Author: संपादक मंडल

  • भारत बनाम पाकिस्तान संभावित युद्ध : खरी खरी

    सामाजिक यायावर


    दरअसल हम भारतीय जो बात बात पर पाकिस्तान में भूसा भर देंगें। पाकिस्तान को मजा चखा देगें, धूल चटा देंगें आदि भावनाओं से ओतप्रोत पाकिस्तान के साथ युद्धोन्माद में रहते हैं। उसके पीछे का बहुत बड़ा कारण हमारे दिमाग में बैठी यह सोच है कि पाकिस्तान हमारे सामने भुनगा है और हम उसे चुटकियों में मसल देंगें।

    पाकिस्तानी अपना गाल बजाते हैं, भारतीय अपना गाल बजाते हैं। दोनों देशों के लोग अपने अपने देश की तुलना अपने दूसरे देश भारत या पाकिस्तान से करते हैं। दोनों देशों के लोगों की राष्ट्रप्रेम से संबंधित दुनिया एक दूसरे को गालियां देने, नफरत करने व हिंसक भावनाओं की अभिव्यक्ति जैसे क्रिया प्रतिक्रिया तक अधिकतर सीमित रहती है। दोनों देशों के लोग आपसी नफरत में इस कदर धंसे हुए हैं कि जीवन का असल मायने समझने व जीने की ओर कोशिश करना तो दूर की बात यदि गाहे-बगाहे इन देशों के कुछ नागरिक कोशिश करते भी हैं तो उन्हें देशद्रोही करार दिया जाता है।

    दोनों ही देश कुंठित हैं, समस्याओं से जूझ रहे हैं। दोनो ही देशों के अधिकतर लोग सामंती सोच के हैं, दिखावटी व दोहरेपन की जिंदगी जीने में लिप्त रहते हैं।

    इसी सोच के मेरे एक मित्र ने कहा कि भारत पाकिस्तान में भूसा भर देगा। मैंने कहा कि हवाई लफ्फाजी करना हो तो चर्चा यहीं खतम करें। यदि कुछ हकीकत व ठोस बात करनी हो तो कुछ बात हो सकती है।

    मैंने कहा कि बांग्लादेश जब अलग हुआ था यदि उस युद्ध की बात यदि छोड़ दी जाए क्योंकि उस युद्ध में पाकिस्तान दोतरफा मार झेल रहा था और पाकिस्तान के लिए भौगोलिक परिस्थितियां कुछ ऐसी विकट थीं कि उसको युद्ध हारना ही था। बाकी जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें भारत पाकिस्तान थोड़ा बहुत कम अधिक लगभग बराबरी पर ही छूटे हैं। यदि भारत ने पाकिस्तानी इलाके कब्जाए हैं तो पाकिस्तान ने भारतीय इलाके कब्जाए हैं। दोनों तरफ के सैनिक हताहत हुए हैं जबकि भारत के पास पाकिस्तान से लगभग दुगुनी सेना है। कारगिल में जो युद्ध हुआ उसका लब्बोलुआब यह था कि भारत ने पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा कब्जाई गईं भारतीय चौकियां आदि छुड़वा लिए थे। कारगिल का युद्ध एक सीमित युद्ध था जो केवल कब्जाई गई चौकियों के इलाकों तक ही लगभग सीमित रहा।

    भारत व पाकिस्तान दोनों की ही सैन्य क्षमता विदेशों पर आश्रित है। हथियारों के आविष्कार व उनकी तकनीक का विकास भारत या पाकिस्तान नहीं करते हैं। जो हथियार मिल गए उन्हीं में कुछ छोटे-मोटे यूं कहें कि सिर्फ स्वदेशी घोषित करने के लिए दिखावटी बदलाव करके स्वयं को स्वयंभू तुर्रमखां घोषित कर लिया जाता है।

    सैनिकों की संख्या को यदि छोड़ दिया जाए तो दोनों देशों की सैन्य क्षमता में बहुत अधिक का अंतर नहीं। इतना अंतर तो कदापि नहीं है कि भारत या पाकिस्तान में से कोई भी देश युद्ध के माध्यम से दूसरे में भूसा भर दे, नेस्तनाबूत कर दे। युद्ध यदि सैनिकों की संख्या से जीते जाते होते तो भारत न अरबों का गुलाम बनता न ही डचों का गुलाम बनता न ही फ्रासीसियों का गुलाम बनता न ही पुर्तगालियों का गुलाम बनता और न ही अंग्रेजों का ही गुलाम बनता। मुठ्ठी भर आए लोगों ने भारत को सैकड़ों सालों तक गुलाम बनाए रखा। भारतीय समाज में कहीं कुछ तो ऐसी कमजोरी जरूर ही होगी जो भारत को मुठ्ठी भर लोग न केवल गुलाम बनाते रहे वरन् गुलाम बनाए रखने में सफल भी रहे।

    संभवतः उन्हीं कमजोरियों के चलते अतिसंवेदनशील व अतिसुरक्षित सेना के मुख्यालयों वाले इलाकों में भी बाहरी लोग आराम से हथियार सहित घुस आते हैं और अत्यधिक प्रशिक्षित व आधुनिक हथियार संपन्न सैनिकों की हत्याएं कर जाते हैं। लेकिन हमें ऐसा क्योंकर हुआ, इन सब बातों को देखने, समझने व सुधारने जैसे मुद्दों में धेला भर भी रुचि नहीं। हमें इन सबसे कोई मतलब नहीं।
    हमें तो पाकिस्तान को गलियाने रूपी सड़कछाप राष्ट्रभक्ति के नशे को जीना है।

    इसलिए हम अपनी सैन्य व सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमजोरियों को देखने व सुधारने की बजाय, समय-समय पर अनेक बार हो चुकी सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सामान्य व कामचलाऊ सैन्य कार्यवाही को मजा चखा दिया, बदला ले लिया, घर में घुस कर मारा, इतिहास में पहली बार हुआ जैसे वाहियात, बेहूदे व उटपटांग तरीके से महिमामंडित करते हुए अपने ही देश की छीछालेदर में जुट जाते हैं।

    भारत व पाकिस्तान दोनों मिसाइल बनाते हैं, दोनो देशों के अपने अपने मिसाइल मैन हैं जिनको महान वैज्ञानिक का स्वयंभू दर्जा दिया जाता है। दोनो देशों के अपने अपने महान परमाणु वैज्ञानिक हैं। दोनो देशों के लोगों ने विदेशों में पलायन करके अपने लिए मुकाम बनाए हैं। इन प्रायोजित व तथाकथित राष्ट्रगौरवों से इतर बहुत कड़वा व नंगा यथार्थ यह भी है कि भारत व पाकिस्तान दोनों देश भले ही कितनी शिद्दत से झूठा दावा करें कि उन्होने मिसाइल, परमाणु बम व राकेट आदि खुद ही विकसित किए हैं, लेकिन दोनो देश तकनीक की चोरी करते हैं व विदेशी तकनीक पर निर्भर हैं।

    हममें इतनी भी सहज बुद्धि नहीं कि हम इस यथार्थ को स्वीकार कर पाएं कि भारत व पाकिस्तान दोनो ही देश सैन्य क्षमता पर आत्मनिर्भर नहीं। दोनों देश लंबे समय तक युद्ध नहीं झेल सकते हैं। कुछ दिनों के युद्धा के बाद ही दोनों देश चाहेंगें कि कोई तीसरा आकर बीच-बचाव करे और युद्ध रुक जाए, कोई समझौता हो जाए। अधिक समय तक युद्ध में दोनों ही देशों के पास हथियार नहीं रहेंगें क्योंकि दोनों ही देश विदेशों पर आश्रित हैं। समझौता होने के बाद दोनों देशों की सेनाएं अपने देशवासियों के सामने अपनी-अपनी पीठ ठोकेंगें, अपनी-अपनी विजय बताएंगें। ऐसा करके लोगों के अंदर आपसी नफरत को जिंदा रखेंगें। सत्ताओं के वजूद के लिए यह फरेब जरूरी भी है।

    दोनो ही देशों के अधिकतर लोगों की सोच व मानसिकता अवैज्ञानिक है तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का तिरस्कार करती है, उपेक्षित करती है। दोनो ही देश एक दूसरे के प्रति नफरत को राष्ट्रभक्ति की कसौटी मानते हैं। चूंकि दोनों देश बचकानी हरकते करते हैं। सैन्य व्यवस्थाओं पर आत्मनिर्भर नहीं हैं। इसलिए यदि किसी कारण वश समझौता न हो पाया तो यदि अपनी मूर्खतावश परमाणु अस्त्रों का दुरुपयोग कर दिया तो क्या होगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इतना तो तय है कि यदि इनमें से कोई भी एक देश परमाणु का प्रयोग करेगा तो दूसरा देश करेगा ही।

    भारत के विकृत मानसिकता के लोग तो बयान दे ही रहे हैं कि कुछ परमाणु बमों के प्रयोग से कुछ प्रतिशत लोगों का ही नुकसान होगा लेकिन शेष देश तो पाकिस्तान को नष्ट होते देख सकेगा। ऐसे मानसिक विकृत लोगों की दृष्टि में व्यक्ति, समाज, देश व जीवन के मायने क्या हैं यह समझना मानवीय संवेदनशीलता व मूल्यों के परे की बात है।

    दोनो ही देशों के तंत्र अपने नागरिकों के लिए असंवेदनशील, निष्ठुर, गैरजिम्मेदार व भ्रष्ट हैं। दोनो ही देशों में अधिकतर लोग शोषित हैं। दोनों ही देशों में हंगामा करने को लफ्फाजी करने को राजनीति माना जाता है। दोनो ही देशों के नेताओं, नौकरशाहों व व्यापारियों का चरित्र लगभग एक जैसा है। पता नहीं किस लफ्फाजी व फूहड़ता के आधार पर दोनों देशों के लोग एक दूसरे का नाम दुनिया के नक्शे से मिटाने की हवाई बात करके अपने अपने सैडिज्म को जीते हैं।

    पाकिस्तानियों से तो नहीं कह सकता लेकिन अपने देशवासियों से निवेदन जरूर करना चाहता हूं कि कोई देश व समाज लफ्फाजी व फूहड़ता व सैडिज्म से महान नहीं बनता, मजबूत नहीं बनता। देश मजबूत बनता है जब देश के लोग मजबूत होते हैं जब देश का समाज व तंत्र व ढांचा मजबूत बनता है। बनाइए अपने देश को मजबूत। जिस दिन आप अपने देश को वास्तव में बिना सैडिस्ट लफ्फाजी के मजबूत बना लेंगें पाकिस्तान जैसे सड़ियल देश की बात छोड़िए दुनिया का कोई देश अमेरिका तक भी आपसे ऊंची आवाज में बात तक करने की हिम्मत नहीं करेगा।

    दरअसल देश के निर्माण की प्रक्रिया गंभीरता व आंतरिक मजबूती से होती है। और यही गंभीरता व आंतरिक मजबूती वास्तव में असल देशप्रेम व राष्ट्रभक्ति होता है। लफ्फाजी, बकैती, ओछेपन व लुच्चई आदि से भरा सैडिज्म राष्ट्रभक्ति नहीं होती, बिलकुल भी नहीं होती।

     

    मैं अपने आपको देशभक्त मानता हूं और उन सभी को देशभक्त मानता हूं जो देश के लोगों के लिए अपना जीवन लगाते हैं, संघर्ष करते हैं, रचना करते हैं। भारत की आज जो स्थिति है उसमें हर गंभीर देशभक्त युद्ध का विरोध करेगा। मैं भी युद्ध का विरोध करता हूं क्योंकि मैं अपने देश को बनते हुए आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं।
    लफ्फाजों का तो काम ही है लफ्फाजी करना।

  • चाइनीज माल का बहिष्कार बनाम हमारी खोखली राष्ट्रभक्ति

    सामाजिक यायावर


    इधर कुछ दिनों में जब से चीन ने पानी बंद किया। जब से चीन भारत में 30 से 40 किलोभीटर अंदर आकर अपनी अस्थाई छावनी बना गया। तब से हम लोगों में चाइनीज माल का बहिष्कार करने की चुल्ल उठ रही है। ऐसा करने वालों में शातिर ओछे राष्ट्रभक्तों से लेकर भोलेभाले जेनुइन राष्ट्रभक्त तक शामिल हैं।

    दरअसल इन लोगों को लगता है कि चाइनीज माल मतलब सस्ते मोबाइल, सस्ते खिलौने, दीपावली की बिजली की लड़ियां, प्लास्टिक वाला चावल व दाल, सस्ते जूते, सस्ते कपड़े आदि है।

    इन लोगों को चाइना की ताकत का अंदाजा नहीं। चाइना सस्ते से लेकर बहुत बेहतर गुणवत्ता की चीजें बनाता है। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का महंगा ब्रांडेड सामान जैसे टीवी, फ्रिज, एसी, लैपटाप, आईफोन, महंगे मोबाइल्स, महंगे ब्रांडेड कपड़े आदि सबकुछ चीन में बनता है।

    हो सकता है कि कैनन कंपनी का कई लाख रुपए की कीमत का जो महंगा लेंस आपने अपने SLR कैमरे में लगा रखा हो वह चीन का बना हो। NIKON का तो अधिकतर सामान चीन में ही बना होगा।

    हो सकता है सैमसंग, नोकिया, आईफोन, एलजी, एचटीसी आदि महंगी व ब्रांडेड कंपनियों का जो मोबाइल आप चौड़े से इस्तेमाल कर रहे हों वह चीन का बना हो।

    हो सकता है कि आपके घर का महंगा टीवी, फ्रिज, एसी, गीजर, बाथटब, ओवन, माइक्रोवेव, कालीन, टाइल्स आदि जिसे आप अमेरिका या अन्य किसी देश का बना मानकर अपने बड़े होने के अहंकार में जीते हों, वह सामान बेसिकली चीन का बना हो सकता है।

    जिन बहुत महंगी कारों व मोटरसाइकिलों में दूसरों को अपने जूते के नीचे का आदमी समझते हुए आप घूमते हों उस कार या मोटरसाइकिल के कई या बहुत या सारे कलपुर्जे चीन में बने हो सकते हैं।

    ये जो गांव गांव में सोलर लाइट लगी होती है, यह जो आपके घर में सोलर पैनल लगा है यह चीन का बना हो सकता है या इसके कई पुर्जे चीन के बने हो सकते हैं।

    चौकिएगा नहीं यदि राफेल विमान में लगे कई पुर्जे या लगभग सारे पुर्जे चीन के बने हों। एयरइंडिया के जिन विमानों में आप उड़ते हैं उनके कलपुर्जे चीन के बने हो सकते हैं।

    जिस बहुत महंगी फ्रेंच रेड वाइन को आप पीकर खुद को विश्वस्तरीय समझते होगें वह चाइनीज ओनरशिप की हो सकती है जबकि आपने उस बोतल को खुद फ्रांस से खरीदा हो।

    ये तो खैर कुछ भी नहीं। भारत में बहुत ऐसी भारतीय कंपनियां हैं जिनको हम स्वदेशी समझते हैं जिनके उत्पादों में मेड इन इंडिया लिखा रहता है जबकि उस उत्पाद में लगा सामान चीन में बना होता है, भारतीय कंपनियां चीन के सामान को जोड़ करके (एसेंबल) करके उत्पाद बनाकर मेड इन इंडिया छाप देती हैं।

    भारत की एक बहुत बड़ी मोबाइल कंपनी है जिसका अधिकतर सामान चीन का बना होता है लेकिन उसके सामानों पर मेड इन चाइना की बजाय कुछ और भी छपा हो सकता है।

    सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर कब तक हम सड़कछाप सोच व मानसिकता को खुद से लपेटे रहेंगें। सवाल यह खड़ा होता है कि हम कब इतने इमानदार व गंभीर होगें कि हम यह समझ पाएं कि बकैती से, छिछलेपन से, छिछोरेपन से, सतहीपन से किसी समाज व देश का विकास नहीं होता, मजबूती नहीं मिलती।

    हमारा देश भारत तब मजबूत होगा जब हम ठीक से देख पाने की दृष्टि विकसित करेंगें, जब हम अपनी कमजोरियों को स्वीकारना सीखेंगें। बकैती व लफ्फाजी करना बंद करेंगें।

    टटपुंजिया दिखावटी ईमानदारी, विद्वता, समझदारी व सामाजिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठ कर ठोस रूप में होने का प्रयास करेंगें।

    यथार्थ से मुंह मोड़कर फिजूल के फर्जी नारे देने से, बेहूदे तर्क देने से व कोरी हवाई भावुकता से यथार्थ नहीं बदलते हैं।

    सच्चा राष्ट्रभक्त वह है जो देश व समाज के निर्माण के लिए काम करे, संघर्ष करे, त्याग करे.
    न कि अपने ही लोगों को चोरी व झूठ से लूट कर या ढकेमुंदे करप्शन से अपने घर में सुविधाओं का सामान भरे, बाजार का उपभोक्ता बने, तिजोरी भरे और खुद को बड़ा आदमी मानने के बेहूदे अहंकार में जिए।

     

  • वेजीटेबल फ्राइड वियतनामी ब्राउन राइस – विटामिन B12 व K से युक्त पौष्टिक भोजन

    सामाजिक यायावर


     

    सामाजिक यायावर का पकाया
    सामाजिक यायावर का पकाया

    सामग्री

    • वियतनामी ब्राउन राइस
    • सेलेरी
    • असपारागस
    • बक चॉय
    • स्कैलियन
    • ब्रोकली
    • गोभी
    • बंद गोभी
    • बैंगनी गाजर
    • लाल गाजर
    • पार्सली
    • चाइव्स
    • अदरक
    • जीरा
    • हींग
    • मेथी
    • प्याज
    • लहसुन
    • लौंग
    • बे-लीफ
    • पुदीना
    • काला टमाटर
    • लाल टमाटर
    • नमक
    • काली मिर्च
    • सोडियम सोया सॉस
    • राइस वाइनगर
    • आलिव ऑयल

    विधि (बनाने में कुल समय = 60 मिनट + सब्जियां काटने में जितना समय आप लें) :

    वियतनामी ब्राउन राइस इसलिए अच्छा होता है क्योंकि यह पकने के बाद स्टिकी हो जाता है और बहुत स्वादिष्ट होता है। ब्राउन राइस को प्रेशर कुकर की बजाय बर्तन में पकाइए। ब्राउन राइस को बर्तन में पकाने में कुल लगभग 45 मिनट लगता है।

    जब तक चावल पक रहा है तब तक सब्जियों को काट लीजिए।

    अदरक, जीरा, हींग, मेथी, प्याज, लहसुन, लौंग, बे-लीफ, पुदीना, काला टमाटर, लाल टमाटर, नमक, काली मिर्च को बाकी सामग्री से अलग रखिए।

    तेज आंच में आलिव ऑयल में अदरक, जीरा, हींग, मेथी, प्याज, लहसुन, लौंग, बे-लीफ, पुदीना को फ्राइ कर लीजिए फिर एक टमाटर को दो या चार टुकड़ों में काट कर काला टमाटर व लाल टमाटर को डाल दीजिए फिर कुछ मिनट बाद नमक व काली मिर्च डाल दीजिए।

    आंच को तेज ही रखिए और काटी हुई सब्जियों में से पार्सली को छोड़कर बाकी सब कुछ डाल दीजिए। तेज आंच में ही पांच-दस मिनट तक कलारते रहिए।

    अब पकाए गए ब्राउन राइस को डाल दीजिए। एक मिनट बाद राइस-वाइनगर और सोया-सॉस डाल दीजिए। कुछ मिनट तक कलारते रहिए। आंच बंद कर दीजिए। पार्सली की पत्तियां डाल दीजिए।

    परोसिए, खिलाइए, खाइए और गुनगुनाइए  ।

     

  • तस्मानिया 2016 – ओवरलैंड ट्रैक | इस्ट कोस्ट

    ग्रेगरी नॉड फ्रांस के हैं। फ्रांस के बेहतरीन संस्थान से इंजीनियरी में स्नातक हैं। ब्लाकबस्टर फिल्म “लेगो” के डिजाइनर रहे हैं। दुनिया की जानी मानी एनिमेशन मूवी बनाने वाली कंपनी में काम करते हैं। बहुत ही अच्छे फोटोग्राफर हैं। बहुत ही अच्छे चित्रकार भी हैं। लोगों की लाइफ पेंटिंग भी करते हैं। लाइफ पेंटिंग का मतलब स्त्री हो या पुरुष इनके सामने पूरी तरह से नंगे विभिन्न्न मुद्राओं में रहते हैं और ये उनका चित्र हाथ से कैनवास में बनाते हैं।

    इनकी एक शार्ट मूवी तस्मानिया के फिल्म समारोह के लिए चुनी गई है। चुनी गई फिल्म को फिल्म समारोह के कॉपी राइट आदि जैसे मसलों के कारण दिखा पाना संभव नहीं है। लेकिन उस फिल्म से मिलती जुलती दूसरी फिल्म आप यहां देख सकते हैं। यह फिल्म भी अच्छी बन पड़ी है।

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  • गौ-सेवक बनाम गौ-रक्षक

     

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह

    लगभग दो साल पहले की बात है मैं अपनी टीम के साथ राजस्थान राज्य के कई जिलों के अनेकों गावों में जलसंग्रहण, नारीसमृद्धता, आर्थिक विकास, शिक्षा व कृषि आदि के कामों को समझने के लिए यात्राएं कर रहा था। इसी प्रक्रिया में मेरा ऐसे गावों में भी जाना हुआ जहां की जनसंख्या का 95% मुसलमान थे, इनमें से कुछ गावों में मतदाताओं की संख्या 10,000-15,000 के लगभग थी।

    ये गांव मुसलमान बहु्ल्य वाले बड़े गांव थे। मुझे व मेरे साथियों को इन गांवों के कई घरों में बहुत सम्मान व प्रेम से शाकाहारी भोजन कराया गया। इन गांवों में पानी के लिए लगभग हर घर में टांके बने हुए थे। पानी का स्रोत टांके थे। राजस्थान व जलसंग्रहण को समझने वाले भलीभांति टांकों व टांकों का जीवन से रिश्ता समझते हैं।

    इन गांवों में चलने वाले मदरसों में मैंने गौशालाएं देखीं, जिनकी देखभाल मुसलमान बंधु करते थे। मैंने पूछा कि ये गाएं कहा से आती हैं तो उनका जवाब था कि आप हिंदू भाई लोगों की गाय जब दूध देना बंद कर देती है तो वे या तो हमारी गौशालाओं में गाएं छोड़ जाते हैं या उनको ऐसे ही अवारा छोड़ देते हैं। इन गौशालाओं में अपवाद छोड़कर सभी गाएं ऐसी ही थीं।

    इन गौशालाओं के चरवाहे मुसलमान थे। मैंने खुद अपनी आंखों से इन मुसलमान चरवाहों के गायों के साथ आत्मीय रिश्ते देखे। चरचाहे की आवाज पर रंभाती हुई गाएं दूर-दूर से चराई छोड़ कर विश्वास भाव के साथ चरवाहे के पास चली आतीं थीं।

    बचपन से मेरे दिलोदिमाग में यह अनुकूलता (कंडीशनिंग) घुसा दी गई थी कि मुसलमान मतलब हिंसक मनुष्य। मैं अपने जीवन में लगभग दो दशक से अधिक इसी पूर्वाग्रह में जीता रहा कि मुसलमान मतलब गाय व आदमी को काट देने वाला बर्बर मनुष्य।

    मैंने जब इन गावों के मौलवियों आदि से पूछा कि मुसलमान व गाय का यह रिश्ता मेरी समझ के बाहर है। मुझे जवाब मिला कि मुसलमान का गाय व बकरी से बहुत गहरा  आर्थिक रिश्ता है। आर्थिक रिश्ता ही हमें गाय व बकरी को संरक्षित करने व उनकी सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उनका कहना था कि गाय की बजाय यदि बकरी की बात की जाए तो बकरी तो हमारे भोजन का प्रमुख हिस्सा है, बकरीद में हम बकरों की बलि देते हैं। लेकिन बकरी सबसे अधिक मुसलमान ही पालता है, बकरी की सेवा सबसे अधिक मुसलमान ही करता है।

    उनका कहना था कि प्रतिबंध लगाने से समाज पशुओं की सेवा करने के लिए प्रेरित नहीं होता है। पशुओं को यदि मनुष्य के आर्थिक लाभ व उपयोगिता से जोड़ दिया जाए तो समाज का बड़ा तबका जो गरीब होता है वह पालतू पशुओं की सेवा अपने आप करता है।

    उनका कहना था कि डेयरी की बहुत योजनाएं सरकारों की विभिन्न माध्यमों से चलती रहती हैं। लोग खूब फर्जीवाड़ा करते हैं लाखों करोड़ों रुपए की सरकारी ग्रांट व सरकारी योजनाओं के तहत बैंकों से लोन लेते हैं। एक-एक डेयरी पर कई-कई ग्रांट लेते हैं। डेयरी का अधिकतर पैसा हजम कर लिया जाता है। कुछ दिन चलाई जाती है फिर सिर्फ कागजों में चलती है या घसीट-घसाट कर चलाई जाती है। कुछ लोग डेयरी की गायों को लोगों में बांट कर खुद को महान समाजसेवी दिखाने का नीचता भरा ढोंग भी कर लेते हैं। जबकि उनसे जितना बन पड़ा उतना लूटघसोट डेयरी की योजनाओं से कर चुके होते हैं।

    उनका कहना था कि जब डेयरी के हालात यह है तो सरकारी योजनाओं व लोगों से चंदे वसूल कर चलने वाली गौशालाओं का हाल न पूछिए। उनका कहना था कि जैसे कि मुसलमान गायों को लेकर बदनाम है लेकिन हमारे जैसे लोग अच्छी गौशालाएं चला रहे हैं, गायों की सेवा कर रहे हैं जबकि हमें ग्रांट नहीं मिलती है। उसी तरह देश में कुछ लोग ईमानदारी से गौशालाएं व डेयरी भी चलाते हैं। लेकिन देश भर में डेयरी की सरकारी योजनाओं व गौशालाओं में जमकर फर्जीवाड़ा है।

    चलते-चलते ….

    cowबुंदेलखंड में स्थिति यह है कि एक गांव के लोग बंदूके लेकर दूसरे गांव के लोगों पर ताने रहते हैं ताकि दूसरे गांवों की गाएं उनके गांव में न आ जाएं। हर गांव में सैकड़ों हजारों गाएं अवारा घूम रही हैं, किसानों की फसलें बर्बाद कर रहीं हैं। किसान पूरी रात बंदूकें लिए खेतों में सोने के बाध्य हैं। किसान गायों से अपनी फसलों को बचाने के लिए बंदूकों से हवा में फायर करते हैं। गाएं हांकी जाती हैं, जहां हांकी जाती हैं वहां से वे फिर अन्यत्र हांकी जाती हैं। बस यही चल रहा है।

    पिछले दो वर्षों में सैकड़ों किसान जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी हमेशा गाएं पालते रहे, ने अपने घर में गाय रखना छोड़ दिया। इनमें से बहुतों ने तो अपनी दुधारू गाएं ऐसे ही अवारा छोड़ दीं ताकि उनके पास कोई गौ-रक्षक उगाही करने न आ जाए। कुकरमुत्तों की तरह गौ-रक्षक दल व अभियान उगे हैं।

    मेरा सुझाव है कि गाय को आर्थिक रूप से देखा जाए न कि धर्म की मजबूरी। तभी गाय का वास्तव में संरक्षण व पोषण हो पाएगा। कहीं ऐसा न हो कि एक दिन गाय भी विलुप्त प्रजातियों की ओर बढ़ जाए।

    यदि देश के किसान व गरीब तबके ने गाय से अपना रिश्ता तोड़ लिया तब कोई भी ताकत भारत में गाय को विलुप्त होने से नहीं बचा सकती है।

    तय हमें करना है कि हम ढोंग करेंगें, ढपोरशंखी करेंगें या हम अंदर से ईमानदार होना चाहेंगें।

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  • मुहम्मद अकबर हुसैन पांचो वक्त नमाजी हैं, शाकाहारी हैं, हिंदू श्रद्धालुओं को पानी पिलाते हैं, मंदिरों को दान देते हैं, गाएं पालते हैं

    अकबर हुसैन (बाएं) सामाजिक यायावर (दाएं)
    अकबर हुसैन (बाएं) सामाजिक यायावर (दाएं)

    आप हैं जनाब मुहम्मद अकबर हुसैन। आप पांचो वक्त के नमाजी हैं। रोज कुरान पढ़ते हैं। जरूरतमंदों को जकात देते हैं। दशकों तक हर वर्ष पवित्र रमजान माह में बिना नागा रोजा रखते रहे हैं। आजकल व्यापार में दौड़-धूप बहुत होने के कारण रमजान में सीमित रोजा रखते हैं।

    अकबर हुसैन मुसलमान होते हुए भी शाकाहारी हैं, मांस नहीं खाते हैं, केवल अंडे खाते हैं। गाय पाल कर डेयरी चलाते हैं, बकरी पालते हैं। आजकल डेयरी व बकरी पालन को स्वावलंबित करने के लिए जोरशोर से प्रयास में लगे हुए हैं। आठवीं पास अकबर हुसैन स्मार्ट फोन रखते हैं, इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। रोज रात में यूट्यूब देखते हैं जिनमें गाय व बकरियों व खेती आदि के बारे में वीडियो होते हैं।

    आपके पूर्वज उत्तर प्रदेश राज्य से थे लेकिन अकबर साहब की पैदाइश छत्तीसगढ़ राज्य के जगदलपुर शहर में हुई। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण अकबर साहब को नौवीं कक्षा से पढाई छोड़नी पड़ी। अकबर हुसैन कहते हैं कि भारत में हिंदू व मुसलमान सभी एक हैं, अंतर केवल यह है कि लोग अलग-अलग ईश्वर को मानते हैं। इनका मानना है कि अलग-अलग ईश्वर को मानने के बावजूद प्रेम से रहना भारतीय समाज की खासियत है।

    पांचो वक्त के नमाजी अकबर हुसैन रोज कुरान पढ़ने के बावजूद मंदिरों को दान देते हैं। प्रतिवर्ष नवरात्रों में मंदिर के दर्शन करने आने वाले हजारों लोगों को पेयजल खरीद कर उपलब्ध कराते हैं। कभी कभार तो इनके द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले पानी की पाउचों की संख्या दस हजार भी पार कर जाती है। अर्थात नवरात्रों में दसियों हजार रुपए मंदिर में ईश्वर के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पानी का इंतजाम करने में खर्च करते हैं।

    दंतेवाड़ा जिले मे स्थित माँ दंतेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ का सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में फुल पैंट पहन कर जाना प्रतिबंधित है। इसलिए मंदिर फुल पैंट वाले दर्शनाभिलाषियों को लुंगी उपलब्ध कराता है। अकबर हुसैन मंदिर को सैकड़ों अच्छी गुणचत्ता की पीली लुंगियाँ दान देते हैं, जिनको पहन कर श्रद्धालु लोग माता दंतेश्वरी के दर्शन करते हैं।

    अकबर हुसैन कहते हैं कि डेयरी को स्वावलंबित करने के लिए बाजार से दाना खरीदना बंद करना पड़ेगा। गायों को हरा व खेती करके उगाया जाने वाला चारा उगा कर देना पड़ेगा। इससे गायों स्वस्थ रहती हैं, पुष्ट होती हैं और उनका दूध भी बढ़ता है।

    अकबर हुसैन की डेयरी में कई प्रजातियों की गाएं हैं लेकिन उनकी योजना है कि भविष्य में केवल अच्छी जाति की देशी गाएं हों।

    बकरी-घर :

    मुहम्मद अकबर हुसैन का बकरी-घर
    मुहम्मद अकबर हुसैन का बकरी-घर

    अकबर हुसैन बकरियां भी पालते हैं। बकरियों के लिए इन्होंने बकरी-घर बनावाया है। बकरी-घर में गर्भवती व छोटे बच्चों वाली बकरियों के लिए अलग व्यवस्था है ताकि बच्चों के साथ बड़ी बकरियां मारपीट न करें। बकरियों की लेड़ी अपने आप नीचे गिरती है जिसको एकत्र करके बेच देते हैं या खाद के लिए प्रयोग कर लेते हैं। बकरियों के लिए पत्तियों वाले पौधो का रोपड़ कर रहे हैं ताकि बकरियों को बेहतर, स्वादिष्ट व पौष्टिक भोजन मिल सके।

    अकबर हुसैन जब गायों व बकरियों की बातें करते हैं तो इनका चेहरा चमक जाता है। घंटों बाते करते रहते हैं। गायों के रहने का इंतजाम साफ सुथरा रहता है। रोज सुबह शाम सफाई होती है। कई बार नहलाते हैं। शाम व सुबह खुले में टहलने के लिए छोड़ते हैं।

    अकबर हुसैन व सामाजिक यायावर
    अकबर हुसैन व सामाजिक यायावर

    गायों व बकरियों की देखभाल अपने परिवार की तरह करते हैं। सामाजिक मुद्दों पर तार्किक समझ रखते हैं। मुझे इनकी डेयरी व बकरी-घर को देखने का अवसर मिला, पूरा दिन साथ रहकर चर्चाएं करने का भी अवसर मिला।

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  • अतिपिछड़े इलाके के युवा के बदलते चरित्र की सच्ची कहानी

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    मैं जब से सामाजिक परिवर्तन व विकास के लिए समझदार हुआ हूं तब से मैंने अपने मन में केवल दो तत्वों पर ही भाव रखे हैं। “मुद्रा विहीन अर्थव्यवस्था व सामाजिक स्वामित्व।”
     
    मजबूरी न हो तो मैं मुद्रा का प्रयोग अभी इसी क्षण से बंद कर दूं। रही बात सामाजिक स्वामित्व की तो मैं व मेरी पत्नी व्यक्तिगत संपत्तियों के लिए प्रयास नहीं करते हैं। हमने अभी तक कोई जमीन, घर, दुकान आदि अचल संपत्ति नहीं खरीदी है। जबकि यदि संपत्ति खरीदना हमारा मकसद होता तो काफी संपत्तियां खरीद चुके होते।
     
    घर में उपयोगिता के सामान ही खरीदे जाते हैं। भारत में माइक्रोवेव, ओवन आदि केवल इसलिए नहीं खरीदे गए क्योंकि इन यंत्रों की उपयोगिता आज तक समझ नहीं आई। जब तक कार से भारत भ्रमण करने की योजना नहीं बनी तब तक कार भी नहीं खरीदी थी।
     
    आज भी कार का प्रयोग भारत में भ्रमण करने के लिए ही होता है। दिल्ली में हमने कभी कार नहीं रखी। मैंने व मेरी पत्नी ने सदैव मेट्रो, आटो, रिक्शा या पैदल ही यात्रा की। जब भारत भ्रमण नहीं करता हूं तब कार दिल्ली से कई सौ किलोमीटर दूर मेरे विश्वसनीय मित्र के यहां खड़ी रहती है। मैं जिस स्थान में कार खड़ी कर आता हूं वहां से महीनों एक इंच भी नहीं खिसकती है, भले ही खड़े-खड़े सड़ जाए।
    अब चूंकि भारत से लंबे समय के लिए जा रहे हैं तो लाखों रुपए का घरेलू सामान मित्रों व माता पिता को मु्फ्त देकर जा रहे हैं। जबकि कई मित्रों का सुझाव था कि आनलाइन सामान बेच कर मैं कई लाख रुपए कमा सकता हूं। मैंने कहा कि यदि मुझमें व मेरी पत्नी में योग्यता व कूबत होगी तो हम अपनी जरूरत का सामान फिर से खरीद लेगें। चूंकि मैं संपत्तियों पर व्यक्तिगत स्वामित्व महसूस नहीं करता इसलिए चूंकि मैं अब इन सामानों का प्रयोग नहीं करूंगा तो जो भी दूसरा इनका उपयोग करेगा वह इनका स्वामी होगा। मैं घरेलू सामान का व्यापारी तो हूं नहीं जो घरेलू सामान बेचता फिरूं।
     
    मेरी पत्नी आस्ट्रेलियन हैं और एक समृद्ध व प्रतिष्ठित परिवार से हैं। उनका परिवार कई सुंदर फार्महाउसों का मालिक है जो नेशनल रिजर्व के अंदर खरीदे गए जंगलों वाले फार्महाउस हैं।
     
    सिडनी जैसे दुनिया के सबसे महंगे शहरों वाले शहर में महंगे इलाकों में अत्यधिक सुविधा संपन्न कई घर हैं। रोविंग की महंगी महंगी नावों के मालिक हैं। कई-कई लाख रुपए का एक-एक बिस्तर। कई-कई हजार रुपए की एक-एक कप प्लेट आदि। घरों में खुद का अत्याधुनिक सुविधाओं वाला स्वीमिंग पूल रहा।
     
    पत्नी के पिता हावर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका के टापर, कुछ वर्ष पूर्व लाइफ-टाइम अचीवमेंट जैसा कुछ सम्मान मिला हावर्ड यूनिवर्सिटी से। एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के निदेशक मंडल में रहे व एक कंपनी के जन्मदाता रहे। माता भी आर्किटेक्ट। भाई-बहन आस्ट्रेलिया के सबसे प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल के पढ़े हुए। बड़ा भाई दुनिया के कई देशों की नामचीन यूनिवर्सिटीज से पोस्ट-डाक्टरेट किया हुआ। आस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी में शोध-प्रयोगशाला का निदेशक। छोटा भाई अंडर-19 में आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम में।
     
    पत्नी भी अपने माता पिता व बड़े भाई से पीछे नहीं रहीं। सिडनी यूनिवर्सिटी से जल-विज्ञान व तकनीक में PhD, कृषि-अर्थव्यवस्था विषय में अमेरिका से दुनिया के नामचीन शोध संस्थान से पोस्ट-डाक्टरेट। आस्ट्रेलिया की ओर से भारत में वरिष्ठ वैज्ञानिक सलाहकार रहीं।
     
    भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति से मुलाकातें व भोजन। भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों से लंबी चर्चाएं, उनके साथ भोजन व भारत सरकार के विभिन्न विभागों के महानिदेशकों व सचिवों आदि से समय समय पर चर्चाएं उनके कामकाज की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा रहा।
     
    सुविधाओं व ऐशोआराम को छोड़कर मेरे साथ भारत में सामान्य जीवन स्तर के साथ जीना। भारत के अति पिछड़े गावों में महीनों बिना सुविधाओं के बारिश में पानी गिरती फूस की झोपड़ियों में रहना। मेरे साथ गावों में पदयात्राएं करना व कभी कभार मिट्टी की सड़कों में बिना बिस्तर के सिर्फ साधारण सी चटाई में मेरी बांह को तकिया बनाकर सो जाना। कभी उफ न करना।
     
    कभी घर खरीदने की इच्छा नहीं। कभी कार रखने की इच्छा नहीं। कभी जरूरत से अधिक सुविधाओं की इच्छा नहीं। कभी नहीं कहा कि मैं सामाजिक कार्यों में सारा पैसा क्यों खर्च देता हूं।
     
    सामाजिक कार्यों में समय, ऊर्जा व पैसे की कमी न पड़े इसलिए शादी के 10 साल तक बच्चा पैदा करने की कोई बात नहीं, जबकि मेरी माता की सगी मौसी जैसे निकट रिश्तेदार भी मुझे नपुंसक व मेरी पत्नी को घुमा-फिराकर अप्रत्यक्ष रूप से बांझ कहते रहे।
     
    लंबे समय से मैं भारत के अति पिछड़े क्षेत्रों में अकेले जाता रहा हूं, ऐसे युवाओं व लोगों को खोजने के लिए जिनके अंदर सामाजिक सोच हो और वे अपने दम पर समाज की बेहतरी के लिए अपना जीवन लगाना चाहते हों।
     
    बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र व दक्षिण भारत के राज्यों में कुछ लोगों के साथ तालमेल मिला और उनके साथ विभन्न स्तरों पर कम ज्यादा ऊर्जा के साथ काम शुरू किए या चल रहे कार्यों में विभिन्न स्तरों पर मदद की।
     
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    इसी प्रक्रिया में एक दशक से भी पहले भारत के एक अति पिछड़े क्षेत्र के एक सामान्य युवा से मुलाकात हुई। तब वह युवा NGOs के स्थानीय बड़े दुकानदारों के साथ काम किया करता था। मेरे साथ चर्चाओं में युवा तड़प के साथ कहता था कि वह NGO दुकानदारों के साथ काम नहीं करना चाहता है। समाज के लोगों के लिए काम करना चाहता है। समाज के लिए जीवन लगाना चाहता है।
     
    मैं सामाजिक स्वामित्व पर चर्चाएं करता था। मेरी इच्छा थी कि युवा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाए और वहां चल रहे लोगों के प्रयासों को देखे व समझे।
     
    इस प्रक्रिया में एक दो बार ऐसा हुआ कि युवा को स्लीपर क्लास में ट्रेन में कुछ असुविधा के साथ यात्रा करनी पड़ गई और युवा का कहना हुआ कि इन तकलीफों से कारण वह अपना रास्ता बदल रहा है।
     
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    देश में हर जिले में ऐसे हजारों लाखों युवा हैं जो प्रशासन के साथ मिलकर विकास के लिए आने वाली ग्रांट्स को मंत्री, सचिव व स्थानीय प्रशासन आदि स्तरों पर अपनी सेटिंग के स्तर के आधार पर विकास के प्रोजेक्ट्स की ग्रांट्स की हिस्सेदारी से पैसा कमाते हैं। बड़े आदमी बनते हैं। संपत्तियां बनाते हैं।
     
    इस प्रक्रिया में कुछ NGO वाले ऐसे भी होते हैं जो समाज के लिए कुछ काम भी कर देते हैं। जिससे उनका नाम भी होता है और उनको काम करने वाला भी मान लिया जाता है। लेकिन इनका भी एजेँडा पैसा व ग्लैमर कमाना ही होता है।
     
    लेकिन इन लोगों में सभी लोग ऐसे होते हैं जो बिना ग्रांट के काम नहीं करते हैं। NGO इनके लिए व्यापार होता है। फर्जी बिल, फर्जी वाउचर, फर्जी आडिट रिपोर्ट, फर्जी साइट-रिपोर्ट की पूरी चेन होती है।
     
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    मैं कई वर्षों तक एक अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग संस्था से जुड़ा रहा। कुछ समय तक आधे भारत का समन्वयक भी रहा। इसलिए भारत के विभिन्न राज्यों के सैकड़ों अच्छे व फर्जी कामों वाले NGOs के फंडिंग आधारित प्रोजेक्ट्स को देखने समझने का अवसर मिला। इनके द्वारा प्रयोग किए जाने वाले तिकड़मों को देखने, समझने व जानने का अवसर मिला। मेरे साथियों ने देश की 500 से अधिक NGOs को ब्लैक लिस्ट भी किया।
     
    कई मैगसेसे पुरस्कृत महानुभावों के साथ बहुत नजदीक से काम करने का अवसर भी मिला। सामाजिक आंदोलनों के राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े व नामचीन संगठनों के साथ काम करने का अवसर मिला।
     
    इस अवसरों से यह समझ आई कि भारत में विभिन्न प्रकार के NGOs वास्तव में कैसे चलते हैं। अच्छे व फर्जी कामों के तिकड़म क्या होते हैं।
     
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    इतना सब देखते समझते हुए देश के हजारों NGOs, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि से अच्छे से मिलना व समझना होता रहा।
     
    सरकारी या विदेशी ग्रांट से तिकड़म करके पैसा कमाना, कुछ काम करते भी जाना ताकि कभी कोई बात न उठे, विरोध न हो। कुछ लोग ग्राँट्स से पैसा कमाते हुए भी वास्तव में समाज के लिए कुछ करते भी रहना चाहते हैं। NGOs व सामाजिक कार्यों के इन दुकानदारों में पैसा कमाने का अंतर हो सकता है। काम करने के तरीकों में अंतर हो सकता है।
     
    लेकिन इनमें से चंद अपवादों को छोड़कर लगभग सभी लोग कम से कम मुझ जैसे व्यक्ति के सामने कभी खुद को ईमानदार नहीं साबित करते हैं। कभी अपने तौर तरीकों को अच्छा नहीं बताते है। काफी लोग तो लज्जा व शर्म महसूस करते हैं।
     
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    लेकिन समाज के लिए जीवन लगाने की बात करने वाले जिस युवा की बात मैं कर रहा हूं उसका चरित्र बहुत अधिक बदलते हुए मैंने देखा है।
     
    आज उस युवा के लिए सामाजिक सोच कोई खास मायने नहीं रखती है। ऐसा नहीं है कि युवा बहुत अधिक पैसा कमा लेता है। लेकिन जिस समाज से ताल्लुक रखता है उसके हिसाब से आज वह बड़ा आदमी है। वह युवा और अधिक पैसा कमाना चाहता है, वह और बड़ा आदमी होना चाहता है।
     
    अब तो उस युवा की स्थिति ऐसी है कि यदि उसके घर में कोई सामाजिक कार्यकर्ता जिसकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो ऐसे सामाजिक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता को भी छोटा आदमी मानने व अप्रत्यक्ष रूप से अपमान करने के अहंकार में जीता है।
     
    आज उस युवा की सोच की स्थिति ऐसी है कि वह यह मानता है कि सरकारी ग्रांट्स व NGO की जिस तिकड़म बाजी व नेक्सस से वह पैसा कमाता है वह व्यापार है और वह युवा अपनी मेहनत की कमाई खाता है।
     
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    मेरी समझ में यह नहीं आता है कि वह युवा शुरू से ही ऐसे ही चरित्र का था लेकिन अभिनय करता था या वह शुरू में अच्छी सोच का था लेकिन बाजारूपन व बेईमानी के रास्ते पर चलने और बेईमानी का पैसा आने के कारण उसका चरित्र ऐसा हो गया है।
     
    एक समय था जब मैं इस युवा के साथ सामाजिक विकास के विचारों पर घंटों चर्चाएं सहजता से कर लेता था। आज यह युवा पैसे व सुविधाओं व खुद को बड़ा आदमी के मानने के अहंकार में इस कदर जीता है कि सामाजिक विचारों पर चर्चा करना तो दूर सामान्य चर्चाएं हो पाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
     
    चारित्रिक व सोच का पतन यहीं नहीं रुकता है। बच्चों व परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। लेकिन ऐसे युवाओं को अपनी संतानों के लिए सिर्फ यह दिखता है कि इनको कितनी सुविधाएं दे दी जाएं और इनके लिए कितना जमा कर लिया जाए। चारित्रिक व सोच का पतन इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं रहता। यदि मुद्दा होता तो क्या वे खुद को और अधिक पतिति होने से रोकने का प्रयास नहीं करते होते।
     
    कारण कुछ भी हो लेकिन जब से सरकारी विभागों ने NGOs के माध्यम से काम करना शुरू किया है तब से समाज में अनैतिकता बढ़ी है। चारित्रिक पतन बढ़ा है। भ्रष्टाचार बढ़ा है।
     
    जिस देश में पूरा का पूरा समाज व ढांचा ही भ्रष्ट होने की कगार पर खड़ा हो वहां मैं पैसे कमाने के तरीके पर सवाल नहीं उठाना चाहता हूं लेकिन चारित्रिक, सोच, विचार, भाव का पतन एक बहुत ही गंभीर बात है।
     
    किसी समाज या देश या व्यक्ति या परिवार का विकास कम से कम पैसा व सुविधाओं से तो नहीं ही होता है।
     
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    बहुत लोग जो मेरे जीवन व मेरे कामों के बारे में नहीं जानते हैं केवल मुझे पत्रकार, लेखक व फेसबुकिया आदि के रूप में ही जानते हैं। जिनके लिए चुनाव लड़ना, चुनाव जीतना, सरकार बनाना, अपनी अपनी पार्टियों के प्रति भक्तई दिखनाा आदि किस्म की वाहियात बातें ही सामाजिक सोच है, सामाजिक प्रतिबद्धता है, सामाजिक निर्माण है, सामाजिक परिवतर्न आदि है।
     
    उनको मेरी यह बात शायद ही समझ आए कि जिस आदमी ने जीवन के लगभग 15-20 साल सामाजिक काम किया हो, वह भी बिलकुल जमीन पर उतर कर सुविधाओं व खूबसूरत कैरियर को लात मारते हुए। सामाजिक क्षेत्र के विभिन्न आयामों को नजदीक से देखा हो। व्यवहारिक सोच दिन प्रतिदिन परिपक्व हुई हो।
     
    वह आदमी यदि जीवन में प्राप्त अनुभवों के आधार पर ईमानदारी से कुछ किताबें लिखकर मरना चाहता है तो यह भी गंभीर सामाजिक काम ही है। यह भी गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता ही है। यह भी सामाजिक निर्माण का प्रयास ही है।
     
    किताबें व विचार ही मनुष्य, परिवार, समाज व देश को दिशा देते हैं। काश हमारे समाज के युवा गंभीर विचारों व किताबों का स्वाध्याय शुरू करें व जीवन में उतार कर जीने का प्रयास शुरू करें।
     
    क्योंकि केवल यही एक मात्र रास्ता है समाज व राष्ट्र निर्माण का।
     
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    सामाजिक यायावर
    सामाजिक यायावर
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
     
  • चाणक्य-नीति की चौपतियाएं

    chanakya-01चाणक्य नीति की किताब पहली बार आज से तीस साल पहले मैंने तब देखी थी जब मैं छोटा था तथा अपने एक रिश्तेदार अभिभावक के साथ किसी गांव जा रहा था। बस बहुत ही खटारा थी बस के अंदर चालक सीट के पास निकले हुए बोनट पर बैठ कर एक आदमी अपने हाथ में पेन, पेंसिल व छोटी-छोटी चौपतियाएं लिए हुए उनको बेचने का प्रयास कर रहा था। उसी के बगल में एक अन्य आदमी खड़ा होकर कई प्रकार की शीशियां लिए हुए कई प्रकार के तेल बेच रहा था।
     
    लगभग तीस साल पहले खटारा बस में बेची जा रही चाणक्य नीति की चौपतियाएं आज भी दूर-दराज के गावों में चलने वाली खटारा बसों से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कनाट प्लेस के बड़े किताब दुकानदारों तक सहजता से उपलब्ध हैं।
     
    मैं नहीं जानता कि इन चौपतियाओं को प्रकाशित करने वाले कौन हैं, उनका मकसद क्या है। वे चाणक्य का नाम भुना कर पैसा कमाने के अलावा सामाजिक रूप से कुछ जिम्मेदार महसूस करते भी हैं या नहीं। सच यही है कि मुझे उनके बारे में अंदाजा नहीं।
     
    चाणक्य तो अब हैं नहीं, जिस जमाने में चाणक्य थे उस जमाने में कापी राइट जैसी कोई बात भी नहीं थी। न ही लिखे हुए वैसा का वैसा ही सुरक्षित रखे जाने की कोई ठोस व्यवस्था ही थी। इसलिए मुझे अंदाजा नहीं कि चाणक्य के नाम पर धड़ल्ले से छापी, बेंची व पढ़ी जाने वाली चाणक्य नीति की चौपतियाओं का ठोस आधार है भी या नहीं।
     
    यदि मैं चाणक्य नीति के नाम पर छापी जानी वाली इन चौपतियाओं व पुस्तकों में लिखी सामग्री को चाणक्य का ही लिखा मान लूं, तो –
     
    मुझे चाणक्य परले दर्जे के धूर्त, हिंसक, अमानवीय, प्रपंची, फरेबी, दंभी आदि किस्म के आदमी लगते हैं।
     
    चाणक्य नीति का मतलब सिर्फ यह कि –
     
    • कितनी भी धूर्तता करके सत्ता प्राप्त करना चाहिए, सत्ता प्राप्त करके कितनी भी धूर्तता करके सत्ता पर बने रहने का प्रयास करना चाहिए।
    • किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। जो विश्वास करे उसको प्रयोग करके उसको धोखा दे देना चाहिए।
    • प्रेम, विश्वास, त्याग आदि जैसे मूल्यों का कोई अर्थ नहीं।
    • सबकुछ सत्ता है, शक्ति है। किसी भी तरह इनको प्राप्त करना चाहिए और किसी भी तरह इनको भोगते रहना चाहिए।
    • इन्हीं सब धूर्तताओं, हिंसाओं, फरेबों, झूठों व तिकड़मों का नाम है चाणक्य-नीति।
     
    मेरा मानना है कि चाणक्य भारत के उन लोगों में से है जिनके चरित्र का हनन सबसे अधिक किया गया है वह भी खुद उनके ही मूर्ख व स्वार्थी अनुगामियों द्वारा। जो मन में आया वह चाणक्य-नीति के नाम से कह दिया। जो चाणक्य के व्यक्तित्व का ककहरा भी नहीं जानते हैं वे भी चाणक्य के नाम से चाणक्य-नीति की दो-चार चौपतियाएं लिख दिए हैं, मानो चाणक्य से रोज जीवंत साक्षात्कार करते हों।
     
    फेसबुक में भी हजारों फर्जी असली प्रोफाइल हर घंटे चाणक्य-नीति पर व्याख्यान देते थे। इसमें काफी रोक तब लगी जब कुछ लोगों ने चाणक्य-नीति का मजाक उड़ाने के लिए बिलकुल उलट बातें चाणक्य-नीति के नाम से छापनी शुरू कर दीं।
     
    चाणक्य के बारे में जितना भी अध्ययन व समझ मेरी है उतने से अभी तक मैं इस बात पर पहुंचा हूं कि चाणक्य मौलिक चिंतक नहीं थे, चाणक्य सामाजिक चिंतक नहीं थे। उन्होंने चंद्रगुप्त को सत्ता प्राप्त करने में मदद की और इस प्रक्रिया में जिन तौर तरीकों का प्रयोग करके उन्होंने सफलता प्राप्त की उसको उन्होंने नीति के रूप में प्रतिष्ठित किया।
     
    बहुत लोग चाहते हैं कि निरंकुश सत्ताएं भोगने को मिलें, इसलिए उनके लिए चाणक्य सबसे पसंदीदा व्यक्ति हुए। चाणक्य की बातों को तोड़ मरोड़ कर अपने अनुसार बनाते-बनाते इन लोगों ने चाणक्य-नीति को सड़कछाप व टटपुंजिया चौपतियों के स्तर तक पहुंचा दिया।
     
    इससे कम से कम एक फायदा तो हुआ ही है कि जो भी धूर्त चरित्र का व्यक्ति है उसको चाणक्य का अनुगामी बनकर खुद को महान राजनैतिक व कूटनीतिक चिंतक मानने का दंभ जीने का अवसर तो मिल ही जाता है।
     
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  • पुलिस-सुधार

    police-reform-04
    भारत में जब भी पुलिस-सुधार की बात होती है तो इसका मतलब सिर्फ उनके अधिकारों व सुविधाओं में बढ़ोत्तरी तथा उनको उन्नत तकनीक के खतरनाक हथियार उपलब्ध कराने तक ही सीमित रहता है। पुलिस को आम आदमी के लिए जवाबदेह बनाने का प्रयास कभी नहीं किया जाता।
     
    police-reform-02यह हमेशा भुला दिया जाता है कि पुलिस का ढांचा अभी तक अंग्रेजो के जमाने का ही है जिसका मकसद आम आदमी को अवारा जानवर समझना है। पुलिस को जमाने से अनाप-शनाप अधिकार प्राप्त हैं, जिनके कारण आम आदमी की हैसियत पुलिस के सामने सड़कछाप अवारा जानवर जैसी होती है।
     
    पुलिस को प्राप्त अधिकारों के कारण ही लाखों निर्दोष लोग जेलों में वर्षों से सड़ रहे हैं। पुलिस द्वारा प्रतिवर्ष हजारों निर्दोष लोगों की हत्या की जाती है। अपराधी व पुलिस का नेक्सस बनता है, जिसके कारण अपराधों की संख्या व तासीर लगातार बढ़ती चली जाती है।
     
    police_reform-01किसी भी देश व समाज में अपराधियों की संख्या कम होती है। शांतिप्रिय लोगों की संख्य अधिक होती है। कुछ लोगों के कारण पूरे लोगों के ऊपर शासन करने के लिए प्रताणित करने के स्तर के अनाप-शनाप अधिकार दे देना सुधार नहीं होता है, सुधार से विपरीत दिशा में चलना होता है।
     
    भारत में पुलिस सुधार केवल और केवल तभी संभव है जब पुलिस को आम आदमी के प्रति जवाबदेह बनाने के गंभीर प्रयास हों।
     
    लेकिन ऐसा क्यों चाह जाएगा, यदि ऐसा हो गया तो राजनैतिक, प्रशासनिक, धार्मिक व व्यापारिक सत्ताओं द्वारा पुलिस का दुरुपयोग करके आम आदमी का शोषण कैसे किया जा सकेगा।
     
    जब तक आम आदमी के प्रति जवाबदेह बनाने की ओर पुलिस-सुधार का साहस न हो तब तक पुलिस-सुधार के नाम पर अधिक अधिकारों व उन्नत खतरनाक हथियारों को देने रूपी पुलिस-सुधार को बिना लाग-लपेट के बकवास कहा जाना चाहिए।
     
    Police Line Do Not Cross
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