Author: संपादक मंडल

  • सफलता व उपलब्धि

    Vivek Umrao “सामाजिक यायावर”
    मुख्य संपादक, संस्थापक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया
    कैनबरा, आस्ट्रेलिया

    मित्र : सफलता व उपलब्धि क्या है?

    सामाजिक यायावर : सफलता व उपलब्धि को हम ठीक से परिभाषित ही नहीं कर पाए हैं। यदि सफलता को हम ठीक से परिभाषित कर लिए होते तो हमारे समाज की दिशा ही भिन्न होती, लोगों की मानसिकता भिन्न होती, जीवन के मानदंड ही भिन्न होते।

    मित्र : आपकी बात समझ नहीं पाया।

    सामाजिक यायावर : दरअसल सफलता व उपलब्धि की पारंपरिक मान्य परिभाषा में ऐसा कुछ है ही नहीं जिसे समझा जा सके, इसलिए आप नहीं समझ पा रहे हैं।

    मित्र : क्या आप उदाहरण देकर समझने में मदद कर सकते हैं?

    सामाजिक यायावर :

    ध्यान से सोचिए कि जिसे सफलता व उपलब्धि कहा जाता है वह वास्तव में है क्या? आप पाएंगें कि ग्लैमर, शक्ति व सुविधाओं को ऐनकेन प्रकारेण कब्जाना, प्राप्त करना व भोगना ही सफलता है।

    एक कमरे के पक्के घर में रहने वाला बेईमान व्यक्ति, झोपड़ी में रहने वाले ईमानदार व सेवाभावी व्यक्ति की तुलना में अधिक सफल माना जाता है। स्वेत-श्याम टीवी वाले की तुलना में रंगीन टीवी वाला, रंगीन टीवी की तुलना में एलसीडी टीवी वाला अधिक सफल माना जाता है। महंगे ब्रांड वाले कपड़े पहनना, चश्मे लगाना आदि सफलता माना जाता है। अजीब से बेहूदे रंगों के कपड़े पहनना जो पहनने वाले व देखने वाले की आंखों को बिलकुल नहीं भाते हैं लेकिन महंगे ब्रांड का होने के कारण जबरन यह मान लिया जाता है कि वह कपड़ा और उस कपड़े को पहनने वाला सफल है, बेहतर हैं, आदर्श है।

    मित्र : जी।

    सामाजिक यायावर : छोटे, मझोले या बड़े घर का मालिक होना जीवन की सबसे बड़ी सफलताओं व उपलब्धियों में मानी जाती है।

    मित्र : जी।

    सामाजिक यायावर :

    एक पुराने मित्र हैं इंजीनियरी में स्नातक करने के बाद आईआईटी मुंबई से प्रबंधन में परास्नातक किया फिर नामचीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों में बहुत ऊंचे वेतनमानों की नौकरियां शुरू कीं। दसियों वर्ष के अंतराल के बाद दो-तीन वर्ष पूर्व मुझसे मिलने व दो दिन मेरे साथ रहने आए थे। वे मुझे दो दिनों तक अपने जीवन की सफलताओं व उपलब्धियों के बारे में बताते रहे। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने भारत के के सबसे प्रतिष्ठित मेट्रो-शहरों में से एक के एक प्रतिष्ठित क्षेत्र में एक फ्लैट खरीदा है। पति-पत्नी दोनो ऊंचे वेतनमानों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी करते हैं। वेतन का बड़ा भाग हर महीने बैंक का ब्याज चुकाने में देते हैं और शेष वेतन-राशि का प्रयोग बच्चों की पढ़ाई, अपने बाजारू उपभोक्ता वाले शौक पूरा करने जैसे उनके अनुसार व्यवहारिक, सफल व प्रतिष्ठित जीवन यापन में करते हैं। सुबह नास्ता करके कार्यालय जाते हैं, वहां कुर्सी में बैठकर जो काम दिया जाता है वह करते हैं, शाम को या तो घर लौटते हैं या मित्रों के साथ किसी शराबखाने जाते हैं, घर में भोजन करते हैं, बाजार से कोई वस्तु खरीदने की बच्चों की मांगों को सुनते हैं, पत्नी के साथ एक बिस्तर में सो जाते हैं। यही दिनचर्या रोज की है।

    इस दिनचर्या में सफलता या उपलब्धि जैसा क्या है? भोजन हर व्यक्ति करता है, हर विवाहित दंपति एक बिस्तर में साथ सोते हैं, हर बच्चा अपने माता पिता के सामने अपनी मनचाही वस्तु के लिए मांग रखता है। फुटपाथों, रैनबसेरों व झोपड़ियों से लेकर बड़े-बड़े महलों में रहने वाला भी जब सोता है तो वह कुछ फुट से अधिक के बिस्तर में नहीं सोता है। गांवों में एक एकड़ के बड़े घर की तुलना में शहर का छोटा सिकुड़ा सा फ्लैट भी उपलब्धि मान लिया जाता है क्योंकि शहरों मे बाजार ने जमीनों की कीमत ऊपर पहुंचा रखी है और लोग खुद को सफल साबित करने के लिए प्रकृति से बहुत दूर ऊंची कीमतों के फ्लैटों को खरीदने में अपना जीवन लगाते रहते हैं। अजीब बेहोशी है।

    तीन-चार वर्ष पूर्व एक मित्र से गूगल मैसेंजर में एक और मित्र से बातचीत हो रही थी, उस समय तक गूगल टाक आदि सुविधाएं नहीं आई थीं। मित्र ने भारत के एक संस्थान से तकनीक में स्नातक किया था, अमेरिका के विश्वविद्यालय से परास्नातक किया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में कई वर्ष रहकर दुनिया की नामचीन कंपनियों में काम किया। एक दिन भारत लौटे और बड़ी कंपनियों में ऊंचे वेतन पर नौकरियां करनी शुरू किया, माता पिता की इच्छा से विवाह किया, पत्नी भी इंजीनियर और बड़ी कंपनियों में नौकरी करतीं हैं। गूगल मैसेंजर में बात करते-करते मित्र ने अचानक किसी ऐसे मुद्दे पर बातचीत होने लगी कि मैंने उनसे पूछा कि वह क्या हैं? मित्र ने जवाब दिया कि खूबसूरत है, ऊच्च शिक्षा की डिग्रियां प्राप्त किए हुए है, सुंदर पत्नी है, अपना फ्लैट खरीद लिया है, कार है, बैंक में पैसे हैं, बड़ी कंपनी में ऊंचे वेतन की नौकरी करता है, आदि-आदि। मित्र इसी प्रकार का बहुत कुछ बता व गिना गए।

    मैने उनसे कहा कि मान लीजिए आपका चेहरे की खूबसूरती किसी दुर्घटना में बिगड़ जाए, मान लीजिए आपकी नौकरी न रहे, मान लीजिए आपकी कार खो जाए, मान लीजिए कि किसी अधिग्रहण में आपका फ्लैट आपका न रहे, मान लीजिए कि आपकी डिग्रियां जल कर राख हो जाएं, आपकी पत्नी आपको छोड़कर चली जाएं आदि-आदि। इन स्थितियों के घटित होने पर क्या आप नहीं रहेंगें, क्या आपकी मृत्यु हो जाएगी, क्या आपकी समझ समाप्त हो जाएगी, क्या आपके जीवन मूल्य पतित हो जाएंगें?

    मित्र बोले नहीं मैं तब भी रहूंगा। मैंने मित्र से कहा जब मैंने आपसे पूछा कि आप क्या हैं तब आपने जिन चीजों को अपने होने के रूप में बताया, उन सबके नष्ट होने पर भी आप कैसे बचे रह गए? मित्र बोले कि इन सबके जाने के बाद भी मैं मनुष्य तो रहूंगा ही। मैंने मित्र से कहा कि हमारी बेहोशी का आलम यह है कि हम जो हैं उसके होने का अहसास तक नहीं करते हैं। आप मनुष्य हैं लेकिन मेरे पूछने पर आपने मुझे दुनिया भर की फिजूल बातें बता दीं लेकिन यह नहीं बताया कि आप मनुष्य हैं जबकि आप जीवन जीने की कला के ढेरों शिविर कर चुके हैं और करते रहते हैं। ऐसे जीवन जीने की कला क्या औचित्य जो आपको जीवन का मूलभूत तत्व तक नहीं बता पाता कि आप मनुष्य हैं।

    बच्चा बचपन से ही केवल और केवल बाजार का बड़ा उपभोक्ता बन पाने को ही अपने जीवन के एकमात्र लक्ष्य के रूप में चुनता है। ईमानदारी से सामाजिक सेवा करने वाले व्यक्ति का उपहास उड़ाया जाता है, बेईमानी व भ्रष्टाचार से सामाजिक कार्यों को करने के नाम पर लाखों-करोड़ों का घालमेल करने वाले एनजीओ चलाने वाले धूर्त लोगों को सफल माना जाता है। युवा नौकरशाह सिर्फ इसलिए बनना चाहता है क्योंकि नौकरशाह बनकर भ्रष्टाचार से पैसे कमाए जा सकते हैं। राजनेता भी पैसे कमाने के लिए ही बना जाता है। चूंकि हर प्रकार के तंत्र पूरी तरह ही भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं इसलिए भ्रष्टाचार करते हुए भी स्वयं को लिखापढ़ी में ईमानदार साबित किया जा सकता है, जीवन मूल्यों के कोई मायने ही नहीं रह गए हैं।

    महंगे विद्यालयों जहां बच्चे के बारे में बच्चा या बच्चे के माता पिता नहीं तय करते हैं, विद्यालय के शिक्षक व प्रबंधन तय करता है, जिनका उद्देश्य बच्चों का समग्र विकास न होकर उनके अपने विद्यालय का ब्रांड व बाजार-लाभ वाली साख महत्वपूर्ण होती है। पैसा खर्च करना हर बात का समाधान माना जाता है इसलिए महंगे विद्यालयों को सफल व बच्चे द्वारा सफलता प्राप्ति को सुनिश्चित करने वाला माना जाता है। बच्चे को अच्छे अंकों को प्राप्त करने के लिए पूजापाठ व मंदिर आदि जाना सिखाया जाता है, बाबाओं से आशीर्वाद प्राप्त करना सिखाया जाता है। अपने से कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोगों व उनके बच्चों को गंदा, खराब, नीच व अपराधी मानना सिखाया जाता है। और भी बहुत कुछ। जन्म लेते ही बच्चे की मानसिकता को माता-पिता, रिश्तेदारों, विद्यालयों व धार्मिक कर्मकांडों के द्वारा बाजारूपने के लिए अनुकूलित किया जाता है।

    शिक्षा के नाम पर बाजार के तंत्रों के यांत्रिक अवयव बनने की दुकानें स्थापित हो रही हैं। आर्थिक विकास के नाम भ्रामक चक्र खड़े किए जाते हैं। कंपनियां खुलती हैं, उनमें सप्लाई के लिए व्यवसायिक प्रतिष्ठान रूपी तथाकथित शिक्षा के संस्थान खुलते हैं। इनमें छात्रों के अभिभावक पैसे देकर डिग्रियां खरीदते हैं, फिर जुगाड़ से किसी कंपनी में नौकरी खोजी जाती है। नौकरी में मिलने वाले वेतन व सुविधा के आधार पर छात्रों की योग्यता, सफलता व उपलब्धि आंकी जाती है। एक बार फिर विवाह प्रस्तावों के लेनदेन व विवाहों के नाम पर बाजारूपन शुरू होता है। जीवन सहचरत्व जैसे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी जीवन मूल्यों को एक बार फिर से तिरस्कृत कर दिया जाता है।

    सामाजिक यायावर : मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या सफलता व उपलब्धि की परिभाषाएं या मान्यताएं सही हैं?

    मित्र : नहीं।

    सामाजिक यायावर : क्यों?

    मित्र : बहुत भयावह लग रहा है। हम लोग कभी सोचते ही नहीं। कभी खुद को समझने व जानने का प्रयत्न करते ही नहीं। खुद को समझने व जानने के नाम पर चल रही आध्यात्मिक व धार्मिक दुकानों ने व्यक्ति को और खतरनाक बेहोशी में ढकेल देते है।

    सामाजिक यायावर :

    भोजन, कपड़े व घर का इंतजाम, विभिन्न प्रकार की शारीरिक भूखों के ही प्रयोजनों में आजीवन लगे रहना, सुविधाओं के आकार व प्रकार के आधार पर जीवन की सफलता व उपलब्धियों को तय करने की मूर्खता व बेहोशी में पूरा जीवन जीते रहना किस प्रकार की सफलता है जो व्यक्ति को सिर्फ और सिर्फ बाजारू बनाती है, बाजार का उपभोक्ता बनाती है, जीवन की हर बात का मूल्यांकन मुद्रा के आधार पर करती है, व्यक्ति को पूरे जीवन एक पल के लिए भी मनुष्य होने का आभास तक नहीं करने देती है। बहुत लोग तो केवल अपने लिए ही नहीं अपने बच्चों व उनके बच्चों के लिए भी घर व संपत्ति अर्जित करने में लगे रहते हैं। ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते हैं कि वे अपनी अगली पीढ़ियों को अकर्मण्य, असंवेदनशील व यांत्रिक बना रहे हैं।

    सफलता व उपलब्धि का अर्थ ही मुद्रा संचय करना व बाजार का उपभोक्ता होना ही हो गया है। ऐसी अनुकूलताओं से उत्पन्न विभिन्न परिभाषाओं व प्रयोजनों ने ही समाज व देश के व्यक्ति की रगों में भ्रष्ट्राचार, असंवेदनशीलता व फरेब को कूट-कूट कर भर दिया है। यहां तक कि सामाजिक कार्यों के लिए दिए जाने वाले अति प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी बाजारूपन पर ही आधारित हैं। समाज, देश व विश्व को समाधानित व्यवस्था  की ओर ले चलने के लिए इन परिभाषाओं को परिवर्तित करना भी आधारभूत आवश्यक तत्व हैं।

    मनुष्य के जीवन का पूरा चक्र ही बाजार व मुद्रा तक ही कुंठित कर दिया गया है। सबसे भयावह बात यह है कि इसी कुंठा में जीने को ही जीवन की समझ, मूल्य, सफलता व उपलब्धि आदि के रूप में प्रतिष्ठापित कर दिया गया है। ग्रंथों में शब्दों में लिखकर कहा जाता है कि हम मनुष्य हैं, मनुष्य प्रकृति की सबसे अधिक ज्ञानावस्था है, मनुष्य के जीवन का उद्देश्य मुक्त होना है, मनुष्य परमात्मा के साथ योग करने के लिए उत्पन्न होता है, लेकिन जीवन जीने की प्रमाणिकता में मनुष्य होने को ही सबसे अधिक तिरस्कृत व कुंठित किया जाता है।

    व्यक्ति के पैदा होने से लेकर मृत्यु तक लगभग हर एक गतिविधि, मानव-निर्मित तंत्र, व्यवस्थाएं व परिभाषाएं यही प्रमाणित करतीं हैं कि मनुष्य का मनुष्य न होना ही सफलता व उपलब्धि है। जो मनुष्यत्व से जितना परे वह उतना ही सफल है।

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    साभार- “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” पुस्तक से

    Vivek Umrao Glendenning “Samajik Yayavar”

    After mechanical engineering graduation and research work in renewable energy systems, he preferred to work voluntarily without a salary with exploited and marginalised communities in very backward areas, rather than taking a job for money.

    Getting a PhD scholarship in a European university for a student in India could be a lifetime dream for the people of third world countries, but he preferred to go to work with marginalised communities rather than to accept PhD scholarship by a European university.

    To understand ground realities and non-manipulated primary information, he did many thousands kilometres foot-marches covering thousands of villages. By these intense foot marches, mass meetings and community talks, he had face-to-face dialogues with around one million people before the age of forty years.

    He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    In India, he founded or co-founded or strongly supported various social organisations, educational and health institutes, cottage industries, marketing systems and community-universities for education, social economy, health, environment, social environment, renewable-energy, groundwater, river-rejuvenation, social justice and sustainability.

    He got married to an Australian hydrology-scientist around fifteen years ago, but stayed in India for more than a decade to work for exploited and marginalised communities. Before marriage, they mutually agreed that until the ongoing works need their physical presence in India, they will not have a baby. That is why they did not make any effort to have a baby for eleven years after the marriage.

    Many hundred thousand of people of marginalised communities of backward areas of India love and regard him, also have accepted him as their family. He left all these social-achievements and prestige for living as a forgotten person to become the full-time father for his son. Even before leaving India, he donated everything except some of his clothes, mobile and laptop.

    Now he lives in Canberra with his son and wife. He voluntarily writes for Indian journals and social media on social issues. Also, he supports ground activists in India as a counsellor who work for the social solution. He is also associated with some international organisations who work for peace and sustainability.

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    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his ground works & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • संस्कृति संस्कार

    सामाजिक यायावर
    सामाजिक यायावर
    जो मेरा बचपन जानते हैं उन्हें पता है कि मैं लगभग पंद्रह वर्ष की आयु तक मातृ-भक्त, पितृ-भक्त तरह का शिशु, बालक, किशोर हुआ करता था। बचपन से मेरे मन मस्तिष्क में संस्कार के नाम पर जो अनुशासन ठूंसा गया उसकी चर्चा भी करना चाहता हूं।
     
    बचपन में यदि मेरी माता ने जमीन में गोल घेरा बना कर मुझसे कह दिया है कि जब तक वे न आएं तब तक मैं घेरे से बाहर न निकलूं। मैंने उसी घेरे में टट्टी पेशाब कर दिया है, रोता रहा हूं लेकिन घेरे का उल्लंघन नहीं किया।
     
    आज जो मेरे जमीनी साथी हैं वे जानते हैं कि मैं सिर्फ चार से पांच घंटे सोकर रात दिन काम पर लगा रहता हूं। मेरे साथी बहुत मेहनती होते हुए भी इस बात का ताज्जुब मानते हैं कि मैं इतना कम सोते हुए भी कैसे सहज व सक्रिय रह लेता हूं।
     
    दरअसल इसका पूरा श्रेय मेरी माता की विकृत अनुशासन को जाता है जिसके कारण उन्होंने मुझे बहुत ही छोटी उम्र से सुबह चार बजे उठकर नंगे पांव घास में पंजो के बल चलने रूपी टहलने के लिए विवश किया क्योंकि उनके मन में कहीं से यह बैठ गया था कि ऐसा करने से आंखें स्वस्थ रहतीं हैं। मेरी आंखें बचपन से खराब हैं बचपन में -3.5D थीं अब सिलेंड्रिकल मिलाकर लगभग -7D के आसपास खराब हैं। सुबह घास में नंगे पांव टहलने से लेकर रात में दस से ग्यारह बजे तक पढ़ने की आदत बना दी। शायद इसी आदत के कारण मेरे शरीर को अधिक नीद की जरूरत नहीं रहती।
     
    हो सकता हो कि कुछ वर्षों बाद मुझे “अल्झाइमर” रोग हो जाए, किंतु अभी तक ठीक-ठाक हूं। पिछले लगभग चालीस वर्षों में मेरा शरीर कुछ घंटों में ही अपनी नींद पूरी कर लेने की आदत में ढल गया है।
     
    नींद का भी कोई रूटीन नहीं, कभी दस बजे रात में सोया तो दो या तीन बजे जग गया कभी रात में दो बजे सोया तो छः या सात बजे जग गया कभी टुकड़ों-टुकड़ों में सो लिया। कभी कभार नहीं भी सोया तो छत्तीस घंटों तक भी बिना सोए सक्रियता से काम करता रह लेता हूं।
     
    मेरी माता मुझे समय-सारिणी बना कर देती थीं। जिसमें यह तक लिखा होता था कि कितने बजे शौच जाना है और कितने मिनट तक शौचालय में बैठना है। कितनी देर तक ब्रश को मुंह के अंदर चलाना है। दिनचर्या का समय निर्धारित था। इसमें चूक हुई तो पिटाई होनी तय और ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी उस पर एक निबंध लिखना भी निश्चित था।
     
     
    मैं भी दूसरे बच्चों की तरह विद्यालय गया हूं। बड़े होने पर मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी की है। B.Stats व BA में भी प्रवेश लिया था। मतलब यह कि मैंने लखनऊ व कानपुर जैसी उस जमाने की घोर राजनैतिक यूनीविर्सिटीज में भी समय गुजारा है। जब मैं लखनऊ यूनीवर्सिटी से B.Stats की पढ़ाई कर रहा था तब वहां के छात्रावासों व कैंपस में छात्रों के बीच में गोलियां चलनी आम बात थी। घोड़ा-पुलिस छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर जानवरों की तरह बर्बरता से पीटती थी। कानपुर यूनिवर्सिटी के बहुत ही सड़ियल कालेज में BA की पढ़ाई में एक वर्ष गुजारा। इंजीनियरी स्नातक के बाद “विकेंद्रित ऊर्जा व्यवस्था व प्रबंधन” में शोध कार्य भी किया है।
     
    शिशु अवस्था में शुरुआती शिक्षा कानपुर के गोविंदनगर के सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षा प्राप्त की। जिनको सरस्वती शिशु मंदिरों के बारे में अंदाजा है उन्हें पता होगा कि आज से लगभग सैंतीस वर्ष पहले कानपुर में गोविंदनगर के सरस्वती शिशु मंदिर का संस्कृति संस्कार का क्या मतलब होता था।
     
    उदय व शिशु कक्षाओं से लेकर बारहवीं तक की मेरी शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर व सरकारी इंटर कालेज में हुई।
     
    यह सब बताने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि कई स्तरों की स्कूली व कालेजी शिक्षण व्यवस्थाएं देखी हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कृति व संस्कार वाले अच्छे विद्यालयों से लेकर सरकारी इंटर कालेज जहां विषयों के शिक्षक भी नहीं होते थे, होते भी थे तो कक्षाएं सिर्फ खानापूर्ती के लिए ही लगतीं थीं, गाली गलौच झगड़े आदि आम बातें थीं।
     
    बचपन से ही शिक्षण संस्थाओं में इतनी विभिन्नता देखने के बावजूद बीस से बाइस वर्ष के मेरे पूरे छात्र जीवन में मेरा कभी भी किसी से मुहांचाही व झगड़ा तक न हुआ, मारपीट होना तो कल्पना से परे की बात है।
     
    पच्चीस वर्ष की आयु तक किसी भी लड़की से एक मिनट की भी मित्रता करना तो दूर दो चार पंक्तियों की औपचारिक हाय-हेलो भी नही किया।
     
     
    चार-पांच वर्ष की आयु से ही मेरी माता ने मुझे युग निर्माण योजना की पुस्तकें पढ़ाना शुरू कर दिया था। स्वामी विवेकानंद का राजयोग, प्रेमयोग, कर्मयोग व जीवनी आदि पुस्तकें मैंने लगभग दस वर्ष की आसपास की आयु में प्रारंभिक तौर पर पढ़ लीं थीं।
     
    विश्वकोष के सत्रह खंड, रामायण, महाभारत, गीता, नैतिक कहानियां, महापुरुषों की जीवनियां व महापुरुषों की जीवन पर आधारित अमर चित्र कथाएं आदि पुस्तकें सैकड़ों की संख्या में परिपक्व किशोर होने के पहले ही पढ़ चुका था।
     
    भयानक सर्दी की रात में भी पानी बरसने पर खेत की मेड़ में पानी को रोकने के लिए खुद लेट कर, प्रकार की गुरूभक्ति करना। सर्दियों में पिता को गर्म पानी पिलाने के लिए रात भर ठिठुरते हुए पानी के पात्र को पेट से लगाकर रखना ताकि पेट की गर्मी से पानी कुछ गुनगुना सा हो जाए, प्रकार की पितृभक्ति करना। इसी प्रकार की मातृभक्ति वाली कहानियां भी।
     
    पौराणिक व नैतिक कथाओं के ये मातृ भक्त, पितृ भक्त, गुरु भक्त प्रकार के पात्र अपने आप ही मेरे आदर्श बन चुके थे।
     
     
    मेरे भोलेपन के कारण, मेरे सीधेपन के कारण मेरे माता-पिता को प्रशंसा मिलती थी। मेरे शिक्षक, अड़ोस-पड़ोस वाले कहते थे कि मैं एक अच्छा लड़का हूं। मुझे भी अच्छे लड़का होने का खिताब जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि लगता था।
     
    उस समय युगनिर्माण योजना अभियान प्रगतिशील अभियान माना जाता था। औसतन हर महीने कई-कई दिनों के पांच-कुण्डीय, दस-कुण्डीय, सौ-कुण्डीय आदि प्रकार के यज्ञ होते ही रहते थे।
     
    जब भी ऐसे यज्ञ होते थे तब प्रभात-फेरी, यज्ञ, कलश-यात्रा आदि से लेकर रात में प्रवचन सुनने तक की दिनचर्या रहती थी। मेरी माता बड़े जोश से पुस्तकें खरीदतीं और मैं पढ़ता था।
     
     
    सहपाठियों से या मुहल्ले के लड़कों से मैंने कभी मारपीट नहीं की, कभी झगड़ा नहीं किया, कभी भी मेरे माता-पिता के पास किसी सहपाठी के माता-पिता उलाहना या शिकायत लेकर नहीं आए, कभी लड़कीबाजी नहीं की।
     
    लड़के बुरे होते हैं इसलिए अपनी मर्जी से मित्र नहीं बनाने हैं। उनके साथ खेलना नहीं है। इसलिए जिन लड़कों के साथ मेरी माता कहेंगी उन्हीं के साथ शाम को एक घंटे खेलना है। या नहीं खेलना है। इसलिए मुझे उस अनुभव का आनंद नहीं जिसमें लड़कों के साथ क्रिकेट खेलना होता है, शैतानी करना होता है, चीजों को तोड़ना फोड़ना होता है। कभी किसी के पेड़ से आम या अमरूद नहीं चुराए, चुराने की कल्पना तक नहीं की।
     
    मुझे कभी तकलीफ नहीं हुई इन सब बातों को। क्योंकि मुझे अपने मन के अंदर यह प्रसन्नता थी कि मैं अच्छा लड़का हूं। अच्छा लड़का होना ही अपने आपमें तकलीफों से पार लगा जाता था। वह बात अलग है कि बाद में मुझे अहसास हुआ कि यह अच्छाई थोपी हुई थी, प्रायोजित थी, कंडीशंड थी।
     
    इतना सब अनुशासित, संस्कारित किस्म का होने के बावजूद मैं बड़े होने पर अपने माता पिता की नजरों में परले दर्जे का चरित्रहीन, अवारा, लुच्चा, लफंगा, कुसंस्कारी लड़का बन गया वह भी ऐसे घटिया स्तर का कि मेरे माता पिता को मेरी युवावस्था में मुझे लातों जूतों से रात दिन महीनों तक पीटना पड़ गया। यहां तक कि मुझे सुधारने के लिए लगभग उनके एक घर में एक साल तक एक छोटे से कमरे में बंद रखना पड़ गया, जहां वे सप्ताह में एक बार मिलने आते थे और रात रात भर पीटते थे।
     
    मेरी गलतियां न होने के बावजूद उन्हें ऐसा क्यों करना पड़ गया वे शायद खुद भी नहीं जानते हैं। उनमें यदि समझने की दृष्टि होती तो वे समझ पाते कि मुझमें देखने व समझने की दृष्टि का विकास होने लगा था, जो उनके रूटीन समझ से परे की बात थी। उनकी समझ से परे होना ही मेरा गलत होना हो गया।
     
     
    इन सब झमेलों में मुझे किताबें पढ़ने की आदत लग चुकी थी। पौराणिक कथाओं, युगनिर्माण योजना, विवेकानंद, बंगाली व उड़िया आदि लेखकों के दायरे से बाहर आकर रसियन, फ्रांसीसी, जर्मन, रोमन, अमेरिकन लेखकों की पुस्तकों की दौड़ लगाने लगा था। ढेरों नोबल प्राप्त साहित्यकारों की पुस्तकें पढ़ गया।
     
    ज्यों-ज्यों मेरा अध्ययन बढ़ता जा रहा था, त्यों-त्यों मेरे अंदर सवाल खड़े होने शुरू हो गए। मेरी समझ व दृष्टि बढ़ती रही थी। हर बात के पीछे के कारक को समझने की इच्छा होने लगी थी। बिना समझे मान लेना संभव नहीं हो पाता था।
     
    मन के अंदर पौराणिक कथाओं पर सवाल खड़े हुए। जिन लोगों के प्रवचन सुनकर खुश होता था वे खुद में जीवन कैसा जीते हैं यह सवाल मन में खड़ा होने लगा। मूल्यों को शब्दों, तर्कों व दर्शन के रूप में मानने की बजाय जीवन में प्रमाणित रूप में देखने की इच्छा बलवती होने लगी।
     
    दिखने लगा कि मेरे माता पिता महान नहीं होते हैं, वे दूसरे मनुष्यों की तरह ही होते हैं, उनमें भी कमजोरियां होती हैं भले ही संस्कृति व संस्कार के ढोंगों के कारण उनको जबरन महान मानने की कंडीशनिंग ठूंसी जाए।
     
    मेरे अपने माता पिता जो खुद पूरे जीवन आपस में तलाक की मांग करते हुए झगड़ा करते रहे, आपस में कभी तालमेल से नहीं रहे। वे ही मुझे मातृ भक्ति, पितृ भक्ति आदि जैसी नैतिक शिक्षा देते रहे जबकि वे खुद मातृ भक्त व पितृ भक्त नहीं रहे। मेरे माता पिता ने जीवन में अधिकतर झूठ ही बोला है, बचपन में मुझे सच बोलना सिखाते थे, जब मैं बड़ा हुआ तो मेरा सच बोलना ही मेरा हरामखोर होना हो गया। मेरी समझ में आया कि खुद माता पिता को ही नहीं पता कि सत्य किस चिड़िया का नाम है। संस्कृति संस्कार क्या होते हैं।
     
     
    ज्यों-ज्यों बढ़ा हो रहा था त्यों-त्यों दुनिया अलग दिखने लगी। नैतिकता का पाठ रटाने वाले व परीक्षाओं में नैतिक शिक्षा के विषय में अंक देने वाले शिक्षकों, रिश्तेदारों व बड़े-बुजुर्गों के असली चरित्र समझ आने शुरु हुए।
     
    जो लोग भाइयों बहनों आदि के प्रेम, त्याग, सहिष्णुता आदि की पौराणिक कथाएं सुनकर रटाकर संस्कृति संस्कार की बातें करते थे उनको अपेक्षाओं, अहंकारों व ईर्ष्याओं के कारण नजदीकी रिश्तों को हमेशा के लिए तोड़ते देखा। समय के साथ यह भी समझ आया कि वास्तव में सच बोलना, विश्वास करना, प्रेम करना मूर्खता मानी जाती है।
     
    समाज का खोखलापन, ढोंग व दोहरा चरित्र दिखने लगा। छोटे में पढ़ी गईं पुस्तकें फिर से पढ़ीं तब अहसास हुआ कि इतनी कहानियां, इतने ग्रंथ, इतने कर्मकांड होते हुए भी हमारा समाज खोखला, ढोंगीं व दोहरे चरित्र का क्यों है।
     
    दरअसल हमारे समाज की पौराणिक कथाएं व ग्रंथ दावा करते लिखे गए हैं कि वे संपूर्ण ज्ञान को समेट हुए हैं, जरा सा भी टसमस होने की भी जरूरत नहीं। दावे को सच बताने के लिए यह प्रायोजित किया जाता रहा कि ग्रंथ ईश्वर के द्वारा या ईश्वर के सहयोग व दिशा निर्देशन में लिखे गए हैं।
     
    यथार्थ तो यह है जड़ता व कुंठा को संस्कृति व संस्कार मानने की भूल हमारा समाज लगातार किए जा रहा है।
     
    जड़ता, कुंठा व कंडीशनिंग को संस्कृति व संस्कार के नाम पर महानता साबित किया जाता रहा क्योंकि खुद को महान प्रतिष्ठित किया जा सके। विचारशीलता व संवेदनशीलता को कुंठित करते हुए ऐसा किया जाता है। और ऐसा किया जाता है संस्कृति संस्कार की महानता व विशालता के नाम पर। ऐसा साबित करने के लिए हिंसा, झूठ, कुतर्क, घृणा आदि का भी सहारा लेना पड़े तो इनको भी उचित साबित किए जाने के लिए तर्क व कथाएँ तैयार रहते हैं।
     
     
    समझ आने लगा कि संस्कृति व संस्कार के नाम का ढिढोंरा पीटने वाले, खुद को महान व सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए ईश्वर से संवादों, मुलाकातों व मनुष्य योनि से मुक्त होकर ईश्वर बन जाने जैसी कहानियां भी गढ़ने वाले हमारे समाज को यह तक नहीं मालूम कि संस्कृति व संस्कार जीवंत मूल्य होते हैं। न कि तंत्र या ढांचा या कर्मकांड या यांत्रिकता या शाब्दिक दार्शनिकता या अतथ्यात्मक तार्किकता।
     
    यह समझ आते ही रटे-रटाए, ओढ़े हुए व ढकोसलों की संस्कृति व संस्कारों के मायाजाल से बाहर आकर मुक्त होने लगा। संवेदना, मानवीयता, भावों, संस्कृति व संस्कार आदि के सही मायनों को समझने में ऊर्जा लगाने लगा।
     
    बस इतना शुरू होते ही माता पिता, रिश्तेदारों, परिवार, मित्रों व समाज के द्वारा प्रताणनाओं का दौर शुरू हो गया।
     
    लेकिन मैं यह सब झेलता रहा क्योंकि यह मेरी जागृति, स्वतंत्रता व डी-कंडीशनिंग का दौर था। मुझे दर्शन की गूढ़ताएं समझ आने लगीं थीं। मैं अंदर से मनुष्यता की ओर बढ़ रहा था, मैं वास्तव में संस्कारित हो रहा था।
     
    समझ आने लगा था कि कपड़े पहनने के तौर तरीकों, खाना खाने के तौर तरीकों, बातचीत के तौर तरीकों, सुविधाएं एकत्र करना, सत्ताएं प्राप्त करना, लोकेषणा भोगना, कर्मकांड, त्यौहारों को मनाने के तौर तरीकों आदि का संस्कृति संस्कार से कोई वास्तविक नाता नहीं होता है।
     
    अनुभव हुआ कि हमारा समाज मूल्यों को शाब्दिक रूप में रटाता है। स्वतः स्फूर्त तरीके से जीवन में प्रमाणित होकर पल्लवित नहीं करता है। हमारा समाज जो स्वयं को संस्कृति व संस्कार का स्वयंभू ठेकेदार मानता है, उसे पता ही नहीं कि संस्कृति व संस्कार किस चिड़िया का नाम है तभी समाज में इतने कर्मकांडों व तौर तरीकों के बावजूद लोग अंदर से हिंसक हैं, खोखले हैं, ढोंगी हैं, स्वार्थी हैं, फरेबी हैं, भ्रष्ट हैं।
     
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  • हमारे देश व समाज को के० सी० देवासेनापथि जैसे IAS अधिकारियों की बेहद जरूरत है

    K C Devasenapathi, IAS
    K C Devasenapathi, IAS

    तमिलनाडु राज्य के एक गांव में एक आम किसान परिवार में पैदा हुए ‘के० सी० देवासेनापथि’, IAS हैं। वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य में कौशल विकास प्राधिकरण के राज्य निदेशक हैं और कृषि कार्य को कौशल के रूप में स्वीकृत कराने के लिए प्रयासरत हैं। अभी हाल तक ही छत्तीसगढ़ राज्य के दंतेवाड़ा जिले में लगभग 3 वर्ष तक जिलाधिकारी रहे।

     
    इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि इनके पूर्वजों व पूरे परिवार में इनके पिता पहले व एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो स्कूल गए थे। देवासेनापथि उन संसाधन-विहीन सरकारी स्कूलों के पढ़े हुए हैं जिनमें एक पैसा भी फीस नहीं पड़ती थी। स्कूल के दिनों में कई वर्षों तक पेड़ों के नीचे बैठ कर शिक्षा प्राप्त करते रहे।
     
    संभवतः पारिवारिक पृष्ठभूमि कृषक व ग्रामीण होने के कारण देवासेनापथि एक संवेदनशील IAS अधिकारी हैं और ऊर्जा के साथ दंतेवाड़ा में जिलाधिकारी के रूप में पानी, दूध व कृषि के लिए दूरदर्शी काम किए। इन्हीं के प्रयासों का नतीजा है कि दंतेवाड़ा 2020 तक 100% आर्गैनिक कृषि जिला हो जाएगा और रासायनिक खेती इस जिले में प्रतिबंधित हो जाएगी। 
     
    इन्होंने किसानों के लिए दूरदर्शी व गहरी सोच के साथ “क्षीरसागर” जैसी योजनाओं की कल्पना करते हुए धरातल में उतारने के कई दूरदर्शी परिवर्तनकारी काम किए हैं जिनकी चर्चा मैं अपनी आने वाली पुस्तकों में विस्तार से करूंगा।
     
    मेरी मुलाकातें 
    चार वर्ष से कुछ अधिक समय पहले की बात है। मैं बस्तर संभाग छत्तीसगढ़ में स्वावलंबन व ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए स्थानीय आदिवासी समाज को अपने स्तर से सहयोग दे रहा था। इसी प्रक्रिया में बस्तर संभाग के कई जिलों में सप्ताहों भ्रमण कर रहा था।
     
    नारायणपुर, सुकमा व दंतेवाड़ा जिलों के साथ-साथ बीजापुर जिले के भी बीहड़ आदिवासी गावों में आना-जाना हो रहा था। एक दिन जब मैं बीजापुर जिला मुख्यालय गया हुआ था, तब मेरी इच्छा हुई कि बीजापुर जिला के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व जिलाधिकारी से मिलूं। उस दिन जिलाधिकारी उपलब्ध नहीं थे। जिला कार्यकारी कार्यालय से मालूम पड़ा कि जिला कार्यकारी अधिकारी शाम को लगभग 5 बजे कार्यालय में उपलब्ध होगें। छत्तीसगढ़ में जिसे जिला पंचायत मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहते हैं वह कई राज्यों में मुख्य विकास अधिकारी के नाम से जाना जाता है।
     
    के० सी० देवासेनापथि उस समय बीजापुर जिले के मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे। मैंने अपना विजिटिंग कार्ड भेजा। लगभग 20-25 मिनट इंतजार के बाद मुझे बुलावा आया। कमरे में घुसते ही देवासेनापथि की बात कि आपको इतना इंतजार इसलिए करवाया कि आराम से बात हो सके। काफी व चाय का प्रस्ताव दिया गया, मैंने काफी पीना स्वीकार किया।
     
    देवासेनापथि की एक खासियत है कि वे AC का प्रयोग बहुत कम करते हैं। मई जून की गर्मी में भी आफिस में AC का प्रयोग कम ही करते हैं। इसलिए कार्यालय की खिड़कियां खुली हुईं थीं और AC बंद था। बोले कि प्राकृतिक हवा का आनंद ही अलग होता है।
     
    महज 15 मिनट की सौजन्य मुलाकात, बस इतना ही। इसके बाद कभी टेलीफोन से बात नहीं हुई, कभी मुलाकात नहीं हुई। मैंने देवासेनापथि जी के बारे में कभी कोई अध्याय नहीं लिखा। मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य नामक किताब में मैंने बहुत लोगों का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया लेकिन इनके बारे में कोई अध्याय नहीं।
     
    देवासेनापथि जी जब दंतेवाड़ा जिलाधिकारी थे तब इनके हाथ मेरी किताब “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” लगी। इनको मेरी किताब अच्छी लगी और जो काम ये कर रहे थे, करना चाहते हैं उसके नजदीक लगी।
     
    मैं पिछले एक महीने से छत्तीसगढ़ में भ्रमण कर रहा हूं। इसी दौरान दंतेवाड़ा भी जाना हुआ, वहां मालूम हुआ कि गावों के हजारों आदिवासी किसान देवासेनापथि के ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कार्यों की प्रशंसा करते हैं।
     
    मेरी इच्छा हुई कि मैं देवासेनापथि जी से मुलाकात करूं। रायपुर के अपने प्रवास के दौरान मैं एक दिन बिना पूर्व सूचना के इनके कार्यालय पहुंच गया। मजेदार बात यह हुई कि जब मैं इनके कार्यालय की पार्किंग में पहुंचा तब यह नया रायपुर मंत्रालय में किसी मीटिंग में जाने के लिए अपनी कार में बैठ रहे थे।
     
    मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि देवासेनापथि मुझे याद रखे होगें। मुझे बहुत ताज्जुब तब हुआ जब इन्होंने मुझे पहचाना और अपनी कार से ही हाथ हिला कर अपनी ओर से मुझसे अभिवादन किया जबकि मैं अपनी कार के अंदर बैठा हुआ था। मुझे महुसूस हुआ जो IAS होते हुए भी इतना सहज है, IAS होने का अहंकार नहीं है, उससे मिलकर आनंद आएगा।
     
    तय हुआ कि अगले दिन मुलाकात होगी। अगले दिन मैंने फोन किया तो देवासेनापथि ने कहा कि वे मेरे साथ लंबी व तसल्ली भरी मुलाकात चाहते हैं इसलिए शाम को मुलाकात होगी। मैं अगले दिन कार्यालय पहुंचा और देवासेनापथि जी के साथ लगभग 2 घंटे लंबी मुलाकात चली। इस दौरान वे किसी और से नहीं मिले। शायद उन्होंने मुझसे मुलाकात के लिए समय खाली रखा था।
     
    सहज, सारगर्भित व दूरदर्शी सोच से ओतप्रोत मित्रवत मुलाकात। मुझे लगा कि मैं IAS जैसी सबसे ताकतवर संस्था के नौकरशाह से नहीं बल्कि सामाजिक विकास के लिए प्रतिबद्ध जमीनी कार्यकर्ता से चर्चा कर रहा हूं। आनंद ऐसे ही IAS अधिकारियों से मिलकर आता है। ऐसे ही IAS अधिकारियों से मिलकर लगता है कि वर्तमान ढांचे में भी कुछ IAS आम लोगों के प्रति जवाबदेही महसूस करते हैं।
     
    यदि कभी मेरी मुलाकात छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री जी से हुई तो मैं उनसे दर्ख्वास्त करूंगा कि इनको ऐसे जिलों में जिलाधिकारी के रूप में भेजा जाए जहां विकास की जरूरत है। ऐसे विभागों में भेजा जाए जहां ये कृषि को उद्योग व कृषक को उद्योगपति बनाने के अपने विचारों को धरातल में उतारने के लिए प्रयास कर पावें।
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    K C Devasenapathi, IAS, and Vivek Umrao Glendenning
    K C Devasenapathi, IAS, and Vivek Umrao Glendenning
     
     
  • सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता —— भारत को किसी भी परिस्थिति में आदिवासी/दलित/शूद्र नेतृत्व व दिशा की जरूरत है

    हमें विभिन्न आर्थिक, राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा प्रायोजित नेतृत्वों को परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में स्वीकारने की आत्मश्लाघा व प्रवंचना से बाहर आने की जरूरत है भले ही प्रायोजित नेतृत्व तात्कालिक तौर पर यह कितना भी अधिक लाभप्रद व परिवर्तनकारी दिख रहा हो।

    मूल बात कहने के पहले एक सच्चा घटनाक्रम सुनाना चाहता हूं। तब फेसबुक जैसी सोशल साइटें जीवन का अभिन्न अंग नहीं हुआ करतीं थीं। ईमानदारी की चोचलेबाजी या विकास के मसीहागिरी की चोचलेबाजी या लच्छेदार स्वादिष्ट भाषणों या कुछ समय की न्यायिक हिरासतें या पुलिस की दो चार लाठियाँ आदि किस्म की आम आदमी द्वारा झेली जाने वाली सामान्य व रोजमर्रा वाली घटनाएं रातोंरात राष्ट्रीय नेता व देश के परिवर्तन का कर्णधार नहीं बनाया करतीं थीं। उसी समय की बात है।

    भारत देश में एक राज्य है उसका नाम है केरल। उसी केरल राज्य की एक गांव की ग्राम सभा ने दुनिया में पेयपदार्थों की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक की नाक में नकेल कसने व अपने गांव का भूलज व कृषि अर्थव्यवस्था बचाने के लिए उस कंपनी द्वारा उस गांव में स्थापित व संचालित बाटलिंग प्लांट बंद कराने का प्रस्ताव पारित किया।

    उस कंपनी ने ग्राम सभा के इस प्रस्ताव को केरल राज्य के हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक बेंच ने अपने बयान में कहा कि ग्रामसभा को ऐसे प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है, पानी सामाजिक संपत्ति है।

    फिर क्या था, भारत में आंदोलनों के लिए बने विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के लोग, मैगसेसे पुरस्कृत कुछ लोग, फंडेड NGO वाले लोग आदि ने हाईकोर्ट की बेंच की उस बयान की कापियां निकलवाईं, उनके दस्तावेज बनाए, बुकलेट बनवाईं और देश भर में घूम घूम कर खूब बांटा। खूब प्रेस कांफ्रेस कीं। लग रहा था जैसे कि भारत में अब सामाजिक स्वामित्व सुदृढ़ हो जाएगा।

    इन लोगों ने हजारों प्रेस कांफ्रेस की होगीं, जहां जाते वहीं प्रेस कांफ्रेस करते और हाईकोर्ट की भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात करते, चिल्ला चिल्ला कर हाईकोर्ट के शान में कसीदे पढ़ते।

    इन सभी क्रियाकलापों से एक घटना हुई कि लोगों के दिलोदिमाग में बैठ गया कि कोर्ट हमेशा सही व समाज के लिए कल्याणकारी निर्णय देता है। कोर्ट पानी को सामाजिक संपत्ति मानता है। कोर्ट ग्रामसभा व ग्रामीण लोगों के प्रस्तावों का आदर देता है, महत्व देता है। दिलोदिमाग में यह सब बैठाया सामाजिक आंदोलनों के विभिन्न संगठनों के लोगों ने, मैगसेसे पुरस्कार पाने वालों आदि ने वह भी जागरूकता व चेतनशीलता आदि के नाम पर।

    अब देखते हैं आगे की घटना-

    लगभग एक या दो साल या कम ज्यादा समय के बाद केरल की उसी हाईकोर्ट ने अपनी बात पलट दिया।

    सामाजिक आंदोलनों के संगठनों के लोग, NGO  वाले लोग, मैगसेसे पुरस्कृत लोग आदि तो देश भर में यह बता चुके थे कि पानी सामाजिक संपत्ति है और ऐसा हाईकोर्ट कहता है। देश भर में घूम घूम कर लाखों करोड़ों लोगों के दिलोदिमाग में बहुत कुछ बैठा चुके थे। उसी कोर्ट ने अपनी बात बिलकुल पलट दिया।

    अब ये लोग जो लोगों के सामने ढेरों बातें दावे से ठोंकते हुए कर चुके थे। फिर से कैसे जाते उतने व उन्हीं लोगों के बीच यह कहने कि कोर्ट का निर्णय उचित नहीं, समाज के लिए कल्याणकारी नहीं। मान लीजिए यदि उन्हीं व उतने ही लोगों के पास किसी तरह जाना संभव भी होता तो भी लोग इनकी विरोधाभासी बातों पर विश्वास क्यों करते?

    केरल के गांव की घटना जो भारत में भूजल के सामाजिक स्वामित्व के मसले पर बहुत बड़ा परिवर्तनकारी आंदोलन का आधार बन सकती थो। उसकी बिना सोचे बिचारे तात्कालिक लाभ के लिए की जाने वाले क्रियाकलापों के कारण भ्रूण हत्या हो गई।

    लोगों के NGO को मिलने वाली ग्राँटों की राशि बढ़ गई, लोगों के नाम व पहचान बढ़ गई, लोग देश विदेश घूम लिए, लोगों सेलिब्रिटी बन गए, बहुत सारे पुरस्कारों का आदान प्रदान हो गया, लोगों को क्रांतिकारी होने का तमगा मिल गया।

    लेकिन आम समाज वहीं का वहीं रहा या यूं कहें कि भूजल पर सामाजिक स्वामित्व वाला मसला पीछे चला गया। अब कोई न तो केरल के गांव की बात करता है न ही भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात होती है।

    भारत में फेसबुक जैसी साइटों के आने से एक बात हुई है कि हम रातोंरात किसी को भी छुटपुट, टटपुंजिया, तात्कालिक व प्रायोजित घटनाओं के कारण सामाजिक बदलाव व परिवर्तन का मसीहा मान लेते हैं। सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन का नेतृत्व मान कर अपना समर्पण दे देते हैं, हममें से बहुत लोग अंध भक्त भी बन जाते हैं जो कुछ भी सुनने समझने तक को तैयार नहीं होते।

    पता नहीं क्यों हम किसी तात्कालिक व अस्थाई लाभ के लिए परिवर्तनकारी नेतृत्वों के प्रायोजन में जुट पड़ते हैं, स्वयं को अंध समर्पित भी कर देते हैं। फिर कहते हैं कि दगा हो गया, समझ नहीं पाए।

    दरअसल सामाजिक प्रतिबद्धता व जीवन मूल्यों को लेकर जितने सतही व खोखले हम होते हैं। हमारी कल्पना का परिवर्तन भी उतना ही सतही व खोखला होता है। यही कारण होता है कि हम सतही व खोखले आधारों पर परिवर्तन के लिए प्रायोजित नेतृत्वों के लिए अपने आपको समर्पित कर देते हैं।

    जिनको हम प्रायोजित करते हैं उनकी तो मौज हो जाती है, लेकिन हम व हमारा देश वहीं का वहीं खड़ा रहता है या पीछे चला जाता है। यह बिलकुल वैसे ही है जैसे जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तब हम चिल्लाते हैं कि खेत नहीं बचा पाए। लेकिन हम फिर वही गलती करते हैं, नई चिड़ियों पर विश्वास करते हैं, जो हमारे खेत फिर से चुगती हैं। हम फिर से ठगा महसूस करते हैं। कसमें खाते हैं मूर्ख न बनने की। लेकिन फिर हम नए प्रयोजनों में फंस कर नए बहाने व तर्कों को गढ़ने लगते हैं और फिर से ठगे जाते हैं। 

    भारत में पिछले कुछ वर्षों में मीडिया व सोशल साइट्स के द्वारा बहुत ही कम समय में कई परिवर्तनकारी नेतृत्वों को विभिन्न घटनाओं को आधार बना कर तेज गति से प्रायोजित किया गया है। उनको बिना सवाल सत्ताएं भी सौपी गईं लेकिन उनका वास्तविक चरित्र क्या रहा यह बाद में मालूम पड़ा और लोगों ने ठगा महसूस किया।

    कितनी बार हम मूर्ख बनेंगे कब तक ऐसा करते रहेंगे। हमें शार्ट कट बंद करने होगें। हमें बिना खुद को बदले हुए परिवर्तन देखने की लिप्सा से ऊपर उठना होगा।

    पहले हमको समझदार बनना होगा, प्रवंचना कभी भी अपने लिए समझदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती। बेईमानी कभी भी अपने लिए ईमानदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती।

    सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता।

    हमें ठोस होने की जरूरत है और हमें परिवर्तन के लिए दीर्घकालिक रास्तों को चुनने की जरूरत है। वास्तविक सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन कभी भी शार्टकट व टटपुंजिए तौर तरीकों से संभव नहीं।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
  • JNU जैसे संस्थानों की विशिष्टता विशेष अनुदानों, अनुग्रहों व संसदीय कानूनों की शक्तियों की देन है न कि अर्जित की हुई

    IIM, Calicut

    IIM, Calicut

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

    जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की स्थापना करना अच्छा निर्णय था। तत्कालीन प्रधानमंत्री व भारत सरकार की दूरगामी सोच का परिणाम था। JNU की स्थापना करने की मंशा में कोई दुर्भाव नहीं था, वरन् भारत देश की बेहतरी निहित थी। JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। JNU की स्थापना में JNU की स्थापना के क्षण से मिलने वाले विशेष अनुदानों व अनुग्रहों का बहुत बड़ा योगदान है। JNU की विशिष्टता सरकार से मिले इन्हीं विशिष्ट अनुदानों व अनुग्रहों के आधारभूत स्तंभों पर खड़ी है।

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

     

    • भारतीय संसद में JNU की स्थापना व विशिष्ट दर्जा देने के लिए कानून बना जो JNU को शक्ति देता है। JNU को संसदीय कानून का यह विशिष्ट स्तर स्थापना के समय से प्राप्त है। JNU ने यह स्तर अर्जित नहीं किया। सरकारी अनुग्रह था।
    • दिल्ली जैसी सघन जनसंख्या वाली राजधानी में एक यूनिवर्सिटी के लिए लगभग 1000 एकड़ जैसी बड़ी जमीन का अधिग्रहण किया गया।
    • छात्रों के रहने के लिए पर्याप्त से अधिक संख्या में सुविधा संपन्न छात्रावासों का निर्माण किया गया।
    • पढ़ाई, छात्रावास व भोजनालय की फीसें इतनी कम रखी गईं कि एक तरह से मुफ्त जैसा ही माना जा सकता है।
    • ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा में विशेष अंक देने का प्रावधान रखा गया ताकि गांवों के छात्र JNU में पहुंच सकें।
    • छात्रों का विकास हो, उनकी सोच दूरगामी हो, वे चिंतनशील बनें इसलिए समृद्ध व सुविधा संपन्न पुस्तकालयों व वाचनालयों की स्थापना की गई।
    • छात्रों की राजनैतिक चेतनशीलता का विकास हो इसलिए JNU के छात्रसंघ की स्थापना भी विशिष्ट रूप से की गई।
    • भारत में उपलब्ध योग्य लोगों का चयन शिक्षकों के रूप में किया गया।
    • शिक्षकों को बेहतर वेतन व सुविधाएं दी गईं।
    • आदि।

    भारत देश को JNU ने नहीं बनाया। भारत की आजादी में JNU का कोई योगदान नहीं। भारत के विकास में JNU का विशिष्ट योगदान नहीं। सामाजिक संसाधनों व संसदीय कानून रूपी विशिष्ट अनुग्रहों के आधारों पर JNU वजूद बना व खड़ा है। JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई नही है।

    फेसबुक में JNU के ऊपर लिखी गई मेरी पोस्टों पर JNU के लोगों की अधिकतर टिप्पणियां बेबुनियाद तर्कों पर रही हैं। JNU के शिक्षकों, छात्रों व भूतपूर्व छात्रों का यह कहना कि भारत में JNU सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, पूरी तरह बेबुनियाद व फिजूल बात है।

    जब JNU ने अपनी विशिष्टता अर्जित ही नहीं की है तो JNU के लोगों के अंदर लोकतांत्रिक समझ विकसित होने की बात कैसे हो सकती है। JNU को स्थापित करने वाले लोगों की सोच व दूरदृष्टि लोकतांत्रिक थी, जिसके कारण JNU का ढांचा ऐसा बना कि यह लोकतांत्रिक संस्थान हो जाता है।

    बने हुए ढांचे में जीने का मतलब उस ढांचे की समझ होने की अनिवार्यता नहीं है। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत में “सामाजिक समता” व “जाति-व्यवस्था के अंत” आदि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना सक्रिय योगदान करता होता। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत के गावों व किसानों के आर्थिक विकास की व्यवहारिक व धरातलीय योजनाएं बनाता होता। और भी बहुत करता होता।

    भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब व बेहद घटिया फैशन चल गया है जो शायद भारत के मीडिया के कारण उत्पन्न हुआ है। भारत में कुकरमुत्तों की तरह टीवी चैनल्स बने हैं जिनका काम सिर्फ बरसाती मेढ़कों की तरह शोर मचाते हुए टर्राना है। इस मीडिया का अधिकतर अर्थात लगभग 98% हिस्सा भारत के मेट्रों शहरों तक ही सीमित है, इस 98% प्रतिशत में भी बहुत बड़ा हिस्सा राजधानियों तक ही सीमित है। नेशनल मीडिया का तो मतलब ही दिल्ली राजधानी है।

    इसी मूर्खता भरे फैशन के कारण ही JNU को भारत की सभी विश्वविद्यालयों का प्रतिनिधि मान लिया गया है। मानो JNU ही पूरे भारत का विश्वविद्यालय है। मानो JNU ही भारत की विचारशीलता, चिंतनशीलता, सामाजिक सोच, सामाजिक प्रतिबद्धता, सामाजिक कर्मठता व राजनैतिक परिवर्तनों का केंद्र है।

    जैसे दिल्ली भारत नहीं है, भारत जैसे बड़े देश का केवल एक शहर है। बिलकुल वैसे ही JNU का मतलब भारत के सारे विश्वविद्यालय नहीं है। JNU भारत के अनेकों विश्वविद्यालयों में से एक विश्वविद्यालय है। चूंकि JNU दिल्ली में है जहां सारा मीडिया है और JNU की स्थापना विशिष्ट सरकारी व संसदीय अनुदानों व अनुग्रहों के द्वारा हुई है, इसलिए JNU में छींक आने का भी हंगामा होता है। वास्तव में हमारे, हमारे तंत्र व मीडिया का यह चरित्र देश के अन्य विश्वविद्यालयों व उनके छात्रों को कुंठित करता है, उनकी योग्यता, कार्यक्षमता व प्रतिभा को खंडित करता है।

    भारत के किसी भी विश्वविद्यालय को उसकी स्थापना के पहले क्षण से ऐसी विशिष्ट संसदीय व सरकारी अनुग्रह व अनुकंपाएं मिल जाएं तो उसका स्तर JNU के स्तर से कतई कम नहीं होगा भले ही उसको किसी बीहड़ में स्थापित किया जाए। इसकी संभावनाएं भी बहुत हैं कि ऐसे विश्वविद्यालयों का स्तर JNU के स्तर से बेहतर ही हो।

    JNU के लोगों को यह मूल्यांकन करना चाहिए कि जितना उनको भारत ने दिया है उसके एवज में वे भारत को क्या दे रहे हैं। यदि इसका मूल्यांकन हो तो यदि JNU के लोग ईमानदार होगें तो उनको शर्म आएगी। बिना अर्जित की हुई विशिष्टता पर अहंकार करना, दूसरों को अपने से हीन समझने की मानसिकता आदि JNU कितना लोकतांत्रिक है, कितना सामाजिक सोच का है, कितना स्वतंत्र चिंतक है, खुद ब खुद प्रमाणित कर देते हैं। धिक्कार पैदा होती है JNU के शिक्षकों व छात्रों के अहंकार व बड़बोलेपन को देखकर। भारत के लोगों ने JNU बनाया है, इसलिए भारत के लोग JNU से अधिक लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतन के हुए। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तब यह माना जा सकता था कि JNU को संस्थान के रूप में लोकतांत्रिक समझ है।

    देश में देश को बनाने व दिशा देने के लिए JNU से बड़े व गंभीर मुद्दे हैं। लेकिन चूंकि मीडिया कभी उन पर ध्यान नहीं देता। लोगों के वेस्टेड इंटरेस्ट व महात्वाकांक्षाओं के लिए उनकी कोई वैल्यू नहीं होती इसलिए वे मुद्दे हमेशा किनारे ही पडे रहते हैं। इसके बावजूद यह दावा किया जाता है कि देश के लिए सोचा व किया जाता है।

    देश के बहुत लोगों की दृष्टि में JNU पूरा भारत होगा, लेकिन मेरी दृष्टि में JNU सिर्फ और सिर्फ एक यूनिवर्सिटी है जिसकी स्थापना देश के विचारशील व दूरदृष्टिवान लोगों ने इस विश्वास से की थी कि इसके लोग सामाजिक विकास के लिए चिंतन करेंगें, निर्माण करेंगें, सामाजिक चेतनशीलता पैदा करेंगें न कि केवल नौकरी, पैसा, ग्लैमर, अय्याशी व कैरियर के पीछे ही भागेंगें। यदि JNU का उद्देश्य यही सब होना था तो संसद में JNU के लिए अलग से कानून बनाकर विशिष्टता देने की जरूरत ही क्या थी।

    भारत में सैकड़ों यूनिवर्सिटीज हैं जहां के छात्र अपना हर दिन दर्द में गुजारते हैं। मैं अपने जीवन में कई ऐसे छात्र नेताओं से मिला हूं जिनको पुलिस की पिटाई ने जीवन भर के लिए अपंग कर दिया और ये छात्र नेता JNU के छात्रसंघ अध्यक्ष की तुलना में बहुत ही बेहतर व दर्दीला भाषण देने की क्षमता व योग्यता रखते थे। भारत की इन सैकड़ों अनजानी यूनिवर्सिटीज के सैकड़ों हजारों छात्र नेता अपने जीवन में ढेरों फर्जी मुकदमें झेलते हैं।

    इन छात्रनेताओं व छात्रों का क्या? लेकिन कभी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती इन छात्र नेताओं के लिए। क्यों नहीं उठी। केवल इसलिए नहीं उठी क्योंकि वे ऐसे विश्वविद्यालयों से नहीं थे जिनको हर वर्ष अरबों रुपए की सरकारी अनुदान मिलता हो और जिनको संसद में विशेष कानून द्वारा संरक्षण व विशिष्टता प्राप्त हो। क्या दोष है इन विश्वविद्यालयों का और इनमें पढ़ने वाले छात्रों का?

    हमारी संवेदनशीलता, जागरूकता इन विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ क्यों नहीं जुड़ती है? क्या ये लोग भारत देश के नहीं है? क्या ये विश्वविद्यालय भारत देश के अंदर नहीं है। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तो बात समझ आ सकती थी कि JNU ने विशिष्टता अर्जित की है।

     

    IIM, Kozhikode

    IIM, Kozhikode

    जैसे JNU की विशिष्टता प्रायोजित है, अनुदान, अनुकंपा व अनुग्रहों के स्तंभों पर स्थापित है। तो ऐसा भारत के हर विश्वविद्यालय के साथ क्यों नहीं? एक ही देश के अंदर इतना भेदभाव क्यों? buy provigil south africa yanginstitute.com modafinil kup online इसीलिए मैं चाहता हूं कि या तो भारत के हर जिले में कम से कम एक JNU, IIT, IIMAIIMS आदि हो जिनको वैसी ही विशिष्ट अनुदान, अनुग्रह व संसदीय कानून की शक्ति आदि मिले जो JNU, IIT, IIM व AIIMS जैसे संस्थानों को इनकी स्थापना के क्षण से प्राप्त है। 

    JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं किया है, विशिष्टता प्रायोजित है, मिथक है। इसलिए देश के हर जिले में JNU(s) की स्थापना किया जाना कोई बड़ी बात नहीं। देश के लाखों करोड़ों युवाओं को हक है JNU जैसी विशिष्टता को भोगने का, उनको भी हक है खुद को लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतक मानने व कहलवाने का।

     

    देश का लाखों करोड़ों युवा पैदा होते ही केवल नौकरी पैसा व ग्लैमर पाने के लिए अंतहीन चूहादौड़ में झोंक दिए जाते हैं। कोचिंग सेंटर्स लूटते हैं, बच्चे आत्महत्याएं करते हैं, कुंठित होते हैं, हीन भावना से ग्रस्त होते हैं। प्रतिक्रिया वादी बनते हैं। इन्हीं प्रायोजित विशिष्टता वाले संस्थानों में पहुंचना ही बचपन से अपना मकसद चुन लेते हैं। कितना ओछा व छोटा मकसद होता है जीवन का। जो पहुंच गए वे आजीवन स्वयं को दूसरों की तुलना में विशिष्ट मानने के अहंकार में जीते हैं। जबकि यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो इन संस्थानों में प्रवेश पाने में रटने की योग्यता के अतिरिक्त कौन सी वास्तविक योग्यता होती है। किंतु चूंकि ऐसे संस्थानों की संख्या भारत की जनसंख्या के अनुपात में नगण्य है तथा अन्य संस्थानों को सरकारी विशिष्ट अनुग्रह मिलते नहीं हैं इसलिए एक मिथक स्थापित हो गया है कि जो भी इन संस्थानों में प्रवेश पाता है वह बहुत योग्य है, विशिष्ट है। 

     

    भारत के सुनहरे भविष्य के लिए शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता की स्थापना करने की प्रवृत्ति अब खतम कर देना चाहिए। भारत की संसद से हर उस कानून को खतम कर देना चाहिए जो किसी शैक्षणिक संस्थान को देश के अन्य संस्थानों की तुलना में विशिष्टता देता हो। क्योंकि भारत के किसी संस्थान ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। भारत की संसद ने ऐसे संस्थानों की स्थापना के पहले क्षण से ही उनको संवैधानिक रूप से विशिष्ट संस्थान होने की शक्ति दी है। 

     

    शैक्षणिक संस्थानों की विशिष्टता अर्जित की हुई होनी चाहिए न कि किसी राजकीय व संवैधानिक शक्ति व अनुग्रह के प्रायोजन से प्राप्त हुई होनी चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता देश व समाज के लिए दूरगामी रूप से बहुत ही अधिक हानिकारिक होती है और वास्तविक प्रतिभाओं को कुंठित करती है, प्रतिक्रियावादी बनाती है, असंवेदनशील बनाती है, हीन भावना से ग्रस्त करती है।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

  • आस्ट्रेलिया के तस्मानिया राज्य की राजधानी होबार्ट सिटी-बस की एक लाजवाब यादगार घटना

    Public Bus, Hobart City. Tasmania state, Australia
    Public Bus, Hobart City.
    Tasmania state, Australia

     

    सन 2007 की बात है। मैं पहली बार तस्मानिया जा रहा था, मेरी जीवन साथी भी साथ थीं। हम लोग अपनी एक वैज्ञानिक मित्र के यहां रुकने वाले थे। उन्होंने तस्मानिया की राजधानी होबार्ट में घर खरीदा था और वहां के फारेस्ट विभाग में वैज्ञानिक की नौकरी करनी शुरू की थी।

    Wineglass Bay Tasmania, Australia
    Wineglass Bay, Tasmania, Australia

    तस्मानिया में एक घने जंगल में ट्रैकिंग करने की योजना थी। हमारी जीवन साथी के एक सहपाठी वैज्ञानिक मित्र पूर्वी अंटार्कटिका में दक्षिणी ध्रुव की ओर जा रहे थे।

    Antarctica
    Antarctica

    An antarctic station of a country
    An antarctic station

    वैज्ञानिक के रूप में उनकी पोस्टिंग अंटार्कटिका के एक वैज्ञानिकी स्टेशन में हुई थी। वे जिस विशेष समुद्री जहाज से अंटार्कटिका जा रहे थे उस जहाज को होबार्ट से चलना था। इन वैज्ञानिक मित्र महोदय से भी मिलना था।

    मैं और मेरी जीवनसाथी सिडनी से हवाई जहाज के द्वारा सुबह ही होबार्ट पहुंच गए थे। जिन वैज्ञानिक मित्र के घर में रुकना था वे हमें लेने के लिए एयरपोर्ट आईं थीं। घर पहुंच कर सामान रखकर कुछ नास्ता करके हम लोगों ने सिटी बस से होबार्ट घूमने देखने का निर्णय लिया।

    हम लोग बस स्टाप पहुंचे हमें कोई अंदाजा नहीं था कि कौन सा स्थान कहां है, दोनो ही पहली बार गए थे। बस आई रुकी हम लोग बस में चढ़े, बस चालिका के पास टिकट लेने गए और उस स्टाप का नाम बताया जहां हम उतरना चाहते थे। हमने निवेदन किया कि हम लोग होबार्ट से बिलकुल परिचित नहीं हैं इसलिए नहीं जानते कि हमें जहां उतरना है वहां पर बस रोकने के लिए बस का बजर कहां बजाना होगा। बस चालिका बोली कोई बात नहीं वह हमें हमारे स्टाप पर उतार देगी।

    बहुत लोग चढ़े उतरे, इस प्रक्रिया में बस चालिका हमारे बारे में भूल गई होगी। बस चलती रही हम लोग बैठे रहे। पूरी बस खाली हो गई, केवल हम लोग बैठे रहे। यहां तक कि बस अंतिम टरमिनल में पहुंच गई जहां उस बस को कुछ घंटे के लिए खड़ा रहना था। तब बस चालिका को ध्यान आया कि हम लोग अभी बस में ही हैं।

    बस चालिका ने हम लोगों के पास आई और विनम्रता से हमें होनी वाली असुविधा के लिए माफी मांगी। हमने कहा कि वह हमको बताए कि हम कौन से नंबर की बस पकड़ कर अपने स्टाप पर जाएं।

    बस चालिका ने कहा कि हमें किसी बस को पकड़ने की जरूरत नहीं है वह हमें हमारे स्टाप पर छोड़ कर आएगी। बस चालिका पूरी खाली बस केवल हम लोगों को लिए हुए अंतिम टरमिनल से लगभग 10 किलोमीटर वापस जिस स्टाप पर हम लोगों को उतरना था वहां तक लाई और हम लोगों को वहां उतारा।

    पता नहीं शायद उससे ऐसी गलती पहली बार हुई होगी, इसलिए वह खुद को माफ नहीं कर पा रही थी। इसलिए हम लोगों को हुई असुविधा के माफीनामें के तौर पर वह हम लोगों को काफी भी पिलाना चाहती थी। हम लोगों ने विनम्रता से मना कर दिया और उसकी विनम्रता के लिए उसको बार बार धन्यवाद ज्ञापित किया।

    यदि बस चालिका चाहती तो हम लोगों से अंतिम टरमिनल तक का अतिरिक्त किराया वसूलती और हमको दूसरी बस पकड़ कर जहां हमे जाना था वहां पहुंचने जैसा तरीका बताने जैसा व्यवहार भी कर सकती थी। बस चालिका सरकारी कर्मचारी थी, काफी अच्छा वेतन मिलता है, स्थायी नौकरी होती है। सिटी बस सरकार चलाती है।

    पब्लिक सर्विस मतलब पब्लिक को सुविधा देना, सम्मान देना, देखभाल करना। ऐसा पब्लिक सर्विसेस के तौर तरीकों व व्यवहारों में प्रमाणिकता के साथ दिखता है।

    पता नहीं भारत में पब्लिक सर्विस का मतलब समझने में कितनी सदियां लगेंगीं।

    (बताने की जरूरत नहीं है कि भारत में सरकारी बस वाले यात्रियों से कैसा सलूक करते हैं।)

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  • सतयुग की अवधारणा मिथक है जो कर्म की अवहेलना भी करती है – मित्र के साथ संवाद

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

    मित्र : सतयुग क्या है?

    सामाजिक यायावर : सतयुग एक ऐसा युग है जब सब कुछ सत्य पर आधारित है, सब कुछ ठीक होता है। मानव अपनी पूर्णता व मूल्यों की उच्चतर अवस्था को जीता है। सब कुछ सत्य पर आधारित, न्यायपूर्ण व कल्याणकारी होता है। सतयुग की अवधारणा में हर युग का काल नियत है; जैसे सतयुग सत्रह लाख अठ्ठाइस हजार वर्ष, त्रेतायुग बारह लाख छियानबे हजार वर्ष, द्वापरयुग आठ लाख चौसठ हजार वर्ष और कलियुग चार लाख बत्तीस हजार वर्ष।  

    हर युग में मनुष्य की औसत आयु भी नियत है, जैसे सतयुग में मनुष्य की औसत आयु एक लाख वर्ष, त्रेतायुग में मनुष्य की औसत आयु दस हजार वर्ष, द्वापरयुग में मनुष्य की औसत आयु एक हजार वर्ष और कलियुग में मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष।

    युगों की अवधारणा में सबसे लंबा युग ‘सतयुग’ है और मनुष्य की आयु सबसे लंबी एक लाख वर्ष मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि सतयुग में मनुष्य जीवन-मूल्य, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि की उच्चतर अवस्था को प्रामाणिकता के साथ जीता है।

    मित्र : आप क्या मानते हैं कि सतयुग था?
    सामाजिक यायावर : बिलकुल नहीं।

    मित्र : क्यों?
    सामाजिक यायावर : सतयुग की मूलभूत अवधारणा में ही बहुत छिद्र हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही, मनुष्य के कर्म का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है।

    मित्र : यह तो चौकाने वाली बात है। क्योंकि सद्कर्म ही तो सतयुग का मूलाधार है।
    सामाजिक यायावर : स्वर्ग व सतयुग आदि की हमारी अवधारणाओं के मूल में ही छिद्र हैं, भ्रम हैं, कोरी कल्पनायें हैं। यदि आप पूर्वाग्रह व भावुकता को परे रखकर विश्लेषण करें तो आप भी मेरे तर्कों से सहमत हो सकते हैं।

    लाखों वर्ष के सतयुग में मनुष्य द्वारा एक लाख वर्ष जैसे बहुत लंबे समय तक जीवन-मूल्यों, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि को जीते हुएऔर सद्कर्मों को करते रहने के बावजूद युग का समय पूरा होने पर एक दिन सतयुग का क्षय हो जाता है। 

    सतयुग से कलियुग के बीच में ‘त्रेतायुग’ व ‘द्वापरयुग’ भी हैं जो लाखों वर्षों के हैं। इन युगों में भी मनुष्य कितना भी सद्कर्म कर ले, लेकिन उसको पूर्व-निर्धारित नियति व दैवीय व्यवस्था के कारण बढ़ना कलियुग की ही ओर है।  कलियुग में कितने भी बुरे कर्म कर ले, बढ़ना ‘सतयुग’ की ही ओर है। क्योंकि कलियुग का समय खतम होते ही, “सतयुग” आ जायेगा। सतयुग से त्रेतायुग, त्रेतायुग से द्वापरयुग, द्वापरयुग से कलियुग, कलियुग से सतयुग, इस पूरे चक्र में सब कुछ पूर्वनिर्धारित व नियोजित है।

    जब सतयुग के उच्चतर निरपेक्ष-सद्कर्मों को जीने से मनुष्य सतयुग की निरंतरता नहीं बनाएरख सका तो कलियुग में उसके छोटे-छोटे सापेक्षिक-सद्कर्म का सतयुग के लिए कोई औचित्य ही नहीं, फिर भी कलियुग सतयुग की ओर बढ़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य कैसे भी कर्म करे। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग अपने समय से आयेंगें और जायेंगें, मनुष्य के कर्मों से इनका होना, न होना, आना, जाना आदि का कोई संबंध नहीं। 

    यही कारण है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही मनुष्य की ‘कर्मशीलता’ का कोई अस्तित्व व महत्व नहीं रह जाता है। मनुष्य के कर्म की कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती है। और सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही ‘कर्म’ औचित्यहीन और तिरस्कृत हो जाता है।

    यदि मनुष्य अपने जीवन में ‘कर्मशील’ बने रहना चाहता है, सद्कर्मों का प्रयास करते रहना चाहता है, कर्म को मानव जीवन का उद्देश्य मानते रहना चाहता है, तो मनुष्य को पूर्वनिर्धारित व नियोजित युगों की अवधारणा को अस्वीकार करना पड़ेगा। और यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर किसी भी क्षण से सतयुग या कलियुग में जीना शुरू कर सकता है।

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  • भारत के मेट्रो शहर में झोलाछाप डा० मद्रासी द्वारा खूनी बवासीर का शर्तिया इलाज

    सामाजिक यायावर

    2016-02-09-bavasir-shartiya-ilaj-02

    यह लेख भारत में सत्य घटनाओं पर आधारित है। सरकारी नौकरी करने वाला एक इंजीनियर कई वर्षों से बवासीर से परेशान था। उसके किसी मित्र ने बताया कि उसी शहर में एक मद्रासी है जो बवासीर का शर्तिया इलाज करता है। इंजीनियर मद्रासी का पता लेकर पहुंचता है। पॉश एरिया में कई मंजिला घर, लंबी कारें घर के सामने खड़ी हुईं। इंजीनियर अंदर गया। अंदर कई पढ़ी लिखी खूबसूरत लड़कियां भी अपनी-अपनी बारी आने के इंतजार में बैठी हुईं। इंजीनियर भी अपनी बारी के इंतजार में एक कुर्सी पर बैठ गया।

    इंजीनियर भी उस चलताऊ मनोविज्ञान से पीड़ित था जिसमें अंग्रेजी में गिटगिटाने व कांवेँट में पढ़ने को जागरूकता, योग्यता व बुद्धिमत्ता की कसौटी माना जाता है। अंग्रेजी में गिटगिटाती कांवेंट की पढ़ी हुईं खूबसूरत लड़कियों को मरीजों के रूप में देखकर इंजीनियर को लगा कि अब बवासीर का इलाज शर्तिया हो ही जाएगा।

    इंजीनियर साहब देखते कि जब भी कोई स्त्री या पुरुष पर्दे के अंदर दूसरे कमरे में जाता तो डाक्टर की “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” जैसी दबंग आवाजें आतीं, फिर कराहने की आवाजें आने लगतीं। 15-20 मिनट बाद वह स्त्री या पुरुष पर्दे वाले कमरे से बाहर आते और चुपचाप बाहर चले जाते।

    काफी देर तक यह प्रक्रिया देखते रहते हुए इंतजार करने के बाद इंजीनियर साहब का नंबर आया। इंजीनियर साहब उस मद्रासी से पहली बार मिल रहे थे। मद्रासी ने इंजीनियर साहब से यह तक नहीं पूछा कि इनको कौन सी बीमारी है मानो मद्रासी को पता ही था कि यहां आने वाला हर बीमार बवासीर का ही बीमार है।

    मद्रासी ने कहा “खोलो”। इंजीनियर साहब बिलकुल नहीं समझ पाए कि ये क्या खोलें? इंजीनियर साहब ने पूछा कि क्या खोलें? मद्रासी बोला कि आप यहां क्यों आएं हैं, इंजीनियर साहब बोले कि बवासीर के इलाज के लिए। मद्रासी बोला कि बवासीर कहां होता है? इंजीनियर साहब चुप हो गए। मद्रासी बोला कि इसमें शर्माने की क्या बात है बताइए कि बवासीर गांड़ में होता है। इसलिए जब मैंने कहा कि खोलो तो इसका मतलब हुआ कि आप अपनी पैंट व अंडरवियर उतार कर मेरे सामने अपनी गांड़ खोलकर दिखाइए।

    इंजीनियर साहब वहीं पड़े एक तखत पर लेट गए और अपनी गांड़ खोल कर मद्रासी को दिखाने लगे। मद्रासी ने अपनी उंगली बिना किसी दस्ताने के सीधे इंजीनियर साहब के गुदाद्वार में डालने लगे। मद्रासी बोला “और खोलो” अरे भई “और फैलाकर खोलो”। इंजीनियर साहब ने “और खोला” उसके बाद “और फैलाकर खोला”। उंगली डालते हुए मद्रासी बोला कि मुह खोलकर हवा निकालिए जगह बनाइए तभी तो उंगली अंदर जाएगी, इंजीनयर साहब ने कराहते हुए मुंह खोला। मद्रासी ने पहले एक उंगली फिर दो उंगलियां गुदाद्वार में पूरी तरह डाल कर अंदर खूब अच्छे से घुमाते हुए इंजीनियर साहब को हुए बवासीर का कारण जाना व समझा। 

    इंजीनियर साहब के गुदा में जीवन में पहली बार कोई उंगली गई थी। मद्रासी का भारी हाथ और भारी हाथ की भारी उंगलियां। इंजीनियर साहब को बेइंतहा दर्द था लेकिन करें तो करें क्या। आखिर शर्तिया इलाज जो करवाना था। इंजीनियर साहब कुछ और समझे हों या न समझे हों लेकिन अंदर से बाहर आती “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” व कराहने जैसी आवाजों का मतलब बखूबी समझ चुके थे। 

    इंजीनियर साहब की इसी हालात में मद्रासी से बवासीर का शर्तिया इलाज करवाने के पैकेजों में बातचीत शुरू हुई। मद्रासी बोला कि कोई चिंताजनक बात नहीं है, बवासीर ठीक हो जाएगा। इंजीनियर साहब ने कुछ महीने का 30 हजार रुपए वाला पैकेज पसंद किया। इस पैकेज में इंजीनियर साहब को कुछ महीनों तक रोज मद्रासी के पास आना था और मद्रासी की उंगलियों को अपनी गुदा के भीतर लेते हुए गुदा नली में कोई मलहम वगैरह लगवाना था।

    इंजीनियर साहब बिना नागा रोज मद्रासी के पास आते। मद्रासी “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” जैसे आदेश देता, इंजीनियर साहब के मुंह से कराहने की आवाजें आतीं और मद्रासी उंगलियां डालकर अच्छे से चारों तरफ घुमाते हुए कोई मलहम लगाता। इस पूरी प्रक्रिया के बाद इंजीनियर साहब कई घंटे चलने के काबिल नहीं रहते लेकिन बवासीर के शर्तिया इलाज के लिए सब प्रकार का दर्द झेलते।

    भगंदर :

    लगभग एक महीने बाद मद्रासी ने इंजीनियर साहब को सूचित किया कि इनको भयंकर वाला भगंदर (फिस्टुला) है। इसलिए इलाज लंबा चलेगा। इंजीनियर साहब ने मद्रासी के पैर पकड़े और बोले कि हमको ठीक कर दीजिए, बहुत तकलीफ है। मद्रासी ने बताया कि भगंदर का पैकेज बवासीर के पैकेज से अतिरिक्त लेना पड़ेगा। इंजीनयर साहब सहमत हुए। अब बवासीर व भगंदर का इलाज चलने लगा। मद्रासी उसी तरह रोज इंजीनियर साहब के गुदा में उंगलियां डालकर अच्छे से घुमाते हुए कोई मलहम लगाता रहा। लेकिन अब बवासीर के साथ-साथ भगंदर का भी इलाज हो रहा था। इंजीनियर साहब यह मानकर चल रहे थे कि मलहम बदल गया होगा। नया बदला हुआ मलहम बवासीर व भगंदर के इलाज के लिए होगा। अब इंजीनियर साहब का कांबो इलाज चलने लगा।

    मछली की आंख से बनी गुदा रिंग :

    फिर लगभग एक महीने बाद मद्रासी ने इंजीनियर साहब को एक नई सूचना दी कि गुदा को सिकोड़ने फैलाने वाली उनकी गुदा रिंग टूटी हुई है, बदलनी पड़ेगी। इंजीनियर साहब बोले कि कैसे बदलेगी? मद्रासी बोला कि मछली की आंख से बनती है और बढ़िया काम करती है, चिंता वाली कोई बात नहीं है।

    गुदा रिंग बदलवाने के लिए इंजीनियर साहब के सहमत होने पर मद्रासी ने बताया कि रिंग का खर्चा बवासीर वाले पैकेज के अतिरिक्त होगा। इंजीनियर साहब ने मछली की आंख से बनी गुदा रिंग का अतिरिक्त खर्चा दिया।

    मद्रासी ने एक दिन “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” के साथ-साथ “ऐसे ही फैलाकर खोले रहो” वाला वाक्य भी बोला और इंजीनियर साहब 30-40 मिनट तक अपनी गुदा अपने हाथों से पकड़ कर खींच कर फैलाते हुए खोले रहे और मद्रासी बिना दस्तानों के अपनी मोटी-मोटी उंगलियों को इंजीनियर साहब की गुदा के अंदर डालते निकालते रहने के बाद बोला कि लो भई आपकी गुदा रिंग बदल गई अब मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग लग चुकी है।

    न कोई आपरेशन, न कोई चीर फाड़। मद्रासी ने इंजीनियर साहब की गुदा में अपनी मोटी मोटी उंगलियां डालने और निकालने की प्रक्रिया लगभग 30-40 मिनट तक दुहराई और मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग जादुई तरीके से डाल दी। इंजीनियर साहब बहुत खुश हैं कि बिना आपरेशन व चीर-फाड़ के उनकी गुदा-रिंग बदल गई और मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग लग गई।

     

    चलते-चलते :

    इंजीनियर साहब व मद्रासी की बातें खुल कर होनें लगीं थीं। मद्रासी ने उनको बताया कि उसने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक हजारों स्त्रियों के यौनांग देखे और उनकी गुदाओं में महीनों उंगलियां डाली और मलहम लगाते हुए इलाज किए।

    मद्रासी बहुत कम पढ़ा लिखा है, शायद पांचवी या छठवीं तक ही पढ़ा है, लेकिन बहुत पढ़े लिखे लोगों के बवासीर, भगंदर व गुदा-रिंग आदि का शर्तिया इलाज “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो”, मोटी मोटी बिना दस्तानों की उंगलियों, मलहम व मछली की आंख आदि से बनी गुदा-रिंगो आदि-आदि पैकेज के साथ करता है।

    मद्रासी की संताने अमेरिका में पढाई करतीं हैं, उनकी पढ़ाई का सारा खर्चा मद्रासी अपने द्वारा किए गए शर्तिया इलाज की कमाई से उठाता है। करोड़ों का घर है, करोड़ों के कई प्लाट हैं। आलीशान कारे हैं। पत्नी के पास लाखों रुपयों के गहने हैं। और भी बहुत कुछ है।

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  • धार्मिक कथाएं व ग्रंथ, इतिहास व इतिहासकार

    सामाजिक यायावर
    सामाजिक यायावर
    किसी भी धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस धर्म के लोगों को स्थायी रूप से मानसिक गुलाम रूपी अनुगामी बनाने के लिए लिखी गईं हैं। ताकि धर्मों की अमानवीयता, ऋणात्मकता व शोषण वाले गहरे तत्वों पर कभी सवाल न खड़ा हो पाए।
     
    यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं।
     
    एक उदाहरण स्वरूप यदि वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल के बारे में यही साबित होता है कि उस काल्पनिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था और धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था।
     
    जब भी धार्मिक कल्पनाओं व कर्मकांडों को जबरदस्ती सही साबित करना होता है तो ऐतिहासिक शोधों की बात की जाती है।
     
    ऐसे मामलों में जिसे ऐतिहासिक शोध कहा जाता है यदि उस शोध का आधार वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, तो वह ऐतिहासिक शोध कल्पनाओं, काल्पनिक कथाओं व इन पर आधारित ग्रंथों, महाग्रंथों, काव्यों व महाकाव्यों आ्दि की बेसिरपैर की खिचड़ी के अलावे कुछ भी और नहीं होता है।
     
    भारत के बहुत इतिहासकार जिनकी किताबें पढ़ीं जातीं हैं और जिनके नाम की तूती बोलती रही है या बोलती है। जिनके नामों को सबूत के तौर पर दिया जाता है। वे दरअसल इतिहास के शोधों के नाम पर ऐसी ही खिचड़ियां बनाते, पकाते व परोसते रहे हैं।
     
    यही सबकुछ पढ़ कर हजारों लाखों ने PhD कर ली, यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर हो गए, देश के ऊंचे नौकरशाह हो गए। इसी सब घालमेल ने देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा व दशा की और शिक्षा व्यवस्था की खामी के लिए गाली देने के लिए लार्ड मैकाले जैसे कुछ लोग अनंतकाल के लिए भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए राक्षस घोषित कर दिए गए।
     
    बेसिकली हमारा देश ऐसे ही खोखले व सतही आधारों पर खड़ा है। हमें ही तय करना है कि हम खुद को, अगली पीढ़ी को, समाज को, देश को क्या देना चाहते हैं और कैसा बनते देखना चाहते हैं ….
     
     
     
     
  • समाजवादी बिल्लियों का बड़ा परिवार और फ्रैंक हुजूर

    सामाजिक यायावर

    जो गांवों के हैं उन्होंने अपने गावों में या अपने घरों में घरेलू बिल्लियां देखी होगीं। भारत में पाई जाने वाली घरेलू बिल्ली धारीदार व छीटदार खूबसूरत होती है। अपनी दादी, नानी, माता, बुआ, मौसी, बहन व पत्नी आदि को खाने का सामान बिल्लियों से बचाने की जुगत के साथ रखते देखा होगा। उनमें से बहुतों ने अपने घरों में अपनी दादी व नानी के द्वारा हाथ से बनाई गई मिट्टी की अलमारियां देखीं होगीं जिनमें बाहर से कड़ी भी लगती थी जिसमें छोटा सा ताला भी लगाया जा सकता था। यह जुगत बिल्ली से भोजन व दूध को सुरक्षित करने के लिए होती थी।

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    frank-hujur-cat-008बीते दिनों में गांव के लोग पालतू पशुओं व पक्षियों के साथ परस्परता में जीवन जीते थे। कभी चूक हो जाने पर यदि बिल्ली दूध पी गई तो बिल्ली को जान से नहीं मारा जाता था। बिल्ली को घर से मार कर भगाया नहीं जाता था। जिन घरों में बिल्लियां होती थीं वे बिना पाली गई होने के बावजूद पालतू होती थीं। उन बिल्लियों के बच्चों के घर के बच्चों के साथ रिश्ते बनते थे। आज भी बहुत गावों में ऐसा होता है। शहरों में भी कभी कभार ऐसा देखने को मिलता है। लेकिन बिल्ली को घर के पारिवारिक सदस्य की तरह अधिकार देते हुए पालना, भारत में प्रचलन में नहीं है, कुछ लोग पालते हैं लेकिन प्रचलन में नहीं हैं। बिल्ली पालना आसान नहीं होता क्योंकि बिल्ली स्वतंत्र जीव होती है। 

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    बिल्ली की आप कितनी भी देखभाल कीजिए वह कभी आपकी गुलाम नहीं बनती है। बिल्ली कुत्ते की तरह आपकी अनुगामी, भक्त या स्वामिभक्त नहीं बनती है। आप बिल्ली को रोज कई बार भोजन खिलाइए लेकिन वह कभी आपके सामने कुत्ते की तरह लार चुआते हुए आपके तलुवे नहीं चाटेगी, आपके आगे अपनी पूछ नहीं हिलाएगी। आपसे जुड़े होने के बावजूद वह अपना वजूद आपके वजूद से स्वतंत्र रखती है।

    अपना वजूद स्वतंत्र रखते हुए, अपनी दृष्टि स्पष्ट रखते हुए भी आपसे जुड़े रहने की, आपके साथ मित्रवत रहने की खासियत के कारण ही शायद आत्मकथा लेखक व संपादक फ्रैंक हुजूर बिल्लियों को समाजवादी कहते हैं। फ्रैंक हुजूर कहते हैं कि उन्होंने बिल्लियों से समाजवाद के कई अध्याय सीखे हैं। फ्रैंक हुजूर ने विश्व की कई हस्तियों की आत्मकथाएँ लिखीं हैं। पाकिस्तान के विश्वप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान के जीवन के ऊपर भी किताब लिखी है। सोशलिस्ट फैक्टर नामक अंग्रेजी मासिक पत्रिका के संपादक भी हैं। फ्रैंक हुजूर की जीवन संगिनी बालीवुड में अभिनेत्री हैं। टीवी सीरियल्स में काम करतीं हैं। उन्होंने भी फ्रैंक हुजूर की 40 से अधिक बिल्लियों को अपने बच्चों की तरह स्वीकार कर रखा है।

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    frank-hujur-cat-001फ्रैंक हुजूर ने दुनिया के विभिन्न देशों की कई प्रजातियों की 40 से अधिक बिल्लियां पाली हुई हैं। सभी का भोजन, रहने की व्यवस्था व स्वास्थ्य आदि की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी फ्रैंक हुजूर पारिवारिक अभिभावक की तरह उठाते हैं। फ्रैंक हुजूर को अपनी प्रत्येक बिल्ली का नाम, उसके माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, मौसी मौसा, बुआ फूफा, बहन भाई आदि सभी के नाम व इतिहास जुबानी याद रहता है। इनके घर में हर जगह बिल्लियां ही दिखाई देती हैं। आप फ्रैंक हुजूर से मिलने पहुंचिए तो मालूम पड़ा कि जिस कुर्सी पर या सोफे पर आप बैठने जा रहे हैं वहां पर पहले से ही एक बिल्ली आराम से पसरी हुई है। चिंता न कीजिए बिल्ली आपको देखने के कुछ देर बाद आपके लिए स्थान खाली करके अपने लिए कोई नई जगह जुगाड़ लेगी। कोई गिला शिकवा नहीं। कुर्सी के लिए कोई झगड़ा नहीं। 

    frank-hujur-cat-002यदि आप रात में फ्रैंक हुजूर के अतिथि हैं और यदि बिल्लियों को आप पसंद आ गए तो सुबह जब आप जगते हैं तो आपको आपके साथ बिस्तर में कई बिल्लियां सोती मिलेंगीं। मैं इन सब बातों के जीवंत अनुभव उनके घर में अतिथि के रूप में ले चुका हूं। चूंकि सिडनी, आस्ट्रेलिया में हमारे घर में कई बिल्लियां पारिवारिक सदस्यों के रूप में रहीं हैं, इसलिए मुझे फ्रैंक हुजूर के घर में बिल्लियों के साथ बहुत ही अधिक अच्छा लगता है।

    फ्रैंक हुजूर ने बिल्लियों के नाम दुनिया की हस्तियों के ऊपर रखे हैं। आपको विक्टोरिया, ब्रूटस, नेपोलियन, लेनिन, लोहिया, टीपू आदि ऐतिहासिक पात्रों के नाम इनकी बिल्लियों के नामों में मिल जाएंगें। बिल्लियों के समाजवादी दर्शन के बारे में फ्रैंक हुजूर ने एक बिल्ली “लार्ड बोका” जिसका देहांत हो चुका है के ऊपर काफी कुछ लिखा है। यदि आप इच्छुक हों तो आप http://lordboca.com और http://www.newskarnataka.com/india/man-who-built-a-shrine-in-the-memory-of-a-cat में जाकर A devine socialist cat के बारे में पढ़ सकते हैं।

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