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  • कन्यादान टीम की ग्यारहवीं बिटोली जाएगी ससुराल

    कन्यादान टीम की ग्यारहवीं बिटोली जाएगी ससुराल

    Ashish Sagar Ashish

    2 जून,2019,बाँदा :-

    * कालिंजर की तलहटी में वाल्मीकि समुदाय के बीच प्रकृति सम्यक होगा विवाह। यूपी बुंदेलखंड के बाँदा में एक बार पुनः आगामी 15 जून को प्राकृतिक संसाधनों के बीच कन्यादान टीम अपने वार्षिक अभियान की ग्यारहवीं बिटिया का ब्याह करेगी। उल्लेखनीय है बाँदा की नरैनी तहसील के मोहनपुर खलारी प्रधान सुमनलता पटेल पत्नी अध्यापक यशवंत पटेल और उनके साथी हर वर्ष किसी एक कन्या का विवाह करते है। इस सामाजिक सरोकारी कार्यक्रम में हमेशा जातिवाद, धर्म,रंग-भेद की मिथक दीवारों को तोड़ा जाता है। प्रधान सुमनलता और उनके पति सहित सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर ने बताया कि हमने कभी बेटियों के कन्यादान में मजहब और जाति का ख्याल नहीं किया है। ऐसा किसी भी सरोकारी को करना भी नहीं चाहिए। संकल्प के मुताबिक इस वर्ष कालिंजर गांव के महादलित वाल्मीकि परिवार की बेटी रेखा पुत्री बाबू समुद्रे का की वैवाहिक रस्में गढ़ा-गंगापुरवा के किशन पुत्र कारेलाल मतेल के साथ सम्पन्न की जाएगी। सामाजिक समरसता के संदेश देने की मुहिम ऐसे आयोजन का हिस्सा होता है। बतलाते चले बीते शनिवार कन्यापक्ष के गांव जाकर कन्यादान टीम साथियों ने गंवई चौपाल में इस प्रकृति सहपूरक विवाह की मंत्रणा की। शादी को देशी गंवई अंदाज में वैकल्पिक प्राकृतिक साधनों के साथ आयोजित करने निर्णय किया गया है। पेशे से अध्यापक खुद किसान परिवार से आते है और उन्होंने अपनी भतीजी का ब्याह भी इस अभियान की कड़ी में बीते 26 जून 2018 को बैलगाड़ियों से बारात की अगवानी करके किया था। समाज मे इस ब्याह की खासी चर्चा रही थी। इसके पूर्व निषाद समाज की गरीब मैकी देवी की शादी भी गंगापुरवा में बीते 7 जून 2017 को बैलगाड़ियों से की थी।….15 जून को होने वाली रेखा परिणय किशन के ब्याह में भी पर्यावरण का ख्याल रखते हुए ग्रामीण परंपरा के अनुरूप कार्बन उत्सर्जन करने वाले साधनों को परहेज रखा जाएगा। मसलन डीजे,आतिशबाजी और फूहड़ता से दूरी बनाते हुए बारात की अगवानी में छियूल की लकड़ी से बने फूलों,बांस,कांस के मंडप के बीच बिटिया के पैर पूजे जाएंगे। साथ ही वरपक्ष के स्वागत में दोना-पत्तल की पंगत में शुद्ध ईंधन में पका भोजन परोसा जाएगा। मिट्टी के कुल्हड़ में जलपान होगा तो आम और जामुन के पत्तों से बना हाथी दरवाजा,पुराने वाद्य यंत्र से ग्रामीण महिलाओं के मंगल गीत दुहला-दुल्हन आशीर्वाद देते दिखलाई पड़ेंगे। कन्यादान टीम रेखा के परिवार के साथ विवाह की तैयारियों में जुट गई है। अयोजन कर्ता सदस्यों ने बताया कि बिना किसी चमक-दमक के गांव की जीवनशैली को सहेजने की दिशा में यह ग्याहरवीं लड़की की शादी है। वह यह आयोजन व्यक्तिगत साधनों से करते है । जिसमें समाज की दुआएं शामिल होकर आयोजन को सफल बनाती है। 

    11 जून :- 

    पंद्रह जून को होने वाले प्रकृति सम्यक विवाह के आयोजन पूर्व आज कन्यापक्ष द्वारा ‘ छुई-माटी ‘ की रश्म ( मिट्टी के बर्तन मसलन चुहला निर्माण व घर की चूना, गोबर,गंवई रंग से लिपाई-पुताई / रंग रोगन का कार्यक्रम शुरू हुआ ) सम्पन्न हो गई। इन मिट्टी के बर्तनों को मंडप के पास रखा जाता है। फ़ोटो में मिट्टी के चुहले बनाती कन्या रेखा वाल्मीकि के पारिवारिक जन, रिश्तेदार व पड़ोसीजन। आज से अलग- अलग वैवाहिक रीति रिवाजों के पड़ाव शुरू होंगे। यथा माईंन, तेल, हल्दी-उपटन,मंडप आदि महिलाओं को बुलौआ लगाकर आयोजित होते है। न्योता देने आदि का कार्य नाउन दाई करती है। वहीं वरपक्ष में भीखी,जनेऊ यदि यग्योपवीत अलग से नहीं किया तो होता है । जैसा ग्रामीण परिवेश में ब्याह के वक्त बिटिया के घर होता है। आज बिटिया रेखा के घर खलारी प्रधान पति अध्यापक यशवंत पटेल ने उपस्थिति बनाये रखी । 

    Ashish Sagar Ashish        

  • आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    आग, बचाव व बच्चों का प्रशिक्षण — Vivek Umrao Glendenning

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    ​ऑस्ट्रेलिया में आग व बचाव सेवाएं कहा जाता है, बहुत महत्वपूर्ण व सम्मानित सेवा मानी जाती है। छोटे-छोटे बच्चों के लिए वर्ष में कई बार कार्यक्रम आयोजित होते हैं। छोटे-छोटे बच्चों जिनको ढंग से चलना व बोलना तक नहीं आता, उन बच्चों को भी आग व बचाव सेवाओं के वाहनों व यंत्रों से परिचित करवाया जाता है। पूरा का पूरा अत्याधुनिक वाहन बच्चों के हवाले कर दिया जाता है, बच्चे उसमें चढ़ सकते हैं, बटनें दबा सकते हैं, स्टियरिंग से खेल सकते हैं। खुद करते हुए अपनी जिज्ञासाएं शांत कर सकते हैं। बच्चों को इस सेवा से जुड़े खिलौने उपहार के रूप में दिए जाते हैं, ताकि बच्चे घर में भी सीख समझ सकें।

    आग व बचाव सेवाओं  के लोग बहुत ही मिलनसार होते हैं, यदि आपातकाल में नहीं जा रहे हैं तो किसी बच्चे की रुचि होने पर वाहन में बैठाकर घुमाने जैसी क्रिया कोई बड़ी बात नहीं। यदि आग व बचाव सेवाओं का कोई वाहन जा रहा है, तो रास्ते में मिलते बच्चों से सेवाओं के लोगों द्वारा हाय हेलो बोलना, मुस्कुराना इत्यादि सामान्य बात है।

    आग व बचाव सेवाएं बच्चों के लिए डरावनी नहीं है, न ही बच्चों की पकड़ व पहुंच से दूर। बच्चों के साथ विश्वास व सम्मान का रिश्ता कायम होता है, जो बड़े होने तक चलता रहता है।

    ​आग व बचाव सेवाओं के कई स्तर होते हैं, छोटी से लेकर बड़ी दुर्घटना से लड़ने व बचाव के लिए। यह सेवा केवल मनुष्य तक ही सीमित नहीं है, यह सेवा पेड़-पौधों, जंगल, जानवर, पक्षी सभी प्रकार के जीव-जंतुओं की सेवा व सुरक्षा के लिए है। यह सेवा कुत्ता बिल्ली इत्यादि को भी बचाती है। यह सेवा किसानों की फसलों व किसानों के पशुओं को भी बचाती है। आग हो, बाढ़ हो, तूफान हो या अन्य मामले, यह सेवा लोगों व जीव-जंतुओं को बचाने का प्रयास करती है, ईमानदारी व प्रोफेशनल तरीके से करती है।

    ​मेरा पुत्र आदि जब एक वर्ष का था तब वह फायर ब्रिगेड के अत्याधुनिक वाहन के अंदर घुसकर सबकुछ देख चुका था। चालक की कुर्सी पर बैठकर स्टियरिंग घुमा चुका था। स्कूलों में यहां तक कि छोटे-छोटे बच्चों को भी आग, आग का प्रयोग, सावधानी व बचाव के तरीके सिखाए जाते हैं।

    मेरा पुत्र लगभग पौने तीन वर्ष का है। बिना भवन व ढांचे वाले जंगल-पहाड़ स्कूल जाता है। जंगली जीव-जंतुओं, पहाड़, जंगल, नदी-नालों में उछलते-कूदते हुए सीखता समझता है। हजारों एकड़ का जंगल है, पहाड़ है, जाहिर है जहरीले सांप, चीटियां, लिजर्ड इत्यादि भी होते हैं। इनसे डरने की बजाय इन जीवों के साथ तालमेल व उनको हानि पहुंचाए बिना स्वयं को सुरक्षित रखना सिखाया जाता है।

    आजकल इस जंगल पहाड़ स्कूल में आदि व अन्य बच्चों को आग के बारे में सिखाया जा रहा है। कितने प्रकार से आग जलाई जा सकती है। धातुओं व पत्थरों के घर्षण, माचिस व अन्य तरीकों से आग जलाना सिखाया जाता है। आग जलाते समय चोट लगने पर क्या किया जाए, सिखाया जाता है। आग कैसे बुझाई जाए, सिखाया जाता है। कहां आग जलानी है, कहां नहीं जलानी है, यह सिखाया जाता है।

    प्राकृतिक-संरक्षित जंगल में बच्चे आग की जानकारी प्राप्त करते हुए

    ​आदि धातुओं के घर्षण से आग जलाना सीखते हुए

    बच्चे छोटे हैं, वे पूरी तरह से सीख नहीं पाते हैं, न ही याद कर पाते हैं। लेकिन उनका मस्तिष्क इन जानकारियों को ​संरक्षित तो करता ही है, स्टोर की गई इन जानकारियों का प्रयोग बच्चों के कुछ बड़े होने पर मस्तिष्क बेहतर तरीके से करता है, यदि सीखने सिखाने का क्रम चलता रहा।

    ऑस्ट्रेलिया में कई प्रकार के जंगल होते हैं। एक श्रेणी प्राकृतिक संरक्षित जंगल की होती है, प्राकृतिक संरक्षित जंगलों में आग नहीं जलाई जा सकती है, जंगल में कुछ छोड़ कर आना व जंगल से कुछ लेकर आना प्रतिबंधित होता है। प्रतिबंध का मतलब यह नहीं कि प्रवेशद्वार पर पुलिस लगती है या जांच होती है। एक छोटा सा सूचनापट लगा देना ही पर्याप्त होता है।
    आदि जिस जंगल-पहाड़ स्कूल में जाते हैं, वह प्राकृतिक संरक्षित जंगल है। वहां आग नहीं जला सकते तो बच्चों को घेरा बनाकर, लकड़ी रखकर काल्पनिक आग जलाने व काल्पनिक आग से जानकारी दी गई। अब अगले चरण में उनको ऐसे पार्क में ले जाया जाएगा जहां आग जलाने की सुविधा है। वहां बच्चे असल आग जलाना व सुरक्षा/सावधानी के साथ प्रयोग करना सीखेंगे।

    मस्ती की मस्ती, सीखना का सीखना।

    कोई भी व्यवस्था रातोंरात कानून बनाने से नहीं बनती है। समाज को जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, पीढ़ी दर पीढ़ी सीखने-सिखाने का काम बिना थके, बिना ऊबे करते रहना पड़ता है। अपने आप कुछ भी नहीं होता है। यदि समाज जागरूक नहीं, यदि समाज अपनी जिम्मेदारी नहीं महसूस करता उल्टे राजनैतिक/धार्मिक/आर्थिक सत्ताओं के हाथ में छोड़ देता है तो ऐसा समाज अपनी स्वतंत्रता, विकास व परिष्करण सबकुछ सत्ताओं के हाथों में गिरवी रख कर गुलाम बन जाता है।

    यदि समाज व लोग जागरूक व जिम्मेदार हैं तो व्यवस्था की इतनी औकात हो ही नहीं सकती कि सीढ़ी छोटी पड़ जाए, बैराज के पानी निकालने वाले छेद खुले रह जाएं और समाज के बच्चे अकाल मृत्यु प्राप्त करते रहें।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • भारतीय शास्त्रीय कलाएं और सामाजिक सरोकार

    Sanjay Shramanjothe

    आपने हाल ही में भारत के कलाकारों, खिलाड़ियों अभिनेताओं और लेखकों के वक्तव्य और कृत्य देखे होंगे। उनके बचकाने राजनीतिक वक्तव्य और सामाजिक मुद्दों पर उनकी तटस्थता बहुत परेशान करती है। यह स्थिति यूं ही निर्मित नहीं हो गयी है। इसके पीछे सदियों तक लंबा काम हुआ है।

    भारतीय कलाकारों, खिलाड़ियों, गायकों नृत्यकारों के वक्तव्य बहुत निराश करते हैं। उनके वक्तव्यों में आम भारतीय मजदूर या किसान या गरीब के सामाजिक सरोकार एकदम से गायब हैं। उन्होंने कला को व्यक्तिगत मोक्ष या अलौकिक आनन्द की जिन शब्दावलियों में गूंथा है उसमें फसकर कला और कलात्मक अभव्यक्तियाँ भी इस लोक की वास्तविकताओं के लिए न सिर्फ असमर्थ हो गए हैं बल्कि उसके दुश्मन भी बन गए हैं। हालांकि अभी कुछ वर्षों से पश्चिमी प्रभाव में एक भिन्न किस्म की कला उभर रही है वह एक नई घटना है, उससे कुछ उम्मीद जाग रही है।

    भारत का उदाहरण लें तो साफ नजर आता है कि कला, भाषा, संगीत काव्य आदि सृजन के वाहक होने के साथ ही शोषक परम्पराओं और धर्म के भी वाहक बन जाते हैं। खासकर भारत मे संगीत और साहित्य ने जो दिशा पकड़ी है उसका मूल्यांकन आप समाज की सेहत के संदर्भ में करेंगे तो आपको चौंकानेवाले नतीजे मिलेंगे। 1935 के पहले तक का नख शिख वर्णन और भक्ति सहित नायिका विमर्श वाले साहित्य को दखिये और आज तक के शास्त्रीय संगीत और नर्तन को दखिये – ये सब शोषक धर्म और संस्कृति के कथानकों, मिथकों, गीतों का ही मंचन, गायन और महिमामंडन करते आये हैं।

    नृत्य की प्रमुख शास्त्रीय शैलियो को देखिये वे किसी न किसी मिथक या अवतार की लीला से आरंभ होकर उस अवतार या मिथक से जुड़े सामाजिक मनोविज्ञान को सुरक्षित रखने का काम करती आई है। अधिकांश शास्त्रीय गायक अपनी गायकी जिन काव्य प्रतीकों और छंदों में बांधते हैं वे काव्य अंश सामंती दास्यभाव की भक्ति के गुणगान से या परलोकी वैराग्य और काल्पनिक ईश्वर के महिमामंडन से भरी होती है।

    यह सब सीधे तरीके से ब्राह्मणी वेदांत और ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की वर्णाश्रमवादी सामाजिक संरचना को बनाये रखने का एक सूक्ष्म हथियार बन जाता है। एक खास किस्म का कल्पनालोक इन शास्त्रीय कलाओं से जन्म लेता है और स्वयं को हर पीढ़ी में आगे सौंपता जाता है। इसी से प्रेरणा लेकर हमारा फिल्मी और टेलीविजन का संगीत और नृत्य विकसित/पतित होता है। इस ढंग ढोल में जन्मे संगीत नृत्य खेल साहित्य आदि में समाज के वास्तविक सरोकारों को कोइ स्थान नहीं मिलता है। यही भारतीय कला की हकीकत रही है।

    हमारे साहित्य, संगीत, खेल और फ़िल्म सहित मीडिया की किसी भी विधा के चैम्पियनों को उठाकर देख लीजिए। उनकी कला न उनके हृदय में सामाजिक सरोकारों को पैदा कर पा रही है न उनसे प्रभावित लोगों में किसी सामाजिक शुभ को प्रेरित कर रही है।

    हां, ये ठीक है कि एक व्यक्तिगत अर्थ में, एक व्यक्ति की सृजन प्रेरणाओं को ऊर्जा और आकार देने में ये विधाएं ठीक ढंग से काम करती आई हैं लेकिन इसका सामाजिक या सामूहिक शुभ से कोई अनिवार्य संबन्ध नहीं बनता। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारी कलाएं और उनकी अभिव्यक्तियाँ ठोस और जमीनी सरोकारों से एक खास किस्म की तटस्थता सायास बनाकर चलती हैं।

    यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोक कलाओं और जनजातीय कलाओं में यह समस्या नहीं है। लेकिन चूंकि उनका विकास अब अवरुद्ध सा हो गया है और उनके अपने वाहक अब “सभ्य” होने लगे हैं, सो उनमे पुरानी लोक कलाओं को सहेजने या विकसित करने की प्रवृत्ति क्षीण हो रही है। एक पॉप्युलर कल्चर और उसका आभामण्डल उनपर हावी हो रहा है। अब वे भी चलताऊ किस्म के न्यूज चैनल्स की शैली में परोसीे गई कला, गीत, संगीत, मंचीय काव्य, शायरी और जगरातों कथा पंडालों से प्रभावित हो रहे हैं।

    कुल मिलाकर एक सामान्य स्थिति यह है कि अब लोक कलाओं का नाम लेने वाले समूह और समुदाय ही नहीं बल्कि व्यक्ति और संस्थाएं भी सिकुड़ रही हैं। ऐसे में फिल्म या टेलीविजन पर सवार कला ही सामान्य जनसमुदाय के लिए एक बड़ी खुराक का निर्माण करती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारा आम भारतीय कलाओं की बहुत निकृष्ट और व्यक्तिगत मोक्ष के अर्थ वाले संस्करणों से कला की प्रेरणा लेता है। यह एकांत में तनाव मुक्ति का या किसी तरह के मनोलोक में खो जाने का उपाय भर होता है। इसका समाज की सामूहिकता पर क्या प्रभाव होता है यह एक अन्य भयानक तथ्य है।

    अब कलाकारों और आम जन को लोक कला सहित लोक और लोकतंत्र से ही कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे में कला खेल संगीत नृत्य आदि लोकतंत्र के खिलाफ खड़ी हुई फासीवादी शक्तियों का गुणगान करने लगे हैं। हमारा बोलीवूड, क्रिकेट, टेलीविजन और शास्त्रीय संगीत अब अपनी सांस्कृतिक समझ और राजनीतिक रुझान की घोषणा कर रहा है।

    उदारीकरण के बाद राजनीति, धर्म और व्यापार की त्रिमूर्ति ने जिस नये और सर्वयव्यापी ईश्वर को रचा है अब उस ईश्वर के गुणगान में भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य, खेल आदि कलाएं भी दोहरी हुई जा रही है। पहले देवी देवताओं और सामंतों की स्तुति होती थी अब थोड़े बदले ढंग से बाजार और राजनेता की स्तुति हो रही है। ये स्तुति प्रत्यक्ष नजर नहीं आएगी लेकिन प्रचलित राजनीति और राजनीतिक आका जिन मिथकों और महाकाव्यों से अपने विषबुझे तीर हासिल करते हैं उन्ही प्रतीकों को अपने गायन नर्तन में जिंदा रखकर असल मे ये कलाएं और कलाकार एक खास राजनीति की ही सेवा करते आये हैं।

    आश्चर्य नहीं कि कलाकार हद दर्जे के अंधविश्वासी, कर्मकांडी, ज्योतिष वास्तु आदि के गुलाम और परलोकवादी होते हैं। इनकी संगीत और काव्य की प्रशंसा सुनें तो साफ नजर आएगा कि ये संगीत या काव्य की प्रशंसा उसके आलौकिक या समयातीत होने की उपमा देते हुए करते हैं। किसी अव्यक्त अज्ञात या अज्ञेय के नजदीक जाने के उपकरण की तरह इन्हें वह संगीत नृत्य या काव्य उपयोगी नजर आता है। ऐसे में संगीत, नृत्य और काव्य स्वयं में एक काल्पनिक ईश्वर के प्रचारतंत्र के दलाल बन जाते हैं।

    इस भूमिका के बाद आप भारतीय कलाकारों,संगीतकारों, खिलाड़ियों और कुछ हद तक साहित्यकारों के समाज विरोधी वक्तव्यों को दखिये, आप देख सकेंगे कि भारतीय कला और कलाकार असल मे प्रतिक्रांति के प्राचीन उपकरण रहे हैं जिनमे शहरी मध्यम वर्ग की असुरक्षाओ और नव उदारीकरण के कीटाणुओं ने नई धार और नया जहर भर दिया है

    Sanjay Shramanjothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • महलों का घर

    महलों का घर

    Mukesh Kumar Sinha

    देखी है मैंने
    ऊँची चहारदीवारियों के बीच 
    बड़े गेट के पीछे छिपा 
    बिन खिड़कियों का घर

    चहारदीवारी में छिपके 
    सांस थामें
    बिना हिले डुले 
    आहिस्ते से अपने टांगों पर
    टिका हुआ घर

    इंटरकॉम और
    स्क्रीन वाले फोन के साथ
    धुंधले पड़े गेट पे लगे
    डोर आईज से 
    पूरा पता लेकर 
    बताता है सन्तरी
    कोई आया है।
    फिर भी, ऐसे घरों में
    बना रहता है डर

    बिन बच्चों के खिलखिलाहट के भी
    हवाओं के सहारे झूलते झूले 
    उनींदी सी खोयी रहती है 
    किसी अनजाने के आने के उम्मीद में
    जबकि 
    शेर से दिखने वाले
    दहाड़ रहे होते हैं कुत्ते
    पर, बैठे होते हैं 
    वो कुछ खास लोग 
    घर के अंदर 
    जहाँ होता है तलघर

    बेशक इन घरों में भी 
    जीवंत होती हैं साँसे 
    पर रुक-रुक कर थमती सी लगती है 
    ये साँसे 
    ईंट गारे से नींव की शुरुआत के साथ 
    जिन्होंने पूरी उम्र काट दी फ़ुटपाथ पे रहकर
    वे मजदूर बना रहे होते हैं विशाल घर

    चंचल चमकते ख़्वाबों के साथ 
    बनता हुआ 
    विशाल महलों सा घर 
    कब पैसों की अधिकतम आवाजाही 
    और उसके बाद देख कर 
    सिसकता डर 
    मजार सा बन जाता है घर

    अपने ख्वाबों की विशाल चमक को 
    आँखों के सामने खिलते देखने की चाह लिए
    महल को मज़ार बनते देख
    एकांतवास में 
    सिसकता है अंदर का डर

    तभी तो
    ठिठकती साँसों की सरगोशी में
    परकोटों के सन्नाटों की चुभन
    जोहती हैं आमद आहट का धन
    चाहरदीवारी बनना चाहता है
    किलकारियों वाला घर।

    Mukesh Kumar Sinha

  • गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    Mukesh Kumar Sinha

    पहुंचा हूँ गाँव अपने….
    जाने कितनी भूली बिसरी सुधियों की पोटली सहेजता..
    अब ज़रा सा आगे ही रुकेगी बस 
    और, दूर दिखाई दे रहा है वो ढलान 
    चौक कहते थे सब ग्रामवासी
    कूद के बस से उतरा और निगाहें खोजने लगीं 
    वो खपरैल जिसमें चलता था 
    “चित्रगुप्त पुस्तकालय” 
    कहाँ गया वो .?

    कहाँ गयी वो लाईब्रेरी 
    जिसने हमें मानवता का पहला पाठ पढ़ाया 
    हमें मानव से इंसान बनाया था
    बचपन के ढेरों अजब-गजब पल
    खुशियां-दर्द-शोक, हार-जीत
    सहेजा था इसके खंभे की ओट से झांकते हुए
    धूम धूम धड़ाम धड़ाम 
    यादों के लश्कर दिमाग़ में अंधेरा कर गये
    फिर स्मृति की मशाल लिये लौटा वही 
    जहाँ जीया था मैंने, मेरा बचपन
    इन दिनों ‘मनरेगा’ ने बदल दी रंग रूपरेखा 
    नहीं दिखी वो अपनी पुरानी लाइब्रेरी!

    यहीं तो पढ़ी थी प्रेमचंद की गोदान
    कैसी टीस से भर गया था बालमन
    और वो, राजन इकबाल सीरीज के बाल उपन्यास 
    अहा कैसे ढल जाते थे हम भी उन पात्रों में
    यहीं चोरी से पढ़े थे इब्ने सफ़ी और 
    सुरेन्द्र मोहन पाठक के जासूसी, थ्रिलर नावेल
    फिर खुद में फीलिंग आती शरलॉक होम्स की
    की थी गांव की लड़कियों की जासूसी
    ये लोकप्रिय उपान्यास
    लुगदी साहित्य कहलाता है इन दिनों

    हाँ, एक रूमानी बात बताऊँ तो
    वहीँ सीखी, रानी को अपना बनाना
    हर दिन घंटो कैरम पर फिसलती उंगलियां
    और क्वीन मेरी हो, सबसे पहले
    इसकी होती जद्दोजहद ! 
    क्या क्या जतन करते थे उसे पाने के लिये
    क्या करेगा उस शिद्दत से कोई आज का आशिक़ 
    अपनी माशूक़ के लिये उस दर्ज़े की मशक़्कत
    वही होती थी टारगेट 
    यहीं खेल-खेल में चमकी थी
    क्वीन सी एक प्यारी सी लड़की
    फ्रॉक व लहराते बालों में

    हाँ इसके सामने हुआ करती थी
    हमारी परचून की दूकान
    जहां संतरे की गोली की मिठास…
    वो हाज़में की चटकारा देती गोलियां
    या लाल मिर्च से रंगी दाल मोठ
    सब हासिल था चवन्नी में
    दस पैसे की जीरा-मरीच 
    या अठन्नी का सरसो तेल भी बेचा
    छोटे छोटे हाथों से 
    यहीं पर जाना था भूख दर्द देती है
    और नमक की बोरी रहती थी बाहर पड़ी
    वैसे ही
    जैसे उनदिनों आंसुओं से बनता हो नमक

    स्कूल से लौट कर या जाने से पहले
    वजह बेवजह 
    जब भी *मैया* का अचरा नहीं मिला तो
    उदासियों के आंसुओं को सहेजा था 
    इसके भुसभुसे से दीवाल में 
    एक दो तीन अल्हड़ फ्रॉक वाली लड़कियों को
    निहारा भी, छिप कर यहाँ

    और बताना भूल गया
    यही है वो जगह जहां बसंत पंचमी झूमती
    वीणावादिनी की मधुर तान अलापती
    वो प्रसाद को ललचाती हमारी जिव्हायें
    क्या भूलें क्या सुनायें
    खेत-गाछी-टाल-नदी
    जाते आते लोग
    गाय-भैंस-बकरियां सूअर की संवेदनाएं भी
    देखते हुए वहीँ घंटों बतियाते अपने से
    कितनी हलचल… कैसा कोलाहल
    तितली के पीछे भागते, जुगनू पकड़ते
    तब किसे पता था क्या होती है हमिंग बर्ड

    नम आँखों से बस् सोच रहे
    जाने कहाँ खो गया बचपन हमारा
    खुश्क है दम
    आँख है नम.
    काश.!!!
    लौट आये
    बचपन की
    वो बयार पुरनम……।

    आखिर इसी पुस्तकालय ने कहा था कभी
    तू सच में बच्चा है !
    सोचता हूँ, फिर ढूंढूं वहीँ बचपन !
    एक प्रतिध्वनि कौंधी कहीं अंदर
    कि
    क्या सच्ची स्मृतियां कविता नहीं हो सकती !

    Mukesh Kumar Sinha

  • महलों सा घर

    महलों सा घर

    Mukesh Kumar Sinha

    देखी है मैंने
    ऊँची चहारदीवारियों के बीच 
    बड़े गेट के पीछे छिपा 
    बिन खिड़कियों का घर

    चहारदीवारी में छिपके 
    सांस थामें
    बिना हिले डुले 
    आहिस्ते से अपने टांगों पर
    टिका हुआ घर

    इंटरकॉम और
    स्क्रीन वाले फोन के साथ
    धुंधले पड़े गेट पे लगे
    डोर आईज से 
    पूरा पता लेकर 
    बताता है सन्तरी
    कोई आया है।
    फिर भी, ऐसे घरों में
    बना रहता है डर

    बिन बच्चों के खिलखिलाहट के भी
    हवाओं के सहारे झूलते झूले 
    उनींदी सी खोयी रहती है 
    किसी अनजाने के आने के उम्मीद में
    जबकि 
    शेर से दिखने वाले
    दहाड़ रहे होते हैं कुत्ते
    पर, बैठे होते हैं 
    वो कुछ खास लोग 
    घर के अंदर 
    जहाँ होता है तलघर

    बेशक इन घरों में भी 
    जीवंत होती हैं साँसे 
    पर रुक-रुक कर थमती सी लगती है 
    ये साँसे 
    ईंट गारे से नींव की शुरुआत के साथ 
    जिन्होंने पूरी उम्र काट दी फ़ुटपाथ पे रहकर
    वे मजदूर बना रहे होते हैं विशाल घर

    चंचल चमकते ख़्वाबों के साथ 
    बनता हुआ 
    विशाल महलों सा घर 
    कब पैसों की अधिकतम आवाजाही 
    और उसके बाद देख कर 
    सिसकता डर 
    मजार सा बन जाता है घर

    अपने ख्वाबों की विशाल चमक को 
    आँखों के सामने खिलते देखने की चाह लिए
    महल को मज़ार बनते देख
    एकांतवास में 
    सिसकता है अंदर का डर

    तभी तो
    ठिठकती साँसों की सरगोशी में
    परकोटों के सन्नाटों की चुभन
    जोहती हैं आमद आहट का धन
    चाहरदीवारी बनना चाहता है
    किलकारियों वाला घर।

    Mukesh Kumar Sinha

  • संयुक्त राष्ट्र संघ, चाइना की स्थाई सदस्यता/वीटो-पावर व पं० नेहरू

    संयुक्त राष्ट्र संघ, चाइना की स्थाई सदस्यता/वीटो-पावर व पं० नेहरू

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    ​कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई। पांच स्थाई सदस्य थे – अमेरिका, रूस, फ्रांस, इंग्लैंड व रिपब्लिक ऑफ चाइना। अमेरिका व इंग्लैंड इत्यादि ने द्वितीय विश्व युद्ध में चाइना के सक्रिय सहयोग को ध्यान में रखते हुए रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य बनवाया। चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से है। मतलब यह चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य मतलब वीटो वाला सदस्य सन् 1945 से है जब भारत आजाद भी नहीं हुआ था इंग्लैंड का ही हिस्सा हुआ करता था। पं० नेहरू का प्रधानमंत्री बनना तो बहुत दूर की कौड़ी थी उस समय। 

    चाइना व संयुक्त राष्ट्र संघ के मुद्दे को समझने के लिए हमें रिपब्लिक ऑफ चाइना व पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अंतर को समझना पड़ेगा।

    1945 में जब संयुक्त राष्ठ्र संघ की स्थापना हुई तब चाइना को रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा जाता था और चाइनीज नेशनलिस्ट पार्टी का शासन था। 1949 के लगभग जब माओ ने गृहयुद्ध में चीन में तख्तापलट किया और ताइवान इलाके को छोड़कर पूरे चाइना पर कब्जा कर लिया तब चाइना का नाम पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा गया। ताइवान को रिपब्लिक ऑफ चाइना कहा गया।

    चूंकि 1945 में जो देश स्थाई सदस्य बना था वह था रिपब्लिक ऑफ चाइना, न कि पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, इसलिए 1949 के बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना (1949 के बाद वाला ताइवान ही रहा)। 1949 में रूस द्वारा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) को सैन्य व अन्य सहयोग दिए जाने तथा आगे चल कर मंचूरिया को रिपब्लिक ऑफ चाइना को वापस करने की बजाय पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को दिलवाने इत्यादि जैसे कार्यों के लिए रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) संयुक्त राष्ट्र संघ में रूस को कंडेम्न करना का प्रस्ताव लाया, और यह प्रस्ताव जीता भी। इतना ही नहीं रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) ने 1955 में मंगोलिया मसले पर वीटो का भी प्रयोग किया।

    1960 के दशक में अल्बानिया ने संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव लाने शुरू किए कि संयुक्त राष्ट्र संघ से रिपब्लिक ऑफ चाइना को चाइना न माना जाए बल्कि पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को चाइना माना जाए, तथा रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ से बाहर कर दिया जाए। 1961 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह प्रस्ताव पारित किया कि रिपब्लिक ऑफ चाइना व पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संदर्भ में बदलाव करने के लिए दो तिहाई मतों की जरूरत होगी। सन् 1969 तक संयुक्त राष्ट्र संघ के विएना कन्वेशन्स इत्यादि में भी रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) ही स्थाई व संस्थापक सदस्य के रूप में हस्ताक्षर करता रहा था। यहां यह ध्यान देने की बात है कि पं० नेहरू का देहांत 27 मई 1964 में ही चुका था।

    1970 के आसपास दुनिया के विकसित व अन्य देशों ने पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का चाइना) को रिकगनाइज करना शुरू किया। 1971 में भी संयुक्त राष्ट्र संघ में पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना की जगह स्थाई सदस्य मानने के कई प्रस्ताव खारिज हुए। यहां यह ध्यान देने की बात है कि पं० नेहरू का देहांत 27 मई 1964 को हो चुका था।

    1971 वर्ष के अंतिम महीनों में संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपब्लिक ऑफ चाइना की जगह पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना माना गया। इस तरह पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का चाइना) को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मुख्य चाइना मानते ही वह स्वतः स्थाई सदस्य व वीटो पावर वाला देश बन गया।

    जिस नुक्ते के कारण रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) 1945 से 1971 तक संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई व वीटो पावर वाला देश बना रहा। उसी नुक्ते के कारण पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना के बाद से रिपब्लिक ऑफ चाइना को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता आज तक नहीं मिल पाई है। क्योंकि जैसे पहले रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चीन माना जाता था तथा पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइन को उसका हिस्सा। उसी तरह 1971 के बाद से पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चीन मानने के बाद से रिपब्लिक ऑफ चाइना (आज का ताइवान) को उसका हिस्सा माना जाता है।

    चलते-चलते​

    यदि रिपब्लिक ऑफ चाइना या पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना मानने के नुक्ते को अलग कर दिया जाए तो मुख्य चाइना संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से ही स्थाई सदस्य व वीटो पावर का देश रहा है। 1945 में भारत आजाद तक नहीं हुआ था। 1971 के बहुत पहले ही पं० नेहरू का देहांत हो गया था।

    पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मुख्य चाइना माने जाने का प्रस्ताव अल्बानिया लेकर आया था, इस तरह के प्रस्ताव कई बार लाए गए जो 1971 के अंत तक हमेशा अस्वीकृत होते रहे थे।

    इसलिए पं० नेहरू ने चाइना को स्थाई सदस्य बनवाया या वीटो पावर दिलवाया, यह सब फालतू बकवास है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह की बकवास थरूर साहेब अपनी किसी किताब में करें या वर्तमान सरकार के नुमाइंदे।

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • बदली — Hukum Singh Rajput

    बदली — Hukum Singh Rajput

    ​हुकुम सिंह राजपूत

    ​रहती हू———घर नही!
    भागती हू——-डर नही!
    उड़ती हू—— –पर नही!
    देती हू ——- कर नही!
    आदि से हू —–अमर नही!
    नारी हू ———–नर नही!
    बिन मेरे गुजर बसर नही!
    इस पहेली का अर्थ है 
    बदली

    आइये बदली पर प्रकाश डाले:

    नित्य कहॉ से आती बदली,
    नित्य कहॉ जाती है बदली!
    अपना रङ्ग जमाती बदली,
    सबको नाच नचाती है बदली!

    झटपट रङ्ग बदल देती बदली,
    सफेद से लाल काली हो जाती है बदली!
    तुरन्त आकाश से हट जाती बदली,
    कभी आकाश पर छाई रहती है बदली!

    जङ्गल देख धीरे धीरे चलती बदली,
    रूखी धरती दोड़ खूब लगाती है बदली!
    सीधी कभी ना चलती बदली,
    गोल गोल घूमती रहती है बदली!

    पर्वत पर छा जाती बदली,
    अपना रङ्ग दिखाती है बदली!
    चन्दा सूरज छुपाती बदली,
    कभी खूद छुप जाती है बदली!

    हवा को पलट देती बदली,
    कभी हवा के सङ्ग चल देती है बदली!
    ओष को रोक देती बदली,
    ओले खूब गिराती है बदली!

    प्रात: तूषार गिराती बदली,
    जल खूब बरसाती है बदली!
    गरज गरज कर चलती बदली,
    बिजली खूब चमकाती है बदली!

    इन्द्रधनुष रच देती बदली,
    मयूर को नाच नचाती है बदली!
    धारवा छोड़ देती बदली,
    मूसलाधार जल बरसाती है बदली!

    बेजान झरनो मे जान डालती बदली,
    धरती पर स्वर्ग बनाती है बदली!
    गरजती तो बॉस उगाती बदली,
    चमकती तो आम के फूल जलाती है बदली!

    ठण्ड खूब गिराती बदली,
    गर्मी भी गिराती है बदली!
    सिमट सिमट कर सिमट जाती बदली,
    छोटी से बड़ी हो जाती है बदली!

    बूदबूद कर जल बरसाती बदली,
    फूर फूर से भी काम चला लैती है बदली,
    सागर से गुजर जाती बदली,
    खारे पानी को मीठा बना देती है बदली!

    घट घट कर घट जाती बदली,
    आकाश से हट जाती है बदली!
    कहॉ से जल लाती बदली,
    कोन जाने जल कैसे बरसाती है बदली!

    धरती पर हरियाली करती बदली,
    हरे रङ्ग को हर लेती है बदली!
    सागर की पनिहारी बदली,
    गगन की पटराणी है बदली!
    पल मे ​LOC पार करती बदली,
    बिन पासपोर्ट देश विदेश घूमती है बदली!
    बिना जङ्गल पानी नही बरसाती है बदली,
    बिन पेड़ धरती से प्यार नही करती है बदली!

    कोइ कहे सागर से पानी लाती बदली,
    कोइ कहे पर्वत पर सो जाती है बदली!
    कहे राजपूत बदलीबदली फिरती बदली,
    क्योआपने जङ्गल काटे ऐसा कहती है बदली!

    कटे जङ्गल देख तड़प तड़प कर भागती बदली,
    कही सूखा,कही ज्यादाजल बरसातीहै बदली!
    ज्यादा कम के चक्कर मे खुद फट जाती बदली,
    सारा का सारा जल एक स्थान पर डाल देतीहै बदली!

    पेड लगाओ सीचो संभालो ऐसा कहती बदली,
    कभी धार चलाना नही समझाती है बदली!
    नाच नाच कर पैडृ मुझे नचाता बतलाती बदली ,
    होगा जङ्गल होगा मङ्गल पुकारती है बदली!

    मेडक को आजाद करती बदली,
    पपीहे को पानी पिलाती है बदली!जब जब बरसन लगती बदली,
    दिन रात बरसती रहती है बदली!
    बडै बडे बॉध तोड़ देती बदली,
    बाढ़ नदियो मे लाती है बदली!
    सब कुछ बहा देती बदली,
    जब जब घनघोर बरसती है!

    अलग अलग दल मे रहती है बदली,
    बरसने पर एक हो जाती है बदली!
    जग मै सबसे बडी दाता बदली,
    जग की जीवन जननी है बदली!

    घणा जल है सागर मै बताती बदली,
    बिन जङ्गल जल कैसे बरसायै सोचती है बदली!
    सागर से मिलकर आई कालीकाली बदली,
    अथाह जल भर कर लाई , नही बरसाती है बदली 

    अल्प विराम (क्षमा करना)

    बदली हमे क्या कहती है?
    नाच नाच कर पेड बादल को नचाने वाला है,
    तवासी जलती धरती पर पेड ही जल बरसाने वाला है!
    सागर वही है, पानी वही है, बादल वही है, हवा वही है, फिर सूखा क्यो पडृ जाता है ?
    बस जङ्गल नही है?
    बादल जङ्गल की रानी,
    सागर से लाती है पानी!
    बिन जङ्गल कैसे बरसाये पानी!!
    सूखा ऐसे पड जाता है?

    कारी बदरी घिरघिर आई,
    अथाह जल भर कर लाई!
    बिन जङ्गल होगयी पराई!!
    सूखा—————*

    हमने जङ्गल काटने की ठानी,
    सो बादल नही बरसाती है पानी!
    बादल करती है मनमानी!!
    सूखा————-*

    हमने हाथो से हर लिया मङ्गल,
    काट दिया देखो सब जङ्गल!
    अब घर घर होता देखो दङ्गल!!
    सूखा बार बार पड जाता है
    सूखा—-‘———

    बिन जङ्गल बादल भटकाई,
    कही सूखा कही बरसाई!
    भटकत भटकत बादल फटजाई!
    देखो नयी मूसीबत आई 
    सूखा जबजब पड जाता है—
    जङ्गल कटा तो सब कुछ जल गया???
    छाछ मिली—-‘दु:ख जल गया!
    दूध मिला—–मुख जल गया!
    माचीस मिली—दिया जल गया!
    सहेली मिली—-पिया जल गया!
    चाय मिली——तन जल गया!
    नजर मिली—-मन जल गया!
    पक्षी मिला—-विमान जल गया!
    कूर्सी मिली—-ईमान जल गया!
    हवामिली–पसीना अपने आप जल गया!
    नोकरी छुटी–‘हसीनो का बाप जल गया!
    ज्यादा करन्ट मिला—t—-b जल गयी!
    जेब खाली हुई—b—b’–जव गयी!
    धुम्रपान किया—बहुत कूछ जल गया!
    और
    जङ्गल काटा—तो—‘सब कुछ जल गया!

    ​Hukum Singh Rajput

    ​Hukum Singh Rajput, around 85 years, is a farmer, a poet, an inventor and an innovative community scientist. He is a part of a group of farmers who changed the entire face of their local communities.

  • भारतीय बाबाओं की अवसरवादिता एवं धूर्त्तता

    भारतीय बाबाओं की अवसरवादिता एवं धूर्त्तता

    Sanjay Shramanjothe

    भारतीय इतिहास या संस्कृति के किसी भी मुद्दे पर बात करिए, एक बात भयानक रूप से चौंकाती है. सामान्य ढंग के भक्त और कम शिक्षित लोगों में जानकारी का अभाव होता है, इसलिए उनकी बातें बस प्रचलित नारों की प्रतिध्वनी भर होती है. खैर ये बात कम पीड़ित करती है. ज्यादा दुःख होता है रजनीश भक्तों से, इसमें श्री श्री और जग्गी वासुदेव के शिष्य भी जोड़े का सकते हैं. ये लोग एकदम दिशाहीन होते हैं.

    बात बात में ध्यान या समाधि के अनुभव की बात करते हैं. सीधे जाकर ध्यान करने की सलाह देते हैं, सलाह देते हुए जताते जाते हैं कि ये तो बुद्धपुरुष बन ही चुके हैं। कोई भी मुद्दा हो उसकी ऐसी व्याख्या बताएँगे कि बस हंसने और रोने के आलावा कोई रास्ता ही नहीं बचता.

    अभी नास्तिकता और बुद्ध पर बात निकली, दो रजनीश भक्त कहीं से निकल आये और कहने लगे कि शब्दों को छोड़कर अनुभव में जाइए बुद्ध आस्तिक और नास्तिक का अतिक्रमण हैं. ठीक है भाई. मान लिया भाई. अब इसका अर्थ आप ही समझाइये, अर्थ से ज्यादा इसके इम्प्लिकेशन पर भी आइये. ये लोग स्वयंसिद्ध बुद्ध पुरुष हैं. रजनीश ने ऐसे स्वयंसिद्ध लोगों की फ़ौज खड़ी की है और इसी फ़ौज की मूर्खता में वे खुद भी दब मरे. अमेरिका में उनकी जो गत हुई वो बाहरी षड्यंत्र से कम भीतरी षड्यंत्र से ज्यादा हुई.

    इस झटके में जो बुद्धि आई उसके बाद उनका अंदाज ही बदल गया. लेकिन उसके पहले उन्होंने जो सैकड़ों किताबें रंग डालीं थीं उनकी मूर्खताओं से लोगों को निकालना मुश्किल है. ओशो बनकर उन्होंने खुद ही इन किताबों को नकारने का पूरा प्रयास किया था लेकिन भक्त क्यों सुनेंगे?और जो सुन ले वो फिर भक्त ही किस काम का.

    अब बुद्ध और शून्य की बात करते हैं. रजनीश जिन्दगी भर समझाते रहे शून्य और पूर्ण एक ही हैं. उनकी भी बीमारी वही है जो उनके भक्तों की है. फल से पता चलता है पेड़ कैसा था. शुन्य और पूर्ण उनके लिए एक हैं. इसका मतलब हुआ कि जिस अनुशासन या अंतर्दृष्टि से शून्य का अनुभव होता है वो औपनिषदिक या ब्राह्मणी दृष्टि के समान ही है.

    अगर ये बात सच है तो बुद्ध ने नाहक श्रम किया. रजनीश अगर सही हैं तो महावीर और बुद्ध दोनों मूर्ख हैं जो इतने साल तक वेदों और परमात्मा को नकारते रहे. भगवान रजनीश दर्शन की जलेबियाँ बनाते हुए कहते हैं कि जिस तरह शंकर प्रच्छन्न बौद्ध हैं उसी तरह बुद्ध प्रच्छन्न वेदांती हैं.

    ये रजनीश के पाखण्ड की अंतिम उंचाई है. इसके बाद वे सीधे नीचे लुढकते हैं और रजनीशपुरम की राख में औंधे मुंह गिरते हैं. और ऐसे गिरते हैं कि उनकी तैयार की हुई फौज में से एक भी ऐसा आदमी आज तक खड़ा न हो सका जो उनके अंतिम समय की समझ को थोड़ा सा आगे बढा सके. सब के सब कॉपीराइट और सम्पत्ति के नाम पर लड़ रहे हैं।

    जितने भक्त हैं वे सब दाढ़ी बढ़ाकर चोगा पानकर आँखें चौड़ी कर करके फोटो खिंचाते रहते हैं. कुछ अन्य हैं जो नोंनवेज जोक्स सुनाकर ही समाधि लाभ करते रहते हैं. अभी हरियाणा में एक आश्रम खुला है ओशो के नाम पर वे चौरासी दिनों में चौरासी लाख योनियों से शर्तिया छुटकारा दिलाते हैं. ये रजनीश की कन्फ्यूज्ड शिक्षाओं का स्वाभाविक परिणाम है. ये न हो तो आश्चर्य होगा. ये हो रहा है तो एकदम सही हो रहा है. कई सूरमा यहीं फेसबुक पर हैं, खुद के नाम के आगे ओशो लगाकर लोगों की कुंडलिनी जगा रहे हैं. मतलब खुद की तो जग गयी अब जगत का कल्याण कर रहे हैं.

    एक अजीब सी प्रवृत्ति है इन वेद वेदान्त के प्रेमियों में वे किसी मुद्दे को उसके तर्क और उसके इम्प्लिकेशन के संदर्भ में देखते ही नहीं. कभी नहीं सोचते कि उनकी जलेबिदार व्याख्या का फलित क्या होगा. अब रजनीश को देखिये वे शून्य और पूर्ण को एक ही बताते हैं. इस व्याख्या में वे तर्क कम और आंतरिक अनुभव की ज्यादा बात करते हैं. इसे वे कहते हैं आंतरिक अनुभव की परिपक्वता और उससे जन्मी स्थित्प्रग्यता और तटस्थता. खुद तो इसे भांज ही रहे हैं औरों को भी ये जहरीली भांग तैयार करने का प्रशिक्षण दे जाते हैं.

    अब उनके मूर्खता का आलम देखिये शून्य और पूर्ण एक ही हैं, भक्ति और ज्ञान एक ही है, कर्म और अकर्म एक ही है. तर्क और कुतर्क एक ही है. जय और पराजय एक ही है. तो फिर वही होना है जो आज तक हुआ है. फिर ये भी मान लीजिये कि रजनीशपुरम का होना और मिटना भी एक ही है. लेकिन जब रजनीशपुरम को बुलडोजरों से तोड़ा गया तब रजनीश बहुत क्रोधित हुए. जमाने भर में प्रेस कान्फ्रेरेंस करते रहे.

    कुछ विडिओ तो ऐसे हैं जिनमे रजनीश पत्रकारों पर क्रोधित हो रहे हैं. अब कहाँ गयी तटस्थता?भक्त भी गजब हैं. कुछ फोटो हैं जिनमे रजनीश हथकड़ी लगाये खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं. भक्त इसे शेयर करके कहते हैं कि ये है स्थितप्रज्ञ समाधिस्थ व्यक्ति जो दुःख में भी मुस्कुरा रहा है.

    इन्ही भक्तों की वाल पर रजनीश का चीखता हुआ वीडियो भी मिलेगा उसके परिचय में लिखा मिलेगा – ओशो का रौद्र रूप. गजब है भाई. अब मुस्कुराहट और रौद्र रूप अलग क्यों हो गये? ये क्यों नहीं कहते कि ओशो संतुलन खो चुके हैं.

    बस भक्त जन ऐसी ही जलेबियाँ बनाते हैं. भक्त किसी राजनेता के हों या धर्मगुरु के उनकी लीला ही न्यारी है. वो जो न करें सो कम है. दुर्भाग्य ये कि इन सभी भक्तों में अचानक भाईचारा जाग उठा है. कुम्भ मेलों के बिछड़े इन सभी भक्तों का अचानक से भारत मिलाप हो गया है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

  • खिलखिलाती पहचान

    खिलखिलाती पहचान

    Mukesh Kumar Sinha

    खिलखिलाहट से परे
    रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान, 
    उदासियों में जब ओस की बूंदों से
    छलक जाते हों आंसू 
    तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
    ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना 
    कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की

    खिलखिलाते हुए जब भी तुमने कहा 
    मेरी पहचान तुम से है बाबू 
    मैंने बस उस समय तुम्हारे
    टूटे हुए दांतों के परे देखा 
    दूर तक गुलाबी गुफाओं सा रास्ता 
    ये सोचते हुए कि 
    कहीं अन्दर धड़कता दिल भी तो होगा ना 
    मेरे लिए 
    गुलाबी श्वांस नली, लग रही थी आकाशगंगा 
    और खोज जारी थी मेरे लिए धधकते गुलाबी दिल की 
    कुछ बृहस्पति ग्रह की तरह

    खिलखिलाहट और मेरी खीज 
    अन्योनाश्रय संबंधो में बंधा प्रेम ही तो था 
    जिस वजह से 
    झूलती चोटियों के साथ तुम्हारी मुस्कुराती, गाती आँखें
    और चौड़ा चमकता माथा 
    चमकीली किरणों सा आसमान एक
    जो फैलकर 
    बताता सूर्योदय के साथ
    कि पकी बालियों सी फसल बस कटने वाली है 
    या फिर 
    कुम्भ सा पवित्र चेहरा तो नहीं तुम्हारा 
    जहाँ त्रिवेणी छमकते हुए मिट जाती हैं

    सुनो मेरी खीज से परे 
    बस तुम खिलखिलाना 
    सौगंध है तुम्हें
    ताकि बस तुम हो तो लगे ऐसा कि 
    मेरे आसमान में भी उगती है धनक,
    कभी न कभी 
    बारिश के बाद निकलती है एक टुकड़ा धूप 
    और खिलती है फ़िज़ा
    सिर्फ मेरे लिए 
    सुन रहे हो न मेरी आकाश गंगा

    सुनो कि 
    बार बार हूँ कह रहा
    खूब खिलखिलाती रहना 
    महसूस करना
    मेरे साथ बह रही एक नदी 
    मचलती, बिफरती, डूबती, उतराती
    जीवंत खिलखिलाती नदी 
    बेशक मुझपर पड़ती रहे 
    मासूम बूंदों की फुहार … 
    याद रखना नदियाँ चुप नहीं रहती

    समझे ना !

    Mukesh Kumar Sinha