अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा –Tribhuvan

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प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन ने अपनी पुस्तक 'दॅ आइडिया ऑव जस्टिस' के 'दो शब्द' वाले हिस्से में प्रसिद्ध लेखक चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास 'ग्रेट एक्सपेक्टेशंस' से एक अदभुत उदाहरण दिया है। चार्ल्स डिकंस के उपन्यास में बच्चों की अपनी छोटी-सी संवेदनशील दुनिया है। इसमें एक पात्र पिप कहता है कि अन्याय का एहसास बहुत अंदर तक पीड़ा पहुंचाता है। पिप ने बचपन में अपनी गुस्सैल और बदमिज़ाज बहन के हाथों बहुत अपमान सहा था। हर आदमी जब अन्याय सहता है तो वह पिप की तरह ही सोचता है। ऐसा नहीं होता कि हम व्यवस्था को पूरी तरह न्यायपूर्ण बना ही दें; लेकिन यह उम्मीद और प्रत्याशा हर हृदय में स्पंदित होना स्वाभाविक है कि हमारे चारों तरह जो अन्याय का वातावरण बन गया है, उसे समाप्त किया जाए। यह अन्याय कई बार वास्तविक और कई बार छद्म रूप से तैयार किया जाता है।

हम जिस देश और समाज में जी रहे हैं, वह बहुत ही अदभुत हैं। उसने हम सबको बहुत ही गिरगिटिया बना दिया है। इसे हम सब आए दिन देखते हैं, लेकिन स्वीकार नहीं करते। हम आए दिन देखते हैं कि शिड्यूल्ड कास्ट्स और शिड्यूल्ड ट्राइब्स विकराल समस्याओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन इनका एहसास कथित ऊंची जातियों और उच्च शिक्षित लोगों को नहीं है। आज जिस तरह की डिस्पैरिटीज और जिस तरह के सब्जुगेशंस ये वर्ग भुगत रहे हैं, वह हमें बाहर से सामान्य बात लगती है, लेकिन आप जब इनके हृदय में उतरकर देखेंगे तो वहां आपको एक विकराल झंझावात दिखाई देगा। यह उस मिथकीय रामराज्य का भी कड़वा सच था और यह इस युग के रामराज्य का भी सच है कि यहां वनवासी हनुमान को ही सीना फाड़कर अपने हृदय में बसते राम का ही चेहरा दिखाना होता है। राम राम ही रहते हैं और वनवासी योद्धा हनुमान होकर भी सेवक ही रहता है और राम जी विजय की हुई स्वर्णिम सत्ता विभीषणों को ही सौंपते हैं। भले वह कालकूट विष पीने वाले शिव के आशीर्वाद से ही रची गई हो।

दुनिया का एक यही देश है, जहां आज भी समाज आदिम तरह से न केवल बंटा हुआ है, बल्कि उसकी भाषिक संवेदनाएं भी आदिकालीन ग्रंथों से अनुप्राणित होती हैं। हमें समझ भी वही आता है। इसलिए वैज्ञानिक सत्य और शोध पर आधारित नई शब्द रचना हमें स्वीकार्य ही नहीं होती। हमारे यहां शिड्यूल्ड कास्ट 16.6 और शिड्यूल्ड ट्राइब 8.6 प्रतिशत हैं। इतना वर्ग इतना सा सरल नहीं है। यह 1108 अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ है आैर उनका अपना ऊंच-नीच और छुआछूत है। यह 29 राज्यों में फैला हुआ मानव समाज है। हमारे एसटी 22 राज्यों में फैले हुए हैं और ये 744 तरह के आदिवासी समाज हैं, जिनकी अपनी बहुत समृद्ध और गौरवशाली परंपराएं हैं, लेकिन हमारे विकास की अाधुनिक धारणाओं और कामकाज की शैली ने इन्हें बर्बाद कर दिया है।

सोशल मीडिया एक तरह का ख़तरनाक़ दर्पण है। यह एक तरह की खुली हुई पैथोलॉजिक लैबोरेट्री है। इसमें हर एक का ब्लड, स्टूल और स्पूटम समुद्र ही तरह से बह रहा है। बायोप्सियों के ढेर लगे हैं। इस विशालकाय पैथोलॉजिकल लैबाेरेटरी से किसी को गंध आ रही है और कोई घृणा में डूबा जा रहा है। कोई मुंह पर कपड़ा बांध रहा है और किसी ने नाक भींच ली है। लेकिन मानव समाज को एक स्वस्थ और विवेकशील समाज के रूप में देखने की कामना करने वाले लोग इसे किसी डॉक्टर की निगाह से देखेंगे। आज के एससी-एसटी वह नहीं हैं जो कल थे। उन्हें शिक्षा और जागरूकता ने सबके बराबर खड़ा कर दिया है। इससे वे कोई विवेकवान या कोई वैज्ञानिक सोच वाले हो गए, यह नहीं है। लेकिन यह सच है कि वे अब उन्हें छोटे-छोटे अन्याय भी उद्वेलित करते हैं। वे एक अब एक ताकत के रूप में गोलबंद हो गए हैं। उनमें सबके सब न तो शंभु हैं कि वे सांप्रदायिक लोगों का गुर्गा बनकर उनकी दमित रक्तपिपासा का शांत कर देे और न ही वे सबके सब प्रतिभा से दिपदिपाते लेखकीय प्रतिभा वाले ऐसे अति संवेदनशील रोहित वेमुल्ला हैं, जो यथार्थ का सामना करने के बजाय आत्महत्या कर लें।

अब समय आ गया है कि हम हिंसा की मुखर आलोचना करें, लेकिन यह प्रतिज्ञा भी करें कि हम भारतीय समाज से अन्याय को मिटा देंगे। हम अन्याय को खत्म करके ही न्याय का संवर्धन कर सकते हैं। हम अपने घरों में उनका उसी तरह स्वागत सत्कार करें, जैसा हम अपने रिश्तेदारों से करते हैं। हम अपने घरों के अगवाड़े या पिछवाड़े एक-एक अलग से रखे चाय के कपों को हटा दें। हम अपने घरों के बाहर सफाई करने वाले या गंदे नाले में उतरकर सफाई करने वाले से ऐसा ही सलूक करें, जैसा एक आदर सरहद पर लड़ते किसी सैनिक का करते हैं। हमें अपने शब्दकोशों को बदल डालना चाहिए, जिनमें कथित अछूत जातियों के नामों को गालियों के तौर पर प्रयुक्त किया जाता है। हमें अपनी नैतिकता में आ चुकी कलुषाओं को धोना होगा। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारी बस्तियों में वे लोग वैसे ही सम्मान से रहें, जिस सम्मान से एक स्वाभिमानी को रहना चाहिए। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें अपने दिलो-दिमाग को मानवीय और न्यायशील बनाना होगा। हम ऐसे नहीं हैं, इसीलिए हमें अपनी जाति की हिंसा हिंसा ही प्रतीत नहीं होती और किसी अन्य जाति की हिंसा हिंसा दिखाई देती है। इसीलिए हमें गांधी जैसे महानायक की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे आतंकवादी नहीं लगता, लेकिन एक खास इमारत के बाहर गोलियां चला देने वाला देशद्रोही लगने लगता है। हम इमारत के भीतर के देवता की हत्या करने वाले का तो मंदिर भी बनाने लगते हैं, लेकिन इमारत पर बंदूक तानने वाले को फांसी दिए बिना बेचैन हो उठते हैं।

न्याय की यह पुकार इस महान देश की मिट्‌टी में वैदिक काल से भी शायद सैकडों-हजारों साल पहले की है। हमारी मानवीय चेतना उसी मिट्‌टी से नहाई हुई है। हमें इस धरती पर पल रहे समाज को एक अच्छे मानव समाज का रूप देने के लिए अपनी अपनी संस्कृतियों और अपनी अपनी मानसिकताओं में पल रहे अन्याय को खत्म करना होगा। यह काम हमें ही करना होगा; क्योंकि जिनके भरोसे हमने यह काम छोड़ दिया है, वे बहुत ख़तरनाक़ खेल खेल रहे हैं। वे अपनी सत्ता के लालच में 15 अगस्त 1947 से आज तक बच्चों के हाथों में बासुरियों के बजाय बंदूकें ही शोभित करवाने की संस्कृति को बढा रहे हैं। बच्चे सरदार भगतसिंह ने अंगरेजों को भगाने के लिए खेत में बंदूकें बोई थीं, लेकिन हमें स्वतंत्र भारत में बांसुरियां बोनी चाहिए, न के धनुष और सुदर्शन चक्र! यह राम आैर कृष्ण से भी पहले उन वैदिक ऋषियों का देश है, जिन्होंने मानवता की कोंपलों की रक्षा के लिए अपने आपको होमना सीखा था। यह रक्तपिपासुओं का नहीं, यह ऐसे आम भारतीयों का देश है, जिनके कंठ में राग और विराग पलता है। जहां संतों की वाणियां गूंजती हैं। यह सिर्फ इसी देश को एक परिवार नहीं, पूरी वसुधा को कुटुंब बनाने का स्वप्न रचने वाले लोगों के बच्चों का देश है। यह उन साधुओं और फ़कीरों का वह देश है, जहां एक ऐसे मानव समाज की कल्पना की गई थी, जो निखिल द्यु लोक में प्रेम प्राण, गान गंध और पुलक के झरने की कामना करते हैं। जहां हृदयों में हिंसक भाव नहीं, नीरव आलोक बरसता है। जहां स्वर्णिम उषा की अरुणाई से प्राण आरक्त होते हैं और अलसाई आंखों पर दूर्वादल के आेसकण नव जागृति लाते हैं।

इसलिए स्वतंत्रता का स्वप्न तभी पूरा होगा जब अन्याय का अंधकार हम सबके हृदयों से हम स्वयं दूर देंगे।

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3 Responses to अन्याय का एहसास और हमारे हृदयों में स्पंदित होती न्याय की प्रत्याशा –Tribhuvan

  1. Davinder says:

    Very well addressed, should send it to PM & Govt.

  2. Ram Tarun says:

    Very good analysis

  3. Vijendra Diwach says:

    बढिया लेख

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