बस्तर, छत्तीसगढ़ पर आने वाली पुस्तक का प्रस्तावना अध्याय

अभी इस विमर्श को छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद वहां के आदिवासी समाज के लिए प्रतिबद्ध, ईमानदार व कल्याणकारी है या नहीं, यह भी छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद बस्तर के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व वास्तव में करता है या नहीं, सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण तथ्य कि बस्तर का माओवादी, माओवाद को जानता समझता भी है या नहीं इस विमर्श को भी छोड़ देते हैं। मैं इस किताब में यह विमर्श विस्तार से करूंगा भी नहीं क्योंकि पूर्वाग्रहों से इस विमर्श के दूषित होने का खतरा है, भिन्न पूर्वाग्रहों के लोगों के दावे भिन्न होंगें। मैं इस किताब में बस्तर में चल रहे प्रयासों की तथ्यात्मक चर्चा करूंगा, पुस्तक को पढ़ने के पश्चात आप स्वयं ही बस्तर के माओवाद के संदर्भ में विमर्श कर सकने में सक्षम होंगें, ऐसी आशा मैं करता हूं।

साम्यवादी विचारधारा को मानने वाले लोगों में यह विरोधाभास रहता है कि वे सत्ता के राजसी ढांचे को साम्यवादी ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति मानते हैं लेकिन सत्ता के साम्यवादी ढांचे को लोकतंत्रीय ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति नहीं मानते हैं, इसे क्रांति न मानने के लिए विभिन्न तर्क देते हैं जबकि यदि देखा जाए तो सत्ता के ढांचों में परिवर्तन की दोनों घटनाओं का चरित्र एक सा है तथा दोनों घटनाएं आम लोगों द्वारा घटित हुईं। यूं लगता है कि क्रांति को स्थापित करने के लिए क्रांति की परिभाषा को पूर्वाग्रह के अनुसार गढ़ लिया जाता है।

माओवाद के संदर्भ में मूलभूत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति जिसने किसी चीटी को नहीं मारा होता है वह दूसरे व्यक्तियों की नृशंस हत्याएं करने में गौरव का अनुभव करने लगता है, स्वयं को परिवर्तन के महान यज्ञ में आहुति डालने वाला समझने लगता है, कैसे क्रांति में योगदान करने के लिए किसी की भी निर्दोष व मासूम की भी हत्या करने के लिए स्वयं में महिमामंडित करते हुए गौरवांवित महसूस करते हुए स्वीकृति प्राप्त कर लेता है!! आगे की चर्चा ऐसा क्योंकर होता है, समझने में मदद करती है।

सत्ता को अपरिहार्य मानना तथा सत्ता परिवर्तनों को जिस रूप में प्रस्तुत किया जाता है या जाता रहा है, इस अनुकूलता के अंतर्गत बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए सत्ता के ढांचों में परिवर्तन ही एकमात्र रास्ता दृष्टिगत होता है, जिसे क्रांति का नाम दिया जाता है जिससे संबद्धित व्यक्ति स्वयं को क्रांतिकारी कहता है। व्यक्ति के विचार, सोच व मानसिकता की अनुकूलता यूं कर दी जाती है कि व्यक्ति यह मानने लगता है कि वर्तमान व्यवस्था नष्ट करने से बहुत अधिक अव्यवस्था होगी जिसका उपयोग वर्गविहीन सामाजिक व्यवस्था में किया जा सकता है। वर्तमान व्यवस्था को भी अव्यवस्था ही माना जाता है। वर्गविहीन आदर्श सामाजिक व्यवस्था के निर्माण व निर्माण प्रक्रिया में लोगों की हत्याएं होना व करना तो महान क्रांति के लिए आहुति मात्र ही हुईं।

क्रांति का सबसे भयावह तथ्य यह है कि वर्तमान में जीवन जीने वाले मनुष्यों के जीवन का मूल्य, भविष्य के अजन्में मनुष्यों के जीवन मूल्य की तुलना में नगण्य है, कमतर है। इतना नगण्य है कि जीवित मनुष्य के जीवन की हत्या, भविष्य के काल्पनिक मनुष्य के आभासी बेहतर भविष्य के लिए करते हुए, गौरव महसूस किया जा सकता है।

भविष्य अनिश्चित होता है। काल्पनिक भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाना प्रपंच, तर्क-छद्म व प्रवंचना से इतर कुछ भी नहीं। क्रांतिकारियों को भविष्य के प्रति इतना निश्चिंत-विश्वास कैसे हो सकता है, वर्तमान में हत्याएं करते हुए, भय स्थापित करते हुए, मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हुए कैसे भविष्य में मानवीय व्यवस्था का दावा कर देते हैं? क्या हिंसा करना, हत्या करना, हथियार का प्रयोग करना, भय स्थापित करना इत्यादि से भविष्य को देख सकने व महसूस कर सकने की दृष्टा क्षमता विकसित होती है?

माओवाद अच्छा हो सकता है, आदर्श हो सकता है, किंतु हिंसा आदर्श नहीं हो सकती, हिंसा अच्छा नहीं हो सकती, हिंसा अनुचित है, हिंसा अस्वीकार्य है, हिंसा प्रवंचना है, हिंसा आत्मछल है। अहिंसा उचित है, अच्छा है, इस तथ्य को कोई भी मनुष्य अस्वीकार्य नहीं कर सकता। माओवाद मनुष्य को मतवादी के रूप में बेसुध करके हिंसक बनाने व हिंसा करने में गौरवांवित महसूस करने की आत्म-प्रवंचना की ओर ढकेलता है। ऐसा मनुष्य बिना हिंसा के नहीं रह सकता, क्रांति के नाम पर ऐसा क्रांतिकारी मनुष्य हिंसा करता है, जो अनुचित है व अस्वीकार्य है।

ऐसी क्रांतियां मात्र प्रतिक्रियाएं होती हैं, विपक्षी होने की प्रतिक्रियाएं, प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्रियाएं। प्रतिक्रियाओं की शृंखला से इतर कुछ भी नहीं। प्रतिक्रियाओं, कल्पनाओं व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति वस्तुतः क्रांति हो ही नहीं सकती, इसे भले ही इसे कितना भी जोर लगाकर क्रांति का नाम दिया जाए।

कल्पना व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति को कितना ही महिमामंडित किया जाए, कितना भी सुसंगत तर्क दे लिए जाएं, कितने भी ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल खाती हो, समानता नहीं ला सकती है। इसको यूं समझने का प्रयास किया जाए कि कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से विश्व को बचाना चाहते हैं, कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से। बेहतर व आदर्श व्यवस्था बनाने के नाम पर एक दूसरे की परस्परता को खंडित करते हैं, एक दूसरे के अस्तित्व को जड़ सहित समाप्त करना चाहते हैं। जबकि वास्तव में इनमें से किसी को भी बेहतर समाज का निर्माण करने की अभिलाषा नहीं होती है वरन अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार व्यवस्था को मनचाहा आकार देना चाहते हैं, ऐसा कर पाने के लिए हिंसा, शक्ति, सत्ता, प्रपंच, छल, छद्म इत्यादि का प्रयोग करते हैं। कल्पना विलगाव पैदा करती है, दूसरे समूह व व्यक्ति को निम्न स्तर का मानती है।

यह क्रांति केवल सत्ता पर एक समूह के स्थान पर दूसरे समूह को स्थापित कर देती है। नया सत्ताधारी समूह विभिन्न सत्ताओं को अपने अधिकार में कर लेता है। फिर एक नया उच्च वर्ग बनता है जो विभिन्न प्रकार के विशेष अधिकारों से स्वयं को शक्तिशाली बनाता है। क्रांतियों के नाम पर विभिन्न स्तरों पर व तौर-तरीकों से इसी प्रक्रिया का दुहराव चलता रहता है। सत्ता-क्रांति कभी भी विषमता न तो कभी नष्ट करती है और न ही नष्ट करने की अभिलाषा व क्षमता ही रखती है। सत्ता-क्रांति महत्वपूर्ण बन पाने का वंचना तंतु है, संपूर्ण रूप से प्रतिक्रिया या प्रतिक्रिया की शृंखला पर आधारित। प्रतिक्रिया संघर्ष उत्पन्न करती है तात्पर्य कभी समाधानित न होने वाला वैमनस्य व हिंसा, परस्परता की हत्या। इस प्रकार की क्रांति सार्थक, मानवीय व समता वाली कैसी हो सकती है?

मोटे तौर पर वर्तमान साम्यवाद पूंजीवाद के विरोध पर आधारित है। साम्यवाद में आर्थिक समता की कल्पना परोसी जाती है, कल्पना परोसना इसलिए कह रहा हूं क्योंकि गहराई से समझने पर साम्यवाद का चरित्र भी पूंजीवादी चरित्र का ही है। साम्यवाद का पूंजीवाद राजकीय होता है, राजकीय-पूंजीवाद। पूंजीवाद चाहे व्यक्ति का हो, व्यक्तियों के समूह का हो या राज्य का हो, कभी समतापूर्ण व कल्याणकारी नहीं हो सकता, संभव ही नहीं।

साम्यवाद ही नहीं, अभी तक समाजवाद व पूंजीवाद में भी जो अंतर माना जाता है वह यह कि पूंजी की स्वछंदता व शक्ति व्यक्ति के पास न होकर राज्य व शासन के पास रहती है। इसका बेहतर समाज व व्यवस्था निर्माण से कोई रिश्ता नहीं होता क्योंकि राज्य अपने आपमें कोई जीवंत वस्तु नहीं होता जो स्वयं को स्वतः संचालित करता हो। राज्य को व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह द्वारा ही संचालित किया जाता है। इस प्रकार नाम परिवर्तन के बावजूद शक्ति व सत्ता कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों के हाथ में ही केंद्रित रहती है।

पूंजीवाद की ही तरह साम्यवाद का आधार भी आर्थिक ही है इसीलिए इसका मूल चरित्र भिन्न नहीं है। व्यक्ति के अंदर आर्थिक संपन्नता के लिए जो वासना रहती है, साम्यवाद की आर्थिक समता का आधार यही वासना है। साम्यवाद आधार प्रतिक्रिया है यही कारण रहा कि यह वर्ग विग्रह में लिप्त होकर एक ऐसा तंत्र बन गया जो मनुष्य का प्रयोग करता है तथा घृणा, द्वेष, हिंसा, हत्या आदि को आवश्यक व अनिवार्य मानने की कट्टरता रूपी आत्मछल को प्रवंचना के साथ कोरे आदर्श व गौरव के रूप में प्रतिष्ठित व पोषित करता है। पूंजीवाद व साम्यवाद में मूलभूत चारित्रिक अंतर नहीं।

लोकतंत्र में मूलभूत आदर्श प्रबल होना चाहिए। राजकीय व शासकीय मानसिकता को लोकतंत्र का नाम देने तथा शास्त्रों में, दस्तावेजों में, भाषा में, तर्कों इत्यादि में लोकतंत्र-लोकतंत्र की रट लगाने से लोकतंत्र को झुठलाया ही जाता है। वास्तविक लोकतंत्र का मूलभूत आदर्श, लोकविश्वास के आधार पर नीतियों को स्थापित करते हुए राज्य-शासन को कम करते हुए शासन मुक्त समाज की स्थापना व मनुष्य का परिष्करण करने के वृहद अवसर उपलब्ध कराना है।

विनाश को केवल और केवल वही लोकतंत्र रोक सकता है जो अहिंसा, सामाजिक समता व कल्याण को अपनी दीर्घकालिक नीति मानेगा, इसी के अनुरूप अपने आर्थिक, प्रशासनिक व राजनैतिक ढांचे बनाएगा। अभी तक की पद्धतियों में सबसे बेहतरीन पद्धति लोकतंत्र है। पुरानी क्रांतियों को व्यवस्थित या ऊटपटांग तरीकों से दोहराया जाना औचित्यहीन है। मूलभूत बात है मानवीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति व रचना “अहिंसा” को जानने, समझने, स्वीकारने व प्रमाणिकता में जीने की। सत्य के आग्रह के साथ अहिंसा को समझना, स्वीकारना व प्रमाणिकता में जीना। मैं गांधी को मानवीय इतिहास के लिए इसीलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण व दृष्टा व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे मानवीय लोकतंत्र के दृष्टा थे, उनकी अहिंसा सत्य के निकट थी व स्वअनुशाषित थी।

मैं साम्यवाद, माओवाद पूंजीवाद, लोकतंत्र आदि विषयों पर गहरी व विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में नहीं करना चाहता क्योंकि इस पुस्तक का मुख्य विषय बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन के लिए रचनात्मक प्रयास हैं, पुस्तक अपने मूल विषय से भटक जाएगी। संक्षिप्त रूप से जितनी भी चर्चा इन विषयों पर प्रस्तावना अध्याय में हुई, आशा करता हूं कि उससे आपको यह महसूस हो रहा होगा कि मुझे साम्यवाद, माओवाद, क्रांति, परिवर्तन, पूंजीवाद आदि की समझ है, साथ ही यह पुस्तक रचनात्मक समाधान का प्रशस्तिगान करती हुई प्रतीत न हो, वरन् वस्तुस्थिति व रचनात्मक समाधान के प्रयासों को समझने में उपयोगी हो ताकि आप भी अपना योगदान सुनिश्चित करने की ओर मनन कर सकें, निर्णय ले सकें।

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9 Responses to बस्तर, छत्तीसगढ़ पर आने वाली पुस्तक का प्रस्तावना अध्याय

  1. Rohatas singh rana says:

    गूढ़ विषय का सटीक सामान्यीकरण ,समझ में आने वाली सीधी बातें , बहुत सटीक पकड़ है आपकी विषय पर,गहरे जड़ों तक पहुंचे हैं I इससे बेहतर क्या कहा जा सकता है कि “भविष्य अनिश्चित होता है। काल्पनिक भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाना प्रपंच, तर्क-छद्म व प्रवंचना से इतर कुछ भी नहीं।” नवीन साधना युक्त सृजन की बधाइयां i

  2. आमिर says:

    सटीक एवं निष्पक्ष । इसको पढ़ कर आने वाली किताब को पढ़ने की इच्छा औऱ बढ़ गई । शुभकामनाएँ ।

  3. महेश सिंह says:

    बहुत उम्दा विश्लेषण ☺ किताब के बारे में जिज्ञासा प्रबल हो गयी। माओवाद का इतन स्पष्ट विवेचन पहले नबी पढ़ा। कुछ पंक्तियाँ तो सुनहरे शब्दों में लिखे जाने लायक हैं । जैसे काल्पनिक भविष्य लिए वर्तमान को बलि ——–। बहुत शुभकामनायें ।।

  4. Wasim Meo says:

    इसको पढ़ कर आने वाली किताब को पढ़ने की इच्छा औऱ बढ़ गई । शुभकामनाएँ

  5. Ruman says:

    Acha wishleshan hai, kioki tarkik hai. Armed struggle zarurat padne per zaruri hota hai, lekin apni bat manwane ke leay hatiar uthana fasiwad hai, mauwadi fasiwad ka hi Ek chehra hai.

  6. Nishant says:

    वर्तमान में हत्याएं , बलात्कर, लोगों को डरा कर, शोषण करते हुए काल्पनिक भविष्य के लिए खुद भी नरकीय जीवन जीना और बाकी लोगों के जीवन को भी आसान न होने देना । उन लोगों के चेहरे भी पहचाने जाने चाहिए जो इन्हें बढ़ावा देते है , सिस्टम और इनके बीच दलाल का काम करते है आदिवासियों के नाम से ग्रांट उठा कर इन्हें फंडिंग पहुँचाते है, क्रांति के नाम पर स्थानीय लोगो से पैसा वसूलने का काम करते है । मतलब सत्ता बना भी ले तो क्या करेंगे रातों रात सब ठीक हो जायेगा या ठीक करने के क्रम में केवल माओवादी ही बचेंगे और जब केवल ये बचेंगे तो इनके अंदर की हिंसा , कुंठाएं एकाएक खत्म हो जाएँगी ।
    एक और मानवीय विडंबना से एक दम साफ़ साफ़ रुबरु कराने और जीवन को समझने में मदद करते रहने के लिए धन्यवाद
    सादर।

  7. Pingback: Book on Bastar, Chhattisgarh – constructive efforts for conflict resolution : Prologue (English translation) | Ground Report India

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  9. Krishna Sharma says:

    विवेक जी आपको बहुत समय से पड़ता आ रहा हूँ फेसबुक पर आज आपके इस GRIO पर आना हुआ आपकी बुक की प्रस्तावना पढ़ी बहुत ही निष्पक्ष लिखा है आपने धन्यवाद ।

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