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  • भारत के IAS अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि ब्रिटिश किसी इलाके में पैदा होने वाली समाजविरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझे

    त्रिभुवन


    गंगासिंह के गंगनहर लाने का मिथक

    गंग नहर
    गंग नहर

    महाराजा गंगासिंह गंगनहर निकालकर आए और भगीरथ की तरह साबित हुए। यह मिथक जाने कब से चल रहा है। जिसकी सत्ता होती है, इतिहासकार भी उसके दास होते हैं। आप बस एक बार एक मिथक बस साबित कर दीजिए, फिर बाकी काम हम पत्रकार मुफ़्त में करते रहेंगे। ये मिथक फिर चाहे पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक कितने ही क्यों न हों। हर युग की अपनी रामायण और हर युग के अपने राम होते हैं। हर सम्राट, हर बादशाह और लोकतांत्रिक शासक तक अपने आपको गौरवान्वित करने की आत्मप्रशंसा से बाज नहीं आते। उन्हें स्वयं एहसास नहीं होता तो हर राम को उनका तुलसीदास तलाश कर ही लेता है।

    गंगनहर और गंगानगर के इतिहास को लेकर मैं बीकानेर के अभिलेखागार से लेकर दिल्ली में तीन मूर्ति भवन के नेहरू मेमोरियल संग्रहालय तक की बहुत ख़ाक छान चुका हूं। इस पर मेरी एक किताब भी कंप्यूटर के किसी कोने में पड़ी है। तथ्य ये है कि 1876 से 1878 के बीच भयावना अकाल पूरे हिंदुस्तान में पड़ा था। यह ग्रेट फेमीन के नाम से इतिहास में कुख्यात है। इंपीरियल गजट ऑव इंडिया के थर्ड वॉल्यूम (1907 में प्रकाशित) के अनुसार इस अकाल ने देश के छह लाख 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपने बाहुपाश में ले लिया था। इसमें पांच करोड़ 85 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए थे और 55 लाख लोग भूखों मर गए थे। पंजाब और नॉर्थ प्रोविंस में आठ लाख और राजपूताने में कोई 20 लाख काल कवलित हुए। किसी को अनाज का दाना नहीं मिला और किसी को पानी की बूंद। मारे भूख के लोग मरे हुए जानवरों तक को खा गए या कीकर-जांटी के पेड़ों की छाल चबा-चबाकर मर गए।

     

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    लार्ड नार्थब्रुक
    लार्ड नार्थब्रुक

    इस अकाल ने दक्षिण भारत के राज्यों को भी बुरी तरह प्रभावित किया। इस अकाल ने ब्रिटिश सरकार के संवेदनहीन लोगों तक को बुरी तरह हिला दिया था। उन दिनों लॉर्ड नार्थब्रुक वायसरॉय थे। लेकिन वे 1876 में चले गए थे। लेकिन इस अकाल का सामना किया लार्ड लिटन ने, जो 1876 से 1880 तक वायसरॉय रहे। लॉर्ड नार्थ ब्रुक और लॉर्ड लिटन की डायरियाें में दर्ज टिप्पणियां रोंगटे खड़े कर देती हैं। वे यह भी बताती हैं कि भारतीय राजे-महाराजे, जिन्हें हमने आज लोकतांत्रिक कालखंड में सिर के ऊपर बिठा रखा है, कितना गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कर रहे थे। इन देशी शासकों और उनके सलाहकारों ने इस तांडव को भाग्य से जोड़कर अपने फर्ज़ से किस तरह मुंह मोड़ लिया था। आप भरोसा नहीं करेंगे, अगर उस समय जातिभेद से ऊपर उठकर काम करने वाला अंगरेज़ अमला नहीं होता तो दलितों और कथित अछूतों की जो हालत होती, वह अकल्पनीय थी। और बहुत हद तक रही भी।

    लार्ड रोबर्ट लिटन
    लार्ड रोबर्ट लिटन

    ख़ैर, उन्हीं दिनों लॉर्ड लिटन के बाद जब मार्केस ऑव रिपन वायसरॉय बनकर आए तो उन्होंने अकाल से निबटने की बड़ी योजना बनाई। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे विदेशी, भारत विरोधी और क्रूरशासक थे। उन दिनों उत्तर भारत के राजपूताना और बहावलनगर रियासतों में भुखमरी बहुत बढ़ गई थी। यहां के लाेगों ने पंजाब और नॉर्थवेस्ट प्रोविंस में चोरियां, डाके और बलात्कार शुरू कर दिए थे। आखिर बूभुक्षितों किं न करोति पापम् वाली स्थिति हो गई। यानी कि भूख से लड़ता आदमी कौन सा अपराध नहीं करता है! ऐसे हालात में जब पंजाब और ये प्रोविंस त्राहिमाम़् कर बैठे तो रिपन ने एक बड़ा सर्वे करवाया कि आखिर इस लॉ लेसनेस की स्थिति का कारण क्या है? वे किसी विदेशी सरकार या अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहराकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ गए। इस सर्वे को बहुत बुद्धमत्ता से सोशियो-इकोनॉमिक सोच वाले लोगों ने बड़े शानदार तरीके से किया और निष्कर्ष निकला कि अगर बहावलनगर और बीकानेर रियासतों में लोगों की बहबूदी की कोई परियोजना बने तो ये लोग बस जाएं और अपराध घटें।

    लार्ड जार्ज रॉबिनसन मार्कस आफ रिपन
    लार्ड जार्ज रॉबिनसन मार्कस आफ रिपन

    राजनीतिक विज्ञानियों, समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों ने मुकम्मल येाजना बनाकर कहा कि अगर सतलुज का पानी इन दोनों इलाकों में पहुंचा दिया जाए तो लोग खेती करेंगे और लोग खुशहाल हो जाएंगे। अर्ल ऑव डफरिन ने कोशिश की, लेकिन डूंगरसिंह नहीं मानें। वे बीकानेर के महाराजा था। मार्क्वेस ऑव लैंड्स डाउने ने भी कोशिश की, लेकिन उनके समय में एक बड़ी उम्मीद थी। उन दिनों बीकानेर कोई स्वतंत्र रियासत नहीं थी, जैसे उदयपुर, जोधपुर या जयपुर हुअा करती थी। बीकानेर में भले शासक डूंगरसिंह या गंगासिंह रहे, लेकिन वहां ब्रिटिश डोमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल का काम करती थी। यही मूल शासक थी। नाम मात्र को डूंगरसिंह और गंगासिंह थे। यह काउंसिल भारत सरकार तय करती थी। यानी बीकानेर सीधे तौर पर ब्रिटिश डाेमिनेटिड रीजेंसी काउंसिल से गवर्न होता था। बहरहाल, इसी काउंसिल ने डूंगरसिंह के समय ही गंगासिंह को मेयो कॉलेज में पढ़ाने, ऑक्सफॉर्ड भेजने और उन्हें सैनिक प्रशिक्षण देना तय किया था। ये राजपरिवार के नहीं, ब्रिटिश काउंसिल के फैसले थे। और इसके बाद अंगरेज़ों का पढ़ाया गंगासिंह जब शासक बना तो वह अंगरेज़ के फैसले हूबहू लेने लगा। जैसे आर्यसमाज के सुधारकों को बीकानेर से देशनिकाला देना। जैसे आज़ादी की मांग करने वालों को बाहर निकालना और स्कूल तक नहीं खुलने देना।

    महाराज गंगा सिंह
    महाराज गंगा सिंह

    लेकिन चूंकि अंगरेजों को अपने प्रोविंस में अपराध कम करने थे, इसलिए उन्होंने बजरिए गंगासिंह बीकानेर नहर का प्रोजेक्ट बनवाया और पूरा करवाया। यह लॉर्ड चेम्सफॉर्ड के समय यानी 1916 से 1921 के बीच बना। आपको यह भी याद दिलाता चलूं कि एक भयावना अकाल 1918-1919 के बीच भी पड़ा था। इस दौरान लॉर्ड चेम्सफॉर्ड वायसरॉय थे। इस काल ने भी उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक जो विकराल कहर बरपाया, वह अवर्णनीय है। इसके नतीजे भी घोर मानवहंता रहे। इस तरह बार-बार अकाल पड़ना और बार-बार अंगरेज़ों के सीधे शासन वाले उत्तर भारतीय पंजाब और साथ लगते प्रोविंसेज में जब अपराध बेकाबू हुए तो अंगरेज़ प्रशासन की यह धारणा सुदृढ़ हुई कि अगर इन अपराधों को नियंत्रित करना है तो उन इलाकों में नए रोज़गार पैदा करने होंगे, जहां से ये आपराधिक मानसिकता पैदा हो रही है। ऐसे लोगों को रोज़गार से जोड़ना होगा, जिनकी मानसिकता इस ओर चुंबकीय ढंग से आकर्षित हो रही है। इस सोच से सतलुज का पानी बीकानेर रियासत में भेजने का फैसला हुआ। यह सिर्फ़ बीकानेर नहीं, बहावलनगर और फ़ीरोज़पुर के लिए भी हुआ। इन तीनों के लिए नहरें निकाली गईं।

    आपको हैरानी होगी, 1923 में बीकानेर नहर, जिसे हम आजकल गंगकैनाल कहते हैं, वह 1925 में बनकर तैयार हो गई। दो साल में। यह काम अंगरेज़ों ने किया। भारतीय मज़दूरों का पसीना इस नहर में आज भी बहता है। गंगनहर के पानी में उन लाखों मजदूरों के उस पसीने की महक आज भी आती है। बीकानेर रियासत की प्रशासनिक और इंजीनियरिंग क्षमता जवाब दे गई तो पंजाब से अंगरेज़ सरकार ने जीडी रुडकिन और एक कमिश्नर, जिनका नाम फिलहाल मुझे याद नहीं आ रहा है, दो लोगों काे भेजा। इन दोनों ने गंगनहर के निकलने के साथ-साथ कालोनाइजेशन का काम शुरू किया और 1ए, दो ए, एक बीबी, चार बीबी, एक केके, दो केके, 25 एमएल, 24 एमएल, 8 टीके, पांच केके, 36 एलएनपी आदि आदि जैसे चकों के नाम हाउटलेट्स के, जिन्हें हम मोघा कहते हैं, हिसाब से निकाले। मेरा अपना गांव चक 25 एमएल है। मुख्य गंगनगर पर बने सुलेमान की हैड की शोभा और सम्मोहन आज भी कम नहीं होता है। सुलेमान की हैड का 1925 में बना पुल अभी कुछ साल तक जस का तस था। अब शायद वहां नया पुल बन गया है। लेकिन राखी और चूने के उस कमाल के सामने आधुनिक इंजीनियरिंग मारे शर्म के अपना चेहरा तो छुपा ही लेती होगी।

    लार्ड रुफुस मार्कस आव रीडिंग
    लार्ड रुफुस मार्कस आव रीडिंग

    लार्ड एडवर्ड वुड /लार्ड इरविन
    लार्ड एडवर्ड वुड /लार्ड इरविन

    महाराजा गंगासिंह से ज्यादा तो अर्ल ऑव रीडिंग और लार्ड इरविन ने किया। इन दोनों वायसरॉय ने 1921 से 1926 और 1926 से 1931 के बीच गंगनहर के लिए जो किया, वह रिकॉर्ड पर है। लार्ड इरविन तो 26 अक्टूबर 1927 के दिन फीरोज़पुर हैड पर बीकानेर नहर में पानी प्रवाहित करने के उद्घाटन के मौके पर माैजूद थे।द्ध गंगासिुह के साथ-साथ इस मौके पर मदन मोहन मालवीय जी को भी विशेष तौर पर बुलवाया गया था। आपको इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि गंगानगर का स्थापना दिवस 26 अक्टूबर नहीं है। यह तो पानी प्रवाहित करने का दिन है। इसे स्थापना दिवस का नाम एक स्वच्छेचारी कलेक्टर करणीसिंह ने कुछ साल पहले दिलाने की कोशिश की थी। इन करणीसिंह को गंगानगर के सरदार सुच्चासिंह ने चूरू से लाकर बड़ी कोशिशों से खुद पढाया लिखाया और कलेक्टर के आेहदे तक पहुंचाने में मदद की, लेकिन यह बंदा जब कलेक्टर बनकर आया तो इन्होंने गंगानगर के लोगों को बहुत निराशा किया। जनप्रतिनिधियों को सम्मान देना तो दूर, इनमें किसी प्रतिष्ठित नागरिक से पेश आने की शालीनता के मानदंडों को भी ताक पर रख दिया था।

    इन नहरों को निकालने का अंगरेज़ सरकार का मक़सद वाकई में न केवल पूरा हुआ, बल्कि ये हमारे आधुनिक प्रशासकों और आईएएस अधिकारियों के लिए अध्ययन और अनुशीलन का अनुकरणीय विषय होना चाहिए कि वे किसी इलाके में पैदा होने वाली समाजविरोधी गतिविधियों से किस तरह जूझें। अंगरेज़ों से हमें यह सीख तो लेनी ही चाहिए कि उनकी तरह अगर हम काम करें तो हम समस्याओं को दूर कर सकते हैं, अपराधों से लड़ सकते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने राजों-महाराजों की झूठी प्रशस्तियां कब तक पढ़ते रहेंगे और विदेशी आक्रांत के रूप में आए अंगरेज़ प्रशासकों की खूबियों और अच्छाइयों को निष्पक्ष होकर ग्रहण करने का काम कब करेंगे? हमें अपनी क्रूरताएं सदा करुणा के निर्झर लगती हैं। हमें अपनी मूर्खताएं बुद्धिमत्ता की प्रज्वलित ज्योतियां प्रतीत होती हैं। हमें अपने खलनायक दिव्य आत्माएं लगती हैं। लेकिन सच यही है कि आज हम एक आज़ाद और सबल देश हैं। हमें हर चीज़ को क्रिटकली ही देखना चाहिए। गंगनहर लाना तो दूर, गंगनहर का कनसेप्ट तक गंगासिंह के दिमाग में नहीं आ सकता था। यह अंगरेज़ों का काम था और उन्होंने किया। अंगरेज़ों ने गंगनहर ला दी, लेकिन गंगासिंह से लेकर आज के शासक तक पानी का सही बटवारा नहीं करवा सके। हमारे इंजीनियरों ने अपनी इंजीनियरिंग की समस्त मेधा को कलंकित कर दिया है। हमारे प्रशासनिक अधिकारी किसानों को कभी सही पानी नहीं दिला पाए। किसान मुड़ढ़ और टेल के पाटों में कारुणिक ढंग से पिस रहा है।

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    त्रिभुवन की अनुमति से उनकी फेसबुक प्रोफाइल से लिया गया

     

  • गौमाता का मांग-पत्र

    सामाजिक यायावर


    गुजरात से अपना मांग पत्र लेकर दो गाएं दिल्ली स्थित 7-लोककल्याण मार्ग (उर्फ़ सेवन रेस कोर्स रोड) के लिए निकली थीं। उदयपुर आते-आते वे थककर चूर हो गईं और भूख से बिलबिला उठीं। कई जगह तलाशने के बाद जब खाना नहीं मिला तो वे एक कंटेनर में मुंह मारने लगीं और अपने सिर फंसा बैठीं। हमारे फ़ोटो जर्नलिस्ट अमित राव ने जब फोटो खींचने की कोशिश की तो एक गाय ने धीरे से अपने गले में बंधा एक लिफ़ाफ़ा भरी आंखों से थमा दिया। इस लिफ़ाफ़े को खोला तो इसमें एक विनय- पत्रिका निकली, जो इस प्रकार है :-

    धेनु मां का आप सबको आशीर्वाद। हम भारत के हृदय का मर्मस्थल हैं। हमारा महत्त्व तो आप नहीं जानते। हमारा महत्त्व जानना हो तो आप उन नीरद सी. चौधरी की “दॅ कॉण्टीनेंट ऑव सरसी” पढ़ो; जिन नीरद चौधरी को आप सब सदैव गाली ही देते हैं, लेकिन उन्हें कुछ पढ़ो तो आपको हमारा भी पता चले। नीरद लिखते हैं : गाय आर्यों के साथ भारत आई। आर्यों का सौंदर्यबोध बहुत विकसित था और वे गायों और सांडों की सुंदरता से बहुत प्रभावित थे। दरअसल एक हृष्टपुष्ट सुंदर गाय या सांड से अधिक सुंदर प्राणी इस दुनिया में है भी नहीं। उसका चिकना सफेद रंग, तीखे नाक-नक्श, विवेकमयी भाव-भंगिमा और उसकी रंभाहट उसे एक विचित्र सतयुगी और सतोगुणी सात्विकता वाली आभा प्रदान करती है।

    हम गाय ही एक ऐसा प्राणी है, जिसकी प्रशस्ति वेदों आैर उपनिषदों में बिखरी पड़ी है। यह एक प्राणी ऐसा है, जो पशुत्व से ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है। प्रकृति के जीवों की यही एक कृति ऐसी है, जो आज तक भारतीय उप महाद्वीप में मानव जीवन को मां के बाद सबसे अधिक दुग्धपान करवाकर जीवनीशक्ति देती आई है। गाय ने ही हमारे खेतों में अपने बेटों को किसान बेटों के साथ लगाकर शस्य-श्यामल धरती में बदला। लेकिन अनादिकाल से गायों की आंखों में एक करुणा छलछलाती दिखाई देती है, जो साफ़ कहती है कि कभी उसके बेटों को जुए में जोत कर आहत किया गया तो आज वह एक पल कसाई के हाथ से छूटती है तो अगले ही पल कसाई से भी अधिक क्रूर भूख से जूझने को छोड़ दी जाती है।

    हम यह विनय पत्रिका लिख रही हैं कि क्या हमारे हित में गोभक्तों की यह सरकार और गोभक्तों का यह अपार संगठन हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता? क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और संघ परिवार के भारतीय जनता पार्टी सहित सभी अानुषांगिक संगठन हम गाय के लिए कुछ करने को तैयार हैं? क्या ये सभी संगठन अपने-अपने संविधान में नहीं बना सकते कि इनके किसी भी संगठन के सदस्य होने के लिए गाय का पालन ज़रूरी होगा। वह घर में नहीं पाल सकता तो उसके लिए किसी गोशाला में उस गाय के पालन लायक पैसा देगा।

    विधानसभा का टिकट सिर्फ़ उसी व्यक्ति को मिलेगा, जो कम से कम 100 गायों को नियमित रूप से पाल रहा होगा। लोकसभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो कम से कम 250 गायों के पालन लायक गोशाला का संचालन करवा रहा होगा। राज्य सभा का टिकट उसी को दिया जाएगा, जो 500 गायों की क्षमता वाली गोशाला का बेहतर प्रबंधन अपने स्तर पर करवा रहा होगा। और राज्य सरकार में वही व्यक्ति मंत्री बनेगा, जो 1000 गायों और केंद्र में वह जो 2500 गायों से ज्यादा की क्षमता वाली गोशालाओं का शानदार संचालन करवा रहे होंगे।

    भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था प्रकट करने आैर गोमाता की सेवा करने का इससे इतर और क्या श्रेष्ठ उपाय हो सकता है? यह क़दम उठाना इन सब लोगों की नैतिक जवाबदेही भी है, क्योंकि ये लोग जिस गोमाता के नाम पर वोट मांग रहे और देशवासियों की सहानुभूति बटोरकर चुनाव में जीत दर्ज कर रहे हैं, उसके लिए गोमाता की प्रति इनको अपना उत्तरदायित्व निभाना जरूरी है। आख़िर अगर आप अपनी निष्ठाओं को रचनात्मक रूप तो देना ही चाहिए।

    ये लोग यह प्रतिज्ञा ख़ुद भी करें और आप जैसे लोगों से भी करवाएं कि आप केवल गाय का घी खाएंगे। गाय का ही दूध पिएंगे। दही या पनीर वही लेंगे, जो गाय के दूध से बना हो। मिठाई वही खरीदेंगे, जो गोघृत से बनी हो। हम सिर्फ़ उसी होटल में रुकेंगे, जो गाय के दूध को ही इस्तेमाल करता हो। हम सिर्फ़ उसी विमान में सवारी करेंगे, जो गाय के दूध का प्रयोग करता हो। हम सिर्फ़ उसी को वोट देंगे, जिसके घर गायें बंधी हों।

    यह भी संकल्प लें कि हम ऐसे चमड़े से बनी किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करेंगे, जो गाय का हो। हम ऐसे किसी देश से मित्रता नहीं करेंगे, जो गोमांस का प्रयोग करता हो। हम ऐसे किसी व्यक्ति से हाथ नहीं मिलाएंगे, जो गोमांस खाता हो। हम ऐसे देश में जाकर अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं समझेंगे, जहां गोमाता कटती हो। हम ऐसे देशों के ऐसे होटलों में तो रुकेंगे ही नहीं, जिनके किचन में गोमांस पकता हो! हम अपने बच्चों को ऐसे देशी-विदेशी संस्थानों में पढ़ने नहीं भेजेंगे, जहां गोमांस का प्रचलन हो!

    मुझे लगता है, ये बेटे हम गोमाताओं के लिए भी वैसा ही दिखावटी प्रेम रखते हैं, जैसा आजकल के बेटे रखते हैं। अपने वेतन से पांच रुपए मां के खाते में जमा नहीं कराते, लेकिन मदर्स डे पर मां की बड़ी-बड़ी तसवीरें लेंगे, सेल्फी खिंचवाएंगे! सच तो ये है कि मुझ गोमाता से प्रेम और सैद्धांधिक आबद्धता रखने वाले लाेग हैं ही नहीं ये। कुछ लोग हम गायों के नाम पर देश का वातावरण तो ख़राब करना चाहते हैं, लेकिन हम गाय के प्रति उनके मन में वैसी सैद्धांतिक दृढ़़ता नहीं है, जो वास्तविक और एक पवित्र गोप्रेमी हृदय में होनी चाहिए। अगर होती तो वे ऊपर लिखी हुई प्रतिज्ञाएं करते। हम गाय को आज कचरे के ढेरों पर भूख से लड़ने और सड़कों पर मरने को निष्ठुर नहीं छोड़ देते। हमारी दुर्दशा को लेकर लोगों का दुहरा आचरण देखकर मन में करुण रुदन हो उठता है। हमारा निवेदन है कि हम गायों को आप जीवन, मरण, इहलोक और परलोक मानना बंद करो। हम गायों का भजन, पूजन, साधन आैर आराधन अब समाप्त करो। बहुत पाखंड हो लिया। अगर कुछ कर सकते हो तो हमारी हालत सुधारने के लिए कुछ करो। और जो हमने कही हैं, वे संकल्प लो। नहीं तो हमारा नाम लेना बंद करो।

    पुनश्च:
    और हॉं सुनो, तुम सब पूत कपूत हो सकते हो, लेकिन हम माता कभी कुमाता नहीं होंगी!!!

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    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार

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  • ओमप्रकाश बंसल :: जांबाज़ और बहादुराना पत्रकारिता का वह चेहरा, देश का संभवत: ऐसा अकेला पत्रकार, जिसने बमुश्किल 500 प्रति के सर्कुेशन के बावज़ूद हाईकोर्द के दस से ज़्यादा जजों को हटाने पर मज़बूर कर दिया

    त्रिभुवन


    ओमप्रकाश बंसल  नहीं रहे। वे प्रशांत ज्योति के संपादक थे। उनके नाम से नेता, अफ़सर और बड़े-बड़े लोग ख़ौफ़ खाते थे। किसी के भी ख़िलाफ़ ख़बर हो, रोकने का प्रश्न ही नहीं। इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि उनके पिता को एक बार पुलिस ने सट्टा करते हुए गिरफ़्तार कर लिया तो उन्होंने क्राइम रिपोर्टर के रूप में अपने पिता के भी ख़िलाफ़ ख़बर लिखी। उनके एक भाई सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे, उनके बारे में भी कई बार ख़बरें छपीं। किसी का कितना भी बड़ा विज्ञापन उनके अख़बार में छप रहा हो, ख़बर न रुकती थी और न डायल्यूट होती थी। फ़्रंट की है तो फ़्रंट पर छपेगी और अंदर की है तो अंदर। विज्ञप्ति को पहले पेज पर तो क्या, भीतर के किसी पेज पर भी जगह मिल जाए तो गनीमत समझो। वे देश के संभवत: ऐसे अकेले पत्रकार थे, जिसने के बमुश्किल 500 प्रति के सर्कुेशन के बावज़ूद हाईकोर्द के दस से ज़्यादा जजों को हटाने पर मज़बूर कर दिया।

    मैंने अपनी पत्रकारिता प्रशांत ज्योति से शुरू की थी। यानी वह मेरे लिए पहली तनख़्वाह वाला अख़बार था। औम जी के किस्से कहीं से भी शुरू करो, ख़त्म नहीं होंगे। वे अनूठे जीवंत कैरेक्टर थे। क्राइम का वैसा रिपोर्टर मैंने कहीं नहीं देखा। किसी जगह पर पेड़ कटने की ख़बर आज भी हम लोगों के लिए कोई बड़ी ख़बर नहीं होती, लेकिन उन्होंने कुछ पेड़ कटे तो सिंचाई विभाग के तीन इंजीनियरों को जेल दिखाकर दम लिया। एक डाॅक्टर थीं कृष्णा गेदर। कलेक्टर थे आरएस गलूंडिया। गेदर से आंख में दर्द की दवा लाए तो 120 रुपए का बिल पास करवा लिया। उन दिनों आरटीआई वारटीआई नहीं हुआ करती थी। बंसल जी ने डोक्यूमेंट्स लिये, ख़बर छापी और कार्रवाई शुरू कर दी। गलूंडिया जी ने बंसल जी से आख़िरी क्षणों में माफ़ी न मांगी होती तो वे जेल में हाेते। लेकिन भाई रेवतीरमण ने उनका जितना साथ दिया और जिस दौर में दिया, वह कोई और नहीं दे सकता था।

    उनके कुछ किस्से तो ग़ज़ब ही हैं।  जैसे :

    • कहां जा रहा है?
      फ़ोन करने।
      तो ये फ़ोन है या बेरिये की…।
      अरे, वो बाहर करना था।
      एसटीडी?
      नहीं, आईएसडी।
      तो क्या हुआ? इसमें आईएसडी भी है, मिस्टर।
      मेरी तनख्वाह है छह सौ और आईएसडी का बिल आएगा 900 का।
      फ़ुकरिया समझा है क्या? आेए, बाहर नहीं जाएगा। ले पकड़ फ़ोन। कर यहीं से। बाहर कभी आईएसडी करने गया तो ये रही बंदूक, गोली मार दूंगा!
    • एक माननीया : बंसल जी, मुझे आज अापके …ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं बैठने दिया।
      क्यूं?
      बोला, तू कहां की पत्रकार है? तू तो विज्ञापन का काम करती है।
      हम्मममम ….कौन है रे अंदर। अरे सक्सेना!
      ..आज से संपादक सुदर्शना शर्मा….और डिक्लेयरेशन क्लियर होने से पहले प्रेसलाइन में उसी दिन से संपादक का नाम बदल गया।
    • नगर परिषद के चुनाव थे। एक बहुत बड़े ट्रांस्पोर्टर चुनाव में उतरे। चुनाव कार्यालय पुरानी धानमंडी में खोला। ठीक प्रशांत ज्योति के सामने। सुबह-सुबह लाउड स्पीकर शुरू। बंसल जी को सिरदर्द की पुरानी प्रॉब्लम थी। दोपहर दो बजे आए।
      बोले : ये क्या है? दो-चार बार सेठ जी से अनुरोध किया कि स्पीकर हटा लें। नहीं माने तो उन्होंने कलेक्टर को फ़ोन लगाया। बोले : कलेक्टर साहब, दो घंटे में या तो ये लाउडस्पीकर हटा दो। नहीं तो मैं तुम्हारी ….में लगा दूंगा!जिला कलेक्टर ने कोतवाली पुलिस को भेजा कि जाओ इस जाहिल को गिरफ़्तार करके लाओ। कोतवाल माफ़ी मांगते हुए आए और इस बीच किसी ने कलेक्टर को समझा दिया कि आप अपमान का घूंट व्हिस्की समझकर पी जाओ। नहीं तो कल आपके दिक्कत हो सकती है। उन्होंने कहा : मैंने ऐसा क्या किया है? सामने अॉफ़िसर ने समझाया : सर, वो आपकी घड़साना वाली ज़मीन के काग़ज़ उनके ही पास हैं! उसी दिन शाम को कलेक्टर का संदेशवाहक प्रशांत ज्योति कार्यालय में था और कलेक्टर साहब विनयावनत मुद्रा में। लाउडस्पीकर तो कभी का उतर चुका था।

    प्रशांत ज्योति का पुराना कार्यालय धानक धर्मशाला में एक ऊंचे चबूतरे पर हुआ करता था। उसे बंसल जी अधिकारपूर्वक "मेरा थड़ा" कहा करते थे। उन्हें छोटी सी बात पर गुस्सा आ जाया करता था तो सामने बैठे रिपोर्टर हो या कोई बड़े सेठ जी, बोलते थे : उतर मेरै थड़ै ऊं!!! और उनका यह तकियाकलाम तब भी था जब वे धानमंडी के भूतल में अपनी मित्र के साथ बैठे रहते थे!

    इतिहास और धर्म से संबंधित पुस्तकों के वे बेहद शौकीन थे। उन्होंने एक बार मेरे पास एक ऐटलस देखा।
    बोले : कितने का है?
    मैंने कहा : 9000 का।
    बोले : ले चेक। दे दे।
    मैंने मना किया तो बोले : पता बता। मंगवा के दे। ये ले चेक।
    किताब चाहे कम्युनिज्म की हो या कौटिल्य की, खूबी बता दो तो बंदे से भले 50,000 रुपए ले लो।

    वे एक नेकदिल इनसान थे। फक्कड़ थे। भावुक थे। कोई चाहे उन्हें किसी अपराधी के पक्ष में मोड़ दे या साधु के। कई लाेगों ने उन्हें झूठे अत्याचारों के किस्से सुनाकर कई बार गलत ख़बरें भी छपवाईं और बाद में मैंने बंसल जी को रोते हुए भी देखा।

    कई बार वे 360 डिग्री घूम जाया करते थे। अगर कोई तथ्य ला दे तो। इस तरह की उनकी आदतों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका भी। लेकिन वे जिस पर भरोसा करते थे उस पर इतना करते थे कि वह चाहे उन्हें कुछ भी कह दे और कर दे, लेकिन अगर किसी ने उन्हें कुछ भर दिया तो आज का सोना कल की राख भी हाे सकता था। वे विचलनों और विद्रोहों के बीच संतुलन साधने की चालाकी नहीं जानते थे। वे किसी एक व्यक्ति के साथ अत्याचार होने पर पूरी कम्युनिटी से भिड़ जाते थे और इसीलिए वे औमप्रकाश बंसल थे। वे अफ़सरों से भिड़ते भी थे, लेकिन उनके साथ खड़े भी हो जाते थे। राजस्थान के टॉप ब्यूरोक्रैट रामलुभाया जिन दिनों कलेक्टर थे, उन्होंने अस्पताल को सुधारने का बीड़ा उठाया तो सब अख़बार वाले डॉक्टरों के साथ थे, लेकिन बंसल अकेले रामलुभाया के साथ।

     

    गंगानगर में पुरी के जगदगुरु शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ आए थे। उन दिनों सती विवाद चल रहा था। निरंजन देव सती समर्थक थे और कह रहे थे कि वेदों में सती का समर्थन है। बंसल जी ने मुझे बुलवाया। बोले : आपके पिताजी से पूछो कि वेदों में सती का समर्थन है क्या? मैंने बताया कि वे कह रहे हैं नहीं है। बोले : इस शंकराचार्य के खिलाफ केस भी करवाना है और इसे भगाना भी है। करीब दस हमने खबरें लिखीं। शंकराचार्य से प्रश्न पूछते। वे रात को जवाब देते। लेकिन पांच दिन बाद ही हमारी खबरों को लेकर पुलिस ने केस दर्ज किया और शंकराचार्य रातोरात भाग गए। उस दौर में पूरा मीडिया एक साथ था और शंकराचार्य अकेले पड़ गए।

     

    ख़बरों में वे किसी को नहीं बख्शते थे। किसी समय कम्युनिस्ट उनके दोस्त हुआ करते थे। आज भी हैं। लेकिन उन्होंने एक ख़बर निकाली जब सीपीएम नेता हेतराम बेनीवाल सीटू के नेता हुआ करते थे और जेसीटी मैनेजमेंट ने उनके बेटे की शादी में 51000 रुपए का बान दिया था।

    कानून की वैसी बारीकियां मैंने किसी संपादक में नहीं देखीं। क्राइम इन्वेस्टिगेशन की वैसी हूक शायद ही किसी में हो। पुलिस से आगे और ज्यादा तथ्यों के साथ। कई उलझे हुए मर्डर केसों में उन्होंने जांच की धारा बदल दी। कानून और पत्रकारिता मिलकर किसी का कितना फ़ायदा कर सकते हैं, यह चीज़ उन्होंने बार-बार साबित की।

    एक बार एक दोस्त को उन्होंने पूरा अख़बार संभालने को दे दिया। कुछ दिन बाद दोस्त दिखाई नहीं दिए। मैंने पूछा : ….कहां हैं? वे इधर-उधर देखने लगे। फिर भीतर आवाज़ दी : …कहां है? जल्दी लाओ कहां है? ….कुछ देर बाद अंदर से एक कंपोजीटर ब्लेड लेकर बाहर आया। मैं हंसा। गुस्से से बोले : हंसता क्याें है? मैंने कहा : ये तो ब्लेड है। बोले : नहीं, ये ब्लेड नहीं है। ये तो …..है! बाद में उन्होंने एक्सप्लेन किया कि वो आपका बंदा दिन भर इस ब्लेड से दूसरे अखबारों की खबरें काटकर यहां दिया करता था तो मैंने उस दिन से उन्हें कहा, तुम जाओ और आज से ये ब्लेड प्रशांत ज्योति का न्यूज एडिटर!

    वे बच्चे की तरह सरल स्वभाव भी थे। एक बार उनका अपने एक पुराने मित्र से झगड़ा हो गया और ऐसा हुआ कि बस पूछो मत। मैंने उनसे पूछा : आप तो दोस्त थे। ये गिरावट कैसे? बोले : उसने मेरी कपड़े की दुकान बंद करवाकर पान का खोखा शुरू करवा दिया। इसलिए। मैंने कहा : आप पहले कपड़े की दुकान करते थे? वे बोले : नहीं। मैं डेली अख़बार निकालता था। ये बोला : देख बंसल, विज्ञापन तो डेली मैं भी इत्ता ई आवैगा और वीकली मैं भी इत्ता ई। क्यूं खरचो करै? तो मैंने उसकी सलाह मानकर अखबार को डेली से वीकली कर दिया। यानी कपड़े की दुकान को पान के खोखे में बदल दिया। मैंने कहा : ये तो आपकी गलती है। आपने उनकी बात क्यों मानी? बोले : यार ये तो मैंने आज तक सोचा ही नहीं। मैं तो जो कोई आता है। उसी की मान लेता हूं! मैंने कहा : आपका दोस्त कहता है : आप रात को पेटीकोट पहनकर घूमते हो! वे बहुत हंसे। बोले : यार पुराना दोस्त है। वही अंदर की बात जान सकता है! मुझे लगा, वे गुस्से से भर उठेंगे। लेकिन उन्होंने जोर से हंसते हुए बताया : यार, मैं लुंगी बांधता था। मेरा पेट बड़ा था। लुंगी खुल जाती थी। ये चौधरी ने सलाह दी : यार बंसल, तेरी ये लुंगी बार-बार खुल जाती है। तू इसे आगे से सिलवा ले। मैंने सिलवा ली। ये फिर भी गिरती रही। वो बोला : यार तू इसका नेफ़ा बनवा और नाला डाल ले। मैंने उसकी वो बात भी मान ली। …फिर कई दिन बाद साला मजाक करने लगा : यार ये तेरा पेटीकोट!!! अब देख…तू फिर मुझे कहेगा कि ये भी ग़लती मेरी ही ही है। चल उतर मेरे थड़े से!!!

    साहित्य को वे बहुत सम्मान से देखते थे। उन्होंने रविवार का पूरा अख़बार ही साहित्य को समर्पित कर रखा था। ऐसे कई मौके आए जब हमने पहले पन्ने पर हिन्दी की बेहतरीन रचनाएं छापीं।

    उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं। लेकिन एक पहलू ऐसा है, जो शायद औमप्रकाश बंसल ही कर सकते थे। इन विषयों पर फ़िल्मों में काल्पनिक पात्रों को जीने वाले हीरो तो करते रहे हैं, लेकिन आम जीवन में वैसा दुस्साहस करना हर किसी के बस की बात नहीं। अपने जीवन में उठाया उनका यह कदम उनमें लाख अवगुण हों तो भी उन्हें ढांप लेता है और उन्हें मेरी नज़र में उन्हें एक नायक की छवि प्रदान करता है।

    आज बंसल नहीं रहे, बात इतनी सी नहीं है। वह अनगढ़ और अनचीन्हा व्यक्तित्व नहीं रहा। एक अदभुत चरित्र नहीं रहा। एक असाधारण व्यक्ति नहीं रहा। उनके साथ ही मेरे शहर की जांबाज़ और बहादुराना पत्रकारिता का वह चेहरा चला गया, जिसमें दसों रस समान वेग से बहते थे।

     


    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार

  • अपने-अपने अहंकारों का हिसाब किसी और तरह बराबर करें। प्लीज़।

    सामाजिक यायावर


    एक बहुत पुरानी कहावत है। बुज़ुर्ग कहते आए हैं। अगर अपने वस्त्र उघाड़ेंगे तो अपनी ही नग्नता दिखाई देगी। हर चीज़ का न सुबूत होता है और न यह ज़रूरी कि हर चीज़ दिखाई ही जाए। सर्जिकल स्ट्राइक मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष ही नहीं, पूरे मीडिया में जो बहस चल रही है, वह हमारे देश की जगहंसाई कराने के लिए काफ़ी है। दुनिया में राष्ट्रवाद और राष्ट्रराज्य की विदाई का समय आ चुका है और हम अभी तक पूरी तरह राष्ट्र ही नहीं हो सके हैं।

    हमारे देश में या तो राष्ट्रवाद के स्वयंभू ठेकेदार हैं और वे अपने अलावा किसी दूसरे को राष्ट्रवादी मानना ही नहीं चाहते या ऐसे लोग जिनके लिए राष्ट्र से पहले व्यक्तियों की जमात है। ऐसे लोगों के लिए उनके अपने अलावा सब देशद्रोहीनुमा चीज़ हैं। एक वर्ग ऐसे लोगों का है, जो लोकतांत्रिक ढंग से पांच साल के लिए चुने हुए लोगों की किसी भी बात को गले से नीचे उतारने को तैयार नहीं हैं। ये सब वे लोग हैं, जिन्होंने चुनाव में और उससे पहले कभी इस देश के पीड़ित लोगों के अांसू पौंछने का कोई काम नहीं किया। ये सब विचारधारा के कड़ाहों में उबलते रहे हैं।

    मुझे तो कई बार लगता है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए उतनी मेहनत की ही नहीं, जितना परिश्रम सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहनसिंह, दिग्विजयसिंह, पी चिदंबरम्, कपिल सिब्बल आदि ने नरेंद्र मोदी की राह आसान बनाने के लिए किया। उनकी सरकार के पहले तीन साल का रिकॉर्ड मुखर होकर कह रहा था कि सीटें ज्यादा नहीं आएंगी, लेकिन सुनता कौन था? नरेंद्र मोदी के बारे में मैंने सबसे पहले वामपंथी अभियानों के दौरान बांटे जाने साहित्य के माध्यम से सुना था। वामपंथियों को मोदी को राष्ट्रव्यापी हिन्दू हृदयसम्राट बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी।

    इस बात के कि वे गुजरात में उनके धत्कर्मों पर फोकस करके गुजरात में उन्हें रोकते। यह एक लोकतांत्रिक तरीका होता। लेकिन आज जो मोदी को लेकर अरण्यरोदन हो रहा है, वह अप्रासंगिक होता जा रहा है। आज सर्जिकल स्ट्राइक पर बहस करने वाले तीन साल बाद चुनावों के आते-आते इतने थक जाएंगे कि बोल ही नहीं निकाल पाएंगे, जबकि वही उचित समय होगा। अभी तो बच्चे की जान मत लीजिए, उसे फस्ट टेस्ट, सैकिंड टेस्ट, थर्ड टेस्ट, कॉपी चेक, हाफ़ इयरली आदि देने दीजिए। फ़ाइनल आए तो फिर ख़बर जरा कस कर लीजिएगा। जैसे लोगों ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, दिग्गी राजा, चिदंबरम, सिब्बल आदि की ली। लेेकिन मुझे लगता है, तब आपके तेवर ऐसे नहीं रहेंगे।

    लेकिन आप संवैधानिक ढंग से सत्ता में आ जाते हैं तो इसका मतलब यह भी नहीं होता कि आपकी आलोचना नहीं की जा सकती। इस देश की लोकशाही को अधिकार है कि वह ख़राब प्रश्नपत्र करने वाले बच्चे को दीवार की तरफ़ मुंह करके खड़ा कर दे या मुर्गा बना दे। मुर्गा वुर्गा आजकल लोगबाग कम बनाते हैं, क्योंकि बच्चों की माएं बहुत हल्ला मचाने लगती हैं। फिर भी अापकी ग़लती पर आपको ग्राउंड के चार चक्कर तो लगवाए ही जा सकते हैं।

    खैर, एक खेमा है, जो पहले सत्ता में रही अपने विरोधी दलों की सरकारों की हर अच्छाई की तो आलाेचना करता ही था, उन बुराइयाें पर तो कोहराम मचाता था, जिन्हें आज उन्होंने अपना प्रिय कंठहार बना रखा है। एफडीआई, पाकिस्तान को सबक सिखाना, चीन की चीं बुला देना, स्वदेशी आदि ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिन पर पूरा संघ परिवार पहले दिन से शीर्षासन की मुद्रा में है। पुराने ऑडियो और विडियो सामने आए तो मारे शर्म के ऐसे-ऐसे कदम उठाने पड़े, जिनसे किसी भी जिम्मेदार नेता को बचना ही चाहिए। आख़िर यह कौन-सा आत्मसम्मान है, जो आज चीन की हर चीज़ के बहिष्कार का नारा लगाता है, लेकिन हमारे प्राणप्रिय नेता सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने की बारी आती है तो आप भारतीय हस्त लाघव वाले शिल्पकारों को भूल कर चीन की शरण में चले जाते हैं। आप अगर किसी ऐसी चीज़ का सहारा लेंगे, जो उचित नहीं है तो अनुचित प्रश्न भी आपके सामने जीभें लपलपाएंगे।

    इसलिए एक जिम्मेदार और सुसंस्कृत देश के नागरिक होने के नाते जिम्मेदार और सुसंस्कृत अाचरण ही करना चाहिए। आप अपने अहंकारों के लिए देश के दर्प को दांव पर मत लगाइए। अगर आपका उपहास उड़ता है तो अपनी पुरानी ग़लतियों पर अफ़सोस कीजिए, न कि उन पर गर्वीला पर्दा डालिए। यही पश्चाताप है। अगर इस देश ने किसी को संवैधानिक तौर पर चुना है तो बर्दाश्त कीजिए, क्योंकि करोड़ों लोग अपने नापसंद नेताओं को सत्तासीन होते मन ही मन कुढ़ते रहे हैं। उनके मन में 68 साल की दबी हुई कुंठा अगर उबाल नहीं खाएगी तो किसकी खाएगी? इसलिए देश को देश रहने दें। अपने-अपने अहंकारों का हिसाब किसी और तरह बराबर करें। प्लीज़।

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    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार