Author: संपादक मंडल

  • एक सत्य कथा बनाम हमारी संस्कृति व संस्कार का एक नंगा पहलू

    सामाजिक यायावर

    एक युवा, भावुक व संवेदनशील| अपने माता, पिता, बहन, भाई व मित्रों को प्यार करने वाला| पढ़ने में बहुत अच्छा| B.Tech के बाद IIT बंबई से MBA किया हुआ| भारत में दुनिया की नामचीन कंपनियों में प्रबंधकीय पदों पर काम करना| अपने कलीग्स के साथ अच्छा व्यवहार करना| कुछ ऐसे चरित्र व व्यक्तित्व का युवा|

    मैंने अपनी शादी एक आस्ट्रेलियन वैज्ञानिक महिला से किया जो प्रेम विवाह था| मेरी शादी पहले हुई और चूंकि विदेशी युवती से प्रेम विवाह हुआ, इसलिए मुझसे युवा ने पूछा कि वह शादी कैसे करे, मैने उससे कहा कि जिस व्यक्तित्व के आप हैं आपको प्रेम विवाह करना चाहिए| युवा ने मेरा सुझाव सुनते ही ठुकरा दिया|

    युवा अपने माता पिता व परिवार की मर्जी से शादी करना चाहता था। मैने कहा कि भारतीय समाज में विवाह का मतलब जीवन सहचरत्व नहीं रहा है। जीवन साथी के चुनाव में पारस्परिक समझ, जीवन मूल्यों व पारिवारिक मूल्यों का कोई भी महत्व नहीं रहा है| कसौटियां बदल गई हैं| युवा को सामाजिक परंपराओं व संस्कारों के कर्मकांडों व पोथियों पर विश्वास था|

    युवा के माता पिता ने खूब ठोंक बजाकर एक लड़की खोजी| लड़की उसी शहर की थी जिस शहर का युवा था| लड़की B.Tech थी और एक कंपनी में अच्छे वेतन पर नौकरी करती थी| दोनो का विवाह हुआ, मैं भी विवाह सपत्नीक गया और ठुमके भी लगाए| युवा के माता, पिता, बहन व भाई सभी बहुत खुश| युवा का छोटा भाई ऐसा कि अपने बड़े भाई व परिवार के लिए जान दे दे| छोटा भाई तो बेइंतहा खुश कि उसकी भाभी आ रही है|

    युवा की शादी के कुछ महीने बाद ही पत्नी ने खटपट शुरू कर दी, पैसों के लिए, संपत्ति के लिए, बटवारे के लिए। युवा नहीं चाहता था तो युवा पर दबाव व शादी तोड़ने की अप्रत्यक्ष धमकियां। युवा दोनो तरफ मैनेज करना चाहता था, सौहार्दपूर्ण पारिवारिक जीवन जीना चाहता था। दोनो छुट्टियों में जब अपने शहर आते थे तो युवा को अपनी पत्नी के माता पिता के घर में ठहरना पड़ता था। यहां तक कि अपने माता पिता के घर जाने के लिए भी पत्नी से अनुमति लेनी पड़ती थी। जितनी देर के लिए युवा को अपने माता पिता के पास आने की अनुमति मिलती थी, उससे देरी होने पर पत्नी फोन खड़खडाना शुरू करती थी या युवा के माता पिता के घर झगड़ा करने पहुंच जाती थी।

    दोनों जिस शहर में नौकरी करते थे वहां उनके घर में यदि युवा के माता पिता यदि चंद दिनों के लिए पहुंच जाएं तो पत्नी को बड़ी तकलीफ, माता पिता के सामने तो ऊपर से मुस्कुराए देखभाल करे लेकिन अकेले में युवा का जीना दूभर कर दे| धीरे धीरे मुस्कराते हुए देखभाल करने का ढोंग बंद करके सीधे अपमान करना शुरू। जबकि पत्नी के माता पिता, भाई, बहन महीनों आकर रहते थे तो पत्नी को कोई भी परेशानी नहीं होती थी|

    कुछ समय बाद युवा की माता का देहावसान होता है| युवा पिता बनता है। युवा के छोटे भाई को अपनी भतीजी व भतीजे को छूने का अधिकार भी युवा की पत्नी नहीं देती है| जबकि छोटा भाई अपने भतीजी व भतीजा के साथ रिश्तों को जीना चाहता है आखिर वे उसके अपने बड़े भाई की संताने हैं| इन्हीं मानसिक व भावनात्मक तनावों से कई वर्षों तक गुजरते हुए युवा जीता रहा|

    युवा व उसकी पत्नी छुट्टियों पर आए हुए थे|  युवा अपनी पत्नी, सास, ससुर आदि के साथ उनके किसी रिश्तेदार के यहां मिलने गांव जा रहे थे| लौटते समय रास्ते मे ही युवा मानसिक अवसाद में पहुंच जाता है| युवा की पत्नी, युवा के सास ससुर आदि युवा को वहीं अनजान सड़क पर छोड़कर शहर पहुंचते हैं। युवा के पिता व छोटे भाई को बताते हैं कि युवा पागल हो गया है तो उसको फलाने गांव के पास फलाने रास्ते पर छोड़ आए हैं|

    युवा का छोटा भाई भी IIT से MBA, एक कंपनी के महत्वपूर्ण विभाग का मुखिया। फोन सुनते ही कार से कई सौ किलोमीटर की यात्रा करके अपने भाई के पास पहुंचता है। डाक्टरों से संपर्क करता है, डाक्टर कहते हैं कि युवा पागल नहीं हुआ है बस अवसाद से ग्रस्त है, भावनात्मक व मानसिक आराम व सकून चाहिए|

    युवा के पिता व छोटा भाई युवा की देखभाल करते हैं और सामान्य अवस्था में पहुचाते हैं| इस पूरे समय में युवा की पत्नी व सास ससुर को युवा की कोई चिंता नहीं| जबकि युवा ने कुत्ते की तरह स्वामिभक्ति के साथ अपने सास ससुर को महीनों महीनों अपने घर में रखकर सेवा की, जबकि खुद अपने माता पिता की न की| युवा के ठीक होते ही पत्नी ने उसको नौकरी ज्वाइन करने के लिए बुला लिया|

    युवा के पिता दारू पीते थे, अपने बेटे को अवसाद में देखकर दारू पीना एक झटके में छोड़ दिए। अपने बेटे के पास उसकी देखभाल करने के लिए उसके साथ रहने गए तो युवा की पत्नी उनसे पैसों का हिसाब किताब मांगती। हिसाब भी कैसा। युवा के माता पिता व रिश्तेदार जब जब मिलने आए तो रहने का किराया, भोजन का खर्चा आदि का आधा। युवा की पत्नी का कहना कि घर का खर्च दोनो के पैसे से चलता है तो उसको आधा खर्चा मिलना चाहिए।

    युवा के पिता अपने बेटे के लिए बहू की बेहूदगियां झेलते रहे। वे अपनी पोती व पोते को बहुत प्रेम करते हैं। उनसे कहा गया वे अपने पोते व पोती को चूम नहीं सकते हैं, गोद में नहीं बैठा सकते हैं, लाड़ नहीं कर सकते हैं। तर्क दिया गया कि बच्चों की यदि लाड़ पाने की आदत पड़ गई तो बाहर वालों से भी लाड़ मागेंगे। युवा के पिता मजबूरन अपने बेटे का घर छोड़कर अपने शहर वापस आ गए।

    लेटेस्ट अपडेट यह है कि युवा की पत्नी व पत्नी के माता पिता ने तलाक की बातचीत शुरू दी है। युवा अपनी पत्नी व बच्चों को प्रेम करता है, साथ जीना चाहता है। लेकिन पत्नी को तलाक चाहिए। पत्नी को अपने बच्चों के लिए संवेदनशील पिता नहीं चाहिए। पत्नी को तलाक चाहिए।

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    ऐसी ढेरों घिनौनी और बदबूदार सच्ची गाथाओं से हमारा समाज भरा पड़ा है। लेकिन हम अपनी बदबू दूर करने की बजाए, यह साबित करने में लगे रहते हैं कि दूसरे भी बदबूदार हैं। शायद यही साबित करना ही हमारी संस्कृति है, यही हमारे संस्कार हैं, और हमें अपने ऐसे दोगलेपन पर गर्व होता है।

  • जाति, आरक्षण, योग्यता व हमारी धूर्तता व ढोंग

    विवेक ‘नोमेड’
    सामाजिक यायावर

    जब तक जाति जैसी सबसे पुरानी व सबसे घिनौनी सामाजिक दास व्यवस्था का समूल नाश नहीं होता| तब तक भारत में संवैधानिक आरक्षण खतम नहीं किया जा सकता है| भले ही पूरे देश को गृह युद्ध की आग में झोंक दिया जाए, तब भी नहीं| गृह युद्ध में 70-80 प्रतिशत शारीरिक मजबूत व संघर्ष करने वाले लोगों के समक्ष 25-30 प्रतिशत लोग कैसे ठहर पाएंगे। इसकी कल्पना भी दिलचस्प है।

    महज सरकारी नौकरी व सुविधा व भ्रष्टाचार की नदियों में डुबकी लगाने की अय्याशी के भोग के लिए संवैधानिक आरक्षण का विरोध करने वालों को जाति व्यवस्था में स्वयं को शूद्रों की कैटेगरी में रख कर उन परंपरागत जुल्मों के बारे में भी सोचना चाहिए जो शूद्रों पर लगातार किए गए और आज भी किए जा रहे हैं| चंद सरकारी नौकरियों के न मिलने पर रात दिन आरक्षण को गाली देने वाले धूर्तों की सोच की इतनी छोटी सी भी हैसियत नहीं कि वे जाति व्यवस्था में शूद्रों की स्थितियों की कल्पना तक कर पाएं|

    मुद्दा यदि योग्यता का है, तो आजादी के बाद सरकारी नौकरी के सर्वोच्च पदों व नीति निर्माता स्तर की नौकरशाही में रहते हुए भी देश व समाज के विकास में क्या योगदान रहा इसकी भी खुली बहस होनी चाहिए| योग्यता का मतलब परीक्षा में अंक पाना नहीं होता| शिक्षक कौन हैं, शिक्षा प्रणाली क्या है, परीक्षाओं के मापदंड क्या हैं ऐसी बहुत से गंभीर मसलों पर भी बहस होना चाहिए| योग्यता को साबित करने का दारोमदार टुच्ची व ओछी परीक्षाओं व उनमें प्राप्त अंकों तक ही सीमित करना सामाजिक खणयंत्र के सिवाय कुछ भी और नहीं। यदि मामला योग्यता का है तो बिना सरकारी नौकरी पाए, बिना सरकारी सुविधा पाए देश व समाज का विकास किया जा सकता है, तो दिखाइए योग्यता| या फिर योग्यता का मानदंड व कसौटी सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरी व सुविधा व भ्रष्टाचार की ऐशबाजी तक ही सीमित है|

    देश को आरक्षण ने बहुत कुछ दिया है, शोषण कम हुआ है, जाति की अभेद्य दीवारों पर धक्के लगे हैं। जिन लोगों को परंपरा में नालियों में रहते हुए जीवन यापन करने के लिए विवश किया गया उनने बेहतर स्थानो में बेहतर घर बनाए। जिन लोगों को परंपरा में शिक्षा का अधिकार नहीं दिया गया, उनने लिखना पढ़ना सीखा। जिन लोगों को परंपरा में कुंठित किया गया उनको दो कौड़ी की परीक्षाओं में प्राप्त अंकों को योग्यता का आधार व सबूत मानकर अयोग्य बताना नीचता व धूर्तता व बेशर्मी है।

    योग्यता का लक्ष्य सरकारी नौकरी की अय्याशी भोगने तक ही क्यों सीमित रहती है। वैसे भी सरकारी नौकरियां लगातार घटाई जा रहीं हैं। योग्यता तो दिखावटी बहाना है, मामला तो सत्ता शक्ति व ऐशबाजी में भागीदारी न देने का है। देश के सर्वोच्च नौकरशाही स्तर के पदों पर कितने दलित पहुंचे, इस पर बहस होनी चाहिए। किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी योग्यता के द्वारा प्राप्त की जाती आई है, यह कहना बेहूदी धूर्तता व बेहूदा मजाक के अलावा कुछ भी और नहीं।

    भारत में जातिवादी धूर्तता की नीचता व टुच्चई की इंतहा यह है, कि यहां आज तक कभी भी एक पल के लिए भी आरक्षण का स्वागत अशूद्रों द्वारा नहीं किया गया। आरक्षण के विरोध के लिए बेशर्म व धूर्त तर्क दिए जाते हैं और साबित किया जाता है कि आरक्षण से देश व समाज का कितना नुकसान होता है। यह सारा खेल केवल और केवल सरकारी नौकरी को भोगने व सत्ता शक्ति के लिए ही किया जाता है।

    सरकारी नौकरी व सत्ता शक्ति को भोगने की कड़ी में हजारों लाखों अशूद्र लोगो द्वारा आजादी के बाद से ही फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवा कर फर्जी तरीके से सरकारी नौकरियां को पाकर शूद्रों का शोषण किया गया है, उनका संवैधानिक हक मारकर संवैधानिक अपराध किया गया है। ऐसे धूर्त व नीचता भरे लोगों व समाज से वास्तविक संवेदनशीलता की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

    वैसे यदि किसी सरकार में, किसी मीडिया में, किसी व्यापारी में, किसी में बिना जाति का समूल नाश किए संवैधानिक आरक्षण हटाने का बूता हो तो हटा दे। फेसबुक, व्हाट्सअप आदि में फर्जी बकवास करके खुद को कर्मशील, क्रांतिकारी व परिवर्तनकारी समझने वाले लोग यदि गृह युद्ध की विभीषिका पीढ़ी दर पीढ़ी झेल सकते हों तो भी आरक्षण को नहीं हटाया जा सकता है।

    धूर्तता, नीचता, ढोंग व हिंसा से जबरिया सामाजिक समाधान मिलने के युग अब जा चुके हैं। समाज को अपनी वास्तविकता व वास्तविक हैसियत व क्षमता कभी नहीं भूलना चाहिए। सामाजिक समाधान के लिए सामाजिक ईमानदारी अब जरूरी है। हमें अपनी नीचता, टुच्चई, धूर्तता, कपटता व कमीनीपंथी भरे ढोंग से बाहर आने का प्रयास करना चाहिए।

  • छात्राओं व छात्रों के लिए 100 रुपए प्रतिमाह की कम से कम 12 महीने की अवधि के लिए छात्रवृत्तियों के लिए सूचना

    छात्रवृत्तियों की संख्या = 15 या अधिक
    छात्रवृत्तियों की राशि = 100 रुपए प्रतिमाह कम से कम 12 महीने या अधिक

    छात्रवृ्त्तियों का वर्गीकरण –

    अनुसूचित जन जाति व अनुसूचित जाति वर्ग की छात्राओं के लिए = 5 छात्रवृत्तियां या अधिक
    अन्य वर्ग की छात्राओं के लिए = 5 छात्रवृत्तियां या अधिक
    सभी वर्गों के छात्रों के लिए = 5 छात्रवृ्त्तियां या अधिक

    छात्रवृत्तियों के लिए शैक्षिक योग्यता = 9वीं, 10वीं, 11वीं व 12वीं की छात्रा या छात्र

    • छात्रवृत्तियाँ “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” किताब के लेखक विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग ‘सामाजिक यायावर’ की ओर से दी जा रही हैं।
    • लेखक व पुस्तक के संदर्भ में अधिक जानकारी के लिए आप वेबसाइट   http://www.books.groundreportindia.org   को देखने का कष्ट उठा सकते हैं।

     

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  • भारतीय-दाम्पत्य जीवन व परिवार के व्यवहारिक मूल्य

    सामाजिक यायावर

    जैसे हम मानव-निर्मित ईश्वर को वास्तविक ईश्वर माने हुए हैं, माने हुए हैं कि हमारी सभ्यता विश्व की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता है। वैसे ही और भी बहुत कुछ हम यूं ही माने हुए हैं और माने हुए को मनवाने के लिए दूसरों को अपशब्द कहते हैं, अपमानित करते हैं। अपने द्वारा माने हुए को जबरन तथ्यपरक सिद्ध करने के लिए  दूसरों के प्रति स्वयं को हिंसक भी बनाते हैं। बिलकुल ऐसे ही हम, बस यूं ही मान बैठे हैं कि भारतीय संस्कृति के परिवार व पारिवारिक मूल्य विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि, बस यूं ही मान लेने की अनुकूलता व बंद-दिमाग की जिद से बाहर आकर परिवार व पारिवारिक मूल्यों का ठोस धरातल पर मूल्यांकन किया जाए; तो परिवार की नीव हिंसा, ढोंग, झूठ, बाजारूपन व उपभोक्तावाद से भरी हुई दिखती है।

    हम समाज व देश निर्माण, विश्वगुरू होने की संस्कृति आदि का दावा करते हैं लेकिन मनुष्य व समाज को जीवन मूल्य व संस्कार देने वाली मूलभूत ईकाई परिवार के प्रति कतई गंभीर व जिम्मेदार नहीं होते हैं। हमने परिवार व परिवार की मूलभूत ईकाई विवाह को बाजारू बना रखा है जो मनुष्य में जीवन मूल्यों व संस्कारों को समृद्ध करने के बजाय संभावना के भ्रूण को भी नष्ट करता है।

    हम अपने जीवन साथी तक के चुनाव में अंदर से ईमानदार नहीं होते जबकि हम समाज व देश के निर्माण, विकास व समृद्धि की बात करते हैं। हम भूल जाते हैं कि देश व समाज का निर्माण मनुष्यों के निर्माण से होता है और मनुष्य के निर्माण की मूलभूत इकाईयाँ परिवार व विवाह हैं। जहां परिवार नहीं, वहां समाज नहीं; जहां समाज नही, वहां देश नहीं। खोखलेपन, दोहरेपन व सतहीपन आदि से व्यक्ति, परिवार, समाज व देश कुछ भी न तो निर्मित होता है और न ही समृद्ध होता है।

    यदि ईमानदारी व सूक्ष्मता से पारिवारिक मूल्यों के तत्वों को देखा जाए तो देश व समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की नीव जाति-व्यवस्था के साथ-साथ भारतीय परिवार भी है।

    परिवार में संस्कार व संस्कृति के मायने :

    संस्कृति बोलचाल की भाषा, कपड़े पहनने व भोजन करने के तौर तरीको, त्योहारों व पूजापाठ के कर्मकांडो आदि तक ही संकुचित होती है। वास्तविक जीवन मूल्यों व आंतरिक भाव संवेदना का कोई औचित्य नहीं होता है, उल्टे तिरस्कृत किए जाते हैं।

    संस्कारित स्त्री का तात्पर्य कि निर्धारित किए गए कपड़े पहने, किसी पुरुष से मित्रता न करे, प्रेम की स्वतंत्रता की मांग न करे। किसी पुरुष से कल्पना में भी भावात्मक प्रेम भी न करे। विवाह अर्थात् माता पिता जिस पुरुष से शारीरिक संभोग करने के लिए  निर्धारण करें केवल उसी पुरुष से शारीरिक संभोग करे और उस पुरुष के लिए  संताने पैदा करे। बचपन से विवाह तक माता पिता व भाई आदि की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले और विवाह पश्चात् अपने सास ससुर व पति की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले।

    संस्कारित पुरुष का तात्पर्य कि पुरुष परिवार के लिए  संपत्तियां अर्जित करे और सुविधाएं एकत्र करे और संपत्तियों व सुविधाओं से अपने माता पिता, पत्नी व संतानों की देखभाल करे। बचपन से लेकर युवा होने तक माता पिता ने देखभाल किया है इसलिए   पुत्र अपने माता पिता की मृत्यु तक उनकी देखभाल करे और आज्ञाकारी बन कर रहे। केवल संपत्ति व सुविधा अर्जित करने के तौर तरीको में विशेषज्ञता प्राप्त करे और माता पिता जिस स्त्री से विवाह कर दें, उसी स्त्री के साथ शारीरिक संभोग करे और उस स्त्री का प्रयोग अपने लिए  संताने उत्पन्न करने के लिए  करे।   

    माता पिता द्वारा तय किया गया विवाह :

    माता-पिता द्वारा तय किए गए विवाह में लड़की व लड़के को सभ्यता व संस्कारों के मूल्यों की कसौटी में मूल्यांकन करने का जबरदस्त प्रचलन है, इस प्रचलन को लड़का या लड़की को परिवार व समाज की संस्कृति की रक्षा व समृद्धि के लिए  ठोंक बजाकर चुनना कहा जाता है; इस प्रक्रिया में बहुत सारी लड़कियां व लड़के अस्वीकृत किए जाते हैं, ताकि अपने पुत्र के लिए  सेवाभावी संस्कारी पत्नी और पुत्री के लिए  देखभाल करने वाला प्रतिष्ठित पति खोजा जा सके।

    पुत्रवधू के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़की अपने ही धर्म व जाति की हो, लड़की स्वर्ग की अप्सरा जैसी सुंदर हो, बहुत अमीर घर की हो या अच्छे वेतन व सुविधा वाली सरकारी या गैर सरकारी नौकरी करती हो या दोनो, मुंहमागा दहेज लेकर आए, भाई न हों तो और बेहतर ताकि माता पिता की चल-अचल संपत्ति में हिस्सा भी मिले, प्रतिष्ठित परिवार की हो ताकि लड़के वालों का सामाजिक कद भी बढ़ जाए आदि आदि प्रकार की सभ्यता व संस्कारों से संपन्न गुणी लड़की को पुत्र की पत्नी होने के लिए  प्राथमिकता दी जाती है।

    ऊपर बताए गए मानकों की सभ्य व संस्कारी लड़की मिलने पर उसको चलाकर देखा जाता है ताकि उसके लंगड़ेपन की जांच हो सके, गाना गवाकर देखा जाता है ताकि उसके गूंगेपन की जांच हो सके, किसी प्रकार जुगत लगाकर लड़की के शरीर के आंतरिक अंगों को भी किसी विश्वसनीय महिला द्वारा देखे जाने का प्रयास किया जाता है ताकि शरीर में दाग-धब्बे आदि की जानकारी हो पाए, कुछ संस्कृतिवान लोग तो लड़की के अंतः वस्त्र तक उतरवा कर जांच करना चाहते हैं ताकि शरीर में छुपे हुए दाग व धब्बों की पूरी जानकारी मिल सके और वे लड़की के परिवार वालों से ठगा हुआ न महसूस करें।

    जामाता के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़का अपने ही धर्म व जाति का हो।  लड़के के माता पिता के पास चल अचल संपत्ति हो या लड़का ऊंचे वेतनमान व सुविधाओं की सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करता हो या दोनो। लड़का सुंदर हो किंतु यदि लड़का बहुत अमीर है और बदसूरत है तो उसकी अमीरी के कारण उसको सुंदर और सुपात्र मान लिया जाता है। लड़का इकलौता हो तो और अच्छा, लड़के की बहन न हो तो और अच्छा। लड़का ऊपरी कमाई वाली सरकारी नौकरी में हो तो सबसे अधिक संस्कारी और सुपात्र माना जाता है।

    माता पिता द्वारा तय किए गए विवाहों को परंपरा में केवल इसलिए   सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है क्योंकि इसमें लड़का या लड़की अपना जीवन साथी अपनी विचारशीलता व समझ के आधार पर नहीं बल्कि अपने माता पिता की इच्छा के आधार पर चुनते हैं।

    प्रेम विवाह :

    चूंकि परंपरा में प्रेम को स्त्री पुरुष के मध्य यौन संभोग तक ही संकुचित कर दिया गया है; इसलिए   माता पिता के द्वारा तय किए गए विवाह और प्रेम विवाह में केवल एक ही अंतर रह पाता है, वह यह कि एक में माता पिता द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है जबकि दूसरे में अपने द्वारा पसंद किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है। बाकी सब कुछ समान ही रहता है।

    परिवार में सहज प्रेम व पारस्परिक विश्वास की जीवंतता न होने से युवक या युवती को सहज प्रेम की अनुभूति नहीं होती। परिवार में यौन से संबंधित चर्चा बच्चों व किशोरों के लिए  प्रतिबंधित होती है, अश्लीलता माना जाता है।

    माता पिता आपस में यौन संभोग करते हैं किंतु यह मानने को तैयार नहीं होते कि स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर व शारीरिक क्रियायें प्राकृतिक हैं, कुछ भी बुरा नही, कुछ भी छुपाने लायक नहीं। स्त्री के अंगों को अश्लील मानते हैं, छुपाने लायक मानते हैं।

    उचित जानकारी के अभाव में किशोर यौन कुंठित हो जाता है, इसलिए   अपवाद को छोड़कर प्रेम विवाह में भी सहज प्रेम प्रस्फुटित नहीं हो पाता है; प्रेमी प्रेमिका सहज प्रेम व यौन आकर्षण में अंतर ही नहीं कर पाते परिणामस्वरूप उनका प्रेम विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण व वासना तक ही संकुचित हो जाता है।

    यही कारण है कि बहुत मामलों में लड़की अपने प्रेमी को एक झटके में केवल इसलिए छोड़ देती है कि उसके माता पिता द्वारा खोजा गया लड़का उसके प्रेमी की तुलना में अधिक अमीर और कमाऊ है; और ऐसा करते ही उस लड़की को उसके माता पिता व परिवार द्वारा समझदार, तीव्रबुद्धि व संस्कारी मान लिया जाता है। प्रेमी के साथ यौन संबंधो के बावजूद उस लड़की को चरित्रवान व संस्कारी लड़की माना जाता है।

    ऐसा ही लड़के के लिए  भी है; जब वह माता पिता द्वारा खोजी गई अमीर लड़की, दहेज व सुविधाओं आदि के लिए  अपनी प्रेमिका को एक झटके में छोड़ देता है।

    प्रेम विवाह व माता पिता द्वारा तय किए विवाह का चरित्र बिलकुल एक सा ही होने के बावजूद प्रेम विवाह सामाजिक रूप से केवल इसलिए   तिरस्कृत होता है क्योंकि प्रेम विवाह में जाति या धर्म के बाहर का मनुष्य प्रेमी या प्रेमिका हो सकता है और माता पिता के द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के बजाय अपनी पसंद के मनुष्य के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं और संतानोत्पत्ति की जाती है।

    परिवार में पति पत्नी  :

    अपवादों को छोड़कर विवाह होने के पश्चात् कुछ दिनों तक दोनों पक्षों की ओर से सामंजस्य, संतुलन आदि का ढोंग चलता है। लेकिन समय के साथ-साथ जब पति पत्नी अपने वास्तविक चरित्र के साथ जीना शुरू करते हैं, तो आपसी टकराहटें शुरू होतीं हैं। ऐसी स्थिति आने पर जो पति पत्नी अपने स्वार्थ व अहंकार से बाहर आकर संतुलन नहीं कायम कर पाते हैं, वे अपने वैवाहिक जीवन को नर्क बनाते हैं।

    दरअसल लड़का, लड़की, माता, पिता आदि यह भूल जाते हैं कि उनमे अच्छाई व बुराई दोनों ही हैं और वे समाज व परिवार की अनुकूलता के ही उत्पाद हैं; जैसे वे खुद हैं वैसे ही उनकी पत्नी, पति, बहू, दामाद, पुत्र, पुत्री आदि भी हैं।

    ये लोग स्वार्थ, लिप्सा व बाजारू भोग के नशे के अंधेपन में यह भूल जाते हैं कि विचार, संस्कार, विनम्रता, शुद्धता, प्रेम, समर्पण, त्याग आदि मूल्य जीवन में जीवंतता से जिए जाते हैं।  ऐसे लोगों की ईमानदारी, विश्वास व प्रेम का कोई ‘वास्तविक जीवन मूल्य’ नहीं होता।  ऐसे लोग पूरा जीवन रोते झींकते गुजारते हैं और समय के साथ-साथ परिवार व समाज में जाने अनजाने ऋणात्मकता ही बढ़ाते हैं।

    परंपरा में विवाह संस्था में सहज व स्वतंत्र जीवन सहचरत्व का मूल्य विकसित करने के बजाय स्त्री व पुरुष के यौन संबंध से संतान पैदा करने व पैदा की गई संतान को अपने जैसा ही संकुचित, अनुकूलित, कुंठित व परतंत्र बनाने वाली संस्था बना दिया गया है; जिसमें मनुष्य के भावों, प्रेम व स्वतंत्रता आदि का कोई स्थान व महत्व नहीं है। सब कुछ बने बनाए ढांचे से ही तय होता है।

    परिवार में बच्चे :

    चूंकि विवाह संस्था के ढांचे में ही सहज प्रेम उपेक्षित व तिरस्कृत किया जाता है, इसलिए   बच्चों का पालन पोषण भी ढांचे की अनुकूलता के संकुचित प्रभाव क्षेत्र के दायरे में ही होता है। अनुकूलता के प्रभाव क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करना ही संस्कृति व संस्कार का ध्वस्त होना मान लिया जाता है।

    माता पिता व परिवार द्वारा बच्चों में स्वतंत्र व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना तक की भ्रूण हत्या की जाती है। बच्चे  स्वतंत्र अस्तित्व वाले चेतनशील जीवंत मनुष्य के बजाय माता पिता की व्यक्तिगत संपत्ति माने जाते हैं; यही कारण है कि माता पिता व बच्चों के संबंध सहज व मौलिक प्रेम के बजाय अनकही किंतु तीव्र अपेक्षाओं के व्यापाराना लेनदेन पर आधारित होते हैं।

    ऐसी अनुकूलता व कुंठित वातावरण मनुष्य व समाज का विकास व चेतनशीलता अवरुद्ध कर देते हैं और बचपन से ही मानसिकता दूषित व कुंठित कर देते हैं।  बच्चा मौलिकता व स्वतंत्रता के बजाय व्युत्पन्न अनुकूलता की परतंत्रता की ओर बढ़ता जाता है और इन्ही के सख्त व संकुचित दायरों में आजीवन कुंठित होकर रह जाता है। ऐसे ही चक्रों के कारण कुंठा व मानसिक परतंत्रता पीढ़ी दर पीढ़ी और गहरे व्याप्त होती चली जाती है।   

    चलते-चलते :

    परिवार व विवाह संस्था के भावों व मूल्यों को अपनी जरूरत के अनुसार परिभाषित करके प्रायोजित करते हुए कुंठित व परतंत्र मानसिकता के व्यापाराना ढांचे को संस्कृति का नाम दे दिया गया है। यही कारण है कि वास्तविक जीवन-मूल्य, संस्कार, संस्कृति, स्वतंत्रता व चेतनशीलता आदि अपवाद परिवार में ही परिलक्षित होता है।

    साभार – “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” किताब के एक खंड से लिया गया.

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  • किताब की प्रस्तावना :: देश व समाज का निर्माण मनुष्य का दायित्व है

    मनुष्य के बिना देश हो ही नहीं सकता, और जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहां देश होगा ही होगा। मनुष्य बड़ा है देश से, क्योंकि मनुष्य बनाता है देश। देश की सत्ता, मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही बनाता व निर्धारित करता है। मनुष्य है तो देश है, बिना मनुष्य के देश का कोई अस्तित्व नहीं। यही सहज सामाजिक तथ्य है, शेष तर्क व परिभाषायें राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने वर्तमान अस्तित्व के लिये तोड़मरोड़ कर उनके अपने निहित-स्वार्थों के लिये थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिये देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है जिसका निर्माता मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़ गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की किताबों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा।

    यही बदलाव का दिन वास्तविक व व्यापक परिवर्तन का दिन होता है। सत्ता को चलानें वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है, इस यथार्थ को समझना व चारित्रिक रूप से जीना ही मनुष्य का लोकतांत्रिक होना है। मनुष्य की इस लोकतांत्रिकता के द्वारा ही उसका देश लोकतांत्रिक बनता है। किसी देश को उस देश को बनाने वाले मनुष्य लोकतांत्रिक बनाते है, दूसरे शब्दों में लोकतांत्रिक मनुष्य ही देश को लोकतांत्रिक बनाता है, न कि देश का कानून, संविधान व सत्ता प्रणाली। सत्ता प्रणाली राजतंत्रीय होते हुये भी देश व देश का मनुष्य लोकतांत्रिक हो सकता है।

    मनुष्य देश का निर्माण करता है। देश का निर्माण धार्मिक समूहों, राजनैतिक समूहों व आर्थिक तंत्रों आदि पर न तो निर्भर करता है और न ही इन सब से देश निर्माण की अपेक्षा ही की जानी चाहिये।

    देश निर्माण मनुष्य की जिम्मेदारी है। धार्मिक समूह, राजनैतिक समूह व आर्थिक तंत्र आदि मनुष्य द्वारा निर्मित देश के विभिन्न अवयव होते हैं, जिनको वर्तमान प्रासांगिकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है। मनुष्य देश निर्माण की प्रक्रिया में विभिन्न अवयवों का निर्माण करता है, फिर उन्हें परिवर्तित करता है। अवयवों के निर्माण व परिवर्तन की प्रक्रिया में वह सीखता है और बेहतर निर्माता बनता है। और यही बनाना और सीखना ही मूलरूप में लोकतांत्रिक होना होता है…. यही है लोकतंत्र का मूलभाव।

    देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचनात्मकता है। इसलिये जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।

    सत्ताओं में व्यापक-सामाजिक-परिवर्तन का कोई सामाजिक-अवतार नहीं होता
    सामाजिक-अवतार राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम-मनुष्य के समाज में होते हैं

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भीसामाजिक-अवतार नहीं होता जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। सामाजिक-अवतार तो आम समाज से अंकुरित व पुष्पित होते है और मनुष्य निर्मित सत्ताओं के बिना रहते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्ही तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जानें का साहस व दृष्टि हो ही नही सकती है।  इसीलिये तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते है, ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिस्थापित किये गये हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह वास्तव में आम मानव का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह होती है, जिसमें सबसे नीचे का आधार सबसे चौड़ा और सबसे ऊपर की चोटी सबसे नुकीली और सबसे कम चौड़ी होती है।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाकर व दबाये रहते हुये ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिये मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, व्यापक-समाधान की दृष्टि नही रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    विश्व में अ-आयुधनिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलकर ही हुये हैं।

    यह किताब धन, मोहकता व मीडिया आदि के प्रायोजन के कारण बड़े दिखने वाले अदूरदर्शी व तात्कालिक लक्ष्य वाले कामों की चर्चा को नहीं करेगी या अत्यधिक प्रासांगिक होने पर ही करेगी। किताब मे ईमानदार व दूरदृष्टि वाले प्रयासो की चर्चा की गई है। जिनसे वास्तव मे समाज का वास्तविक विकास हो सकता है, दिखा है, हुआ है। इनमें से लगभग सभी कामों को या तो मैने नजदीक से देखा है, या मै खुद सक्रिय रूप से भागीदार रहा हूँ। यह किताब उद्योगपति, नौकरशाह, किसान, सामाजिक-संस्था आदि के द्वार आम-मनुष्य के तौर पर किये गये कार्यों व प्रयासों की बात करती है, जिनने देश व समाज को उत्तमता की ओर बढ़ने की दिशा दी, प्रेरित किया, गति दी।

    यह किताब उन लोगों के लिये बहुत कुछ लिये हुये है, जो लोग भारतीय समाज के विकास व समाधान के लिये ईमानदार सोच व प्रतिबद्धता रखते हैं।

    यह किताब ऐसे ही मनुष्यों को समर्पित है, ऐसे ही लोगों की चर्चा करती है, जो संज्ञानता या बिना-संज्ञानता के देश के निर्माण, पोषण व उत्तमता की ओर ले जाने के लिये विचार करते हैं, प्रयास करते हैं, कर्म करते हैं।

    —–
    द्वारा
    विवेक ग्लेंडेनिंग उमराव ‘नोमेड’
    www.nomadhermitage.groundreportindia.org

  • आप और मैं

    आप और मैं

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मैं तब भी मेहनत करता था
    मैं आज भी मेहनत करता हूं

    आप तब भी वादे करते थे
    आप आज भी वादे करते हैं

    नियति 
    आपने जबरन बनाई
    या
    आपके बनाये ईश्वर ने बनाई

    कुछ तो है 
    जो 
    मेहनतकश को नीचे रखता है
    मेहनतकश को कुचलने वाले को ऊंचे रखता है

    विज्ञान आपका
    बाजार आपका
    तकनीक आपकी
    मुद्रा आपकी

    कानून आपके
    राष्ट्र आपके
    सेना आपकी
    संविधान आपके

    जीवन मूल्य आपके
    धार्मिक किताबें आपकी
    मंदिर आपके
    पुरोहित आपके 

    अपराध की परिभाषाएं आपकी
    अपराध को लिये नियत दंड आपके
    अपराधी आपके 
    न्यायालय आपके
    न्यायाधीश आपके

    सबकुछ आपका
    केवल एक को छोड़कर
    और वह एक है
    मुझ जैसा ‘मेहनतकश’

    पता नहीं क्यों 
    आप 
    मेहनतकश को अपना नहीं मानते

    पता नहीं क्यों 
    आप 
    भयभीत रहते हैं मेहनतकश से

    जो सहज प्राकृतिक नियमों
    को इतर रखकर
    आपनें सबको असहज करने
    के तंत्र बनाये

    आपनें डरकर तंत्र बनाये
    खुद को सहज करने को
    लेकिन खुद को घोर
    असहजता ही दी।

    कभी सोचा आपने
    कि
    वास्तव में आपको
    भयभीत
    मुझसे होना था
    या
    खुद अपने आपसे। 

    बस यही कहना था
    और 
    हजारों साल के 
    शोषण व अन्याय
    के बावजूद
    यह कह पाने की
    हिम्मत
    आज भी है
    मुझमें।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • एक मुठ्ठी चावल से अंगूठा-छाप आदिवासी महिलाओं के स्वावलंबन व आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ते कदम 

    सामाजिक यायावर

    छत्तीसगढ़ राज्य के दंतेवाड़ा जिले में एक गांव है जहां की महिलाओं नें एक मुठ्ठी चावल जमा करना शुरू किया फिर हांडी भर जानें पर गांव भर से हांडियां जमा कर चावल एकत्र करके बेचकर कमाये पैसों से कुटीर उद्योग का काम शुरू किया।

    अचार, बड़ियां, कपड़ा सिलना आदि काम करतीं हैं। ईंट भी बनातीं हैं, खेती भी करतीं हैं।

    एक मुठ्ठी चावल जमा करना आज भी जारी है जबकि इनके समूह में लाखों रुपये का ट्रांजेक्शन होता है।

    इनके पास जनलोकपाल पर आश्रित होकर अपनीं प्रगति की कल्पना करते हुये सरकारी तंत्र को गरियानें की कोई महान-क्रांतिकारिता नहीं।

    ये लोग तो जो इनसे हो सकता है वह भी खालिस अपनें दम पर बिना बाहरी सहायता के, उद्योग करतीं हैं।

    आप समझदार लोग जो मर्जी चिल्लायें लेकिन मुझ जैसे गवांर का बहुत स्पष्ट रूप से मानना है कि देश में बड़े बदलाव इन जैसी उद्यमी महिलाओं से ही होगें न कि मुद्रा आधारित भ्रष्टाचार की बात करनें वाले जादुई जन-लोकपाल आदि राजनैतिक सत्ता प्राप्ति के चोचलों से।

    काश भारत के लोग व मीडिया इन जैसी अंगूंठा छाप किंतु दूरदृष्टि रखनें वाली महिलाओं के साथ खड़े हो पानें की सोच, समझ, साहस व सामाजिक इमानदारी रखते होते।
    ………….‌… काश …..

     

     

  • ‘लोकतंत्र’, ‘साहब’, ‘जनलोकपाल’ और ‘बेरोकटोक-सत्ता-भोग’ की महात्वाकांक्षा

    सामाजिक यायावर

    ‘मेरी समझ में कुछ बातें नहीं आती हैं जैसे कि साहब यदि सच में ही ‘जनलोकपाल’ बिल लाना चाहते हैं तो लोकतंत्र का आदर क्यों नहीं करते हैं। इनके इस दावे का कि इनके अलावे बाकी सब लुच्चे लफंगें है और केवल इनकी ही पार्टी के लोग शुद्ध-बुद्ध हैं इसलिये देश की जनता को इनको पूर्ण बहुमत देना चाहिये ताकि साहब ‘जनलोकपाल’ कानून बना पावें……. में बहुत ही बेसिक नुक्श हैं, जिनकी चर्चा ‘साहब’ कभी नहीं करते हैं।

    भारत के संविधान के अनुसार तो ‘साहब’ को ‘जनलोकपाल’ कानून बनानें के लिये 362 सांसद लोकसभा में और 160 सांसद राज्यसभा में चाहिये। जो कि साहब की पार्टी केवल अपनें दम पर ले आयेगी ऐसा साहब जी के जीते जी हो पायेगा ऐसा लगता नहीं है क्योंकि 2014 इनकी पार्टी का सबसे स्वर्णिम अवसर है और इस बार इनकी पार्टी चुनाव ही लड़ रही है कुल 350 सीटों में, यदि साहब की पार्टी सभी 350 सीटों में जीत जाती है तब भी लोकसभा में 12 लोग और और राज्यसभा में 160 सांसद कहां से लायेंगें।

    अब सवाल यह उठता है कि जब साहब अपनें दम पर ‘जनलोकपाल’ कानून बना ही नहीं सकते हैं तो क्या यह सब धींगामुस्ती खुद के लिये बेरोकटोक सत्ता का भोग करनें के लिये ही है…….

    पता नहीं क्यों ‘साहब’ की अधिकतर बातें, दावे और तर्क बिलकुल ही हजम नहीं हो पाते हैं और थोड़ी सी ही गवईं-अकल लगाते ही बातों के बताशों की तरह ढेर हो जाते हैं।

    ‘साहब’ जिस लोकतंत्र को रोज गलियाते हैं, उसी लोकतंत्र नें सिर्फ ‘साहब’ की हवाई बातों और दावों पर विश्वास करके सत्ता सौंप दी।

    ‘साहब’ को अपनीं खुद की राजनैतिक महात्वाकांक्षा से बाहर निकलकर सच में ही देश, देश के असल व बहुसंख्य समाज और देश के लोकतंत्र का आदर करना सीखना चाहिये।

  • उत्तर प्रदेश और बिहार सामाजिक व राजनैतिक चेतना के अतिवादी राज्य हैं

    0-Nomad-Hermitage-Vivek-Glendenningगांधी जी का "नील" आंदोलन की धरती बिहार थी। देश में अंग्रेजों की दासता को नकारनें का काम जिन मंगल पांडे जी नें किया था वे उत्तर प्रदेश के ही थे। एक महिला होकर भी अंग्रेजों से भीषण पंगा लेंनें वाली झांसी की रानी भी उत्तर प्रदेश की ही थीं। 

    इन दोनों राज्यों में लगभग हर जिले में ऐसे लोग मिल जायेंगें जिन्होनें समाज को शिक्षित करनें के लिये शिक्षा संस्थानों के लिये सैकड़ों/हजारों एकड़ जमीन एक झटके में बिना किसी लाग-लपेट के दान कर दी होगी।

    मैं भूदान आंदोलन की बात नहीं कर रहा हूं। ऐसे बहुत उदाहरण हैं जो कि उस समय के हैं जबकि खुद विनोबा जी को नहीं पता था कि वे कभी भूदान-आंदोलन चलायेंगें 🙂 ।

    काशीराम जी की बात को समझनें और आगे बढ़ानें वाला राज्य भी उत्तर प्रदेश ही था, जबकि काशीराम जी नें अपनें जीवन के बेहतरीन साल पंजाब जैसे राज्यों को दिये। 

    जयप्रकाश नारायण जी बिहार की धरती में अवतरित हुये थे। 

    उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में एक से बढ़कर एक राजनैतिक व सामाजिक आंदोलन हुये हैं। लालू, मुलायम, काशीराम, मायावती, नितीश कुमार, कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह आदि जैसे राजनेताओं का उदय और ऊंचाई पर बीसियों वर्षों के जमीनी संघर्षों को लगातार करते हुये पहुंचना … इन राज्यों के दबे-कुचले समाज की सामाजिक व राजनैतिक चेतना के ही कारण हो पाया। और ये सभी राजनैतिक प्रक्रियायें "सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन" ही रही हैं। और इस यथार्थ को किसी भी तर्क/वितर्क/कुतर्क से नकारा नहीं जा सकता है। 
     

    देश में आपातकाल लागू करवानें, हजारों लोगों को महीनों जेलों में सड़वानें और फिर आपातकाल को फेंक देनें जैसी अतिवादी राजनैतिक चेतना के सूत्रधार उत्तर प्रदेश व बिहार राज्य ही थे। 

    भारत में साम्यवाद को मजबूत आधार देनें का श्रेय उत्तर प्रदेश के ही जिले "कानपुर" को जाता है।

    उत्तर प्रदेश व बिहार के समाज नें सामाजिक व राजनैतिक चेतना को भी प्राथमिकता दी बाकी अन्य राज्यों की तरह एनकेन प्रकारेण बाजारीकरण  के कथित विकास के पीछे अंधे-भक्तों की तरह नहीं भागे। 

    सामाजिक व राजनैतिक चेतना के अतिवादी स्तर के कारण इन दोनों राज्यों में राजनीति करना और राजनैतिक सत्ता प्राप्त करना आसान नहीं है। 

    वैसे लोकतंत्र में राजनैतिक बकैती और बकलोली करनें का भी अपना अलग मजा है। किंतु हम तो आपको भारत में राजनैतिक चेतना के खिलाड़ी तब मानेंगें जब आप इन दो राज्यों में सम्मानजनक तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर कुछ उखा़ड़ पायें। 

    इन दो राज्यों नें अच्छों अच्छों को राजनीति करना सिखा दिया है, आपको भी सिखाया जायेगा बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के। सीखनें के पहले एक बात समझ लीजियेगा कि यहां के गांवों में लगभग हर आदमी अपनें घर में चुनाव, राजनीति और राजनैतिक परिवर्तन नाम की बकरियां बिना रस्सी के ही छोड़े रखता है लेकिन क्या मजाल कि बकरियां घर की डेहरी पार कर जायें 🙂 । 

    गांधी जी तो बता ही गये हैं कि बकरी का दूध मष्तिक के लिये बहुत लाभदायक होता है। 🙂
    भारत के दक्षिण से कुछ ऊपर में स्थित एक राज्य के लोगों की तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों नें गांधी के साथ उठनें बैठनें वालों के व्यक्तिगत नामों के व्यक्तिगत-पहचान-कारपोरेट्स तो नहीं बनाये हैं लेकिन राजनैतिक-चेतना की बकरियां पालना जरूर ही खूब बढ़िया से जानते हैं।  

    चलते चलते एक बात और- उत्तर प्रदेश और बिहार के गांव आज भी लोगों का स्वागत करते हैं और सामाजिक लोगों को प्रेम करते हैं और साथ खड़े होते हैं। शुरुआत विश्वास से करते हैं किंतु एक सीमा से बाहर सामाजिक-धोखों को नहीं स्वीकारते हैं। स्वागत करना आता है तो धता बताना भी आता है। 

    सादर प्रणाम
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग "नोमेड"
    एक गवांर जाहिल यायावर 
     

  • आदरणीय मित्रों से एक सविनय निवेदन : गंभीर लेखों के मसले पर

    0-Nomad-Hermitage-Vivek-Glendenningआदरणीय मित्रों,

    सादर प्रणाम

     

    आपके प्रेम, आपकी सक्रिय भागीदारी और मेरा उत्सावर्धन करते रहनें के लिये मैं आपका हार्दिक आभारी हूं। गंभीर लेखों के संदर्भ में मैं आप सुधिजनों के समक्ष अपना सविनय निवेदन रखना चाहता हूं, आप मेरे निवेदन पर विचार करनें की कृपा कीजिये। सादर 

     

    मैं एक मान्यता प्राप्त प्रोफेशनल जर्नलिस्ट हूं, कुछ छोटी मोटी प्रिंट व आनलाइन पत्रिकाओं का संपादक भी हूं जिसमें कि एक 120 पृष्ठ की मल्टीकलर अंग्रेजी भाषा की प्रिंट जरनल भी है जो कि गंभीर सामाजिक मसलों में गंभीर लेख व विश्लेषणात्मक रिपोर्ट्स प्रकाशित करती है। 

     

    मेरी चंद रिपोर्ट्स दुनिया की प्रतिष्ठित प्रिंट-जर्नल्स में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। मैंने UN, UNICEF, EU जैसी वैश्विक संस्थाओं को उनके कुछ वैश्विक-दस्तावेजो को बनानें में एक जर्नलिस्ट के रूप में सहयोग भी किया है और उनके द्वारा मुझे सम्मानजनक तरीके से धन्यवाद भी ज्ञापित किया गया है। 

     

    मेरे पास एक जर्नलिस्ट/संपादक के रूप में बस यही कुछ चंद छोटे मोटे अनुभव हैं और कुछ खास नहीं। मैं अभी सीख रहा हूं और संभवतः आजीवन सीखूंगा। मैं आभारी हूं जो कि आपमें से बहुत मित्रों से समय समय पर बहुत कुछ सीखनें को मिलता रहता है। 

     

    मैं आपसे कुछ विनम्र निवेदन करना चाहता हूं। कुछ ऐसी बातें हैं जो कि मुझे आपसे कुछ और सीख पानें से हतोत्साहित करतीं हैं। कुछ मसले हैं जिनको कि मैं आपके समक्ष सादर प्रेषित करना चाहता हूं ताकि आपसे और बेहतर सीख पानें में मुझे हतोत्साहन नहीं महसूस हो। सादर

     

    मेरी अधकचरी समझ के अनुसार-

     

    लंबे व गंभीर लेख लिखना टीवी-चैनल्स की बाइट्स, अखबारों की हेडलाइन्स और मैगजीन्स की सुर्खियां पढ़कर/देखकर प्रतिक्रियास्वरूप चंद लाइनें लिखनें जैसा या बाइट्स लिखनें जैसा नहीं होता है या अखबारी खबर लिखनें जैसा भी नहीं होता है जिसमें घटना की सूचना भर दे देनी होती है या खबरों की हेडलाइन आदि का लिखना जैसा भी नहीं होता है। 

     

    लंबे व गंभीर लेख, लेखक लिखनें के पहले सोचता है, विचारता है, अध्ययन करता है, तथ्यों की पड़ताल करता है …. फिर लिख पाता है। जो नये लेखक होते हैं उनको लिखनें में बहुत समय लगता है, किंतु जो लोग लंबे समय से लिख रहे होते हैं उनके अंदर हरसमय कुछ न कुछ चिंतन/आब्जरवेशन चलता रहता है सो लिखना तुलनात्मक रूप से बहुत ही कम समय में हो जाता है। 

     

    मेरा सविनय निवेदन जो कि मेरी अधकचरी समझ के ऊपर आधारित हैं:

    • लेख/पोस्ट का मूल विषय लेख/पोस्ट होता है न कि लेख/पोस्ट में की गयी कमेंट्स:
      आपमें से कई लोग कमेंट्स में केवल यह बतानें के लिये आते हैं कि पोस्ट का विषय क्या होना चाहिये था और अपनी कमेंट्स से मुझ पर लेख/पोस्ट के मूल-विषय को बदलनें का दबाव भी डालते हैं और लगातार बहस करते हैं। और यदि मैं उनका दबाव नहीं स्वीकारता हूं तो मुझे अहंकारी/शंखनादी आदि आदि जैसी सांस्कृतिक-गालियों से सुशोभित करते हैं।

      चूंकि आप मेरे मित्र हैं, इसलिये मेरी अधकचरी समझ का आदर करना सीखिये। मैं आपकी पोस्ट में आकर आपसे कभी नहीं कहता कि आपको क्या लिखना या क्या नहीं लिखना चाहिये …. आप भी मेरे लेखों/पोस्टों में मुझे यह न बताईये कि मुझे क्या लिखना चाहिये था।

      यदि आपको लगता है कि मेरी अधकचरी समझ बेहतर नहीं है तो आप खुद लेख/पोस्ट लिखिये ताकि मुझे भी आपसे सीखकर परिष्कृत होनें का अवसर मिल सके।

    • आप मेरे मित्र होनें के नाते या मेरे पाठक होनें के नाते मुझे किसी विषय में लेख/पोस्ट लिखनें का आदेश दे सकते हैं। और यदि मुझे उस विषय की जानकारी होगी तो मैं आपका आदेश सिर-माथे रखूंगा।
      किंतु आप जब लिखे जा चुके लेख/पोस्ट के मूल-विषय में ही प्रश्न खड़ा करते हैं तो यह आपका मुझे गाली ही देना होता है और कुछ भी नहीं। भले ही आपकी भाषा कितनी भी संतुलित क्यूं न हो। 
       
    • रचनात्मकता, रचना और रचनाकार का आदर करना भी मानवीय संवेदनशीलता का आधारभूत जीवन-मूल्य है।
      मूल-विषय के बिंदुओं में सहमति/असहमति हो सकती हैं और ऐसा होना प्रशंसनीय है किंतु मूल-विषय के औचित्य को ही नकारनें का मतलब आप रचनाकार और रचना को गाली दे रहे हैं और खुद के अहंकार को पोषित कर रहे हैं, और अपनें अहंकार के कारण दूसरों पर मानसिक हिंसा भी कर रहे हैं।
       

    जिस प्रकार के लेखों को लोग पैसे लेकर लिखते हैं उस गुणवत्ता के लेखों को मैं बिना किसी आर्थिक लाभ के लिखता हूं और कापी-राइट के बिना ऐसे ही खुला छोड़ देता हूं। जबकि कई लोग मेरे लेखों को अपनें नाम से लिख रहे हैं और बेच रहे हैं वह भी चंद पंक्तियों में कुछ हेरफेर करके, और इस श्रेणी में आने वाले लोग वे हैं जो टीपते तो मेरे लेख हैं किंतु आजतक कभी मेरे लेखों में न तो "लाइक" किये और न ही "कमेंट"। ऐसे लोगों का चरित्र का मूल्यांकन सहजता से किया जा सकता है। मुझे इन लोगों के इस प्रकार के अनैतिक-चरित्र से कोई तकलीफ नहीं है क्योंकि मेरे लिये सामाजिक-चेतना व जागरूकता महत्वपूर्ण है न कि मेरा नाम। 

    दुर्भाग्य से मैं 1992 से सामाजिक सरोकारों में प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय हूं, इसलिये मेरे लिये लेखन का लक्ष्य "लाइक" "कमेंट" "सस्ती लोकप्रियता" या "आर्थिक लाभ" आदि नहीं ही है। यदि मुझे एक भी लाइक न मिले, एक भी कमेंट न मिले तब भी मैं लिखता रहूंगा। लिखना मेरे लिये सामाजिक-प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

    सादर प्रणाम
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग "नोमेड"