समलैंगिकता – प्राकृतिक या अप्राकृतिक

सामाजिक यायावर


मैं जब प्राकृतिक शब्द का प्रयोग करता हूं तो इसका अर्थ प्रकृति की व्यवस्था के सहज नियमों को जानना, समझना व अनुपालन करना है, न कि केवल प्रकृति में होना मात्र। यदि प्राकृतिक होने का अर्थ प्रकृति में होना मात्र है तो फिर पर्यावरण असंतुलन, बलात्कार, शोषण आदि का कोई तात्पर्य नहीं रह जाता है। कुछ भी सब प्राकृतिक है।

समलैंगिकता को मैं अप्राकृतिक मानता हूं। अप्राकृतिक क्यों मानता हूं क्योंकि प्रकृति में जिन भी स्तनपायी जीव जंतुओं के पास योनि व गुदा अलग-अलग हैं, उनमें गुदा-मैथुन नहीं होता है। दूसरी बात सेक्स प्राकृतिक रूप से संतानोत्पत्ति के लिए है। जीव जंतुओं में रात दिन जब मन हो जाए तब सेक्स नहीं होता है। जब संतानोत्पत्ति के लिए ऋतु आएगी तभी पशुओं में सेक्स होता है। जीवन की गति चलती रहे इसके लिए सेक्स एक व्यवस्था है प्रकृति में।

समलैंगिकता को अप्राकृतिक मानने के बावजूद, मेरा ऐसा मानना है कि जो लोग समलैंगिकता को जीना चाहते हैं उनको ऐसा जीने का पूरा अधिकार है। उनको समलैंगिकता का प्रचार प्रसार करने, समलैंगिकता को प्रतिष्ठित करने, समलैंगिकता को महानता साबित करने, समलैंगिकता को धर्म के रूप में भी प्रतिष्ठित करने आदि-आदि का संपूर्ण अधिकार है।

समलैंगिकता के विरोध का मतलब सिर्फ यह है कि स्त्री-स्त्री व पुरुष-पुरुष के साथ सेक्स न करे, जीवन भर सेक्स करते रहने के साथी के रूप में न चुने। दो पुरुष या दो स्त्री साथ में रहें लेकिन आपस में सेक्स न करें तो मामला समलैंगिकता का नहीं होता। मुख्य मामला सेक्स करने के तरीके का है और कुछ नहीं।

यदि बात सेक्स करने के तरीके पर की जाएगी तो हममें से बहुत ऐसे लोग होगें जो अपने दाम्पत्य जीवन में अपनी पत्नी के साथ या अपनी प्रेमिका के साथ या वेश्या के साथ या बलात्कार करते समय या पशु के साथ गुदा मैथुन करते होगें। बहुत ऐसी स्त्रियां होगीं जो अपने पति से या प्रेमी से या पशु से या छोटे बच्चों से मुख-मैथुन करती होगीं। यह भी तो समलैंगिकता ही हुई।

मैं समलैंगिकता को अप्राकृतिक इसलिए मानता हूं क्योंकि मैं गुदा-मैथुन, मुख-मैथुन, हस्त-मैथुन आदि को अप्राकृतिक मानता हूं। लेकिन मैं समलैंगिकता का विरोध नहीं करता क्योंकि मैं यह भी जानता हूं कि हम सभी लोग गर्भ में बीज बनने से लेकर मृत्यु तक पूरा का पूरा जीवन अप्राकृतिक रूप से जीते हैं।

राष्ट्र की सीमाएं, संविधान, सेना, कानून, परंपराएं, कर्मकांड, धर्म, संस्कार, ईश्वर की कल्पनाएं, मुद्रा, व्यापार, बाजार, संपत्ति-अधिकार आदि-आदि सभी कुछ अप्राकृतिक है। समलैंगिकता की तुलना में बहुत अधिक खतरनाक कोटि के धूर्तता, नीचता व पाखंड से भरे हुए अप्राकृतिक हैं। जब इन जैसी अप्राकृतिक बातों को हमनें सर-आखों पर प्रतिष्ठित कर रखा है तो समलैंगिकता जैसी व्यक्तिगत-स्वाद पर आधारित इच्छा जो किसी का शोषण नहीं करती, हिंसा नहीं करती, पर सवाल उठाने व विरोध करने का कोई औचित्य नहीं।

हमने धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कार जैसी निहायत ही अप्राकृतिक चीजों में स्वयं के संपूर्ण अस्तित्व को ही विलीन कर रखा है। हमने अपने स्वाद पर आधारित तौर-तरीके जैसे भोजन, भोजन करने के तौर-तरीकों, कपड़े पहनने के तौर-तरीकों, बोलचाल के तौर-तरीकों, अभिवादन करने के तौर-तरीकों, सम्मान प्रेम आदि को व्यक्त करने के तौर-तरीकों, संपत्ति कब्जाने व उसके बटवारे के तौर-तरीकों आदि-आदि को संस्कृति व सभ्यता आदि के रूप में प्रतिष्ठित कर रखा है।

चलते – चलते :

हम पूरा जीवन एक से बढ़कर एक अप्राकृतिक, धूर्तता, हिंसा, बेहूदगी व झूठ से भरे झोल-झपाटों को प्रतिष्ठा के साथ स्वयं को महान व अद्वितीय मानते हुए स्वीकार कर रखते हैं। लेकिन हम इतनी मूलभूत ईमानदारी क्यों नहीं रख पाते कि हम समलैंगिकता जैसी बातों को भी धर्म या संस्कृति या सभ्यता या स्वाद के एक तौर-तरीके के रूप में स्वीकार कर लें, या फिर हम किसी भी झोल-झपाटे को न स्वीकार करें।

 

जब तक हम कंडीशनिंग से स्वयं को मुक्त करने का ईमानदार प्रयास नहीं शुरू करेंगें हम दोहरे चरित्र/कसौटियों/मापदंडों आदि को ईश्वरीय, महान व अद्वितीय आदि मानने की मूर्खता व भ्रम में जीते रहेंगे।

 

 

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