Author: संपादक मंडल

  • भैंस/गाय/बकरी का ग्रामीण-अर्थव्यवस्था से संबंध और उत्तर प्रदेश/बिहार जैसे भैंस/गाय/बकरी परिवेश वाले राज्य

    सामाजिक यायावर

    मेरे दादा (पिता के पिता) जी का देहांत नवंबर 1984 में सड़क दुर्घटना के कारण हुआ था लगभग 85 वर्ष के रहे होंगें। चूंकि मेरे माता-पिता उनके साथ गांव में नहीं रहते थे सो मेरे पिता के हिस्से में आईं हुयीं भैंसें, बकरियां, गाय और बैल आदि को मेरे दादा जी नें पिता जी के हिस्से की जमीन में काम करनें वाले अपनें पारंपरिक मजदूर परिवार को दे दिया था। 

    दादा जी के देहांत के बाद जब जानवरों को लौटानें की बात आयी तो मेरे पिता जी बोले कि हमें नहीं चाहिये जो पिताजी नें अस्थायी रूप से आपको दिया वह उनकी ओर से स्थायी-दान मान लीजिये। 

    मैं छोटा था किंतु इस घटना से मेरे मन में एक बात बैठ गई कि भैंस आदि जानवर शायद बेकार होते हैं और फिजूल का सिरदर्द भी होते हैं। चूंकि शहरी परिवेश में पला-बढ़ा इसलिये गोबर गंदी चीज होती है आदि बातें शहरीकरण वाली कथित-शुचिता नें बैठा दी।  मुझे लगता है कि ऐसे ही बहुत बालकों/किशोरों के मन में धारणायें बनतीं होगीं। 

    जब बड़ा हुआ और समाज को समझनें के लिये स्वाध्याय व समाज के लोगों के द्वारा किये जा रहे आर्थिक विकास/स्वावलंबन आदि के जमीनी प्रयासों को देखना व समझना शुरु किया, तो जो बात सबसे पहले मेरी समझ में आयी वह यह कि भैंस, गाय और बकरी भारत के ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव है। 

    मैंने देखा कि कैसे महिलायें अपनी मरी हुयी बकरी को अपनी गोद में लेकर दहाड़ें मारकर रोतीं हैं। बिहार की भीषण बाढ़ों और आग से नष्ट होते गावों में मैंने देखा कि ग्रामीण कैसे अपनी जान की बाजी लगाकर अपनें जानवरों की रक्षा करता है। 

    समय के साथ मैंने समझा कि वास्तव में भैंस/गाय/बकरी आदि भारत के करोड़ों ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि ये जानवर न हों तो करोड़ों भूमिहीन परिवारों को खाना/कपड़ा और झोपड़ी तक नसीब नहीं हो। 

    उदाहरण-

    • मेरे एक बहुत ही अच्छे व विश्वसनीय मित्र हैं। बहुत बड़े चिकित्सक हैं प्रतिदिन कई सौ मरीजों को देखते होगें, अपनी पैथोलोजी है, अपना क्लीनिक है और यह सब उनके पास देश के जानेमानें मेट्रो-शहर में है। उनकी आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। उनके एक सगे भाई एक Indian Institute of Technology (IIT) के उप-निदेशक भी रह चुके हैं और एक सगे साले-भाई Airtel Company के वाइस-प्रेसीडेंट।  उनके परिवार से बहुत लोग All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) से स्नातक/परा-स्नातक की पढ़ाई पढ़े हैं।मैंने उनसे एक बार कहा कि आजकल गांवों में गायों की डेयरीज खुलवा रहा हूं, ताकि ग्रामीणों की आर्थिक व्यवस्था आगे बढ़े। मित्र बोले कि एक गाय/भैंस मेरी ओर से और मुझे 10,000 (दस हजार) रुपये निकाल कर दिये। मैंने कहा कि यह क्या है, वे बोले कि इसे आप एक गाय या भैंस कुछ भी समझ लीजिये। मैं ठहाका मारकर हंसा, मैंने कहा कि एक अच्छी गाय या भैंस 70,000-80,000 की कीमत से शुरु होती है और कई लाख रुपये तक जाती है। मैंने उनसे कहा कि जब आप कभी गांवों जाते होगें तो जो भैंसे आपको ऐसे ही जमीन में बैठी हुयी दिखतीं हैं उनमें से बहुतों की कीमत 1 लाख रुपये से अधिक की भी हो सकती है।  

      मेरे मित्र अचंभित हुये और बोले कि मुझे बिलकुल पता नहीं था कि गाय और भैंस इतनी महंगी आती है। मैंने उनको बताया कि 10 हजार में तो अच्छी बकरी मिलती है। 

    • मेरे एक मित्र हैं लखनऊ में अपनें कामकाज से 1 लाख रुपिया महीना के लगभग आज से लगभग 10 साल पहिले कमाते थे। आजकल गांवों में रहते हैं और शानदार शुद्ध हवा लेते हुये मस्ती से रहते हैं। उननें और उनकी पत्नी नें तीन गाय-भैंसे पाल रखी हैं। बच्चों को भरपूर दूध-मलाई खिलानें और मुझे जैसे मित्रों को शुद्ध खोये के पेड़े खिलाते रहनें के बावजूद महीनें का 25,000-30,000 केवल दूध से कमाते हैं वह भी गांव में। जानवरों के गोबर का प्रयोग खेती में खाद में करते हैं और कभी कभी शरीर में चुपड़ कर स्नान भी कर लेते हैं। हमनें उनसे पूंछा कि इतना पढ़नें लिखनें के बाद गांव में रहते हैं, भैंसों की सेवा करते हैं … अजीब नहीं लगता है। 

      इन मित्र का कहना है कि आजकल के लाखों B.Tech/M.Tech/MBA लड़के/लड़कियां दिन में 15-15 घंटे काम करके जितना कमाते हैं उससे अधिक मैं अपनीं कुछ गायों/भैसों और खेती से कमा लेता हूं और बढ़िया शुद्ध हवा लेता हूं और शारीरिक/मानसिक रूप से स्वस्थ भी रहता हूं।

      रही सेवा करनें की बात तो ये जानवर जीवन हैं और मेरे अपनें परिवार का हिस्सा हैं मेरे प्रति वफादार हैं। जबकि शहरी चकाचौंध के लिये कंपनीज से शोषण कराते हुये शारीरिकमानसिक बीमार जिंदगी जीनें वाले लोगों को तो यह तक नहीं पता होता कि आज जिस नौकरी में हैं उसमें कल होंगें भी या नहीं या किसकी सेवा कर रहे हैं। वे नौकर हैं और मैं मालिक हूं।
       

    मैं उत्तर प्रदेश व बिहार की ऐसी हजारों महिलाओं से मिल चुका हूं जो कि केवल गाय/भैंस की सेवाटहल करके दसियों हजार महीनें की आय करतीं हैं जबकि अंगूठा-छाप हैं। 

    मैं तो कहता हूं िक पहले असली भारत को समझ लीजिये फिर उसकी बात कीजिये। नहीं तो आप अपनीं मूर्खता में उनका उपहास उड़ातें रहेंगें जिनके जीवन की तुलना में खुद आपका जीवन ही उपहास है। 

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  • आधुनिक भारतीय समाज की “जातिवाद” के कुछ घिनौनें उदाहरण जो कि रोजमर्रा की सामान्य उदाहरण हैं

    सामाजिक यायावर

    यह लेख उन लोगों को समर्पित है जो लोग मुझे मेरे जातिवाद के ऊपर लिखे लेखों में ज्ञान-प्रवचन देते हैं या प्रतिक्रिया स्वरूप तर्कोंशब्दों के जाल से यह बतानें का प्रयास करते हैं कि जातिवाद खतम हो रहा है या जातिवाद अपनें भीतर बहुत ही मानवीयदूरदर्शी भाव व मानवीय लक्ष्य को समाहित किये हुये है/या था ::

    मैंनें अपनें छात्र-जीवन में भी कुछ ऐसे गावों में समाज के लिये काम किये जिन गांवों में “दलित-वेश्यायेंऔरदलितही रहते थे और आज तक रहते हैं।

    यह बातें तब की हैं जब मैं स्नातक का छात्र हुआ करता था और सेमेस्टर्स में बंक मारकर, हर शनिवार-रविवार, सर्दियो/गर्मियों/सेमेस्टर-अवकाशों में 200 किलोमीटर की दूरी स्थानीय बसों या मोटरसाइकिल में तय करके पहुंचता था और इन्हीं दलितों के घरों में रहता था, खाता था और कभी कभी इनके साथ खेतों में या किसी और काम में मजदूरों की तरह काम करता था ताकि मेरे मन को यह नैतिक सकून मिल सके कि मैं अपनें भोजन के लिये इन पर अवांछित बोझ नहीं बन रहा हूं। 

    • “दलित-वेश्याओं” वाला गांव, कुछ सौ वर्ष पूर्व उस इलाके के ऊपरी जाति के लोगों नें बसाया था। इस गांव में पति नाम की कोई वस्तु नहीं होती थी। आसपास के इलाके के गांवों से कोई भी आकर इस गांव की महिलाओं को वस्तु की तरह भोग सकता था। बिना पिता की पहचान व नाम के पैदा होनें वाली इनकी संतानों में यदि पुत्र हुआ तो वह ऊपरी जाति के लोगों के घरों में बेगारी करनें में उसको अपनें जीवन की नियति माननी होती थी, और यदि लड़की हुयी तो उसको तो महज 13-14 साल की उम्र से ही वेश्या बनना तय था ही। इस गांव की लड़कियां आज भी वेश्या बनतीं हैं और यदि 35 साल से अधिक उम्र के पुरुष से यह पूंछा जाये कि उसका पिता कौन है तो 90% से अधिक पुरुष गोलमाल जवाब देगा क्योंकि उसको पता ही नहीं कि किस पुरुष के साथ रात-बितानें से उसका जन्म हुआ।

      जब लोग जागरूक होनें लगे तो ऊपरी जाति के लोगों नें नया तरीका निकाला- इस गांव की लड़कियों को मुंबई जैसे भारतीय मेट्रो शहरों, अरब देशों और दूसरे देशों के वेश्यालयों में बेचा जानें लगा।

      यह वही गांव है जहां कि लड़कियों को मैंनें अपनीं धर्म-बहनें माना और उन्होनें मुझे रक्षाबंधन में राखी बांधी।  कुछ स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर इस गांव के लोगों के लिये गैर-परंपरागत ऊर्जा के उपकरण, प्राथमिक शिक्षा व स्वास्थ्य आदि के काम भी शुरु किये गये थे।

    • “दलित” वाला गांव में सिर्फ एक घर पंडित जी का था उसमें भी केवल एक पंडित जी ही रहते थे और उनका पूरा परिवार मेट्रो शहर में रहता था।  पंडित जी थे अकेले लेकिन पूरा गांव उनका गुलाम था क्योंकि पूरे गांव की जमीन लगभग मानिये कि उनकी ही थी। इसलिये 60 परिवारों के दलित उनके अघोषित गुलाम।महज 15 वर्ष पूर्व की ही बात है कि एक 12 साल के दलित बच्चे नें उनके खेतों में बेगार करनें से मना कर दिया तो उसको खेत में जिंदा जला दिया गया था और किसी की हिम्मतहुयी कि पंडित जी को कोई किसी कानून आदि बता पाता। यह घटना उन पंडित जी की है, जिनके परिवार के लोग न तो बहुत बड़े पदों में थे औरही कोई राजा या नवाब आदि।   

    मेरा बहुत ही दृढ़ता से यह मानना है किजातिवादका घिनौनापनहिंसा समझनें के लिये मनुष्य को अपनें स्वार्थ, अहंकार, शाब्दिक-तर्कों के कथित ज्ञान की महानता के गौरव आदि ओछेपन से बाहर आकर सच्ची मानवीय-संवेदनशीलता से घिनौनेपन को समझना होगा।

    ऊपर की बातें तो तब की हैं जब मैं छात्र होता था। तब से अब तक तो मैं कितना भारत देख चुका हूं मुझे खुद भी याद नहीं रहता…. मैं सैकड़ों घटनायें बता सकता हूं जो कि ऊपरी जातियों के वीभत्स व घिनौंनें अमानवीय आत्याचारों पर हैं। सारी घटनायें सत्य हैं और आधुनिक भारत व समाज की हैं।

    “जातिवाद” को खतम करना है तो पहले खुद में इमानदार और मानवीय होईये और तार्किक, शाब्दिक और पौराणिक-कथाओं वाला दर्शन किनारे रखकर इमानदार चिंतन कीजिये। अपनें इर्द-गिर्द की दस-पांच घटनाओं को दुनिया की कसौटी न मानिये। दुनिया आपके मुहल्ले से बहुत ही अधिक बड़ी है।

     

  • हिंदू धर्म की आधारभूत कथित-कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था का आधुनिक काल्पनिक-चित्रण

    सामाजिक यायावर

    यह लेख उन लोगों के लिये लाभदायक हो सकता है, जो कि जातिवाद के घोर हिमायती हैं और इस गुमान में जीते हैं कि जातिवाद वास्तव में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था है। जिन लोगों का जाति-विरोध केवल चुनावी-राजनीतिक व आरक्षण जैसे मसलों में होनें वाली हानि के स्वार्थ पर आधारित है, कृपया वे खुद को जातिवाद का घोर हिमायती ही मानकर इस लेख का आनंद उठावें।

    यदि आप यह मानते हैं कि भारत के लिये जाति वास्तव में ही आधारभूत जरूरी है। यदि जाति-व्यवस्था बहुत ही नायाब खोज थी और वर्ण-व्यवस्था सनातन धर्म की ही अति-मानवीय व सामाजिक-व्यवस्था है।  और समय के साथ वर्ण-व्यवस्था को यदि चौपट नहीं किया गया होता तो यह बहुत ही लाजवाब व्यवस्था थी।

    तो आप नीचें की काल्पनिक-चित्रण को समझिये और सच में अंदर से इमानदार होकर बहुत ही साधारण भी तार्किक क्षमता का प्रयोग करके स्वयं में जातिवाद से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजनें की सामाजिक-इमानदार चेष्टा कीजिये।

    वर्ण-व्यवस्था सच में ही जन्म-आधारित न होकर कर्म-आधारित थी तो आधुनिक समय में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था किस प्रकार की हो सकती है, इसका काल्पनिक-चित्रण का प्रयास किया जाये।

    यदि ध्यान से देखा जाये तो जिस कर्म को वर्ण तय करनें का आधार माना गया था वह कोई गूढ़ कर्म न होकर व्यवसाय के चरित्र पर आधारित था।  इसलिये मैंने व्यवसाय को कर्म मानते हुये आधुनिक समय में कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था की कुछ-कुछ कल्पना की, जो कि कुछ यूं है-

    ब्राम्हण वर्ण:

    • वैज्ञानिक
    • प्रोफेसर
    • शिक्षक
    • ट्यूटर
    • अवैतनिक सामाजिक-कार्यकर्ता
    • सामाजिक-शोधार्थी
    • संपादक
    • जर्नलिस्ट
    • चिकित्सक
    • …. आदि आदि

    क्षत्रिय वर्ण:

    • सांसद/विधायक
    • सेना में काम करनें वाले लोग
    • पुलिस में काम करनें वाले लोग
    • …… आदि आदि

    वैश्य वर्ण:

    • नौकरशाह
    • कंपनीज के निदेशक/मुख्य-कार्यकारी अधिकारी आदि
    • प्रबंधक
    • मार्केटिंग विभाग
    • व्यापारी (गांव में सड़क किनारे कपड़ा बिछाकर पान-मसाला बेचनें वाले से लेकर सुपर-मार्केट तक)
    • व्यापाराना डीलों के दलाल
    • शेयर-बाजार के दलाल
    • राजनीति में दलाल किस्म के लोग
    • मीडिया के दलाल किस्म के लोग
    • गांव-गांव/कस्बे-कस्बे/नगर-नगर में व्यापाराना के अंदाज में मंदिरों को चलानें वाले
    • NGOs को फंड के लिये चलानें वाले
    • NGOs में वेतन के लिये काम करनें वाले
    • ….. आदि आदि

    शूद्र वर्ण:

    • इंजीनियर
    • मजदूर
    • किसान
    • राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों के प्रचार के लिये सड़क/सोशल साइट्स आदि में पोस्टरबाज
    • ….. आदि आदि

    आधुनिक वर्ण-व्यवस्था बहुत अधिक परिवर्तनशील होगी, उदाहरण के लिये-

    • कोई महानुभाव आज किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं तो आज “ब्राम्हण” हैं, किंतु उनकी इच्छा हुयी कि अब चुनाव लड़कर सांसद बना जाये तो उनके सांसद बनते ही जाति बदल कर “क्षत्रिय” हो गयी। कभी चुनाव हार गये और फिर प्रोफेसरी शुरु कर दी तो उनकी जाति फिर “क्षत्रिय” से बदलकर “ब्राम्हण” हो गयी।
    • कोई महानुभाव आज इंजीनियर है तो “शूद्र” जाति का हुआ। किंतु यदि किसी कंपनी में मजूरी न करके किसी कालेज में पढ़ानें लगा तो उसकी जाति “ब्राम्हण” हो गयी। जिस दिन कालेज प्रबंधन नें कालेज में पढ़ानें की नौकरी से निकाल दिया और उसनें फिर से किसी कंपनी में मजूरी करनी शुृरू की तो उसकी जाति “शूद्र” हो गयी।

    आप अपनीं कल्पना शक्ति से ऐसे ही हजारों उदाहरणों की कल्पना कर सकते हैं।

    “आधार-कार्ड” जैसा एक “वर्ण-कार्ड” होना चाहिये जिसका कि मुख्य डाटाबेस से सीधा आनलाइन संबंध हो और बहुत ही उच्च क्षमता व गुणवत्ता के साफ्टवेयर्स और आनलाइन डाटाबेस आदि होनें चाहिये, जिससे कि मनुष्य के व्यवसाय के बदलते ही तुरत डाटाबेस में उसकी जाति अपडेट हो जाये।

    “वर्ण-कार्ड” सबसे जरूरी चीज होगी। हजारों साल पहले लोग पूरा जीवन एक ही गांव या नगर में ही परंपरा में कई पुश्तों तक रह जाते थे। किंतु आज कौन कहां चला जाये और किस व्यवसाय को अपना ले, इसका कोई अनुमान नहीं किया जा सकता है …. इसलिये “वर्ण-कार्ड” बहुत जरूरी होगा ताकि “जाति” को व्यवसाय बदलते ही तुरंत अपडेट कर दिया जाये ताकि कोई लोगों को अपनीं जाति गलत बताकर धोखा न दे पाये, आदि आदि।

    यदि आपनें सच में ही यह लेख सच्चे मन से पढ़ा है और अंदर से सामाजिक-बेईमान और स्वार्थी नहीं हैं। तो इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि “जाति-व्यवस्था” एक वाहियात बात है भले ही यह कर्म पर ही आधारित क्यों न हो।

    कोशिश कीजिये कि भारत को और भारतीय समाज को जाति से बिलकुल ही मुक्त कीजिये। और इस दिशा में एक छोटा सा कदम भी आप तब ही चल सकते हैं जबकि आप स्वयं में सच्चे मन से इमानदार हों।  इस दिशा में एक कदम चलनें के लिये आपको तर्कों की नहीं सच्चे मन की भावना को यथार्थ धरातल में जीकर प्रमाणित होनें की जरूरत है।

    हिंदू धर्म में बहुत ही सुंदर तत्व हैं किंतु जाति जैसी आधारभूत घिनौनी, हिंसक व सामाजिक गुलामी जैसी सड़ांध के कारण सबकुछ आधारहीन हो जाता है।

    मैं तो यही कहूंगा कि आईये सबसे पहले भारत को जाति मुक्त देश व समाज बनायें। इतना होते ही भारत में भ्रष्टाचार नगण्य के स्तर में पहुंच जायेगा। भारत सच में ही विश्व-गुरू बननें की क्षमता व योग्यता रखता होगा।

    —-
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

  • भारत का समृद्ध मिडिल क्लास, अपनीं गतिविधियों व सत्ता लोलुपता से देश में गृह-युद्ध आमंत्रित करता सा प्रतीत हो रहा है

    सामाजिक यायावर

    जितनी उच्छंखलता से भारत का समृद्ध मिडिल क्लास भारत के संवैधानिक गरिमाओं व लोकतांत्रिक मूल्यों का माखौल उड़ानें में खुद को गौरवांवित व क्रांति का वाहक साबित कर रहा है और परिवर्तनकारी होनें के छद्म को भरपूर अहंकार के साथ से जी रहा है। उसके दूरगामी परिणाम बहुत अधिक घातक होंगें।

    समृद्ध मिडिल क्लास की आज की जा रही गतिविधियों से प्रेिरत होकर भविष्य में जब देश का शूद्र, आदिवासी और वास्तविक शोषित/गरीब संवैधानिक गरिमाओं को ताक पर धरना शुरु करेगा तो आज के परिवर्तनकारियों को खोजे जगह नहीं मिलेगी। और होनें वाली क्रियाओं को रोकनें की समझ, ताकत व हिम्मत भी नहीं होगी।

    इसलिये कोशिश कीजिये और सत्ता लोलुपता के कारण ऐसा डायनासोर न बनाइये जो कि एक दिन खुद आपके ही अस्तित्व में प्रश्नचिंह खड़ा कर दे।

    कोशिश कीजिये कि दो बातों को अपनें अहंकार को और सत्ता लोलुपता को तिलांजलि देते हुये समझनें का प्रयास कीजिये-

    •  सामाजिक परिवर्तन गंभीरता, धैर्य और सामाजिक समझ व ठोस सामाजिक रिश्तों के जमीनी आधार से होते हैं।
    • जो व्यवहार करके आज आप अपनें लिये लाभ प्राप्त करनें के नशे में जी रहे हैं वही व्यवहार यदि अधिसंख्यों नें सीख लिया तो खुद आपका अपना वजूद हमेशा के लिये भयंकर खतरे में पड़ जायेगा, और उस परिस्थिति को रोकना बिलकुल ही असंभव होगा आपके लिये।

    भारत के शोषित लोगों, शूद्रों (परंपरागत सामाजिक शोषित) व आदिवासियों को समझनें का छद्म अहंकार छोड़िये और ऐसा कोई व्यवहार न कीजिये जो उनको कोई ऐसा रास्ता चुननें को प्रेरित करे कि खुद आपका अपना वजूद ही हमेशा के लिये खतरे में पड़ जाये।

    मैंने समय समय पर कहता ही रहता हूं कि बिना समाज को गहराई से समझे हुये केवल खुद को महाज्ञानी व महा-परिवर्तनकारी माननें के छद्म व अहंकार में की गयीं मूर्खताओं और सत्ता-लिप्सा की प्रेरणा से की गयी गतिविधियों से देश को गृहयुद्ध में झोंका जा सकता है।

    और यदि भविष्य में भारत गृहयुद्ध की परिस्थितयों की ओर अग्रसर होता है तब न तो टीवी चैनलों के प्रकांड सामाजिक व राजनैतिक समझ के लोगों की अद्वितीय समझ ही किसी काम के लायक होगी, न ही अखबारों के संपादक व पत्रकार लोगों की अद्वितीय जमीनी समझ ही किसी काम के लायक होगी और न ही NGO के मठाधीशों का फंड्स, प्रोजेक्ट्स और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर पानें की मार्केटिंग व अकाउंट मेंटेंन करनें की दस्तावेजी समझ ही किसी काम के लायक होगी।

    इसलिये जो भी कीजिये वह नशा कुछ कम करके कीजिये। दुनिया में कई प्रकार के नशे होते हैं। नशा इसलिये बुरा होता है क्योंकि यह मनुष्य की सोचनें समझनें की क्षमता को अस्थायी रूप से क्षीण कर देता है, जो कि शोषण और जीवन के दर्द को भूलनें में मदद करता है और लगातार खुद का शोषण करवानें के लिये नियति को स्वीकारनें की कमजोरी भी देता है या कभी कभी नशा तात्कालिक तौर पर भूलनें की ताकत देता है ताकि मन को दबाव में भी रिलैक्स किया जा सके।

    हर प्रकार के नशे में होनें के लिये कुछ खानें, पीनें, सूंघनें या छूनें वाले पदार्थ की ही आवश्यकता नहीं होती है, कुछ नशों के लिये किसी पदार्थ के प्रयोग करनें की आवश्यकता नहीं होती है।

    मेरा सुझाव है कि न तो खुद को नशे में रखिये और न ही समाज के लोगों को नशे में रखिये। नशा है तो एक न एक दिन टूटता ही है। और कुछ नशे ऐसे होते हैं जो यदि टूटते हैं तो नशा दिलानें वालों को बहुत विध्वंस की ओर ले जाते हैं।

    बहुत लोग दावे से ऐसा कहते रहते हैं कि भारत में गृहयुद्ध नहीं आ सकता है। मैं ऐसे लोगों को बहुत ही अधिक हवाई और वाहियात मानता हूं।

    भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को, भारत के संवैधानिक गरिमा का मजाक उड़ानें की गलतियां ऐसी मूलभूत गलतियां हैं जो कि ऐसी गंभीर गलतियां हैं जो कि आनें वाले समय में देश को लंबे गृहयुद्ध में धकेल सकतीं हैं।

    देश, देश के संविधान, देश के लोकतंत्र व समाज यहां तक कि जातिवाद जैसी घिनौनी नीचता नें भी आपको बहुत कुछ दिया है। इसलिये जो मिल चुका है और अभी जो और मिलनें वाला है उसको भोगिये और समाज का आदर कीजिये।  और भोगनें के लिये तरीके प्रयोग कीजिये किंतु कुछ ऐसी मूलभूत गलतियां मत कीजिये जो कि देश को सिर्फ समृद्ध मिडिल क्लास की लिप्साओं के लिये गृहयुद्ध में धकेल दे। 

    लोकतंत्र में राजनैतिक सत्ता प्राप्त करनें से या राजनैतिक सत्ता में बनें रहनें से या राजनैतिक सत्ता को घिसटते हुये या सरलता से चलाते रहनें से … ना तो व्यवस्था परिवर्तन होते हैं, न ही सामाजिक बदलाव होता है और ना ही राजनैतिक सामाजिक चेतना का ही विकास होता है।

    इन परिवर्तनों व विकास के लिये मूलभूत तत्व होते हैं – समझ, दृष्टि व सामाजिक इमानदारी वह भी अपनें खुद के स्वार्थों व स्वकेंद्रित लिप्सा और अहंकार से ऊपर उठकर !!

     —
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

  • जातिवाद सबसे घिनौना/हिंसक फासिज्म और सामाजिक-भ्रष्टाचार को खतम करनें की दिशा में प्रस्तावित सामाजिकता के आधारभूत-रचनात्मक बिंदु

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”

    • जातिवाद सबसे घिनौना रेसिज्म है
    • जातिवाद सबसे हिंसक सामाजिक-फासिज्म है
    • जातिवाद ही भारत में करप्शन का जनक है
    • मनुष्य को मर्द और औरत की जाति के रूप में देखना भी एक किस्म का जातिवाद है
    • समाज और आदमी को करप्ट बनाया है “जातिवाद” नें।

    भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनानें या लागू करनें से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलानें से करप्शन नहीं दूर होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज और समाज का आदमी करप्ट है।

    आरक्षण का विरोध तो आरक्षण लागू होनें के पहले दिन से हुआ है, वह भी केवल इसलिये कि शूद्र समकक्ष क्यों खड़ा हो और सामाजिक व राजनैतिक संसाधन व ताकत शूद्र के साथ क्यों साझा हो। इसको योग्यता व अयोग्यता से जोड़ा जाना बहुत ही सतही तर्क है।

    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक माननें वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील माननें वाले अधिसंख्य सवर्ण लोगों का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिये घृणा का भाव रखते हैं क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करनें लगा है और सवर्णों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करना लगा है।

    अब मुश्किल तो यह है कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है और “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” पर आधारित है। (मुझ जैसे गवांर-जाहिल की यह पंक्ति समझनें के लिये कुछ मेहनत लगेगी)

    हजारों सालों तक कुचला है जिन्हें और उसी कुचले जानें के परिणाम स्वरूप आज संसाधन और मजे ले रहे हैं। जिनकी मेहनत का हजारों साल माल खाया है वह भी पूरी शिद्दत के साथ पारंपरिक व सामाजिक भ्रष्टाचार स्थापित करके थोड़ी सी अंदर की इमानदारी और प्रेम उनके साथ भी साझा करनें की मानवीयता दिखा दीजिये।  या सारी परिभाषायें, सारा दर्शन, सारा ज्ञान, सारी ईमानदारी, सारी महानता व सारी मानवीयता केवल आपके खुद के स्वार्थ व अहंकार तक ही सीमित है।

    जातिवाद के हजारों वर्षों के काल में जबकि शूद्रों को समाज में मनुष्य की तरह जीनें के मौलिक अधिकार भी नहीं थे।

    जो लोग योग्यता या अयोग्यता का तर्क देते हैं उनकी सोच शायद अपनें स्व-केंद्रित स्वार्थ व भोगनें की लिप्सा में यह भूल जाती है कि हजारों वर्षौ के जातिवाद नें भारतीय समाज की करोड़ों प्रतिभाओं की प्रतिवर्ष भ्रूण हत्या की है।  प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या कैसे की इस बात को समझनें के लिये नीचें की लाइनों को खुले मन से समझनें की आवश्यकता है।

    जातिवाद नें जन्म के आधार पर ही बचपन से ही आदमी की योग्यता व सामाजिक चरित्र तय कर दिया। –

    • ब्राम्हण का पुत्र जो कि मूढ़ बुद्धि का हो तब भी उसे विद्वान माना गया और उसको आजीवन सिर्फ कुछ पोथियों को उल्टा-पुल्टा तरीके से बांच देना है। घोर मूढ़ता को भी महान विद्वता साबित करनें के लिये पौराणिक कथायें बना दीं गयीं। भरपूर सामाजिक षणयंत्रों के साथ मूढ़ता को महान विद्वता साबित करनें का अमानवीय कुचक्र।
    • क्षत्रिय का पुत्र बहुत कायर होते हुये भी, महान बहादुर के रूप में जन्मजात मान लिया गया…. आदि आदि।
    • वैश्य के पुत्र को व्यापार व प्रबंधन का ककहरा न आते हुये भी, व्यापार व प्रबंधन का पुरोधा जन्मजात ही मान लिया गया।
    • शूद्र को ऊपर के तीन वर्णों के गुलाम के रूप में जबरन स्थापित किया गया।

    * देश में यदि पौराणिक कथाओं आदि के कथित दैवीय ज्ञान की बात न की जाये तो भारतीय समाज ज्ञान के मामलें में, शिक्षा के मामलें में कहां खड़ा हुआ … इसको समझनें के लिये किसी कुतर्क की बजाय इमानदार मन की जरूरत है। तो यह रहा हजारों वर्षों के ब्राम्हणों के परंपरागत ज्ञान व योग्यता में दावेदारी का परिणाम।

    * क्षत्रियों के पुरुषार्थ की वास्तविकता समझनें के लिये चारणों या भाटों के गीतों को महत्व देनें की बजाय यदि सैकड़ों वर्षों की लगातार स्थापित रही राजनैतिक गुलामी को सबूत के तौर पर देखा जाये तो वास्तविकता और यथार्थ  को समझनें के लिये किसी कुतर्क की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

    * वैश्यों के व्यापाराना व प्रबंधन की योग्यता, वह भी तब जबकि शूद्र रूपी बेगार गुलाम मौजूद थे खून जलाकर उत्पादन करनें के लिये, को समझनें के लिये किसी छोटे से भी शोध की जरूरत नहीं है।

    बात ज्ञान के ऊपर दावेदारी की हो, पौरुष के ऊपर दावेदारी की हो या व्यापाराना-प्रबंधन की दावेदारी की हो …. भारतीय समाज के जातिवाद नें लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण-हत्या हर साल लगातार हजारों वर्षों तक की है और पूरी बेशर्मी और सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ की है।

    • सोचिये कि यदि शूद्रों को अपनी प्रतिभा को दिखानें का अवसर मिला होता तो बहुतेरे दुनिया के नामचीन वैज्ञानिक भारतीय समाज नें दिये होते।
    • सोचिये कि यदि जातियां न होतीं तो हो सकता है कि किसी ब्राम्हण जाति में पैदा होने वाले बच्चे की चमड़े के काम के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो संभव है कि उसनें पता नहीं कितनीं चीजों का आविष्कार किया होता।
    • सोचिये कि यदि क्षत्रिय जाति में पैदा होनें वाले बच्चे की लुहार-गिरी के प्रति अभिरुचि का आदर होता तो लौह-यंत्रों की पता नहीं कितनीं चीजों का आविष्कार किया होता।
    • ऐसे ही सैकड़ों-हजारों बातें सोचीं जा सकतीं हैं और बहुत ही सहजता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जातिवाद नें कैसे प्रति वर्ष लाखों-करोड़ों प्रतिभाओं की भ्रूण हत्या की वह भी लगातार हजारों वर्षों तक वह भी पूरी बेशर्मी व घिनौनी सामाजिक/शारीरिक हिंसा के साथ।

    भारत में जातिवाद के कारण योग्यता व प्रतिभा को कभी सहेजा ही नहीं गया, बहुत ही सीमित दायरे में तुलनात्मक रूप से जो जातियों की सीमितता में बेहतर निकल गया उसको हीरो के रूप में प्रायोजित कर दिया गया और यही घटिया तरीका आजतक लागू है।

    भारतीय संविधान में यदि आरक्षण की व्यवस्था न दी गयी होती तो अभी तक देश की अधिसंख्य जनता अछूत मानी जाती होती, अपनें गलें में थूंकदान और कमर में झाड़ू लटकाये घूम रही होती ताकि उसके पदचिंहों से और थूक से किसी ब्राम्हण का जन्मजात दैवीय रूप से प्राप्त ज्ञान भष्म न हो जाये।

    सवर्णों नें आजतक कभी शूद्रों को अपनें समकक्ष मनुष्यों के रूप में स्वीकारा ही नहीं, कभी भी समाज को जातिवाद से ऊपर उठकर देखनें की चेष्टा भी नहीं किये। जातिवाद का विरोध केवल सरकारी नौकरियों में शूद्रों के हिस्से को खतम करनें के लिये और राजनैतिक सत्ता में उनकी बढ़ती भागीदारी से डर कर किया जाता है। 

    भारत में योग्यता का मापदंड कौन किस स्तर की सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है, जैसे वाहियात और बेफिजूल कसौटी के आधार पर किया जाता है।

    जो लोग इस दावे या भ्रम में जीते हैं कि भारत में सामाजिक रूप से “जातिवाद” खतम हो रहा है, तो वे लोग खुद के ही बनाये हुये झूठों में जीते हैं और “जातिवाद” जैसी सामाजिक विभीषिका को अपनें स्व-केंद्रित स्वार्थों से परे नहीं देखना चाहते हैं।

    ज्यों ज्यों शूद्र जातियां प्रशासनिक व राजनैतिक ताकत प्राप्त करतीं जा रहीं हैं, त्यों त्यों सवर्णों को समाज से “जातिवाद” खतम होते दिख रहा है, इसलिये “आरक्षण” व “जातिवादी राजनीति” का विरोध किया जाता है।

    दूर से देखनें में भले ही सुंदर लगे कि यह विरोध “जातिवाद” के विरोध में है। बहुत सुंदर तर्क भी दिये जाते हैं, किंतु यथार्थ में तो यह विरोध स्व-केंद्रित स्वार्थों का ही है।

    वास्तव में बिना सामाजिक इमानदारी के “जातिवाद” का पत्ता भी नहीं हिलनें वाला। सवर्ण जातियों की ओर से जब भी जातिवाद के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- आरक्षण और जातिवादी राजनीति।

    यदि सवर्ण सच में ही सामाजिक इमानदार होता और जातिवाद को खतम करनें के लिये थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करता तो जातिवाद कब का खतम हो गया होता।

    सवर्णों को कुछ नहीं करना था केवल अपनें अंदर से जातिवाद की भावना खतम करनीं थी, केवल इतना ही करना था और कुछ नहीं करना था। जातिवाद की भावना शब्दों से तो खतम होती नहीं, इसके लिये जीवन में जीवंत रूप में इस भावना को जीकर प्रमाणित करना पड़ता। 

    यह भावना प्रमाणित होती अंतर्वर्णीय विवाहों को प्रोत्साहित करनें से और सहजता के साथ सामाजिक मान्यता देनें से। आजादी के 65 वर्षों में अंतर्वर्णीय विवाहों का प्रतिशत धीरे धीरे बढ़कर 100% तक हो जाना चाहिये था, किंतु आज भी हम वहीं के वहीं खड़े हैं सामाजिक घृणा के स्तर पर, शायद घृणा के और भी बढ़े हुये स्तर पर क्योंकि अब यह घृणा दोनों तरफ से हो गयी है पहले केवल सवर्णों से शूद्रों की ओर थी और शूद्र पौराणिक कथाओं को सच मानकर खुद को ब्रम्हा जी के मैल की पैदाइश की नियति व पापों का दंड भोगना मानकर जी रहे थे।

    किंतु अंग्रेजों के आनें से काफी कुछ भ्रम टूटा और संवैधानिक आरक्षण पानें के बाद जब सवर्णों के द्वारा भोगे जा रहे हजारों वर्षों के सामाजिक आरक्षण की ही तरह संवैधानिक आरक्षण को पाकर खुद को कुछ कुछ आदमी समझना शुरु किया तो हजारों सालों के शोषण की प्रतिक्रिया बननीं शुरु हुयी।

    आजादी के बाद सवर्णों नें शूद्रों को रोकनें के हथकंडों की बजाय यदि जातिवाद जैसी घिनौनी कुरीति को खतम करनें के बारे में गंभिरता से सोचा होता और सवर्ण-शूद्र को मिश्रित कर दिया होता तो आज देश की हालात ही कुछ और होती। तब हमें न तो गांधी, नेहरू व बाबासाहेब को गरियानें की जरूरत होती, न हीं देश में भ्रष्टाचार होता और न ही लोकतंत्र खतरे में होता।

    किंतु शायद ब्राम्हणों का दैवीय ज्ञान, क्षत्रियों का पराक्रम, वैश्यों की प्रबंधन कुशलता व योग्यता इतनी छोटी सी बात समझनें की भी योग्यता व दृष्टि नहीं रख पायी और देश इतनें अधिक खतरनाक मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है।

    यदि अंतर्वर्णीय विवाहों के द्वारा सवर्णों और शूद्रों को मिश्रित कर दिया गया होता तो आज किसी भी प्रकार के आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होती और भारत की राजनीति व लोकतांत्रिक मूल्यों की दिशा भी नहीं भटकती।

    कुछ अपवादों को सामनें रखकर हम लोग पूरी निर्लज्जता के साथ जातिगत-व्यवस्था को उचित साबित करना शुरु कर देते हैं।  मैं कहता हूं कि कभी तो हम सच में समाज के प्रति इमानदार हो जायें, कभी तो अपनें अंदर के चोर को खतम करें, कुछ थोड़ा सा ही सही लेकिन देश, समाज व अगली पीढ़ियों के लिये दूरदर्शी कदम तो उठा लें।

    जातिवाद का सिर्फ और सिर्फ एक ही समाधान है और वह है कि प्रतिवर्ष होनें वालीं लाखों शादियों में से अधिकतर शादिया सवर्णों और शूद्रों को मिश्रित करतीं हुयीं हों।  समान आर्थिक/सामाजिक स्तर के सवर्णों और शूद्रों के विवाहों से इस तरह की रचानात्मक शुरुआत की जा सकती है। आरक्षण से शूद्रों का आर्थिक व सामाजिक स्तर तो बढ़ा ही है, सो ऐसी सामाजिक शुरुआत कुछ मुश्किल नहीं।

    जातिवाद खतम करनें के लिये सिर्फ सवर्णों को इच्छाशक्ति का परिचय देना है और अपनें अंदर के घृणा भाव व कथित जातिवादी श्रेष्ठता के छुपे हुये अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालना है …. इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है…. और इसके अलावे कोई समाधान भी नहीं है।  

    जातिवाद का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ इमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है।  यह समाधान ही नये समाज, नये देश व नये सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो कि आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर ही होगें।  

    (नोट- इस सार्थक व मानवीय सोच वाले लेख को कृपया घृणा, अहंकार, पूर्वाग्रह और स्वार्थ से दूषित न किया जाये ऐसा विनम्र निवेदन है, सादर प्रणाम।)

    ——
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

    Vivek U Glendenning "Nomad"

  • “झाड़ुई चिराग” टाइप टोटकों से ही देश/समाज में असल बदलाव होते हैं

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग  "सामाजिक यायावर"  * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर  * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर” 

    दिल्ली की बिजली समस्या का जमीनी और स्थायी समाधान : कुछ रामबाण टाइप्स नुस्खे ::

    • धरनें में बैठ जाइये।
    • पूरे देश में अपनें फालोवरों को मोमबत्ती सुलगानें के लिये आवाहन कीजिये
    • अपनें फेसबुकिया पोस्टरबाजों की रातदिन की ड्यूटी भारत सरकार को गरियानें में लगा दीजिये।
    • अपनें प्रवक्ताओं अौर मीडिया-एक्सपर्ट्स को रातदिन मीडिया की बहसों में समय, संसाधन और ऊर्जा का सदुपयोग करनें के लिये कहिये, ताकि बिजली की समस्या का हल मीडिया बहसों रूपी “झाड़ुई चिराग” को घिसकर तुरत फुरत निकाला जा सके।
    • अपनें पोस्टरबाजों को रातदिन यह साबित करनें में लगा दीजिये कि यदि दिल्ली पुलिस राज्य सरकार के अंडर में होती तो बिजली जैसी समस्यायें न होंतीं।
    • मीडिया में बयानबाजी बढ़ा दीजिये
    • रेडियो में हर मिनट यह गाना बजावाईये ” लोकपाल होता तो बिजली का उत्पादन होता और सबको फोकट में बिजली मिलता होता” ।
    • दो चार बड़े उद्योगपतियों को अपनी पार्टी में हंगामें के साथ ज्वाइन कराईये तुरत।
    • एक सबसे जरूरी बात, दूसरों को गरियाना न भूलियेगा, यह नुस्खा तो आधारभूत नुस्खा है, इस नुस्खे के बिना तो सब नुस्खे फेल वह भी फौरन से भी पेश्तर।

    पिज्जा/बर्गर किसम की फंडामेंटल मूल्यों वाली क्रांतिकारी और सामाजिक बदलाव की गहरी समझ रखनें वाले महापुरुष लोग अपनी गूढ़ समझ व इमानदार टाइप्स सामाजिक दूरदर्शिता से और भी शानदार व खालिस नुस्खे इसमें जोड़कर अपनीं पोस्टरबाजी लगातार कायम रख सकते हैं।

    इन्हीं टोटकों से देश में बदलाव होते हैं। जै हो।

     

  • दिल्ली, बिजली और बिजली का बिल

    सामाजिक यायावर

    जो बिजली भारत में लोग घरों में पाते हैं वह मोटा-मोटी तीन आधारभूत चरणों व क्रम से घर में पहुंचती है-

    1. बिजली उत्पादन (प्रोडक्शन)
    2. बिजली प्रसारण (ट्रांसमिशन)
    3. बिजली वितरण (ड्रिस्ट्रीब्यूशन)

    दिल्ली शहर-राज्य भारत का एकमात्र राज्य है जो कि बिजली की खपत तो बेइंतहा करता है, लेकिन उत्पादन नहीं करता है।

    दिल्ली के लोगों को पता ही नहीं कि बिजली पूरे देश से जबरन घसीट कर एक तरह से लूटकर दिल्ली वासियों तक पहुंचायी जाती है, इसलिये दिल्ली की बिजली की दरें बिजली वितरण कंपनीज को सब्सिडी दिये बिना, घटायी नहीं जा सकतीं हैं।

    अरविंद केजरीवाल जी की दिल्ली सरकार जब भी बिजली वाले वादों अौर दावों की बात आती है तो वितरण कंपनीज के बारे में मीडिया में बयान देना शुरु कर देते हैं, जो कि किसी भी वास्तविक समाधान तक नहीं ही पहुंचना है।

    अरविंद जी यदि वास्तव में एक प्रतिशत भी दिल्ली की बिजली के लिये गंभीर हैं तो उन्हें बिजली-उत्पादन अौर बिजली-प्रसारण जैसे प्राथमिक मुद्दों के बारे में सोचना चाहिये।  इन मुद्दों को समाधानित करनें के बाद बिजली-वितरण की खामियां दूर करनें की बात आती है। जब तक बिजली-उत्पादन व बिजली-प्रसारण आदि मुद्दों की बात नहीं होती है तब तक बिजली-वितरण कंपनीज को धमकानें आदि को राजनैतिक व वोट-बैंक की चोचलीबाजी ही कहना अधिक उचित है, क्योंकि इससे समाधान की अोर कोई भी रास्ता नहीं जाता है।

    दिल्ली के लोगों नें मौका दिया है, कुछ तो ठोस कीजिये …. आपको इतना विश्वास, ग्लैमर और अपना खुद का भविष्य सौंप दिया …. कुछ वास्तविक सामाजिक प्रतिबद्धता आप भी बिना मीडिया बयानबाजी के जीकर साबित कर दीजिये, ताकि आपके बाद भी लोग किसी पर विश्वास करनें की हिम्मत बनायें रखें।

  • गांधी का वध तो हर क्षण ही किया जा रहा है

    सामाजिक यायावर

    गांधी जी को मैं भारत के अंदर अपनी सामाजिक क्रियात्मकता का गुरु मानता हूं। जहां तक भी मेरी दृष्टि जाती है मुझे पूरी शताब्दी में गांधी के इतना भारत को समझनें, जीनें वा प्रेम करनें वाला मनुष्य नहीं दिखता है।

    गांधी को गलियानें वाले लोगों का अधिकतर प्रतिशत उन लोगों का ही है जिनकी पहली प्राथमिकता मनुष्य और मनुष्यों का समाज नहीं है। और इनमें से अपवादों को छोड़कर लगभग सभी लोग घोर स्वार्थी, लिप्सायुक्त, अहंकारी, द्वेष व राजनैतिक सत्ता की खुली/छुपी विकृत महात्वाकांक्षाओं आदि से भरे पूरे लोग ही हैं।

    जिनकी सामाजिक क्रियाशीलता के प्रति न तो कोई समझ है, न ही कोई इमानदारी है और न ही कोई प्रतिबद्धता .. वे लोग गांधी को गाली देनें में ही अपनी सामाजिक इमानदारी/प्रतिबद्धता व क्रांतिकारिता खोजनें व साबित करनें में लगे रहते हैं।

    गांधी को इन लोगों नें घरना/अनशन/पाकिस्तान बटवारा/नेहरू को प्रधानमंत्री आदि जैसी मैनीपुलेटेड तथ्यों तक ही सीमित कर दिया है। क्योंकि इन्हीं मुद्दों में गाली बकनें का शानदार अवसर मिलता है।

    एक कुंठा दिखती है ऐसे लोगों में गांधी के प्रति। मानसिक विकृत सी दिखती है ऐसे लोगों में। कम से कम मुझे तो ऐसे लोगों में कोई भी सामाजिक इमानदारी व प्रतिबद्धता नहीं ही दिखती है।

    जैसा कि मैं समय समय पर कहता ही रहता हूं कि जिन्होंनें कभी खुद अपनें व अपनें परिवार के स्वार्थों से ऊपर उठकर अपनें पड़ोसी के लिये भी साफ दिल से विकास के बारे में करना तो दूर सोचा तक नहीं होगा … ऐसे लोग गांधी, अंबेडकर, नेताजी बोस और भगत सिंह आदि के संबंधों को परिभाषित करनें लगते हैं।

    बड़ा ताज्जुब होता है जब स्वार्थ के पुतलों को उन अति-कमर्ठ त्यागी लोगों का चारित्रिक विश्लेषण करते देखता हूं जिननें अपना जीवन बृहत्तर समाज के बृहत्तर भले के लिये होम कर दिया। बड़ी ही घिनौनी पृवत्ति लगती है इस तरह के चारित्रिक विश्लेषण।

    “हिंद स्वराज” जैसी चार पन्नें की संुदर पुस्तिका पढ़नें की समझ न रखनें वाले लोग मैनीपुलेटेड “स्वराज” का नारा लगाते देखे जा सकते हैं और “स्वराज” से जुड़ी किसी भी प्रारंभिक ठोस-समझ का ककहरा भी समझे बिना कुतर्कों से लंबी अंतहीन बहसें करते देखे जा सकते हैं, ऊपर से खुद को गौरवांवित महसूस करते हुये दूसरों से श्रेष्ठ होनें का भीषण अहंकार भी जीते हैं।

    बड़ी ही घिन आती है जब NGO ग्रांट लेकर आंदोलन चलानें वाले लोग गांधी का रास्ता अपनानें का ढोंग करते हुये नारे लगाते हैं। बड़ी ही घिन आती है जब सामाजिक काम को NGO फंडिंग एजेंसीज का फंडिग प्रोजेक्ट बना दिया जाता है और स्वावलंबन व स्वराज का दावा किया जाता है।

    बड़ी ही कोफ्त होती है तब जब “स्वावलंबन”, “स्थानीय समाज” और “सोशल ट्रस्टीशिप” का ककहरा भी न जाननें वाले लोग “स्वराज”, “परिवतर्न” व “आर्थिक विकास व स्वावलंबन” के नारे लगाते व दावे करते देखे जा सकते हैं; ताकि गांधी के देश में आम समाज के लोगों को राजनैतिक रूप से और भरमाया जा सके ….. सामाजिक मूल्यों की जो बची खुची झाड़न बची रह गयी है किसी कोनें में, उसको भी सड़ा दिया जाये ताकि संभावनाओं का सूक्ष्म-बीज भी बचा न रह जाये।

    गांधी को लोगों के दिलों से बेदखल करने की घिनौनी साजिशें इतनी आसान भी नहीं।
    गांधी को मीडिया या इंटरनेट नें नहीं बनाया “गांधी”। गांधी खुद बनें “गांधी” वह भी खुद को सामाजिक क्रियाशीलता से तपाकर बनाया।

    गांधी “सोशल ट्रस्टीशिप”, “स्वराज”, “स्वावलंबन”, “अहिंसा”, “प्रेम”, “मानवता”, “पर्यावरण”, “शिक्षा” व “सामाजिकता” आदि का दूसरा नाम है और इन सामाजिक मूल्यों के बिना बेहतर समाज व देश बनना नामुमकिन है।

  • काश हम धूर्त, अवसरवादी, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी और कामचोर आदि न होते तो कम से कम आजादी, आजादी के लिये संघर्ष करनें वाले पूर्वजों और गणतंत्र का निरादर और मजाक न उड़ाते होते

    सामाजिक यायावर

    भारत नें दो प्रकार की गुलामियां झेलीं हैं वह भी लगातार।

    पहली हजारों सालों की निरंतर “सामाजिक गुलामी” जो कि जातिवाद जैसी घिनौनी सामाजिक हिंसा, धूर्तता और षणयंत्र आदि से कूट कूट कर भरी हुयी थी।

    दूसरी सैकड़ों सालों की निरंतर “राजनैतिक गुलामी”।

    जिस समय देश में सड़कें नहीं थीं, संपर्क मार्ग तक नहीं थे, संचार माध्यम नहीं थे, देश की 85% से अधिक जनसंख्या को शिक्षा के अधिकार नहीं थे, बीमारियों के इलाज नहीं थे, लोगों को मौलिक अधिकार तक नहीं थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक नहीं थी …. और भी बहुत कुछ जो कि बहुत ही गंभीर व मौलिक था …. वह नहीं प्राप्त था समाज के अधिसंख्य लोगों को।

    उस समय देश के लोगों नें “बाल-विवाह” और “जातिवाद” जैसी कुरीतियों के बारे में सोचा और लड़नें का साहस किया।

    हजारों सालों की “सामाजिक गुलामी” और सैकड़ों सालों की “राजनैतिक गुलामी” के विरुद्ध लोगों नें बिना संसाधन के संघर्ष किया और विजय पायी।

    पूर्वजों नें “सामाजिक गुलामी” व “राजनैतिक गुलामी” को लगातार झेलते हुये भी “आजादी” और “गणतंत्र” के बारे में सोचा, कल्पना की। केवल सोचा या कल्पना ही नहीं किया बल्कि यथार्थ में उतार कर अपनीं आनें वाली पीढ़ियों के लिये सहेज दिया।

    बिना किसी प्रकार की नागरिक-सुविधा के, बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के, बिना संचार-माध्यमों के, बिना किसी शिक्षा आदि के …. हमारे पूर्वजों नें देश को न केवल “राजनैतिक आजादी” दिलायी बल्कि “जातिवाद” के खिलाफ भी संघर्ष किया और सैकड़ों सालों की “राजनैतिक गुलामी” के बावजूद, अशिक्षा के बावजूद, घोर नारकीय जीवन जीवन जीते रहनें के बावजूद देश को “गणतंत्र” दिया।

    लाखों, करोड़ों लोगों के निरंतर संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम है हमारे देश की आजादी व गणतंत्र।

    आइये अब अपना भी मूल्यांकन कर लें कि हमनें क्या किया आजादी के बाद-

    हमनें केवल और केवल अपनी लिप्सा, अपनें स्वार्थ, अपनें भोग आदि के लिये देश को मजाक बनाकर रख दिया। हमनें कभी देश के बारे में सोचा ही नहीं, हमनें केवल अपनी महात्वाकांक्षाओं और लिप्साओं के बारे में सोचा।

    तंत्र में खराबी हम पैदा करते हैं और गालियां देते हैं पूर्वजों को, कि उन्होनें यह न किया होता तो ऐसा होता या वैसा होता।

    हमनें पूर्वजों को गालियां देनें के लिये संगठन बनाये और जो जितना गरिया ले उसको उतना ही बड़ा बुद्धिजीवी मानते हैं और प्रशंसा करते हैं। गांधी को गरियानें के संगठन, बाबा साहेब को गरियानें के संगठन, बुद्ध को गरियानें के संगठन ….. आदि आदि।

    हम अपना खुद का स्तर अपनें खुद के स्वार्थ, अपनें परिवार व रिश्तेदारों के स्वार्थ से ऊपर कभी उठा नहीं पाये, लेकिन गांधी, बाबासाहेब, बुद्ध आदि को तबियत से हर बात में गरियानें में ही अपनी बौद्धिकता, अपनी क्रांतिकारिता, अपनी सामाजिक समझ, अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और अपना सामाजिक उत्तरदायित्व साबित करते हैं।

    आजादी के बाद की हमारी पीढ़ियां इतना अधिक स्वार्थ में लिप्त है, इतना अधिक भोगी हो गई है कि आजादी को और पूर्वजों को केवल इसलिये गरियाती है कि उसको और अधिक भोगनें को क्यों नहीं मिल रहा है। कभी किसी पूर्वज को गरियाना, कभी किसी को।

    हम ऐसे ऐसे लोगों को बिना जांचे सत्ता सौंप देते हैं जिसनें भारत को समझा तक नहीं है, जिसनें कभी कोई ठोस सामाजिक काम नहीं किया। हमनें यह समझनें की जहमत तक नहीं उठाते कि जिसको हम अपना जन-प्रतिनिधि बना रहे हैं या सत्ता सौंप रहे हैं उनकी कोई वास्तविक सामाजिक समझ है भी या नहीं।

    हम नशे में अपनें जन प्रतिनिधि चुनते हैं और अपनें ऊपर शासन करनें का अधिकार देते हैं। और फिर गालिया देते हैं गणतंत्र को और उन करोड़ों पूर्वजों को जिन्होनें हमारे लिये त्याग किया जीवन का बलिदान दिया।

    हमारे पास इतनी तमीज नहीं कि हम अपना जन-प्रतिनिधि चुन सकें और गालियां देते हैं उन करोड़ों पूर्वजों को जिन्होनें घोर नारकीय जीवन जीते हुये भी आजादी के बारे में सोचा, गणतंत्र के बारे में सोचा और अपनीं कल्पना को यथार्थ में साकार कर दिया।

    यह भारतीय गणतंत्र की ही उदारता व महानता है कि यहां लोकतंत्र को, गणतंत्र को गरियानें वाले लोग जिन्होनें वास्तविकता में समाज के लिये कभी कुछ ठोस किया भी नहीं और केवल संचार माध्यमों और लोकतंत्रिक मूल्यों को गरियानें के कारण खुद को रातोंरात क्रांतोकारी साबित करते हैं उनको लोग अपना जन-प्रतिनिधि चुनते हैं और राजनैतिक सत्ता सौपते हैं।

    ऐसा सिर्फ और सिर्फ इसलिये हो पाता है क्योंकि हमनें कभी अपनें भोगनें से ऊपर उठकर देश के बारे में नहीं सोचा, हम सब कुछ पका पकाया पाना चाहते हैं। इसलिये हम कुछ कोई पुरुषार्थ किये बिना ही अवसरवादिता से और अधिक भोगना चाहते हैं और देश व समाज की कीमत पर भोगना चाहते हैं और लगातार भोगना चाहते हैं।

    हम देश व समाज की कीमत पर, अपनीं आनें वाली पीढ़ियों की कीमत पर भोगना चाहते हैं और पूरी निर्लज्जता और निरंकुशता के साथ देश व समाज का उपहास उड़ाते हुये भोगना चाहते हैं।

    “ मैं भी अपनी किशोरावस्था में आजादी व गणतंत्र का मजाक बनाता था और लड्डू व जलेबी व मिठाई आदि का ही दिन मानता था। किंतु समय के साथ साथ मैंनें जितना भारत, भारत के गांवों, भारत के लोगों और लोकतंत्र को समझा, मैनें उतना ही भारत की राजनैतिक आजादी का आदर करना सीखा। उतना ही उन लाखों-करोड़ों पूर्वजों का आदर करना सीखा जिन्होनें अपना जीवन बलिदान किया वह भी आनें वाली पीढ़ियों के लिये ताकि वे कम से कम अपनें ही देश में दूसरों के जूतों के तले तो न कुचले जायें और कुचलनें वाला यदि कोई हो तो अपना ही हो।

    मैंने यह भी सोचना शुरु किया कि मैं देश व समाज के लिये क्या कर रहा हूं जबकि कम से कम मेरे पास राजनैतिक स्वतंत्रता तो है, कुछ नहीं तो पब्लिकली गालियां बकनें का अधिकार तो रखता ही हूं। पूर्वजों के पास तो यह भी नहीं था। तो जब वे कुछ न होते हुये भी इतना सोच और कर गये तो मैं इतना सब कुछ भोगते हुये क्या कुछ बहुत थोड़ा सा भी देश व समाज के लिये नहीं कर सकता हूं।

    क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता हूं कि मैं पूर्वजों को न गरियायूं, मैं आजादी का मजाक न बनाऊं, मैं गणतंत्र का उपहास न करूं। क्या सच में इतना भोगनें के बावजूद मैं इतना भी आभारी नहीं हो सकता हूं देश के पूर्वजों के लिये।

    क्या सच में ही मैं इतना अधिक धूर्त, मक्कार, स्वार्थी, परजीवी, लंपट, भोगवादी, कामचोर और अवसारवादी आदि हूं …… क्या सच में ही मैं ऐसा ही हूं … “

    —-
    विवेक उ० ग्लेंडेनिंग “नोमेड”

  • सलीके का मतलब

    सामाजिक यायावर

    सलीके का मतलब:

    • आप खाते कैसे हैं,
    • पाखाना बैठकर करते हैं या कुर्सी नुमा ढांचे में बैठकर करते हैं,
    • पानी कैसे पीते हैं मसलन गिलास में कुछ पानी छोड़ देते हैं या नहीं छोड़ देते हैं,
    • चाय कैसे पीते हैं मसलन कप में आवाज/बेआवाज चुस्की या प्याली में सुरसुराकर पीते हैं,
    • टाई कैसे बांधते हैं,
    • मेहमान के आनें पर अंदर से गालियां देते हुये भी चेहरे में बड़ी और खूबसूरत मुस्कुराहट कैसे लाते हैं,
    • मन के अंदर दूसरों को अपनें से दोयम मानते हुये भी विनम्रता का ढोंग कैसे करते हैं,
    • ….. आदि आदि नहीं होता है।

    सलीके का मतलब:
    सहजता से और अंदर की ईमानदारी से दूसरे मनुष्य के साथ व्यवहार में जीना होता है।
    एक बहुत ही अमीर, बहुत ऊंची डिग्रीधारी भी बेसलीकेदार और एक गांव का अनपढ़, गरीब भी बहुत अधिक सलीकेदार हो सकता है।