भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

Kumar Vikram
Editor, National Book Trust, NBT

पहले भी हमारी उनपर कोई ख़ास आस्था नहीं थी
बल्कि हम उनपर हँसा ही करते थे
मानो समाज के उच्च आदर्शों के तार तार हो रहे लिबास पर
अपनी असहायता को ढकने के लिए अपनी शर्मिंदगी छिपा रहे हों
जब मीडिया सभाओं भाषणों अख़बारों
स्कूली कक्षाओं के वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में
हम उनसे अकसर टकराते रहते थे

'युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं
टकराव का हल बातचीत से निकलना चाहिए'
'आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता'
'परिस्थितियां कैसी भी हो किसी भी नागरिक को
क़ानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है'
' मेरे उनसे वैचारिक मतभेद ज़रूर थे
पर उनकी मृत्यु मेरे अंदर एक ख़ालीपन छोड़ गई है'
'पड़ोसी देशों के साथ हमारे राजनैतिक मतभेद भले ही हों
हमें अपनी साझी सांस्कृतिक विरासत को नहीं भूलना चाहिए'
'कर्म करो फल की चिंता न करो' आदि 

पर अब जब सारे मुखौटे टूट कर गिर गए हैं
हम इन रटे रटाए शब्दों को सुनने को तरस गए हैं
मानो मन में एक कसक सी रहती है
कि पुराने जमाने के कुछ जुमले
भ्रम स्वरूप ही जीवन में बचे रहने चाहिए
ताकि मनुष्य की बची हुई मनुष्यता के बचने की
संभावना थोड़ी बची रहे
शायद कुछ वैसे ही
जैसे टूटती खंडहरों को समाज बचाकर रखता है
जहाँ स्कूली बच्चे पिकनिक के लिए ले जाए जाते हैं
और रटी रटाई ऐतिहासिक जुमलों के सहारे
गाइड उन्हें इतिहास बोध करवाता है

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