नरेंद्र मोदी : विरोधी इस बंदे की ताक़त और अंधभक्त इसकी कमज़ोरियों को खुली आंख से देखें –Tribhuvan

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लंदन में चोगम सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रसून जोशी वाले कार्यक्रम को लेकर पूरी दुनिया में फैले भारतीयों के बीच ख़तरनाक़ बहस चल रही है। इससे पहले मोदी को चाहने वाले इकतरफ़ा मो:दी-मो:दी का समवेत गुंजार करते थे। अब मोदी के विरोधियों का स्वर भी बहुत प्रबल हो गया है; लेकिन एक चीज़ है कि मोदी के विरोधी मोदी की ताक़त और मोदी के भक्त मोदी की कमज़ोरियों को नहीं भांप रहे।

मोदी विरोध का स्वर जब से मज़बूत हुआ है, राहुल गांधी भी उन्हें बांहें ऊंची करके चुनौती देने लगे हैं। लेकिन राहुल जी, एक बात समझने की है कि ये बंदा नरेंद्र मोदी है, न तो राजनाथ सिंह और न ही सुषमा स्वराज है। न यह अटल बिहारी वाजपेयी है और न ही लालकृष्ण आडवाणी। ये सबके सब राजनीति के उसी फ़ील्डक्लब के मेंबर थे, जिसमें आपकी कांग्रेस और उस जैसी अन्य पार्टियाें के लोग थे।

मोदी को चुनौती दीजिए, लेकिन पहले मोदी को ठीक से समझ तो लीजिए। मोदी के सामने तुम नहीं हो यार। तुम सुरक्षा कर्मियों के हाथों में पल बढ़कर बड़े हुए हो। जहां पुलिस होती है, वहां भय ही होता है। निर्भीकता नहीं होती। खिलंदड़ापन नहीं हो सकता। इसीलिए तुम एक ऐसी भाषा और ऐसे अंदाज़ में मोदी का विरोध करते हो, जो जनपथ और अकबर रोड के कुछ ख़ास अहातों के गमलों में उगाई और आप तक पहुंचाई जाती है।

यह भाषा आम हिन्दुस्तानी की भाषा नहीं है। आपके हावभाव भी आम भारतीय नागरिक के नहीं हैं। केवल कुर्ता और पायजामा पहन लेने से भर से आप ऐसे नेता का सामना नहीं कर सकते, जिसने घाट-घ्राट का पानी पिया हो। आपने बचपन से छान-छान कर ठाठ किए हैं और वह आग के दरियाओं को पार करके गांव की गलियों के गंदे और गलीज़ कहे जाने वाले जांबाज़ लड़कों के लड़ भिड़कर तरह-तरह के इम्तिहान में पास होकर निकला है।

दरअसल राहुल बाबा, तुम समझते हो कि अब इस देश के विपक्ष की राजनीति में वही भाषा काम आएगी, जो आज तक आती रही है। तुम्हें तुम्हारे रायबहादुर (राय देने वाले बहादुर लोग) समझाते हैं कि मठों और मंदिरों में जाने से सत्ता की राह निकल आएगी। राह नहीं तो कोई पगडंडी ही मिल जाएगी। लेकिन यह ऐसे हाईवेज का जमाना है, जिसमें आगे की गाड़ी इतनी स्पीड से चलती है कि पीछे वाली उसे क्रॉस नहीं कर पाती।

अब न तो अटल बिहारी का ज़माना है और न ही लालकृष्ण आडवाणी का। अब न तो वह संघ है और न ही वह भाजपा है। ये सबके सब राजाओं के जमाने से कार्पोरेट कलेवर में आ चुके हैं और अब कंपनी संस्कृति से सब चल रहा है और तुम हो कि अभी बाबा आदम के ज़माने वाली राजनीति का टटुआ दौड़ा रहे हो।

तुम्हारा कांग्रेस संगठन दीमक लगे काठ का ऐसा घोड़ा है, जो लोहे की जंग लगी लगाम चबा रहा है। क्या इसके सहारे तुम मोदी का मुक़ाबला करोगे? यह जो मोदी है, वह अलग तरह का नेता है।

यह सिर्फ़ प्रधानमंत्री नहीं है। यह सिर्फ़ भाजपा का नेता भर नहीं है। यह पट्‌ठा सियासी ज़मीन का पुराना कसरती है। यह दिल्ली के सब नेताओं से ज़्यादा ज़मीनी और ज़्यादा यथार्थवादी है। तुम भले इसे ज़्यादा शिक्षित मत मानो और तुम्हारी कांग्रेस के प्रति अप्रकट भक्ति वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी या वामपंथी-प्रगतिशील खेमे के लोग इसका उपहास उड़ाएं, लेकिन यह बंदा बहुत ज़्यादा शिक्षित नहीं होने पर भी दिल्ली में रहकर जंग खा चुके भाजपा और कांग्रेस सहित सभी दलों के नेताओं से कहीं अधिक तत्पर, संलग्न और कटिबद्ध है।

यह दिल्ली या किसी प्रदेश की राजधानी के ऐश्वर्यशाली घर में पैदा हुआ लड़का नहीं है। यह राजनीतिक चांदनी वाले घरों के निर्जन आंगन में तुम्हारी तरह पला-बढ़ा राजकुमार भी नहीं है। यह सुदूर भारत के ठेठ गांव की गंदी और बदबूदार गलियों में पैदा हुआ, खेला-कूदा और सुलगते अभावों में गुलिस्तान ढूंढ़कर आगे बढ़ा लड़का है।

यह शोलों, धुएं के बादलों और रुला देने वाली नाकामियों के बीच पला-बढ़ा है। इसका बचपन तपती बालू वाली धरती पर नंगे पांव गुजरा है। यह तुम्हारी तरह चांदनी बिछे आंगन के गमले में नहीं उगा है।

यह हम आम हिन्दुस्तानियों के लालच को भी जानता है और साहस को भी। भारत की धरती के कोने-कोने की ख़ाक़ छान चुका यह कल का प्रदेश स्तरीय नेता आज का विश्वस्तरीय नेता बनने के दिवास्वयं बेच रहा है। यह बहुतेरे लोगों को ढिठाई से भरा भी दिखता है, लेकिन असल में यह बहुत ज़्यादा धैर्य की आधारशिला पर खड़ा एक वक्र व्यक्तित्व है। यह चिंताओं के कोहरे से भी घिरता है तो अपने लिए चांदनी से चिना एक मकान तलाश लाता है।

आप अपनी घोर निष्क्रिय राजनीति की मुंडेर पर इसे जब धुएं की लकीर बनता देखते हैं तो यह अगले दिन शोला बनकर आप पर टूट पड़ता है। आप हों या वामपंथी, समाजवादी या फिर अन्यान्यपंथी, सबके सब अपने-अपने विचारों और अपने संगठनों के जंग को सहलाते हुए आंदोलनहीनता के कारण अपने चंद्रमाओं को अंधेरों में डुबोते हैं और इसका दुस्साहस देखिए कि यह बेवफ़ाई भी बहुत मज़े से करेगा और इम्तिहान से निकल जाएगा। यह जिस मेहरबान से काम निकालेगा, उसका दुश्मन भी हो जाएगा और भूतपूर्व मेहरबान को अपना हमदर्द बने होने के भ्रम में भी डाले रखेगा।

यह हर दिन एक नया भ्रम पैदा करता है। यह अच्छी तरह जानता है कि इस देश का आम भारतीय कितना भोला-भाला है और उसका सियासी टटलू कैसे काटा जा सकता है! कैसे किसी हिन्दुस्तानी को पीली परत चढ़े पीतल को सोने की ईंट बताकर बेचा जा सकता है। लेकिन तुम्हें तो पगले अभी यही पता नहीं कि टटलू काटना कहते किसे हैं और यह टटलू काटने का उस्ताद है। यह राजनीति का बहुत मंजा हुआ खिलाड़ी है।

भारतीय समाज मानता है कि जो पांडे जी के पांचों वेदों में, वह पंडाइन की छिगुनिया में! और यह तो भोले बंदे पंडाइन की छिगुनिया क्या, पूरी की पूरी पंडाइन को भी छिका-छुकूकर कलंदर हो गया।

इसलिए दोस्त, न कांग्रेसियों के चक्कर में पड़ और न विदेशी पॉलिटिकल मैनेजरों के भुलावे में आ। अकबर रोड से फटाफट फूट ले और एकलव्य बनकर इसी से कुछ सीख ले। अंगूठे-वंगूठे तो कटते रहते हैं। इस मोल में हाथ भी कटे तो महंगा नहीं! यह बहुत कम पढ़ा लिखा है, लेकिन गुणा बहुत है। हालांकि न तो इसने और न तूने कभी अमीर मीनाई को पढ़ा होगा, लेकिन इस बंदे ने अभी घाेर विरोध के दिनों में अमीर मीनाई की ग़ज़ल के उस शेर को बहुत शानदार ढंग से सही साबित किया है कि : कौन सी जा (जगह) है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं, शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर!

सच कह रहा हूं, सीख ले उससे कुछ कि कातिल भी बनो तो मरने वाले को यह एहसास करा दो कि यह खून आलूदा मिट्‌टी नहीं, उसे रचाने के लिए लाई गई मेंहदी है!

Credits: Tribhuvan's Facebook

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