Category: Articles

  • भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

    भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

    Kumar Vikram
    Editor, National Book Trust, NBT

    पहले भी हमारी उनपर कोई ख़ास आस्था नहीं थी
    बल्कि हम उनपर हँसा ही करते थे
    मानो समाज के उच्च आदर्शों के तार तार हो रहे लिबास पर
    अपनी असहायता को ढकने के लिए अपनी शर्मिंदगी छिपा रहे हों
    जब मीडिया सभाओं भाषणों अख़बारों
    स्कूली कक्षाओं के वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में
    हम उनसे अकसर टकराते रहते थे

    ‘युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं
    टकराव का हल बातचीत से निकलना चाहिए’
    ‘आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता’
    ‘परिस्थितियां कैसी भी हो किसी भी नागरिक को
    क़ानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है’
    ‘ मेरे उनसे वैचारिक मतभेद ज़रूर थे
    पर उनकी मृत्यु मेरे अंदर एक ख़ालीपन छोड़ गई है’
    ‘पड़ोसी देशों के साथ हमारे राजनैतिक मतभेद भले ही हों
    हमें अपनी साझी सांस्कृतिक विरासत को नहीं भूलना चाहिए’
    ‘कर्म करो फल की चिंता न करो’ आदि 

    पर अब जब सारे मुखौटे टूट कर गिर गए हैं
    हम इन रटे रटाए शब्दों को सुनने को तरस गए हैं
    मानो मन में एक कसक सी रहती है
    कि पुराने जमाने के कुछ जुमले
    भ्रम स्वरूप ही जीवन में बचे रहने चाहिए
    ताकि मनुष्य की बची हुई मनुष्यता के बचने की
    संभावना थोड़ी बची रहे
    शायद कुछ वैसे ही
    जैसे टूटती खंडहरों को समाज बचाकर रखता है
    जहाँ स्कूली बच्चे पिकनिक के लिए ले जाए जाते हैं
    और रटी रटाई ऐतिहासिक जुमलों के सहारे
    गाइड उन्हें इतिहास बोध करवाता है

    About Author

    Kumar Vikram

  • भीमा कोरेगांव: ऐतिहासिक नायकों की तलाश में दलित –Prof Ram Puniyani

    भीमा कोरेगांव: ऐतिहासिक नायकों की तलाश में दलित –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    महाराष्ट्र के कोरेगांव में एक जनवरी 2018 को उन दलित सिपाहियों, जो सन् 1818 में पेशवा के खिलाफ युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ते हुए मारे गए थे, को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए दलितों के खिलाफ अभूतपूर्व हिंसा हुई।  सन् 1927 में अंबेडकर ने कोरेगांव जाकर इन शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि दी थी। दलितों द्वारा हर साल भीमा कोरेगांव में इकट्ठा होकर मृत सैनिकों को श्रद्धांजलि देना,दलित पहचान को बुलंद करने के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है। इस साल यह समारोह बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया क्योंकि इस युद्ध के 200 साल पूरे हो रहे थे। विवाद एक दलित – गोविंद गायकवाड़ – जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसने संभाजी का अंतिम संस्कार किया था – की समाधि को अपवित्र किए जाने से शुरू हुआ। भगवा झंडाधारियों ने उन दलितों पर पत्थर फेंके जो भीमा कोरेगांव मे इकट्ठा हुए थे। शिवाजी प्रतिष्ठान और समस्त हिन्दू अगादी नामक हिन्दुत्व संगठन इस हिंसा के अगुआ थे।

    पुणे के शनिवारवाड़ा, जो पेशवाओं के राज का केन्द्र था, में एक सभा को संबोधित करते हुए दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने ‘आधुनिक पेशवाई‘ के खिलाफ संघर्ष शुरू करने का आव्हान किया। ‘आधुनिक पेशवाई‘ से उनका आशय भाजपा-आरएसएस की राजनीति से था। जिस सभा में उन्होंने भाषण दिया, वहां दलितों के साथ-साथ अन्य समुदायों के नेता भी उपस्थित थे। इस घटना पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं हुईं। कुछ लोग इसे मराठा विरूद्ध दलित संघर्ष बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि यह दलितों पर हिन्दुत्ववादी ताकतों का हमला है। एक ट्वीट में राहुल गांधी ने इस घटना के लिए भाजपा की फासीवादी व दलित-विरोधी मानसिकता को दोषी ठहराया।

    भीमा कोरेगांव युद्ध का इतिहास, समाज में व्याप्त कई मिथकों को तोड़ता है । इस युद्ध में एक ओर थे अंग्रेज, जो अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे, तो दूसरी ओर थे पेशवा, जो अपने राज को बचाना चाहते थे। अंग्रेजों ने अपनी सेना में बड़ी संख्या में दलितों को भर्ती किया था। इनमें महाराष्ट्र के महार, तमिलनाडू के पार्या और बंगाल के नामशूद्र शामिल थे। अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में इसलिए शामिल किया था क्योंकि वे अपने नियोक्ताओं के प्रति वफादार रहते थे और आसानी से उपलब्ध थे। पेशवा की सेना में अरब के भाड़े के सैनिक शामिल थे। इससे यह साफ है कि मध्यकालीन इतिहास को हिन्दू बनाम मुस्लिम संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाना कितना गलत है। जहां इब्राहिम खान गर्दी, शिवाजी की सेना में शामिल थे वहीं बाजीराव पेशवा की सेना में अरब सैनिक थे। दुर्भाग्यवश, आज हम अतीत को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देख रहे हैं और इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि युद्धों का उद्देश्य केवल और केवल संपत्ति और सत्ता हासिल करना था।

    बाद में अंग्रेजों ने दलितों और महारों को अपनी सेना में भर्ती करना बंद कर दिया क्योंकि उन्होंने पाया कि ऊँची जातियों के सिपाही अपने दलित अफसरों को सेल्युट करने और उनसे आदेश लेने के लिए तैयार नहीं थे। अंबेडकर का प्रयास यह था कि दलितों की ब्रिटिश सेना में भर्ती जारी रहे और इसी सिलसिले में उन्होंने यह सुझाव दिया कि सेना में अलग से महार रेजिमेंट बनाई जानी चाहिए। महार सिपाहियों के पक्ष में अंबेडकर इसलिए खड़े हुए क्योंकि वे चाहते थे कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में दलितों की मौजूदगी हो।

    क्या भीमा कोरेगांव युद्ध दलितों द्वारा पेशवाई को समाप्त करने का प्रयास था? यह सही है कि पेशवाओं का शासन घोर ब्राम्हणवादी था। शूद्रों को अपने गले में एक मटकी लटकाकर चलना पड़ता था और उनकी कमर में एक झाड़ू बंधी रहती थी ताकि वे जिस रास्ते पर चलें, उसे साफ करते जाएं। यह जातिगत भेदभाव और अत्याचार का चरम था। क्या अंग्रेज, बाजीराव के खिलाफ इसलिए लड़ रहे थे क्योंकि वे पेशवाओं के ब्राम्हणवाद का अंत करना चाहते थे? कतई नहीं। वे तो केवल अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार करने के इच्छुक थे ताकि उनका व्यापार और फले-फूले और उन्हें भारत को लूटने के और अवसर उपलब्ध हो सकें। इसी तरह, महार सिपाही, पेशवा के खिलाफ इसलिए लड़े क्योंकि वे अपने नियोक्ता अर्थात अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। यह सही है कि इसके कुछ समय बाद देश में समाज सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई और उसका कारण थी आधुनिक शिक्षा। अंग्रेजों ने देश में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था इसलिए लागू की ताकि प्रशासन के निचले पायदानों पर काम करने के लिए लोग उन्हें उपलब्ध हो सकें। समाज सुधार इस प्रक्रिया का अनायास प्रतिफल था। अंग्रेज़ भारत की सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए अपनी नीतियां नहीं बनाते थे। वैसे भी, उस दौर में जातिगत शोषण के प्रति उस तरह की सामाजिक जागृति नहीं थी जैसी कि बाद में जोतिबा फुले के प्रयासों से आई।

    यह कहना कि पेशवा राष्ट्रवादी थे और दलित, ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन कर रहे थे, बेबुनियाद है। राष्ट्रवाद की अवधारणा ही औपनिवेशिक शासनकाल में उभरी। ब्रिटिश शासन के कारण देश में जो सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन आए, उनके चलते दो तरह के राष्ट्रवाद उभरे। पहला था भारतीय राष्ट्रवाद, जो उद्योगपतियों, व्यापारियों, शिक्षित व्यक्तियों,  श्रमिकों और पददलित तबके के नए उभरते वर्गों की महत्वाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति था। दूसरे प्रकार का राष्ट्रवाद धर्म पर आधारित था – हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रवाद। इसके प्रणेता थे जमींदार और राजा-नवाब, जो समाज में प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति बढ़ते आकर्षण से भयातुर थे और धर्म के नाम पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते थे।

    पिछले कुछ वर्षों में देश में दलितों के बीच असंतोष बढ़ा है। इसको पीछे कई कारण हैं। रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या और ऊना में दलितों की निर्मम पिटाई इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। वर्तमान सरकार की नीतियां, दलितों को समाज के हाशिए पर धकेल रहीं हैं – फिर चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो या शिक्षा का क्षेत्र। कोरेगांव में भारी संख्या में दलितों का इकट्ठा होना इस बात का प्रतीक है कि वर्तमान स्थितियों से वे गहरे तक असंतुष्ट हैं। नए उभरे दलित संगठन समाज के अन्य दमित वर्गों के साथ गठजोड़ कर रहे हैं। भीमा कोरेगांव में हुई घटनाओं के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों, श्रमिकों और कई अन्य सामाजिक संगठनों ने दलितों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। दलित, अतीत के नायकों से प्रेरणा ग्रहण करने का प्रयास कर रहे हैं। हालिया घटनाक्रम से यह साफ है कि वे भारतीय प्रजातंत्र में अपना यथोचित स्थान पाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। उन पर हिन्दू दक्षिणपंथी समूहों का आक्रमण, दलितों की महत्वाकांक्षाओं को दबाने और कुचलने का प्रयास है।  

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता – कपिल चौधरी : किसान के बेटे ने इंजीनियरिंग के बाद इंट्रप्रेन्योरशिप को चुना

    इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता – कपिल चौधरी : किसान के बेटे ने इंजीनियरिंग के बाद इंट्रप्रेन्योरशिप को चुना

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    इंट्रेप्रेन्योर बनना आसान नहीं होता। काम शुरू करने के पहले बहुत योजनाएं बनानी पड़तीं हैं, बहुत सारी तैयारियां करनी पड़तीं हैं, रिस्क लेने पड़ते हैं। भारतीय समाज में इन सबके अतिरिक्त सबसे बड़ा काम जो करना पड़ता है जिसमें पुरखे याद आ जाते हैं वह यह कि माता-पिता व परिवार को तैयार कैसे करें कि योग्यता होने के बावजूद सरकारी या ऊंचेवेतनमान की गैरसरकारी नौकरी करने की बजाय अपना व्यवसाय करेंगे। वह भी तब जबकि उस व्यवसाय को परिवार में कभी किसी ने न किया हो। बहुत लोगों को तो पूरे जीवन अपने माता-पिता का विरोध व गालियां सिर्फ इसलिए खानीं पड़तीं हैं क्योंकि उन लोगों ने अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहा। वे लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिनके माता-पिता थोड़ी सी बहसबाजी के बाद ही सही लेकिन बात सुनने समझने को तैयार हो जाते हैं।

    काम शुरू होने के बाद भी जीवन भर लगातार नवीन योजनाओं के साथ काम करना पड़ता है, जीवन भर प्रतिस्पर्धा में बने रहना पड़ता है, प्रतिस्पर्धाओं में बने रहते हुए सफल भी होना पड़ता है। व्यवसाय आर्थिक विकास का मूलभूत व सबसे महत्वपूर्ण चक्र होता है। उन लोगों के लिए तो बहुत ही मुश्किल होता है जिनको अपने माता पिता से व्यवसाय बना-बनाया नहीं मिलता है। अपना व्यवसाय करना ही आपकी मेधाविता, क्षमता व प्रयोगशीलता का वास्तविक मानदंड होता है।

    Kapil Chaudhary

    कपिल चौधरी:
    कपिल चौधरी मुरादाबाद के एक सामान्य गांव के किसान के पुत्र हैं। कपिल चौधरी की शुरुआती पढ़ाई लिखाई गांवों के विद्यालयों में हुई। माता-पिता की इच्छा थी कि कपिल इंजीनियरिंग करें, उसके बाद कोई अच्छी सी सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करें, विवाह करें फिर बच्चे पैदा करते हुए सकून से अपना जीवन यापन करें। 

    लेकिन कपिल चौधरी व उनके मित्र कपिल वर्मा अपने जीवन के रास्ते व शैली खुद चुनना चाहते थे। इन लोगों को लगा कि नौकरी करने से बेहतर है अपना स्वयं का व्यवसाय करना। इंजीनियरी की पढ़ाई करते हुए ही योजनाएं बनाने लगे। योजनाओं को जमीन पर कैसे उतारा जाए इसके लिए तैयारियां करने लगे। इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई भी करते, पढ़ाई करने के अतिरिक्त जिस समय अन्य छात्र लोग मौजमस्ती करते तब ये दोनों युवा अपनी योजनाओं की तैयारी के लिए मार्केटिंग रिसर्च व अन्य गतिविधियों के लिए भागदौड़ करते। घर से मिलने वाली पाकेटमनी का प्रयोग इन सब कामों में करते।

    Kapil Verma and Kapil Chaudhary in Mr Caps Cafe

    कपिल के माता-पिता किसान। किसी किसान से उनका पुत्र जो इंजीनियरिंग कर रहा हो, वह यह कहे कि वह नौकरी नहीं करना चाहता है बल्कि अपना स्वयं का व्यवसाय करना चाहता है। अपवाद छोड़ दीजिए तो किसान हत्थे से उखड़ कर ही बात करेगा। कपिल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ते हुए लगभग दो वर्षों तक धीरे-धीरे अपने माता-पिता के मन को तैयार किया ताकि वे कपिल के निर्णय को स्वीकार कर पाएं।

    पिछले वर्ष 2017 के नवंबर महीने में कपिल चौधरी ने अपने मित्र कपिल वर्मा के साथ मिल कर Mr Caps काफी कैफे की स्थापना की। मेरठ के बाद मुरादाबाद, उसके बाद भारत के अन्य शहरों में भी श्रंखला खोलने की योजना बनाए हुए हैं।

    Mr Caps Cafe

    कपिल चौधरी का कहना है कि इंजीनियरी की पढ़ाई के बाद जितना रुपया छात्र माता-पिता से लेकर सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं या जुगाड़ में खर्च करके नौकरियां पाते हैं या उच्च शिक्षा में खर्च करते हैं। उसकी तुलना में बहुत कम आर्थिक सहयोग माता-पिता से लिया है वह भी लोन के रूप में।

    गांवों के बहुत लोग ऐसे होते हैं जो अपने मित्रों व रिश्तेदारों का प्रयोग करके अखबारों में अपने उन बच्चों का नाम व फोटो छपवाकर अपने भीतर के कुंठित अहंकार को तुष्ट करते हैं, जो किसी सरकारी नौकरी को पा गए होते हैं। मेरी दृष्टि में विकसित समाज व देश के लिए कपिल चौधरी जैसे स्वावलंबी, रोजगार देने वाले व  अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदारी करने वाले युवा आदर्श होने चाहिए न कि सरकारी नौकरी करने वाले।

    सरकारी नौकरी बनाम इंट्रेप्रिन्योरशिप:
    हममें से बहुत लोग लंबी-लंबी बातें करते हैं। इंट्रेप्रेन्योरशिप की बात करते हैं, सेमिनार्स में भाषण देते हैं। पुरस्कार जीतते है। लेकिन जब अपने घर की बात आती है तो हमारी पहली प्राथमिकता यही रहती है कि हमारी संतान या हमारे परिवार वाले ऊंची सरकारी नौकरी में जाएं या ऊंचे वेतनमान वाली गैरसरकारी नौकरी करें। ऊंची सरकारी नौकरी करने का उद्देश्य समाज के लिए कुछ करने का उद्देश्य नहीं होता। समाज के लिए कुछ करने के लिए न तो सरकारी नौकरी और न ही पैसा ही मूलभूत तत्व होते हैं।

    अपवादों में भी अपवाद को छोड़कर सरकारी नौकरी करने के पीछे के कई बड़े व मूलभूत आकर्षण होते हैं (ढोंग चाहे जो कहा व किया जाए) –

    • जवाबदेही का न होना
    • मेहनत कम होना
    • भ्रष्टाचार का होना
    • दहेज का मिलना
    • सामंतवादी मानसिकता का होना

    सरकारी नौकरियों के इन्हीं आकर्षणों के कारण स्थिति यहां तक है कि इंजीनियरिंग, एमसीए, एमबीए इत्यादि प्रोफेशनल डिग्रीधारी युवा बीटीसी, बीएड करके सरकारी स्कूलों में अध्यापक बनने का भी काम करते हैं। जीवन में संघर्ष व मेहनत से पलायनवादी इन युवाओं के जीवन का अंतिम लक्ष्य महज एक अदद सरकारी नौकरी पाना होता है। सरकारी नौकरी व जेब में पैसा आने के बाद क्रांतिकारिता, विचारशीलता, चिंतनशीलता व सामाजिक सोच तो अपने आप आ ही जाती है। इनको अधिलाभांश के रूप में लीजिए।

    यदि इन आकर्षणों व अधिलाभांशों को हटा दिया जाए तो कोई भी व किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी समकक्ष स्तर के स्व-व्यवसाय की तुलना में कहीं नहीं ठहरती है। लेकिन भारत जैसे अलोकतांत्रिक व सामंती चरित्र के समाज व लोगों वाले देशों में दो-चार या दस-बीस या सौ-पचास किताबें रटकर परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी पाने का सबसे प्रमुख व वास्तविक उद्देश्य समाज व लोगों के संसाधनों के ऐश्वर्य व शक्ति का अनियंत्रित भोग करना होता है।

    चलते-चलते:
    कपिल चौधरी से मेरा लगाव इसलिए है क्योंकि मुरादाबाद के जिस गांव में मैंने शिक्षा के नवीन प्रयोग किए थे, कपिल उस समय मेरे छात्र थे और छठवीं कक्षा में पढ़ते थे, मुझे आजतक नहीं भूले हैं। कपिल का मानना है कि उनके जीवन में सोच बदलने में मेरा भी योगदान रहा है। 

    आप जब भी मेरठ जाएं या आपका कोई मित्र, जानपहचान या रिश्तेदार मेरठ में रहता हो या मेरठ आना-जाना होता हो। आप कपिल चौधरी को एक अवसर अवश्य दें। मेरठ से गुजरने वाले व्यस्त हाईवे में ही उनका अत्याधुनिक व खूबसूरत कैफे है। नीचे दी हुई फोटो में पता व संपर्क दिया हुआ है। फोटो पर क्लिक करने से फोटो बड़ी होकर दिखेगी।

  • लहसुन व जुकीनी के सिरका वाले अचार बनाने की घरेलू विधि

    लहसुन व जुकीनी के सिरका वाले अचार बनाने की घरेलू विधि

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    आज हमने सेब से बने सिरका में लहसुन व जुकीनी के अचार रख दिए। यहां सिडनी में भारतीय दुकानों से खरीदे गए तेल से बनाए गए अचारों के जारों को धो कर, सुखाकर अपने द्वारा बनाए गए सिरका के अचारों में प्रयोग कर लिया। थोड़ा देशी पुट भी हो गया। लहसुन का अचार बहुत आसान है, जुकीनी वाले में कुछ झाम करना पड़ता है। जुकीनी की खोज अमेरिका महाद्वीप में हुई थी। वैज्ञानिकी श्रेणियों के रूप में यह एक फल है लेकिन सब्जियों की तरह प्रयोग किया जाता है। तरोई/तोरी व जुकीनी में अंतर होता है। तरोई को लुफ्फा या चाइनीज ओकरा के नाम से जाना जाता है।

    बाएं- लहसुन, दाएं-जुकीनी

    लहसुन का सिरका वाला अचार:

    लहसुन को छील लें, एक लहसुन की कली को या तो दो टुकड़ों में लंबाई में काट लीजिए या यदि कली छोटी हो तो समूची रहने दीजिए।

    यदि एक कप लहसुन है तो एक तिहाई कप सिरका व दो तिहाई कप पानी में सरसों (थोडा सा कूट लीजिए), नमक, मिर्च पाउडर, शक्कर, सौंफ, मेथी, काली मिर्च इत्यादि अपने स्वादानुसार मिलाकर उबलने तक गर्म कीजिए, गर्म करते समय चम्मच से चलाते भी रहिए ताकि नमक व शक्कर अच्छी तरह से मिल जाए। (लहसुन को इसमें नहीं डालेंगे)

    एक दूसरे पात्र में इतना पानी डालकर उबलने तक गर्म कीजिए कि एक कप लहसुन पूरी तरह डूब जाए। जब पानी उबलने तक गर्म हो जाए तो गैस बंद करके पात्र में लहसुन डाल दीजिए, कुछ मिनट तक लहसुन उसमें पड़ा रहने दीजिए। पानी से लहसुन को निकाल कर कुछ मिनट तक सुखा लीजिए।

    लहसुन को कांच के एक जार में डाल दीजिए, लहसुन डालने के बाद सिरका पानी व मसालों का जो मिक्सचर बनाए थे, उसको डाल दीजिए। जार का मुंह मजबूती से बंद कर दीजिए। जार को कुछ मिनट उल्टा करके रख दीजिए। फिर जार को सीधा करके ठंडा होने तक रख दीजिए। ठंडा होने पर फ्रिज में कुछ दिनों के लिए रख दीजिए।

    जुकीनी का सिरका वाला अचार:

    जुकीनी को छीलकर या बिना छीले जैसे आपकी इच्छा हो, चौड़ाई की ओर से पतले-पतले छल्लों के रूप में काट लीजिए। एक तसले में जुकीनी के छल्लों को रख दें, उन पर नमक छिड़क दें, उछाल-उछाल कर हिलाएं ताकि सभी छल्लों पर नमक पहुंच जाए। अब इसको ढककर लगभग एक घंटे के लिए रख दीजिए।

    एक घंटे बाद आप देखेंगे कि जुकीनी ने नमक के कारण पानी छोड़ा है। जुकीनी के छोड़े हुए पानी को फेंक सकते हैं या यदि आप पीना चाहें तो पी भी सकते हैं (नमक के कारण नमकीन बहुत होगा)। जुकीनी के छल्लों पर जो पानी होगा उसको भी कागज वाले टिशू पेपर से या पेपर टावल से या किसी अन्य विधि से सुखा लें।

    पानी व सिरका के घोल की मात्रा इतना होनी चाहिए कि घोल में जब जुकीनी डाली जाए तब अच्छी तरह डूब जाए, घोल कुछ ऊपर तक भी रहे। पानी व सिरके का अनुपात एक तिहाई सिरका व दो तिहाई पानी होना चाहिए।

    पानी व सिरके के घोल में सरसों (कूटकर), नमक, शक्कर, मिर्च, हींग, हल्दी इत्यादि डालकर उबलने तक गर्म करें, थोड़ी देर उबलनें दें (एक या दो मिनट), चम्मच से चलाते रहें। ठंडा होने दीजिए।

    जुकीनी के छल्लों और इस को अच्छी तरह मिला कर जार में डाल दीजिए। जार को मजबूती से बंद करके कुछ देर तक उल्टा रख दीजिए। फिर कुछ दिनों के लिए फ्रिज में रख दीजिए।

    खाइए व खिलाइए।

  • आचार्य कौटिल्य की विषकन्या

    आचार्य कौटिल्य की विषकन्या

    Rajeshwar Vashistha

    बहुत पुरानी कहानी है
    कहते हैं मेरे जनक थे आचार्य चाणक्य
    अर्थशास्त्र में उन्होंने मेरी संकल्पना की
    ताकि सुरक्षित रहे मौर्य साम्राज्य
    इतना कुटिल था उनका मस्तिष्क
    कि इतिहास उन्हें जानता है
    कौटिल्य के नाम से!

    John Lilith Painting -1887

    मुझे नहीं मालूम
    विवाह किया या नहीं
    उस कुरूप ब्राह्मण ने
    पर इतना कह सकती हूँ
    अवश्य ही मर गई होगी
    उसकी माता
    उसे जन्म देने के तुरंत बाद
    अन्यथा कोई
    इतना स्त्री द्वेषी क्यों होता?

    कहते हैं, लिखा है कल्किपुराण में
    चित्रग्रीव गंधर्व की पत्नी सुलोचना
    सप्रयोजन देखती थी
    जिस भी पुरुष की आँखों में
    तुरंत मर जाता था वह!

    चाणक्य के लिए असम्भव था
    ऐसी अनेक गंधर्व पत्नियों को
    धरती पर खोजना
    जो मोहिनी बन नाश कर दें शत्रुओं का!
    पर उन्हें शत्रुमर्दन के लिए
    आवश्यकता थी किसी ऐसे ही विकल्प की!

    विश्वास करें
    चाणक्य नहीं हो सकते थे किसी पुत्री के पिता
    अन्यथा क्यों यातनामय विषपान कराते
    सुंदर कन्याओं को
    विषकन्या बनाने के लिए!

    इतिहास मौन है इस प्रक्रिया पर
    जिसमें कितनी ही बालिकाएं मर गई होंगी
    विषकन्याएं बनने से पूर्व
    क्या हिसाब रखा होगा मौर्य साम्राज्य ने
    या राजा चंद्रगुप्त ने
    कि कितनी ही कत्ल कर दी गई होंगी
    ज़रा-सा संदेह होने पर
    बस कहानियाँ लिख दी गई
    शुकसप्तति में उन चरित्र हीन औरतों की
    जिन्हें आज भी चटकारे लेकर पढा जाता है!

    क्या विडम्बना है
    ब्रह्मास्त्र कलयुग में आते आते
    बदल गया एक स्त्री के शरीर में
    जिन्हें डर नहीं लगता था
    तीरों और तलवारों से
    वे मेरे साथ भोग कर
    चले जाते थे स्वर्गद्वार
    आश्चर्य है आज भी
    सबसे विनाशकारी बारूद ही
    भरा है स्त्री देह में!

    आचार्य कौटिल्य
    स्त्री के शरीर में विष भरते हुए
    क्यों नहीं सोचा तुमने
    एक पुरुष के क्षुद्र स्वार्थ के लिए
    किसी दूसरे पुरुष की वासना को बेध कर
    तुम नहीं बदल पाओगे स्त्री की प्रकृति
    जन्म नहीं लेतीं विषकन्याएं
    उन्हें तुम बनाते हो!

    Rajeshwar Vashishth

    एक सवाल का बिना उत्तेजित हुए
    उत्तर दो आचार्य
    स्त्रियाँ तो आज भी अमृत बाँट कर
    जीवन वार देती हैं समाज पर
    क्या पुरुष की प्रकृति में
    विधाता ने विष भरा था?

  • माँ

    माँ

    Sarita Bharat

    माँ तुझमें अपना अक्स देखती हूँ  
    सम्पूर्ण एहसास के साथ 
    उतर जाती हूँ तुम्हारे भीतर, 
    अपनी पदचाप की रफ्तार पर सोचती हूँ 
    लोहे की कोख से लोहा जन्मा था बचपन में मरमरी सी देह पर तेल मालिश करती हाथों का स्पर्श महसूसती हूँ!

    Sarita Bharat

    तुम्हारे सीने के दूध की सुगंध आज भी मेरे नथुनों में भर जाती है!
    पालक का साग और बेसन की तरकारी का स्वाद 
    अपनी बनाई सब्जियों में खोजा करती हूँ!

    खुद में ढूंढती हूँ प्रतिबिम्ब तुम्हारा संघर्षों के पड़ाव पर फिर उठ खड़ी होती हूँ
    याद करती हूँ वो दिन माँ!

    जब समाज के झूठे तानों के आगे तनकर खड़ी हो जाती थी तुम
    चट्टान की मानिंद!
    हम बेटियों के लिये भिड़ जाती थी तुम भेड़ियों से!  
    समाज, परिवार और देश की चिंता में एक चिंता एक शब्द चलता रहता है अक्सर भीतर!

    माँ तुमारी धुंधली परछाई अक्सर कुछ करने से पहले कह जाती है!
    माँ, सृष्टि की रचनाकार!
    इस यथार्थ को शब्दों में संजोकर
    काश! रच सकती नया इतिहास!

    मानो शब्दों की खाली पोटलिया आकाश में टँगी है
    और मैं खड़ी सोच रही हूँ!
    कैसे दे पाउंगी माँ शब्द को सार! सिर्फ अपनी पथराई आँखों में देखती हूं अक्स तुम्हारा!
    और फिर संपूर्ण अहसास के साथ उतर जाती हूँ अपने भीतर!

    माँ हर पल प्रेरित होती हूँ
    जिंदगी के भीतर और बाहर के संघर्ष के लिए
    माँ यह सबकुछ तुम्हीं से तो सीखा है!

  • स्त्री यौनिकता को राष्ट्रवाद या आदर्श समाज की कल्पना से जोड़ने के कारक एवं प्रभाव –Sanjay Jothe

    स्त्री यौनिकता को राष्ट्रवाद या आदर्श समाज की कल्पना से जोड़ने के कारक एवं प्रभाव –Sanjay Jothe

    Sanjay Sharman Jothe[divider style=’right’]

    स्त्री यौनिकता पर सत्र था, मौक़ा था यूरोप, एशिया और अफ्रीका में परिवार व्यवस्था में आ रहे बदलाव पर एक कार्यशाला. यूरोप, खासकर सेन्ट्रल यूरोप में परिवार में बढ़ते आजादी के सेन्स और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के बीच एक सीधा संबंध है – डेवेलपमेंट स्टडीज, मनोविज्ञान और सोशियोलोजी ने यह स्थापित कर दिया है. यह एक आधुनिक लेकिन स्थापित सच्चाई है. लेकिन क्या महिलाओं की ‘यौन आजादी’ को भी परिवार में आ रहे परिवर्तन के साथ रखकर देखा जा सकता है? जैसे स्त्री की आर्थिक आजादी का परिवार-व्यवस्था और समाज में में हो रहे बदलाव से संबंध है वैसे ही क्या स्त्री की यौन आजादी से इसका कोई संबंध बन सकता है?

    कुछ औपचारिक शेयरिंग्स और प्रेसेंटेशन के बाद असली मुद्दे लंच टाइम और काफी ब्रेक में निकले. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया, अल्जीरिया, बंगलादेश, भारत और श्रीलंका के रिसर्च-स्कालर्स एकसाथ भोजन पर बैठे. अफगानिस्तान से आये मित्र अपना अनुभव बता रहे थे कि काबुल में उनके अध्ययन और अनुसंधान के दौरान उन्होंने दो महत्वपूर्ण बातें नोट कीं जो स्त्री यौनिकता के बारे में पुरुषों के ख्याल और उसके सामाजिक परिणाम से जुडती हैं.

    अफगान विद्वान् ने बताया कि एक अध्ययन के दौरान अफगान युवकों को पोर्न फिल्मे दिखाई गयीं और उसपर उनकी प्रतिक्रियाएं नोट की गईं. उन्होंने बताया कि आजकल के अफगान युवक ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि सेक्स के दौरान कोई स्त्री कैसे आनंदित हो रही है? उन युवकों में आपस में ये बड़ी चर्चा का विषय बन जाता है कि ये तो पुरुष के आनन्द का विषय है स्त्री को भी इसमें आनंद होता है क्या? अफगान विद्वान् ने कहा कि ये नया बदलाव है.

    सत्तर के दशक में कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं जिनमे तत्कालीन अफगान समाज के युवक सेक्स के दौरान स्त्रीयों के आनंदित होने को आश्चर्य से नहीं देखते थे बल्कि उसे सहज स्वीकार करते थे.

    इस बात पर पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया से आये विद्वानों ने भी सहमती जताई कि ये बदलाव उनके समाज में भी जरुर हुआ है. अब के अफगान, पाक या सीरियाई युवकों में स्त्री की यौनिकता और यौन स्वतन्त्रता को लेकर जो विचार बदले हैं वे असल में इन समाजों के पतन की अचूक सूचना है. अब उनके समाज में स्त्री के मनोविज्ञान, उसकी भावनाओं, उसकी स्वतन्त्रता या उसके अस्तित्व मात्र पर पुरुषों के विचार बहुत नकारात्मक ढंग से बदल गये हैं.

    एक अन्य उदाहरण देते हुए अफगान मित्र ने बात और साफ़ की, आजकल अफगान समाज में एक चलन बढ़ रहा है, हालाँकि अभी भी सीमित है लेकिन धीरे-धीरे बढ़ रहा है. अफगान समाज में कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में अब भाई अपनी बहन की शादी में नहीं जाना चाहते. पिता या चाचा ताऊ या मामा इत्यादि बुजुर्ग लोगों को जाना अनिवार्य है लेकिन वे भी बेमन से उस समारोह में हिस्सा लेते हैं. इसका कारण बताते हुए उन्होंने एक गजब की बात बताई.

    बात ये है कि बहन की शादी में दुल्हे के साथ आये हुए युवक जिस तरह से नाचते गाते और अपनी मर्दानगी या अधिकार का प्रदर्शन करते हैं वो दुल्हन के भाई या पिता के लिए बहुत अपमानजनक होता है. दूल्हे के साथ आई पूरी टोली अपने आप को दुल्हा समझती है और उनकी नजरों से, हाथों के इशारे से, चेहरे के हाव भाव से वे बस सेक्स के इशारे और सेक्स से जुड़े मजाक करते रहते हैं, जैसे कि पूरी टोली किसी सामूहिक सुहागरात के लिए आयी हो. ये सब देखना कम से कम दुल्हन के भाई के लिए बहुत अपमानजनक होता है. इसलिए आजकल कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में बहन की शादी में अफगान युवकों के नदारद हो जाने का चलन बढ़ रहा है.

    लेकिन मजे की बात ये है कि ये ही भाई, चाचा ताऊ और मामा लोग जब अपने परिवार या कबीले के पुरुष की शादी में जाते हैं तो वो सारी नंगाई करते हैं जिससे खुद उन्हें चिढ होती है. मतलब ये कि उनके बहन या बेटी की शादी में जो चीजें उन्हें शर्मिन्दा करती हैं वही चीजें उनके पुरुष दोस्त या पुरुष रिश्तेदार की शादी के दौरान मर्दानगी दिखाने का हथियार बन जाती हैं.

    अब गौर कीजिये इन तीन घटनाओं में सीधा संबंध है. पोर्न देखते हुए अफगान युवकों का स्त्री के आनंदित होने पर आश्चर्य व्यक्त करना और अपनी बहन के विवाह में गुलच्छर्रे उड़ा रही बरात के सामने खुद को अपमानित महसूस करना और इसी तरह की बारात में कभी खुद शामिल होकर नंगाई के नाच करने में आनंद लेना – ये मूल रूप से उनके समाज में स्त्री पुरुष संबंधों के पतन सहित स्वयं उस समाज के सभ्यतागत और नैतिक पतन का सबूत है.

    सत्तर के दशक में अफगान बाड़े में सोवियत-अमेरिकी सांडों की लड़ाई के पहले और धार्मिक आतंक के भूत के प्रवेश के पहले जो अफगान समाज था वो एकदम भिन्न था. तब स्त्रीयां स्कर्ट या जींस पहनकर विश्वविद्यालयों में पढ़ती थीं या स्मोक कर सकती थीं. तब लड़कियों के म्यूजिक बैण्ड भी हुआ करते थे. समाज में प्रेम संबंध और मित्रता बहुत आसान थी. आज के अफगानिस्तान में अब लड़का लड़की आपस में बात करना तो दूर एक दुसरे की तरफ देख भी नहीं सकते. पर्दा और बुर्का लगभग औरत की चमड़ी ही बन गये हैं, उन्हें हटाना मुश्किल है. स्त्रीयां खुद अपनी गुलामी के बारे में कोई विचार बना पाने में सक्षम नहीं रह गयी हैं.

    जब अफगान और पाक विद्वानों ने भारत के पिछले कुछ सालों में घटी घटनाओं पर टिप्पणी की तो उन्होंने जोर देकर कहा कि बॉस भारत का समाज भी अफघानिस्तान सीरिया होने की तरफ बढ़ रहा है. जिस तरह से स्त्रीयों को पर्दा, नैतिकता, सच्चरित्रता आदि का पाठ पढाया जा रहा है और जिस तरह से स्त्री पुरुष संबंधों और स्त्रीयों की आजादी को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है, ठीक वैसा ही अफगानिस्तान पाकिस्तान में धार्मिक आतंक के भूत के उभार के दौरान हुआ था.

    ख़ास तौर से जब स्त्री के चरित्र से जुड़े मुद्दे, स्त्री की यौनिकता के नियन्त्रण से जुडी रणनीति अगर आपके राष्ट्रवाद से या आदर्श  समाज की कल्पना से जुड़ने लगें तो समझ लीजिये कि आपका समाज एक गहरे खतरे की तरफ बढ़ रहा है. अगर ये अगले पांच दस सालों में नहीं रुका तो आपके समाज में अफगानिस्तान और सीरिया का जन्म होने वाला है.

  • अति दुर्लभ 233 वर्ष पुराने “बौल्टन व वाट इंजन” के फोटो : दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन

    अति दुर्लभ 233 वर्ष पुराने “बौल्टन व वाट इंजन” के फोटो : दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन

    Vivek Umrao Glendenning “सामाजिक यायावर”

    “बौल्टन व वाट इंजन” दुनिया का सबसे पुराना रोटेटिव सिस्टम इंजन है। इस इंजन को स्कॉटलैंड के इंजीनियर जेम्स वाट ने डिजाइन किया था, जिसे उनके व्यापारी सहयोगी मैथ्यू बौल्टन के सहयोग से बनाया गया था। इसीलिए इस इंजन का नाम “बौल्टन व वाट इंजन” रखा गया। “बौल्टन व वाट इंजन” दुनिया के पहले सफल इंजन थे जो ऊर्जा पैदा करते थे तथा जिनका कामर्शियली प्रयोग किया गया। ये इंजन हवा, पानी या मानवश्रम से नहीं चलते थे। 

    लेख में जिस अति-दुर्लभ “बौल्टन व वाट इंजन” के चित्र हैं वह इंजन पहली बार लंदन की एक फैक्ट्री में 1785 में प्रयोग किया जाना शुरू किया गया। इस इंजन ने लंदन की फैक्ट्री में लगभग 102 वर्ष तक काम किया। इसके पश्चात यह इंजन यादगार के रूप में आस्ट्रेलिया भेज दिया गया। आगे चलकर सन् 1988 में यह इंजन सिडनी के पावरहाउस संग्रहालय में स्थापित किया गया।

    सिडनी पावरहाउस संग्रहालय विश्व के बेहतरीन विज्ञान व तकनीक संग्रहालयों में आता है। इस संग्रहालय को ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया के संस्थापक व मुख्य संपादक विवेक उमराव “सामाजिक यायावर” की पत्नी के पिता, जो विश्व में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट्स के रूप में जाने जाते हैं, ने डिजाइन किया था।

    (फोटो को बड़े आकार में देखने के लिए फोटो पर क्लिक कीजिए)

    Vivek’s life-partner and his son with Boulton and Watt Engine 1775

  • जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    जाति-व्यवस्था बनाम सोने की चिड़िया वाला सामाजिक-समृद्ध भारत

    मित्र : भारत में ऐसी मान्यता है कि भारत शताब्दियों पहले इतना अमीर था कि सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस मुद्दे पर आपका क्या मत है? 

    नोमेड : भारत में बहुत ऐसी मान्यताएं हैं जिनमें शताब्दियों पहले भारत दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश था। मान्यताओं का क्या, जो भी प्रयोजित कर दिया जाए वही मान्यता बन जाती है। जिस भारत में कुल जनसंख्या के पाँच मे से चार हिस्सों को शिक्षा, समाज के लिए सोचने-विचारने, अभिव्यक्ति, मानव के रूप में प्रकृति से सहज भाव से प्राप्त मौलिक अधिकार आदि भी न रहे हों; वहाँ मान्यताएं क्या कहतीं हैं से क्या फर्क पड़ता है। मेरा मानना है कि भारतीय समाज में इतिहास व मान्यताओं के नाम पर अपवाद छोड़कर जो भी है, वह लगभग सब कुछ प्रायोजित ही है और सामाजिक-कपट व ढोंग के साथ प्रायोजित है। प्रायोजित तर्कों से ऊपर उठकर यदि सामाजिक प्रतिबद्धता व ईमानदारी से सोचिए, तो आप मेरे विश्लेषण कि जाति-व्यवस्था के होते हुए भारत के आर्थिक विकास व समृद्धि की कल्पना ही असंभव और अव्याहारिक है, से सहमत होगें।


    भारत के सैकड़ों जिलों के हजारों गाँवों के लाखों लोगों से संवाद करके उनको जीवन जीते देख कर, उनके विकास के लिए उनके ही जैसे होकर धरातलीय कार्यों को करते हुए, जो समझ व अनुभव हुए उनसे मैं इन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचता हूँ। समाज के लोगों की वास्तविक जीवन-शैली, मान्यताओं, जीवन-मूल्यों और दर्शन आदि में भारी अंतर दिखता है। क्या आपको नहीं लगता कि भारत के लोग दोहरे चरित्र के होते हैं। उनकी कथनी, करनी व प्रस्तुतीकरण आदि में भयंकर व विरोधात्मक अंतर होता है। कभी-कभी तो विपरीत ध्रुवों जैसा अंतर होता है।


    मित्र : जी बिलकुल लगता है?

    नोमेड : क्योंकर लगता है, आपको?


    मित्र : जीवन को उनके साथ जीने की प्रक्रिया में स्पष्ट अनुभव होता है, इसलिए लगता है।

    नोमेड : सबको तो नहीं लगता है, आपको ही क्योंकर लगता है?


    मित्र : संभवतः मैं कारकों को देखने की चेष्टा करता हूं, इसलिए लगता है।

    नोमेड : संभवतः नहीं। यही यथार्थ है कि चूंकि आप कारकों को देखने की चेष्टा करते हैं या कारकों को समझना चाहते हैं, इसलिए आपको दिखना शुरु हो जाता है। वैसे ही मुझे भी जीवन जीने की प्रक्रिया में अनुभव होता है। मेरी व आपकी दृष्टि व समझ में अंतर सिर्फ मात्रा, गुणवत्ता व चरित्र आदि का हो सकता है। 


    मित्र : आप क्या मानते हैं कि भारत कभी सोने की चिड़िया रहा होगा?

    नोमेड : जी बिलकुल मानता हूँ कि भारत सोने की चिड़िया नहीं, सोने का डायनासोर रहा होगा। 


    मित्र : इसका मतलब भारत का समाज बहुत समृद्ध रहा होगा।

    नोमेड : बिलकुल नहीं।


    मित्र : ऐसा कैसे हो सकता है?

    नोमेड : क्यों नहीं हो सकता है। आज भारत में कुछ लोग बहुत अमीर हैं, दुनिया भर के ऐशोआराम में हैं, लेकिन समाज की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग पौष्टिक भोजन, अच्छे कपड़े व सामान्य स्तर का घर तक नहीं पाती है। 


    मित्र : जी सहमत हूँ, लेकिन तब भी ऐसा ही अंतर रहा होगा, ऐसा क्योंकर हो सकता है?

    नोमेड : तब तो और भी वीभत्स अंतर रहा होगा। अब तो जाति-व्यवस्था का अपवाद स्वरूप ही सही किंतु कुछ क्षय हो रहा है, तब तो जाति-व्यवस्था ही समाज व अर्थ-शास्त्र का मूल-आधार थी।


    मित्र : जी।

    नोमेड : दरअसल यदि भारत कभी भी समाज के रूप में समृद्ध समाज रहा होगा तो उसके कुछ अवशेष तो दिखने ही चाहिए। एक ऐसा समाज, जिसमे समाज की कुल जनसंख्या के बहुत बड़े प्रतिशत भाग को वैज्ञानिक प्रयोगों, आर्थिक व्यवस्था प्रयोगों, शोधों व प्रबंधनों को करने की बात तो छोड़िए खुद के परिश्रम के द्वारा उत्पादित संपत्ति पर ही अधिकार नहीं रहा हो, सामान्य जानकारियों को प्राप्त करने की शिक्षा का भी अधिकार नहीं रहा हो, अपने व अपने परिवार के विकास व प्रगति आदि के संदर्भ में विचार करने व अपने मन की बात की अभिव्यक्ति का अधिकार तक नहीं रहा हो, ऐसा समाज समृद्ध हो सकता है, इसका प्रश्न का ही कोई औचित्य नहीं है और आप समाज की समृद्धि की प्रासंगिकता की बात करना चाह रहे हैं।


    मित्र : अभी आप ही ने कहा कि भारत सोने की चिड़िया क्या डायनासोर रहा होगा। आपके ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है?

    नोमेड : दरअसल भारत की अर्थव्यवस्था का आधार समाज में अच्छी अर्थ-व्यवस्था या संसाधनों का बेहतर प्रबंधन या वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि नहीं था। यदि होता तो अवशेष दिखाई पड़ते जैसे अन्य तत्वों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं। अवशेष न भी दिखाई देते तो परंपराएं दिखाई पड़तीं, जैसे अन्य तत्वों की परंपराएं दिखाईं पड़ती हैं, भले ही विकृत रूप में दिखाई पड़तीं। 


    जाति-व्यवस्था के कारण शूद्र को दासों की तरह आजीवन लगातार परिश्रम करके उत्पादन करना पड़ता था और परिश्रम करके उत्पादित संपत्ति के एवज में पशुओं की तरह घिसटकर जी लेने लायक सामग्री ही प्राप्त होती थी; ताकि परिश्रम करने वाले दासों की संख्या कम न हो जाए। जाति-व्यवस्था के कारण व्यापार का अधिकार केवल व्यापारी वर्ग को रहा। इन सब तत्वों को जोड़कर देखने से यह मालूम होता है कि व्यापारी को किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं थी और उत्पादन के लिए व्यापारी को नगण्य के बराबर निवेश करना पड़ता था। इस तरह परंपरा में व्यापारी जाति-व्यवस्था के कारण बिना कुछ किए ही दूसरों के परिश्रम के उत्पादन से बैठे-बैठे व्यक्तिगत लाभ कमाने की अवस्था में रहा है। इस प्रकार के व्यापार से केवल व्यापारी और राज-सत्ताओं का ही लाभ हुआ। 


    शूद्र उत्पादन करता रहा और व्यापारी और राज-सत्ताएं शूद्र के आजीवन व अनवरत अवैतनिक-परिश्रम से भरपूर ऐश करतीं रहीं। इसीलिए भारत में व्यापारियों ने विज्ञान-तकनीक, शोध व मौलिक सोच आदि को प्रोत्साहित करने के बजाय कुंठित ही किया, ताकि दूसरों के परिश्रम के द्वारा भरपूर लाभ बटोरा जा सके। भारत के उद्योपतियों व व्यापारियों की मानसिकता आज भी ऐसी ही है। इसीलिए ये लोग पूरी निर्दयता, निरंकुशता व दृष्टिहीनता के साथ भारत के लोगों के परिश्रम व सामाजिक संसाधनो को कब्जाने व सभी स्तरों पर शोषणों के द्वारा अर्जित लाभ की तकनीक पर ही व्यापार करते हैं।

    लाभ का बटवारा व्यापारी-वर्ग व राज-सत्ताओं के मध्य होने की परंपरा आज भी वैसे की वैसी ही है। आम-आदमी के परिश्रम की उपेक्षा तब भी थी और आज भी है; आम-आदमी के हाथों में संसाधनों व उसके द्वारा अर्जित संपत्ति का अधिकार व नियंत्रण तब भी नहीं था और आज भी नहीं है। पहले जो केवल शूद्रों के साथ होता था, आज पूरे आम-समाज के लोगों के साथ हो रहा है, यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो आज की स्थितियाँ और अधिक भयावह हैं और इन सबकी वीभत्सता व भयावहता आदि का आधार जाति-व्यवस्था ही है। यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो समाज की मानसिकता व अनुकूलन ऐसा नहीं होता, जिनके कारण ऐसी भयावह परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी हैं। 


    मित्र : बहुत विचारक किस्म के लोगों से सुनता हूँ कि अंग्रेजो के पहले भारत के लोगों की स्थितियाँ बिलकुल ही भिन्न थीं। भारत के लोग बहुत समृद्ध थे और भारत के गाँवो में स्वावलंबन की बहुत ही अद्वितीय व्यवस्था थी। अंग्रजों ने भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़ दिया ताकि विश्व में भारत की महानता नहीं सिद्ध हो सके।

    नोमेड : बिलकुल सही सुनते हैं आप, मैं भी यही सुनता आया हूँ। 


    मित्र : आपके क्या विचार हैं, इन सब मान्यताओं के बारे में?

    नोमेड : आधारहीन मान्यताएं हैं।


    मित्र : कैसे?

    नोमेड : इन मान्यताओं को मानते ही, यह मानना पड़ेगा कि भारत के प्रत्येक गाँव में अधिकतर लोगों के घर समृद्ध थे और सुविधाओं से संपन्न थे। मैंने भारत के लगभग पचास हजार छोटे-बड़े गाँवों को देखा है, खुद भी ग्रामीण परिवेश से हूँ, लगभग दो दशकों से भारत के अतिपिछड़े गाँवों के लिए धरातलीय काम कर रहा हूँ। गाँव में जमींदारों, लंबरदारों, व्यापारियों व राज-सत्ता के चाटुकारों आदि के अलावा किसके पास समृद्धि व सुविधा थी? लुहार, बढ़ई, माली, कहार आदि परंपरा में सैकड़ों वर्षों तक पीढ़ी दर पीढ़ी वही काम करते हुए भी कभी भी दो-जून की रोटी, जैसे तैसे तन ढकने वाले मांगकर लाए गए कपड़ों के टुकड़ों व जमींदार के तालाबों से खोद कर लाई गई मिट्टी के छोटे-छोटे घरों आदि से ऊपर न उठ पाए।


    जिस समाज में लोगों को पेट भरने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों में बड़े लोगों द्वारा अपनी खाई हुई पत्तलों में अपना जूठा खाना इसलिए छोड़ने की घिनौनी परंपरा बनाई गई कि भूखे पेट लोग उस बचे-खुचे जूठे खाने को खाकर जूठा खाना छोड़ने वाले की उदारता के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे और अवसर पड़ने पर उसके लिए बेगार करेंगे; ऐसी परंपराएं शोषित वर्ग के लोगों का आत्मविश्वास तोड़ने व अंतःमन में शोषण को ईश्वरीय प्रयोजन व अपने जीवन की नियति स्वीकारने के लिए बनाईं गईं। उनको सुंदर शाब्दिक तर्को से गढ़ा हुआ कृत्रिम किंतु सुंदर आवरण चढ़ा कर ढक दिया गया। स्वावलंबन व सुसंस्कृत संस्कृति की अजीबोगरीब कसौटियाँ और मानदंड हैं, जहाँ घोर अमानवीयता को भी निर्लज्जता के साथ महानता व संवेदनशीलता परिभाषित कर दिया जाता है।

    लुहार का बेटा लुहार, बढ़ई का बेटा बढ़ई, माली का बेटा माली, कहार का बेटा कहार आदि आदि का तथाकथित स्वावलंबन भीषण शोषण व दया पर आधारित था, न कि व्यवस्थित आर्थिक व्यवस्था पर। लुहार का बेटा सुनार नहीं बन सकता, सुनार का बेटा लुहार नहीं बन सकता। शोध, विकास व नई तकनीक आदि की दूर-दूर तक कोई भी संभावनाएं नहीं। जो है, जैसा है उसी को उटपटांग तरीके से या सुलझे हुए तरीके से आगे बढ़ाना।


    ऐसे इतने कुंठित व परतंत्र तंत्र को स्वावलंबन की अद्वितीय व्यवस्था कहा व सिद्ध किया जाता है। दरअसल जाति-व्यवस्था जन्म आधारित दास-व्यवस्था थी। लेकिन इसको कर्म-आधारित व्यवस्था मानने के मिथक को सही मान लिया गया है। इसे सही मानने के पीछे अनेकानेक निहित स्वार्थ, सामाजिक-कपट व दुर्भावनाएं पोषित होती हैं। किंतु यदि संवेदनशीलता, जातिगत दुर्भावना से ऊपर उठकर, सामाजिक-ईमानदारी व जीवन-मूल्यों के आधार पर विश्लेषण कीजिए, आपको समतामूलक स्वावलंबन कही नहीं दिखेगा। 


    यदि आपके द्वारा उद्धृत विचारक किस्म के लोगों की मान्यताएं मान ली जाएं तो यह भी मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने हर गाँव में सैकड़ों सुविधा-संपन्न व समृद्ध घरों को उजाड़ कर खेती की लहलहाती जमीन को ऐसे बदल दिया मानो वहाँ कभी कुछ था ही नहीं और गाँवों में सुअर के गंदे बाड़ों जैसी मलिन-बस्तियाँ बना दीं। यदि अंग्रेजों के पास आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व भवनों को नष्ट करके उपजाऊ भूमि में बदलने की इतनी उन्नत तकनीक थी। तो आज हमें उनकी उस जमाने की इस अद्वितीय तकनीक को सीखने की जरूरत है क्योंकि भारत की आजादी के बाद जिस तरह से कृषि भूमि के विकास के नाम पर अधिग्रहण करके कंक्रीट के जंगल खड़े किए हैं; वह भी बिना किसी खास प्रयोग व प्रयोजन के। उनको तोड़ कर उपजाऊ कृषि भूमि में बदल कर देश के लोगों के सामने सुरसा जैसे मुँह बाए खड़ी खाद्य व भूजल की भयावह समस्या को हल करने की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता के रूप में है।   


    यदि कभी वास्तव में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता होगा, तो मैं इसका सिर्फ यह मतलब निकालता हूँ कि उस समय भारत के व्यापारियों व राजाओं आदि के पास खूब संपत्ति रही होगी। चूंकि भारत में सैकड़ों राज्य होते थे, जिनमें राजा, प्रधानमंत्री, दीवान, मंत्री, सेनापति, रिश्तेदार व चाटुकार आदि होते थे। राज्यों में व्यापारी होते थे। इसलिए समाज की अधिसंख्य जनसंख्या के शोषित होने के बावजूद, भारत सोने की चिड़िया लगा करता होगा। यदि वास्तव में भारत सोने की चिड़िया कहलाने लायक जैसा समृद्ध होता तो समाज की समृद्धि के अवशेष समाज की परंपराओं में मिलते। 


    कोई भी समाज जो सांस्कृतिक व आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, वह अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों का शोषण बर्बरता से नहीं करता है और न ही खुद अपने ही समाज के अधिसंख्य लोगों से विद्रूपता के साथ घृणा ही करता है।

    पुस्तक “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” से लिया गया लेख (सामाजिक यायावर ‘विवेक उमराव’ द्वारा लिखित यह पुस्तक प्रकाशन के ग्यारह महीने में ही पुनःमुद्रित करनी पड़ी थी)

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

    —————

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • पदार्थवादी मानसिकता से जूझता युवा एवं उसकी समस्याएं

    पदार्थवादी मानसिकता से जूझता युवा एवं उसकी समस्याएं

    Ramanand Sharma[divider style=’right’]

    आज की युगल जोड़ी एक बहुत बड़ी संक्रामक बीमारी से जूझ रही है , वह कुछ इस प्रकार है की आज के समय में नव युवक/युवती  स्वयं को तब तक अधूरा  समझते  है जब तक लड़का  किसी लड़की के साथ प्रेम  संबंध में नहीं आ जाता है या लड़की किसी लड़के के साथ प्रेम सम्बन्ध में नहीं आ जाती है , चलिए ठीक है कुछ लोगो ने कहा की जीवन में लड़की होंने से हम बहुत कुछ सीखते है, कई ऐसी बाते जो हम किसी से नहीं कह पाते है उससे कहकर मन हल्का कर लेते है , अर्थात आप के लिए वो एक कैफीन है जो आपको रिलैक्स होने में मदद करती है.

    मेरा विचार कुछ अलग है , मेरा मानना है व्यक्ति स्वयं में पूर्ण है, ये मीडिया और बॉलीवुड है जो नवयुवको के दिमाग  पर एक परत बना रहा है कि  लड़का तब तक अधूरा  है जब तक वह किसी लड़की के साथ नहीं है या लड़की किसी लड़के के साथ नहीं  है ।

    इससे भी भयावह स्थिति से आपको रुबरू कराता हूँ  मेरा मानना है भूत केवल भ्रम है जो खोखला होता है लेकिन कुछ बुद्धजीवियो ऐसे है जो कहते है भूत सत्य है वह आज भी भूत को सत्य मानकर वर्तमान में जी रहे है, ये वही लोग है जिनके बुद्धि में जीव पड़े होते है इनका मनना होता है की अगर मेरा एक हाथ टूट गया या मेरे साथ कुछ नकारात्मक घटना घटित हो गई तो मेरा मेरा जीवन यही खत्म हो जाता है और वर्तमान से भविष्य तक के सफ़र में स्वयं को कोसते रहते है, जबकि ये कर्लोय तकच्स जैसे लोगो को भूल जाते है जिनका दाया हाथ जिससे वो शूटिंग करते थे वो खराब हो जाता है लेकिन वह व्यक्ति हार नहीं मानता और तदन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है और अपने बाये हाथ को शूटिंग हैण्ड बना लेता है और 2 बार अपने केवल एक हाथ के दम पर ओलिंपिक विजेता बनता है, व्यक्ति में अगर इच्छा हो कुछ कर गुजरने की तो वह नकारात्मक से नकारात्मक परिस्थिति में अच्छा कर गुजरता है ।

    आप को एक और मजेदार बात बताते है, आज कल क्या हो रहा है की युगल जोड़ी बनती है दोनों पक्षों में बहुत उर्जा रहती है, और उनके संबंधों में जीने की तो छोड़िये मरने के बाद अगले जन्म में साथ रहने के वादे हो जाते है, लड़की एवं लड़का एक दूसरे के साथ काफी वक्त बिताते है काफी बार दिन दिन भर साथ रहना, खाना, घूमना अर्थात दिन भर की अनेक क्रिया साथ होती है अवमूनन 24 घंटे में 8 घंटे एक दूसरे को देते है,  और साल छह महीने बाद सुनने में क्या आता है!!

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]दोनों पक्षों में कोई एक कहता है ,मै तुमको समझ नहीं पाई या पाया you deserve better!!  यह हम किस समाज की ओर बढ़ रहे है जहा रिश्तों की कोई अहमियत नहीं है एक पक्ष को आनंद नही आ रहा तो वह समाधान की ओर न बढ़कर यह कह देता है,  you deserve better!! अर्थात व्यक्ति, व्यक्ति के लिए वस्तु मात्र बन कर रह गया है, आजकल जब उन मित्रो को देखता हूँ जो इस बीमारी से जूझ रहे है तो मन में यही बात आती है की उन मैडम या सर से बोल दू if he or she deserve better तब वो तुम्हारे साथ दिन दिन भर चैट क्यों करता, अपनी क्लासेज क्यों मिस करता, रात में खाना खाने से पहले तुमसे क्यों पूछता, तुम्हारे साथ जीने मरने की कसमे क्यों खाता, तुम्हारे साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपने क्यों देखता या देखती।। बहुत विचारणीय बिंदु है विचार कीजियेगा ।। यह घटना अधितर ग्रेजुएशन काल में घटित होती है जब लोग कॉलेज में होते है, जब वे अपने कैरियर को दिशा दे रहे होते है और इस बीमारी के वजह से विधार्थी अपने ग्रेजुएशन में अच्छा प्रदर्शन नही कर पाता है और जूलॉजी इंजीनियरिंग और विषय विशेष में पढने के बाद भी उसे उस विषय का ज्ञान नही रहता है और वह जनरल एग्जाम की तैयारी में लग जाता है। [/content_container]

    लोग 2000km से पढने आते है, माँ बाप मजदूरी करके दो रोटी कम खा के पैसा बचाते है और बच्चे को भेजते जिससे उसे कोई दिक्कत ना हो ,और विधार्थी देल्ही (शहर) की चकाचौक और बॉलीवुड की काल्पनिक दुनिया में उलझा रहता है और जब चेतता है तो कई ऐसे होते है जो बहुत कुछ अच्छा कर जाते है लेकिन अधिकांश लोगो के लिए समय जा चुका होता है ।।
    अगर हर विधार्थी यह सोचे की वह इतना दूर से क्यों आया है! और माँ बाप किस तरीके से पैसा भेज रहे है ! तो मुझे लगता है सभी सुपथ पर रहेंगे और बेहतर से बेहतर आयाम हम अपने राष्ट्र को दे सकेंगे।।
    नोट:- sucide रेट के बढ़ने में इस बीमारी का बहुत बड़ा योगदान रहा है, यह कथन एमिल दुर्खेइम साहब ने नही कहा है, इसे मै अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ ।।