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हमारे प्रधानमंत्री जी को “कौटिल्य-शास्त्र” की चौपतियाओं व नारा-संस्कृति वाली क्रांतिकारिता से बाहर आने की महती जरूरत है

सामाजिक यायावर


इसमें संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी जी की मंशा रहती है कि देश बेहतर हो। लेकिन केवल मंशा रखने भर से, नारे देने व भक्तों के तर्क वितर्क कुतर्क से कुछ भी साबित करते रहने से देश का निर्माण नहीं होता, देश आगे नहीं बढ़ता है।

झाड़ू लेकर सफाई हो, बेटी बचाओ वाली बात हो, 24 घंटे बिना सोए देश के लिए काम करता हूं या ऐसी ही अन्य बातें। सभी नारे के रूप में निकलीं, नारे के रूप में प्रायोजित हुईं और धरातलीय वास्तविकता पर सड़ियल दिखावे व चोचलेबाजी के रूप में परिवर्तित होकर अपनी परिणति को प्राप्त हुईं। 

pm-india-narendra-modiशायद हमारे प्रधानमंत्री जी को ऐसा लगता है कि वे 24 घंटे बिना सोए देश के लिए काम करते हैं जैसे नारों को प्रायोजित कर देने मात्र से देश का तंत्र जिम्मेदार व कार्यशील हो जाता है। सफाई का नारा दे देने मात्र से लोग सफाई करना शुरू कर देंगें। बेटी के साथ सेल्फी का नारा देने मात्र से लोग कन्या भ्रूण हत्या बंद कर देंगे, दहेज बंद हो जाएगा, प्रेम विवाहों का स्वागत होने लगेगा, लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की आजादी मिल जाएगी।

कम से कम मुझे यह बिलकुल भी नहीं लगता कि मोदी जी यह चाहते होगें कि उनके दिए गए नारों की परिणति इस प्रकार हो। मोदी जी नारे देते हैं, क्योंकि उनको लगता है कि उनका काम नारे देने का है और लोग उनके नारों को सामाजिक बदलाव वाले आंदोलनों का रूप दे देगें। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता, उनके दिए नारे बहुत ही सड़ियल परिणति को प्राप्त होते हैं।

हमारे प्रधानमंत्री जी समझ ही नहीं पाए हैं कि नारों से जीवन जीने की प्रमाणिकता में अंतर नहीं आता है। वे देख ही नहीं पाए कि सफाई, बेटी बचाओ आदि जैसे मुद्दों पर उनके दिए नारों का जमीन पर क्या परिणति हुई। किस प्रकार उनके दिए नारे जमीन पर आते-आते सड़क छाप नारा व चोचलेबाजी का रूप ले लिए।

नारों की इस तरह परिणति होने में प्रधानमंत्री जी के भक्तों व अंध भक्तों का बहुत बड़ा योगदान है। क्योंकि उनके अंध भक्त भी यही मानते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री केवल नारे देता है, हवाई बातें करता है जिसका जीवन जीने की प्रमाणिकता से कोई संबंध नहीं। इसलिए प्रधानमंत्री जी के अंध भक्त लोग तक भी प्रधानमंत्री जी के नारों को जीवन में उतारने की बजाय गैर-भक्तों के साथ तर्को, कुतर्को व गाली गलौज से प्रधानमंत्री जी के नारा-प्रयासों की और अधिक छीछालेदर करते रहते हैं।

तर्क, वितर्क, कुतर्क व गाली गलौज की बजाय यदि भक्त व अंध भक्त गण प्रधानमंत्री जी के दिए नारों को खुद अपने ही जीवन में उतार कर जीना शुरू कर देते तो बिना अतिरिक्त प्रयास के ही प्रधानमंत्री जी लोकप्रियता घटने की बजाय बढ़ती और भक्तों को गाली गलौज करने तथा फर्जी गाथाएं, फर्जी फोटुवें व फर्जी रपटें गढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती, लोग खुद ब खुद मोदी जी के फालोवर बनते चले जाते और मोदी जी के नारे जनांदोलन का रूप ले लेते।

दरअसल जितने भी गांधी विरोधी लोग हैं, जो गांधी को नहीं समझते हैं या गांधी के कारण जिनके वेस्टेड इंटरेस्ट्स को क्षति पहुंचती है, वे सभी यही समझते कहते व प्रायोजित करते हैं कि गांधी को अंग्रेजो ने प्रायोजित किया। बहुत लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया यही प्रायोजित करने में कि गांधी में कोई खासियत नहीं थी वे केवल अंग्रेजों द्वारा प्रायोजित थे।

इस प्रकार की सोच रखने वाले विकृत मानसिकता वाले लोगों को यही लगता है कि महानता, मानवीय मूल्य, संवेदनशीलता, ईमानदारी, त्याग आदि जीवन में जीकर प्रमाणित होने वाले मूल्य न होकर केवल सत्ताओं द्वारा प्रायोजित किए जाने वाले मूल्य हैं। इसलिए ऐसे लोग मूल्यों को स्वयं में प्रमाणिकता से जीने की बजाय सत्ता व सत्ता द्वारा स्वयं के प्रायोजित करवाने के तिकड़मों में लगे रहते हैं।

परिणाम यह होता है कि समाज व समाज के लोग जीवन मूल्यों के प्रति अवहेलना व तिरस्कार की अवस्था की ओर बढ़ जाते हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी के भक्त व अंध भक्त गण ऐसी ही अवस्थाओं में जीने वाले लोग होते जा रहे हैं। जिन्हें उचित-अनुचित, सही-गलत, मूल्यों व संवेदनशीलता का भान नहीं। तुर्रा वे यह सोचते हैं कि वे देश निर्माण में प्रधानमंत्री जी के साथ कंधा से कंधा से मिलाए खड़े हैं।

500 व 1000 रुपए को बंद करने वाले मुद्दे की ही बात कर ली जाए। जो भी ईमानदार चिंतक है जिसे सामाजिक अर्थशास्त्र की समझ है वह अच्छी तरह जानता है कि 500 व 1000 रुपयों को बंद करने की कवायद जिस तरह के झोल झपाटे से हुई उसका काला-धन समाप्ति व भ्रष्टाचार नियंत्रण से दूर-दूर तक कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता है। लेकिन भक्तगण पिले पड़े हुए हैं। इसके लिए इमोशनल नारे व इमोशनल ब्लैकमेल करने वाले तर्क गढ़ते हैं। इन सब चोचलों से आम आदमी कशमशा कर रह जाता है, उसके सोचने समझने की शक्ति कुंद होती चली जाती है। 

व्यक्तिगत रूप से मैं इसमें प्रधानमंत्री जी का दोष नहीं मानता, दोष उनकी समझ का है उनके भावों का नहीं। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी अर्थशास्त्री है ही नहीं, उन्हें तो अर्थशास्त्र का ककहरा भी शायद ही आता हो। वे तो कौटिल्य शास्त्र, जो राजतंत्रीय काल में आधुनिक व्यवस्था से बिलकुल ही भिन्न व्यवस्था में लिखा गया था, का अनुसरण करने वाले प्राणी हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए यदि कौटिल्य ने कहीं लिख दिया कि मुद्रा का विमूल्यीकरण कर देना चाहिए तो हमारे प्रधानमंत्री जी के लिए यह ब्रह्मवाक्य होगा और वे बिना सोचे विचारे विमुद्रीकरण कर देंगें वह भी इस अहंकार के साथ कि वे जो कर रहे हैं वह व्यवस्था परिवर्तन के लिए है। मैं यह बिलकुल नहीं कह रहा हूं कि प्रधानमंत्री जी ने वर्तमान विमुद्रीकरण कौटिल्य जी से पूछकर किया। मैंने केवल उदाहरण दिया अपनी बात को समझाने के लिए।

आगे का काम हमारे प्रधानमंत्री जी के भक्त गण संभाल लेते हैं। पिल पड़ते हैं मोदी जी की बात को सही व ऐतिहासिक साबित करने के लिए। भले ही इसके लिए किसी निहायत ही सड़ियल सी टेक्स्ट बुक के किसी पन्ने को नीला पीला करके बताना पड़े कि देखो वहां लिखा है कि विमुद्रीकरण करना चाहिए। बस हो गया भक्तों का काम खतम। भारत व भारत के लोग चाहे गर्त में चले जाएं। बिना सवाल अपने आराध्य की भक्ति रूपी भक्तियोग परंपरा में महान योग के रूप में प्रतिष्ठित है ही। 

दरअसल 500 व 1000 रुपयों को खतम करने वाली बात उतनी सीधी व सपाट है नहीं जितनी इसको लागू करते समय बताई गई व प्रायोजित की गई थी। ढेर सारे टेढ़े मेढ़े पेंच हैं। खैर फेसबुक में या पब्लिक में खुलेआम इन पेंचों की बात नहीं की जा सकती। जो दृष्टि रखते हैं उनको शुरू से ही अंदाजा हो गया था। जिनके पास दृष्टि नहीं है उनको तो हाथी सूप, रस्सी, खंभे आदि रूप में ही दिखेगा। खैर…

मोटा-मोटी यह समझा जाए कि माननीय प्रधानमंत्री जी खुद को क्रांतिकारी व राष्ट्र निर्माता के रूप में प्रायोजित करने में बहुत तगड़ी हड़बड़ी कर गए। उनके द्वारा दिए गए नारों को ही उनके भक्तगण देश निर्माण, देश प्रेम, देश भक्ति, जागरूकता, प्रगतिशीलता व विकास की कसौटी मानते हैं। इसलिए मोदी जी भी नारा-आसक्ति में जीते हैं। सो उन्होंने 500 व 1000 नोटों के मामले में काला धन वगैरह-वगैरह का क्रांतिकारी नारा दिया और निकल लिए। बाकी का काम उनके भक्तों व उनकी कैबिनेट ने संभाल लिया जिसमें देश के लोगों को इमोशनल टच देते हुए बयानबाजी करते रहना है जैसे देश के लिए इतना तो कष्ट भोगना ही पड़ेगा। देश के लिए यह, देश के लिए वह, इत्यादि।

आम आदमी के लिए देश कल्याणकारी होने की बजाय लगातार कष्ट देने व बलिदान मांगने की मशीन हो गया। लोकतांत्रिक देश लोगों के कल्याण के लिए होता है। जिम्मेदार व ईमानदार जनप्रतिनिधि देश के लोगों के पहले स्वयं कष्ट भोगने की शुरुआत करता है। लेकिन यहां तो मानो केवल आम आदमी ही देश बनाने के लिए जिम्मेदार हैं सो केवल और केवल वही कष्ट भोगें और लगातार भोगेंगे। मानो उनकी पैदाइश ही हुई है कष्ट भोगने के लिए, कष्ट भोग-भोग कर देश निर्माण के लिए।

देश के आम आदमी की हालात पुराने जमाने के शूद्रों जैसी है। जिनका जन्म ही होता है कष्ट भोगने के लिए। कष्ट भोगना उनकी ईश्वरीय नियति मान ली जाती है। शूद्र कष्ट भोगते गए ऊपर वाले मौज करते गए। बिलकुल वैसे ही आम आदमी कष्ट भोग-भोग कर देश निर्माण करता रहे और ऊपर वाले मौज करते रहें।

 

दरअसल भारत जैसे देशों में जहां का ढांचा भले ही कागज में लोकतंत्र की बात करता हो लेकिन वास्तविक चरित्र सामंतवादी का होता है उन देशों में जो नेता लोग बहुत लंबे समय तक सत्ता या सत्ता के नजदीक रहते हैं, उनमें इतना अधिक अहंकार व मद आ जाता है कि वे आम लोगों को तकलीफों के प्रति घोर असंवेदनशील हो जाते है। उनको देश के आम लोग लिजलिजाते कीड़े-मकोड़े की तरह लगते हैं। उनको लगता है कि आम आदमी की पैदाइश ही लिजलिजा जीवन जीते रहने के लिए ही होती है। वर्तमान भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों व भक्तगणों के बयानों व तर्कों से तो यही लगता है कि उनकी असंवेदनशीलता सीमाएं पार कर चुकी है। उनको लगता है कि आम लोग तो पैदा ही हुए हैं लिजलिजाते कीड़े मकोड़ों के रूप में घिसटती हुई जिंदगी जीने के लिए। 

जबकि स्थिति यह है कि इस झोल झपाटे से देश को आर्थिक रूप से भयंकर क्षति हुई है, लंबे समय तक लगातार क्षति होती रहेगी। देश कब उबर पाएगा इसका अंदाजा नहीं। भक्तगण क्या कहते हैं इसकी बात न की जाए क्योंकि वे तो देश को आर्थिक महाशक्ति एक घंटे में बना दें, सोशल मीडिया है ही। क्या पता आर्थिक महाशक्ति बना भी चुके हों, इसलिए शायद कुछ दिनों में सोशल मीडिया में तैरते-उतराते भारत महान आर्थिक शक्ति के तौर पर हमारे आपके पास पहुंच भी जाए।

 

मैं मोदी जी के कई गुणों का प्रशंसक हूं, उनकी कई नीतियों का आलोचक भी हूं। लेकिन मैंने एक बात पर हमेशा विश्वास किया है कि मोदी जी देश के लोगों के प्रति निर्दयी नहीं हैं, हिंदुत्व के दर्शन पर विश्वास करते हैं। लेकिन देश के आम लोगों को लिजलिजाते कीड़े-मकोड़े समझना, उनसे हमेशा देश निर्माण के नाम पर कष्ट भोगते रहने की ही इमोशनल मांग करते रहना और खुद विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजाने का आनंद लेना। कुछ भी हो सकता है लेकिन महान गौरवाशाली हिंदुत्व संस्कृति दर्शन नहीं ही हो सकता। 

प्रधानमंत्री जी व उनके भक्तों को समझने का प्रयास करना चाहिए कि अब राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है। राजतंत्र में राजा गलतियां करते हुए, आम लोगों को कष्ट देते हुए भी राजा बना रहता है। लेकिन लोकतंत्र में गलतियां करते जाना बहुत कुछ बदल देता है। लोकतंत्र में लोग अपने कष्ट को कम करने के लिए जन-प्रतिनिधियों को शक्ति देते हैं। आम आदमी कभी भी यह सवाल खड़ा कर सकता है कि क्या देश निर्माण में कष्ट भोगने का ठेका सिर्फ उस आम आदमी का ही है जिसका जीवन पहले से ही कष्ट में है।

विश्वास कीजिए एक दिन यह आम आदमी जिसे लिजलिजाता हुआ कीड़ा-मकोड़ा समझा जाता है, खुद को लिजलिजाता कीड़ा-मकोड़ा मानने से मना कर सकता है। क्योंकि आम आदमी देख सकता है कि देश निर्माण के नाम पर कष्ट भोगते रहने के बावजूद उसकी स्थिति में अंतर नहीं आता है, जो देश निर्माण के नाम पर कष्ट नहीं भोगते हैं उनकी स्थिति जरूर ही और बेहतर होती चली जाती है। उस दिन आम आदमी इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए चतुराई से गढ़े गए खूबसूरत तर्कों को भी धता बता देगा।

 

भक्तगण कुछ भी कहें लेकिन लोगों की सोच व समझ प्रतिक्षण बदल रही है। लोग अपने आराम व स्वार्थ के प्रति प्रतिपल जागरूक हो रहे हैं। लोगों को दिखता है कि कैसे उनको कष्ट मिलता है देश निर्माण के नाम पर और कुछ प्रतिशत लोग कैसे मौज करते हैं। इन सबमें देश की ऊर्जा बर्बाद होती है, देश व समाज के लोगों के मूल्य पतित होते चले जाते हैं।

सत्ता में बने रहने के लिए इमोशनल ब्लैमेलिंग व लोगों की गलत कंडीशनिंग करने की बजाय लोगों के कल्याण के लिए गंभीर व दूरदर्शी काम करते रहना चाहिए। सत्ता में बने रहने के लिए कौटिल्य शास्त्र व नारा-क्रांतिकारिता शायद ही बार-बार काम आ पाए। देश के प्रधानमंत्री को नारा-क्रांतिकारिता व कौटिल्य शास्त्र से बाहर निकल आना चाहिए। 

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