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  • इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

    इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है…!

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    बहुत साल पहले की बात है। उन दिनों में स्कूली छात्र था और कम्युनिस्ट शब्द पहली बार कानों में पड़ा था। यह शब्द प्रयुक्त किया था एक सरदार साहेब ने, जिन्हें मैं नानाजी कहा करता था।

    वे दिखने में साधु जैसे थे, क्योंकि वे सिख वेशभूषा में रहने के बावजूद बालों को अक्सर खुला रखा करते और गले में होती सफेद मोतियों की एक सुंदर माला। घर में कारें-जीपें बहुत थीं, लेकिन मेरे बाबा से मिलने के लिए वे घोड़े पर आते थे। दोनों की दोस्ती की वजह घोड़े, उपनिषद चर्चा और सिख-इस्लाम या दार्शनिक विषय हुआ करते थे। वे उपनिषदों की बहुत सी कहानियां बड़े ही रोचक ढंग से सुनाया करते थे।

    मैं अभी उनका नाम भूल गया हूं, लेकिन वे बानियावाला गांव से आया करते थे। उस गांव के सरदार मस्तानसिंह मुझे आज भी बहुत याद हैं। गांव का नाम बानियावाला था, लेकिन गांव पूरी तरह सिखों का था। उस गांव में मैंने कभी कोई बानिया नहीं देखा। बानिया यानी बनिया। यह गांव कई कारणों में मेरे दिलोदिमाग़ में है। वह सरदार साहब ही थी, जिन्होंने मुझे छठी कक्षा में “भोजप्रबंध” लाकर दिया था और कहा था कि मैं इसे कंठस्थ कर लूं। कपड़े की ज़िल्द और ख़ास गंध वाले पीले पन्ने वाली वह किताब आज भी हमारे घर की थाती है।

    “भोजप्रबंध” संस्कृत साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति है। यह लोककवि बल्लाल की अनुपम रचना है। इसमें राजा भाेज की राजसभा के बहुत से सुंदर और सम्मोहक कथानक हैं। यह कृति बताती है कि शासकों को क्यों साहित्य में पारंगत होना चाहिए। लेकिन एक विद्या व्यसनी किसान सिख को जब मैं इस तरह देखता था तो ऐसा लगता था कि किसी पुराने कालखंड से कोई ऋषि चला आया है।

    इस ग्रंथ का वह श्लोक मुझे आज भी कंठस्थ है, जिसमें राजा भोज ने टटं टटंटं टटटं टटंटम् बोला और कालिदास ने समस्यापूर्ति यों की : राजाभिषेके मदविह्वलाया, हस्ताच्युतो हेमघटो युवत्या:; सोपानमार्गेषु करोति शब्दं टटं टटंटं टटटं टटंटम्!

    ख़ैर, बातचीत चल रही थी, कम्युनिज्म की। मेरे बार-बार प्रश्नों पर वे समझाने लगे : जैसे ये आंगन है। ये वेहड़ा है। तुहाडा ते साडा खेत है। ए घोड़ेे ऐं। ए मज्झां ते गाइयां ऐं…ये सबके सांझे हैं। मेरे बात पल्ले नहीं पड़ी। मुझे ये लगता था कि पूरे गांव का सब कुछ साझा ही है, क्योंकि हमारे घर से दूध और मक्खन मेरे दोस्त आकर ले जाते हैं और मैं किसी भी घर से जाकर गन्ने, फल और सब्जियां ले आता हूं या दे आता हूं। हमारा खेत दूर था। इसलिए चार क्यारे लूसण और दो क्यारे बरसीम पड़ोस के किसी खेत में बो लेते थे। बाबा ने कई लोगों को साथ लेकर आंदाेलन चलाया और गांव में स्कूल खुल रहा था; लेकिन वह बना उस जगह जो पांच-छह गांवों के बीच समान दूरी पर थी।

    लेकिन मुझे उनकी एक बात बहुत आसानी से समझ आ गई : सभी रिश्ते बहुत साफ़ सुथरे और इनसाफ़ की बुनियाद और न्याय की अाधारशिला पर टिके होते थे। (हां-हां, दोनों का मतलब एक ही होता है!) लेकिन वे ऐसे ही बोला करते थे। वे आैम प्रकाश चौटाला की तरह, लेकिन चौटाला से भी बहुत पहले से “यक़ीन, भरोसा और विश्वास” बोला करते थे। हर किसी से योग्यता और क़ाबिलियत के अनुसार काम और हर किसी को उसकी ज़रूरत और अावश्यकता के अनुसार पैसा। अब तुम चाहो तो मेहनत-मज़ूरी कर लो और चाहो तो हवाई जहाज उड़ाओ या फिर किताबें लिखो। कालिदास बनकर समस्या पूर्ति करो। मेरे ये बात बिलकुल पल्ले नहीं पड़ी। उनके शब्द आज भी वैसे के वैसे याद हैं।

    आख़िर में उन्होंने समझाया : देखो, मान लो तुम चार भाई हो। सब काम करेंगे अपनी क़ाबिलियत और जुगत से, लेकिन जो खेत में होगा, वह सबको बराबर मिलेगा। इस तरह वे कई चीज़ें समझा रहे थे। यह सही है कि न तो वे कम्युनिस्ट थे और न ही मेरे बाबा। न ही मैं कभी कम्युनिस्ट बना और न ही सरदार साहब की संतानें। सबके भीतर पता नहीं कौन कौन आवाज़ें लगाता है। लेकिन कभी किसी सांप्रदायिक, मताग्रही, जातिवादी या राष्ट्रवादी को उन्होंने न पसंद किया और न कभी अपने आसपास फटकने दिया। कई संकीर्ण मुल्ला-मौलवियों, पंडितों-ज्योतिषियों, मिशनरियों, ग्रंथियों आदि से दो-दो हाथ करते ही देखा। हमारी रगों में भी वही लहू बहुत जीवंत होकर बह रहा है।

    लेकिन कुछ समय बाद जब उन सरदार साहब की मां का देहांत हुआ तो मैं भी बाबा के साथ घोड़े पर बैठकर गया। उस दिन वे बोले : बेटा, आज तेरे उस दिन वाले प्रश्न का उत्तर मेरे पास बहुत ज़ोरदार है। हर मां होती है सच्ची कम्युनिस्ट! तुम मां को समझ लो तो कम्युनिज्म समझ आ जाएगा। देख, मैं नकम्मा (निकम्मा) कोई काम नहीं करता। सारा दिन वेहला (बेकार) घूमता रहा। किताबें पढ़ता। साधु बना। मेरे भाई खेत में खटते। लेकिन मां ने सदा सबको एक जैसी रोटी दी, मक्खन में लिबड़-लिबड़ के। सरों का साग दिया घ्यो से तर करके। मैंनूं भी वही दूध का बड़ा छन्ना और खेत में खटने वालों को भी वही सब। एक जैसा पैसा, एक जैसा प्यार।

    वे बोले : हमारे घरों में जो जमाईं ऊंचे पदों पर थे उनको भी वही शगुन और सम्मान दिया। जैसा उनको वैसा ही सरीके-कबीले के कम पढ़े लिखे दामादों को। सबके साथ बराबर। एक भाई ने बड़ी पैळी (खेत) बना ली और एक के पास कम रही तो भी मां के लिए दोनों बराबर रहे। न प्यार में फर्क, न दूध के गलास में और दही के कटोरे में। मुझ नकम्मे को अगर मक्खन बिना रोटी चंगी नहीं लगती थी तो वह हमारे बड़े भाई के हिस्से का भी मक्खन हमें देती थी।

    वे कह रहे थे : और वेखो तुम, तुम्हारी मां भी ऐसी ही होगी और तुम्हारे प्यो की मां भी वैसी ही हाेगी। मां की मां भी और दुनिया की हर मां। हर मां की नीति fairest of all principles होती है : from each according to his ability, to each according to his needs! एबिलिटी के अनुसार काम और ज़रूरत के अनुसार अवदान!

    और कमाल वेखो : मां के इस फै़सले पर न कभी बाप की घुड़की चली और न कभी ताए की गालियां कुछ कर पाईं! बाप तो पूरी हिटलरशाही चलाता है। एक ही घर हिटलरशाही भी तब कुछ ठीक कर पाती है अगर मां का कम्युनिज्म साथ हो। मां भी अगर हिटलर हो जाए तो फिर आंगन का तो हिरोशिमा बनना तय ही है, वेहड़ा भी नागसाकी हो ही जाऊगा!

    वे बोले : देख, घर से मां चली गई, कम्युनिज्म चला गया! बस हिटलरशाही रह गई। वह रुआबदार आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूंज रही है आैर सिख वेशभूषा के कारण उनका ऋषितुल्य चेहरा मेरी आंखों के आगे जीवंत हो जाता है। मानो, वे कह रहे हों : कम्युनिज्म चला गया, मां चली गई! (कम्युनिज्म का अर्थ यहां सीपीआई-सीपीएम आदि के शासन से नहीं लगाया जाए। जैसे कि आरएसएस ब्रैंड विचारधारा या इस्लामिक फंडामेंटलिस्ट या भोलेभाले लोगों को ठगने वाले ईसाइयों की गतिविधियों को हम धर्म नहीं कह सकते।)

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  • अगर आप किसी एक राजनीतिक दल के खेमे में हैं, उसकी ग़लतियों का महिमामंडन करते हैं और ठीक वैसी ही ग़लती पर विरोधी का उपहास उड़ाते हैं तो आप में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिसे लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है।

    अगर आप किसी एक राजनीतिक दल के खेमे में हैं, उसकी ग़लतियों का महिमामंडन करते हैं और ठीक वैसी ही ग़लती पर विरोधी का उपहास उड़ाते हैं तो आप में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिसे लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है।

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    इस समय देश में तीन तरह के नागरिक हैं।

    एक वे जिन्हें जो कुछ कर्नाटक में हुआ, वह बहुत अच्छा लग रहा है। ये सबके सब या तो कांग्रेसी माइंडसेट के लोग हैं या फिर भाजपा के विरोधी लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचे लोग हैं।

    एक वे जिन्हें वह अच्छा लगा, जो बिहार, गोवा, मेघालय, जम्मू और कश्मीर में आदि में हुआ और उन्हें सिर्फ़ कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस का सरकार बनाना बुरा लगा, ये भाजपा और आरएसएस के लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये भी सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचा लोग हैं। इनका भी अपना कोई विवेक नहीं हैं आैर इनकी हालत हांकी जा रही भेड़ाें से कुछ अलग नहीं है, जैसा कि बिलकुल ऊपर की श्रेणी वाले लेागों के साथ है। इसमें आप दिल्ली की आम आदमी पार्टी, बहन मायावती की बसपा, वामपंथी दलों या अकाली मित्रों या अन्ना-वन्नाद्रमुक किसी को भी ले शामिल कर सकते हैं। कोई और भी दल संभव है। आरजेडी, जेडीयू, जेडीएस आदि आदि। कोई भी। सबके सब।

    इस समय देश को एक तीसरी तरह की श्रेणी के लाेगों की ज़रूरत है। जो ग़लत को ग़लत और अनैतिक को अनैतिक कह सकें। ये देश में न के बराबर लोग हैं। अगर हमें अपने देश और देश की व्यवस्था को अच्छा बनाना है तो इस श्रेणी में हमें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की ज़रूरत है। चमचे बनो तो देश के बनो। मानवता के बनो। इस धरती के बनो। राजनीतिक व्यवस्था में अनैतिकता, झूठ-फ़रेब और आपराधिक मानसिकता से वर्चस्व स्थापित करके सत्ता हासिल करने वाले लिप्सुओं के पीछे देश को बर्बाद करने के षडयंत्र में क्याें शामिल हो रहे हो?

    अगर राजस्थान में 51 साल पहले लोकतंत्र को प्रहसन बना देने वाली कांग्रेस आपके सामने है तो गोवा, बिहार, मेघालय और कर्नाटक में लोकतंत्र का चीरहरण करने वाली भाजपा भी आपके सामने है। क्या इनमें कोई फ़र्क है?

    अगर पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें पांच साल पहले बढ़ना ग़लत था तो वह आज भी है। अगर किसानों की दुर्दशा के लिए दस साल पहले प्रश्न उठ रहे थे तो वे आज भी उठने चाहिए। अगर पंद्रह साल पहले नोटबंद करना देश के साथ खिलवाड़ करना था तो वह आज भी है। अगर आज से बीस साल पहले किसी आतंकवादी घटना पर हमें सरकार बिना रीढ़ और बिना हड़डी की एक कमज़ोर अनैतिक लगती थी तो वह आज भी है। आख़िर ऐसा क्या है कि हम नागरिकों की बुद्धि में कोई राजनीतिक दल या कोई विचारधारा ऐसा इंजेक्शन लगा देती है कि आपके या हमारे विवेक और राज्यपाल के विवेक में कोई फ़र्क नहीं रह जाता? और आप ऐसा आचरण करने लगते हैं, मानो आप किसी के खिलौने, किसी की कठपुतली या किसी मदारी के सिखाए हुए बंदर हों! क्या ऐसा होना चाहिए। ऐसे जितने भी मेरे मित्र या बंधु हैं, सबसके सब ज़हीन और जीनियस हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वे किसी के अनचाने या अनचाहे ही दुष्टतापूर्ण कामों के प्रशंसक बन जाते हैं।

    आओ, मित्रो, हम सब देश के सजग नागरिक बनें, तटस्थ रहें और ग़लत को ग़लत कहें। अगर हम में यह साहस नहीं है और हम किसी एक के खेमे में हैं तो हम में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिस लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है। और हां, याद रखें कि भेड़ तो भेड़ है। उसे कुदरत ने बनाया ही वैसा है। लेकिन आपको तो प्रकृति ने एक बहुत बेहतरीन मस्तिष्क और एक अतुलनीय हृदय दिया हुआ है, जिसे अच्छे और बुरे की पूरी पहचान करने की क्षमता से आपूरित किया गया है। और फिर भी आप बहुत गर्व के साथ किसी खेमे की भेड़ बनना पसंद करते हैं तो यह जानना दिलचस्प होगा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

    और अगर आप शिक्षक, वकील, पत्रकार, लेखक, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश आदि में से कुछ हैं तो यह और भी शर्मनाक है।

    क्षमा करें, मुझे यह कड़ी भाषा इस्तेमाल करने की इज़ाज़त अपनी भारत माता से मिली हुई है।

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  • बलात्कारी को आख़िरी सांस तक तड़पाओ, लेकिन पीड़िताओं को उनकी खनकती भोर लौटाने की व्यवस्थाएं किए बिना आपके कानूनी संशोधन धूल हैं!

    बलात्कारी को आख़िरी सांस तक तड़पाओ, लेकिन पीड़िताओं को उनकी खनकती भोर लौटाने की व्यवस्थाएं किए बिना आपके कानूनी संशोधन धूल हैं!

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    इस धरती पर मानवता के ख़िलाफ़ जितने भी घृणित अपराध हैं, उनमें बलात्कार सबसे घिनौना और भयानक है। इसके ख़िलाफ़ अभी भारत सरकार ने जो कानून बनाया है, उसके एक हिस्से को पढ़ें तो लगता है कि हमारी सरकारों में संवेदना नामकी कोई चीज़ ही नहीं है। क्या किसी 30 साल या 40 साल की महिला के लिए बलात्कार 20 साल की उम्र से कुछ कम पीड़ादायी है? बलात्कार बलात्कार है और यह समान रूप से घृणित है। क्यों कानून बनाने वाले हमारे नेता बलात्कार को महिला की उम्र के हिसाब से टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटते हैं? वे क्यों भूल जाते हैं कि सबसे ज्यादा बलात्कार की शिकार महिलाएं 16 से 45 साल की उम्र की होती हैं और आत्मा की कराहों में उम्र से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, बशर्ते नन्हीं बच्चों को अलग रखें।

    ये ठीक है कि हम सुकुमार बच्चियों के मामले में फांसी का प्रावधान करने जा रहे हैं, लेकिन 16 या 20 साल की उम्र के मामले में सज़ा को 10 साल और 20 साल में करने से हमारी सरकार के राजनेताआें और विधिवेत्ताओं की हृदयहीनता और अदूरदर्शिता साफ़ दिखती है। वे यह क्यों भूल जाते हैं कि बलात्कार की शिकार महिला अपने त्रासद दु:ख को भूलने की कोशिशें करते हुए या तो कोमा में चले जाना पसंद करती है या फिर ऐमनेशिया की शिकार होना। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक बलात्कार पीड़िता निर्णय होेने तक झूठी ही मानी जाती है, जबकि न्यायाधीश के फ़ैसले में अपराधी ठहरा दिए जाने से पहले तक बलात्कार का अपराधी निर्दाेष या फिर आरोपी ही माना जाता है।

    किसी भी महिला के जीवन में यौवन के दिन एक खनकती भोर लेकर आते हैं। लेकिन घृणित मानसिकता वाले अपराधी उसके जीवन के सबसे सुखद क्षणों को रौंद डालते हैं। हमारी संस्कृति में आए दिन बच्चियों को शिक्षाएं दी जाती हैं, लेकिन लड़कों को सुसंस्कारवान बनाने की तरफ़ लोग ध्यान नहीं देते हैं। इसीलिए तो बलात्कार तरह-तरह से होता है। शारीरिक न सही, वह मानसिक भी होता है। हम देखते हैं कि बलात्कारी मानसिकता कभी आंख से, कभी हाथ से, कभी जिह्वा से और कभी कानून और संहिताओं के सहारे से बलात्कार करती है। कभी वह धर्म और जाति का सहारा लेती है तो कभी पद और प्रभाव का।

    कई बार तो यह भी होता है कि महिला को ही दाेषी ठहरा दिया जाता है। वे कहते हैं, आपने पारदर्शी वस्त्र पहन रखे थे। या उन्होंने पी रखी थी या फिर ड्रग्स ले रखी थीं। वे इसलिए रेप का शिकार हो जाती हैं कि वे पर्याप्त सावधानी नहीं बरततीं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि बलात्कार इसलिए होता है, क्योंकि कोई बलात्कारी होता है। यहां तक तर्क दिया जाता है कि यौनाकर्षण वाला सौंदर्य बलात्कार को जन्म देता है। लेकिन पिछले कुछ साल से बालिकाओं से बलात्कार की घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर डाला है। ऐसा लगता है कि हम एक अंधे कुएं पड़े समाज हैं और हमारी संस्कृति और सभ्यता किसी नींद में सोई हुई है। हमारे हौसले पस्त हैं और हमारे दिलोदिमाग़ में खामोश चीखें भर गई हैं। अपराधियों में न शासन का भय है और न ही पुलिस का ख़ौफ़। अपराधी किसी बालिका को निधड़क ले जा सकता है, क्योंकि हम बच्चियों से बचाने से ज़्यादा गाय को ले जा रहे व्यक्ति को मारने में दिलचस्पी रखते हैं और गाय वैसी की वैसी और उतनी ही तादाद में सड़कों पर भूखी रंभाती रहती है।

    यह देश ही ऐसा है। यहां न गाय के लिए कोई ठौर ठिकाना है और न ही बेटियों के लिए। ख़ासकर गु़रबत में जी रहे लोगों की हालत तो एक जैसी है। हमारी सरकारों के होश गुम हैं और बांहों का दम एकदम खत्म है। हम उनींदी आंखों वाले लोग सोए हुए पांवों के साथ कानून बनाते हैं और बलात्कारी को फांसी दिलाने की बातें करते हैं, लेकिन हमारी व्यवस्था की लौ इतनी बुझी हुई है कि बलात्कार के मामले की एफआईआर तक दर्ज नहीं हो पाती। हमारी राजनीतिक पार्टियां और सरकारें एक नुमाइशी व्यवस्था सजा कर बैठी हैं और ऐसा आभास देती हैं कि वे एक मंतर फूंकेंगी तो सब कुछ बदल जाएगा।

    ये इस पीड़ा को समझने को ही तैयार नहीं है कि बलात्कार के बाद पीड़िता को जिस आंसू, सिसकी, पीड़ा, अवसाद, प्रतिहिंसा और आत्महीनता के मिलेजुले नारकीय लैबरिंथ से निकलना पड़ता है, वह एक बहुत जटिल, मुश्किल और असहनीय प्रक्रिया है। क्या इस पीड़ा के बाद किसी अपराधी को फांसी पर चढ़ा देने से भर से आप किसी महिला या बालिका को वैसा का वैसा जीवन दे सकते हैं? क्या वही हंसी उसके भीतर गूंजेगी? क्या उसकी रगों में दौड़ते लहू में थिरकने की आवाजें उसी तरह आएंगी? क्या वह फिर वैसी चुहल कर पाएगी?

    कई बार तो ऐसा होता है कि सरकारें और व्यवस्थाएं खुद बलात्कारों का आयोजन करती हैं। युद्ध क्या हैं‌? बार-बार सेना और अर्धसैनिक बलों का लगाया जाना क्या है? जहां सेनाएं और अर्धसैनिक बल तैनात होते हैं, क्या वहां बहुत ही सुनियोजित तरीके से बलात्कार नहीं करवाए जाते हैं? क्या इसीलिए स्थानीय समाजों में इन बलों के प्रति प्रतिहिंसा और घृणा के भाव नहीं होते हैं? दुनिया का कौनसा हिस्सा इस तरह के घृणास्पद पापों से बचा है?

    लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि पीड़िताएं चुप रह जाएं? बलात्कार जिस पावर के बल पर होता है, दरअसल यह लड़ाई उस पावर के ही खिलाफ़ है। बलात्कार करके अपराधी भी तो पावर ही दिखाता है। बलात्कारी से तो कोई महिला बचकर भी भाग सकती है, लेकिन जब बल एकत्र होकर सुनियोजित नृशंसता दिखाता है तो यह त्रासद कोरस होता है।

    मेरा प्रश्न इतना सा है कि बलात्कारी को फांसी देने के बजाय उसकी आखिरी सांस तक नारकीय ढंग से सड़ाया जाना चाहिए, क्योंकि किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह किसी अन्य को ऐसी पीड़ा पहुंचाए। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि हमारी सरकार पीड़िता के लिए कोई ऐसी व्यवस्था करे, जिससे वह अपनी पीड़ा और त्रासद अनुभव को विस्मृत कर सके। उससे मुक्त हो सके। वह अवसाद के भंवर से बाहर निकल सके। वह ऐसा जीवन जिए कि कभी भी उसकी यादों की तहों में दर्द का कोई कांटा न उगे। उसे एक खुला और हवादार जीवन मिले। उदासियां उसकी हदों से दूर रहें। वह एक अच्छे जीवन के तारों तले झूम सके और अपनी उमंगों को लहरा सके। वह प्रसन्नताओं के समंदर में डुबकियां लगा सके और जब मन चाहे तो दमकती रेत पर जिजीविषा की रेत में अपनी आत्मा को सेक सके।

    हर पीड़िता को हक़ और अधिकार है कि वह खनकती भोर को अपने भीतर फिर लौटा सके। और इसका एक मात्र तरीका यह है कि उसके जिस्मानी घावों के साथ-साथ उसकी आत्मा पर लगे अनचीन्हे घावों पर प्रेम की मरहम लगा सकें। हम प्रेम की ऊष्मा के बिना यह सब प्राप्त नहीं कर सकते।

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  • नरेंद्र मोदी : विरोधी इस बंदे की ताक़त और अंधभक्त इसकी कमज़ोरियों को खुली आंख से देखें –Tribhuvan

    नरेंद्र मोदी : विरोधी इस बंदे की ताक़त और अंधभक्त इसकी कमज़ोरियों को खुली आंख से देखें –Tribhuvan

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    लंदन में चोगम सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रसून जोशी वाले कार्यक्रम को लेकर पूरी दुनिया में फैले भारतीयों के बीच ख़तरनाक़ बहस चल रही है। इससे पहले मोदी को चाहने वाले इकतरफ़ा मो:दी-मो:दी का समवेत गुंजार करते थे। अब मोदी के विरोधियों का स्वर भी बहुत प्रबल हो गया है; लेकिन एक चीज़ है कि मोदी के विरोधी मोदी की ताक़त और मोदी के भक्त मोदी की कमज़ोरियों को नहीं भांप रहे।

    मोदी विरोध का स्वर जब से मज़बूत हुआ है, राहुल गांधी भी उन्हें बांहें ऊंची करके चुनौती देने लगे हैं। लेकिन राहुल जी, एक बात समझने की है कि ये बंदा नरेंद्र मोदी है, न तो राजनाथ सिंह और न ही सुषमा स्वराज है। न यह अटल बिहारी वाजपेयी है और न ही लालकृष्ण आडवाणी। ये सबके सब राजनीति के उसी फ़ील्डक्लब के मेंबर थे, जिसमें आपकी कांग्रेस और उस जैसी अन्य पार्टियाें के लोग थे।

    मोदी को चुनौती दीजिए, लेकिन पहले मोदी को ठीक से समझ तो लीजिए। मोदी के सामने तुम नहीं हो यार। तुम सुरक्षा कर्मियों के हाथों में पल बढ़कर बड़े हुए हो। जहां पुलिस होती है, वहां भय ही होता है। निर्भीकता नहीं होती। खिलंदड़ापन नहीं हो सकता। इसीलिए तुम एक ऐसी भाषा और ऐसे अंदाज़ में मोदी का विरोध करते हो, जो जनपथ और अकबर रोड के कुछ ख़ास अहातों के गमलों में उगाई और आप तक पहुंचाई जाती है।

    यह भाषा आम हिन्दुस्तानी की भाषा नहीं है। आपके हावभाव भी आम भारतीय नागरिक के नहीं हैं। केवल कुर्ता और पायजामा पहन लेने से भर से आप ऐसे नेता का सामना नहीं कर सकते, जिसने घाट-घ्राट का पानी पिया हो। आपने बचपन से छान-छान कर ठाठ किए हैं और वह आग के दरियाओं को पार करके गांव की गलियों के गंदे और गलीज़ कहे जाने वाले जांबाज़ लड़कों के लड़ भिड़कर तरह-तरह के इम्तिहान में पास होकर निकला है।

    दरअसल राहुल बाबा, तुम समझते हो कि अब इस देश के विपक्ष की राजनीति में वही भाषा काम आएगी, जो आज तक आती रही है। तुम्हें तुम्हारे रायबहादुर (राय देने वाले बहादुर लोग) समझाते हैं कि मठों और मंदिरों में जाने से सत्ता की राह निकल आएगी। राह नहीं तो कोई पगडंडी ही मिल जाएगी। लेकिन यह ऐसे हाईवेज का जमाना है, जिसमें आगे की गाड़ी इतनी स्पीड से चलती है कि पीछे वाली उसे क्रॉस नहीं कर पाती।

    अब न तो अटल बिहारी का ज़माना है और न ही लालकृष्ण आडवाणी का। अब न तो वह संघ है और न ही वह भाजपा है। ये सबके सब राजाओं के जमाने से कार्पोरेट कलेवर में आ चुके हैं और अब कंपनी संस्कृति से सब चल रहा है और तुम हो कि अभी बाबा आदम के ज़माने वाली राजनीति का टटुआ दौड़ा रहे हो।

    तुम्हारा कांग्रेस संगठन दीमक लगे काठ का ऐसा घोड़ा है, जो लोहे की जंग लगी लगाम चबा रहा है। क्या इसके सहारे तुम मोदी का मुक़ाबला करोगे? यह जो मोदी है, वह अलग तरह का नेता है।

    यह सिर्फ़ प्रधानमंत्री नहीं है। यह सिर्फ़ भाजपा का नेता भर नहीं है। यह पट्‌ठा सियासी ज़मीन का पुराना कसरती है। यह दिल्ली के सब नेताओं से ज़्यादा ज़मीनी और ज़्यादा यथार्थवादी है। तुम भले इसे ज़्यादा शिक्षित मत मानो और तुम्हारी कांग्रेस के प्रति अप्रकट भक्ति वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी या वामपंथी-प्रगतिशील खेमे के लोग इसका उपहास उड़ाएं, लेकिन यह बंदा बहुत ज़्यादा शिक्षित नहीं होने पर भी दिल्ली में रहकर जंग खा चुके भाजपा और कांग्रेस सहित सभी दलों के नेताओं से कहीं अधिक तत्पर, संलग्न और कटिबद्ध है।

    यह दिल्ली या किसी प्रदेश की राजधानी के ऐश्वर्यशाली घर में पैदा हुआ लड़का नहीं है। यह राजनीतिक चांदनी वाले घरों के निर्जन आंगन में तुम्हारी तरह पला-बढ़ा राजकुमार भी नहीं है। यह सुदूर भारत के ठेठ गांव की गंदी और बदबूदार गलियों में पैदा हुआ, खेला-कूदा और सुलगते अभावों में गुलिस्तान ढूंढ़कर आगे बढ़ा लड़का है।

    यह शोलों, धुएं के बादलों और रुला देने वाली नाकामियों के बीच पला-बढ़ा है। इसका बचपन तपती बालू वाली धरती पर नंगे पांव गुजरा है। यह तुम्हारी तरह चांदनी बिछे आंगन के गमले में नहीं उगा है।

    यह हम आम हिन्दुस्तानियों के लालच को भी जानता है और साहस को भी। भारत की धरती के कोने-कोने की ख़ाक़ छान चुका यह कल का प्रदेश स्तरीय नेता आज का विश्वस्तरीय नेता बनने के दिवास्वयं बेच रहा है। यह बहुतेरे लोगों को ढिठाई से भरा भी दिखता है, लेकिन असल में यह बहुत ज़्यादा धैर्य की आधारशिला पर खड़ा एक वक्र व्यक्तित्व है। यह चिंताओं के कोहरे से भी घिरता है तो अपने लिए चांदनी से चिना एक मकान तलाश लाता है।

    आप अपनी घोर निष्क्रिय राजनीति की मुंडेर पर इसे जब धुएं की लकीर बनता देखते हैं तो यह अगले दिन शोला बनकर आप पर टूट पड़ता है। आप हों या वामपंथी, समाजवादी या फिर अन्यान्यपंथी, सबके सब अपने-अपने विचारों और अपने संगठनों के जंग को सहलाते हुए आंदोलनहीनता के कारण अपने चंद्रमाओं को अंधेरों में डुबोते हैं और इसका दुस्साहस देखिए कि यह बेवफ़ाई भी बहुत मज़े से करेगा और इम्तिहान से निकल जाएगा। यह जिस मेहरबान से काम निकालेगा, उसका दुश्मन भी हो जाएगा और भूतपूर्व मेहरबान को अपना हमदर्द बने होने के भ्रम में भी डाले रखेगा।

    यह हर दिन एक नया भ्रम पैदा करता है। यह अच्छी तरह जानता है कि इस देश का आम भारतीय कितना भोला-भाला है और उसका सियासी टटलू कैसे काटा जा सकता है! कैसे किसी हिन्दुस्तानी को पीली परत चढ़े पीतल को सोने की ईंट बताकर बेचा जा सकता है। लेकिन तुम्हें तो पगले अभी यही पता नहीं कि टटलू काटना कहते किसे हैं और यह टटलू काटने का उस्ताद है। यह राजनीति का बहुत मंजा हुआ खिलाड़ी है।

    भारतीय समाज मानता है कि जो पांडे जी के पांचों वेदों में, वह पंडाइन की छिगुनिया में! और यह तो भोले बंदे पंडाइन की छिगुनिया क्या, पूरी की पूरी पंडाइन को भी छिका-छुकूकर कलंदर हो गया।

    इसलिए दोस्त, न कांग्रेसियों के चक्कर में पड़ और न विदेशी पॉलिटिकल मैनेजरों के भुलावे में आ। अकबर रोड से फटाफट फूट ले और एकलव्य बनकर इसी से कुछ सीख ले। अंगूठे-वंगूठे तो कटते रहते हैं। इस मोल में हाथ भी कटे तो महंगा नहीं! यह बहुत कम पढ़ा लिखा है, लेकिन गुणा बहुत है। हालांकि न तो इसने और न तूने कभी अमीर मीनाई को पढ़ा होगा, लेकिन इस बंदे ने अभी घाेर विरोध के दिनों में अमीर मीनाई की ग़ज़ल के उस शेर को बहुत शानदार ढंग से सही साबित किया है कि : कौन सी जा (जगह) है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं, शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर!

    सच कह रहा हूं, सीख ले उससे कुछ कि कातिल भी बनो तो मरने वाले को यह एहसास करा दो कि यह खून आलूदा मिट्‌टी नहीं, उसे रचाने के लिए लाई गई मेंहदी है!

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  • मंदिरों में व्यभिचार की घटनाएं देखकर उस वैदिक साधु ने तान दी थी विरोध के धनुष की प्रत्यंचा और ढेर कर दिया था अध्यात्म की गरिमा के हंताओं को

    मंदिरों में व्यभिचार की घटनाएं देखकर उस वैदिक साधु ने तान दी थी विरोध के धनुष की प्रत्यंचा और ढेर कर दिया था अध्यात्म की गरिमा के हंताओं को

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    लोग उसे स्वामी विवेकानंद की तरह प्रेम नहीं करते, क्योंकि वह विदेशी भाषा में विदेशी लोगों को प्रसन्न करने के लिए विदेशी धरती पर नहीं गया था। उसे जब केशवचंद्र सेन ने कहा कि आप विदेश होकर आ जाएंगे तो भारत में आपको अपार सम्मान मिलेगा तो उसने कहा : पहले मैं अपने घर का अंधेरा दूर कर लूं। समय बचा तो वहां भी जाऊंगा। यह विचित्र साधु कोई और नहीं, दयानंद सरस्वती था। कबीर और मार्टिन लूथर के बाद यही साधु इस धरती पर हुआ, जिसने धार्मिक पाखंडों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। और साबित किया कि किस तरह मंदिर और मूर्तियां देश के पतन का कारण बन रही हैं।

    वह इस देश के कोने-कोने में घूमा। अफ़गानिस्तान के उस किनारे से लेकर बर्मा की सीमा तक वह गया। वह हर धर्म के भीतर तक गया। ज्ञान की थाह ली। वह हर धर्मग्रंथ की थाह लेने की कोशिश करता रहा। उसने मंदिरों में ईश्वर को तलाशने की कोशिश की, लेकिन उन्हें हर जगह पतन और अंधेरे के दर्शन हुए। यह देखकर उनका खून खौल उठा और उन्होंने ऐसे समय में मंदिरों और मूर्तियों के खिलाफ़ आवाज उठाई जब देश में न आज जैसी चेतना थी और न हालात।

    दयानंद सरस्वती ने 1875 के आसपास ही अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश लिख दिया था। इसके 11वें अध्याय में उन्होंने मंदिरों और मूर्तियों को अध्यात्म के बजाय 16 बुराइयाों का कारण बताया और कहा कि ये विनाशकारी चीज़ें हैं। मंदिरों को उन्होंने भ्रष्टाचार और व्यभिचार का केंद्र बताया। उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर मंदिरों और साधुओं के हालात देखे और समझे थे और उनके बारे में बहुत खुलकर लिखा। हालांकि उनके इन विचारों के कारण ही एक रूढ़िवादी ब्राह्मण ने उन्हें दूध में शीशा पिघलाकर दे दिया था और उसी से स्वामी जी की मृत्यु हो गई थी। लेकिन आखिरी समय तक दयानंद सरस्वती ने मंदिरों-मूर्तियों के नाम पर चलने वाले गलत चीज़ों पर बहुत मुखर होकर आवाज़ उठाई थी।

    स्वामी जी ने मंदिरों और मूर्तिपूजा की 16 बुराइयां भी गिनाईं, जिनसे देश आज भी दो-चार हो रहा है। उनका कहना था, इससे मन-मस्तिष्क में जड़ता आ जाती है। धन का अपव्यय और दुरुपयोग होता है। मंदिरों में अपार चढ़ावा और धन आने से व्यभिचरण और दुराचरण बेरोकटोक फैलता है। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में लिखा कि मंदिर-मूर्तियां देश की एकता को खंडित करने का कारण बन सकती हैं, जो कि हम राममंदिर-बाबरी मस्जिद प्रकरण में देख ही रहे हैं। उनका तर्क था कि इससे पर्यावरण का भारी विनाश होता है और लोगों के समय, संसाधन और शक्ति का तो यह अपव्यय है ही। सिर्फ़ इसे ही भक्ति का कारण मान लेने से मनुष्य सच्चे आध्यात्मिक मार्ग से दूर हो जाता है और इस तरह वह धर्म के मार्ग को छोड़कर अधर्म की राह पकड़ लेता है।

    यह सही है कि मंदिर और मूर्ति के प्रति बहुत से लोगों की आस्थाएं जुड़ी होती हैं और सब मंदिरों में व्यभिचार भी नहीं होते। लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती ने आज से 143 साल पहले जो आशंका व्यक्त की थी, वह आसिफा जैसी सुकुमार बेटी के साथ हुए नृशंस कांड और शंभु की रामनवमी के दिन शोभा यात्रा की घटनाओं से बहुत सच साबित होती है। आखिर आसिफा के पिता ने भी तो सहज ही उत्तर दिया कि वे कितनी ही बार बेटी को ढूंढ़ते हुए मंदिर के पास से निकले, लेकिन यह सोचकर कभी भीतर नहीं गए कि इस पवित्र स्थल पर उसे कोई क्यों लेकर जाएगा! दयानंद का कहना था कि धर्म का उद्देश्य है अहंकारों और सभी तरह की बुराइयों का आत्म विसर्जन। न कि लोगों को लूटना-खसोटना। उनका कहना था कि मंदिरों के निर्माण से बेहतर है कि अाप सुदूर आबादियों में लोगों के भले के लिए ऐसे विद्यालय खोलें, जहां से विवेकी बनने की शिक्षा मिले। सत्यार्थप्रकाश में एक जगह जब कोई सनातन धर्म के सबसे बड़े उदघोष गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु वाला श्लोक पढ़ता है तो वे कहते हैं : गुरु कोई ब्रह्मा-व्रह्मा नहीं होता। गुरु अगर कामी-क्रोधी हो तो उसे समझाना, दंड देना और फिर भी न माने और कामुकता दिखाए तो मृत्युदंड दिलवा देना चाहिए। क्योंकि गुरु एक संस्था है।

    उनके लिए धर्म एक पाखंड मुक्त जीवन जीने की पद्धति है। समस्त संसार से प्रेम करने की एक प्रक्रिया। अपने झूठ और असत्य का परित्याग करने की और सत्य और आलोक को अपने भीतर समेट लेने की। वे ख्याति और मूर्तिस्थापना के बहुत विरोधी थे। इसलिए उन्होंने कहा था कि आप सब मेरे पदचिह्नों पर मत चलो। सच की तलाश करो और उसे आत्मसात करो। उनका कहना था कि जिस तरह बिना मनुष्य ज्ञानेंद्रियों का उपयोग किए बिना अंधेेरे और अविद्या का शिकार हो जाता है, उसी तरह धर्म के नाम पर मंदिर और मूर्तियां मनुष्य को अंधकार और अविद्या के मार्ग पर ले जाती हैं। उन्होंने अपनी मूर्ति या चित्र प्रकाशित करवाने के लिए भी वर्जनाएं की थी। वह बुरे लोगों और बुराइयों से अंतिम क्षण तक लड़े। काशी में पंडितों को चुनौती दी तो हरिद्वार में पाखंड खंडिनी गाड़ी। लोगों ने उन्हें बहुत चेताया, लेकिन उनका कहना था कि बुराइयों का विरोध करने में तनिक भी पीछे नहीं हटना चाहिए। एक भी इंच नहीं। वे अंतिम समय के अंतिम क्षण तक जीवंत बने रहे और मंदिरों-मठों और मूर्तियों को धर्म के विनाश और मानवता के पतन का कारण बताते रहे।

    मैं अपने पिता के पास बैठकर अपने स्कूली दिनों में सोचा करता था कि दयानंद के विचार रात के अंधकार में बिजली की कौंध की तरह हैं और वे भारत को सभी तरह के धार्मिक पापों से मुक्ति दिला देंगे। वे मेरी कच्ची उम्र के दिन थे। मुझे उन दिनों आर्यसमाज मंदिरों में आते साधु और विभिन्न भजनोपदेशक ऐसे बांस के पेड़ लगते थे, जिनसे कुछ दिनों में बांसुरियां बनेंगी और वे चेतना और विवेक की स्वरलहरियों से भारत की धरती को ही नहीं, समूचे विश्व को गुंजायमान बना देंगी। मेरे मानस पटल पर चेतना का आलोक झिलमिलाने लगा था। मुझे लगता था कि अभी कुछ ही समय बाद इस देश के समस्त कोने विवेक से दमक उठेंगे और समस्त शिक्षित लोग अंधेरों से लड़ रहे होंगे। लेकिन अब जब सच का वह स्वप्न भंग हुआ है तो देखता हूं कि जिस साधु ने मंदिरों, मूर्तियाें और सांप्रदायिकता (हिन्दी में यह शब्द सबसे पहले दयानंद सरस्वती ने ही प्रयुक्त किया था) के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी थी, उसी के वनोद्यान के बांस आज मूर्तियों, मंदिरों और सांप्रदायिकों के हाथों की कुल्हाड़ियों के दस्ते बने हुए हैं। वे अगर बांसुरियां बने होते तो शायद आज किसी आसिफा के साथ देश की सबसे पवित्र भूमि के मंदिर में ऐसा न केवल ऐसा नहीं होता। ऐसा करने वालों के समर्थकों का तो तत्काल ही शिरोच्छेन ही कर दिया जाता!



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  • क़ातिल बेगुनाह, तलवार न्यायाधीश और कुसूरवार गवाह उर्फ़ सलमान बनाम बिश्नोई समाज –Tribhuvan

    क़ातिल बेगुनाह, तलवार न्यायाधीश और कुसूरवार गवाह उर्फ़ सलमान बनाम बिश्नोई समाज –Tribhuvan

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    अली सरदार जाफ़री का एक शेर है: तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद, बे-गुनह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा। यानी जहां तेग़ यानी तलवार न्यायाधीश हो और जहां सूली और फ़ांसी गवाह हों, वहां पर क़ातिल ही बेगुनह हुआ करता है।

    सलमान खान प्रकरण में जो दोषी है, वह तो सबकी चर्चाओं और सम्मान के केंद्र में है, लेकिन जो न्याय दिलाने वाले और सम्मान के पात्र लोग हैं, वे हाशिये पर हैं। हम आज अगर पतन और गिरावट की राह पर हैं तो इसीलिए कि अपराधी की शोभा यात्रा निकाली जा रही है और जिसकी शोभा यात्रा निकाली जानी चाहिए, उन्हें उजड्ड और पुरातनपंथी हास्यास्पद बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। इस प्रकरण में जो गवाह हैं और इस भ्रष्ट और गंदी व्यवस्था में भी पीछे नहीं हटे, वे बिश्नोई समुदाय से हैं और जांभोजी की शिक्षा के कारण ही वे निष्ठा के साथ खड़ रह सके। अगर ये निष्ठाएं नहीं होतीं तो सलमान कभी के इस प्रकरण से बाहर हो चुके होते।

    इन हालात में मुझे बताइये कि हमारे मीडिया और विश्व हिंदू परिषद के जोधपुर वाले उन हिंसकभाव वाले लोगों में क्या फ़र्क़ है, जो निरपराध अफराजुल की नृशंस हत्या करने वाले शंभु की शोभा यात्रा निकाल रहे हैं। देश का पूरा मीडिया और आम लोग तो भी वही सब होने को मरे जा रहे हैं!

    भगवान जांभोजी गुरुनानक जी से 18 साल पहले हुए थे। जांभाेजी का अनुयायी होने के लिए उसे 29 नियमों का मानना जरूरी है। दोनों संतों ने गुरुघरों का जो शिल्प अपनाया, उसमें एक अदभुत साम्य है। ये मसीत और मंदिर के बीच संतुलन कायम करते हैं। क्षमाशीलता को ऊपर मानते हैं। लेकिन प्राणी मात्र की रक्षा करना और हरे वृक्ष नहीं काटना दो ऐसे नियम हैं, जो बिश्नोई धर्म को बाकी सब धर्मों से अलग रखते हैं। हरे पेड़ों की रक्षा के लिए तो बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इनमें 111 तो महिलाएं थीं।

    बिश्ननोई समाज में भी मुस्लिम समाज की तरह मनुष्य को दफ़नाया जाता है, न कि जलाया जाता है। ऐसे बहुतेरे संप्रदाय हैं, जिनमें पार्थिव देह को जलाने के बजाय दफनाया जाता है। लेकिन बिश्नाई धर्म के प्रति बचपन से ही मेरा अाकर्षण इसलिए रहा है, क्योंकि यह धर्म जीवों के प्रति अपार प्रेम रखता है। किसी भी बिश्नोई बहुल गांव में जाएं तो वहां आपको कितने ही हरिण और मोर ऐसे मिलेंगे, मानो हम किसी अभयारण्य में आ गए हों। बिश्नोई जीव की रक्षा के प्रति इतने प्रतिबद्ध होते हैं कि जीव की हत्या करने वाले की हत्या तक करने में भी उन्हें संकोच नहीं होता। ऐसे भी उदाहरण देखे जाते हैं। यह देखकर तो अांखों में आंसू आ जाते हैं कि कई बार किसी हरिणी को कुत्ते या जंगली जानवर मार दें और उसके बच्चे भूखे हों तो बिश्नोई महिलाएं उन्हें अपने बच्चे की तरह अपने सीने से लगाकर दूध पिला देती हैं। यह अदभुत और अकल्पनीय है।

    जिस युग में पर्वत, पहाड़, नदियां, झरने, वन संपदा और कुदरत के वारे वरदानों को इन्सान तबाह करने पर तुला है तब जांभाेजी भगवान की शिक्षाएं बहुत प्रासंगिक दिखाई देती हैं।

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  • अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा  –Tribhuvan

    अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा –Tribhuvan

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    प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘दॅ आइडिया ऑव जस्टिस’ के ‘दो शब्द’ वाले हिस्से में प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस’ से एक अदभुत उदाहरण दिया है। चार्ल्स डिकंस के उपन्यास में बच्चों की अपनी छोटी-सी संवेदनशील दुनिया है। इसमें एक पात्र पिप कहता है कि अन्याय का एहसास बहुत अंदर तक पीड़ा पहुंचाता है। पिप ने बचपन में अपनी गुस्सैल और बदमिज़ाज बहन के हाथों बहुत अपमान सहा था। हर आदमी जब अन्याय सहता है तो वह पिप की तरह ही सोचता है। ऐसा नहीं होता कि हम व्यवस्था को पूरी तरह न्यायपूर्ण बना ही दें; लेकिन यह उम्मीद और प्रत्याशा हर हृदय में स्पंदित होना स्वाभाविक है कि हमारे चारों तरह जो अन्याय का वातावरण बन गया है, उसे समाप्त किया जाए। यह अन्याय कई बार वास्तविक और कई बार छद्म रूप से तैयार किया जाता है।

    हम जिस देश और समाज में जी रहे हैं, वह बहुत ही अदभुत हैं। उसने हम सबको बहुत ही गिरगिटिया बना दिया है। इसे हम सब आए दिन देखते हैं, लेकिन स्वीकार नहीं करते। हम आए दिन देखते हैं कि शिड्यूल्ड कास्ट्स और शिड्यूल्ड ट्राइब्स विकराल समस्याओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन इनका एहसास कथित ऊंची जातियों और उच्च शिक्षित लोगों को नहीं है। आज जिस तरह की डिस्पैरिटीज और जिस तरह के सब्जुगेशंस ये वर्ग भुगत रहे हैं, वह हमें बाहर से सामान्य बात लगती है, लेकिन आप जब इनके हृदय में उतरकर देखेंगे तो वहां आपको एक विकराल झंझावात दिखाई देगा। यह उस मिथकीय रामराज्य का भी कड़वा सच था और यह इस युग के रामराज्य का भी सच है कि यहां वनवासी हनुमान को ही सीना फाड़कर अपने हृदय में बसते राम का ही चेहरा दिखाना होता है। राम राम ही रहते हैं और वनवासी योद्धा हनुमान होकर भी सेवक ही रहता है और राम जी विजय की हुई स्वर्णिम सत्ता विभीषणों को ही सौंपते हैं। भले वह कालकूट विष पीने वाले शिव के आशीर्वाद से ही रची गई हो।

    दुनिया का एक यही देश है, जहां आज भी समाज आदिम तरह से न केवल बंटा हुआ है, बल्कि उसकी भाषिक संवेदनाएं भी आदिकालीन ग्रंथों से अनुप्राणित होती हैं। हमें समझ भी वही आता है। इसलिए वैज्ञानिक सत्य और शोध पर आधारित नई शब्द रचना हमें स्वीकार्य ही नहीं होती। हमारे यहां शिड्यूल्ड कास्ट 16.6 और शिड्यूल्ड ट्राइब 8.6 प्रतिशत हैं। इतना वर्ग इतना सा सरल नहीं है। यह 1108 अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ है आैर उनका अपना ऊंच-नीच और छुआछूत है। यह 29 राज्यों में फैला हुआ मानव समाज है। हमारे एसटी 22 राज्यों में फैले हुए हैं और ये 744 तरह के आदिवासी समाज हैं, जिनकी अपनी बहुत समृद्ध और गौरवशाली परंपराएं हैं, लेकिन हमारे विकास की अाधुनिक धारणाओं और कामकाज की शैली ने इन्हें बर्बाद कर दिया है।

    सोशल मीडिया एक तरह का ख़तरनाक़ दर्पण है। यह एक तरह की खुली हुई पैथोलॉजिक लैबोरेट्री है। इसमें हर एक का ब्लड, स्टूल और स्पूटम समुद्र ही तरह से बह रहा है। बायोप्सियों के ढेर लगे हैं। इस विशालकाय पैथोलॉजिकल लैबाेरेटरी से किसी को गंध आ रही है और कोई घृणा में डूबा जा रहा है। कोई मुंह पर कपड़ा बांध रहा है और किसी ने नाक भींच ली है। लेकिन मानव समाज को एक स्वस्थ और विवेकशील समाज के रूप में देखने की कामना करने वाले लोग इसे किसी डॉक्टर की निगाह से देखेंगे। आज के एससी-एसटी वह नहीं हैं जो कल थे। उन्हें शिक्षा और जागरूकता ने सबके बराबर खड़ा कर दिया है। इससे वे कोई विवेकवान या कोई वैज्ञानिक सोच वाले हो गए, यह नहीं है। लेकिन यह सच है कि वे अब उन्हें छोटे-छोटे अन्याय भी उद्वेलित करते हैं। वे एक अब एक ताकत के रूप में गोलबंद हो गए हैं। उनमें सबके सब न तो शंभु हैं कि वे सांप्रदायिक लोगों का गुर्गा बनकर उनकी दमित रक्तपिपासा का शांत कर देे और न ही वे सबके सब प्रतिभा से दिपदिपाते लेखकीय प्रतिभा वाले ऐसे अति संवेदनशील रोहित वेमुल्ला हैं, जो यथार्थ का सामना करने के बजाय आत्महत्या कर लें।

    अब समय आ गया है कि हम हिंसा की मुखर आलोचना करें, लेकिन यह प्रतिज्ञा भी करें कि हम भारतीय समाज से अन्याय को मिटा देंगे। हम अन्याय को खत्म करके ही न्याय का संवर्धन कर सकते हैं। हम अपने घरों में उनका उसी तरह स्वागत सत्कार करें, जैसा हम अपने रिश्तेदारों से करते हैं। हम अपने घरों के अगवाड़े या पिछवाड़े एक-एक अलग से रखे चाय के कपों को हटा दें। हम अपने घरों के बाहर सफाई करने वाले या गंदे नाले में उतरकर सफाई करने वाले से ऐसा ही सलूक करें, जैसा एक आदर सरहद पर लड़ते किसी सैनिक का करते हैं। हमें अपने शब्दकोशों को बदल डालना चाहिए, जिनमें कथित अछूत जातियों के नामों को गालियों के तौर पर प्रयुक्त किया जाता है। हमें अपनी नैतिकता में आ चुकी कलुषाओं को धोना होगा। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारी बस्तियों में वे लोग वैसे ही सम्मान से रहें, जिस सम्मान से एक स्वाभिमानी को रहना चाहिए। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें अपने दिलो-दिमाग को मानवीय और न्यायशील बनाना होगा। हम ऐसे नहीं हैं, इसीलिए हमें अपनी जाति की हिंसा हिंसा ही प्रतीत नहीं होती और किसी अन्य जाति की हिंसा हिंसा दिखाई देती है। इसीलिए हमें गांधी जैसे महानायक की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे आतंकवादी नहीं लगता, लेकिन एक खास इमारत के बाहर गोलियां चला देने वाला देशद्रोही लगने लगता है। हम इमारत के भीतर के देवता की हत्या करने वाले का तो मंदिर भी बनाने लगते हैं, लेकिन इमारत पर बंदूक तानने वाले को फांसी दिए बिना बेचैन हो उठते हैं।

    न्याय की यह पुकार इस महान देश की मिट्‌टी में वैदिक काल से भी शायद सैकडों-हजारों साल पहले की है। हमारी मानवीय चेतना उसी मिट्‌टी से नहाई हुई है। हमें इस धरती पर पल रहे समाज को एक अच्छे मानव समाज का रूप देने के लिए अपनी अपनी संस्कृतियों और अपनी अपनी मानसिकताओं में पल रहे अन्याय को खत्म करना होगा। यह काम हमें ही करना होगा; क्योंकि जिनके भरोसे हमने यह काम छोड़ दिया है, वे बहुत ख़तरनाक़ खेल खेल रहे हैं। वे अपनी सत्ता के लालच में 15 अगस्त 1947 से आज तक बच्चों के हाथों में बासुरियों के बजाय बंदूकें ही शोभित करवाने की संस्कृति को बढा रहे हैं। बच्चे सरदार भगतसिंह ने अंगरेजों को भगाने के लिए खेत में बंदूकें बोई थीं, लेकिन हमें स्वतंत्र भारत में बांसुरियां बोनी चाहिए, न के धनुष और सुदर्शन चक्र! यह राम आैर कृष्ण से भी पहले उन वैदिक ऋषियों का देश है, जिन्होंने मानवता की कोंपलों की रक्षा के लिए अपने आपको होमना सीखा था। यह रक्तपिपासुओं का नहीं, यह ऐसे आम भारतीयों का देश है, जिनके कंठ में राग और विराग पलता है। जहां संतों की वाणियां गूंजती हैं। यह सिर्फ इसी देश को एक परिवार नहीं, पूरी वसुधा को कुटुंब बनाने का स्वप्न रचने वाले लोगों के बच्चों का देश है। यह उन साधुओं और फ़कीरों का वह देश है, जहां एक ऐसे मानव समाज की कल्पना की गई थी, जो निखिल द्यु लोक में प्रेम प्राण, गान गंध और पुलक के झरने की कामना करते हैं। जहां हृदयों में हिंसक भाव नहीं, नीरव आलोक बरसता है। जहां स्वर्णिम उषा की अरुणाई से प्राण आरक्त होते हैं और अलसाई आंखों पर दूर्वादल के आेसकण नव जागृति लाते हैं।

    इसलिए स्वतंत्रता का स्वप्न तभी पूरा होगा जब अन्याय का अंधकार हम सबके हृदयों से हम स्वयं दूर देंगे।

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  • क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश के नेता नोटिस ही नहीं करते! –Tribhuvan

    क्योंकि शांतिपूर्ण अांदाेलनों को इस देश के नेता नोटिस ही नहीं करते! –Tribhuvan

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    इस देश के लोगों की बातें सुनें तो लगता है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मनुष्य इसी धरती पर वास करते हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के लोगों ने एससी एसटी एक्ट में संशोधन करने वाले सुप्रीमकोर्ट के एक अवांछित हस्तक्षेप के विरोध को लेकर जिस तरह आंदोलन किया, वह शांतिपूर्ण अांदोलनों की आवाज़ों को नोटिस न करने वाले नेताओं की खोपड़ियों को झकझोरने के लिए काफ़ी है।

    आज़ादी से पहले सरदार भगतसिंह ने बहरों की सरकार को सुनाने के लिए कम नुक़सान करने वाले बम फोड़े थे। आज़ादी आकर छीज भी गयी। और राजनेता वैसे के वैसे और वहीं के वहीं। ढीठ शब्द ही शर्मसार है। काठ के कानों, प्लास्टिक की आंखों और अमेज़ॉन से आयातित दिलों वाले इन राजनेताअों और आम लोगों की विवेक बुद्धि के लिए एक-दो छोटे उदाहरण काफ़ी होंगे। सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम महिलाओं ने बेहद शालीन और शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन सरकारों, मीडिया और प्रशासनिक मशीनरी ने ध्यान ही नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट तक तो आवाज़ भी नहीं पहुंची। किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किए, लेकिन उन्हें काग़ज़ी भुलावे देकर वापस भेज दिया गया।

    आतंकित कर देने वाले और पूरे देश में भय फैला देने वाले आंदोलन करना जैसे भारत मां के सच्चे सपूत होने का प्रमाण है। जैसे घर का सबसे लाड़ला सबसे ऊधम भरे आंदोलन करने का अधिकार रखता है। बर्तन तोड़ेगा, घड़े फोड़ेगा, कपड़े फाड़ेगा और सपूत का सपूत रहेगा। मां भी चुपचाप सुनेगी। बाप भी। बाकी बहन-भाई टुकुर-टुकुर देखेंगे कि उन्हें यह अधिकार कहां है! इसका आंदोलन-उसका आंदोलन। जिन्हें आपने कमज़ोर देखा या लगा कि इनका वोट तो मिल ही जाएगा या जिनका वोट मिलना ही नहीं है तो बंदूक भी चलाई और टैंक भी दौड़ाया। ठांय-ठांय। कितने सुसंस्कृत लोगों का यह अरुण मधुमय हमारा देश है। हम अपने इस देश में हर साल एससी कहे जाने वाले भारतीय नागरिकों पर 40,000 से ज्यादा अत्याचार करते हैं। और इनमें सज़ाएं होती ही नहीं हैं। सिर्फ़ पकड़-धकड़ करके छोड़ दिया जाता है।

    कितनी हैरानी की बात है कि इस देश के सुप्रीम कोर्ट में आजादी के बाद से आज तक अनुसूचित जनजाति का कोई जज ही नहीं बना है। शिड्यूल कास्ट न्यायाधीश भी अभी सुप्रीम कोर्ट में नहीं है। आप कत्लेआम भी करेंगे और यह भी दावा करेंगे कि आपकी तो पुश्तों में भी किसी को तेग़बाज़ी का शौक नहीं है। आप सत्ता में बैठे रहते हैं, कभी बाबरी मस्जि़द ढह रही होती है और कभी सड़कों पर उतरा आंदोलनकारी आपकी कानून और व्यवस्था के रामलला को बंधक बनाकर छोड़ देता है। और इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की बेचारगी का आलम ये होता है कि वह हिंसक समूहों को सलाम करने के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता। बस यह जुमला जुबान पर रहता है कि ये सब हमारे धर्म के रक्षक भाई हैं और ये तो ऐसा नहीं कर सकते।

    इस देश के राजनेताओं की इससे बदतर तसवीर और क्या होगी कि वे पड़ोसी देश के साथ बैठकर समस्या का राजनीतिक हल नहीं निकाल सकते और इस देश के आम जवान को मरने के लिए हवि बनने देते रहेंगे। सरहद पर कभी अपना बेटा नहीं भेजेंगे। क्योंकि हमारे यहां किसान जातियां हैं और उनके बेटे जय जवान जय किसान सुनकर आ ही जाएंगे। क्या पुलिस के जवान इसी तरह पिटने और मारखाने के लिए बने हैं? हिंसक आंदोलनों में हमारे अपने ही बेटे कब तक पुलिस की वर्दी पहनकर अपने ही भाइयों के हाथों नृशंसता से पीटे और मारे जाते रहेंगे? आप समस्याएं सुलझाएंगे नहीं, बल्कि चुनावी जीत के लिए इस तरह के हिंसक प्रदर्शनों और खून सने रास्तों से अपनी चुनावी जीत के रथों में जुटे हुए घाेड़ों के लिए ऊर्जा जुटाएंगे और इस देश का आम नागरिक तमाशबीन बनकर आपको सत्ता का भोग लगाता रहेगा। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी कम्युनिस्ट, कभी समाजवादी! कभी आम आदमी और कभी खास आदमी।

    यह कितनी अजब बात है कि सभी राजनेता उस कूचे में बे-सबब धूम-धाम कर रहे हैं, जहां अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, निर्धनों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की हालत रुला देने वाली कर दी जाती है। इस अरुण मधुमय देश में हर साल तीस हजार से ज्यादा हत्याएं की जाती हैं। 2014 में 33,981, 2015 में 32,127 और 2016 में 30,450 हत्याएं हुईं। किसी साल 77,237, किसी साल 82,999 और किसी किसी साल 88,008 अपहरण होते हैंं। हर साल 48 लाख से ज्यादा अपराध होते हैं। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र देश में नागरिकों के लिए सबसे असुरक्षित इलाके हो गए हैं। हम महिलाओं को देवियां मानते हैं और बेटियों को अपना गर्व घोषित करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि हर साल महिलाओं के खिलाफ तीन लाख से ज्यादा अपराध घटित होते हैं। कभी 3,39,457 तो कभी 3,29,243 और कभी 3,38,954 अपराध। महिलाओं के प्रति क्रूरता के मामले में पश्चिम बंगाल, राजस्थान और उत्तरप्रदेश बहुत आगे हैं। ख़ासकर पति और उसके रिश्तेदारों की क्रूरता के मामले में। हर साल देश में 1,10,378, पश्चिम बंगाल में 19,302, राजस्थान में 13,811 और उत्तरप्रदेश में 11,156 महिलाएं पति और पति के रिश्तेदारों की हिंसा का शिकार होती हैं।

    जौन एलिया ने एक बहुत ख़ूबसूरत बात कही है : नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम। बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम! लेकिन मेरा कहना है कि जब हम सबको साथ ही रहना है तो झगड़ा क्यूं करें हम? हम अपनी बात ख़ामोशी से भी तो कह सकते हैं और राजनेता ख़ामोश बातों को भी तो गंभीरता से ले सकते हैं। क्यों इतनी हिंसा और क्यों इतना हंगामा? क्यों बार-बार वफ़ादारी के दावे और क्यों बार-बार अग्निपरीक्षाएं? अगर अग्नि परीक्षाएं सीता माता को न्याय नहीं दिला सकतीं और वह भी भगवान राम जैसे शासक के होते हुए तो आज के शासक तो उनके सामने धूल का कण भी नहीं हैं। ख़ामोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँ करें हम। ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम! वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम! हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम? किया था अहद जब लम्हों में हमने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँ करें हम! नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी तो फिर दुनिया की परवाह क्यूँ करें हम। लेकिन ख़ामोश और शालीनता भरी आवाज़ों को आप नहीं सुनेंगे तो आपको वही मिलेगा, जो आज सड़कों पर मिला है, जो कल हरियाणा में जाटों और परसों राजस्थान में गुर्जरों से मिला था। लेकिन ये अब कटु सच स्थापित हो गया है कि इस देश की धरती पर सिख और मुसलमान कभी दलितों, जाटों, गुर्जरों और हिंदुत्ववादियों जैसे आंदोलन का अधिकार नहीं रखते! क्योंकि अब एक ही तरह के राजनीतिक आचरण की चदरिया को देशद्रोह और देशभक्ति की इड़ा और पिंगला में बीन दिया गया है। लेकिन आसनसोल हो या नक्सलवाड़ी, जेतारण हो या जम्मू कश्मीर-हिंसा को हिंसा ही समझा जाना चाहिए। हिंसा का रंग देखेंगे तो आपकी आंख प्लास्टिक की, कान काठ के, दिल खंगर ईंटों का और चेतना भुस से भर जाएगी!

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  • वामपंथ के किलों में भाजपा ने वैसे ही सेंध लगा दी है, जैसे मध्यकाल में अफ़ीम के नशे में डूबे भारतीय शासकों को आक्रमणकारियों ने अपनी रणनीति और आधुनिक हथियारों से उखाड़ फेंका था- त्रिभुवन

    वामपंथ के किलों में भाजपा ने वैसे ही सेंध लगा दी है, जैसे मध्यकाल में अफ़ीम के नशे में डूबे भारतीय शासकों को आक्रमणकारियों ने अपनी रणनीति और आधुनिक हथियारों से उखाड़ फेंका था- त्रिभुवन

    Tribhuvan

    त्रिपुरा के चुनाव नतीजों का संदेश बहुत साफ़ है। आदिवासी कहे जाने वाले लोगों ने बहुत चौंकाने वाला फ़ैसला सुनाया है। त्रिपुरा के परिवर्तन से दिल्ली और शेष देश के स्वयं भू प्रगतिशील खेमे में वाक़ई हाहाकार मच गया है; क्योंकि त्रिपुरा के लाेक ने एक अलग तरह का निर्णय दिया है। यह निर्णय मुझे भी हत्प्रभ करता है, लेकिन यह बदलाव कई संदेश भी देता है। सच बात तो यह है कि वामपंथ के किलों में भाजपा ने वैसे ही सेंध लगा दी है, जैसे मध्यकाल में अफ़ीम के नशे आैर सुरा-सुंदरियों के वैभव में डूबे भारतीय शासकों को आक्रमणकारियों ने अपनी रणनीति और आधुनिक हथियारों से उखाड़ फेंका था। वामपंथियों के पास सुंदरियां तो नहीं, लेकिन वाग्विलास ज़रूर है। वामपंथी बुद्धिजीवी अब तक कांग्रेस सरकारों के माध्यम से वह सब हासिल करते रहे हैं, जो शायद उन्हें माकपा या भाकपा की सरकार बनने पर सपने में भी हासिल नहीं हो सकता। कांग्रेसी शासन संस्कृति ने गांधी जी के जमाने से ही बुद्धिजीवियों को नैतिक पथ से विचलित होना और इसके बावजूद गरजना बहुत सलीके से सिखा दिया था।

    त्रिपुरा की 60 सदस्यीय विधानसभा में पिछले 25 साल से यानी साल 1993 से ही मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा की सरकार थी। पिछले 20 साल से राज्य की बागडोर एक बेहद ईमानदार, नेकनीयत मुख्यमंत्री माणिक सरकार के हाथों में थी। पांच साल पहले 2013 में भाजपा ने इस राज्य में 50 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी और उसे महज 1.87 फ़ीसदी वोट मिले। वह एक सीट तक नहीं जीत सकी। माकपा को उस समय 49 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 10 सीटें। इससे साफ़ पता चलता है कि भाजपा के नेता कुछ कर गुजरने के उत्साह से लबालब भरे हैं और कांग्रेस का नेतृत्व आत्मघाती निकम्मेपन का शिकासर है।

    माकपा मध्ययुगीन क्षत्रिय शासकों के अवतरण में आ गई है। उसके नेताओं को इस बात की कोई परवाह ही नहीं है कि कौन उनके किले में सेंध लगा रहा है और कौन उनके प्रवेशद्वार पर आकर तोपें तान चुका है। वे दिल्ली के अपने किलों में सुरापान और वाग्विलास में डूब चुके हैं। अगर आप अपने हीरे को कूड़े के ढेर पर फेंकेंगे तो पड़ोसी उसे उठाकर अपने यहां सजा ही लेगा। माणिक सरकार जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति को इतने साल तक क्यों त्रिपुरा में ही जर्जर होने दिया गया? क्यों राज्यों की बेहतरीन प्रतिभाओं को केंद्र में नहीं लगाया गया? अत्यधिक केंद्रीयकरण की शिकार अगर माकपा को लोग सत्ता से बाहर नहीं करेंगे तो कौन करेगा? क्या भाजपा ने अपने नेतृत्व को नहीं बदला? अगर भाजपा अपनी सबसे बेहतरीन प्रतिभा नरेंद्र मोदी को केंद्र में ला सकती है तो यह काम माकपा क्यों नहीं कर सकती?

    Tribhuvan

    सच बात तो यह है कि माकपा में अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मारने वाले और जिस डाल पर बैठे हैं, उसे ही काटने के लिए आधुनिक आरे लेकर बैठे नेताओं का बहुत बड़ा जमावड़ा दिल्ली में हो गया है। वर्तमान भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को 2013 में प्रधानमंत्री पद का दावेदार चुना और मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनकर गुजरात से दिल्ली की राजनीति में सबसे ताकतवर पद पर बैठ गए। लेकिन यह मौक़ा भाजपा और मोदी से 18 साल पहले 1996 में अपनी बर्बादियों से अनजान कम्युनिस्टों को मिला था, जब यूनाइटिड फ्रंट ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री लगभग घोषित कर दिया। लेकिन माकपा के कूढ़मगज और यथास्थितिवादी जड़ता के शिकार नेताओं ने इसे मानने से इन्कार कर दिया और ज्याेति बसु का विरोध किया। अब अगर ऐसी पार्टी भारतीय राजनीति से तिरोहित नहीं होगी तो कौन होगा?

    माकपा का दिल्ली नेतृत्व पिछले कुछ वर्षों से बहुत समझौतापरस्त रहा है। यह मैंने स्वयं देखा है कि राजस्थान में अमराराम जैसे नेता किस तरह कोई आंदोलन खड़ा करते हैं और जब सत्ता को उसकी ज्यादा आंच सताती है तो दिल्ली से एयरपोर्ट पहुंचे माकपा नेता वीवीआईपी लाउंज में ही मुख्यमंत्री से बातचीत करके किस तरह ऐसे आंदोलनों का मृत्युपत्र लिख देते हैं। क्या अमराराम, श्योपतसिंह, योगेंद्रनाथ हांडा से लेकर कई बड़े जमीनी लड़ाकों का जन्म अपनी गलियों के लिए ही हुआ है? क्या इनके हाथ में कभी दिल्ली की कमान नहीं आ सकती थी? या इन्हें कोई नेतृत्वकारी पद नहीं मिल सकता था? क्या उत्तर भारत में ऐसे प्रतिभाशाली नेता कम हुए हैं? लेकिन केंद्रीयतावादी माकपा बहुत लंबे समय से आत्मघाती खोल में जी रही थी और अब उसकी परिणति सामने आ गई है।

    आज भी माकपा अपनी पुरानी जड़ता भरी मार्क्सवादी सोच से चिपकी हुई है और अपने भीतर बदलाव को तैयार नहीं है। कोई पूछे कि सीताराम येचुरी और प्रकाश कारात ने ऐसा क्या किया है, जो ये लोग आज भी केंद्रीय कमान संभाले हुए हैं? क्यों इनकी जगह ऊर्जा से भरे और भारतीय समाज के बदलाव के तत्पर राज्य स्तरीय नेताओं को केंद्र में लाया जाता? यह पार्टी कब तक दकियानूसी सादगी से चिपकी रहेगी? मोबाइल फाेन तक का इस्तेमाल न करने वाले कम्युनिस्ट नेताओं को आज का मतदाता क्यों कर चाहेगा? नई तकनीक से आप कब तक दूरी बनाएंगे? इसका साफ़ सा मतलब है कि भारतीय मतदाता ने अपनी जागरूकता के हिसाब से फ़ैसला किया है और उसने ईमानदार मुख्यमंत्री के नेतृत्व में काम करने वाली एक निकम्मी सरकार को उखाड़ फेंका। निकम्मेपन ने मध्यकालीन इतिहास के कौनसे गुण को बचने दिया था?

    भारतीय जनता पार्टी की जीत का इसे अच्छा संकेत कहा जाए कि कश्मीर के बाद इस पार्टी का दूसरा खतरनाक पाखंड, समझ नहीं आता। जैसे कश्मीर में भाजपा ने अलगाववादियों के साथ सरकार बनाई है, उसी तरह वह त्रिपुरा में भी वामपंथी किले को ढहाने के लिए उस आईपीएफटी से गठबंधन में चली गई है, जो त्रिपुरा के अल्पसंख्यकवादी जनजातीय लोगों के एक अलग राज्य की मांग कर रही है। अगर यह भाजपा की सोच में आया बदलाव है तो यह स्वागत योग्य है, लेकिन अगर यह सिर्फ़ राजनीतिक चालाकी और सत्ता हासिल करने भर का कुटिल खेल है तो इसके नतीजे घातक निकलेंगे। इस पूरे चुनाव परिणाम का एक सबक ये है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व सिर्फ़ देश में बुरा होने की बाट जोह रहा है। भाजपा के शासन में बड़ी से बड़ी खामियां हों और सत्ता के बेर उसकी झाेली में आ गिरें। यह बहुत ख़तरनाक़ और बुरी सोच है, जो कांग्रेस का मूच चरित्र है। आंदोलनहीन और बिना जिस्म में जुंबिश लाए, ये जिस तरह की राजनीति करती है, वह देश के लिए ख़तरनाक़ है।

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  • “पद़मावत” के बहाने राजस्थान के आत्मदर्प का उपहास उड़ाते हैं भंसाली — त्रिभुवन

    “पद़मावत” के बहाने राजस्थान के आत्मदर्प का उपहास उड़ाते हैं भंसाली — त्रिभुवन

    Tribhuvan

    संजय लीला भंसाली चाहे कितने भी बड़े फ़नकार क्यों न हों, लेकिन दिलों को जीत लेना इस क़दर आसान नहीं होता। फ़िल्मकारों के पास प्रचार की बहुतेरी चालाकियां हुआ करती हैं, लेकिन ये चीज़ें सदा ही जादू की तरह काम नहीं करतीं। प्रचार के लिए शुरू की गई विवादों की अदाकारी में भी सौ कर्ब के पहलू निकल आते हैं। भंसाली ने “पद्मावत” का निर्माण पूरा करके बड़ी ही अदाकारी के साथ फ़न्काराना रोने की कोशिश की थी, लेकिन राजस्थान के राजपूतों के विरोध के बाद उनके आँसू बह निकले।

    Padmaavat

    मैं कुछ दिन पहले अपनी दिल्ली यात्रा में “पद्मावत” देख चुका हूं। इस पर लिखने का काफ़ी मन था, लेकिन शनिवार की रात जब “चैंपियन” पर कमलेश ने कुछ चीज़ें छेड़ीं और साफ़ कहा कि इस तरह की फ़िल्में बननी ही क्यों चाहिए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने साफ़ तौर पर कहा कि किसी भी फ़िल्म या कृति पर रोक लगाना बहुत ग़लत है, लेकिन “पद्मावत” देखने के बाद मुझे लगता है कि न तो आम लोग किसी चीज़ का विरोध करते समय विवेक का इस्तेमाल करते हैं और न ही हमारे स्वनाम धन्य संपादक लोग राजस्थान के राजपूत शासकों का बुरी तरह उपहास उड़ाने वाली फ़िल्म की तारीफ़ें करते समय इतिहास के तथ्यों को ही याद रखते हैं।

    “पद्मावत” फ़िल्म को लेकर जो बात एक सामान्य युवक कमलेश के विवेक पर प्रहार करती है, वह फ़िल्म देखकर सबसे पहले फ़तवा जारी करने वाले मौलानुमा संपादकों की बुद्धि से बहुत परे की बात है। कमलेश का तर्क है : यथार्थ जीवन में रणवीर और दीपिका प्रेमी-प्रेमिका हैं और जब भंसाली इन्हें फ़िल्म में अलाउद्दीन ख़िलज़ी और पद्मिनी की भूमिकाएं देता है तो इसके पीछे फ़िल्म के निर्देशक की काईयां बुद्धि का पता चलता है। वह शरारतन कहीं न कहीं यह दर्शाना चाहता है कि दोनों के बीच प्रेम का कोई अदृश्य रसायन बह रहा था।

    और संभवत: यही वह बात थी, जिससे भंसाली के गाल पर पड़े थप्पड़ के पीछे का गुस्सा अंकुरित हुआ था। कमलेश और दूसरे बहुतेरे लोगों का मानना है कि भंसाली ने पद्मिनी के माध्यम से क्षत्रियों की प्रतिष्ठा से छेड़छाड़ की कोशिश की है और यह नाक़ाबिले बर्दाश्त है।

    लेकिन फ़िल्म देखने के बाद मुझे बहुतेरा ऐसा आपत्तिजनक लगा, जो शायद फ़िल्म की तारीफ़ें करने वाले बुद्धिजीवियों की निगाह में सही रहा होगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भंसाली ने अलाउद्दीन ख़िलजी के रूप में जो पात्र गढ़ा और जितनी मेहनत उसे संवारने और जीवंतता प्रदान करने में खर्च की, उसका एक प्रतिशत भी राजस्थान की वीरता की शान रहे रत्नसेन के पात्र पर खर्च नहीं की।

    Alauddin Khilji (Ranveer Singh)

    ख़िलजी वाक़ई बहादुर और दुस्साहसी था, लेकिन रत्नसिंह की कद-काठी और उसके हावभाव ऐसे तो नहीं ही रहे होंगे, जैसे शाहिद कपूर के दिखाए गए हैं। भंसाली ने रत्नसिंह के पात्र को बुरी तरह कमज़ोर दिखाने के लिए ही शाहिद कपूर का चयन किया है, जो रणवीरसिंह अभिनीत अलाउद्दीन ख़िलजी के सामने दो कौड़ी का भी नहीं लगता।

    ख़िलजी की कुश्ती का दृश्य बहुत ज़ोरदार ढंग से फ़िल्माया गया है और उसमें ख़िलजी की ताक़त को जीवंतता दी गई है। उसका डील-डौल और उसके शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन क्या कमाल है। उसकी भूमिका को वीरता और क्रूरता के चाक पर शरीर और अभिनय की मिट्‌टी से गूंथा गया है।

    Ratnsen (Shahid Kapoor)

    अल्लाउदीन के मुकाबले रत्नसेन का पात्र बहुत कमजोर गढ़ा गया है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि शौर्य और शक्ति की मिट्‌टी से बना रत्नसेन शाहिद कपूर जैसा रहा होगा, जो पद्मिनी की तलाश में सिंहल द्वीप चला गया? शूरवीरों की कद-काठी छोटी हो सकती है, लेकिन उनके ओज और तेज ऐसे तो नहीं हुआ करते। रत्नसेन को उनकी पत्नी जिस पद्मिनी को लाने के लिए ताना देती है, वह पद्मिनी किसी सुंदरी का नाम नहीं था, अपितु भारतीय कामशास्त्र की भाषा में सर्वाेत्तम मानी जाने वाली सुंदरी पद्मिनी थी। जैसे चित्रिणी, शंखिनी, हंसिनी आदि मानी जाती हैं। और शूरवीर तथा कामवेत्ता रत्नसिंह जब पद्मिनी की तलाश पूरी करके लौटता है तो क्या उसका संघर्ष कम रहा होगा?

    इस फ़िल्म को देखकर तो लगता है कि राजपूतों से ज़्यादा अगर किसी को विरोध करना चाहिए था तो ब्राह्मणों को करना चाहिए था। इसमें राघव चेतन ब्राह्मण को न केवल फ़िल्म में देशद्रोही और विश्वासघाती बताया गया है, बल्कि उसे निकृष्टतम व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। राघव जैसा सुरीला और निष्णात बांसुरीवादक दिखाया गया है, अगर वह वाक़ई में संगीतज्ञ था तो द्रोही नहीं था और अगर द्राही था तो वह संगीतज्ञ नहीं हो सकता।

    पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मानते हैं कि राजपूतों ने मानवीयता और अद्वितीय किस्म की निर्भीकता के कारण चालाक, निष्ठुर और अमानवीय आक्रमणकारियों से मात खाई। इसके अनुपम उदाहरण भी बिखरे पड़े हैं। लेकिन फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह अलाउद्दीन ख़िलजी रत्नसेन के महल में निर्भीकता से आता है।

    Padmaavat Ratnsen

    इतना ही नहीं, अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़गढ़ के दुर्ग के चारों तरफ घेरा डाल रखा है और भीतर रत्नसेन और पद्मिनी कभी होली खेलते हैं और कभी दीपावली मनाते हैं। क्या सामान्य सा विवेक रखने वाले शासक के साथ भी ऐसा संभव है कि वह चारों तरफ शत्रु से घिरा रहे और किले के भीतर नीर बनकर बांसुरी बजाता रहे? भंसाली ने बहुत ही चालाकी से राजपूत वीर को निहायत ही कायर और मूर्ख चित्रित करने की कोशिश की है और यह इतिहास के सच के हिसाब से भी बहुत आपत्तिजनक है। एक जगह तो रत्नसेन अचानक अलाउद्दीन की सेना पर ऐसे समय हमला करता है जब सब लोग सोए पड़े हैं और कोई जगाकर अलाउद्दीन को हमले की सूचना देता है। मेरा ख़याल है कि राजपूत शासकों के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा निकृष्ट शासक हो, जिसने कभी किसी सोए हुए शत्रु पर हमला किया हो।

    यह सही है कि अलाउद्दीन ख़िलजी के पात्र को इस फ़िल्म में बहुत क्रूर दिखाया गया है, लेकिन यह क्रूरता उसके प्रभाव में बढ़ोतरी पैदा करती है, न कि उसके पात्र को वीभत्स बनाती है।

    Aditi Rao and Deepika Padkone

    पद्मिनी के पात्र में दीपिका का अभिनय बहुत कमज़ोर और निष्प्राण रहा है। उसका पात्र और उसके संवाद भी बहुत बचकाने गढ़े गए हैं। इसके विपरीत ख़िलजी की पत्नी मेहरुनिसा की भूमिका में अदिति राव का क्या शानदार अभिनय है। जिम सर्भ तो क़माल हैं।

    दरअसल, यह फ़िल्म दिल्ली को केंद्र में रखकर गढ़ी गई है। दिल्ली अलाउद्दीन ख़िलजी और अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली। दिल्ली सदा सदा से ही ज़ुल्मत की प्रतीक रही है, लेकिन दिल्ली के वासियों के लिए यह अत्याचार सदा ही सदाचार रहा है।

    मुझे लगता है कि रत्नसेन के बहाने भंसाली ने राजस्थान के आत्मदर्प को बहुत नीचा दिखाया है और ख़िलजी की शान में जमकर कसीदे पढ़े हैं। और यह बहुत आपत्तिजनक है। इसका बात का पता फ़िल्म देखकर ही लग सकता है और किसी भी फ़िल्म, पुस्तक और कलाकृति पर प्रतिबंध लगाना विवेक की अर्गलाएं बंद करने के समान है। ऐसा करना भंसाली की मानसिकता को आर्थिक फायदों से भर देना है। अगर विरोध इतना प्रखर नहीं होता तो यह फ़िल्म वाकई में बुरी तरह पिट जाती। लिहाजा, फ़िल्म का विरोध करने वाले तत्वों ने राजस्थान के दर्प का उपहास उड़ाने वाले भंसाली की परोक्ष रूप से जाने या अनजाने प्रचार में बहुत मदद की है।

    Tribhuvan

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