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  • प्रेम – असहमति

    प्रेम – असहमति

    Mukesh Kumar Sinha

    असहमतियां
    नही होती
    हर समय
    सहमति का विपरीत

    असहमति
    कई बार
    बस ये जताने के लिए भी
    होती है
    कि समझ पाए अहमियत ।

    विरोध
    वक़्त बेवक्त
    किया जाता है
    सबसे अपनों का

    विरोध
    में छिपा होता है
    सुझाव
    कि समझा करो
    या, ऐसे तो समझोगे न !

    प्रेम
    में भी कई बार
    करना पड़ता है
    ‘न’ का सामना

    प्रेम
    का उत्सव सरीखा
    किस डे/ हग डे
    में असहमतियां
    झिझक भी हो सकती है
    जो, प्रेम का विरोध तो नहीं

    प्रेम
    में बहते हुए
    प्रोमिस डे के दिन कहना
    कि प्रोमिस करो
    प्रेम करते रहोगे न
    शायद उम्मीदों का गुलाब ही तो है

    Mukesh Kumar Sinha

    प्रेम
    कितना चॉकलेटी होता है न
    तभी तो
    चुप्पियां सहमति समझी जाती है
    फिर भी चिल्ल्ला कर
    जताना चाहते हैं प्रेम

    प्रेम सिक्त नजरें
    मौन हो कर भी
    बता देती है
    हवाओं में गुलाबी सुगंध है ।

    असहमति
    भी प्रेम ही है
    समझे न
    माय वेलेंटाइन !!

  • मासूम बूंदों की फुहार

    मासूम बूंदों की फुहार

    Mukesh Kumar Sinha

    खिलखिलाहट से परे
    रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान,
    उदासियों में जब ओस की बूंदों से
    छलक जाते हों आंसू
    तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
    ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना
    कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की!

    खिलखिलाते हुए जब भी तुमने कहा
    मेरी पहचान तुम से है बाबू
    मैंने बस उस समय तुम्हारे
    टूटे हुए दांतों के परे देखा
    दूर तक गुलाबी गुफाओं सा रास्ता
    ये सोचते हुए कि
    कहीं अन्दर धड़कता दिल भी तो होगा ना
    मेरे लिए

    खिलखिलाहट और मेरी खीज
    अन्योनाश्रय संबंधो में बंधा प्रेम ही तो था
    जिस वजह से
    झूलती चोटियों के साथ तुम्हारी मुस्कुराती, गाती आँखें
    और चौड़ा चमकता माथा
    चमकीली किरणों सा आसमान एक
    जो फैलकर
    बताता सूर्योदय के साथ
    कि पकी बालियों सी फसल बस कटने वाली है

    सुनो मेरी खीज से परे
    बस तुम खिलखिलाना
    सौगंध है तुम्हें
    ताकि बस तुम हो तो लगे ऐसा कि
    मेरे आसमान में भी उगती है धनक,
    कभी न कभी
    बारिश के बाद निकलती है एक टुकड़ा धूप
    और खिलती है फ़िज़ा
    मेरे लिए

                 Mukesh Kumar Sinha

    सुनो कि बार बार हूँ कह रहा
    खूब खिलखिलाती रहना
    महसूस करना
    मेरे साथ बह रही एक नदी
    मचलती, बिफरती, डूबती, उतराती
    जीवंत खिलखिलाती नदी
    बेशक मुझपर पड़ती रहे
    मासूम बूंदों की फुहार …

    समझे ना !!

  • प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    Vidya Bhushan Rawat

    कल अंकित सक्सेना के पिता को टी वी पर देखा जहा एंकर महाशय उनको प्रणाम कर रहे थे लेकिन गुस्सा हो गए के केजरीवाल ने मुसलमानों को तो मौत पर अधिक पैसा दिया और हिन्दुओ के नहीं. सर्व प्रथम बात ये के अंकित को मार डाला गया और ये एक अपराध है और कानून के अनुसार अपराधियों के साथ जो होना चाहिए वो होने चाहिए. पुलिस ईमानदारी से काम करे और चार्ज शीट दाखिल करे ताकि न्याय हो सके.

    अंकित सक्सेना की मौत पर साप्रदायिक राजनीती की कोशिशे हो रही है और एंगल निकालने की कोशिशे भी जारी है. अभी तक नहीं मिल पाया है लेकिन बना दिया जाएगा क्योंकि चैनल इसी लिए है के अगर संप्रदायीकरण का मटेरियल नहीं मिल रहा तो उसे तैयार कर दिया जाना चाहिए.

    कुछ दिनों पूर्व मुझसे ये पुछा गया गया था के अंकित सक्सेना के पिता ने बहुत संयम से काम लिया है और उसकी सराहना की जानी चाहिए. मैं तो ये कहता हो को ऐसे मौके पर मीडिया को माँ बाप के मुंह में माइक लगाने के बजाये निष्पक्ष रिपोर्टिंग करनी चाहिए. हमें ये पता होना चाहिए के जिस किसी के घर में कोई असामयिक मौत होगी तो उसके घर वाले बहुत बिरले ही होंगे जो इमोशनल न हो और इन हालातो में वे अगर कुछ कह भी दे तो बहुत आश्चयर्य नहीं होना चाहिए.

    Vidya Bhushan Rawat

    अंतर जातीय या अंतर्धार्मिक रिश्तो में बहुत आवश्यक है के कुछ बाते समझी जाए. हम इन्हें लोकतान्त्रिक रिश्ते भी कह सकते है और ये तभी कामयाब हो पाएंगे जब हम एक दूसरे के ऊपर अपनी धार्मिक और भाषाई श्रेष्ठता न लादे. ये रिश्ते इसलिए मज़बूत होते है क्योंकि आप धर्म और जाति की सीमाओं को लांघकर इसे बनाते है इसलिए आप ये नए विचार की नीव रख रहे है जो संगठित धर्मो और जातियों से निकलकर बनता है जहा इंसान की श्रेष्ठता होती है, उसकी आज़ादी का सम्मान है और थोडा जगह विचारभिन्नता के लिए भी बची रहती है. कोई भी प्रेम सम्बन्ध तब तक नहीं चल सकता जब तक उसमे स्वतंत्रता को गुंजाइश न हो और कोई भी सम्बन्ध अनंत काल तक चलता रहे इसकी सम्भावना भी नहीं होती इसलिए संबंधो के बन्ने और बिगड़ने में जो कडुवाहट आती है उसका कारण यही है के हम कही लुटा हुआ महसूस करते है. कोई कहता है प्यार में डूब जाना चाहिए, लेकिन मुझे लगता है किसी को डूबने की जरुरत नहीं. अपने होश हवाश में रहिये और एक दूसरे की स्वयत्तता का सम्मान करेंगे तो अलग होने में कोई कडुवाहट नहीं होगी.

    जो लोग इसे लव् जिहाद का नाम दे रहे है वही लोग खाप पंचायतो के जातिगत फैसलों को संस्कृति और परंपरा के नाम पर सही ठहराते है. हकीकत ये है के प्रेम करना हमारे समाज में अपराध है और इसलिए प्रेम के अभाव में हमारा समाज हिंसक बन चूका है. ये हिंसा क्रूरता और बर्बरता में बदल चुकी है क्योंकि ये प्यार नहीं, ये प्यार में औरत को एक वस्तू समझ रहा है और जिस समाज की महिला प्यार में दूसरी और जाती है वह अपने को लुटा हुआ महसूस करता है. इसलिए अंकित के प्यार में उसकी प्रेमिका के माँ बाप की उनकी इज्जत खतरे में दिखाई दी. हम सब जानते है के प्रेम विवाह कितने मुश्किल है खासकर जब लड़का और लड़की दोनों का आर्थिक रुतबा बहुत बड़ा नहीं होता और वे दो स्वतंत्र व्यक्ति नहीं बन पाते और उनको अपने परिवार की मदद की लगातार जरुरत होती है. दो सफल व्यक्ति अपने समाज से दूर रहकर अपने रस्ते पर चल सकते है लेकिन जहाँ व्यक्ति समाज के रीति रिवाजो के अनुसार चलेंगे तो वे तो प्यार के रस्ते में रोड़ा अटकाएंगे ही.

    भारत में शादी की पवित्रता का सिद्धांत जाति से जुड़ा हुआ है और प्रेम विवाह जाति की सर्वोच्चता और शुद्धता के सिद्धांतो में सबसे बड़ी बाधा है. जैसे जैसे लोग जाति धर्म के बन्धनों से ऊपर उठकर निकलेंगे तो इनके नाम पर चलने वाली घृणा और नफ़रत की दुकानों के बंद होने की संभावनाए भी बढ़ जाएँगी. देश के युवा की उर्जा समाज निर्माण में लगनी चाहिए न के जाति धर्म की अँधेरी दीवारों को मज़बूत करने में. शायद धर्म के धंधेबाजो को इस बात का पता है के प्रेम की ताकत के अच्छे से अच्छे तानाशाह और राजा महाराजा भी हार गए.

    अंकित के दोस्तों ने एक विडियो बनाया और कहा के प्रेम किसी सेस भी हो सकता है. प्रेम कोई योजना बनाकर नहीं होता. योजना से तो दंगे करवाए जाते है या किसी की जासूसी करवाई जाति है और प्रेमी जोड़ो का क़त्ल और वो सब वो लोग करते है जिनकी जिंदगी से प्रेम गायब है. जिनकी जिंदगी में प्रेम है वो तो बस प्रेम की गंगा बहाते रहेंगे. अंकित की दोस्त शह्जादी ने लगातार ये बात कही के उसके माँ बाप गुनाहगार है. प्यार करने वालो को मजबूती से अपने विचारों पर खडा होना होगा क्योंकि प्यार भी एक विचारधारा है वैसे ही जैसे घृणा और नफरत भी एक नकारात्मक विचार है जो जातीय और धार्मिक सर्वोच्चता के अहंकार से पनपती है. इसलिए प्यार के विचार की जीत के लिए हमें कौशल्या जैसी प्रेमिकाओं की और देखना होगा जिसने जातिगत अहंकार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखी है और अपने पति शंकर के हत्यारों को जेल के सीखचों तक पंहुचाने के लिए अपने जद्दो जहद जारी रखी है. कौशल्या का मामला भी भी अंकित जैसा है वो तथाकथित ऊँची जाति से आती थी जिसका शंकर से प्रेम हो गया जो दलित था और ये बात कौशल्या के माँ बाप को पसंद नहीं थी और एक दिन कोयम्बतूर के बिजी चौराहे में शंकर की बेरहमी से हत्या कर दी गयी बिलकुल उसी तरह जैसे हम अंकित की हत्या देख रहे हैं. सड़क चलते लोग अपने काम में लगे रहे, कोइ विडियो बनाता रहा और कोई चुप देखता रहा लेकिन भीड़ निर्दोष को बचा नहीं पायी. शहजादी को कौशल्या से सीखना होगा और हत्यारों को जेल तक पहुचना होगा, अपने लिए न्याय की लड़ाई लडनी होगी और घृणा फ़ैलाने वाली मानसिकता से लड़ना होगा.

    भारत के भविष्य के लिए जरुरी है के जातियों का समूल विनाश नो क्योंकि ये देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है. ये जातीय फर्जी गौरवो के सिद्धांत पर चल रही है. अभी इलाहाबाद में दलित छात्र दिलीप सरोज की नृशंश हत्या केवल इसलिए कर दी गयी के उसका पैर किसी दबंग सवर्ण से टकरा गया. जाति के आधार पर भारत में विभाजन साफ़ दिखाई दे रहा है और पचासों उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर या बड़ी बड़ी फौजे बनाकर और हथियार बेचकर भी देश कभी मज़बूत नहीं बन सकता जब तक जाति के किले बचे रहेंगे. रोहित वेमुला से लेकर दिलीप सरोज तक सैंकड़ो छात्रो और युवाओं की बलि चढ़ चुकी है केवल इसलिए क्योंकि आपको अपनी जातीय सर्वोच्चता बनाये रखनी है. देश के बहुजन समाज को अशक्त करके कभी देश आगे नहीं बढ़ सकता. हिंसा हमारे समाज का एक नया नॉर्म बन चुकी है जो किसी भी समाज को मंदबुद्धि बनाएगी और हिंसा का प्रतिकार केवल हिंसा से करने को उत्प्रेरित करेगी.

    आज देश के युवाओं को देखना है के वे प्रेम की दुनिया को आगे बढ़ाना चाहते है या जातियों के दमघोटू ढांचे में कैद रहना चाहेगे. प्रेम में बहुत बड़ी ताकत है उन सारे पूर्वाग्रहों को तोड़ने की जिन्हें जाति की ढांचों ने बनाये है. आजदी के ७० वर्षो के बाद भी आज हम उन्ही पुराथान्पंथी जकडन में फंसे है तो कही न कही विचारात्मक द्वन्द है. जाति के नाम पर दूकान चलाने वालो और अपनी प्रभुत्व बनाये रखने वालो की साजिश को केवल युवा तभी तोड़ पायेंगे जब विवाह जैसी संस्था का लोकतान्त्रिककरण हो और वो तभी संभव होगा जब चाहत पर किसी का पहरा न हो. जिस दिन भारत में समाज का लोकतंत्रीकरण हो गया जैसा बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे, उसी दिन भारत दुनिया का सबसे मज़बूत लोकतंत्र होगा और सबसे बड़ा देश भी. समाज में लोकतंत्र के अभाव में हम अपनी ही औलादों को इज्जत के नाम पर मारते रहेंगे और तमाशा देखते रहेंगे. अभी भी समय है, चेतने का, समाज के नव निर्माण का और देश को बचाने का. जातियों के जाल में जकड़ा देश कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा और केवल घृणा और नफ़रत के ब्यापारियो के नियंत्रण में रहेगा. जातियों का उन्मूलन तभी हो पायेगा जब हमारे युवाओं को अपना साथी चुनने की स्वतंत्रता होगी नहीं तो उदंडता और जबरदस्ती ही हमारे समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखेंगे और कानून का पालन करने वाले केवल देखते रहेंगे क्योंकि संविधान केवल बहस करने का एक दस्तावेज होगा, हमारे जीवन मूल्यों को निर्धारित करने का नहीं. ये अंतर्द्वंद अंतत उन ताकतों को मज़बूत बना रहा है जो चाहते ही नहीं के समाज लोकतान्त्रिक हो क्योंकि इस प्रक्रिया में उनकी बहुत से जातीय विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे लेकिन बदले में सबको जो मिलेगा वो अप्रतिम होगा, एक लोकतान्त्रिक समाज ही देश को मज़बूत और एकजुट रख पायेगा जिसके लिए हमें बड़ी तोपों और टैंको की जरुरत नहीं होगी.

  • संबंधों में उक्ताहट

    संबंधों में उक्ताहट

    Pratima Jaiswal[divider style=’right’]

    कड़ाके की ठंड में घर में एक ही छोटा-सा पलंग था. वो रात में बीच-बीच में उठकर देखता रहता था कि कहीं उसे पैर तो नहीं लग रहा है, कहीं उसकी चादर तो नीचे नहीं गिर गई है. वो खुद ये बातें जब बताती थी, तो लगता था कि कितना प्यार करता है इसका पति. लेकिन उस वक्त मुझे झटका लगा जब मैंने उसे किसी दूसरे लड़के के साथ मेट्रो स्टेशन पर दूसरे अंदाज में देखा. लड़के के जाने के बाद मैंने उससे धोखे की वजह पूछी तो बोली ‘मुझे उसके प्यार में पिता वाली फीलिंग आती है, फैंटेसी चाहिए मुझे, जो उसे देखकर नहीं आती.’

    ये बेतुकी बात सुनकर मैंने उसे कोई ज्ञान नहीं दिया और अपना रास्ता नापने में ही भलाई समझी. अपने आसपास कई बार ऐसी कहानियां देखती हूं जिन्हें देखकर लगता है कि समाज, परिवार तो प्रेम के दुश्मन बाद में हैं. पहले तो ये लोग प्रेम के सबसे बड़े दुश्मन हैं.

    एक और दोस्त है, जिन महाशय ने अपनी प्रेमिका को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वो मां की तरह उसका ख्याल रखती है. हमेशा उससे प्रेम के इजहार का कोई मौका नहीं छोड़ती. उनके मुताबिक वो वैसी अट्रैक्टिव लड़की नहीं है, जैसी उसे चाहिए थी. उसका मन और नजरें इसलिए काबू नहीं रह पाती. प्रेमिका वैसी हो, जिसके सामने आते ही सारी दुनिया को भूलकर उसके साथ दिन बिताने का मन करने लगे.

    उसकी बातें सुनकर ऐसा लगा जैसे किसी टीनएजर से बात कर रही हूं. जबकि उसकी उम्र 30 साल के आसपास है. कभी हमें लगता था कि मन का भटकाव और नायक-नायिका पूजा, फैंटेसी दुनिया एक उम्र का पड़ाव है. एक उम्र बाद प्रेम की गंभीरता समझ आने लगेगी.

    लेकिन मैंने तो ऐसे लोगों को भी देखा है जो सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं और दुनिया भर को ज्ञान देते हैं, लेकिन खुद कई लड़कियों को एक-साथ शादी के भ्रम में रखे हुए हैं. शादी अपने प्रेम से नहीं बल्कि अपने भविष्य से करेंगे. जिसके साथ पैसों की तंगहाली वगैरह जैसी दिक्कतें नहीं आए. लाभ-हानि के बही खाते को खोलकर अपने लिए आदर्श प्रेम चुनते हैं. कोई प्रेम से इतना ऊब चुका है कि जीवनसाथी के प्रेम की न ही परवाह है न ही उसकी मौजूदगी का महत्व. https://karensingermd.com/ उन्हें बस अटेंशन चाहिए. उनके लिए किसी एक को छोड़कर सब महत्व रखते हैं. उन्हें कोई एक नहीं सब चाहिए.

    वहीं कुछ लोग ऐसे हैं, जो भूतकाल में जी रहे हैं, जबकि जीवन में नए प्यार को स्वीकार कर चुके हैं फिर भी उन प्रेम कहानियों में जी रहे हैं, जिसके किरदारों ने उन्हें कभी महत्व नहीं दिया. नया प्यार क्योंकि मिल चुका है इसलिए खोने का कोई डर नहीं है. कई जोड़े ऐसे भी हैं, जिनमें एक प्रेम में डूबा और तो दूसरा प्रेम से ऊबा हुआ है. जिंदगी में परेशानियां किसे नहीं आती लेकिन उनके लिए प्रेम भटकाव है और सारी परेशानियों का मूल प्रेम या उनका पार्टनर ही है. ऐसा कुछ वक्त बाद महसूस करने लगते हैं.

    Pratima Jaiswal

    कुछ प्रेम कहानियों में किसी तीसरे को एंट्री दे दी जाती है. कहने को दोस्त है खास है लेकिन हर पल किसी दूसरे का हक मारे बैठा है. दो के बीच में कोई तीसरा आ जाए, तो दो रह सकते हैं क्या? ऐसे लोग खुद अपना घर तोड़ते हैं. इतिहास के पन्ने पलट लीजिए.

    कुल मिलाकर समाज, परिवार से लड़ना तो बाद में है, पहले खुद साथ रहना और दोनों तरफ से प्रेम बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है. आधुनिकता का एक घाटा ये भी है कि लोग प्रेम से ऊबने लगे हैं. उसपर भी अगर किसी में प्रेम बचा भी है, तो साथी की बेरूखी, अनदेखापन उसे भी प्रेम से एक दिन ऊबा देगा. धीरे-धीरे सब खत्म हो जाएगा. प्रेम कहानियां और किरदार हर रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं.

    इन सब बातों से अलग अगर आपके पास कोई ऐसा साथी, ऐसा प्यार है, जिसके लिए आप दुनिया में सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं. आपको देखते ही सारी थकान, परेशानियां भूलकर चेहरे पर मुस्कुराहट आ  जाती है या आपको स्पेशल फील कराने या मुस्कुराने के मौके तलाशता रहता है, तो उसके महत्व को समझिए. जाने मत दीजिए संभालकर रखिए उसे. आप सच में खुशकिस्मत है. प्यार है तो प्रेम बना रहना चाहिए और अगर नहीं है तो किसी कहानी के किरदार मत बनिए, न कभी किसी के प्रेम का तिरस्कार कीजिए और न कभी खुद को तिरस्कृत होने दीजिए.

    बाकी आपका नजरिया है.

  • कैंसर पीड़ित महिला

    कैंसर पीड़ित महिला

    Vandana Dave

    (1)

    असहनीय पीङा थी 
    कहने से शरमाती थी
    बढ़ता रक्तस्राव 
    अश्रुओं में बह जाता था
    कर घर के उपचार
    काम में लग जाती थी
    बगल की गाँठ
    देखकर
    अनदेखा कर देती थी
    सीने पर लाल दानों को
    अलइयाँ कहती थी
    निप्पल से निकलते 
    पदार्थ को बच्चे का
    दूध समझती थी
    इस अनहोनी से वह 
    बिलकुल अंजानी सी थी
    एक दिन आखिर 
    डरते डरते उसने 
    बतलाया 
    लेकिन 
    देर बहुत हो चुकी थी
    मेहमान वो बस
    कुछ ही दिनों की थी

    (2)

    वस्त्रों से अपने को 
    ढँकना है
    छूपाना नहीं

    दर्द कहीं भी हो
    तोङ दो सहने 
    का सलीका 
    सबकुछ बतलाना है

    दिल की गाँठ
    बगल में आते 
    लगती नहीं है देर
    अपने को हरदम 
    टटोलना है

    खूबसूरती सिर्फ 
    चेहरे की नहीं 
    स्वच्छता हर अंगों की 
    जरूरी है

    ये चुप्पी, ये शरम, ये हया
    पल्लू के पीछे बढती
    गाँठों के लिए नहीं है
    झिझक तुम्हें तोङनी है
    अपने को बचाना है!!!

    श्रीमती वन्दना दवे
    पेटलावद (झाबुआ) मप्र में जन्म। ग्रामीण जीवन जिया इसलिए कुछ फकीराना अँदाज है जीने का व सोचने का। इन्दौर के कस्तूरबा ग्रामीण संस्थान से ग्रामीण विकास एवं विस्तार में एमए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक। वर्तमान में भोपाल में निवासरत।

    फेसबुक पर मुण्डेर पेज संचालित
    https://www.facebook.com/munderblog/

  • डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर बातचीत

    डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर बातचीत

    Dr Udit Raj

    डा० उदित राज की आरक्षण मुद्दे पर यह बातचीत दिसंबर 2009 की है। आप आरक्षित अनारक्षित किसी भी वर्ग के हों, मेरा सुझाव यह है कि आप अपनी पसंद नापसंद से ऊपर उठकर इस बातचीत को सुनें। आरक्षण के संदर्भ में आपकी सोच संभवतः परिवर्तित हो या नई समझ-दिशा मिले।
    _
    सामाजिक यायावर

  • शाकाहार मांसाहार बनाम ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत

    शाकाहार मांसाहार बनाम ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत

    ब्राह्मणवाद का विरोध हो, दलित समर्थन हो या भारत की माओवादी क्रांतिकारिता हो। शाकाहार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध उभयनिष्ठ तत्व है। बहुत ऐसी घटनाएं हैं जिनमें शाकाहारी लोगों को माओवादियों द्वारा मांस खाने के लिए बाध्य किया गया या धोखे से मांस खिलाया गया। मैं नहीं जानता कि मानसिकता की शुरुआत कब व कैसे हुई, लेकिन शाकाहार को बहुतेरे दलित चिंतक ब्राह्मणवाद से जोड़कर देखते हैं तथा मांसाहार को ब्राह्मणवाद के विरोध के रूप में देखते हैं। इस धींगामुस्ती के लिए तर्क खोज कर लाते हैं, अच्छी खासी ऊर्जा का अपव्यय करते हैं। समाज में वैसे ही लोगों की मान्यताओं के कारण बहुत सारी खाइयां हैं। मांसाहार शाकाहार वाली खाई भी पैदा कर दी जाती है। आइए मांसाहार शाकाहार से संबंधित कुछ तथ्यों को देखते समझते हैं।

    आधुनिक भारतीय परिवेश में गरीब लोगों के लिए शाकाहार सरल, सुलभ व सस्ता है:

    • वे लोग जो जंगलों में रहते हैं:

      भारत में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जंगलों में रहते हैं। जो लोग जंगलों में रहते हैं उनको भी पशु उपलब्ध नहीं हैं। जो समाज जंगलों में रहते हैं उनके लिए भी पशुओं की उपलब्धता कम होने के कारणों में पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, पशुओं की संख्या कम होते जाना व जंगलात के कानून हैं। जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोगों को जंगल में रहने के बावजूद पौष्टिक भोजन मिल पाना संभव नहीं रहा। पेड़ों की छालें, पत्तियां व पौधों को पानी में उबालकर खाते पीते रहे। चावल का विभिन्न प्रकार से प्रयोग प्रमुख खाद्य रहा।

    • वे लोग जो जंगलों में नहीं रहते हैं (मुख्यधारा के लोग):

      मांसाहार के लिए पशु चाहिए या जलचर चाहिए। पशुओं के लिए चारगाह व पानी स्रोत चाहिए। जलचरों के लिए तो पानी स्रोत चाहिए ही चाहिए। एक समय था जब गांवों में तालाब होते थे, छोटी-छोटी सरिताएं होतीं थीं। मछली अपने आप उत्पादित होती थी। कोई भी गया तालाब में घुसा, मछली निकाल लाया और पका कर खा लिया। अनेक प्रकार के छोटे-मोटे पशु सहजता से उपलब्ध रहते थे। कुछ नहीं तो खेतों में चूहे तो मिल ही जाते थे। अब तो रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग के कारण व इनके प्रयोग से जमीन कड़ी हो जाने के कारण खेतों में चूहों व अन्य जानवरों की उपलब्धता बहुत तेजी से घटी है।

      पहले लोग जानवरों से खेती करते थे। जानवरों की मृत्यु होती रहती थी जिनका प्रयोग अछूत माने जाने वाले लोगों को करने के दे दिया जाता था। किसी गांव की अछुत बस्ती में जाते ही सुअर दिखने शुरू हो जाते थे, अछूत लोग खूब सुअर पालते थे, जो नालियों में लोटते रहते थे, कुछ नहीं तो गंदगी खा करके ही मस्त रहते थे, कुलमिलाकर सुअर अपने खाने का जुगाड़ खुद ही कर लिया करता था। भैंस, सुअर इत्यादि जैसे जानवर अछूतों के भोजन का अभिन्न अंग थे।

      अब बहुत कुछ बदल चुका है। स्थितियां परिस्थितियां व मानसिकताएं बदलीं हैं। कितने दलित लोग ऐसे हैं जो नालियों में लोटने वाले सुअर को खाना चाहते हैं। लोग अब जानवरों के मरने का इंतजार नहीं करते हैं, जिस जानवर का भी दूध कम हुआ उमर बढ़ी उसको स्लाटर हाउस में बेच कर पैसे कमा लिए। बछड़ों को तो बैल बनने ही नहीं दिया जाता, क्योंकि खेती में बैलों का प्रयोग किया ही नहीं जाता, बछड़ों को तब तक घर में रखा जाता है जब तक उसको पैदा करने वाली गाय का दूध निकालने के लिए बछड़े की जरूरत रहती है। यह जरूरत खतम होते ही बछड़े को स्लाटर हाउसों को बेच दिया जाता है।

      यदि गांवों के तालाबों में अछूतों का प्रवेश निषेध रहा तो आसपास की किसी छोटी बड़ी नदी में चले गए जलचरों का जुगाड़ कर लिया। अब या नदियां सूख गई हैं या इतनी अधिक प्रदूषित हो चुकी हैं कि जलचरों की संख्या नगण्य हो चुकी है। तालाब बचे नहीं, नदियां बचीं नहीं, बचे भी हैं तो उनमें मछलियों का उत्पादन व्यवसायिक हो चुका है।

    यह एक कटु सत्य है कि दलितों के लिए मांस के जो स्रोत पहले सहजता से उपलब्ध थे वे अब उपलब्ध नहीं हैं। अपवाद इलाकों की बात अलग है। यहां अपवादों की बात हो भी नहीं रही।

    गरीबों के लिए आधुनिक भारत में मांसाहार उत्पादन बनाम शाकाहर उत्पादन:

    मांसाहार उत्पादन शाकाहार उत्पादन की तुलना में अधिक खर्चीला है। जिनके पास दाल चावल उगाने की जमीन नहीं वे पशुओं के उत्पादन के लिए जानवरों के लिए चारागाह कहां से लाएंगें। दूसरी बात यह कि मुख्यधारा वाले इलाकों में अब चारागाह बचे ही कहां हैं। तालाब बचे नहीं तो पशुओं को पानी कहां से मिलेगा। पशु तो हैंडपंप से पानी निकाल पी नहीं सकते हैं। अब पशुओं का उत्पादन करना पड़ता है, स्वतः पशुओं का उत्पादन स्वतः होने वाली सामाजिक जीवन शैली अब नहीं रही। वर्ष भर में मांस के लिए एक परिवार को जितने पशु चाहिए, उनके लिए जितने बड़े चारगाह की जरूरत होगी उससे बहुत कम जमीन में वर्ष भर की जरूरत का अनाज उगाया जा सकता है। मांसाहार की तुलना में शाकाहार उत्पादन में बहुत कम पानी की आवशयकता होती है।

    मान लीजिए कि यदि मुर्गी भी पाली जाए तो मुर्गी दाना खाती है। यदि मुर्गी को दालें व अनाज देने लायक क्षमता है तो स्वयं भी तो उस अनाज का प्रयोग किया जा सकता है। यह तो केवल मांसाहार करने के लिए गरीबी में भी अतिरिक्त निवेश करना हुआ। शाकाहार ही तो सरल सुलभ हुआ।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि मांसाहार वाले भी रोटी, चावल इत्यादि खाते हैं। ऐसा तो है नहीं कि केवल मांस खाकर ही जीवित रहते हैं। रोटी चावल इत्यादि अनाजों का इंतजाम तो कहीं न कहीं से किसी न किसी जुगाड़ से करते ही हैं।

    गरीब से गरीब आदमी भी अपनी झोपड़ी में लौकी, तरोई, कद्दू इत्यादि उगा सकता है। सिर्फ एक पौधा ही पूरे परिवार को पूरे मौसम सप्लाई कर सकता है। घर में प्रयोग किए जाने वाले पानी में से ही पौधों को दो चार लोटा पानी दिया जा सकता है। जरूरी तत्वों वाली सब्जियों का उत्पादन झोपड़ी में ही किया जा सकता है वह भी बिना अतिरिक्त खर्च के। अब रही बात रोटी व चावल की तो मांसाहार करते समय रोटी चावल का जुगाड़ जहां से करता है, वहीं से करे।

    मेरा सिर्फ यह कहना है कि आधुनिक परिवेश में भारत में गरीब आदमी के लिए मांसाहार की तुलना में शाकाहार सरल व सुलभ विकल्प है। 

    शाकाहार बनाम मांसाहार:

    दुनिया में ऐसे बहुत देश हैं, ऐसे क्षेत्र हैं जहां शाकाहार से मनुष्य को भोजन उपलब्ध करा पाना संभव नहीं। यूरोप में ऐसे अनेक देश हैं जहां वर्ष में महीनों ऐसी स्थिति रहती है कि शाकाहार का उत्पादन संभव नहीं। ऐसे बहुत देश व क्षेत्र हैं जहां जमीन कम पानी अधिक है। दुनिया में ऐसे कई देश हैं जहां कृषि के लिए उपजाऊ जमीन नहीं। यदि सार्वभौमिकता के साथ विचार किया जाए तो दुनिया में केवल शाकाहार पर निर्भरता संभव नहीं। भिन्न-भिन्न भोगोलिक परिस्थितयों के आधार पर वहां के लोगों ने खानपान, रहनसहन व आचार विचार की परंपराएं बनाईं व स्थापित की। यही सांस्कृतिक विभिन्नता है।

    • क्या केवल मांसाहार संभव है:

      अपवाद क्षेत्रों व अपवाद लोगों को यदि छोड़ दिया जाए तो केवल मांसाहार संभव नहीं। दुनिया में ऐसे अपवाद लोग ही हैं जो पूरा जीवन केवल और केवल मांस खाकर रहते हों। जो लोग मांस खाते हैं वे लोग भी बहुत मात्रा में पास्ता खाते हैं, तोफू खाते हैं, दालें खाते हैं, दूध की बनी वस्तुएं खाते हैं, चीज खाते हैं, मक्खन खाते हैं, सब्जियां खाते हैं, ब्रेड खाते हैं, फल खाते हैं, मेवे खाते हैं, अन्य शाकाहारी वस्तुएं खाते हैं। ऐसे लोग विरले ही होंगे जो मांस व मछली के अतिरिक्त किसी प्रकार का शाकाहारी भोजन न करते हों।

    • क्या केवल शाकाहर संभव है:

      बिलकुल संभव है। हममें आपमें से बहुत लोग ऐसे हैं जिन्होंने जीवन में कभी मांसाहार न किया होगा। दरअसल मानव के क्रमिक विकास की प्रक्रिया में मानव बनने तक की प्रक्रिया में मानव बनने तक सभी पूर्वज शाकाहारी ही रहे थे। मानव भी शाकाहारी था, लेकिन मौसम परिवर्तन व भौगोलिक परिस्थितयों के कारण केवल शाकाहार पर निर्भर रह पाना संभव नहीं था इसलिए मनुष्य ने शाकाहार के साथ-साथ मांसाहार का प्रयोग भी करना शुरू किया। मानव शरीर शाकाहार के लिए अधिक उपयुक्त है।

    चलते-चलते:

    मैं शाकाहारी हूँ इसके बावजूद मैं मांसाहार को गलत नहीं मानता। आप मेरी थाली में मांस रखकर मेरे साथ एक ही थाली में भोजन कर सकते हैं। यदि आपके मांस का शोरबा बहता हुआ मेरी दाल या सब्जी में मिल जाता है तब भी मुझे आपके साथ एक ही थाली में भोजन करने में समस्या नहीं। मेरे लिए शाकाहार या मांसाहार  किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय, समाज, सभ्यता या देश का मूल्यांकन करने के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। शाकाहार मांसाहार के आधार पर मूल्यांकन करने को मैं निहायत ही वाहियात बात मानता हूँ।

    यह लेख मांसाहार का विरोध करने के लिए नहीं है क्योंकि यह एक तथ्य है कि दुनिया के सभी मनुष्यों का पेट शाकाहार व मांसाहार से ही हो सकता है। हजारों वर्षों पहले मनुष्य ने शाकाहारी होने के बावजूद मांसाहार करना सीखा तब भी सर्वाइव करना ही कारण था।

    यह लेख ब्राह्मणवाद-विरोध, दलित-समर्थन व तथाकथित क्रांति के नाम पर शाकाहार की लानत मलानत करने के विरुद्ध तथ्यात्मक आलेख है। यह लेख यह भी बताता है कि आधुनिक भारत में गरीबों के लिए शाकाहारी होना मांसाहारी होने की तुलना में अधिक सरल व सुलभ है।

  • बंदर को पूर्वज मानते ही जाति व्यवस्था, संस्कृति का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिक-श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाती है

    बंदर को पूर्वज मानते ही जाति व्यवस्था, संस्कृति का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिक-श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाती है

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मंत्री जी का बयान तथा समाज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

    मेरा अनुमान है कि मंत्री जी का भाव दूसरा था, मंत्री जी को यह लगता है कि मनुष्य सीधे आसमान से टपका था। मंत्री जी का बंदर को मनुष्य का पूर्वज मानने से विरोध इसलिए है क्योंकि यदि बंदर को मनुष्य का पूर्वज मान लिया जाएगा तो ईश्वर की काल्पनिक अवधारणाओं, पौराणिक कथाओं व पुराणों का अस्तित्व व तथाकथित वैज्ञानिकता पूरी तरह से खतरे में पड़ जाएगी। ब्राह्मण मुंह से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य कही और से व शूद्र पैरों से पैदा हुआ मानने वाली जाति व्यवस्था का आधार छिन्न भिन्न हो जाएगा।

    स्वर्ग नर्क की अवधारणा खतरे में पड़ जाएगी। स्वर्ग नर्क, देवी देवताओं, देवराज इत्यादि की आधार पर गढ़ी गईं सैकड़ों हजारों कहानियों व सांस्कृतिक तामझाम के आमूलचूल अस्तित्व पर खतरा आ जाएगा। पुष्पक विमान, सूक्ष्म शल्य चिकित्सा व अन्य वैज्ञानिक दावों का वजूद पूरी तरह से ही खतम हो जाएगा।

    किसी कागज में चार लकीरें खींच कर, ग्रहों का एक घर से दूसरे घर में जाना। ग्रहों के इस प्रकार एक घर से दूसरे घर में आने-जाने का किसी मानव के जीवन के उतार चढ़ाव यहां तक कि वह किससे शादी करेगा, कब सेक्स करेगा, कब खाना खाएगा, कब मूत्र-त्याग करेगा, कब शौच क्रिया करेगा, शौच क्रिया करते समय किस-किस पशु-पक्षी से मुलाकात होगी, किस दिन किस समय क्या खाएगा, इत्यादि-इत्यादि की गणना तक कर ली जाती है। सैकड़ों-हजारों वर्षों से चली आ रही इन सब फर्जी वैज्ञानिकता, विशेषज्ञता, शुचिता व ईश्वरीय संबंधों इत्यादि के फर्जीवाड़े के तामझाम पर सवाल उठना शुरू हो जाता है।

    मैं यह नहीं मानता कि मंत्री जी ने इस प्रकार का बयान किसी धूर्तता पूर्ण सोची समझी साजिश के कारण दिया। मेरा मानना है कि सैकड़ों-हजारों वर्षों से यह सब हमारे आपके दिलोदिमाग में बहुत गहरे पैठ गया है। हम कितना भी विज्ञान पढ़ लें। वैसे भी हम विज्ञान नौकरी पाने के लिए पढ़ते हैं। जिसे हम पढ़ना कहते हैं उस पढ़ने का मतलब होता है रट लेना। रट कर परीक्षा की उत्तर पुस्तिका में उल्टी करके लिख देना।

    लोग IIT के पढ़े होंगे, कम्प्यूटर प्रयोग करते होंगे, स्मार्ट फोन प्रयोग करते होंगे। जल, जंगल, जमीन, आसमान, पशु-पक्षियों, रसायनों व अंतरिक्ष विज्ञान को समझने का दावा करते होंगे। खुद समझने का दावा न भी कर पाते हों तो भी दूसरों के किए गए दावों से खुश होते हैं।

    अपने बच्चों के लिए छोटी उम्र से ही IIT में भेजने की योजना बनाते हैं। छोटी कक्षाओं से ही बच्चों के मन-मस्तिष्क में भर देते हैं कि IIT पहुंचना है। यहां मैं IIT का नाम केवल इसलिए ले रहा हूं क्योंकि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में न होने के बावजूद भारत में सबसे बेहतर संस्थान माने जाते हैं। पटाक से नौकरी लगती है। चूंकि अंधों में काने राजा हैं ही तो ऊंची सरकारी नौकरियां भी पटाक से लगतीं हैं।

    आप इन पढ़े लिखे लोगों की जीवन शैली देखिए। इनके घरों में छोटे-मोटे मंदिर तक मिलेंगे। पूजा पाठ करेंगे व बच्चों से करवाएंगे। वह भी इसलिए क्योंकि बच्चे को अच्छे नंबर मिलें, बच्चे को परीक्षाओं में सफलता मिले, बच्चे को मनचाही नौकरी मिले।

    ऐसा ही बहुत कुछ और भी।

    एक तरफ तो विज्ञान की किताबें रटा रहे हैं ताकि नौकरी मिले, ऐशो-आराम वाली तरक्की मिले। दूसरी तरफ बच्चे के दिलोदिमाग में कूट-कूट कर भर रहे हैं कि देवी-देवता होते हैं जो सबकुछ निर्धारित करते हैं। किसी खास तरीके से कुछ कर्मकांड करने से जीवन में यह सफलता मिलती है, वह मिलता है। बच्चा भले ही IIT या IISc से विज्ञान या तकनीक में PhD कर ले। लेकिन उसकी मानसिकता तो वही रहेगी जैसी बचपन से वह अपने इर्द-गिर्द देखता आया है।

    यही कारण है अपवादों को छोड़कर अपने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लोग होना बहुत मुश्किल होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना अलग बात है, वैज्ञानिक पदों, विज्ञान के शिक्षकों, विज्ञान या तकनीक के विषयों की प्रोफेसरी इत्यादि की नौकरियां करना बिलकुल अलग बात है। जिस समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव हो, उस समाज के मंत्री जी ने जो बयान दिया है। वह इस कारण भी हो सकता है कि मंत्री जी को सच में ही ऐसा लगता हो। यह जरूरी नहीं कि मंत्री जी के बयान के पीछे कोई सोची-समझी धूर्तता ही हो।

    यह कल्पना करने में क्या जाता है कि हम पुष्पक विमान बनाते थे, हम सूक्ष्म शल्य-चिकित्सा करते थे, हम वानर-मनुष्य के पसीने से मछली को मुंहे से गर्भवती कराकर वानर-मनुष्य पैदा करवाते थे। हम पहले विज्ञान में बहुत ही आगे थे, फिर कुछ ऐसा हुआ कि सबकुछ अचानक तहस-नहस हो गया, केवल इन वैज्ञानिक उपलब्धियों की बात करने वाले ग्रंथ किसी तरह बचे रह गए, जिससे हमको मालूम पड़ता है कि हम कितने विकसित व महान थे। हमारे काल्पनिक ऋषि मनीषी बहुत महान थे, पूरी सृष्टि व ब्रह्मांण की चिंदी-चिंदी समझ रखी थी। सबकुछ वैदिक-संस्कृत जैसी गूढ़ भाषा के गूढ़ मंत्रों में दिया गया है। दुनिया का सारा ज्ञान इन मत्रों में समाया है, सभी मंत्रों में गूढ़ व सूक्ष्म विज्ञान छुपा है, बस समझने वाली बात है।

    लीजिए कर लीजिए जो बन पड़े। वैज्ञानिकता गई तेल लेने। स्वंभू विज्ञान, स्वयंभू वैज्ञानिकता, स्वयंभू वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

    मेरी बात कि बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे:

    मैं लंबे समय तक यही मानता रहा कि बंदर ही मनुष्य के पूर्वज हैं। जीव विज्ञान की किताबों में यही पढ़ाया गया था। इधर कुछ वर्षों में कुछ गंभीर व विश्वविख्यात वैज्ञानिकों की कुछ पुस्तकें हाथ लगीं। मालूम पड़ा कि क्रमिक विकास की प्रक्रिया में बंदर मनुष्य के पूर्वज नहीं थे वरन् बंदर व मनुष्य के पूर्वज एक ही थे। मालूम पड़ा कि एप, चिम्पाजी व बंदर में अंतर होता है। मालूम पड़ा कि एप मनुष्य के पूर्वज थे। मालूम पड़ा कि चिम्पाजी मनुष्य के पूर्वज थे। बंदर मनुष्य के पूर्वज न होकर सहोदर थे, समान पूर्वजों से निकली एक दूसरी शाखा।

    हमारे समाज की शिक्षा-प्रणाली ऐसी है कि हमें गंभीर स्वाध्याय करने की जरूरत नहीं रहती। हमारा लक्ष्य केवल परीक्षाओं में नंबर पाना होता है। आपको विज्ञान, गणित या किसी अन्य विषय की समझ हो, आप बहुत अधिक अध्ययन करते हों यह भी संभव है कि आपको अपने विद्यालय में विषय के शिक्षकों से अधिक आता हो लेकिन यदि आप परीक्षा में नंबर नहीं ला पाते हैं। यदि आप नौकरी नहीं पा पाते हैं तो आपको कुछ नहीं आता। परीक्षा में नंबर व नौकरी ही आपकी योग्यता के मानदंड हैं।

    अपने समाज में अधिकतर लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने कभी भी गंभीर व विस्तृत स्वाध्याय नहीं किया होता है। विषय वस्तु को गहराई व वस्तुनिष्ठता से समझने जानने के गंभीर प्रयास की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपनी या अपनी मानसिकता को पसंद आने वाला या मुफीद बैठने वाला कुछ पढ़ पुढ़ लेते हैं, फिर उसी को आधार बना कर अपनी तार्किक क्षमता व स्तर के घालमेल करते हुए अपने भीतर एक अनुकूलता तैयार कर लेते हैं, फिर उसी अनुकूलता से देखते समझते व दिखाते समझाते हैं। ऐसा करते-करते अनुकूलता की पैठ इतनी हो जाती है कि इन लोगों को यह लगने लगता है कि ये सबकुछ समझते हैं। दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सभी कुछ समझे हुए हैं या समझने की क्षमता रखते हैं। रटना, मान लेना, पहले से ही रटे हुए व माने हुए को तर्क से साबित करना तथा माने हुए को अधिक पुख्ता करना …. इसी प्रकार के तथाकथित विद्वानों व ज्ञानियों की समझ, ज्ञान, विद्वता, चिंतन, विचाशीलता इत्यादि का कुल यही जमा खाता होता है।

    चूंकि ऐसे लोगों की विद्वता, ज्ञान, समझ इत्यादि सभी कुछ शब्दों के रटाव व मानने तथा रटे हुए शब्दों व मानने के तार्किक झोलझाल तक सीमित रहता है; इसलिए इन लोगों की जीवन शैली, जीवन के प्रति सोच, जीवन के प्रति मानसिकता आदि में बेहद खोखलापन व विरोधाभास रहता है। लेकिन तार्किक झोलझाल वाली विद्वता, ज्ञान व समझ का अहंकार इतना अधिक होता है कि विरोधाभास व खोखलापन दिखाई भी नहीं देता है।

    ऐसे लोग मानसिक, वैचारिक व भावनात्मक रूप से विकृत व कुंठित होते हैं क्योंकि इनका जीवन की सार्थकता, समाज व समाधान से कोई ईमानदार व प्रतिबद्ध लेना देना नहीं होता। उल्टे ये लोग इन सब तत्वों को मूर्खता मानते हैं। काश ये लोग तार्किक क्षमता का बेहतर प्रयोग कर पाते। लेकिन शायद इनकी तार्किक क्षमता भी सूक्ष्मता के स्तर की नहीं ही होती है, अन्यथा सूक्ष्मता देख पाने, स्वीकार कर पाने व उसको जी पाने की क्षमता भी होती।

    इतना ही नहीं बल्कि दुनिया के लोग जो अध्ययन करते हैं, आविष्कार करते हैं, मौलिक शोध करते हैं, एक एक बिंदु की सूक्ष्मता को समझने के लिए सालों लगाते हैं, यहां तक कि अपना जीवन तक लगाते हैं, कुछ लोग तो अपने ऊपर ही जीवंत प्रयोग तक करके देखते हैं, बार बार असफल होने के बावजूद लगे रहते हैं …. इत्यादि लोग अयोग्य होते हैं, नासमझ होते हैं मूर्ख होते हैं। ये नासमझ व मूर्ख लोग बिना मतलब निरंतर इतनी मेहनत करते हैं, धैर्य रखकर समझने का प्रयास करते हैं। इतनी मेहनत व धैर्य इत्यादि की बजाय यदि ये लोग भी अपनी पसंद/नापसंद के आधार पर तर्क/वितर्क/कुतर्क के साथ इस अनुच्छेद के ऊपर वाले बाक्स में तीन अनुच्छेदों में बताए गए विद्वानों व ज्ञानियों की तरह कुछ पढ़ पुढ़ लेते, कुछ रट रटा लेते तो दुनिया की सारी थियरीज, सारे सिद्धांत, सारी अवधारणाएं सबकुछ अपने आप ही समझ कर विद्वान व ज्ञानी हो जाते।  

    चलते-चलते:

    भारत के एक मंत्री जी ने संभवतः एक बयान दिया कि मनुष्यों के पूर्वज बंदर नहीं थे। मैंने भी कई पोस्टें लिखीं जिनमें कहा कि बंदर मनुष्य का पूर्वज नहीं था। मेरी बात व मंत्री जी की बयान के पीछे के भावों व कारणों में बहुत अधिक अंतर है।

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना का हनन, खाचों को प्राथमिकता देने के कारण ही होता है। यह खांचा भले ही ब्राह्मणवाद हो या ब्राह्मणवाद का विरोध या किसी राजनैतिक दल या विचार का समर्थन या विरोध। सामाजिक समाधान व वास्तविक शिक्षा बेहद गूढ़, सूक्ष्म व दृष्टि वाली बात होती है।  

     

  • महावरी, सैनेटरी पैड से जुड़ी वर्जनाएं एवं हमारी नासमझी

    महावरी, सैनेटरी पैड से जुड़ी वर्जनाएं एवं हमारी नासमझी

    Apoorva Pratap Singh

    मेरा दोस्त है पारीक, उसने पिछले साल मुझे कहा था कि विडम्बना है कि सैनेटरी पैड की कम्पनी अपना नाम व्हिस्पर (फुसफुसाहट) रखती है ! मतलब टैबू मॉडर्निटी के संग संग चल रहा है । कुछ कुछ वैसी ही अक्षय की फिल्म है । अच्छी कोशिश है इससे इंकार नहीं ! खैर ! जब हम एड देखते हैं किसी sanitary पैड्स ब्रांड का उसमें कपड़े की कई प्रॉब्लम्स दिखाई जाती हैं और उनके प्रोडक्ट को बढ़िया दिखाया जाता है । जबकि इन सब ब्रांड्स की manufacturing यूनिट्स में कई स्टैंडर्ड्स का उल्लंघन किया होता है । एक नैपकिन में 80 प्रतिशत सामान प्रदूषित या संक्रमित होता है । उसकी खुशबू और सफा सफेदी देख कर हम उसे साफ़ मानते हैं । इन सबको हटा भी लें तो कुछ भी recyclable नही होता।

    भारत में माहवारी सम्बन्धी स्वच्छता की कमी है, उसे भरने हेतु सैनेट्री नैपकिन्स की पहुँच बढ़ाने की मुहिम चल रही है। पर असल में हम सब धरती को नुकसान पहुंचा रहे हैं । हर महीने अकेले हमारे देश में ही 60 लाख बिलियन से ऊपर माहवारी सम्बन्धी कचरा पैदा होता है जो कि सैनिटरी पैड्स और टैम्पून्स की देन है । सभी को देश के वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का हाल मालूम है, यह इस्तेमाल किये हुए प्रोडक्ट्स बीमारियां बढाने में अभूतपूर्व योगदान देते हैं। इन कन्वेंशनल पैड्स के जन्मदाता अमेरिका और यूरोप इस प्रदूषण से बचने के लिए महिलाओं को कपड़े के पैड्स के लिए उत्साहित कर रहे हैं। जहां हम सैनिटरी नैपकिन रिवोल्यूशन की बात कर रहे हैं, वही वे इससे मुक्ति के लिये मुहीम चला रहे हैं क्योंकि उन्हें इसके हानिकारक परिणाम डरा रहे हैं।

    Apoorva Pratap Singh

    अभी बाजार मे Biodegredable पैड्स आ रहे हैं जो सस्ते हैं। रीयूजेबल भी हैं लेकिन इनकी सफाई अच्छे से सम्भव नहीं है क्योंकि ये कई परतों में सिले हुए होते हैं जिससे उनको धूप नही मिलती । इसीलिए सिर्फ एक बिना सिला सूती कपड़ा सबसे अच्छा ऑप्शन है, जिसके सारे फोल्ड्स को खोल कर में सुखाया जा सकता है या मेंस्ट्रुअल कप्स हैं। आप शायद कहेंगे कि यह आपकी दिनचर्या से मैच नही करता लेकिन अगर आप सोशल मीडिया इस्तेमाल कर रहे हैं तो अधिकतर बार सम्भव है कि आप के घर ऑफिस में टॉयलेट्स भी होंगे और जब ऐसा नही हो तो भी कई उपाय निकाले जा सकते हैं।

    मेरा यह सब लिखने का कारण है जो सबसे प्रमुख वो है पर्यावरण का दूषित होना और आँखे मूंद कर बाजार की हर बात को सही मान लेना. दूसरा यह सोचिये कि हम अपने दूसरे टैबूज़ में से निकल कर एक नए टैबू, (कपड़ा इस्तेमाल करने से परहेज या योनि में कप फिक्स करने में हिचकिचाहट ) में तो नहीं घुस रहे । जैसे WASH जो एक NGO है एक रेड हट नामक पहल कर रहा है जिसमें वो औरते रहेंगी जो माहवारी से हैं !!! यह उस पुराने नियम से अलग कैसे हुआ, क्या यह अब पितृसत्तात्मकता को मॉड तरीके से सहलाना नही होगा !!! क्या हमारी जरूरतें बाजार तय कर रहा है? क्या पैड्स इकोनॉमिकली गरीब तबका अफोर्ड कर पायेगा और अगर फ्री में मुहैया करा भी दें तब भी वो हानिकारक है।

    हमें खुद और दूसरों को, संग पढ़ने, काम करने वालियों को प्रेरित और जागरूक करना चाहिए ।

  • नेताजी : नारे जो झूठ साबित हो गए

    नेताजी : नारे जो झूठ साबित हो गए

    K Krishan Anand

    तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा
    ये पूरा नारा ही झूठ साबित हो गया। आजादी मिल तो गई, लेकिन वो खून के रास्ते नहीं मिली। इस नारे का एक भी शब्द आजादी मिलने का तरीके और रास्ते में नहीं जुड़ पाया। ये नारा और इसके पीछे के विचार को ही सच साबित करने का मौका, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नहीं मिल पाया। अगर मिल भी पाता तो शायद सही नहीं होता कि उनका ये नारा… उस वक्त के हालात में कारगर साबित नहीं हो रहा था, वो इस नारे को सच साबित करने की कोशिश भी करते तो कामयाब नहीं हो पाते। अब ये वक्त की और भाग्य का लेख था कि ऐसा नहीं हआ और सुभाष चंद्र बोस…  आजाद भारत में भी नेता जी सुभाष चंद्र बोस रह गए। ये अलग बाद है कि उन्हें इससे ज्यादा और राष्ट्रीय सम्मान के साथ जगह मिलनी चाहिए थी।

    K Krishan Anand

    आपको क्या लगता है, काग्रेस ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़कर देश आजाद करवाया?
    दुनिया का इतिहास देखिए, किसी भी देश में ये मुमकिन नहीं हुआ है। गुलामी से छुटकारा मालिक की मर्जी से ही मुमकिन है। उनसे बातचीत करके, बतियाके। तभी एक गुलाम व्यवस्था, अपने पैरों पर खड़ा स्वतंत्र गणतंत्र बन सकता है।

    हर ट्रांसफर-पोस्टिंग में चार्ज हैंडओवर-टेकओवर होता है।
    ये एक व्यवस्था को दूसरे के हाथ सौंपने का तरीका है। अब मान लीजिए एक थानेदार अपनी बदली के बाद उत्तराधिकारी के आये बिना ही अपना बोरिया बिस्तर समेट चला जाए। अब जब नया थानेदार आएगा तो वो क्या करेगा, वो कर ही क्या लेगा। उसे हालात समझने में दो साल लगेंगे तबतक थाने के इलाके में गुंडों का राज चलेगा।

    व्यवस्था से उग्रता से लड़कर, दुश्मनी भरी खूनी संघर्ष करके, आजादी पाना दरअसल, स्वतंत्रता नहीं, स्थापित व्यवस्था पर कब्जा करना है, जिसे तख्तापटल कहते हैं। हमलावर और विजयेता यही करते हैं। तख्तापटल के तरीके से जब भी कोई सत्ता परिवर्तन हुआ है,  नतीजे में एक अराजक, शासनहीन व्यवस्था ही स्थापित हुई है। जिसका आखिरी नतीजा गणतंत्र नहीं, तानाशाही हुआ है। उग्र तानाशाही से शांत गणतंत्र तक यात्रा, एक बेहद तकलीफदेह और लंबी प्रक्रिया है।

    तो कांग्रेस ने अंग्रेजों से आजादी के पहले के कई दशकों तक मित्रतापूर्वक विरोध जताया, बातचीत की। उन्हें देश छोड़ जाने के लिए मनाया, सहमत किया और आखिरकार बाध्य किया। खुद नेता जी इस प्रक्रिया में कांग्रेस के साथ थे। किसी भी देश के लिए, अपनी सत्ता खुद संभालने का ये सबसे सहज और जरूरी तरीका है। हमें अंग्रेजों से केवल आजाद नहीं होना था, उसने शासनकरना भी सीखना था।

    परिवार में बंटवारा होता है। अच्छे परिवार में मालिकाना हक बातचीत से… साथ रहते, तय होता है और बदल जाता है।

    बुरे परिवारों में रातों-रात दो भाई आपस में बांट लेते हैं। परिवार का मुखिया जो कि बाबा होते हैं, वो अपने पटिदारों को जमीन, कर्ज, खेती, संपत्ति के बारे में कुछ नहीं बताते, बांट देते हैं। रातोरात हुई ऐसी बांट बाद परिवार पर मुसीबत टूट पड़ती है। बांटनेवाले सभी लोगों को (बाबा को छोड़) सबकुछ फिर से शुरू करना पड़ता है। उत्तराधिकार जब ऐसे हस्तानांतरित होता है तो भाई भाई एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, हत्याएं होती हैं।

    उत्तराधिकार के हस्तांतरण का सही तरीका है… उत्तराधिकारी को धीरे-धीरे सारी व्यवस्था समझा-बुझा, बतलाकर, सत्ता उसे सौंपकर कूच कर जाना।

    तो आजादी के लिए, आखिरी के दस साल अंग्रेजों से मित्रवत बातचीत की गई, उनसे कोई दुश्मनी नहीं थी।

    अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस…
    वो सेना बनाके देश को आजादी दिलाना चाहते थे। अंग्रेजों पर चढ़ाई करके। इसके लिए वो दूसरे विश्वयुद्ध के ब्रिटेन के दुश्मन… जापान और जर्मनी के नेताओं से मिल चुके थे। वो अंग्रेजों के दुश्मनों से मिल रहे थे। मुश्किल बात थी कि हमें आजाद तो अंग्रेजों से होना था।

    अंग्रेजों से भारत को आजादी दिलानी थी। जो बातचीत से ही मुमकिन थी। कहीं बातचीत का ये रास्ता बंद हो जाता और अंग्रेज जाने से मना कर देते, तो आजादी कुछ और बरसों के लिए टल जाती। कम से कम उस पीढ़ी में तो वो नहीं ही मिलती।  

    अंग्रेजों से बातचीत चल रही थी।
    और नेता जी, उनके दुश्मनों से मिल रहे थे। बस यही दुविधा की स्थिति थी कांग्रेस के लोगों के लिए। वो अगर नेता जी के साथ साफ-साफ अपना रिश्ता रखते तो अंग्रेजों को ये धोखाधड़ी लगता कि हम स्वेच्छा से सबकुछ बढ़िया से सौंप कर जाना चाहते हैं और ये हमारे दुश्मनों से मिल रहे हैं…. जाओ नहीं करते हम आजाद!

    इससे ऐसा नहीं होता कि हम आजाद नहीं हो पाते, आजादी आते-आते कुछ और दिनों से टल जाती। अंग्रेजों को फिर से मनाना पड़ता, बातचीत की पूरी प्रक्रिया फिर से दोहरानी पड़ती। इसे खेल बिगड़ जाना कहते हैं।

    हम अंग्रेजों से उनका भारत जीतना नहीं चाहते थे। उनको अपने भारत से भगाना चाहते थे। जब कोई समान, जगह आप लूटेंगे… तो उसका राजनैतिक और विधिक कानूनी हस्तांनांतरण नहीं करेंगे उसपर जबरन कब्जा करेंगे तो लूट के बाद उस पर दावेदारी के लिए मारकाट मच जाएगी और सब तहस नहस हो जाएगा। जो ताकतवर होगा उसका अधिकार होगा। लेकिन ये जनता का नहीं… विजेयता का शासन होगा। आजादी के बात विभाजन यही बात थी… देश की लूट। लेकिन अगर वो समझौतापूर्ण और विधिवत नहीं होकर, युद्ध से होती तो देश की केवल विभाजन का दंश ही नहीं झेलना पड़ता। अंग्रेजों पर विजय की कीमत देश की बर्बादी होती। हम खुद ही इसे नेस्तनाबूत कर देते कि हमको स्वशासन का अनुभव ही नहीं था।

    हम अपनी ही इंसानी फितरत पर गौर करें तो…
    तो अगर किसी सरकारी दफ्तर में या कोई व्यक्ति आपसे काम करवाना चाहता हो। काम आपके कब्जे में है, आप उसका काम कर देने के लिए तैयार भी हैं। इसी बीच वो आदमी किसी बड़े अधिकारी, जिससे आपकी बनती नहीं, उस अधिकारी की सिफारिश लेकर आ जाए। या वो आपके दुश्मन से मिलकर आप पर दवाब डालने की कोशिश करे, ब्लैकमेल करने का प्रयास करे तो क्या करेंगे आप? उससे डर कर उसका काम फौरन कर देंगे या खींजकर उसका काम करने से मना कर देंगे और कहेंगे कि अब जब होता तब होगा तुम्हारा काम?

    विचार कीजिएगा… ईमानदारी से…. इंसान की सामंतवादी सोच ऐसे ही काम करती है। दबाव और ब्लैकमेलिंग से वो खीज उठता है और जो काम वो करनेवाला होता भी होता है, उसमें भी अड़ंगा लगा देता है। हमारी भ्रष्ट व्यवस्था में ये बात खूब होती है। रिश्वतखोरी की हर कोशिश में हम इस बात का ध्यान रखते हैं का काम बिगड़े नहीं।

    तो कांग्रेस बात कर रही थी और नेता जी अंग्रेजों के दूसरे विश्वयुद्ध के दुश्मनों से मिल रहे थे।

    ऐसे में नेताजी का रुख कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर रहा था। सो उसने नेता जी से अपनी दूरी बना ली. नरम-दल, गरम-दल याद तो होगा ही। अब दिक्कत ये हो गई आजादी के बाद भी ब्रिटेन के साथ कांग्रेस की नरमी बनी रही। जो स्वभाविक भी था। अच्छा मकान मालिक, अपने पुराने किरायेदारों से भी रिश्ता बढ़िया बनाए रखता है। बुरा मकान मालिक… मौजूदा किरायदार से भी टंटा किए रहता है।

    अब आजादी के बाद भी कांग्रेस, अंग्रेजों से जुड़ी रही, मजबूरी सत्ता से संचालन में मदद की होगी। मजबूरी जो भी हो, लेकिन उसे आजादी के बाद उसे नेता जी को नकारना नही चाहिए था। यही उसने मूर्खता की।

    नेता जी का तरीका चाहे जो भी हो, वो लड़ना इस देश के लिए ही चाह रहे थे। उनका तरीका उस समय के लिहाज से उचित भले ना हो, लेकिन उनकी मंशा एकदम दुरुस्त और सही थी। तो कांग्रेस को… आजादी के बाद नेता जी को जोड़ लेना चाहिए था। लेकिन उसने जापान और जर्मनी से उनके रिश्ते और ब्रिटेन से अपने रिश्ते को ही अहम मान-समझ लिया। ये बात सही नहीं हुई।

    भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और उनके सहयोगियों के साथ भी, ऐसा ही किया गया। ये सही नहीं था। आजाद देश को एक आजाद देश की तरह व्यवहार करना चाहिए। देश से ये भारी चूक हुई।

    रामेश्वरम में सेतु बनाने में श्री राम ने गिलहरी के योगदान का भी आदर किया, भले ही वो प्रभावकारी नहीं था। पर श्रीराम ने उस छोटी गिलहरी की कोशिश का मजाक उड़ानेवाले और उसे खारिज करनेवाले वानरों को डपटा था।

    उस वक्त नेता जी ने ऐसा क्यों किया? कांग्रेसियों ने ऐसा क्यों किया?
    इसकी सफाई समझाने उनमें से कोई भी यहां नहीं है। तो हम उनकी विवशताओं, और विचार का केवल अंदाजा ही लगा सकते है।

    This article is originally published at the blog of K Krishan Anand.