व भारत

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    कात्सु होरिउची जब पहली बार भारत आईं थीं तब वे युवती थीं, अब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष है। हम भारतीय, समाज में शांति के प्रति इनके समर्पण को सम्मान देते हुए, प्रेम व सम्मान से कात्सु बहन पुकारते हैं। लगभग 30 वर्ष से भारत में रह रहीं हैं। इनका जीवन विश्व में शांति का संदेश फैलाने के लिए समर्पित है। जापान से आईं कात्सु बहन लगभग 17-18 वर्ष पहले भारत की नागरिक बन गईं थीं।

    दत्तात्रेय बालकृष्णा कालेलकर, लोकप्रिय नाम “काका कालेलकर”, कात्सु बहन के जीवन गुरुओं में से थे तथा कात्सु बहन को अपनी दत्तक पुत्री मानते थे। 

    महात्मा गांधी की इच्छा थी कि समाज में धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, संस्कृतिवाद, भाषावाद इत्यादि से ऊपर उठकर लोगों के हृदय मिलने चाहिए, हृदय से एकाकर होना चाहिए। इसके लिए संस्थानों की स्थापना होनी चाहिए। इसी जिम्मेदारी को स्वीकारते हुए काका कालेलकर ने 1955 में दिल्ली के राजघाट में  गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा (सन्निधि)  की स्थापना की।

    काका कालेलकर गुजरात विद्यापीठ के सह-संस्थापक व वाइस-चांसलर रहे। काका कालेलकर भारत के प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) के अध्यक्ष भी रहे थे।

    कात्सु बहन से मिलने का सौभाग्य मुझे 2005 में हुआ। मैं उन दिनों गांधी स्मारक निधि, राजघाट में रहता था तथा गांधी स्मारक निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, अवार्ड तथा कनाडा के कुछ विश्वविद्यालयों के द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन में सहयोग कर रहा था तथा गांधी स्मारक निधि के मंत्री के सचिव के तौर पर कार्य कर रहा था।

    उस समय कात्सु बहन की उम्र लगभग 65 वर्ष रही होगी। मैं कात्सु बहन की सहृदयता व विनम्रता से प्रभावित हुआ था, मेरा प्रयास रहता था कि यदि अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार की आयोजन समिति की बैठक शाम को नहीं है, तो भले ही कुछ मिनट के लिए ही सही कात्सु बहन के दर्शन कर लूं। कभी कभार स्वादिष्ट स्नैक्स भी खाने को मिल जाते थे। 2005 के बाद पिछले लगभग साढ़े 13 वर्षों में उनसे कभी कोई संवाद, मुलाकात या संपर्क भी नहीं हुआ। इसलिए कात्सु बहन को शायद ही मेरी याद हो, यदि मैं उनको आज भी याद हूँ तो मेरे लिए यह अत्यधिक सौभाग्य की बात है।

    गांधी शांति-दर्शन से प्रभावित कात्सु बहन हिंदी बहुत अच्छे से जानती हैं। बच्चों के लिए जापानी लोक कथा नामक पुस्तक भी हिंदी में लिखी। सन्निधि की पत्रिका का संपादन भी करतीं थीं। कात्सु बहन की विश्व शांति के लिए शांति स्तूप, इंद्रप्रस्थ, दिल्ली की स्थापना में भी सक्रिय भूमिका रही।

    गांधीवादी रमेश कुमार शर्मा भाई की फेसबुक पोस्ट देखकर कात्सु बहन से जुड़ी मेरी यादें ताजा हो गईं। रमेश भाई को बहुत बहुत धन्यवाद। फोटो में कात्सु बहन, रमेश भाई व विष्णु प्रभाकर जी के पुत्र अतुल प्रभाकर भी हैं, जिन्हें मैं अवसर मिलने पर अपना मित्र कहने का सौभाग्य प्राप्त कर लेता हूँ।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.