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पदार्थवादी मानसिकता से जूझता युवा एवं उसकी समस्याएं

Ramanand Sharma

आज की युगल जोड़ी एक बहुत बड़ी संक्रामक बीमारी से जूझ रही है , वह कुछ इस प्रकार है की आज के समय में नव युवक/युवती  स्वयं को तब तक अधूरा  समझते  है जब तक लड़का  किसी लड़की के साथ प्रेम  संबंध में नहीं आ जाता है या लड़की किसी लड़के के साथ प्रेम सम्बन्ध में नहीं आ जाती है , चलिए ठीक है कुछ लोगो ने कहा की जीवन में लड़की होंने से हम बहुत कुछ सीखते है, कई ऐसी बाते जो हम किसी से नहीं कह पाते है उससे कहकर मन हल्का कर लेते है , अर्थात आप के लिए वो एक कैफीन है जो आपको रिलैक्स होने में मदद करती है.

मेरा विचार कुछ अलग है , मेरा मानना है व्यक्ति स्वयं में पूर्ण है, ये मीडिया और बॉलीवुड है जो नवयुवको के दिमाग  पर एक परत बना रहा है कि  लड़का तब तक अधूरा  है जब तक वह किसी लड़की के साथ नहीं है या लड़की किसी लड़के के साथ नहीं  है ।

इससे भी भयावह स्थिति से आपको रुबरू कराता हूँ  मेरा मानना है भूत केवल भ्रम है जो खोखला होता है लेकिन कुछ बुद्धजीवियो ऐसे है जो कहते है भूत सत्य है वह आज भी भूत को सत्य मानकर वर्तमान में जी रहे है, ये वही लोग है जिनके बुद्धि में जीव पड़े होते है इनका मनना होता है की अगर मेरा एक हाथ टूट गया या मेरे साथ कुछ नकारात्मक घटना घटित हो गई तो मेरा मेरा जीवन यही खत्म हो जाता है और वर्तमान से भविष्य तक के सफ़र में स्वयं को कोसते रहते है, जबकि ये कर्लोय तकच्स जैसे लोगो को भूल जाते है जिनका दाया हाथ जिससे वो शूटिंग करते थे वो खराब हो जाता है लेकिन वह व्यक्ति हार नहीं मानता और तदन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है और अपने बाये हाथ को शूटिंग हैण्ड बना लेता है और 2 बार अपने केवल एक हाथ के दम पर ओलिंपिक विजेता बनता है, व्यक्ति में अगर इच्छा हो कुछ कर गुजरने की तो वह नकारात्मक से नकारात्मक परिस्थिति में अच्छा कर गुजरता है ।

आप को एक और मजेदार बात बताते है, आज कल क्या हो रहा है की युगल जोड़ी बनती है दोनों पक्षों में बहुत उर्जा रहती है, और उनके संबंधों में जीने की तो छोड़िये मरने के बाद अगले जन्म में साथ रहने के वादे हो जाते है, लड़की एवं लड़का एक दूसरे के साथ काफी वक्त बिताते है काफी बार दिन दिन भर साथ रहना, खाना, घूमना अर्थात दिन भर की अनेक क्रिया साथ होती है अवमूनन 24 घंटे में 8 घंटे एक दूसरे को देते है,  और साल छह महीने बाद सुनने में क्या आता है!!

दोनों पक्षों में कोई एक कहता है ,मै तुमको समझ नहीं पाई या पाया you deserve better!!  यह हम किस समाज की ओर बढ़ रहे है जहा रिश्तों की कोई अहमियत नहीं है एक पक्ष को आनंद नही आ रहा तो वह समाधान की ओर न बढ़कर यह कह देता है,  you deserve better!! अर्थात व्यक्ति, व्यक्ति के लिए वस्तु मात्र बन कर रह गया है, आजकल जब उन मित्रो को देखता हूँ जो इस बीमारी से जूझ रहे है तो मन में यही बात आती है की उन मैडम या सर से बोल दू if he or she deserve better तब वो तुम्हारे साथ दिन दिन भर चैट क्यों करता, अपनी क्लासेज क्यों मिस करता, रात में खाना खाने से पहले तुमसे क्यों पूछता, तुम्हारे साथ जीने मरने की कसमे क्यों खाता, तुम्हारे साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपने क्यों देखता या देखती।। बहुत विचारणीय बिंदु है विचार कीजियेगा ।। यह घटना अधितर ग्रेजुएशन काल में घटित होती है जब लोग कॉलेज में होते है, जब वे अपने कैरियर को दिशा दे रहे होते है और इस बीमारी के वजह से विधार्थी अपने ग्रेजुएशन में अच्छा प्रदर्शन नही कर पाता है और जूलॉजी इंजीनियरिंग और विषय विशेष में पढने के बाद भी उसे उस विषय का ज्ञान नही रहता है और वह जनरल एग्जाम की तैयारी में लग जाता है। 

लोग 2000km से पढने आते है, माँ बाप मजदूरी करके दो रोटी कम खा के पैसा बचाते है और बच्चे को भेजते जिससे उसे कोई दिक्कत ना हो ,और विधार्थी देल्ही (शहर) की चकाचौक और बॉलीवुड की काल्पनिक दुनिया में उलझा रहता है और जब चेतता है तो कई ऐसे होते है जो बहुत कुछ अच्छा कर जाते है लेकिन अधिकांश लोगो के लिए समय जा चुका होता है ।।
अगर हर विधार्थी यह सोचे की वह इतना दूर से क्यों आया है! और माँ बाप किस तरीके से पैसा भेज रहे है ! तो मुझे लगता है सभी सुपथ पर रहेंगे और बेहतर से बेहतर आयाम हम अपने राष्ट्र को दे सकेंगे।।
नोट:- sucide रेट के बढ़ने में इस बीमारी का बहुत बड़ा योगदान रहा है, यह कथन एमिल दुर्खेइम साहब ने नही कहा है, इसे मै अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ ।।

 

 

 

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