रामभरोसे जलेबी जासूस (कहानी )

Gourang 

रामभरोसे कई दिनों से उसे नोटिस कर रहा था। वह सवेरे ही आकर एक बेंच कब्जा लेता और जाने क्या अपने में सोचता रहता। उसके पीठ पीछे हरे रंग का एक झोला टंगा होता। झोला भी क्या मानो खूब इस्तेमाल किया हुआ। रंग बिलकुल उजड़ा हुआ था, मगर मजबूत था और कुछ वजनी भी था। कई दिनों से उसे देखते रहने से रामभरोसे को पता था कि उस बैग में एक लैपटाप था, जिसे वह निकालता और गोद में रख लेता। फिर कुछ टाईप भी करने लगता। मगर हमेशा नहीं। अमूमन तो वह अपने बेतरतीब बालों और दाढ़ी में हाथ फेरेते हुए कुछ सोचता ही रहता। रामभरोसे कुछ कौतुहुल से ही उस पर नजर रखता। वैसे रामभरोसे अकेला नहीं था, आस-पास के रेगुलर कस्टमर की भी उस पर नजर थी। वे आपस में छुपकर खुसुर-पुसुर से बतियाते। रामभरोसे के कान खूब तेज थे। हाथ काम करते मगर वह आस-पास के बातों पर कान रखता। उस दिन उसने सुना।
एक ने कहा – “कोई रिसर्च वाला लगता है।” 
दूसरे ने कहा – “मुझे तो कोई जासूस लगता है, ये लोग स्वांग धरने में माहिर होते हैं।”
तीसरे को जासूस वाली आईडिया कुछ जमने लगी तो वह भी बात आगे बढ़ा दिया – “ठीक कह रहे हो भाई, आजकल इधर बहुत हलचल बढ़ गई है।”
पहले को अपनी थ्योरी पिटती नजर आई। वह प्रोटेस्ट के सुर में बोला – “खामख्वाह? इसके बेतरतीब बाल, बढ़ी दाढ़ी, खद्दर के कुर्ते और उजड़े जींस, खोई-खोई आँखें देखो। फिर, खाने का भी कोई ठिकाना नहीं। अरे, मैं तो बोलूँ जिसे रामभरोसे के गरम-गरम दूध-जलेबी भी खींच न सके, वह दार्शनिक नहीं तो और क्या?” वह रामभरोसे को अपने पाले में खींचने की कोशिश में बोला। 
रामभरोसे को उसके बात में कुछ दम भी नजर आया। आम कस्टमर से इसका एक बुनियादी फर्क था, वह कुछ खाता-पीता न था। कोई आर्डर भी नहीं। पहले दिन तो रामभरोसे को इस सरफिरे पर बड़ा गुस्सा आया, कोई आर्डर नहीं, बस बेंच कब्जाये बैठा है। मगर शाम को जाते-जाते वह रामभरोसे को पचास का एक नोट पकड़ाया और बड़े मुलायम स्वर में कह गया – “इस बेंच को मेरे लिए रिजर्व रख दीजिये।” तो एक एग्रीमेंट सा ही हो गया, दिहाड़ी का पचास रुपया। लोग भी उस बेंच पर बैठने से परहेज करते। जो हो, रामभरोसे ने पहले को देख हामी में सर हिलाया और फिर गरम जलेबियों को चीनी के चासनी में डुबोया।
दूसरा अब भी जासूसी के दलील पर कायम था। फिर उसे दार्शनिक की थ्योरी में कोई थ्रिल भी अनुभव नहीं हुआ। वह कदरन ऊँचे आवाज में बोला – “यही तो करिश्मा है। जैसा मेक-अप वैसा ही एक्टिंग, अगर धर ही लिए तो जासूस क्या?”
तीसरे ने भी दुक्की लगाई – “बिलकुल सही कहे, फिल्म में भी तो ऐसा ही दिखाता है।”
पहला अच्छा तर्कवीर था। झट दूसरे को काट दिया - “मगर यहाँ जासूसी के लिए रखा क्या है? आधा गाँव आधा शहर में कौन सा तेल का कूँआ निकला है जो जासूस पग धरेगा? यहाँ तो बस एक हमारा रामभरोसे ही है दूध-जलेबी लेकर। फिर तो ये जलेबी जासूस ही है।” मौज हो गई। सब हँसने लगे। दूसरे की भद पिट गई। तीसरा भी मूँह छुपाने लगा। 
बात कुछ तभी के लिए खत्म हो गई। मगर रामभरोसे के लिए खत्म न थी। आखिर यह आदमी सप्ताह भर से आकर यहाँ पड़ा क्यों है? कोई जवाब तो होना चाहिए। वह मन ही मन स्थिर कर लिया। शाम को जब परदेशी जाने को हुआ तो उससे रुपये लेने के बाद आखिर रामभरोसे ने पूछ ही लिया – “साहेब, यहाँ रहे कहाँ हैं?” 
परदेशी मुस्कुराया। अपनी बैक-पैक को पीठ में एडजेस्ट करते हुए बोला – “नदी के उस पार।“ 
“उस पार? अरे उधर तो जंगल है।” रामभरोसे अचकचाया। 
“वहीं कुछ मछुआरे भी रहते हैं। वहीं रह रहा हूँ। हर दिन वे नाव से इस पार छोड़ देते हैं। फिर शाम ढले ले जाते हैं।” परदेशी का शांत मीठा आवाज भी रामभरोसे के हैरानी को कम न कर सका। 
“अरे साहेब, आप इतना बड़ा आदमी, उस गंदी बस्ती में रहने की क्या जरूरत है? हमसे कहिए, हम यहाँ आपकी रहने की व्यवस्था कर देंगे। वैसे भी लोग न जाने क्या-क्या कह रहे हैं।” रामभरोसे को परदेशी से सहानुभूति हो गई थी। 
परदेशी ने फिर मुसकुराते हुए जवाब दिया – “पता है। मगर मैं वहीं ठीक हूँ।” 
रामभरोसे फिर फेर में पड़ गया। वह असमंजस में पूछा – “तो लोग सही कह रहे हैं?” 
परदेशी बोला – “आधा सच। एक लेखक किसी जासूस से कुछ कम नहीं होता। वह किरदारों की जासूसी करता रहता है, फिर उसे कहानी में ढाल लेता है। मैं भी तो यही कर रहा हूँ।” 
ब्रीफिंग पर रातों रात स्टोरी मुकम्मल हो गई। उस छोटे से शहर में हर जुबान पर एक ही कहानी थी – कोई परदेशी लेखक आया है जो राम भरोसे पर स्टोरी लिख रहा है। वह हर दिन घंटों आकर रामभरोसे को वाच करता रहता है।
फिर अगले दिन रामभरोसे किसी हीरो से कम नहीं लग रहा था। खास हो गया था। दूध-जलेबी की बिक्री भी अचानक बढ़ गई। लोग जलेबी जासूस को देखने आने लगे। यही अब परदेशी का उपनाम हो गया। 
उस दिन फिर एक कस्टमर ने रामभरोसे को छेड़ा – “तो रामभरोसे जी शूटिंग कब से शुरू है?” 
“कैसा शूटिंग?” रामभरोसे आसमान से गिरा। 
“अरे! आप छुपाएंगे और समझते है कि हमको कुच्छों पता नहीं चलेगा? अब हीरो बन ही गए हैं तो फिर इतना सीक्रेट वाला गेम काहे खेल रहे हैं?” 
“कौन हीरो और कैसा सीक्रेट? ” रामभरोसे छटपटाया। 
“अब हम ही से कहलवाना चाहते हैं? अब तो सारा शहर जान गया। आपका फिल्म बन रहा है, आप ही हीरो हैं। जलेबी जासूस यहाँ शूटिंग का लोकेशन तलाशने आया है। देखिये, हमारे लिए भी कोई छोटा-मोटा रोल निकलवाईए न, साईड वाला।” वह एक एक्टिंग का पोज लेते हुए बोला। 
“अरे भंगी हो क्या? ई बे सिर पैर वाला बात कौन उड़ाया?” रामभरोसे बौखलाया। 
मगर कौन सुने रामभरोसे की। लोग रामभरोसे को बधाई देने लगे। फिर कुछ ने जलेबी की आर्डर भी दे दिये और कहने लगे – “अपना राम भरोसे तो अब बंबई चला जाएगा, क्या पता फिर कभी उसके हाथों की बनी जलेबी मिले न मिले।”
उलझन में भी खुशी तारी थी। धंधा जो चमक गया था। रामभरोसे दूकानदारी में पनाह खोजने लगा। मगर शाम को फिर बात और आगे निकल गई। कुछ लोगों ने परदेशी को घेर लिया। फिर खुशामद करने लगे – “एकाध रोल हमारे लिए भी निकालिए महाराज।“ कुछ तो बाकायदा पोज भी देने लगे। कुछ ने एक कदम आगे निकलकर दो चार फिल्म के हिट डायलाग भी सुना दिया। 
परदेशी मुस्कुराया फिर मीठी आवाज में बोला – “वैसे तो ठीक है, मगर एक माईनोर सी टेंशन है। हिरोईन राजी नहीं हो रही। जो होगा हिरोईन का मामला सुलझने के बाद ही होगा। तब तक देखते हैं।” कहकर वह मुस्कुराकर निकल गया। लोगों ने खुशी से तालियाँ बजाई, शोर भी हुआ। 
एक ने सुनते ही चुटकी लिया – “अरे हमसे कहे न, हम हिरोईन वाला रोल भी कर लेंगे। रामलीला में सीता वाला रोल तो किए ही हैं। फिर कौन मुश्किल काम है!” 
शहर में अब कोई किन्तु, परंतु वाली बात ही न रही। अब रामभरोसे का दर्जा अब किसी स्टार से कम न था। लोग हीरोईन पर कयास लगाने लगे। रामभरोसे के भाग्य पर भी कुछ को ईर्ष्या हुई। रामभरोसे ने भी अगले दिन कुछ साफ और चमकदार कपड़े पहने, आखिर इतनी बातों से असर तो होता ही है। वह भी कुछ जोश में था, मगर उसे अपने बारे में परदेशी बाबू से पूछने में शर्म सी हो रही थी। वह कभी-कभी शरमाकर उसे देख लेता। कस्टमर छेड़ रहे थे, मगर आज उसे गुस्सा नहीं आ रहा था, वह कुछ लाजुक सा हँसते-हँसते ही दूकानदारी कर रहा था। 
इसी तरह दिन बीता। जलेबी जासूस जाने को हुआ तो कुछ लोगों ने फिर घेर लिया – “हीरोईन का मामला सुलझा?” 
परदेशी हँसते हुए बोला – “करीब-करीब।” 
“फिर कब से शुरू कर रहे हैं?” एक आवाज आई। 
“बस, अब कल फ़ाईनल हो जाएगा।” वह विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन बोला। 
“हमारा ख्याल तो रखिएगा न!” कई आवाजें एक साथ आई। 
“जरूर, जरूर।” कहता हुआ वह निकाल गया। 
शहर भर में अब एक ही चर्चा थी। लोगों ने फिल्म का नाम भी दे डाला था – ‘रामभरोसे जलेबी जासूस’, वैसे तो यह दोनों के जुगलबंदी की बावद टाईटल बनी थी, मगर शहर वालों को भा गई थी। अगले दिन रामभरोसे के दुकान के आगे अच्छी-ख़ासी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। लोग उत्सुक थे, उन्हे भरपूर तमाशा की उम्मीद थी, कुछ को इसमें मौके भी नजर आ रहे थे। 
मगर परदेशी न आया। रामभरोसे भी नदारद था। लोगों ने स्वाभाविक अनुमान लगाया कि फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। काफी देर लोग खड़े रहे। अपनी-अपनी राय जाहिर करने लगे। किसी ने कहा – मुहूर्त किसी मंदिर में रखा होगा, वहीं होंगे दोनों। दूसरे ने कहा – शूटिंग से पहले रिहर्सल करना पड़ता है, वही चल रहा होगा। तीसरे ने रोस प्रकट किया – हमारा तो ख्याल न रखा। किसी और ने कहा – जो हो, शहर का नाम रौशन हो गया। हर मुँह नए-नए कयास थे। दिन निकलता रहा, बातें जारी रही। मगर काफी देर तक कोई न आया। दोपहर हो गया। अब भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। कोई कितना धीरज धरे। इसी तरह शाम होने को आया। 
आखिर रामभरोसे आया। वह काफी थका हुआ था। उसके चेहरे पर फटकार बरस रही थी, रंग उजड़ा हुआ था। वह भारी कदम जाकर परदेशी के बेंच पर ही बैठ गया, और ऊपर की ओर देखने लगा। उसे चन्दन राय की दुमंजिला साफ दिखने लगी। दुमंजिला इमारत की खिड़की अमूमन खुली रहती थी मगर आज बंद थी। इने-गिने लोग वहाँ फिर भी थे। उन्होंने उसे घेर लिया। वे भी पास बैठ गए। एक ने धीरे से पूछा – “शूटिंग बहुत मेहनत वाला काम है न!” 
रामभरोसे कुछ न बोला। वह एकटक खिड़की को देखने लगा। 
एक दूसरा आदमी बोला – “डिस्टार्ब मत करो इसको अभी, कल के शूटिंग का रिहर्सल कर रहा है।” 
रामभरोसे से रहा न गया। वह क्रोध में फट पड़ा और बोला – “फराड है वह। चन्दन राय के लड़की को भगा के ले गया है। यहीं से हर दिन उससे लैपटॉप में चैट करता था। बंद खिड़की देख रहे हो, वहीं से इशारेबाजी होती थी।” सबने बंद खिड़की को देखा। 
रामभरोसे फिर रूआंसे बोला – “अभी हम थाना से आ रहे है। सवेरे से बहुत खिंचाई हुई हमारी। बहुत हाथ-पैर धर कर छूटे हैं हम।“ 
सब अवाक होकर कभी रामभरोसे कभी बंद खिड़की को देख रहे थे।

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