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अगर आप किसी एक राजनीतिक दल के खेमे में हैं, उसकी ग़लतियों का महिमामंडन करते हैं और ठीक वैसी ही ग़लती पर विरोधी का उपहास उड़ाते हैं तो आप में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिसे लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है।

Tribhuvan


इस समय देश में तीन तरह के नागरिक हैं।

एक वे जिन्हें जो कुछ कर्नाटक में हुआ, वह बहुत अच्छा लग रहा है। ये सबके सब या तो कांग्रेसी माइंडसेट के लोग हैं या फिर भाजपा के विरोधी लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचे लोग हैं।

एक वे जिन्हें वह अच्छा लगा, जो बिहार, गोवा, मेघालय, जम्मू और कश्मीर में आदि में हुआ और उन्हें सिर्फ़ कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस का सरकार बनाना बुरा लगा, ये भाजपा और आरएसएस के लोग हैं। इन लोगों का देश प्रेम या लोकतंत्र से कोई लेनादेना नहीं है। ये भी सत्तावादी लोग हैं या फिर बड़ी पार्टियों के चमचा लोग हैं। इनका भी अपना कोई विवेक नहीं हैं आैर इनकी हालत हांकी जा रही भेड़ाें से कुछ अलग नहीं है, जैसा कि बिलकुल ऊपर की श्रेणी वाले लेागों के साथ है। इसमें आप दिल्ली की आम आदमी पार्टी, बहन मायावती की बसपा, वामपंथी दलों या अकाली मित्रों या अन्ना-वन्नाद्रमुक किसी को भी ले शामिल कर सकते हैं। कोई और भी दल संभव है। आरजेडी, जेडीयू, जेडीएस आदि आदि। कोई भी। सबके सब।

इस समय देश को एक तीसरी तरह की श्रेणी के लाेगों की ज़रूरत है। जो ग़लत को ग़लत और अनैतिक को अनैतिक कह सकें। ये देश में न के बराबर लोग हैं। अगर हमें अपने देश और देश की व्यवस्था को अच्छा बनाना है तो इस श्रेणी में हमें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की ज़रूरत है। चमचे बनो तो देश के बनो। मानवता के बनो। इस धरती के बनो। राजनीतिक व्यवस्था में अनैतिकता, झूठ-फ़रेब और आपराधिक मानसिकता से वर्चस्व स्थापित करके सत्ता हासिल करने वाले लिप्सुओं के पीछे देश को बर्बाद करने के षडयंत्र में क्याें शामिल हो रहे हो?

अगर राजस्थान में 51 साल पहले लोकतंत्र को प्रहसन बना देने वाली कांग्रेस आपके सामने है तो गोवा, बिहार, मेघालय और कर्नाटक में लोकतंत्र का चीरहरण करने वाली भाजपा भी आपके सामने है। क्या इनमें कोई फ़र्क है?

अगर पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें पांच साल पहले बढ़ना ग़लत था तो वह आज भी है। अगर किसानों की दुर्दशा के लिए दस साल पहले प्रश्न उठ रहे थे तो वे आज भी उठने चाहिए। अगर पंद्रह साल पहले नोटबंद करना देश के साथ खिलवाड़ करना था तो वह आज भी है। अगर आज से बीस साल पहले किसी आतंकवादी घटना पर हमें सरकार बिना रीढ़ और बिना हड़डी की एक कमज़ोर अनैतिक लगती थी तो वह आज भी है। आख़िर ऐसा क्या है कि हम नागरिकों की बुद्धि में कोई राजनीतिक दल या कोई विचारधारा ऐसा इंजेक्शन लगा देती है कि आपके या हमारे विवेक और राज्यपाल के विवेक में कोई फ़र्क नहीं रह जाता? और आप ऐसा आचरण करने लगते हैं, मानो आप किसी के खिलौने, किसी की कठपुतली या किसी मदारी के सिखाए हुए बंदर हों! क्या ऐसा होना चाहिए। ऐसे जितने भी मेरे मित्र या बंधु हैं, सबसके सब ज़हीन और जीनियस हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वे किसी के अनचाने या अनचाहे ही दुष्टतापूर्ण कामों के प्रशंसक बन जाते हैं।

आओ, मित्रो, हम सब देश के सजग नागरिक बनें, तटस्थ रहें और ग़लत को ग़लत कहें। अगर हम में यह साहस नहीं है और हम किसी एक के खेमे में हैं तो हम में और उस भेड़ में कोई फ़र्क नहीं है, जिस लाठी लेकर एक गवाला हांक रहा है। और हां, याद रखें कि भेड़ तो भेड़ है। उसे कुदरत ने बनाया ही वैसा है। लेकिन आपको तो प्रकृति ने एक बहुत बेहतरीन मस्तिष्क और एक अतुलनीय हृदय दिया हुआ है, जिसे अच्छे और बुरे की पूरी पहचान करने की क्षमता से आपूरित किया गया है। और फिर भी आप बहुत गर्व के साथ किसी खेमे की भेड़ बनना पसंद करते हैं तो यह जानना दिलचस्प होगा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

और अगर आप शिक्षक, वकील, पत्रकार, लेखक, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश आदि में से कुछ हैं तो यह और भी शर्मनाक है।

क्षमा करें, मुझे यह कड़ी भाषा इस्तेमाल करने की इज़ाज़त अपनी भारत माता से मिली हुई है।

Tribhuvan


Credits: Tribhuvan's Facebook

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