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  • इस लोकतंत्र का नाश हो!

    Tribhuvan

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    लोकतांत्रिक शासन की इस राजसी संस्कृति की क्षय हो। इस लोकतांत्रिक संस्कृति से लाख गुना बेहतर राजाशाही, बादशाही और किंगडम की वह संस्कृति थी, जिसमें शासन का शीर्ष व्यक्ति सेना के साथ सबसे आगे खड़े होकर हरावल दस्ते में सीना तानकर खड़ा होता था। ऐसे शासक न केवल स्वयं को बचाकर लाते थे, अपने हर सैनिक के प्राण भी उनके लिए अमूल्य थे। सैनिक मरते थे तो शासक भी मरता था और शासक बचता था तो सैनिक भी बचते थे। कई बार शासक वीर गति को प्राप्त होता था और सैनिक बच जाते थे। शासक और सैनिक के बीच जीत और हार का ही नहीं, प्राणों से जुड़ा रिश्ता भी हुआ करता था।

    वह शासक जानता था कि मेरा फ़ौजी मरेगा तो मैं भी मरूंगा और फ़ौजी समझता था कि बादशाह मरेगा तो मेरा मरना तय है। लेकिन अब फ़ौजी ही मरता है। सैनिक ही मारा जाता है। न इधर के बादशाह का बाल बांका होता है और न उधर के शासक का। शासक तो शासक हैं। इधर वाला शपथ लेगा तो उसे ख़ास मेहमान बनाकर बुलाएगा और उधर वाले का मन आया तो वह आसमान से उड़ते राजा को कहेगा, आ भाई, दो घूंट छक ले।मेरे बेटे का ब्याह है। और वह राजा सारी दुश्मनियां भुलाकर अपने जहाज को तत्काल तथाकथित दुश्मन के आंगन में उतारेगा और उतरते ही उसे बांहों में भर लेगा।

    आज के बादशाह को अपने सैनिक का ख़ून अपना ख़ून नहीं लगता। वह उसे पराया ही लगता है। गुरु गोबिंदसिंह के पास बहुत छोटी सेना थी। उनके लिए एक-एक सैनिक बहुत कीमती थी। तो उन्होंने थियोरी निकाली : सवा लाख से एक लड़ाऊं। और हमारे लोकतांत्रिक शासक ऐसे कमज़र्फ़ हैं कि वे एक से सवा लाख को लड़ा रहे हैं।

    बादशाहों और राजाओं के ज़माने में किसी सैनिक के रक्त की एक बूंद गिरती तो उन्हें लगता था कि किसी का रक्त गिरा है। जो महाराणा प्रताप और शिवाजी को लगता, ठीक वैसा ही अक़बर और औरंग़ज़ेब को लगता। वे सैनिकों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते थे।

    वे भाई का खून बहा सकते थे, पिता को जेल में डाल सकते थे, अपने भतीजे, भांजे या भाई की आंख में लौह तप्त सलाखें डाल सकते थे, क्रूरतम हो सकते थे, लेकिन अपने सैनिक को मरा हुआ नहीं देख सकते थे।

    सैनिक की सुरक्षा सबसे बड़ी सुरक्षा थी उनके लिए। वे युद्ध और योद्धा का धर्म निभाना जानते थे। वे पिता के शत्रु हो सकते थे, लेकिन अपने सैनिक की जीत उनकी जीत और अपने सैनिक की हार में वे अपनी हार देखते थे।

    अगर किसी दुश्मन ने सैनिक की उंगली काटी तो शासक यह मानता था कि दुश्मन ने उसके हाथ को काटने की कोशिश की है। यह राजाशाही थी। यह किंगडम थी और यह बादशाहत हुआ करती थी। यह शिवाजी का धर्म था। यह महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की शासन शैली थी। यह सिकंदर और नेपाेलियन की राह थी। उस पुराकालीन और आज के समय में लगभग अप्रासंगिक हो चुकी शासन संस्कृति के मुग़ल बादशाह रहे हों या महाराणा प्रताप, पृथिवीराज चौहान, शिवाजी, महाराणा कुंभा या विक्रमादित्य या फिर भोज आदि, इन सबकी एक खूबी यह थी कि वे जनता के दुखदर्द को भी सुनते थे और ऐसा कभी नहीं हुआ कि उन्होंने लोगों की जमीन बिकवा दी हों, उनका अन्न छीन लिया हो या फ़सलें बर्बाद कर दी हों या लोग न्याय के लिए भटकते रहे हों, फिर भी उन्होंने अपने ही लोगों को ऐसे खेमे करके नहीं मरवाया, जिसमें एक पक्ष किसी भी तरह के रंग का आतकंवादी करार दे दिया गया हो और उसे नाराज़ जनता मानने होते हुए भी उन्हीं के बेटों को उनके खिलाफ़ सैनिक बनाकर लड़ने लगा दिया गया हो।

    लेकिन कमीनी हिटलरशाही अपना ख़ून बहाना पसंद नहीं करती। वह मानती है कि राजा का खून पवित्र खून होता है। फिर वह 1947 के तत्काल बाद का हो या 2017 का शासक।

    और ऐसे शासकों के लिए सैनिक का रक्त रक्तू नहीं, पानी से भी गया गुजरा होता है। पानी की एक बॉटल भी ऐसे शासकों को वीरगति प्राप्त सैनिक के खून से सस्ती लगती है।

    और आज तो हालात ये हो गए हैं कि हमारे शासकों ने ऐसी संस्कृति बना दी है कि वे पानी तो बचाने की बात करते हैं, लेकिन सैनिकों का रक्त उनके लिए नितांत मूल्यहीन है। इतना कि चाहे जितना बहाओ। बस, पानी बचाओ। पानी रहेगा तो जीवन रहेगा। रक्त का क्या है, हमारे पास इतने सैनिक हैं, बहाते जाओ। आप अपने दिलों और दिमागों के ताले मत खोलना। आप मत समस्याओं का समाधान निकालना। आपको निकालना भी क्यों चाहिए? क्योंकि कौनसा आपका बेटा मर रहा है।कौनसा आपके पोते का रक्त जा रहा है। आपको तो अपने लाल प्यारे हैं और वे ऊंची नौकरियां करेंगे, करोड़ों के बिजनेस करेंगे, साधु भी हो गए तो या परम-वैभवशाली मठ बना लेंगे, दस-बीस हजार करोड़ की कोई पतंजलि कंपनी खोल लेंगे। इन सब जगहों पर प्रधानमंत्री शीश नवाएंगे। आप पूजनीय कहाएंगे।

    और सैनिक कौन? अरे हमारे घर का जवान। किसान का लाल। भारत का सपूत। इस धरती का बेटा। किसी गांव के भाेले-भाले सहज भारतीय परिवार का गौरवशाली भाल। बेटे और लाल तो तुम्हारे भी हैं इस महान् लोकतंत्र के महान् शासको, लेकिन क्या तुम भेजते हो कभी सरहद पर?

    इस महान् और देशभक्त शासको, मैं तुम्हें 1947 से देख रहा हूं। अरे, भेजा है कभी आपने अपने बेटे को कि जाओ तुम अपनी दाईं बाह कटा आओ। जाओ तुम अपनी गर्दन में एक खंजर झेल आओ। जाओ, अपनी तर्जनी पर एक ब्लेड न सही, हिन्दूमलकोट या जैसलमेर की तपती धरती पर कुछ घंटे रेत पर फिराकर ही देख लो। कभी कुछ घंटे कराकोरम या कश्मीर के शीर्ष पर उस वेशभूषा में कुछ घंटे बिताकर देखो, जहां हमारे सैनिक आपाद मस्तक अपने शौर्य को प्रतिमा की तरह 1947 से स्थापित किए हुए हैं।

    नेता ही नहीं, नेताओं के मानसिक गुलामों को भी देखिए, जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है और पैसे के लिए ही अपने देश के भीतर मौत का मंजर कायम करने को उत्कंठित होकर टीवी चैनलों से पूरे देश को लड़ ही मरो, कट ही मरो का संदेश देेने में सबसे आगे हैं।

    अरे कभी सोचा है, नामुरादो कि एक सैनिक मरता है तो उसके घर में कैसा मंजर होता है। शासन जैसा लोककल्याण का महान् मार्ग है, लेकिन वह कार्पोरेट के दासों से अटा पड़ा है। छलिए ही छलिए। अच्छे हर जगह हैं। हर दल में हैं और ज़हर से आप्लावित सोने के घड़े लेकर चलने वाले भी हर जगह हैं। ऐेसे जाली नेताओं के गुलाम और मीडिया जैसे पवित्र पेशे में घुस आए मदारी और सुबुकदस्त सुर में सुर साधकर कागारोल करते हैं : अरे, शहीद की वीरांगना ने कहा है, मेरे घर दो और बच्चे हैं। मैं दोनों को भेज दूंगी। भले वीरांगना ने कहा हो कि एक सिर के बदले उसे पचास सिर चाहिए और नहीं तो उस कायर का ही सिर लाकर मेरी हथेली पर धर दो! लेकिन नहीं, वह सब आपका यह शौर्यशाली एंकर नहीं बोलेगा। रिपोर्टर ने बड़ी मेहनत करके भी भेजा होगा तो वह नहीं चलाएगा। और जो नहीं बोला होगा या जो शासकों ने कहा होगा कि ये बुलवाओ तो उसे वह ज़रूर चलवाना चाहेगा।

    देश में शौर्य और शूरवीरता बांटने वाले इन एंकर महाशय से कोई पूछे : अरे, भाई, तू खुद क्यों नहीं सीमा पर चला जाता देश की रक्षा करने। वह जो तुझसे रिपोर्ट करवा रहा है, वह अपने बेटे को क्यों नहीं भेजता। वह स्वयं तो सपरिवार एसी में बैठेगा, शाम को किसी दूतावास में महंगी दारू पीने जाएगा और मौजमस्तियां करेगा, लेकिन किसान के बेटे का रक्त मांगेगा? अरे तुम सब राक्षस हो या शासक, मीडिया या देशभक्त। क्या हो तुम? देशभक्त हो तो सबसे पहले खुद जाओ सेना में। सेना में नहीं जा सकते, चुने नहीं जा सकते तो बन जाओ मरजीवड़े। बना लो आत्मघाती जत्थे और बम बांधकर जा गिरो दुश्मनों पर। अगर इतना ही देशप्रेम आप के भीतर ठांठें मार रहा है तो थोड़ा किसानों के बेटों का भी बोझ हलका करो। कुछ इस धरती का भी।

    किसान का खून भी खून है। पानी नहीं है। पराया है तो क्या हुआ। वह भी नस्ले आदम का खून है। पूर्व है तो क्या और पश्चिम का है तो क्या? वह शहर का है तो क्या और गांव का है तो क्या?

    वह टीवी एंकर जो कल एक चैनल पर चार लाख का पैकेज ले रहा था, ठीक उसी उम्र का युवा है, जिस उम्र के दो बहादुर सैनिकों ने अपने सिर कटाए हैं। लेकिन वह आज किसी और चैनल पर बैठा है, क्योंकि उसे दस लाख का पैकेज मिल गया है। जिसने उसे सब कुछ सिखाया और इस लायक बनाया, उसे छोड़ दिया। यानी मैं तो हर साल सवा करोड़ का पैकेज लूंगा, आला नेताओं से दोस्ती रखूंगा, देश की राजधानी में रहूंगा, समस्त वैभवशाली सुविधाएं भोगूंगा और राजनेताओं और शासकों से कभी कोई ऐसा प्रश्न नहीं करूंगा, जो उन्हें परेशान करे। लेकिन मैं मानवता का रक्तार्चन करने के लिए और नस्ले-आदम का खून बहाने के लिए, ऋषियों-मुनियों की इस धरती पर रक्त प्रवाह कराने के लिए हर रोज दुश्मनियां भड़काऊंगा।

    इस युवा एंकर का रक्तपिपासु हृदय यह नहीं देखता कि सरहद पर लड़ना कितना मुश्किल है। उसे नहीं मालूम की रूहे-तामीर कितने ज़ख़्म खाकर एक सैनिक पैदा करती है। अरे, एक बेटा मरेगा तो तेरे चैनल की तो टीआरपी बढ़ेगी और तेरा तो पैकेज बढ़ जाएगा और उस विचारधारा या पार्टी के वोट भी बढ़ जाएंगे, जो सत्ता के लिए समस्त सिद्धांत तिरोहित करके इतना आगे बढ़ चली है, जिस समय गांव में जवान सैनिकों के ताबूत आएंगे। लेकिन यह भी तो सोच कि इस धरती की ज़ीस्त कितना तिलमिलाएगी जब वह देखेगी कि इस जवान को भी उसके मां या बाप ने फ़ाकाकशी करके पाला था और किसी देशप्रेम के कारण नहीं, सिर्फ़ नौकरी की बेबसी में फौज में भेजा था।

    यह जो युवा हर रोज़ अपने सीने पर बम झेलते हैं, उसकी लपट न तो चैनल वाले के यहां आती है और न किसी पार्टी वाले के यहां।

    क्यों कोई राहुल गांधी प्रधानमंत्री ही बनना चाहता है? क्यों कोई रामदेव जो योग कुशल है, जो स्वस्थ है, जो हर तरह की आसन क्रियाएं जानता है, वह 10, 577 करोड़ की कंपनी खड़ी करने की राह ही पकड़ता है, सैनिक बनकर सिर कटाने की नहीं सोचता? क्यों? ऋषिवर? क्यों?

    योगिराज, तुम पकड़ो बंदूक और लगो न सरहद पर। सारा पतंजलि परिवार, समस्त शंकराचार्य और उनके अनुयायी, समस्त कारसेवक, समस्त सत्तासेवी देशभक्त, समस्त गोरक्षक, समस्त तिरंगाधारी, समस्त लालझंडे वाले और समस्त-समस्त युद्ध भड़काऊ, सारा आर्ट ऑव लिविंग और सारा राष्ट्रप्रेमी कुनबा क्यों नहीं सेना में जाता? अरे सेना में मत जाओ। सरहद के गांवों में जाकर उन लोगों की मुश्किलें ही हल कर दो, जो 1947 से बदतर जीवन जी रहे हैं और जिनके पास न पानी का नल है, न स्कूल है, न अस्पताल है, न जीवन जीने का कोई बड़ा मकसद है।

    अरे, किसान खेत भी अपना जलाए और बेटा भी अपना होम करे। टैंक आगे बढ़ें तो वे दस जनपथ या सात रेसकोर्स रोड की तरफ़ तो झांकें ही नहीं, लेकिन पूरी भारत माता की कोख को बांझ कर दें। हम ने भी जब अपने टैंक आगे बढ़ाए तो हमने क्या किया? हमने भी तो इस्लामाबाद के कन्स्टीट्यूशन ऐवेन्यू स्थित पीएम हाउस या ऐवाने सदर को भूल गए और आम पाकिस्तानियों को रौंद डाला। उन बेचारों का क्या कुसूर था? कुसूरवार भुट्‌टो था, भुट्‌टो को क्या दंड मिला? क्या बाल भी बांका हुआ? उसे फांसी दी तो जिया उल हक़ ने दी। और चीन, उसका तो कोई टीवी चैनल वाला या राजनेता या देशभक्त नाम ही नहीं लेता कि चलो, पेइचिंग के कब्जेवाली जमीन छुड़ाओ। क्या हुआ संघ के उस प्रस्ताव का, जिसमें कस्में खाई गई थीं कि संसद में तब तक नहीं जाएंगे जब तक दुश्मन चीन से अपनी मातृभूमि का एक-एक कण प्राप्त न कर लेंगे? पुरानी बात भूल गए, चीन के बादशाह आए तो लालकालीन बिछाना याद रहा, जो हम और किसी के आगे तो कभी नहीं बिछाते।

    हमारे राजनेता आज फ़तह का जश्न तो मनाना जानते हैं, लेकिन किसी सैनिक के सिर कटने पर उनके घरों में कभी सोग होता हो, ऐसा मैंने देखा नहीं है। एक दिन हमारे जवानों के सिर कटते हैं और अगले दिन उन जवानों का सबसे शीर्ष मुखिया किसी देशभक्त ऋषि सम्राट् के यहां राष्ट्र ऋषि की उपाधि पाता देखा जाता है। नेहरू से मोदी तक कोई भी हों और किसी भी पार्टी के हों, सबके सब उस समय प्रसन्न चेहरों के साथ राजसत्ता के वैभव को जी रहे होते हैं जब धरती माता या भारत माता की जिंदगी मय्यतों पर रोती है।

    लोकतंत्र के शरीफ़जादे नेता न जंग टालने की कोशिशें करते हैं और न ही अपने आंगने के महकते फूलों की रक्षा करना जानते हैं। इनकी एक सीट बच सके या ये एक सीट जीत सकें तो ये किसी गुंडे को भी पार्टी में देशभक्त बताकर ला सकते हैं और इनकी अपनी मां की हत्या हो जाए तो ये पांच हजार लाेगों का खून बहाने और अपने ही देश के भाइयों को जीवित जलाने जैसा हिंसक, अमानवीय और निंदनीय कर्म करने में संकोच नहीं करते। इनके चूल्हे पर वोटों की आंच जलती रहे तो ये राम की मर्यादा को भूल सकते हैं और इनके नुकसान हो तो ये किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।

    हम सभी दलों के सभी तरह के शासकों को देख चुके हैं 1947 से आज तक। ऐसी कोई विचारधारा नहीं, जिसे आजमाया न हो। नतीजा यही है कि लोकतंत्र की सभी सत्ताएं अपने ही लोगों के दुख-दर्द दूर करने की कोशिश नहीं करतीं, वे सिर्फ अपने आंगन के महकते फूलों से अपनी पिपासा शांत करने के लिए रक्त मांगती रहती हैं।

    सत्तालिप्सा में डूबे हमारे शासक उस देवी को तो पूजते हैं, जो अपनी गर्दन में खप्पर टांगती है और शत्रुओं का मर्दन करती है, लेकिन उसका यह आचरण ये लोग नहीं अपनाते कि मैं ही युद्ध भूमि में रहूं और मैं ही खप्पर पहनूं। यह काम किसी और का नहीं है।

    रक्तपिपासु तो खप्परवाली देवी भी है, लेकिन वह संदेश देती है कि शत्रु के रक्तपिपासु बनो। शत्रु कौन? यह भी पहचानने की जरूरत है। यह भी आत्मचिंतन का विषय है। क्या ये शत्रु अशिक्षा, निर्धनता, दु:ख, आंसू, पीड़ा, घृणा, वैमनस्य, चोरी, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, बीमारियां, धरती पर बढ़ते बोझ और न जाने क्या-क्या चीज़ें नहीं हो सकतीं? हो सकती हैं, लेकिन उससे वोट नहीं मिलते। वोट रक्तस्नान करने से नहीं, रक्तस्नान कराने से मिलते हैं। खुद को रक्षित करके। खुद को बचाकर।

    इनको खप्परवाली देवी का यह सिद्धांत पसंद नहीं कि सबसे आगे मैं। देशभक्ति में भी और सिर कटाने के पवित्र काम में भी। अगर ऐसे हैं तो यह राजशाही है, यह भक्ति है और यह शक्ति है, लेकिन इनका सिद्धांत है तू सिर कटा और मैं महल में रहकर अपनी जान बचाऊं आैर सबसे बड़ा देशभक्त कहलाऊं। यही है लोकतंत्र!महान् लाेकतंत्र!! और मुझसे ऐसा लोकतंत्र सख्त नापसंद है। मैं ऐसे लोकतंत्र से घृणा करता हूं।


    फेसबुक वाल से साभार

     

  • हीरो होता कौन है और लोग घोषित किसी को कर देते हैं!

    Tribhuvan

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    Geetanjali

    अब विनोद खन्ना को ही लें। पूरी दुनिया में उनकी क्या तारीफ़ें हो रही हैं। लेकिन मुझे लगता है कि अपनी निजी ज़िंदगी में वे एक खलनायक थे। असली नायक रहीं उनकी पत्नी गीतांजलि।

    Vinod Khanna

    जिस समय विनोद खन्ना आेशो के सम्मोहक सुंदरियों वाले निर्बाध कामनाओं की संपूर्णता के द्वीप में पहुंचे तो घर में आठ महीने का अक्षय और ढाई साल का राहुल था। दोनों बच्चों को कामयाब बनाना और अपने पिता के घर से भाग जाने के बावजूद स्थापित कर देने वाली गीतांजलि से बड़ा नायक कौन होगा? कम से कम, विनोद खन्ना तो नहीं। दुनिया चाहे जो कहे, सच तो सच है और सच ही रहेगा।

    प्रणाम है, ऐसी अनाम स्त्रियों को जो एक बूढ़ी सास का पूरा ख़याल रखती हैं, उन्हें 24 घंटे मुस्कुराते हुए रखती हैं, उनकी आवभगत और सेवा-सुश्रूषा करती हैं, लेकिन इस मां के साथ फोटो कोई और बड़ा आदमी खिंचवाता है। माँ की कभी खैरखबर न लेने वाला।

    ऐसे कितने ही लोग हैं, जो मां के साथ फ़ोटो और विडियो को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मां के महात्म्य भरे शब्दों के साथ ख़ुद का गौरवगान करवाते हैं, लेकिन अपने ही परिवार की उन स्त्रियों की तारीफ़ में एक शब्द नहीं कहते, जो मां को हर समय अपनी हथेलियों पर रखती अपने दर्द भुला देती हैं। इस तरफ़ कभी कोई मीडिया भी झाँकता नहीं।

    हम भले अमिताभ बच्चन को महानायक कहें, लेकिन क्या वह जया भादुड़ी सच्ची महानायक नहीं है, जो अपना कॅरियर छोड़कर अपनी बेटी और अपने बेटे को स्थापित करती हैं? ऐसी कितनी ही नायिकाएँ हैं।

    क्या आपके या मेरे अपने घर की वह स्त्री सच्ची नायक नहीं है, जो दो बच्चों को उनके पिता की हर रोज़ 15 से 20 घंटे की ग़ैरमौजूदगी में अंकुर से पेड़ बनाते अपने आपको होमती है और एक परिवार को पुष्पित और पल्लवित करती है?

    क्या उन स्त्रियों को कभी नायक का दर्जा दिया जाएगा, जिन्होंने अपने चूल्हे की आंच से आरएसएस के स्वयं सेवकों की धमनियों में ऊर्जा धौंकी या फिर जो हॉलटाइमर कम्युनिस्टों के लिए चूल्हे जलाजलाकर अपने अांखें फोड़ चुकीं?

    क्या इस देश में स्त्रियों की भलाई के नाम पर तूफ़ानी आंदोलन खड़ा करने वाले नेताओं को कभी यह ध्यान आएगा कि उज्ज्वला योजना होने के बावजूद आज भी हमारी गलियों में महानायिकाएं सिर पर लकड़ियों के गट्ठर ढो-ढोकर अपने परिवारों का भरण-पोषण करती हैं, लेकिन कोई सांसद, कोई विधायक, कोई जिला अध्यक्ष, कोई जिला कलक्टर, कोई एडीएम या पटवारी घर से निकलकर उन्हें रास्ते में यह तोहफ़ा नहीं सौंप देता कि लो बहन, तुम हो उज्ज्वला की सच्ची हक़दार!

    समाज के अपने मानदंड हैं, लेकिन नायक तो नायक है। यह इंतज़ार रहेगा कि स्त्री कब नायक कही और स्वीकार की जाएगी? कब सीता, द्रौपदी और यशोधरा असली नायक कही जाएंगी?


    फेसबुक वाल से साभार

  • राजसत्ता

    Tribhuvan

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    राजसत्ता एक ऐसा केंचुल है, जिसे ओढ़कर विषपायी सांप भी सम्मोहक दिखने लगता है।

    भूखे को रोटी मिल जाए और प्यासे को पानी तो यह देखना मुनासिब नहीं होता कि रोटी किसने दी और पानी किसने पिलाया।

    योगी आदित्यनाथ अगर उर्दू विश्वविद्यालय के लिए विशालकाय परिसर देते हैं, मुस्लिम युवतियों की सामूहिक शादी करवाते हैं और सरकार से उनका मेहर तय करवाते हैं तो उन्हें किसी को गले लगाने में क्या आपत्ति होगी? होनी भी क्यों चाहिए?

    कल अगर कोई मौलवी साहब शिक्षा मंत्री बन जाएं और वे संस्कृत के विस्तार की बातें करें, मंदिरों को जगहें आवंटित करने में जुट जाएं और भारतीय पुरातन वैदिक ग्रंथों के प्रकाशन और संचयन की बातें करने लगें तो मेरा ख़याल है कि वैज्ञानिक टेंपरामेंट वाले शिक्षा मंत्री के बजाय आम लोग ही नहीं, कट्टर हिन्दू भी उसे ही ज़्यादा पसंद करेंगे। आख़िर कट्टरता-कट्टरता का भी तो एक बहनापा होता ही है। ठीक ऐसे ही, हिन्दू मताग्रह और मुसलिम मताग्रह के बीच भी एक गर्भनाल का रिश्ता है।

    कांग्रेस तो हाल के वर्षों में कम्युनिस्टीकृत हुई है, वरना यही राग और स्वर तो अाज़ादी से पहले उसके नेताओं के हुआ करते थे। वे ही लोग राम मंदिर का ताला खुलवाते थे और हिंदू परंपराओं को मानते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू को आज लोग कितना भी सेक्युलर कहें, लेकिन उनके समय ही सारनाथ से निकले चार शेरों वाली प्रतिमा को राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बनाया गया। उपनिषद के वाक्य सत्यमेव जयते को राष्ट्रीय भावना माना गया और किसी भी सरकारी भवन के शिलान्यास पर हिंदू पंडितों से पूजा करवाने की परंपरा डाली गई।

    भाजपा और आरएसएस तो नाहक बदनाम हो रहे हैं, दरअसल बहुसंख्यक कट्टरता के बीज तो बाबा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय ही बोए गए। गांधी बाबा ने हर कदम पर भगवद्गीता की बात की और उसे राष्ट्रीय ग्रंथ से ज्यादा महत्व दिया। वे हर जगह रामराज्य की बात ही किया करते थे। नेहरू का राजनीतिक टेंपरामेंट चाहे कुछ भी हो, लेकिन वे राजसत्ता हासिल होने की संभावनाओं के कारण बाबा गांधी से चिपके रहे और सदा उनके प्रिय बने रहे। लेकिन गांधी धार्मिक होकर भी धर्मप्राण और सेक्युलर रहे, लेकिन जिन्ना जैसा नेता गैरधार्मिक और इस्लाम के प्रति परम अज्ञानी होकर भी घोर सांप्रदायिक हो गया।

    हम भले आरएसएस या भाजपा को आज हिंदू पुनरुत्थानवाद के लिए जिम्मेदार बताएं, लेकिन सच तो यह है कि हिन्दू मताग्रह की शुरुआत बंकिमचंद्र, तिलक, अरविंद, मदनमोहन मालवीय, वीर सावरकर, महात्मा गांधी सरीखे आधुनिक सुधारकों ने की थी। बंकिमचंद्र ने हिंदू पौराणिक गाथाओं का गान किया। तिलक ने शिवाजी की विरासत और गणेश चतुर्थी पर्व का राजनीतिक उपयोग शुरु किया। अरविंद ने काली की चेतना को उग्र किया। बंकिम जी के उपन्यास में हिन्दू मठ के सदस्य मुसलमानों के खिलाफ जिस वंदेमातरम् का आह्वान करते हैं, उसी वंदेमातरम को कांग्रेस ने ही राष्ट्रगान बनवाया। आज कांग्रेस को भले आरएसएस भाजपा के गौप्रेम पर आपत्ति हो, लेकिन सच यही है कि स्वयं गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा : “इसमें यानी हिन्दू धर्म में गौपूजा मेरी राय में मानवतावाद के क्रमिक विकास के प्रति एक शानदार परिणाम है।” बाेये पेड़ बबूल को, आम कहां तो खाय वाली कहावत शायद इसी संदर्भ में बनी हो तो अचरज़ नहीं।

    कांग्रेस के नेताओं ने पहले तो रामराज्य, गीता, वंदेमातरम्, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म आदि के माध्यम से राजनीति में धर्म को घुसेड़ा और मजे से राज किया; लेकिन जब पार्टी इन चीज़ों का रस निकाल चुकी, चुनावों और राजसत्ता की कुल्हाड़ी के गोगड़ों में गन्ने की तरह बार-बार पेरकर और बार-बार दुहरा-तिहरा करके पूरी तरह निचोड़ चुकी और मुसलमानों को भी जमकर इस्तेमाल कर चुकी तो अब चुके हुए हिन्दुत्व के गन्ने के छिलकों से बेचारे आरएसएस वाले और भाजपा वाले अपनी धूनी कुछ साल तापना चाहते हैं तो कांग्रेस हायतौबा मचा रही है। कम्युनिस्टों, लौहियावादियों, जेएनयू वालों, तरह-तरह के गतिशीलों-प्रगतिशीलों ने कांग्रेस को कभी इन मुद्दों पर कुछ कहा हो तो बताओ, लेकिन बीजेपी के बाबा आदित्यनाथ का राजभोग और टीवी पर उनका कुछ कवरेज जैसे लाहौलविलाकुव्वत करवाए दे रहा है! देखिए, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पतन हो गया है। कुछ है ही नहीं दिखाने के लिए। अरे क्या देश में एक बाबा ही रह गया है।

    सत्ता का लालच ऐसा ही होता है। वह इनसान की धुरी को पूरी तरह घुमा देता है। अब तक कांग्रेस को घुमाए रखा और अब वह योगियों को घुमा रहा है। आप स्वयं देख लें, कांग्रेस शासन के समय दुनिया के सबसे ताकतवर बाबाओं में एक बाबा रामदेव योग पर फोकस्ड थे और जैसे ही उनके मित्रों की सरकार आई, वे सामान बेचने लगे और वणिक् धर्म अपना लिया। आज तक जिस राजनीतिक दल की जो रेलगाड़ी चला करती थी, उसका नाम कांग्रेस था और सत्ता की मलाई खाने वाले कुर्सीलिप्सु उस ट्रेन पर सवार हो जाते थे। आजकल इस ट्रेन का नाम बदलकर भाजपा हो गया है और अब लोग कांग्रेस या अन्य दल छोड़कर इस पर सवार होने को उतावले हो रहे हैं। जिस तरह विमान में आम कुछ खास चीज़ें अपने साथ नहीं ले जा सकते, उसी तरह सत्ता के स्टेशन के भी कुछ रेस्ट्रिक्शनंस होते हैं। यहां भी आप छुरे, पाछने, तेजाब, उस्तरे, चाकूनुमा चीज़ें साथ नहीं रख सकते। अब जो योगिराज उत्तरप्रदेश की सत्ता संभाल रहा है, उसके कंठ में यह दम नहीं है कि वह गरज कर कह सके कि किसी एक मुसलमान ने किसी एक हिन्दू युवती से बलात्कार किया तो हम सौ मुसलिम युवतियों से बलात्कार करेंगे। अब इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बातें करने का अर्थ वे जानते हैं। सत्ता को आप भले बाहर से सांप कहें या ज़हर, आप उसका पान करने के लिए लालायित रहते हैं और हर समझौता करने को करने को तैयार। सत्ता सुंदरी कहें या विष कन्या, उसके अंग-प्रत्यंग का सम्मोहन हर ब्रह्मचारी और संन्यासी के लंगोट ढीले कर देता है! यह बात रीतिकाल में कवियों ने अपने दाेहों में कही, लेकिन आज के योगिराज इसे साबित भी करके दिखा रहे हैं।


    फेसबुक वाल से साभार

     

  • हिंदू महिला बनाम मुस्लिम महिला :: हमारे दोहरे मानदंड

    Tribhuvan


     

    मैं और पूनम रात को “आजतक” पर श्वेतासिंह की रिपोर्ट देख रहे थे। सात मुस्लिम औरतों की कहानी, जो तीन तलाक से पीड़ित हैं।

    भारतीय मुस्लिम महिलाएं जिस कदर पीड़ित हैं, वह पीड़ा बहुत चिंताजनक है और इस समय सर्वाेच्च प्राथमिकता से समाधान की मांग करती है। इसमें कोई दो राय नहीं है। मुस्लिम समाज को अपने भीतर की ऐसी कालिख को खुद आगे बढ़कर धो-पौंछ डालना चाहिए। वक़्त की चाल और ज़माने की नज़ाकत को समझना चाहिए। वक़्त की मार बहुत ख़तरनाक़ होती है। जो इसे नहीं समझता, वह अगर तलवार से बच जाता है तो फूल से कटना पड़ता है।

    लेकिन . . .
    मैंने कभी नहीं देखा कि श्वेतासिंह ने इस दौर में यह रिपोर्ट भी की हो कि हमारे देश में हर साल 7646 तरुणियों को दहेज-हत्या की बलिवेदी पर बलिदान कर दिया जाता है। तलाक के बहाने छोड़ देना, सताना, ज़ुल्मो सितम करना और अमानुषिक प्रताड़नाएं देना श्वेतासिंह जैसी मेधावी एंकरों के लिए शायद मानीं नहीं रखता। कदाचित इसलिए कि तलाक़-तलाक़ और तलाक़ किसी महिला के लिए दहेज लोभियों के हाथों हत्याएं कर देने से तो कम ही बुरा है।

    यह तो हमारी नैतिकता है। यह हमारा मानदंड है। श्वेतासिंह जैसी तेजस्वी बहनों की यह तो विवेकशीलता है!

    यह आंकड़ा कदाचित् श्वेतासिंह को शायद नहीं चौंकाता, लेकिन घर बैठी मेरी पत्नी को ज़रूर चिंतित करता है कि इस देश के हिन्दू समाज में पति और रिश्तेदार हर साल 1,13,548 युवतियों को क्रूरतापूर्ण ढंग से घरों से बेदखल कर देते हैं। उन्हें सताते हैं और ज़ुल्मोसितम ढाते हैं।

    ये अत्याचार ठीक वैसे ही हैं, जैसे मुस्लिम औरतों के साथ उनके पति करते हैं। छल-कपट और धोखा। इन अत्याचारों की कहानी बहन श्वेतासिंह अपने चैनल पर बहुत नफ़ासत भरे शब्दों में चबा-चबाकर बता रही थीं।

    हमने तथ्यों को देखना शुरू किया और काफी कुछ खंगाल डाला। दहेज हत्याएं हाें, बलात्कार हों या स्त्री की मर्यादाओं को धूल धूसरित करना। हे भगवान्। ऐसा भयावह सच और ऐसी भयावनी चुप्पियां! लेकिन दहेज हत्याओं] रिश्तेदारों से प्रताड़ित हिंदू लड़कियों अौर उनकी मर्यादाओं को तार-तार कर देने वाले ये आंकड़े न तो राष्ट्रद्रोही जेएनयू से आए हैं और न ही किसी गद्दार अलीगढ़ विश्वविद्यालय से जारी हुए हैं।

    ये आंकड़े 2015 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हैं और इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले देश के मेधावी आईपीएस ऑफिसर हैं। इनमें मुसलमान तो न के बराबर हैं। सबके सब हिन्दू हैं। तन-मन और प्राण से।

    अगर हम थोड़ी सी संवेदनशीलता से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट पढ़ें तो यह आंकड़ा रुला देता है कि हमारे महान् स्त्री मर्यादा वाले देश में हर साल 34,676 युवतियों से रेप होते हैं।

    मैं जाना नहीं चाहता, लेकिन इसके भीतर नग्न सत्य से अवगत होना शुरू करूं तो पीड़ित बहनें और बेटियां भी हिन्दू ही हैं और उत्पीड़क राक्षस का वैसे तो कोई धर्म होता नहीं, लेकिन जिस तरह आजकल लोग नामों से पहचान करते हैं तो मैं कहना चाहूंगा कि इनमें गैरहिन्दू एक या दो प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं।

    तीन तलाक एक ऐसा जख्म है, जो न केवल मरहम मांग रहा है, बल्कि एक बड़े चीरफाड़ की चाहत भी रखता है, लेकिन साहब आप जो इतने सुसंस्कृतिवादी बने फिरते हैं, अपने घरों की हालत भी एक बार देख लो।

    आप जैसे गोभक्त हैं, वैसे ही आप स्त्री भक्त भी हैं। आप जैसे नारी को महान् बनाते आए हैं, वैसे ही गाय भी हमारे देश में महान् रही है। लेकिन हक़ीक़त पाखंड का पहाड़ है। इसे हर लाख साधु भी नहीं बदल सकते। एक दो की तो बात ही छोड़िए। अगर किसी ने कड़वाहट भरे सत्य आपके सामने रखे तो आप उस साधु को दूध में शीशा घिसकर दे देते हैं और एक सामाजिक क्रांति अधर में ही मर जाती है।

    मैं आज शाम जब प्रतापगढ़ से लौट रहा था तो हमारे तरुण फ़ोटो जर्नलिस्ट अमित ने कुछ फ़ोटो करने के लिए हमें रुकने को कहा। उस रास्ते पर कोई दस गाएं मेरे पास से गुजरी होंगी, सबके देहों पर लाठियों, गंडासों और अन्य धारदार हथियारों के निशान थे। अंतड़ियां भूख से बाहर आ रही थीं। मानो, कह रही हों ये जीना भी कोई जीना है! शायद हमारे यहां इसीलिए कन्याओं की तुलना गऊ से की जाती है। दोनों की तकदीर है कि वह कसाई के घर जाए कि भूखों मार देने वाले किसान के कि किसी अच्छे परिवार के, जो दूध न भी दे तो खूब खिलाए-पिलाए और सेवा करे। यह कहानी अंदर तक झकझोर देती है।

    आप कानून बनाते हैं और कहते हैं कि गाय को उत्पीड़ित करने वाले को अब आजीवन करावास होगा। आपने ऐसे कानून स्त्री सुरक्षा के नाम पर एक नहीं, हजार बना रखे हैं। आपके यहां कितने ही तो आयोग हैं। पुलिस के महिला थाने हैं। कितनी ही आईपीएस हैं और कितनी ही महिलाएं सबल राजनीतिज्ञ हैं, लेकिन ज़मीनी हालात अब भी बहुत दारुण हैं।

    लेकिन अगर आप गाैरक्षा के लिए आजीवन कारावास का कानून बना रहे हैं तो क्या आप देश की बहन-बेटियों को सताने वाले दहेज लोभियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने का कानून पारित नहीं कर देना चाहिए?

    साहब, एक आंकड़ा है 2125 का।

    ये वे अभागी बेटियां-बहनें हैं, जिनसे हर साल गैंगरेप होता है। इनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू ही हैं और अपराधी 95 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू।

    कहां-कहां आंखें मूंदकर रखेंगी आप श्वेतासिंह।

    औरत को तीन तलाक और परित्यकता, देहज पीड़िता में मत बांटो।

    औरत औरत है। वह सृष्टि का सृजन करती है। उसकी सुरक्षा, संरक्षा और पोषण के लिए एक साथ एक जैसे कानून दो और अपराधियों के लिए एक जैसी सजाएं तय करो। उनमें मत देखो कि कौन हिन्दू और कौन मुसलमान।

    परित्यक्त करने वाले को भी आजीवन कारावास दो, दहेज लेने वाले को भी और तीन तलाक देने वाले को भी।

    हर आैरत को पिता और पति की संपत्ति में अधिकार दो। उसका पति बाहर कमाता है या नौकरीपेशा है और औरत नौकरीपेशा नहीं है तो उसके घर के कामकाज का एक पारिश्रमिक तय करो। पति की तनख्वाह का एक हिस्सा उसे मिले। यह प्रतिशत में ही होना चाहिए। क्या मुसलमान और क्या हिन्दू।

    हमारे ज़हन में न्याय नहीं है। हमारे ज़ेहन मेरी जाति महान, तेरी निकृष्ट और मेरा धर्म महान तेरा धर्म पतित वाली सोच से लबालब भरे हैं।

    अगर हम एक फ़ेयर आैर जस्ट सोसाइटी बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें संवेदनशील और सुसंस्कृत होना होगा। इसकी ज़रूरत महसूस करनी होगी।

    ऐसा नहीं हो सकता श्वेता सिंह कि आपके धर्म में तो कानून बन गया इसलिए दहेज के लिए हत्याओं की खबरों को नीचे पट्‌टी पर भी न चलाओ और तीन तलाक पर वन आवर का पूरा प्रोग्राम करके ऐसे साबित करो कि देखो, मुल्लो तुम्हारा कोई धर्म है! औरतों को घर से निकाल देते हो तलाक-तलाक-तलाक कहकर। देखो, हमारा महान् धर्म! हम हर साल 1 लाख 13 हज़ार 548 औरतों को घर से क्रूरतापूर्वक बेदखल करते हैं, 34 हजार 651 से बलात्कार जैसा पाशविक अपराध होता है, 82 हजार 800 आैरतों की शुचिता को तार-तार करते हैं और 7646 को जीवित जला डालते हैं, लेकिन हमारे यहां कानून बन चुके हैं और हम सबने आधुनिकतावादी सभ्य होने के समस्त सम्मोहक आवरण पहन लिए हैं, इसलिए हम इतना कुछ करके भी तुम अनपढों से बहुत सभ्य कहलाते हैं।

    लेकिन याद रखो कि एक फेयर और जस्ट साेसाइटी लोगों के चैतन्य से ही बन सकती है। कोई कानून, कोई अदालत, कोई दल, कोई धर्म, कोई जाति, कोई समुदाय, कोई आंदोलन, कोई मीडिया औरत के लिए तब तक एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण नहीं कर सकता जब तक कि लोगों के दिलोदिमाग की भूमियों पर न्यायशीलता, विवेकशीलता, समानता, स्वच्छता और निर्मलता की शस्यश्यामलता नहीं लहलहाएगी।

    यह धरती औरत के लिए रहने लायक तभी बनेगी जब आप बलात्कारी मानसिकता से ऊपर उठ जाएंगे और औरत पर किसी तरह की शुचिताओं का बोझ नहीं डाला जाएगा। पुरुष हिन्दू होकर कानून बना लेता है और औरत दग्ध हाेती रहती है। पुरुष इस्लाम और कुरआने-पाक की बात करता है, लेकिन वह औरत को बंदिनी तो बनाना चाहता है, लेकिन वे सब आज़ादियां और अधिकार देने से पीछे हट जाता है, जो कुरआन में दी जाती हैं, लेकिन सामाजिक रूप से पुरुष के खिलाफ़ पड़ती हैं। ठीक ऐसा ही चरित्र अन्य धर्मों का है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आज का अमेरिका है, जहां 46 राष्ट्रपति हो चुके हैं और 226 साल बीत चुके हैं, वहां लोकतंत्र आए, लेकिन मज़ाल कि किसी औरत को वह देश राष्ट्रपति बन लेने दे। दुनिया के इस सबसे ताकतवर देश में ऐसा व्यक्ति तो राष्ट्रपति बन सकता है, जो महिलाओं से याैन दुर्व्यवहार के लिए कुख्यात हो, लेकिन आर्थिक सदाचरण के मामले में थोड़ा संदिग्ध महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकती।


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  • पावर का प्रेम आदमी आैर राजनीतिक दलों के नर्व सिस्टम पर सांघातिक प्रहार करता है

    Tribhuvan

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    पावर का प्रेम आदमी आैर राजनीतिक दलों के नर्व सिस्टम पर सांघातिक प्रहार करता है। वे पाॅलिटिक्स की डिग्निटी भूल जाते हैं। ऐसे लोगों की खाली खोपड़ी एमलेस एक्शन और हैफ्हैजर्ड टर्बुलेंस को आमंत्रित करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती। लोकतंत्र की हत्यारी इंदिरा गांधी की प्रेतात्मा चुपके से सत्ताधीशों की आत्मा में कैसे आकर बैठ जाती है और उनकी सत्ता ऐषणाएं उनके के साथ किस सहजता से घुलमिल जाती हैं, यह पता ही नहीं चलता। सच ही है, स्पेस, प्लेस और मोशन पॉलिटिक्स के मेटाफर को बदलते देर नहीं लगाते।

    ये कैसा चमत्कार है कि आपातकाल के खिलाफ़ लड़ने वाले साहसी लोग ही 1975 की भाषा बोलने लगते हैं। यह भूलकर कि उन दिनों वे जेलों में बैठे अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य पर ठीक वैसे ही विचार रखते थे, जैसे आजकल के गतिशील युवा रख रहे हैं। ये लाेग भूल जाते हैं कि राजनीति एक फैकल्टी है, लेकिन सत्ता को अपने शुद्ध विचारों से चलाना एक आर्ट।

    कितना अचरज़ है, सत्ता का चरित्र नहीं बदलता, स्वतंत्र चैतन्यता रखने वाले लोग अपना चरित्र वस्त्रों की तरह बदलते हैं। कौन भूलेगा कांग्रेस के उस ऐतिहासिक अपराध को। इंदिरा गांधी के उस अलोकतांत्रिक क़दम को। कम्युनिस्टों के एक बड़े खेमे का इमरजेंसी के समर्थन में खड़े होने के पाप को। विनोबा भावे जैसे संत कहलाने वाले साधु स्वभाव व्यक्ति का आपातकाल को राष्ट्रीय पर्व कहने के विचलन को।

    निष्कर्ष ये है कि पॉलिटिकल पार्टियों और उनसे जुड़े लोगों का प्राइमरी एम, आॅब्जेक्ट और पर्पज़ एक ही होते हैं। उनके कॉन्शसनेस में सदा एक ही बात रहती है कि चीज़ों को जितना ज़्यादा नियंत्रित कर सकते हो करो। ये एक ऑटोमेशन जैसा होता है। आप पावर में आए नहीं कि आपकी कॉन्शसनेस लुप्त होने लगती है और सत्ता की कॉन्शसनेस आपकी बुद्धि, चेतना और विवेक का हरण कर लेती है। वे समझते हैं कि वेल-कंट्रोल्ड सिस्टम ही उनका अल्टीमेट एम है।

    आप कह सकते हैं, इंदिरा गांधी निष्कलंक थीं। उन्हें कलंकित और कलुषित किया उनके सत्ता प्रेम ने। सिस्टम को नियंत्रित करने की उनकी ऐषणा ने। वरना तो वे भी आपातकाल थोपकर वैसा राष्ट्रप्रेम ही तो जता रही थीं, जो आप प्रकट करते रहते हैं। वे वैसी ही तो देशभक्ति दिखा रही थीं, जैसी आप प्रकट करते रहते हैं।

    फ़र्क बस इतना सा है कि उन दिनों उनकी बुद्धि वैसी थी, जैसी अाजकल आपकी है। और आजकल इंदिरा गांधी की संतानों की बुद्धि वैसी है, जैसी उन दिनों आपकी थी। लेकिन प्लीज़, सच कहूं तो इंदिरा जी की सच्ची संतान तो आप ही हैं! क्योंकि आप पर ही उनकी वह ओपरी छाया उतरने लगी है, जो इस देश के किसी सत्ताधीश के नहीं उतरनी चाहिए।

    लेकिन सर आप भूल जाते हैं उस लाख टके की बात को कि सत्ता में भी हर फंक्शन का एक ऑर्गन होता है और हर ऑर्गन का एक फंक्शन। और सर ये ऑर्गन आप या इंदिरा गांधी नहीं, इस देश का हर नागरिक होता है, जो मतदाता न भी हो तो भी मदांध सत्ताधीशों को चौकड़ी भुलाते देर नहीं लगाता।

     


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  • शिवरात्रि का बोध उत्सव

    Tribhuvan

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    मित्रो, फ़ेसबुक पर बहुत तीखी बहसें की हैं। टिप्पणियां की हैं। आपको बहुत बार बुरा भी लगा होगा। किसी ने गाली दी, किसी ने सलाह दी और किसी ने नेकनीयती से लिखने को कहा। किसी ने कहा कि मैं तटस्थ होकर रहूं और किसी हितचिंतक ने परामर्श दिया कि मुझे निष्पक्षता से काम लेना चाहिए।

    मैथ्स का छात्र रहा हूं। इसलिए माना कि से ही काम चलाता हूं। माना कि आप ऐसे हैं, माना कि आप वैसे हैं। लेकिन मैथ्स ने यह भी सिखाया है कि इति सिद्धम या क्यूईडी तभी होता है जब हम दो या तीन फार्मूलों से उस माना कि को सिद्ध कर लें। बीज गणित हो या अंकगणित या त्रिकोणमिति।

    बहुत बार मैंने लिखा भी है कि मेरी वह मान्यता है, जो आप सबसे विचार करने के बाद बनेगी। अभी जो लिख रहा हूं या कह रहा हूं, वह मेरी मान्यता नहीं है। यानी सब तर्क-वितर्क और तथ्य जान लेने के बाद हम जो फ़ैसला करते हैं, वही मान्य होना चाहिए। सिद्धांत भी यही है। विज्ञान भी यही सिखाता है।

    हमें लॉ की क्लास में त्यागी जी कई बार एक जज का किस्सा सुनाते थे। एक महिला बोली : जज साहब, जब मेरी खिलाफ पार्टी के वकील साहब बोले तो आपने कहा, यू आर राइट, जब मेरा वकील बोला तो आपने कहा, यू आर राइट। ये भला कोई कोई न्याय की बात हुई जजसाहब? जज बोले : यू आर आल्सो राइट!

    फ़ेसबुक पर इतनी लंबी बहस और इतनी तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगता है कि मंथन एक निष्कर्ष पर पहुंचा है। और वह निष्कर्ष यह है कि हमें ऐसे नए विकल्प तलाशने बंद करने चाहिए, जो जड़तावाद या यथास्थितिवाद को बढ़ाते हों। हमें अपने प्रतिपक्षी की राय को सुननाचाहिए। चाहे वह कितनी भी कड़वी हो। लेकिन हमें अपनी पार्टियों और उनके आचरण में सुधार की मांग करनी चाहिए।

    यह देश और समाज तब बढ़िया बनेगा, जब एक बेहतर बीजेपी, एक बेहतर कांग्रेस, एक बेहतर कम्युनिस्ट पार्टी, एक बेहतर समाजवादी पार्टी, एक बेहतर बसपा, बेहतर तृणमूल हमारे देश में होगी। आप अपनी नीति के अनुसार चलें, लेकिन ईमानदारी बरतें। पारदर्शिता रखें। सब आपस में एक मर्यादित भाषा में बहस करें। खुलकर बोलें और एक दूसरे से प्रेम रखें।

    यह देश बेहतर और ताकतवर तब बनेगा, जब हम अपने अतीत की गलतियों से सीखेंगे और अपने देश की मौजूदा प्रतिभाओं का, कलाकारों का, साहित्यकारों का, इतिहासकारों का सम्मान करेंगे। यह परंपरा देश में बहुत पुरानी है। कोई आपके विचार का नहीं है, इसलिए आप उसे सांप्रदायिक या देशद्रोही घोषित कर दें, यह संकीर्णता आपका नहीं, इस देश का नुकसान करती है।

    हमारा देश, हमारी दुनिया और हमारी धरती माता इस समय भयावने खतरों से जूझ रही है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का अजगर जीभें लपलपा रहा है। यह मानव समुदाय के लिए एक बड़ा खतरा है। जनसंख्या अपार ढंग से बढ़ रही है। यह जल्द ही 9.5 बिलियन होने जा रही है और हमारी धरती माता सिर्फ़ और सिर्फ़ आठ बिलियन जनसंख्या को वहन करने की ही क्षमता रखती है।

    कृषि का संकट एक नया खतरा हो गया है। किसान डूबता जा रहा है। पर्यावरणीय, मानवीय और सरकारी फैसलों ने कृषि को ऐसे विकराल दौर में ला दिया है, जहां अन्न उत्पादन गिरने वाला है और जनसंख्या बढ़ने वाली है। पिज्जा और बर्गर संस्कृति की गोद में अनचाहे ही हमें पटका जा रहा है। खेती का एरिया सिमटता जा रहा है।

    जल संकट एक और विकराल समस्या बनने जा रही है। पीने का जो पानी कभी पवित्र था और जिस शीतल जल के लिए हमारे बड़े-बुजुर्ग प्याऊ खोला करते थे, उस महान् संस्कृति को कार्पाेरेट कल्चर काल कवलित कर गई है और दूषित पानी सड़े हुए प्लास्टिक की दूषित बोतलों में बिक रहा है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस पानी के कारण आपको सबसे ज्यादा बीमारियां होने का डर फैलाया गया, उसका बोतलबंद विकल्प अब हमारे शहरों में अस्पतालों का एक जंगल खड़ा हो चुका है।

    और सबसे बड़ा और पांचवां खतरा यह है कि ऐसी बीमारियां दस्तक दे रही हैं, जिन पर इनसान जीवन भर की कमाई खर्च कर देता है, लेकिन फिर भी स्वस्थ नहीं हो पाता। हमारे विश्वविद्यालय विवादों में लाकर हमारे आत्मसंस्कारों की संस्कृति को विनाश की तरफ धकेला जा रहा है। विकल्प ये है कि हम अपनी महान् रवायतों को और संस्थानों को नष्ट नहीं होने दें, बल्कि उनमें कुछ खराबी है तो उसे दुरुस्त करके और बेहतर बनाएं।

    मित्रो, ये ऐसे ख़तरे हैं और इतने भयावने हैं कि इनका हल किसी कम्युनिस्ट पार्टी, किसी कांग्रेस, किसी आरएसएस, किसी तृणमूल, किसी बसपा, किसी आम आदमी, किसी अभियान, किसी एनजीओ, किसी सरकार या किसी जाति, किसी धर्म या किसी संस्कृति के पास नहीं है। किसी इस्लाम, किसी हिन्दू, किसी बौद्ध, किसी क्रिश्चियनिटी या किसी ताओइज्म के पास नहीं है।

    हल है, लेकिन सब मिलकर करें और एक कॉमन मानव समुदाय के हित को लेकर चलें तो। मिलकर लड़ें तो।

    ये सब दल, सब संस्कृतियां, सब धर्म और सब राजनीतिक दल और उनसे ऊपर के बहुतेरे संगठन, एक कालखंड में लोगों ने उस काल की समस्याओं को लेकर तैयार किए थे। अगर इस्लाम हल होता तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलिम ही मुसलिमों के आपसी संघर्ष में नहीं मारे जाते। ठीक ऐसा ही हिन्दुओं और ऐसा ही अन्य धर्मों के साथ हैं।

    मानव समुदाय को एक होकर ही आगे बढ़ना होगा। अब समय आ गया है कि हम जाति, नस्ल, धर्म और राष्ट्र के नाम पर लड़ना बंद करें। आज राष्ट्रीयतावाद भी एक नया खतरा बन गया है, क्योंकि जितनी भी समस्याएं हैं, उनकी विकरालता ऐसी है कि उनके सामने हमारे राष्ट्रों की क्षमता भी कमतर है। अब इस्लाम को हिंदुत्व के साथ अपनी सकारात्मकताआें के साथ कंधा मिलाकर चलना होगा और हिंदुत्व को इस्लाम के साथ। भारत को पाक के साथ और पाक को भारत के साथ।

    आपके समस्त विश्वास पवित्र और पावन हैं। आपके सब राष्ट्र महान हैं। आप उनका सम्मान करें, लेकिन धर्मों, जातियों, राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक श्रेष्ठताओं के अहंकारों के विष को शिव की तरह पीकर अपने कंठ में स्थापित कर लें। नीलकंठ बनें। नीलकंठ की पूजा करनी है तो उसकी गगनचुंबी प्रतिमा नहीं बनाएं। धन का अश्लील प्रदर्शन नहीं करें। धर्म का कार्पोरेटाइजेशन नहीं करें। धर्म को धर्म रहने दें।उस धन को अशिक्षा, गरीबी, दु:ख, तकलीफ़, पिछड़ापन, गुरबत, भेदभाव, अत्याचार और जुल्मोसितम मिटाने के लिए खर्च करें। यही सच्चा शिवत्व है। बाबा लोग जो मूर्तियां बना रहे हैं, वह शिवत्व नहीं है। वह शिवत्व का अपमान है।


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  • शिवरात्रि का बोध उत्सव

    त्रिभुवन

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    मित्रो, फ़ेसबुक पर बहुत तीखी बहसें की हैं। टिप्पणियां की हैं। आपको बहुत बार बुरा भी लगा होगा। किसी ने गाली दी, किसी ने सलाह दी और किसी ने नेकनीयती से लिखने को कहा। किसी ने कहा कि मैं तटस्थ होकर रहूं और किसी हितचिंतक ने परामर्श दिया कि मुझे निष्पक्षता से काम लेना चाहिए।

    मैथ्स का छात्र रहा हूं। इसलिए माना कि से ही काम चलाता हूं। माना कि आप ऐसे हैं, माना कि आप वैसे हैं। लेकिन मैथ्स ने यह भी सिखाया है कि इति सिद्धम या क्यूईडी तभी होता है जब हम दो या तीन फार्मूलों से उस माना कि को सिद्ध कर लें। बीज गणित हो या अंकगणित या त्रिकोणमिति।

    बहुत बार मैंने लिखा भी है कि मेरी वह मान्यता है, जो आप सबसे विचार करने के बाद बनेगी। अभी जो लिख रहा हूं या कह रहा हूं, वह मेरी मान्यता नहीं है। यानी सब तर्क-वितर्क और तथ्य जान लेने के बाद हम जो फ़ैसला करते हैं, वही मान्य होना चाहिए। सिद्धांत भी यही है। विज्ञान भी यही सिखाता है।

    हमें लॉ की क्लास में त्यागी जी कई बार एक जज का किस्सा सुनाते थे। एक महिला बोली : जज साहब, जब मेरी खिलाफ पार्टी के वकील साहब बोले तो आपने कहा, यू आर राइट, जब मेरा वकील बोला तो आपने कहा, यू आर राइट। ये भला कोई कोई न्याय की बात हुई जजसाहब? जज बोले : यू आर आल्सो राइट!

    फ़ेसबुक पर इतनी लंबी बहस और इतनी तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगता है कि मंथन एक निष्कर्ष पर पहुंचा है। और वह निष्कर्ष यह है कि हमें ऐसे नए विकल्प तलाशने बंद करने चाहिए, जो जड़तावाद या यथास्थितिवाद को बढ़ाते हों। हमें अपने प्रतिपक्षी की राय को सुननाचाहिए। चाहे वह कितनी भी कड़वी हो। लेकिन हमें अपनी पार्टियों और उनके आचरण में सुधार की मांग करनी चाहिए।

    यह देश और समाज तब बढ़िया बनेगा, जब एक बेहतर बीजेपी, एक बेहतर कांग्रेस, एक बेहतर कम्युनिस्ट पार्टी, एक बेहतर समाजवादी पार्टी, एक बेहतर बसपा, बेहतर तृणमूल हमारे देश में होगी। आप अपनी नीति के अनुसार चलें, लेकिन ईमानदारी बरतें। पारदर्शिता रखें। सब आपस में एक मर्यादित भाषा में बहस करें। खुलकर बोलें और एक दूसरे से प्रेम रखें।

    यह देश बेहतर और ताकतवर तब बनेगा, जब हम अपने अतीत की गलतियों से सीखेंगे और अपने देश की मौजूदा प्रतिभाओं का, कलाकारों का, साहित्यकारों का, इतिहासकारों का सम्मान करेंगे। यह परंपरा देश में बहुत पुरानी है। कोई आपके विचार का नहीं है, इसलिए आप उसे सांप्रदायिक या देशद्रोही घोषित कर दें, यह संकीर्णता आपका नहीं, इस देश का नुकसान करती है।

    हमारा देश, हमारी दुनिया और हमारी धरती माता इस समय भयावने खतरों से जूझ रही है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का अजगर जीभें लपलपा रहा है। यह मानव समुदाय के लिए एक बड़ा खतरा है। जनसंख्या अपार ढंग से बढ़ रही है। यह जल्द ही 9.5 बिलियन होने जा रही है और हमारी धरती माता सिर्फ़ और सिर्फ़ आठ बिलियन जनसंख्या को वहन करने की ही क्षमता रखती है।

    कृषि का संकट एक नया खतरा हो गया है। किसान डूबता जा रहा है। पर्यावरणीय, मानवीय और सरकारी फैसलों ने कृषि को ऐसे विकराल दौर में ला दिया है, जहां अन्न उत्पादन गिरने वाला है और जनसंख्या बढ़ने वाली है। पिज्जा और बर्गर संस्कृति की गोद में अनचाहे ही हमें पटका जा रहा है। खेती का एरिया सिमटता जा रहा है।

    जल संकट एक और विकराल समस्या बनने जा रही है। पीने का जो पानी कभी पवित्र था और जिस शीतल जल के लिए हमारे बड़े-बुजुर्ग प्याऊ खोला करते थे, उस महान् संस्कृति को कार्पाेरेट कल्चर काल कवलित कर गई है और दूषित पानी सड़े हुए प्लास्टिक की दूषित बोतलों में बिक रहा है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस पानी के कारण आपको सबसे ज्यादा बीमारियां होने का डर फैलाया गया, उसका बोतलबंद विकल्प अब हमारे शहरों में अस्पतालों का एक जंगल खड़ा हो चुका है।

    और सबसे बड़ा और पांचवां खतरा यह है कि ऐसी बीमारियां दस्तक दे रही हैं, जिन पर इनसान जीवन भर की कमाई खर्च कर देता है, लेकिन फिर भी स्वस्थ नहीं हो पाता। हमारे विश्वविद्यालय विवादों में लाकर हमारे आत्मसंस्कारों की संस्कृति को विनाश की तरफ धकेला जा रहा है। विकल्प ये है कि हम अपनी महान् रवायतों को और संस्थानों को नष्ट नहीं होने दें, बल्कि उनमें कुछ खराबी है तो उसे दुरुस्त करके और बेहतर बनाएं।

    मित्रो, ये ऐसे ख़तरे हैं और इतने भयावने हैं कि इनका हल किसी कम्युनिस्ट पार्टी, किसी कांग्रेस, किसी आरएसएस, किसी तृणमूल, किसी बसपा, किसी आम आदमी, किसी अभियान, किसी एनजीओ, किसी सरकार या किसी जाति, किसी धर्म या किसी संस्कृति के पास नहीं है। किसी इस्लाम, किसी हिन्दू, किसी बौद्ध, किसी क्रिश्चियनिटी या किसी ताओइज्म के पास नहीं है।

    हल है, लेकिन सब मिलकर करें और एक कॉमन मानव समुदाय के हित को लेकर चलें तो। मिलकर लड़ें तो।

    ये सब दल, सब संस्कृतियां, सब धर्म और सब राजनीतिक दल और उनसे ऊपर के बहुतेरे संगठन, एक कालखंड में लोगों ने उस काल की समस्याओं को लेकर तैयार किए थे। अगर इस्लाम हल होता तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलिम ही मुसलिमों के आपसी संघर्ष में नहीं मारे जाते। ठीक ऐसा ही हिन्दुओं और ऐसा ही अन्य धर्मों के साथ हैं।

    मानव समुदाय को एक होकर ही आगे बढ़ना होगा। अब समय आ गया है कि हम जाति, नस्ल, धर्म और राष्ट्र के नाम पर लड़ना बंद करें। आज राष्ट्रीयतावाद भी एक नया खतरा बन गया है, क्योंकि जितनी भी समस्याएं हैं, उनकी विकरालता ऐसी है कि उनके सामने हमारे राष्ट्रों की क्षमता भी कमतर है। अब इस्लाम को हिंदुत्व के साथ अपनी सकारात्मकताआें के साथ कंधा मिलाकर चलना होगा और हिंदुत्व को इस्लाम के साथ। भारत को पाक के साथ और पाक को भारत के साथ।

    आपके समस्त विश्वास पवित्र और पावन हैं। आपके सब राष्ट्र महान हैं। आप उनका सम्मान करें, लेकिन धर्मों, जातियों, राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक श्रेष्ठताओं के अहंकारों के विष को शिव की तरह पीकर अपने कंठ में स्थापित कर लें। नीलकंठ बनें। नीलकंठ की पूजा करनी है तो उसकी गगनचुंबी प्रतिमा नहीं बनाएं। धन का अश्लील प्रदर्शन नहीं करें। धर्म का कार्पोरेटाइजेशन नहीं करें। धर्म को धर्म रहने दें।उस धन को अशिक्षा, गरीबी, दु:ख, तकलीफ़, पिछड़ापन, गुरबत, भेदभाव, अत्याचार और जुल्मोसितम मिटाने के लिए खर्च करें। यही सच्चा शिवत्व है। बाबा लोग जो मूर्तियां बना रहे हैं, वह शिवत्व नहीं है। वह शिवत्व का अपमान है।


    फेसबुक वाल से साभार

  • क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले?

    त्रिभुवन


    क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले? बीएसएफ के जवान तेज बहादुर ने बाकायदा विडियो डालकर बुरे खाने पर जो प्रश्न उठाए हैं, उन्होंने बीएसएफ के अफ़सरों और केंद्रीय गृह मंत्रालय की उस व्यवस्था के रुपहले झूठ की कलई खोल दी है।

    अब बीएसएफ के आईजी और डीआईजी से लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय तक ने खाने-पीने की चीज़ों को दुरुस्त करने के बजाय खुले तौर पर असलियत सामने लाने वाले तेज बहादुर को ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है। यह भारतीय बलों की अंदरूनी हक़ीक़त है।

    बीएसएफ के एक जवान की हूक और तड़प ने पूरी व्यवस्था के भीतरी कोढ़ को सामने ला दिया है। यह सच मैंने सीमा की रिपोर्टिंग करते हुए बहुत नज़दीक से देखा है कि सेना और अर्धसैनिक बलों के आला अफ़सर किन रंगीनियों और रानाइयों में रहते और मौज-मज़ा करते हैं और आम सैनिक किस तरह हाथों को खंजर बनाकर सेना या बीएसएफ के ताज़ को दमकाते हैं।

    मैंने स्वयं देखा है कि साधुवाली, सूरतगढ़ और लालगढ़ छावनी से सेना के अधिकारी किस तरह ट्रकों को सुनसान इलाकों में ले जाकर डीजल बेचा करते थे। मैं जिन दिनों एक साप्ताहिक अख़बार निकाला करता था, उन दिन जहां से कागज़ खरीदता था, वहां से सेना के अधिकारी एक पचास पैसे वाले स्कैच पैन को दस रुपए में खरीदने का बिल लिया करते थे। बीएसएफ के बटालियनों में जब कभी किसी कार्यक्रम के लिए गए, अफ़सर माैज-मजा करते थे और सिपाही तेज बहादुर की तरह ही कलपते थे, लेकिन उनकी सुनता कौन है?

    आपने बीएसएफ के डीअाईजी मान का तर्क तो सुना ही होगा कि तेज बहादुर निजी कारणों से नाराज है। तेज बहादुर का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। इस देश में जो भी व्यक्ति सच कहता है या किसी ताकतवर संस्था के खिलाफ आवाज़ उठाता है तो उसे पागल ही करार दिया जाता है। इस देश का यही ऐतिहासिक सच है। आप सेना के, सुप्रीम कोर्ट के और प्रधानमंत्री सहित किसी अन्य ताकतवर संस्था के खिलाफ़ कुछ बोलेंगे तो कह दिया जाएगा कि आप अमेरिका के या किसी पाकिस्तान एजेंसी के एजेंट हैं!

    तेज बहादुर पागल ही तो है, जिसने यह जानते हुए कि उसका और उस जैसे लाखों जवानों का हर रोज़ जिन चंगेज़ों और नादिरशाहों से वास्ता पड़ता है, वे हेलिकॉप्टरों और युद्धक विमानों की खरीद का सौदा करते हुए तीन-चार सौ करोड़ रुपए से यों ही गिफ्ट में कमा लेते हैं। ऐसे लोगों के पास किसी तेज बहादुर की दाल का पानी मापने और उसमें कितने दाने हैं, यह गिनने की भला फ़ुर्सत होगी? तेज बहादुर पागल नहीं तो क्या है, जो यह जानते बूझतेऔर देखते हुए एक विडियो वायरल करता है कि उसका सामना कितने ही सुल्ताने-ज़ाबिर से हर रोज़ होगा।

    तेज बहादुर तो बीएसएफ का जवान है और वह जब बीएसएफ के अफ़सरों पर प्रश्न भर उठाता है। बीएसएफ के आला अफ़सर उसे मनोरोगी भी साबित कर सकते हैं, लेकिन उस मीडिया को क्या कहेंगे, जिसमें सुधीर चौधरी जैसे वज्रमूर्ख और सरेआम भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोग ऐसे राजनीतिक दलों को पाकिस्तानी एजेंट घोषित करने लगते हैं, जो केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री के खि़लाफ़ एक होने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार रखते हैं।

    ऐसा ही दौर 1975 से 1977 के दौरान आया था जब इंदिरा इज़ इंडिया और इंडिया इज़ इंदिरा का नारा सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े सुधीर चौधरी लगाया करते थे। भारत में सुलतानों से मुहब्बत का दौर आज का नहीं है। यह बहुत पुराना रोग है। सुलतानों के इश्क में पागल हुए लोग ऐसे होते हैं, जो स्वतंत्रता के नूर और अभिव्यक्तियों के चंद्रमा को फेंककर सुलतान के जूते झाड़ने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।

    अब तो क्या मीडिया और क्या सेना, सभी एक ही धारा में बह रहे हैं। क्या संत और क्या मतिमंत। भारत में कभी एक दौर था जब कुंभनदास जैसे संत हुए थे। जिस समय बड़े बड़े राजे-महाराजे अक़बर बादशाह के दरबार में हाजिर हो चुके थे तो कुंभनदास को अक़बर बादशाह ने अपनी राजधानी सीकरी में बुलाया और एक पद सुनाने को कहा तो बाबा कुंभनदास ने टिकट या सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मांगी। वे बोले : ‘संतन को कहा सिकरी सो काम। आवत जात पनहियाँ टूटी। बिसरि गयो हरि नाम। जिनको मुख देखे दु:ख उपजत। तिनको करिबे परी सलाम!’ अरे ओ अक़बर बादहशाह, मुझ संत को तेरी सीकरी से क्या लेना देना।यहां आया और यहां से पैदल जाऊंगा, क्योंकि मैं हाथी घोड़े तो चढ़ता नहीं, मेरी पन्हैयां यानी जूतियां टूट गई हैं। जो आने-जाने में देर हुई, उतने समय में मैं ईश्वर चिंतन करता। और बादशाह की तो शक्ल देखकर तो दिन खराब हो जाता है और देख मेरा दुर्भाग्य कि तुझे सलाम करना पड़ रहा है। और एक आज के संत हैं। निकृष्टता और पतन के चरम पर।

    लोकनायक जयप्रकाश नारायण से लेकर आम आदमी तक जब इंदिरा सरकार के लौहावरण के खिलाफ जनयुद्ध में उतरा तो सत्ता प्रतिष्ठानों ने उन सबको विदेशी शक्तियों के इशारे पर काम करने वाला घोषित करके जेलों में डाल दिया। ये आरोप कम्युनिस्टों के एक खेमे पर भी लगे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं पर भी। ये आरोप भारतीय जनता पार्टी के पुराने संस्करण भारतीय जन संघ पर भी मंढे़ गए और लोहियावादियों-समाजवादियों पर भी। इंदिरा गांधी और उनके मूर्ख और आत्मघाती प्रशंसकों ने विरोधियों को क्या-क्या नहीं कहा। लेकिन अफ़सोस आज नरेंद्र मोदी के भक्त और राष्ट्रीय स्वयं सेवक के अनुयायी उस इंदिरा मार्ग का अनुसरण बड़े गर्व से कर रहे हैं।आज उन्हें उन अंधेरों में नूर ही नूर नज़र आ रहा है, जिनके लिए वे कभी जेल गए थे।

    लिहाजा, बीएसएफ के जिस साहसी जवान ने विडियो डालकर जिस सच को देश के सामने ला दिया है, वह बीएसएफ ही नहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय तक को पच नहीं रहा है। बेहतर ये है कि बीएसएफ और गृह मंत्रालय सेना और बीएसएफ के जवानों की जमीनी खबर ले और सच को सच माने। ऐसे साहसी सैनिक को दंडित करने के बजाय भ्रष्टाचार से सड़ती व्यवस्था को दुरुस्त करे। यह ऐसा ही समय है जब सेना के अफ़सरों के खिलाफ जवानों को अपनी बात रखने का हक़ और अधिकार हो और सुप्रीम कोर्ट अपनी पवित्रता से बाहर आकर आंख में आंख डालने का साहस करे। क्या इस बहादुर देश को सवालों से डरा हुआ सुप्रीम कोर्ट चाहिए? क्या इस देश को ऐसी सेना चाहिए, जो प्रश्नों से डरे? alprazolam for sleep online https://www.veterinary-practice.com/ अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट साहस दिखाए और कंटेप्ट ऑव कोर्ट जैसे दकियानूसी, अलोकतांत्रिक और बेसिरपैर के कानून को अब तिरोहित कर दे। अब तूफ़ाने तरब का वक्त गया सत्ता की शक्तियो!

    पवित्रता यही है कि पवित्रता के अलावा कुछ भी पवित्र नहीं है। न सेना, न अर्धसेना, न प्रधानमंत्री, न राष्ट्रपति, न सुप्रीम कोर्ट और न प्रभु स्वयं। अब वह दौर बीत चुका है जब सेना, अदालतें और बादशाहतें खलीफा थीं। अब खलीफा है तो वह जनता है। लोक है। इस लोक से ऊपर कुछ नहीं है। आप जिस लोक के लिए हैं, आप जिस जनता के लिए हैं, आप जिस नागरिक के लिए हैं, उसे यह अधिकार है कि वह आप पर सवाल उठाए। सवालों से बचने की कोशिश करेंगे तो किसी से नहीं बच पाएंगे। जो सवाल से बचने की कोशिश करेगा, वह भ्रष्ट ही होगा। वह निकृष्ट ही होगा। तेज बहादुर ने अर्ध सैनिक बल की रसाेई की बदहाली का सवाल उठाया है, लेकिन यह सवाल बता रहा है कि देश और व्यवस्था के चूल्हे पर ज़ुल्म, झूठ और निकृष्ट पतन किस तरह पक रहे हैं। मैं बहादुर जवान तेज बहादुर के साहस को प्रणाम करता हूं। वह ज़ुल्मत-कदे में शम्म-ए-फ़रोज़ां लेकर दाखिल हुआ एक साहसी व्यक्ति है। हमें उसके साहस के साथ खड़ा होना चाहिए।


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  • जब मुसलमान हिन्दू हो गए और हिन्दू मुसलमान होते चले गए!

    त्रिभुवन


    प्राचीन भारत में कभी मूर्तिपूजा नहीं होती थी। पूर्व वैदिक काल में लोग मंदिर नहीं बनाते थे। उनके लिए कण-कण में ईश्वर था। मानव-मानव बराबर था। इसका प्रमाण है मनुस्मृति और अन्य ग्रंथ। किसी प्राचीन भारतीय ग्रंथ में मूर्ति का जिक्र तक नहीं है। न चारों वेदों में, न छहों दर्शन में। न उपनिषदों में। किसी स्मृति में भी किसी मूर्ति का उल्लेख नहीं है। प्राचीन भारत के लोग ईश्वर के सर्वव्यापक, निराकार और अमूर्त स्वरूप में विश्वास करते थे। वे इसे दयालु और न्यायकारी भी मानते थे।

    और मुसलमान लोग या कहें कि अरब देशों के वासी, जहां यह धर्म पनपा, मुहम्मद साहब और कुरआन के अार्विभाव होने से पहले हमसे कहीं ज्यादा मूर्तिपूजक थे। उनके यहां बड़े-बड़े मंदिर और विशालकाय मूर्तियां थीं। प्रतिमा पूजन के कारण वे बहुदेववादी हो गए थे और आपस में बुरी तरह लड़ते थे। कत्लोगारत मची रहती थी। शांति और बंधुता उनके लिए जैसे स्वप्न था।

    अगर ऋषि इब्राहिम पैदा नहीं हुए होते और उन्होने प्रतिमा पूजन के ख़िलाफ़ अलख नहीं जगाई होती तो अरब देशों में ऐसे ताकतवर लोग पैदा नहीं होते, जिन्होंने शांति और बंधुता के लिए संघर्ष किया। इब्राहीम ने ही दुनिया में पहली मस्ज़िद स्थापित की, जो मक्का में थी। ऋषि मुहम्मद ने उनके काम को अंतिम रूप दिया और एक नया धर्म इस पृथिवी पर पनपा, जिसमें मूर्तिपूजा अपराध घोषित की गई। ऋषि मुहम्मद ने मदीना की मस्ज़िद स्थापित की। आप अगर ऋषि इब्राहीम का जीवन पढ़ेंगे तो ऐसा लगेगा, मानो आप भक्त प्रह्लाद, भगवान् क़ृष्ण और स्वामी दयानंद के जीवन का कोई पार्ट पढ़ रहे हैं।

    लेकिन कालांतर में समय ने ऐसी करवट ली कि मुसलमानों के अरब में तो हमारा निराकार, दयालु और सर्वशक्तिमान ईश्वरीय और मानव-मानव बंधु का दर्शन पहुंच गया और मुसलमानों के अरब की बुतपरस्ती हमारे यहां आ बैठी। अब यह भी समय का फेर है कि इस्लाम, जिसका अर्थ है शांति है, हिंसा और अशांति का पर्याय बना दिया गया है और सनातन धर्म, जो बिलकुल वैज्ञानिक टेंपरामेंट वाला था, इस्लाम के उत्कर्ष के कारण वहां से भाग कर भारत में आए रूढ़वादियों, अंधविश्वासपरस्तों और पोंगापंथियों के कारण प्रतिगामिता की राह पर चल पड़ा, जहां ऊंचनीच, जातिगोत्र और न जाने क्या-क्या नहीं पनपाया गया।

    आप पूछेंगे : क्यों? ऐसा क्यों हुआ और क्या ऐसा हो सकता है कि अरब से कोई चीज़ यहां आए और हम उसे मान लें? यह तो असंभव बात है!

    लेकिन यह सच है। हैरान कर देने वाला सच। भारत सदा से ही पराए और पश्चिमी देशों की चीज़ों के प्रति सम्मोहन का शिकार रहा है। पश्चिम-परस्त भारतीयों ने पहले अपने सनातन धर्म का नाम छोड़ा और पर्शियाई लोगाें के दिए विदेशी और घृणासूचक नाम हिन्दू तक को अपनाया। इसके बाद अंग़रेज़ आए तो इंडियन हो गए और देश का नाम बदलकर इंडिया कर लिया। यही नहीं, आज भी हम न्यू ईयर मनाते हैं। बर्थ डे पर केक काटते हैं!

    आज भी हमारे प्रधानमंत्री किसी भारतीय पत्रकार को इंटरव्यू देने में आनाकानी करते हैं और विदेशी बबलू टाइप स्ट्रिंगर को बुलाकर साक्षात्कार करते हैं। फिर भले वे पंडित नेहरू हों या अब के अपने प्रिय मोदी।

    टाइम पत्रिका किसी को पर्सन ऑव द ईयर घोषित करने का संकेत देती है तो हमारे लोग कलाबाजियां खाने लगते हैं और अगर हमारे यहां की कोई पत्रिका या अखबार क्रिटिसाइज कर दे तो हमारे सत्तापुरुष तमतमाने लगते हैं।

    धोती-कुर्ता भले कहीं टंगा रहे, लेकिन विदेशी हैट लगाकर मैं आज भी विदेशी संस्कृति पर प्राण निछावर करता हूं। क्या आपने कभी मुझे धोती-कुर्ते में देखा? नहीं न!

    और अंत में : मेरा विचार वह नहीं है, जो अभी यहां प्रस्तुत है। मेरा विचार होगा, जो आप सबकी प्रतिक्रियाओं और तर्कों के बाद बनेगा। हमें इतना विवेकी और विनम्र होना चाहिए कि हम एक-दूसरे के तर्कों को ससम्मान आत्मसात कर सकें।


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  • आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ

    त्रिभुवन


    आप कोसें भले मुस्लिमों को, लेकिन पाकिस्तान भी तो एक हिन्दू ने बनाया था। अब यह अलग बात है कि यह परिवर्तन पीढ़ी भर पहले हुआ।

    महाभारत में एक एक श्लोक है : श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए परधर्मसे, गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है । स्वधर्ममें मरना भी कल्याणकारक है, पर परधर्म तो भय उपजानेवाला है।

    आखिरी ऐसा क्या होता है कि पूंजा गोकुलदास मेघजी का गुजराती परिवार इस्लाम अपना लेता है और भारत का खंडित करके एक नया देश पाकिस्तान बना लेता है। सिर्फ़ पाकिस्तान ही नहीं, इस पाकिस्तान से एक बांग्लादेश भी निकलता है। यह इतिहास की बात है। अभी समीचीन भी नहीं है, लेकिन बहुत गंभीरता से साेचने की बात है। आप जिन्ना या पूंजा परिवार को विभीषण या जयचंद कुछ भी कहें, लेकिन इस बदलाव ने भारत को बहुत क्षति पहुंचाई है।

    देश में जिस तरह की चर्चा इन दिनों चल रही है और जैसे नारेबाजियां और किलेबंदियां हो रही हैं, उनमें क्या यह आत्मविश्लेषण का विषय नहीं है कि एक सुशिक्षित व्यापारिक परिवार ने महाभारत और श्रीमद् भगवद् गीता की शिक्षा को छोड़कर कुरआन की शिक्षा को अपनाया। यह प्रश्न परेशान करने वाला है। आप यह पोस्ट लिखने के लिए मुझे या धर्म बदलने के लिए जिन्ना परिवार को गाली दे सकते हैं। लेकिन मेरा विनम्र अनुराध है कि कई बार आत्मविश्लेषण और आत्मावलोकन संभवत: बहुत उपयुक्त और समीचीन होता है। आख़िर कुछ तो कारण रहा होगा कि पूंजा जैसा गौरवशाली नाम बदल गया। मीठी बाई जैसा शुद्ध भारतीय संस्कारशील नाम तिरोहित हो गया।

     


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