इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है – 001

सामाजिक यायावर


मेरी माता जी की एक चचेरी-ममेरी बहन हैं, माता जी से छोटी हैं सो छोटी बहन हुईं। मेरे गांव में ही उनका ब्याह हुआ। उनके एक लड़का एक लड़की हुई। उनके पति गांव-नाते से मेरे बड़े भाई लगते हैं, पारिवारिक रिश्ते में नहीं आते हैं, सो मौसी वाला रिश्ता ही चलता है। इसलिए उनके पति को मौसा लिखूंगा।

मौसा किसान हैं। ट्रैक्टर हैं, ट्यूबवेल है, बाग-बगीचे हैं। अच्छी किसानी करते हैं, समृद्ध किसान हैं। बहुत ही सुंदर नक्काशीदार कुआं भी रहा उनके घर में जिसका प्रयोग आस पड़ोस के सभी लोग करते रहे। कुएं में गाय बैलों के पानी पीने के लिए बढ़िया अच्छी नांदें भी बनी रहीं, कुएं से पानी नाली में बहते हुए पास के तालाब में जाता रहा। बारिश के समय के अलावे कीचड़ नहीं रहता रहा। अब जरूरत नहीं रही तो कुआं बंद हो गया।

मौसी जी शुरू से शौकीन व जागरूक रही हैं। अपने घर की किचेन को शहर जैसी किचेन की तरह बनवाया, वास-वेसिन, बर्तन को सुखाने का टंगना, बर्तन रखने का टंगना, रेफ्रीजरेटर, कूलर, गैस-चूल्हा, मिट्टी का चूल्हा, खाना रसोई में खड़े होकर बनाया जाता है। चाऊमीन, बर्गर, समोसा, जलेबी, पनीर पकोड़ा, पनीर समोसा मतलब बहुत कुछ बनाना जानतीं हैं और प्रेम से जबरदस्ती बुला कर ठूंस कर खिलाने में इनको आनंद आता है।

पनीर घर में बनातीं हैं। दूध के लिए घर में कई गायें पाल रखी हैं। मैंने उनके पास हमेशा गायें देखीं। बढ़िया मोटी  खूबसूरत गायें। बिना कीचड़ के पूंछ फटकारती गायें। मन आ गया तो कभी कभार गायों को रंगबिरंगा भी कर देतीं हैं, मतलब परिवार के बच्चों की तरह गायों को पालती हैं। उनका कहना है कि हमारे बच्चों की देखभाल गाय करती है तो हमारा फर्ज है कि हम गायों को अपना परिवार व बच्चा मानें, उनके नखरे खुशी से झेलें।

मौसी जी का यह कहना रहा है कि जो खाना है बताओ मैं घर में बनाऊंगी, जो बनाना नहीं आता होगा वह बनाना सीखूंगी फिर बनाकर खिलाऊंगी लेकिन बाजार से खरीद कर नहीं खाना है क्योंकि बाजार में खाने में मिलावटी सामान प्रयोग होता है गुणवत्ता अच्छी नहीं होती। इसी चक्कर में उन्होंने खूब सारी चीजें बनानी सीखीं।

लड़का व लड़की दोनों इंजीनियर हैं। जब भी छुट्टियों में घर आते हैं तब मौसी जी रोज नाश्ते, लंच व डिनर में आज भी अलग-अलग चीजें बनाती हैं। जब मैं गांव में होता हूं तो सुबेरे सुबेरे पूछने आ जातीं हैं कि मैं नाश्ते में क्या खाऊंगा, धोखे से भी मुंह से कुछ निकल गया कि यह खाऊंगा तो वह चीज बनेगी।

गांव में रहते हुए भी बच्चों को शहरों जैसी सुविधाएं दीं। बहुत अच्छी वाली तकिया, बहुत अच्छा बिस्तर मुलायम व गुदगुदा गद्दा, धुली व अच्छी चादरें व बेडशीट, मच्छरदानी, सोफा आदि। अच्छी मुलायम रोएंदार तौलियाएं। बच्चों को चलने के लिए उम्र व जरूरत के हिसाब से साइकिल व मोटरसाइकिल दीं।

मौसी जी की उम्र पचास वर्ष से अधिक होगी। सुबह चार बजे उठती हैं, बड़ा घर है लेकिन खुद ही पूरे घर में झाड़ू लगाना, सफाई करना, गायों की देखभाल करना। फिर नाश्ता बनाना। फिर कपड़े धोना, फिर खाना बनाना, गायों की देखभाल। फिर कुछ देर आराम करतीं हैं, फिर खेत-खलिहान देखने जाती हैं कि काम-काज ठीक चल रहा है या नहीं, वहां से लौटकर फिर गाय व रात का भोजन। रोज साफ सुथरे बिस्तर लगाती हैं।

शाम को भोजन के पश्चात अपने पति के साथ बैठकर या थकावट होने पर बिस्तर में लेटे हुए टीवी देखतीं हैं, समाचार देखतीं हैं। सो जाती हैं।

मेरा मानना है कि मौसी जी अच्छा व स्वस्थ जीवन जीतीं आईं हैं। मेहनत किया, पैसा कमाया, पैसा सुविधाओं में खर्च भी किया, पैसा बचाया भी। मेरा अंदाजा है कि वे एक अच्छी कार खरीदने की हैसियत रखतीं है, दिल्ली जैसे शहर में एक अच्छा फ्लैट खरीद सकतीं हैं। क्या मालूम किसी मेट्रो शहर में उनके दो-चार प्लाट पड़े भी हों जिनकी कीमत आज करोड़ों में हो। किसी का बैंक अकाउंट या संपत्तियों की बहुत गहरी जानकारी नहीं रखी जा सकती है। कोई क्यों बताए भला।

उनका लड़का गांव में रहते हुए भी सुविधाओं में पला बढ़ा। इंजीनियरी की और अब लगभग पचास-साठ हजार महीना की नौकरी करता है। मेट्रो शहरों में पचास-साठ हजार रुपए महीना कोई बड़ी रकम नहीं। छोटे से फ्लैट में रहता होगा। पैसे बचाता होगा, क्या पता मौसी अब भी उसको पैसे देतीं हों। अंदर की बात क्या मालूम। क्या पता जिस मेट्रो शहर में रहता है वहां घर खरीदने में भी आर्थिक मदद करें या किया हो। 

दरअसल यह लेख इन सब बातों की चर्चा करने के लिए नहीं लिख रहा। यह सब बातें तो मुख्य बात का आमुख हैं सो अब आता हूं लेख की असली बात पर।

मेरा मानना है कि जितना पैसा मौसी जी ने अपने लड़के मतलब मेरे मौसेरे भाई को इंजीनियरी की डिग्री दिलाने में खर्च किया, जितना रुपया जब वह नौकरी के लिए संघर्ष कर रहा था उस समय खर्च किया होगा, जितना रुपया उसको मेट्रो शहर में घर खरीदने के लिए सहयोग कर रहीं होगीं। उससे बहुत कम पैसे से कोई व्यापार करवा सकतीं थीं या खेती किसानी को आधुनिक व व्यापाराना तरीके से करवाने की सोच दे सकतीं थीं।

जिस कृषि ने उनको इतना सक्षम व समृद्ध बनाया कि उन्होंने बेहतर जीवन जिया व बच्चों को सुविधाओं वाली परवरिश दी। उसी कृषि को और बेहतर तरीके से करते हुए इंट्रेप्रिन्योर बनने की सोच अपने बच्चों को क्यों नहीं दे पाईं। पढ़ी लिखी व जागरूक होते हुए भी ऐसी सोच क्यों नहीं रख पाईं।

लाखों रुपए साल का निवेश सालों तक बिना उफ किए वह भी पचास-साठ हजार रुपल्ली महीना जैसे छोटे आउटपुट के लिए।

यदि इतना ही रुपया, इतने ही सालों तक बिना उफ किए, बिना लाभ की चिंता किए किसी व्यापार में लगाने की सोच रखतीं तो उनका लड़का आज नौकरी करने की बजाय कई लोगों को अपने यहां नौकरी दे रहा होता। जब उसकी मां उसको गांव में शहर जैसी सुविधा दे सकतीं थीं तो वह दिल्ली जैसे शहर की सुविधाओं को अपने गांव में लाकर खड़ा कर सकता था।

लेकिन हुआ क्या अच्छी खासी समृद्धि व समृद्धि की संभावनाओं को छोड़कर वह लाखों करोड़ों की भीड़ में एक भूला हुआ बिना पहचान वाला चेहरा बनने चला गया वह भी विकास के नाम पर, प्रगति के नाम पर।

इसमें गलती मौसी की या उनके लड़के की भी नहीं है। अपने समाज की सोच ऐसी है कि वह नौकरी को महान मानता है, नौकरी देने को महानता नहीं मानता। दूसरा रिस्क लेने की भावना अभी गांवों के लोगों में नहीं आई हैं। नौकरी में लगने वाला निवेश उनको बिना रिस्क का लगता है जबकि व्यापार का निवेश उनको रिस्क का लगता है। सामंतवादी सोच वाली ऐंठन, अहम व लोगों क्या कहेंगे जैसी मानसिकता भी बहुत बड़ा कारण है। व्यापार में विनम्र होना पड़ता है। लेकिन नौकरी करने में भी तो बातों के जूते रोज खाने ही पड़ते हैं।

मैंने कल अपने गांव के बारे में लिखा। जैसा कि मैं करता हूं, मैंने फेसबुक व व्हाट्सअप जैसी कई सोशल मीडियाओं में उस लेख को भी पोस्ट किया। कई लोगों के अहम को मेरा लेख अनजाने में चोट कर गया। उन्होंने लेख के भाव को समझने की बजाय नुक्ताचीनी करने को प्राथमिकता दी, कुछ ने तो लेख के तथ्यों को ही गलत साबित करने को प्राथमकिता दी।

हमारी सोच का स्तर यह है कि हमारा अहम स्वीकारने को तैयार नहीं होता, समझने को तैयार नहीं होता, सुनने को तैयार नहीं होता। यही कारण है कि हममें दृष्टि विकसित नहीं हो पाती, हम अपने आसपास घटित हो रही घटनाओं को देख नहीं पाते।

ऐसा नहीं है कि मेरा गांव एक आदर्श गांव है, भारत में ऐसे गांव बहुत हैं, सैकड़ों हैं। ऐसा नहीं है कि मेरी चचेरी-ममेरी मौसी ही ऐसी हैं, भारत के गांवों में हजारों की संख्या में ऐसी महिलाएं हैं लेकिन हम उनको देखते नहीं, क्योंकि हमारी हमारी कंडीशनिंग, हमारे पूर्वाग्रह, हमारा अहम, हमको आब्जर्व करने से रोकता है, हमें दृष्टिहीन बनाता है।

दरअसल इंट्रेप्रिन्योरशिप एक सोच होती है, भारत को इस सोच की व दृष्टि की बहुत अधिक जरूरत है। तभी भारत, समाज व भारत के लोग वास्तव में विकसित व जागरूक होगें।

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