Author: संपादक मंडल

  • रोहित वेमुला को मेरी श्रद्धांजलि – आखिर कितनी मौतों के बाद हम सामाजिक संवेदनशील व ईमानदार होगें

    सामाजिक यायावर

    तब तक हम जाति के घिनौनेपन से नहीं लड़ सकते हैं और परंपरा में अगली पीढ़ियों के बच्चों की हत्याओं या आत्महत्याओं द्वारा समाज की विभूतियों को खोते रहेंगें। शाब्दिक, तात्कालिक व क्षणिक भावुकता से कुछ देर के लिए अपने बच्चों की हत्याओं व आत्महत्याओं पर आंसू बहा देने भर से कोई समाधान नहीं होने वाला। वास्तव में जाति-व्यवस्था ही हमारे समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है।

    जब तक हम यह बिना किसी लाग लपेट के यह नहीं मानेंगें कि भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी और है। क्योंकि परंपरागत ऐसी घिनौनी गुलामी जिसमें गुलाम स्वतः ही अपनी पैदाइश से ही अपने ही माता-पिता, अभिभावकों व रिश्तेदारों द्वारा मानसिक रूप से स्वयं को गुलाम मानने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। कभी भी किसी भी परिस्थिति में कर्म आधारित व्यवस्था हो ही नहीं सकती है। कोई भी बेहतर सामाजिक व्यवस्था बिना स्वयं उस व्यवस्था में ही निहित घिनौने बीजों के जाति व्यवस्था जैसी जन्म घिनौनी व धूर्त सामाजिक व्यवस्था की परिणति तक पहुंच ही नहीं सकती।

    भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए, हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है।

    .

     

  • भाषा

    सामाजिक यायावर

    जोनाथन की माता जी मतलब हमारी साली साहिबा ने हमसे कहा कि मैं जोनाथन से हिंदी में बात किया करूं ताकि उसके मस्तिष्क में हिंदी के शब्द भी उसकी अपनी सहज भाषा के रूप में स्थापित होना शुरू हों। जोनाथन अभी भाषा का प्रयोग नहीं कर पाते हैं लेकिन हम लोगों की बातें समझने लगे हैं और बिना भाषा के ही हमारी बातों का प्रतिउत्तर देते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगा उनकी सहजता को देखकर कि उन्होंने अपने पुत्र के लिए हिंदी भाषा जानने की इच्छा मुझसे जाहिर की।

    मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई क्योंकि दिखावटी व खोखले राष्ट्र व भाषा गौरव के कारण मैं उनको ईमानदारी से अपने समाज की भाषा-कुंठा की असलियत बता नहीं पाया। आखिर कैसे बताता कि हमारे देश भारत में अपने उन बच्चों को देखकर माता पिता बलइयां लेते हैं जो बच्चा हिंदी न जानने का ढोंग करता है और अमेरिकन स्टाइल में अंग्रेजी बोलने का बेढंगा ड्रामा करता है। उन रद्दी स्कूलों की फीस बहुत ऊंची होती है जिनकी खासियत सिर्फ यह होती है कि वे स्कूल में और घर में हिंदी की जगह अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को प्राथमिकता देते हैं।

    मैंने अपने जीवन में बहुत सारे समुदायों से मिला हूं, बहुतों के साथ काम भी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है लेकिन हिंदी भाषी लोगों के इतना भाषा कुंठित किसी समुदाय को नहीं देखा। भारत के अंदर भी उड़िया, बांग्ला, तमिल, तेलगू, मलयाली, कन्नड़, पंजाबी किसी समुदाय को देखिए कोई भी उतना भाषा कुंठित नहीं है जितना कि हिंदी भाषी समुदाय भाषा कुंठित है। पढ़ा लिखा तरक्की किया माना जाने वाला हिंदी भाषी समुदाय तो अपने बच्चों को हिंदी का प्रयोग न करने के लिए प्रोत्साहित करता है। खुद हिंदी भाषी ही खुद को दोयम दर्जे का मानता है।

    चलते-चलते यह भी बताना चाहूंगा कि विदेशों में लोग हिंदी या संस्कृत इसलिए नहीं सीखना चाहते कि इन भाषाओं में कोई दिव्यता है या महानता है।हमारे समाज की भाषागत कुंठा का स्तर यह है कि दिव्यता व महानता की फर्जी या तोड़े-मरोड़े तथ्यों के साथ उदाहरणों की बकवास पोस्टें व खबरें सोशल मीडिया व मुख्य मीडिया में सुर्खियों के साथ देखने को मिलती रहतीं हैं।

    दरअसल सच तो यह है कि पाश्चात्य देशों के लोगों को कई भाषाओं को जानने समझने का शौक होता है। वे अपने पूरा जीवन भाषाएं सीखने का प्रयास भी करते हैं। मैं आजतक जितने भी पाश्चात्य देशों के लोगों से विदेशों में मिला हूं वे चाहे मेरे मित्र हों या रिश्तेदार या जानपहचान वाले सभी बिना अपवाद कई कई अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के जानकार हैं।

    हिंदी व संस्कृत भाषा को भी जानने वाले विदेशियों की संख्या तो बहुत ही कम है। जिस भाषा के प्रयोग खुद उस भाषा के मूल समुदाय के लोग ही करने में दोयम दर्जे का महसूस करते हों उस भाषा को प्रतिष्ठित कैसे किया जा सकता है।

    अभी मेरे कोई संतान नहीं है लेकिन जब कभी मेेरे संतान होगी। मैं ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करूंगा कि शैशवावस्था से ही मेरी संतान हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच, इटैलियन, जापानी व डच आदि भाषाओं को अपनी सहज भाषाओं के रूप में जानना पहचानना सीखे। क्योंकि इन भाषाओं को जानने वाले लोग मेरे निकट आस्ट्रेलियन परिवार में मौजूद हैं। कुछ निकट रिश्तेदार तो ऐसे भी हैं जो 15-20 अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के जानकार हैं। और तो और मैं उसको अपने गांव की गवांरू भाषा, पूर्वजों की भाषा राजस्थानी, मित्रों की भोजपुरिया भाषा व छत्तीसगढ़ की गोंडी आदिवासी भाषाओं को सीखने का भी बंदोबस्त करूंगा।

    .

  • यदि सच में ही “रोटी” आपके लिए जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा होती


    सामाजिक यायावर
     
    दरअसल यदि आपके लिए रोटी जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा होती तो आप कहीं किसी दूसरे के खेत में मजदूरी कर रहे होते, कहीं किसी आढ़ती के यहां बोरी ढो रहे होते, कही किसी कस्बे या शहर में रिक्शा खींच रहे होते।
     
    भारत देश में करोड़ों लोग वास्तव में हैं जिनके लिए सच में ही रोटी जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा है और वे अपना पूरा जीवन रोटी की ही मशक्कत में अपना जीवन वास्तव में घिसटा रहे होते हैं।
     
    आपके लिए मुद्दा है भोग-विलास का जीवन और दूसरों की तुलना में सामंती अौकात वाली हैसियत प्राप्त करना। क्योंकि आपका पेट वास्तव में भरा है, वास्तविकता यह है कि आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा रोटी नहीं है।
     
    आपके पेट भरे हैं इसी कारण एक दो अपवादों को छोड़कर आप सभी भोग-विलास व सामंती औकात आदि की प्राप्ति के लिए ही अपना जीवन लगाते हैं। दुनिया में जितने सारे झूठ, छल प्रपंच, शोषण, अमानवीयता, टुच्चई, नीचता, भ्रष्टाचार, हिंसा, पतन, बर्बरता, क्रूरता आदि तत्व ऊपर से नीचे तक दिखते हैं ये सब पेट भरे लोगों की देन हैं जो पहचान, भोग-विलास का जीवन व सामंती औकात आदि के लिए अपना जीवन जीते हैं और इन्हीं तत्वों की दौड़ में आजीवन लगे रहते हैं। जबकि रोना रोते हैं रोटी का।
     
    काश सच में ही रोटी आपके जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा होती तो आप इतने खोखले नहीं होते, इतने असंवेदनशील नहीं होते, दोहरे चरित्र के नहीं होते, झूठ नहीं गढ़ते होते। साथ ही आप कुछ और होते या न होते लेकिन बेहतर मनुष्य जरूर ही होते।
     
    .
     
     
     
  • पंचायत चुनावों में पढ़ाई को अनिवार्य बनाना लोकतांत्रिक व मौलिक अधिकारों का हनन

    सामाजिक यायावर


    साभार – http://panchayatkhabar.com

    स्कूली पढ़ाई किसी व्यक्ति की समझदारी का मापदंड नहीं हो सकती है। निरक्षर व्यक्ति भी बहुत अधिक समझदार व बहुत बेहतर जनप्रतिनिधि हो सकता है। बहुत ऊंची डिग्रीधारी व्यक्ति भी बहुत धूर्त जनप्रतिनिधि हो सकता है। पंचायती चुनावों में ही नहीं किसी भी प्रकार के जनभागीदारी वाले चुनावों में देश के हर आदमी को चुनाव लड़ने का हक वैसे ही होना चाहिए जैसे कि देश के हर आदमी को मतदान देने का हक है।स्कूली शिक्षा को बहुत अधिक तरजीह देने जैसी मूर्खता या अहंकार करने का सामाजिक दंश देश के लोगों को देने की जरूरत बिलकुल भी नहीं है।

    लोग स्कूल जा रहे हैं, समय के साथ साथ अपने आप सभी साक्षर लोग ही चुनाव लड़ेगें। यदि किसी क्षेत्र के लोग किसी अनपढ़ को अपना जन प्रतिनिधि नहीं देखना चाहते हैं तो उनके पास अनपढ़ व्यक्ति को मतदान न करने का विकल्प सुरक्षित है। यह लोगों को तय करने दीजिए कि उन्हें अपना जन प्रतिनिधि निरक्षर चाहिए या साक्षर, ऐसा करने का उनके पास अधिकार भी है। या फिर देश के लोगो से मतदान का अधिकार भी हड़प कर लीजिए।

    भारत देश को चलाने वाले सरकारी कर्मचारी, अधिकारी व नौकरशाह ही हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक हर स्तर पर कार्यकारी अधिकार इन्हीं लोगों के पास होते हैं। ये लोग पढ़े लिखे होते हैं, ऐसा माना जाता है कि बहुत ही अधिक कठिन परीक्षाओं को पार करके नौकरी पाते हैं। फिर भी इनमें से अधिकतर लोगों ने देश व समाज की हालात खराब कर रखी है, भ्रष्टाचार को समाज व जीवन का मूलभूत अंग बना दिया है। पूरी चालाकी के साथ हर बात का ठीकरा नेताओं के सिर पर फोड़ देते हैं जबकि सारे कार्यकारी अधिकार इन्हीं सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के पास होते हैं।

    देश के किसी विभाग की बात कीजिए, सभी में खूब पढ़े लिखे लोग नीचे से लेकर ऊपर तक बैठे हैं। लेकिन सामंती अधिकार, अनापशनाप वेतन व सुविधाओं को भोगने के बावजूद ये पढ़े लिखे सरकारी कर्मचारी व अधिकारी देश के लोगों के प्रति न तो संवेदनशील होते हैं और न ही जिम्मेदार होते हैं।

    नदियों को मार दिया है, प्रदूषण की भयंकर हालत कर रखी है, हर स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को बाजारू बना दिया है। गांवों को घटिया, पिछड़ा व अजागरूक बता कर खतम करने का कुचक्र रचा गया है। अब ताबूत में अंतिम कील ठोकने के लिए पंचायती चुनावों को लड़ने के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बनाया जा रहा है।

    पहले इस बात पर इमानदारी से खुली चर्चा तो की जाए कि पढ़े लिखों ने देश को क्या दिया और गांव के गवांरो ने देश को क्या दिया है। यदि ईमानदारी से चर्चा की जाएगी तो बिलकुल साफ दिखेगा कि गांव के गवारों ने देश को बहुत कुछ दिया है। यहां तक कि पढ़े लिखों व शहरी लोगों की जरूरतों की पूर्ति का आधार भी गांव व गवांर ही हैं।

    उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गये निर्देश पर रोक लगाने के लिए संसद को चर्चा करनी चाहिए। कानून संसद बनाती है। देश का संविधान उच्चतम न्यायालय ने नहीं बनाया है। देश  के मालिक व दिशा निर्देशक देश के आम लोग हैं न कि कोई सरकार या कोई न्यायालय। संरकार और संसद को जनहित में निर्णय लेना चाहिए।

  • बिहार के लोकप्रिय युवा नेताओं की स्कूली शिक्षा का लफड़ा

    सामाजिक यायावर

    मैं आज तक लालू प्रसाद यादव से नहीं मिला, उनकी संतानों से मिलना तो बहुत दूर की बात है। मेरी औकात ही नहीं जो मैं समाजवादी सोच के राजनेताओं से मिल पाऊं, क्योंकि शायद मेरी सोच समाजवादी नहीं। किंतु मुझे लालू प्रसाद यादव के पुत्रों के मंत्री बनने से कोई आपत्ति नहीं। उनके पुत्रों को बिहार के लोगों ने अपना जन प्रतिनिधि बनाया है। राष्ट्रीय जनता दल को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में विजयी बनाते समय बिहार के लोगों को साफ साफ पता था कि लालू प्रसाद यादव की संताने मंत्री बनेगीं।

    अब रही बात कि लालू प्रसाद यादव की संतानों के पास विश्वविद्यालयी डिग्रियां नहीं हैं, तो इस वाहियात बात पर मुझे सिर्फ इतना कहना है कि आजादी के बाद देश को तथाकथित पढ़े लिखे लोग ही तो चलाते आए हैं, उन्होंने देश को घिनौना बना दिया।

    IIT के पढ़े लिखे व भारत के जल संसाधन विभागों के राष्ट्रीय अधिकारियों को तो इतनी भी समझ नहीं कि गंगा नदी की ड्रेजिंग करने से उसकी बची खुची सांसे भी खतम हो जाएंगीं।

    देश के मानव संसाधन व विकास मंत्रालय जिसके अधीन भारत का संपूर्ण शिक्षा का ढांचा है, उसकी केंद्रीय मंत्री की डिग्रियों पर सवाल खड़े होते रहे हैं, लेकिन मंत्री महोदया पिछले डेढ़ वर्षों से देश की शिक्षा को ऐतिहासिक गति दे रही हैं। देश के तकनीकी व व्यवसायिक संस्थानों से बेकार के लोगों को त्यागपत्र देने से मजबूर किया ताकि देश को तरक्की के रास्ते पर भरपूर गति से दौड़ाया जा सके।

    देश के माननीय प्रधानमंत्री भी देश के लाखों करोड़ों युवाओं की तरह डिग्रीधारी नहीं हैं लेकिन विदेशों में भारत का नाम ऊंचा किए हुए हैं, सुर्खियों में बने हुए हैं। देश के लाखों करोड़ों पढ़े लिखे लोग रात दिन अपना काम धंधा छोड़ कर प्रधानमंत्री जी की शान में कसीदे पढ़ते रहते हैं।

    देश के अधिकतर डिग्री धारी लोग उन सेठों के यहां नौकरी करते हैं जो सेठ पांचवी भी पास नहीं हैं। देश में बहुत IAS सिर्फ BA या BSc हैं लेकिन उनके अंडर में B.Tech, M.Tech, MBBS, MD, MS, PhD, Post Doc आदि एक टांग में खड़े जी हुजूरी करते रहते हैं।

    देश में ऐसे हजारों डिग्री कालेज व विश्वविद्यालय हैं जहां कुछ हजार रुपए देकर बिना एक भी दिन कक्षा में जाए मनचाही श्रेणी के साथ BSc व MSc तक की डिग्री प्राप्त की जाती है। जब गली मुहल्लों के लौंडे व लौंडियाएं ऐसी डिग्री लेकर जुगाड़ से सरकारी नौकरी करते हुए घूम सकते हैं तो जिनके माता व पिता दोनों ही देश के दूसरे सबसे ताकतवर राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हों, वे जब चाहते जैसी चाहते वैसी मनचाही डिग्री ले सकते थे। लेकिन उनके द्वारा ऐसा न करना ही उनकी स्कूली पढ़ाई के प्रति ईमानदारी का सबूत है इसलिए मैं व्यक्तिगत रूप से डिग्री के मुद्दे पर लालू प्रसाद यादव की संतानों को अपना समर्थन देना चाहता हूं।

  • आम समाज की हीरो पिंकी

    बनारस जिले की तहसील राजा तालाब के गांव ‘मेहदीगंज’ की पिंकी जिसकी उम्र लगभग 17 वर्ष है और 11वीं कक्षा में पढ़ती है।

    पिछले 6 – 7 वर्ष से अपनी माता के साथ मिलकर अपने परिवार का पालन पोषण करती है और अपनी पढ़ाई भी करती है|
    लगभग 11 वर्ष की उम्र से पिंकी रोज सुबह जल्दी उठती है।
    खेत जाकर सब्जी तोड़ती है।
    सब्जी को साइकिल ठेला में लादती है।
    साइकिल ठेला चलाकर सब्जी मंडी पहुंचती है, सब्जी बेचती है।
    सब्जी बेचकर घर लौटती है और स्कूल पढ़ने जाती है।

    11 वर्ष की जिस छोटी सी उम्र में बच्चों को अपने कपड़े धोने का भी शऊर नहीं होता है,
    उस उम्र में पिंकी साइकिल ठेला में सब्जी लादकर सब्जी मंडी में सब्जी बेचने लगी थी।
    और दो बार स्थानीय स्तर पर आयोजित साइकिल मैराथन जीत चुकी है।

    पिंकी को व पिंकी जैसी कर्मठ, संघर्षशील, प्रतिभावान व जुझारू बच्चियों को तहेदिल से सलाम।

    विवेक ‘नोमेड’
    सामाजिक यायावर

  • बिहार चुनाव 2015

    सामाजिक यायावर

    लगभग दो महीने पहले मेरी बातचीत दुनिया के एक प्रतिष्ठित देश के राजनैतिक राजयनिक उच्चाधिकारी से यूं ही बिहार चुनावों पर हल्की फुल्की चर्चा हो रही थी। राजनयिक जी ने मुझसे कहा कि बिहार में भाजपा व सहयोगी दल की सरकार आ रही है, बिहार के लोग लालू प्रसाद यादव जी के जंगल राज को पूरी ताकत से रोकेंगें भले ही इसके लिए लोगों को नितीश कुमार का विरोध करना पड़े। मैंने राजनयिक जी से कहा कि भारतीय मीडिया तो हवा से चलता है, हवा बनाता है और फिर अपनी ही बनाई हवा को फैलाते हुए चलता है।

    मैंने राजयनिक जी से आगे कहा कि आप भारत की जाति व्यवस्था के जमीनी घिनौनेपन व शोषण को नहीं समझते हैं, तभी आपको लालू प्रसाद यादव का राज जंगलराज लगता है। जबकि लालू का राज शोषित जातियों के राजनैतिक जागरूकता का राज था। यदि लालू ने तथाकथित जंगलराज रूपी राजनैतिक जागरूकता की नींव न भरी होती तो नितीश कुमार विकास के काम नहीं कर पाते। बिहार के शोषित जातियों के लोग लालू व नितीश दोनो को पसंद करते हैं, दोनों की संयुक्त ताकत को हलके में नहीं लेना चाहिए।

    राजनयिक जी को मेरी बात हास्यास्पद लगी, उनको लगा कि मैं वाहियात बात कर रहा हूं।

    ~~~

    मैं चुनावी राजनीति में कम से कम बोलता हूं, क्योंकि सीटों की संख्या में मुझसे त्रुटियां हो जातीं हैं। लेकिन सामाजिक व राजनैतिक विश्लेषण में त्रुटियां बहुत कम होतीं हैं। बिहार चुनाव के बारे में लोगों के फेसबुक अपडेट देखकर ऐसा लग रहा है कि राजनयिक जी से हुई बातचीत में मेरी बात में काफी दम था।

  • भारत के अधिकतर लोग सेलिब्रटी अवतारों के जरखरीद गुलाम बनने को ही, अपने जीवन का लक्ष्य, उद्देश्य व सार्थकता मान बैठे हैं

    विवेक ‘नोमेड’
    सामाजिक यायावर

    हम भारतीय फेसबुक का अधिकतर प्रयोग खुद को मानसिक गुलाम बनाने व मानसिक गुलामी की गतिविधियों को करने में ही गुजारते हैं।

    • जीवन की समझ, दृष्टि, सार्थकता आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।
    • समाज की समझ, दृष्टि, सार्थकता आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।
    • सामाजिक ईमानदारी व प्रतिबद्धता आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।
    • समाज व मनुष्य के वास्तविक विकास व समाधान आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।

    चूकि हमारे समाज में मौलिकता, दृष्टि व वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कुंठित किया जाता है इसलिए हमारे समाज के सेलिब्रिटी लोग या तो अंधो में काने किसिम के होते हैं या नकलची होते हैं या प्रायोजित होते हैं। हम भारतीय ऐसे कुंठित लोगों को सेलिब्रिटी व अवतार बनाकर खुद को उनके जरखरीद गुलाम के रूप में उनकी वाहवाही व समर्थन आदि के लिए समर्पित कर उनकी कुंठा आदि को महानता व दिव्यता आदि के रूप में स्थापित व प्रतिष्ठित करने में अपनी जीवनी ऊर्जा का प्रयोग करने लगते हैं।

    दरअसल हम भी उन्हीं की तरह खोखले, अमौलिक, दृष्टिहीन, अवैज्ञानिक मानसिकता के होते हैं, हम भी उन्हीं की तरह ग्लैमर भोगना चाहते हैं, इसलिए हम उनमें अपनी लिप्साओं का अक्श देखते हैं और खुद को उनका अघोषित मानसिक गुलाम बना देते हैं।

    हम अपनी लिप्साओं व दमित इच्छाओं के आधार पर अपने लिए सेलिब्रिटी अवतार चुन लेते हैं, और उस अवतार का अक्श खुद को मानकर मन की गहराइयों में अपनी लिप्साओं व दमित इच्छाओं को जीने के सैडिज्म में जीने लगते हैं। हम सैडिज्म के इस नशे को तोड़ना नहीं चाहते हैं, इसलिए हम हर उस बात, तथ्य, चिंतन, विचार व व्यक्ति के प्रति हिंसक हो उठते हैं जो हमें इस सैडिज्म से बाहर निकालने का प्रयास करता है या हमारे सैडिज्म को तोड़ता है। दरअसल हम कुंठित सैडिस्ट हैं इसीलिए हम अपने लिए अवतार बनाते हैं और खुद ही खुद को उनका जरखरीद मानसिक गुलाम बनाते हैं।

    ~~~

    ये स्थितियां व गतियां मनुष्य, समाज व देश को बहुत पीछे ले जातीं हैं।
    हम हंगामा चाहे जो करें,
    हम ढोंग चाहे जो करें,
    हम ख्याली पुलाव चाहे जो बनाएं,
    हम जुमले चाहे जितने दें,
    हम चाहे जितने झूठ के पुलंदे बनाएं,
    हम नारे चाहे जितने लगाएं।

    हम जब तक सैडिस्ट रहेंगें,
    हम जब तक सैडिज्म में जीते रहेंगें,
    हम, हमारा समाज, हमारा देश और अधिक कुंठित ही होता जाएगा, पीछे ही जाएगा।

  • दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, जेट एयरवेज की क्लर्क और मैं

    सामाजिक यायावर

    आस्ट्रेलिया दुनिया के उन देशों में है जो कुछ वर्षों से ईलेक्ट्रानिक वीसा देता है, मतलब वीसा लेबल पासपोर्ट में नहीं चिपकाता है। मैं आस्ट्रेलिया के आजीवन स्थाई निवासी का स्टेटस रखता हूँ। भारत में या आस्ट्रेलिया से बाहर रहने की स्थिति में हर एक साल की अवधि की अनुमति आस्ट्रेलिया सरकार से लेनी होती है, जिसे आस्ट्रेलिया वापसी अनुमति प्रपत्र कहा जाता है। आजीवन स्थाई निवासी का स्टेटस रखने वाला बिना इस वापसी अनुमति प्रपत्र के आस्ट्रेलिया के बाहर से आस्ट्रेलिया में प्रवेश नहीं कर सकता है।

    आस्ट्रेलिया में ही रहने पर इस तरह की सालाना अनुमति की कोई जरूरत नहीं होती है, ऐसी अनुमति केवल उन लोगो के लिए जरूरी होती है जो आस्ट्रेलिया के आजीवन स्थाई निवासी का स्टेटस रखते हैं और आस्ट्रेलिया से बाहर जाना चाहते हैं। पहले यह अनुमति पत्र पासपोर्ट में चिपकाया जाता था, अब यह ईमेल के रूप में भेज दिया जाता है और सिस्टम में अपडेट कर दिया जाता है जिसे कि दुनिया की पासपोर्ट कस्टम अथारिटीज एक्सेस कर सकतीं हैं।

    चूंकि मैं आस्ट्रेलिया से बाहर भारत में भी रहता हूं, अन्य देश भी जाता हूं और भारत की नागरिकता छोड़ना नहीं चाहता हूं। इसलिए मुझे हर वर्ष आस्ट्रेलिया सरकार से आस्ट्रेलिया के बाहर आने जाने के लिए वापसी अनुमति प्रपत्र प्राप्त करना होता है। पिछले वर्ष मैं आस्ट्रेलिया लौट रहा था। दिल्ली से सिंगापुर तक के लिए जेट एयरवेज की सेवाएं ले रहा था। बोर्डिंग पास देते समय एयरवेज कंपनियां पासपोर्ट देखती हैं।

    मैंने पासपोर्ट दिखाया, महिला क्लर्क ने कहा कि आस्ट्रेलिया का वीसा कहां है? मैंने कहा कि हमको वीसा नहीं मिलता केवल वापसी अनुमति प्रपत्र चाहिए होता है, हमने उसको अपना स्थाई निवासी वाला सबूत दिखाया।  क्लर्क ने हमारा पासपोर्ट उल्टा पुल्टा, सारे पन्ने पलट डाले फिर बोली इसमें अनुमति प्रपत्र वाला लेबल दिखाइए, हमने कहा कि सब इलेक्ट्रानिक है आस्ट्रेलिया सरकार लेबल नहीं चिपकाती है। क्लर्क बोली मैं 8 वर्ष से नौकरी कर रही हूं, मैं नियम जानती हूँ।  मैंने कहा कि आप, आपके माता पिता, उनके माता पिता, उनके माता पिता आदि सभी भारत में पैदा हुए तो क्या आप भारत को जानतीं हैं?

    मैंने कहा भारत में लोग सरकारी नौकरियां करते हैं, खूब वेतन लेते हैं, खूब सुविधाएं लेते हैं, खूब करप्शन करते हैं, शक्ति का खूब दुरपयोग करते हैं, लेकिन पूरा जीवन यह नहीं जानते हैं कि जिस नौकरी में वे ताउम्र रहे आखिर उसमें करना क्या था? आप कह रहीं हैं कि आप नौकरी करती हैं इसलिए नियम जानतीं हैं जबकि आस्ट्रेलिया दो तीन साल पहले ही लेबल चिपकाना बंद कर चुका है, यह छोटी सी बात तक आपको नहीं मालूम।

    क्लर्क बोली मैं आपको बोर्डिंग पास इशू नहीं कर सकती, मैंने कहा कि मत कीजिए आपकी मर्जी। लेकिन पहले अपने उच्चाधिकारियों से पूछ लीजिए कि क्या आपको ऐसा करने का अधिकार है? मैंने कहा कि मेरे पास वैध पासपोर्ट है, वैध स्थाई निवासी का स्टेटस है, वैध वापसी अनुमति प्रपत्र है, मैंने आपकी कंपनी को पेमेंट करके टिकट खरीदा है, यदि आपको लगता है कि आपको नियम कानून पता हैं और आपको मुझे रोकने का अधिकार है तो मत दीजिए बोर्डिंग पास। क्लर्क बोली कि उसे मेरा वापसी अनुमति प्रपत्र देखने का अधिकार है, मैंने कहा कि बिलकुल नहीं है, यदि होता तो आपको वह सुविधा जरूर मिली होती जिससे आप मेरे पासपोर्ट से ईलेक्ट्रानिक वापसी अनुमति प्रपत्र को एक्सेस कर सकतीं होतीं।

    मैंने कहा कि आप एक कंपनी के लिए काम करती हैं, आपकी कंपनी व्यापारी है, आपका काम पैसा लेना व सामान व सुविधा बेचना है। यदि मैं गलत होऊंगा तो मुझे भारत सरकार या आस्ट्रेलिया सरकार रोकेगीं आप या आपकी कंपनी नहीं। क्लर्क के चेहरे पर तमतमाहट साफ दिख रही थी। उसने कुछ भी सोचा हो लेकिन बोर्डिंग पास दे दिया।

    मैं सुरक्षा जांच व भारतीय सीमा जांच अधिकारी के पास पहुंचा, उन्होने पासपोर्ट देखा मशीन पर रखा और मुहर लगा दी। मैंने उनको मेरे साथ घटित हुआ वाकया बताया तो उनका जवाब आया कि कंपनी ने जो कुछ साल पहले जो बता दिया होगा वह उसी लकीर को ही मानकर चल रही होगी।

    मैंने अधिकारी को धन्यवाद ज्ञापित किया और हवाई जहाज के लिए वेटिंग लाउंज की ओर बढ़ने लगा।

  • तथाकथित मेट्रो जागरूकता

    सामाजिक यायावर

    मैं अपनी कंपनी के निदेशक मंडल की बैठक के बाद निदेशकों के साथ खान मार्केट, नई दिल्ली के जापानी रेस्टोरेन्ट में डिनर करने गया फिर फ्रांसीसी रेस्टोरेन्ट श्रृंखला लोपरा में डेजर्ट खाने गए। खान मार्केट से दो तीन किलोमीटर पर ही मेरा आशियाना है, लेकिन कभी कभार आटो या टैक्सी की जगह मेट्रो की सवारी छोटी दूरी पर भी अच्छी लगती है वह भी तब जब घर जल्दी लौटना चाहें।

    स्वयं के अतिरिक्त शेष निदेशक मंडल को विदा करने के बाद मैं मेट्रो से घर वापस हुआ। अपना स्टेशन आते ही मेरा मन किया कि मैं मेट्रो स्मार्ट कार्ड में रुपए टापअप करा लूं। मैंने देखा कि सिर्फ एक युवती ही टापअप की लाइन में खड़ी है, भीड़ न होने के कारण मैंने सोचा कि फटाफट टापअप करा लूँ।

    युवती को बताया गया कि उसका कार्ड तकनीकी खराबी रखता है, युवती ने कहा कि उसके कार्ड में काफी रुपए हैं और उसे काफी दूरी पर स्थित मेट्रो स्टेशन के पास अपने घर लौटना है, वह कैसे लौटे, उसको मेट्रो के कारण ऐसी असुविधा झेलनी पड़ रही है, मेट्रो जिम्मेदार है। काउंटर के क्लर्क ने युवती से कहा कि वह नया कार्ड ले सकती है या टोकन ले सकती है और अपने घर जा सकती है। रही बात इस खराब हुए कार्ड की तो वह एक फार्म भर सकती है उसको एक रसीद दी जाएगी और कुछ दिनों बाद उसको खराब हुए कार्ड में पड़े रुपए मिल जाएंगे। क्लर्क ने कहा कि बेहतर कि वह अपने घर के नजदीक के मेट्रो स्टेशन में जाकर फार्म भरे क्योंकि रुपए वापस वहीं से होगें जहां फार्म भरा जाएगा। युवती ने तेज आवाज में चिल्लाते हुए अंग्रेजी बोलना शुरू किया, अंग्रेजी में काऊंटर वाले क्लर्क को बताया कि वह पढ़ी लिखी है, जागरूक है और अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानती है। युवती ने कहा कि मेट्रो के कारण उसको असुविधा हो रही है, उसने पैसे दिए हैं।

    मुझे वहां खड़े खड़े लगभग 15 मिनट हो चुके थे, मुझसे इतनी जागरूकता देखी नहीं गई तो मैंने युवती से कहा कि –

    मैं मानता हूं कि मेट्रो के कार्ड में तकनीकी खराबी हो जाने के कारण आपको असुविधा हो रही है जबकि आपने मेट्रो को पैसे दिए हैं, कार्ड एक ईलेक्ट्रानिक डिवाइस होता है जो कई सालों तक लगातार प्रयोग किए जाने, पर्स व घर में रखे जाने व प्रयोग किए जाने वाले तौर तरीकों के कारण खराब हो सकता है।

    आप मेट्रो द्वारा दी गई असुविधा जो महज कार्ड में हुई तकनीकी खराबी के कारण अनजाने व अनचाहे पैदा हुई है, के प्रति तो जागरूक हैं किंतु पिछले 15 – 20 मिनटों से आप मुझे जो असुविधा दे रहीं हैं, उसका जिम्मेदार कौन है जबकि यह असुविधा आप जानबूझकर दे रहीं हैं क्योंकि आप जानतीं हैं कि मैं आपकी बहस के चक्कर में पिछले 15 -20 मिनटों से लाइन में आपके पीछे खड़ा हूँ।

    मैंने कहा कि क्लर्क आपको समाधान बता चुका है, इतनी छोटी पोस्ट पर काम करने वाला इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकता है, उसे तो वह भाषा भी ठीक से नहीं आती होगी जिस भाषा में आप बात कर रहीं हैं। आप यदि अपने अधिकारों के लिए जागरूक हैं और लड़ना चाहतीं हैं तो उचित अधिकारी के पास जाकर लड़िए, किंतु अपनी सुविधा के लिए मुझे असुविधा देने का अधिकार आपको किस जागरूकता या अधिकार ने दिया …..

    शायद उस युवती को मेरी छोटी सी बात समझ नहीं आई और वह क्लर्क को अंग्रेजी में चिल्लाकर हड़काती रही। मुझे लगा कि मैं अपने कार्ड का टापअप फिर कभी करा लूंगा जब इस युवती की तरह जागरूक नागरिक स्मार्ट कार्ड के काउंटर की लाइन पर खड़े होकर अपनी जागरूकता का प्रदर्शन न कर रहे हों।

    ~~~

    यह जागरूकता नहीं है और न ही अपने अधिकारों के लिए लड़ना है। आपका अधिकार केवल वहीं तक है जब तक आप दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं करते हैं। जागरूकता का मतलब यह है कि दूसरे को असुविधा दिए बिना, दूसरों के अधिकारों का हनन किए बिना अपने अधिकार के लिए लड़ना। जागरूकता व अधिकार पूर्वाग्रह, स्वार्थ, स्वकेंद्रण व अपनी पसंद नापसंद पर आधारित नहीं होते हैं।