Tag: Tribhuvan

  • ऐसा था वह “रणबांकुरा”

    ऐसा था वह “रणबांकुरा”

    Tribhuvan

    वह 65 साल का था, लेकिन आख़िरी के समय तक उसके चेहरे पर युवाओं जैसी ही आभा थी। वह भले पहले जैसा बलिष्ठ नहीं था, लेकिन किसी को कुछ ग़लत करते देखता तो अभी भी दृढ़ता से फ़टकार लगाने में कहां चूकता था। उसका रौबीला व्यक्तित्व कुछ अलग ही अंदाज़ का था। अफ़सर उससे थर-थर कांपते थे। वह आते तो मंत्री चैंबर छोड़कर निकलना ज़्यादा पसंद करते थे। और अगर सत्तारूढ़ दल से होने के बावजूद कुछ मंत्रियों या विधायकों को पता लग जाता कि “वह” भी इसी ट्रेन से जा रहा है तो वे यात्रा रद्द करना ज़्यादा उपयुक्त मानते थे।

    उसके एक कार्यकर्ता को किसी ने पीट दिया। वह भरे बाज़ार गया पीटने वाले नेता की दुकान पर और उसे फ़िल्मी अंदाज़ में जमकर पीटा। फिर कार में बिठाकर कोतवाली ले गया और सीआई से कहा : हम दोनों ने एक जैसा अपराध किया है। हम दोनों को गिरफ़्तार कर लो।

    Surendra Singh Rathore

    वह एक छोटी पार्टी का बहुत बड़ा नेता था। एक चुनाव में उसके किसी कार्यकर्ता को बड़ी पार्टी के नेताओं ने पंचायत समिति के कमरे में बंद कर दिया। वह अकेला था और सामने करीब ढाई हजार कार्यकर्ताओं के साथ उसके प्रतिद्वंद्वी ताल ठोक रहे थे। वह निडर होकर अकेला उनके बीच जाता है और सब ऐसे तितर-बितर हो जाते हैं जैसे आबादी में कोई युवा बघेरा आ गया हो। वह जाता है और अपने कार्यकर्ता को छुड़ाकर ये जा और वो जा। सब हत्प्रभ। उसकी निर्भीकता सम्मोहित करती थी। जैसे आप किसी फिल्म के दृश्य देख रहे हों। सिखों से उनका मा-जाए भाई का-सा रिश्ता हुआ करता था। दलित और मुस्लिम तो उन पर जान छिड़कते थे।

    प्रदेश की जेलों में गंगानगर के लोग काफ़ी हुआ करते थे। सरदार लोग भोलेपन में कुछ अपराध कर बैठते और फिर पुलिस और जेल के अफ़सरों की बन आती। बीकानेर के एक नामी जेलर साहब ने किसी सरदार को तंग करने में अति कर दी तो उसकी बहन इससे बोली : देख भाई तू कर कुछ भाई का। भाई अगले दिन ही बीकानेर पहुंचा और ऐसा किया कि ये जेलर की कुर्सी पर और जेलर मेज के नीचे।

    जिन दिनों वह सक्रिय था, उसमें ग़ज़ब की फुर्ती थी। वह सौम्य, शालीन और बनावटी किस्म का नेता नहीं था। जो भीतर था, वैसा ही बाहर था। छुपकर कभी कुछ नहीं किया। सब साहस के साथ। चौड़े-धाड़े। जो हूं, वह हूं। उसका रंग, उसकी चाल और उसके बोलने का अंदाज़ सबको दूर से ही मोहित कर लेता था। दोस्त सम्मोहित हाेते थे और दुश्मन चुपचाप किनारे करके दूसरी गली में चले जाते थे। वह हर समय किसी लोडेड एके फोर्टीसेवन जैसा रहता था। न डर, न चिंता और न कोई सावधानी।

    उसकी एक अलग ही छवि थी। अंदाज़ भी बहुत अलग था। बहुत बार खु़द अपने साधारण से घर के एक छोटे से कमरे में बैठा रहता और बाहर कई-कई दिन तक दो-ढाई सौ लोग इंतज़ार करते रहते। अचानक बाहर आता और दहाड़ता : क्यों भीड़ लगा रखी है! क्या हो गया!!! सामने करीब पौने सात फुट के एक पार्षद ने कहा : प्रधान जी, आपके दर्शन करने थे! वह बोला : कर लिये दर्शन!!! अब चलो घर अपने-अपने!!! और वह हुजूम निकलता तो दूसरा आ धमकता। फिर वही खेल और वही अंदाज़।

    हमारा औपचारिक परिचय कुछ महीने पहले हो चुका था और लेकिन जो पहली मुलाकात थी, वह बहुत यादगार थी। हाड़ कंपा देने वाली शीत की वह आधी रात थी। भारी बारिश हो रही थी। तेज झंझा चल रही थी। उस समय दरवाज़े पर थपकियां ज़ोर-ज़ोर से लगीं और त्रिभुवन-त्रिभुवन की आवाज़ गूंजने लगी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने आते ही वह बोला : “कुकुरमुत्ता” दो। मैं हैरान। आप और ‘कुकुरमुत्ता’! और वह भी इस समय। जिस व्यक्ति की छवि को मैं उन दिनों एक खालिस गुंडे के रूप में प्रचारित पा रहा था, वह मुझसे कह रहा था : देखो “कुकुरमुत्ता’ निराला की रचना है और मैं भी प्रकृति की निराली रचना हूं। मैं भी निराला हूं।

    मैं पुरानी आबादी थर्ड ब्लॉक के अपने छोटे से कमरे की अलमारी से किताब ढूंढ़ रहा हूं और उस व्यक्ति के कद के लिहाज से मेरा कमरा बहुत छोटा था, क्योंकि उस व्यक्ति का किसी भी जगह खड़े होने का ही अर्थ था कि सौ-पचास लोग प्रधानजी-प्रधानजी कहकर उमड़ आएंगे।

    मैं अभी किताब ढूंढ़ ही रहा था कि उन्होंने याददाश्त के हिसाब से ही पढ़ना शुरू कर दिया :

    आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब,
    बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब;
    वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्ता
    पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-
    “अबे, सुन बे, गुलाब,
    भूल मत जो पायी खुशबू, रंग-ओ-आब,
    खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
    डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!

    वह कहने लगा, मैं यह कविता कुछ जगहों से भूल गया था। मैं कुछ महीनों पहलेे आखिरी बार उससे मिला तो महान कवि केशव दास को उद्धृत करते हुए कहने लगा : केशव केसनि असि करी, बैरिहु जस न कराहिं। चंद्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं! और जोर से हंस पड़े। उन्हें केशवदास की रसिकप्रिया और रामचंद्रिका के बहुतेरे हिस्से कंठस्थ थे।

    उसे तरह-तरह की कारों, शराबों और हथियारों का भी बहुत शौक था। वे एक बार फ़ीरोज़पुर के पास किसी गांव में मुझे ले गए और बोले : चलो, तुम्हें अपनी लाइब्रेरी दिखाता हूं। वहां एक आलीशान अलमारी में तीन चार सौ किताबें। एक से सुंदर एक और एक से बढ़कर एक। बोले : देखो। पढ़कर देखो। मैंने एक बहुत सुंदर पुस्तक निकाली, जिस पर मीन कैंफ और अडोल्फ़ हिटलर लिखा था। वह पुस्तक मेरे हाथ से फिसलते-फिसलते बची। दरअसल वह पुस्तक नहीं, पुस्तक की तरह दिखने वाली स्कॉच की एक बोतल थी।

    चुनावों में विरोधियों ने जैसे हमले उस पर किये, वैसा आम तौर पर नहीं होता। उसके विरोधी नेताओं ने उसे गुंडा और शराबी कहा तो उसने चुनाव की पूरी धारा ही मोड़ दी। सभाओं में कहना लगा : हां, मैं गुंडा हूं। और हर उस आदमी के लिए गुंडा हूं, जो इस शहर में गरीब लोगों के साथ बेइन्साफ़ी करेगा। जो मज़दूर का खून चूसेगा। जो बेईमानी करेगा। वह सभाओं में गरजता : माताओ-बहनो, मैं शराब पीता हूं, लेकिन मैं अपने विरोधी की तरह कभी किसी का खून नहीं पीता। मैंने ग़रीब और किसी मज़लूम की अस्मत नहीं लूटी। मैंने किभी किसी का शोषण नहीं किया। लेकिन हां, मैं गुंडा हूं और वह गांधीवादी है, जो खून पीता है…आप सबका। क्या तेवर थे उसके!

    साहित्य और इतिहास का वह बहुत अच्छ जानकार था। लेकिन उस जैसी निर्भीकता और साहसिकता मैंने कभी किसी में इस तरह लपलपाती नहीं देखी। पिछले दो-तीन दिन से उस पर आ रही प्रतिक्रियाएं देख रहा था कि ज़माना उसे किस तरह देखता है। बहुतेरे लोग उसकी प्रतिभा को ज़ाया होना मानते हैं और बहुतेरे लोग नाकाम। लेकिन उसने अपनी हर सांस को अपनी शर्त पर जीकर दिखाया। वह कभी न तो सत्ता के बल के आगे झुका और न किसी के बाहुबल के आगे। वह न न्यायबल के आगे समर्पित हुआ और न बुद्धिबल के आगे। यह सब उसने उस दौर में करके दिखाया, जब बड़े-बड़े राजनीतिक लोग छोटी-छोटी बातों के लिए शीर्षासन करने लगते हैं।

    करीब पांच साल उसने मुझे बुलाकर बताया था कि ब्लड कैंसर के बाद अब पता नहीं कब क्या हो जाए। पूरा शरीर भीतर से जर्जर हो गया है, लेकिन मैं किसी को क्या बताऊं। तुम भी मत बताना। उसके कारण निराश नागरिकों में उम्मीदें जगती थीं। टूटे हुए युवाओं में एक बलभाव तैरने लगता था। उसका अपना ही धर्म और अपनी अलग ही जाति थी। इतिहास में जिसे वीरता कहा जाता है, वह उसको जीता था। उसने गुंडापन भी किया और बहुत धमक के साथ किया, लेकिन सिंह-वृत्ति से। उसने प्रतिद्वंद्वियों पर हमले भी किए और खुले आम किए, लेकिन कभी किसी सताए हुए को नहीं सताया। कई लोगों को उनसे प्राण भिक्षा मांगते भी देखा। ताकतवरों को चुनौतियों देने का आनंद अगर किसी ने लिया तो उसी ने लिया। मैंने पूरे प्रदेश में ऐसा तो कोई नहीं देखा।

    उसके एक बहुत नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी पर एक प्राणघातक हमला हुआ। आरोप उसी पर लगा। लेकिन वह हमला उसने नहीं, किसी और ने किया था। वह कहने लगा : ये मेरी मॉडस ऑपरेंडी है क्या? क्या मैं ऐसे घटिया हमले करता हूं।

    वह जिस तरह हथेली पर प्राण लिए फिरता था, उसकी क्या वज़ह थी? वह बोला : मैं नहीं बना। जैसे तुम्हें तुम्हारे पिता ने ऐसा बना दिया, वैसे ही मेरी मां ने मुझे ऐसा बना दिया। बचपन में जाड़ दर्द करती और मां शराब का फाहा दबा देती। मैं तो तभी से यह रस चूस रहा था। एक बार बड़े भाई को कक्षा में बिना कारण ही शिक्षिका ने पीट दिया। वह बिना कारण ही बार-बार ऐसा करती थी। मां तो पता चला तो भाई कहीं बाहर खेल रहा था और मैं हाथ लग गया। मां ने मेरी बाजू पकड़ी और बोली : देख भाई को मैडम ने बिना कारण मारा और तू देखता रहा! शर्म नहीं आती। कैसा राजपूत है रे। राजपूत क्या कभी अन्याय देखता है। और अगले दिन जाते ही मैंने मैडम के बाल खींच लिए, धूल डाल दी और बुरा हाल किया। अब जहां कहीं अन्याय होता है तो मुझे लगता है : मां कह रही है, कैसा राजपूत है रे तू। अन्याय देखता है?

    उसकी मां अनपढ़ थी, लेकिन हीरे गढ़ती थी। घर में जिस समय बेटी की शादी हुई तो वह आमंत्रित करने वालों के नाम और पते सिर्फ़ बोले जा रही थीं और लिखने वाला थके जा रहा था। पांच हजार से ज्यादा पते उन्हें कंठस्थ थे। इसलिए यह बेटा भी कभी किसी को चीज़ को किसी डायरी में नहीं लिखता था और जब मौका आता था तो सब अचानक याद आ जाता था।

    वह बहुत ही अलग अंदाज का बिंदास बंदा था और उसका जीवन किसी उपन्यास से कम में नहीं आ सकता। एक बार वह टाइटैनिक फिल्म दिखाने अपने कई दोस्तों और बच्चों को ले गया । रात को घर आने के बाद वाल्मीकि बस्ती में वाल्मीकि समाज के लोगों के बीच खूब ठुमके लगाए और गीत गाए। अंबेडकर जयंती पर लोग उसे सम्मान से बुलाते तो एससी ऑफिसर बहुत परेशान हाेते थे, क्योंकि वह उन्हें मंच से बहुत खरीखोटी सुनाता था। दलितों की बदहाली के लिए वह दलित अफसरों को बहुत खींचता था। लेकिन उनका साथ भी देता था।

    उसका गोरा रंग बहुत आभा बिखेरता था। एकदम चिकना और बिंदास। कॉलेजों के नए नए चुनाव हुए थे और वह गर्ल्स कॉलेज का चुनाव जीतने के बाद आई और पांव छूकर बोली : अंकल, आई लव यू! वह बोला : हट मरज्याणिए, तेरा बाप तो मेरा छोटा भाई है!

    दोस्तों और परिजनों की बेटियों के प्रति उसके मन में जितना सम्मान और गर्वभाव था, वह बहुत कम देखने में आता है। एक बार उसका एक कार्यकर्ता उसके पास पिटाई किए जाने की शिकायत लेकर आया तो उसने सामने वालों को बुलाया, जैसा कि उनके यहां दरबार लगा करता था। सामने वाले बुजुर्ग ने बताया कि यह मेरे बेटे का दोस्त है और इस नाते मेरी बेटी इसकी बहन हुई। तो इसने उसे गलत निगाह से क्यों देखा? उन्होंने कार्यकर्ता की तरफ देखा, तो वह बोला : अंकल, हम दोनों लव करते हैं! इतने में ही लड़का दूर फर्श पर जाकर गिरा। उसे उसने इतना झन्नाटेदार थप्पड़ लगाया और कहा : हरामजादे, दोस्त की बहन अपनी बहन होती है।

    वह बहुत छोटी उम्र में प्रधान बन गया था। एक बीडीओ ग्रामीण इलाके में महिलाओं के सेंटर चेक करने गया तो उसने किसी महिला से छेड़छाड़ कर ली। प्रधानजी के पास गांव वाले आए तो उन्होंने बीडीओ से पूछा : बीडीओ बोला, सर गलती हो गई। माफ कर दो। और पंचायत समिति पहुंचकर उन्होंने बीडीओ को कमरे में बंद किया और उसी की कुर्सी के हत्थे से जमकर सुताई  की और उसे पुलिस में लेकर गए कि इसकी एफआईआर दर्ज करो। इसे इसके प्रधान ने इसके दफ्तर में मारा!

    Tribhuvan

    पांच साल पहले वह बहुत बीमार थे। मैं मिलने गया तो मुझे मेरे मित्र गजराजसिंह जी ने एक दिलचस्प वाकया सुनाया। बोले : मैं 23 साल पहले की बात है। मैं यूथ हॉस्टल में बैठा था इनके पास। हम ठहाके लगा रहे थे। अचानक मुझे संदेश देने कोई और आया। मैंने सुना और मैं वापस आकर बैठा था तो मेरा चेहरा रुंआसा हो गया। साहब ने मुझे पूछा : अरे कौन क्या कह गया। अभी ठीक करता हूं। ऐसी राेनी सूरत क्यों बना ली? गजराज बोले : हुकुम बेटी हुई है मेरे। यह सुनकर वह बोले : अरे, खुश हो। लक्ष्मी आई है। और हां, भूल जा कि ये तेरी बेटी है। ये मेरी बेटी है। इसे मैं अपने घर ले जाऊंगा। बात आई-गई हो गई। 23 साल चले गए। एक दिन हुकुम अचानक घर पधारे और बोले : मेरी बेटी कहां है? घर ले जाना है। वह तब जयपुर के महारानी कॉलेज में फाइनल में ही थी। और हुकुम ने याद दिलाया कि देख तेरे साथ 23 साल पहले यूथ हॉस्टल में उस दिन वादा किया था कि यह मेरी बेटी है और इसे मैं अपने घर ले जाऊंगा। आैर आज समय आ गया है। आैर आज वह लक्ष्मी उस उसी के आंगन में है। बेटी का पिता तो भूल गया वह बात, लेकिन इस मरजीवड़े को यह सब याद रहा।

    ऐसा था वह इस युग का रणबांकुरा।

  • क्या इस माहौल के लिए सिर्फ़ संघवादी मानसिकता से जुड़े लोग ही दोषी हैं?

    क्या इस माहौल के लिए सिर्फ़ संघवादी मानसिकता से जुड़े लोग ही दोषी हैं?

    Tribhuvan[divider style=’right’]

    इन दिनों जो माहौल चल रहा है, उसे लेकर देश का एक बड़ा वर्ग आरएसएस और उससे जुड़े लोगों को दोषी मानता है। यह स्वर छुपा हुआ नहीं है। यह बहुत मुखर स्वर है और ख़ासकर वामपंथी झुकाव वाले प्रगतिशील खेमे के बुद्धजीवियों में। लेकिन क्या सिर्फ़ संघवादी मानसिकता के लोग ही इस वातावरण के लिए दोषी हैं?

    मैं इतिहास का एक सामान्य सा विद्यार्थी हूं। मैं जब इतिहास पढ़ता हूं तो देखता हूं कि गांधी-नेहरू-पटेल-सुभाष और बहुतेरे बुद्धिजीवी भविष्यवाणी करते हैं कि अंगरेज़ भारत से दफ़ा हो जाए तो हम अमन-चैन से रहेंगे और सांप्रदायिकता सदा के लिए विदा हो जाएगी। ब्रिटिश उपनिवेशवाद की उंगली थामकर सांप्रदायिकता भी भारत की धरती को छोड़ देगी। जातिवाद से तो हम निबट ही लेंगे। यह तो कोई समस्या ही नहीं।

    सच बात तो ये है कि अगर किसी खेत में खरपतवार बुरी तरह उग आया हो तो उसके लिए आप खरपतवार को कभी दोष नहीं दे सकते। अगर कोई ऐसा करेगा तो लोग उसे मूर्ख ही कहेंगे। खेत किसान के पास है और फ़सल को नष्ट करके अगर खरपतवार लहलहाने लगा है तो किसान दोषी है। वह इतने दिन तक कर क्या रहा था! देश में अगर सांप्रदायिक माहौल बना और यह विष बेल परवान चढ़ी तो अब तक मुख्यधारा की सबसे बड़ी और सत्तासीन पार्टी कांग्रेस और ताकतवर दल के रूप में रहे कम्युनिस्ट और समाजवादी कर क्या रहे थे? उन्होंने ऐसा माहौल बनने ही क्यों दिया? अगर आप सत्ता में हों और आप की मति नहीं मारी गई हो तो आप समाज और देश को ठीक से आगे ले जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या ऐसा किया गया?

    इतिहास के सफ़ेद पन्नों पर काले अक्षर नाच-नाच कर कह रहे हैं कि 1947 से पहले कांग्रेस ने दो बड़ी रणनीतिक भूलें की थीं। गांधी-नेहरू और पटेल इसके लिए जिम्मेदार थे। इन सबने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली स्वीकार की थी।

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]आज कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और समाजवादी दल और इनकी मानसिकता से जुड़े पत्रकार-लेखक और विचारक वंदेमातरम्, रामराज्य, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म और सनातन धर्म के प्रतीकों का नाम भर सुनकर नौ-नौ ताल उछलते हैं। लेकिन मैं बड़ी विनम्रता से जानना चाहता हूं कि वंदेमातरम्, रामराज्य, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म और सनातन धर्म के प्रतीकों को देश की राजनीतिक संस्कृति में सबसे पहले लाया कौन था? सत्यमेव जयते क्या आरएसएस लेकर अाया था? सुप्रीम कोर्ट का आदर्शन वाक्य यतोधर्मस्ततो जय: कौन लेकर आया था? उस समय विधि मंत्री तो महान् क्रांतिकारी सुधारक और संविधानवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। हिन्दू प्रतीक चिह्नों को भारतीय जीवन दर्शन बनाने वाले लोग तो खुद कांग्रेस के थे और दोष मंढ़ा जा रहा है अकेले आरएसएस पर। अरे भाई, आरएसएस ने तो ये चीज़ें कांग्रेस के कबाड़ खाने से निकालकर अपने खाली आलों में सजाई हैं, क्योंकि उनके पास अपना कुछ था नहीं। वे भारत को परम वैभव पर पहुचाने तो चाहते थे, लेकिन राह नहीं थी। राह कांग्रेस के पास भी नहीं थी। लेकिन वे हिन्दू धर्म के पुरातत्व युग में जाकर गीता की कसम खाने से लेकर न जाने कितनी चीज़ें उठाकर लाए। [/content_container]

    कांग्रेस एक तरफ तो सनातन संस्कृति से जुड़े लोगों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए इन प्रतीकों को गढ़ रही थी और दूसरी तरफ़ मुस्लिम अल्पसंख्यकवाद के प्रेत को पाल-पोस रही थी। अब आप दो-दो प्रेतों की सेवा करें और आप 70 साल तक बचे रहें तो और आपको क्या चाहिए? अरे आपको तो बहुत पहले नष्ट हो जाना चाहिए था।

    अभी आरक्षण पर लोग बहुत हो हल्ला-करते हैं, लेकिन सच तो ये है कि ब्रिटिश सरकार भारत में मुसलमानों की तरह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के लिए भी अलग निर्वाचन प्रणाली ला रही थी। लेकिन गांधीजी ने हिन्दू समाज की एकता के नाम पर ब्रिटिश योजना के खिलाफ अनशन किया और उन जातियों को आरक्षण का वादा करके लड़ाई जीत ली। आरएसएस आज इसी विचार को लेकर तो प्रचंड हो रहा है। तो यह मूल विचार है किसका? आरएसएस का कि कांग्रेस का? कि गांधीवादियों का?

    हमारा देश आज़ाद हुआ तो कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को अपनाने की बात तो की, लेकिन उसके मूल में हिन्दुत्ववादी पुरुत्थानवाद के बीज ही थे। अब यह बीज वटवृक्ष बना है तो ज़मीन किसी और ने छीन ली है। आज़ादी के बाद स्वतंत्रता दिवस के सरकारी समारोहों में शंखनाद क्या आरएसएस लेकर आया था? हिन्दू पूजा पद्धति से जुड़े मंत्र क्या हिन्दू महासभा पढ़ रही थी? भारत का नाम भारत कांग्रेस के लोगों ने रखा था तो क्या इसे संघ के लोगाें ने सुझाया था? भारत शब्द महाभारत से लिया गया था। क्या यह भारत माता से लिया गया शब्द नहीं था? और क्या यह कांग्रेस के नेताओं के मस्तिष्क की उपज नहीं था? https://bloodbornecertification.com/ generic provigil cost अगर यह उस दिन सही था तो आज भारत माता सांप्रदायिक कैसे हो गया और अगर आज सांप्रदायिक है तो उस दिन कांग्रेस कैसे धर्मनिरपेक्ष थी?

    मुंडकोपनिषद से लिया गया राष्ट्रीय घोष “सत्यमेव जयते” क्या नागपुर से कांग्रेस मुख्यालय को या संविधानसभा के प्रमुख को भेजा गया था? हिन्दू परंपरा का पवित्र पक्षी मोर देश का राष्ट्रीय पक्षी कैसे बना? भाजपा का प्रेम तो ऊंट और गधे के प्रति पिछले कुछ समय में दिखाई दिया है, जो कि पूरी तरह मुसलिम संस्कृति से जुड़े पशु हैं। हिन्दू परंपरा तो ऊंट और गधे का विकराल उपहास ही करती है।

    गाे-रक्षा का मुद्दा तो भाजपा पिछले कुछ वर्ष से लेकर आई है, लेकिन संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में इसे क्या आरएसएस ने शामिल करवाया था? यह काम कांग्रेस के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि ने ही किया था। गोवध पर पाबंदी लगाना भारतीय संविधान के उद्देश्यों में एक बताया गया है। इसमें बहुत सारे नीतिनिर्देशक तत्व हैं, लेकिन एक गाय ही बाकी उद्देश्यों को भूखी मरती चर गई।

    जैन एक अलग धर्म था। सिख एक अलग पंथ था। लेकिन इन्हें हिन्दू धर्म का ही अंग बताने वाला संविधान किसने रचा था? क्या संघ ने? संघ तो उसमें पावर में था ही नहीं। यह सब कांग्रेस और उसके छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नेता ही तो कर रहे थे।

    मुझे लगता है, कांग्रेसजनों, समाजवादियों, वामपंथियों, लोहियावादियों आदि आदि का यह कहना कि देश में सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा और संघ परिवार के लोग ही माहौल बिगाड़ रहे हैं, तर्कसंगत नहीं है। दरअसल धर्मांधता और सांप्रदायिकता वाले इस राजनीतिक खेल के नियम बनाए तो किसी और ने पहले अपने फायदे के लिए था, लेकिन समय आने पर इसे किसी और ने हथिया लिया। यह ऐसा ही है कि आप अपनी सियासी कमज़र्फ़ी के चलते पहले तो बंदूकों दूसरी की तरफ़ तान दें, लेकिन जैसे ही किसी दूसरे के हाथ में यह चीज़ आ जाए तो यह ग़लत हो जाए। यही मूलभूत चूक है।

    इतिहास की ग़लतियों को अगर आप आज खुले तौर पर स्वीकार नहीं करेंगे तो वही होगा, जो हो रहा है। कोई भी देश अतीत के मूल्यों को हृदय में तो धारण कर सकता है, लेकिन उन्हें पहन-ओढ़कर एक आधुनिक भावबोध वाला राष्ट़्र नहीं बनाया जा सकता।

    आज हमारे देश को हमारे महान नेताओं ने जिस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, वहां उनकी राजनीति सत्ता प्राप्ति तक सीमित है और देश और देश के लोग जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनमें से किसी एक का भी हल उनके पास नहीं है। वे एक दूसरे को ग़ाली देने, देशद्रोही और नाकाम घोषित करने के प्रपंच को कामयाब बनाकर चुनाव जीतने तक का वास्ता रखते हैं।

    इस देश का इंटेलिजेंटसिया इन नेताओं से भी अधिक धूर्त और मक्कार है। वह सत्ता के गलियारों का मज़ा जहां और जितनी आसानी से ले सकता है, वह उसके साथ रहता है। उसे इस देश के वास्तविक सरोकारों से कोई लेना देना नहीं हैं। उसके शौक महंगी शराबें, लग्जरी कारें और लैविश लाइफस्टाइल है। आम भारत किस गांव में, किसी गली पर, किस कोने में, किसी आदिवासी अंधेरे में सुबक रहा है, उसे कुछ पता नहीं है। वह अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी गर्व से अपना बाप कह सकता है और गर्व से किसी को भी देशद्रोही ठहरा सकता है।

    भारत के नए हालात बता रहे हैं कि हम एक सुइसाइड स्क्वैड के शिकंजे में हैं और हमें एक नागरिक के तौर पर सदा सजग और चैतन्य रहने की आवश्यकता है। जो आदमी सत्ता के लालच में खु़द ज़हरीली दिल्ली को अपनाने चला है, वह आपके लिए कोई शस्य श्यामला धरती का टुकड़ा ढूंढ़कर लाएगा, अगर आप ऐसा भ्रम पाले हैं तो इस पृथिवी पर आपसे मूर्ख कोई नहीं है।

    हमें अपने देश के हितों को देखना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति, किसी दल, किसी संगठन, किसी विचारधारा, किसी धर्म विशेष या किसी रंग विशेष के हितों और एजेंडे को। इनका शिकार होने का मतलब है आप देश के हितों को नहीं समझ पा रहे हैं। देश का हित इसमें है कि आप सदा सैनिक की तरह चौकन्ने रहें। ग़लत को ग़लत और सही को सही कहें।

    उपनिषद में कहा गया है कि विष को सोने के घड़े में ही रखा जाता है। इसलिए आप विष को भी समझें और घड़े को भी ठीक से देख लें। आज एक नहीं, कई घड़े हैं और उनमें भांति-भांति और इंटरनेशनल ब्रैंड के विष भरे हुए हैं। वे इतने सम्मोहक हैं कि हम स्वयं ही विषपान को उत्कंठित हो जाते हैं और अपने आपको रोक ही नहीं पाते।

    आप समझ गए न : सोने के घड़े में ज़हर!

    [divider style=’full’]

    Credits: Tribhuvan’s facebook

  • क्या हम वाक़ई स्त्री मर्यादा की संस्कृति की रक्षा करने वाले राष्ट्र हैं?

    क्या हम वाक़ई स्त्री मर्यादा की संस्कृति की रक्षा करने वाले राष्ट्र हैं?

     

    [thrive_headline_focus title=”त्रिभुवन” orientation=”right”]

    फ़तेहसागर की पाल पर वह सुबह-सुबह कहने लगा : देश भर में “पद्मावती” फिल्म को देखेे बिना ही भारी विरोध हो रहा है। यह भी समझ नहीं आता कि रत्नसिंह की पत्नी का नाम पद्मिनी था तो पद्मावती का विरोध क्यों हो रहा है? नाम ही बदल गया तो विरोध का आधार ही क्या रह जाता है? आख़िर आप अख़बारों में लिखते ही हैं कि “बदला हुआ नाम!”

    कहते हैं, 1303 में अलाउद्दीन ख़िलजी ने पद्मिनी को हासिल करने की कोशिश की थी। उसने चित्तौड़ के दुर्ग पर हमला किया था। महीनों किले की घेराबंदी किए रखी। समझ नहीं आता कि कोई शासक इतना सनकी हो सकता है कि वह किसी दूसरे की पत्नी को हासिल करने के लिए इतना कुछ क्यों करेगा? ऐसा होगा तो वह पागल ही हो जाएगा।

    उसका तर्क था : दरअसल यह घटना 714 साल पुरानी है। अलाउद्दीन छू भी न ले, इसलिए रानी पद्मिनी ने जौहर कर लिया था। उस समय तो कोई इतिहास भी नहीं लिखता था। किसी के पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं था। आप कल्पना कीजिए, आज जिस समय हिन्दुस्तान में एक नेता किसी दूसरे के बारे में कहता है कि मशीन में आलू इधर से डालो तो उधर से सोने का लड्‌डू निकलेगा, उसे ही तोड़मेरोड़ कर पेश किया जा सकता है और 90 प्रतिशत से अधिक सुशिक्षितों के दिमाग़ में एक बेबुनियाद झूठ बिठा दिया जाता है तो उस काल में तो लाेगों ने क्या ही किया होगा।

    उसने कहा : और जो देश 714 साल पहले की एक रानी के एक काल्पनिक नृत्य के एक काल्पनिक दृश्य पर इतना आंदाेलित है, वही देश चीन की सान्या सिटी में देश की एक छोरी मानुषी छिल्लर के मिस वर्ल्ड बनने पर बधाइयां दे रहा है। ग़ज़ब देश है। और प्रसन्नता से फूलकर कुप्पा हुआ जा रहा है। विचित्र लोग हैं। लेकिन साथ ही यह पद्मावती मामले में भंसाली को कोसते हुए अपने-अपने सेलफोन्स के वाट्सऐप पर मानुषी छिल्लर की आने वाली गरमागरम तसवीरों और विडियो क्लिपिंग्स पर इतना लहालोट होते हैं कि उसके स्त्री मर्यादा के पाखंड पर हंसी आ जाती है।

    उसने मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा : मुझे नहीं मालूम कि मिस वर्ल्ड का ख़िताब किसी लड़की के सिर पर इस तरह की अश्लील शारीरिक मुद्राएं दिखाने के बाद सिर पर आकर टिकता है। संजय लीला भंसाली तो फिर भी कुछ हदों में रहते हैं, लेकिन ब्रिटेन में छोटे पर्दे पर सेक्स बेचने वाला एरिक मॉरले तो रीता फारिया से लेकर मानुषी छिल्लर तक छह वर्जिन तरुणियों को सेक्स का तड़का लगाकर सौंदर्य के पुजारी बने बैठे कार्पोरेटिया पैजेंट्स को नहला चुका है। लेकिन यह सब हमें अच्छा लगता है। बहुत बधाई वाला मंगल काम। जैसे ही किसी तरुण के विश्व सुंदरी बनने की ख़बर आती है, चारों तरफ से बधाइयां बरसने लगती हैं। यहां हमारी सनातन संस्कृति वात्स्यायन के मूड और माइंड में आ बसती है।

    उसने फ़ोन का वाट्स ऐप चेक किया और कहने लगा : मैं देखता हूं, हमारे यहां कुछ लोग सारा दिन मुस्लिमों के खिलाफ वाट्स ऐप चलाते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि दुनिया की एक चौथाई यानी लगभग 23 प्रतिशत आबादी मुसलिम होने के बावजूद उनकी शायद ही कोई छोरी ऐसे किसी नग्न कार्यक्रम में शामिल होती हो। आैर एक हमारा देश है कि सारा दिन मर्यादा-मर्यादा करते हुए अपनी संस्कृति का ढोल पीट पीटकर थकथकाकर चूर हो सो जाता है। और अगली सुबह पता चलता है कि अपनी मर्यादा तो चीन में जाकर अपनी सेक्सुअल ब्यूटी का परचम कार्पोरेट पैजेंट्स के दरबार में फहरा आई है। और हम अचानक पिछला गाना भूलकर उसके गीत गाने लगते हैं।

    वह बोला : काल्पनिक पद्मावती के नृत्य पर जिनकी भृकुटियां तनी हुई हैं, उन्हें होश है कि नहीं!!! स्त्री गरिमा स्त्री गरिमा ही होती है। वह चाहे पद्मावती की हो या फूलनदेवी की।

    उसका कहना था : आखिर क्या कारण है कि हम पद्मिनी भी हमीं चाहते हैं और सनी लियोन को भी हमीं हिट करते हैं? हम किसी सामान्य दलित महिला पर इतना अत्याचार करते हैं कि वह फूलन देवी बन जाती है और हम आए दिन इतने अमानुषिक होते हैं कि हमारे देश में महिलाओं से बलात्कार के मुकदमे सारी हदें तोड़ जाते हैं। हम स्त्रियों की मर्यादा के इतने रक्षक हैं कि दहेज, भ्रूण हत्या आैर घरेलू हिंसा के लिए विशेष कानून बनाए जाते हैं, क्योंकि सामान्य कानूनों से हल ही नहीं निकलता।

    वह मुझे बहुत नाराज़ लग रहा था। कहने लगा : हम सुबह-शाम चीन-चीन-चीन चिल्लाते हैं! मत खरीदो चीन का सामान। बहिष्कार चीनी सामान। और पता लगा कि हमारी मर्यादाओं की नथ उतरवाई तो एरिक मॉर्ले का प्रेत चीन में ही करता है और हम प्रसन्न होते हैं कि हमें 17 साल बाद यह मौक़ा मिला है!

    अंतत: वह दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गया और बोला : मैं विनम्रता से जानना चाहता हूं कि आज मेरे भारत का असली सच क्या है? पद्मिनी के गौरव पर मर मिटने वाला या चीन में मर्यादा की नथ उतरवाई करवाने वाला?

    हम जा कहां रहे हैं? -बुदबुदाते हुए वह चला गया!

    मैं अवाक् था।

    [divider style=’full’]

    Credits: Tribhuvan’s facebook.

  • सभ्यता अगर ताजमहल है तो औरंगजे़ब भी ठीक वही सोचता था, जो योगी आदित्यनाथ साेचते हैं

    सभ्यता अगर ताजमहल है तो औरंगजे़ब भी ठीक वही सोचता था, जो योगी आदित्यनाथ साेचते हैं

    Tribhuvan[divider style=’full’]

    आप या मैं जिस समय अपने देश, अपने धर्म, अपने राष्ट्र और अपनी दुनिया के अतीत में झांकते हैं और उसके अंधेरे से ही प्रेम करते हैं तो यह उम्मीद करना बेकार है कि आप या मैं वर्तमान के वातायन से झरती आलोक रश्मियों को अपनी मुटि्ठयों में भरना चाहेंगे। यह आपकी या मेरी मानसिकता है। लेकिन सचमुच ऐसा हो रहा है और यह भयानक बात है। यह सचमुच डर जाने जैसी बात है। मेरे लिए भी। आपके लिए भी।

    आप अपने अतीत में जाकर किसी बौधायन, किसी नागार्जुन, किसी आर्यभट, किसी वाग्भट, किसी ब्रह्मगुप्त, किसी सुश्रुत, किसी चरक, किसी भास्कराचार्य, किसी वराहमिहिर या किसी कौमारभृत्य जीवक की राह पर चलेंगे तो वर्तमान में आपके समस्त अंधेरे छंट जाएंगे। मेरे भी। लेकिन अगर आप अपने अतीत और वर्तमान का मूल्यांकन किसी आतंकवादी सभ्यता और किसी भयावनी विचारधारा से करके अपने भविष्य के सपने का ब्लूप्रिंट तैयार करेंगे तो इस पर दु:स्वप्न का महल खड़ा होगा और उस वीभत्स निर्माण से घृणा और जुगुप्सा की गंदी बास आएगी। मुझे भी। आपको भी।

    भारतीय दर्शन में उस अवस्था को मानसिक विचलन और पश्चिमी दर्शन में इसे केटेगरी ऑव मिस्टेक कहता है, जब हम अच्छे और बुरे, सफेद और काले, पानी और आग, आकाश और धरती और चांदनी और तपती धूप का भेद ही खोने लगते हैं। हमें न श्रेणियों का ज्ञान रहता है और न ही मर्यादाओं की बोध।

    मैं भारत-पाकिस्तान सीमा के पास एक बहुत ही छोटे से गांव का रहने वाला हूं। मेरे गांव में स्कूल भी नहीं था। एक परिवारों के अलावा किसी में कोई साक्षर तक न था। मेरा अपना परिवार भी पशुपालक परिवार था। पिता घोड़े पालने का शौक रखते थे और मां घोड़े तो घोड़े, उन्हें दूध पिलाने के लिए भैंसे तक रखती थी। मेरी शिक्षा भी कोई बहुत अच्छी नहीं हुई। अब भी मेरे दिमाग में अज्ञान कूट-कूट कर भरा है। लेकिन जब देखता हूं कि उच्च शिक्षित परिवारों से आए और सुसंस्कृत परंपरा में पले-बढ़े लोग और मुझसे कहीं अकल्पनीय श्रेष्ठ संस्थाओं में शिक्षित हुए युवक और प्रौढ़ कैसी-कैसी बातें करते हैं और कैसी-कैसी सोच रखते हैं तो मन वितृष्णा से भर उठता है। बहुत बार सोचता हूं कि कोई ऐसा सोच भी कैसे सकता है, जिसे वे बड़े गर्व से कहते और लिखते हैं। यह देख आैर सोचकर मैं बेहद उद्वेलित हो जाता हूं।

    कभी कोई सरकारी फार्म भरना ही नहीं आया और अखबार बांटने का काम ढूंढ़ने के चक्कर में दुर्घटनावश पत्रकारिता की चपेट में आने से आज तक सड़क पर चलने वाले और जमीन पर पैदल चलने वालों तक के कड़वाहट भरे अनुभवों से आए दिन मुठभेड़ होती रहती है तो यह मुझ मूढ़़ के दिमाग में भी एक चरखा सा चला देती है।

    दुर्भाग्य से कुछ पढ़ने-पढ़ाने की भी असभ्यता पड़ गई और किसी तरह के विचार की दासता या किसी विचार का भक्त या अनुयायी बनने के प्रति भी विमोह सा रहा है। इतना जरूर है कि दिमाग की सब खिड़कियां खुली रहें और विचार की जो भी ताज़ा हवा आए तो वह हमारे दिलोदिमाग को भी जरा भिगो दे।

    राजनीति, धर्म, संस्कृति और विज्ञान के इतिहास को पढ़ते हुए मुझे अपने देश के अतीत में बहुत रोशनी और बहुत सा अंधेरा मिलता है। कितने ही दीपस्तंभ और आलोक निर्झर भारतीय इतिहास में हैं। कितने ही विकराल अंधेरे और अन्याय अट्‌टहास कर रहे हैं। किसी सभ्यता का निर्माण किसी असभ्यता के बिना नहीं होता। आप सभ्य तभी कहला सकते हैं, जब आपके सामने कोई बड़ा असभ्य हो। आप तभी रौशन होंगे, जब कोई अंधेरे से पुता खड़ा होगा। ऐसे समझ ही नहीं आता। लेकिन अगर आप किसी और के धूल-धक्कड़ से परेशान हैं तो इसका मतलब यह कतई नहीं होता कि आप कीचड़ में लोटने लगें। कोई अगर पागल होकर अपने भाई-बंधुओं के नरसंहार का महाभारत रच रहा है तो आप क्यों उससे प्रभावित होते हैं। अाप अपनी शुचिता की पंचवटी में किसी रामायण की रचना कीजिए।

    इतिहास इतिहास होता है। न तो वह वर्तमान हो सकता और न ही भविष्य। इतिहास काला हो सकता है और आप भविष्य को सफेद बना सकते हैं। इतिहास बहुत चितकबरा हो सकता है और आप भविष्य को बहुत काला कर सकते हैं। लेकिन काल के साथ आपने दिक् या स्पेस का ध्यान न रखा तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। इतिहास में जितनी ऐतिहासिक गड़बड़ियां हुई हैं, वे काल और दिक् यानी स्पेस का बोध ठीक से न रख पाने के कारण ही हुई हैं। इतिहास में मतभेदों ने कई बार भयानक युद्धों का रूप भी लिया है। आप स्वयं सोचिए, एक ही परिवार के सदस्य कौरव और पांडव अगर अपने मतभेदों को आपस में बैठकर आपसी चर्चा और बहस से सुलझा लेते तो क्या महाभारत होता? कौरव और पांडव वास्तव में बहुत बुद्धिमान और दूरदर्शी परिवार के सदस्य थे और उन्होंने दुनिया में सबसे पहले युद्धविहीन सत्ता हस्तांतरण का तरीका ईजाद किया था। इसे जुए का नाम देकर बदनाम कर दिया गया, लेकिन यह एक बौद्धिक खेल था और आप एक खेल खेलकर अगर सत्ता का हस्तांतरण करते हैं तो यह वाकई उस युग में एक अकल्पनीय बात रही होगी।

    अभी जो लोग इतिहास के सच से डर रहे हैं, वे दरअसल अपने भीतर की कायरता से डरे हुए लोग हैं। आपके भीतर अगर कोई ग्रंथि किसी रोग से ग्रस्त है तो आपको उसकी सही जांच और परख आनी ही चाहिए। क्रिकेट में आप आए दिन जीतते या हारते हैं। लेकिन हारते हैं तो निराशा जरूर होती है, लेकिन आप तब या तो अपनी टीम के खिलाड़ियों को नया प्रशिक्षण देते हैं और उनकी गलतियों को दूर करते हैं या फिर टीम में नए चेहरों को जगह देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि आप हार को स्वीकार ही न करें। अगर आप ऐसा व्यवहार करते हैं तो यह ऐसा लगता है, मानो आप किसी बहुत छोटी क्लास के बच्चे हैं।

    यह मामला सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा है कि आप मुसलिम काल को अंधकार युग मानते हैं। लेकिन मेरा खयाल है, वह संक्रांति काल था, जो जरा लंबा चला। अंधकार युग तो वह था जब हमारी कमज़ोरियों का फायदा उठाकर विदेशी आक्रमणकारी सफल हुए। हार जाने के बाद कोई अंधकार नहीं होता। वहां तो रोशनी का सूर्य पल रहा होता है, लेकिन जब हम हारते हैं तो हार, पराजय या पराभव की घटना से पहले अंधेरा रहा होता है, जो अपनी शक्ति का पूरा बोध नहीं होने देता और इनसान अपने पागलपन में हार बैठता है। लेकिन यह हार कोई हार नहीं है। हारा हुआ दौर और निराशा का दौर वह समय है जब आप अतीत के किसी कालखंड में झांकने जाकर उसे सुधारने की कोशिश करते हैं। यह संभव नहीं है। यह बचपना है। ऐसा ही जैसे बच्चा अपनी कॉपी में चांद बनाकर कल्पना करता है कि चांद उसके पास आ गया। वह खिलखिलाता है। वह प्रसन्न होता है। आप इस प्रसन्न बच्चे जैसे प्रसन्न हैं।

    अभी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताजमहल को अपने राज्य की पर्यटन सूची में नहीं रखा है। ताजमहल का निर्माण शाहजहां ने करवाया था और शाहजहां का बेटा औरंगज़ेब पसंद नहीं करता था कि उसका पिता यह ताजमहल बनवाए। उसने बहुत विरोध किया। आैरंगजेब जिस समय 14 साल का था तो ताजमहल उसकी मां की स्मृति में उसके पिता ने बनवाना शुरू किया था और यह खत्म तब हुआ जब औरंगज़ेब 35 साल का हो गया था। औरंगज़ेब एक धार्मिक कट्टर लेकिन ईमानदार आदमी था। जैसा कि अपनी धार्मिक कट़्टरता के लिए कुख्यात लोग अक्सर ईमानदार हुआ करते हैं। औरंगजेब देख रहा था कि उसकी जवानी बीतती जा रही है और उसके सनकी पिता की आदत के कारण सरकारी धन संपदा ताजमहल में लगने से रीतती जा रही है। शाहजहां ने सरकारी खजाने से तीन करोड़ 20 लाख रुपए उस समय लगा दिए थे। औरंगजे़ब को बहुत गुस्सा आया और जब उसका बस चला तो उसने ताज़महल पर पूरा धन अपव्यय करने के कारण अपने सनकी ओर फजूलखर्च पिता को सत्ताच्युत कर कैद में डाल दिया। लेकिन पिछले पौने चार साै साल में किसी भी शासक की आत्मा में औरंगज़ेब की आत्मा नहीं जगी, उसने सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ सिंह के हृदय को ही अपने लिए सही ठिकाना पाया।

    लेकिन यह बहुत ही असहिष्णुता भरा कदम है कि आप इतिहास से पीठ फेरबकर बैठ जाएं। किसी शासनकाल विशेष की अच्छी चीजों को बुरा बताएं और किसी शासनकाल की खराब चीजों को अच्छा प्रस्तुत करें। यह अपने वर्तमान के बोध और भविष्य के निर्माण का सवाल भी है। क्या आप काल्पनिक ईंटों पर महल बना सकते हैं? लेकिन खराब खंगर ईंटों पर तो बहुत सुंदर और मजबूत महल खड़ा हो सकता है। आप भारतीय संगीत का इतिहास खंगालिए। आप भारतीय चित्रकला को देखिए। आप भारतीय कला और साहित्य को बांचिए। आप भारतीय दर्शन और इतिहास का अवलोकन कीजिए। क्या कृष्ण की प्रशंसा में किसी हिन्दू ने रसखान से अधिक सुंदर और सम्मोहक सवैए लिखे हैं? क्या आपके घर रखी रामायण किसी मुस्लिम के हाथों कुरआन के लिए तैयार की गई रहल के बिना किसी और चीज़ पर ठीक से रखी जा सकती है? क्या बाबर के साथ कोई मुसलिम फाैज आई थी? नहीं।

    आप विद्वानों, कलाकारों, चित्रकारों, मूर्तिकारों, शिल्पकारों और स्थापत्यकलावानों को हिन्दू या मुसलमान मत मानिए। उनका धर्म तो कला है। संगीत है। कोई मुसलमान अगर संगीतज्ञ या चित्रकार हो यह जरूरी नहीं, लेकिन किसी संगीतज्ञ का ऐसा होना जरूरी है। ऐसा ही हिन्दू के साथ है। ऐसा ही सिख के साथ और जैन या बौद्ध के साथ। यह मुसलमान या हिन्दू की उपलब्धि नहीं, यह समृद्ध भारतीयता है। आज हम दोनों तरफ और पूरी दुनिया में धर्म (कहना तो चाहिए अधर्म) के नाम पर जो लड़ाकापन देख रहे हैं, उसमें कलाएं विकसित करने का माद्दा ही नहीं है। उसमें विध्वंस का दम तो है, सृजन की प्रतिभा नहीं है। सृजन विध्वंसक मानसिकता नहीं कर सकती। सृजन सृजनशील ही कर सकता है। धर्म सच में तो मनुष्य को किसी रासायनिक यौगिक की तरह संवेदनशील और करुणा से आप्लावित करता है। वह विध्वंसक नहीं बनाता। वह पर्वत, पहाड़, नदी, जल, नभ, वायु और अग्नि की पवित्रता की बात करता है। अगर किसी धर्म में सुसांस्कृतिक संवेदनाएं और करुणा नहीं है तो वह सभ्यता नहीं कहलाता। वह असभ्य ही बना रहता है।

    अगर आप चारों वेदों को देखें, छहों शास्त्रों को पढ़ें और उपनिषदों का अध्ययन करें, जो कि भारतीय सभ्यता की पुख्ता आधारशिलाएं हैं, तो आप पाएंगे कि वहां झूठ और अज्ञान को सबसे बड़ा खतरा बताया गया है और हर स्तर पर प्रयास किया गया है कि मनुष्य अविद्या का शिकार न हो। उपनिषदों का ज्ञान विलक्षण है। वह तर्क नहीं, निश्छलता उपजाता है। वह पवित्रता लाता है। आप ब्रह्मगुप्त या शंकराचार्य के दर्शन को पढ़ेंगे तो उनका अदभुत ज्ञान कट्‌टरतावादियों को असभ्य ही ठहराता है। भास, शूद्रक और कालिदास का साहित्यिक वैभव किसी से छुपा है क्या? अगर किसी ने इनमें से एक को भी ठीक से हृदयंगम किया हो तो वह किसी अन्य धर्मावलंबी के प्रति असहिष्णु और प्रतिहिंसक हो ही नहीं सकता।

    क्या कोई सोच सकता है कि बीज गणित की अगुवाई करने वाला भारत घृणा के गणित का अभ्यास करेगा? युुक्लिद से भी पहले पाइथोगोरस थियोरम और शुल्वसूत्र का सृजन करने वाले बौधायन ने या कात्यायन ने क्या कभी सोचा होगा कि ज्यामिति की पहली आधारशिला रखने वाले भारत में संकीर्णता की त्रिज्या तान दी जाएगी?

    क्या चरक और सुश्रुत ने कभी कल्पना की होगी कि भारतीय आयुर्वेद को पश्चिमी दबाव में दफन करने वाले समस्त फैसले उनके नाम लेने वाले लोग ही करेंगे और प्रवाल पिष्टि सहित कितने ही समुद्रीय तत्वों पर रोग लगा देंगे?

    क्या ढाई हजार साल पहले कौमारभृत्य जीवक को स्वप्न् में भी यह खयाल आया होगा कि जिस धरती पर उन्हें एक भी पौधा अनुपयोगी नहीं मिला, उस देश में एक दिन सरकारें वनस्पतियों को तहस-नहस करने की परियोजनाओं को विकास का नाम देंगी? यह वही जीवक थे, जो कहते थे कि साधु अगर व्यापार करता है तो वह पूरे राष्ट्र को नरकगामी बनाता है।

    यह वही जीवक थे, जिन्होंने तक्षशिला के योजन भर में कई दिन तक गुरु के आदेश से ऐसे पौधे की तलाश की, जो किसी ओषधि में काम न आता हो और अंतत: विफल साबित हुए।

    यह वही जीवक था, जिसने सम्राट बिंबिसार के गुदाद्वार के पास नासूर का इलाज किया था और उन्हें रानियों के उपहास से मुक्ति दिलाई थी। यह वही जीवक था, जिसने बिंबिसार के इलाज की घोषणा की तो एक ब्राह्मण मित्र ने उसकी बांह पकड़ कर कहा कि क्या वह एक निकृष्ट नास्तिक बौद्ध का इलाज करेगा तो पलटकर जीवक बोले : इस विश्व में कौन नास्तिक? सभी तो ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर की किसी संतान को जो विधर्मी समझता है, वह स्वयं निकृष्ट और विधर्मी है! ब्राह्मणों के इसी कट्‌टर आचरण के कारण जीवक बाद में बौद्ध हो गए।

    क्या कभी पाई का सबसे एक्युरेट मान बताने वाले आर्यभट ने कभी सोचा होगा कि उनके देश में लोग विवेकवाद के बाद कट्टरतावाद की भेंट चढ़ जाएंगे और ज्योतिर्विज्ञान की पूजा करने के बजाय ज्योतिष के अंधकार में डूब जाएंगे? क्या दुनिया को खगोलविद्या का ककहरा सिखाने वाले भारत के किसी ऋषि ने कल्पना की होगी कि यहां के लोग अपरिग्रह को त्यागकर धन और वैभव के बजबजाते अमानुषिक ढेर लगाएंगे और शासक उनकी उंगलियों पर नाचेंगे?

    शतरंज जैसे खेल का आविष्कारक भारत कभी इस खेल को भूल जाएगा और एक विदेशी खेल के लिए मर मिटेगा और उस खेल के खिलाड़ियों को भगवान घोषित कर देगा? काम शिक्षा का अाविष्कारक और कामसूत्र का प्रणेता भारत एक दिन काम शब्द से ही घृणा करने लगेगा और कामुकता के बजबजाते कीड़ों को साधुता का बाना पहना देगा!

    क्या कभी भारतीय मनीषियों ने यह कल्पना की होगी कि मूर्ख, हुड़दंगी, अंधभक्त और धर्म के नाम पर कट्‌टरता फैलाने वाले इतने ताकतवर हो जाएंगे कि वे सनातन धर्म की बुराइयों पर वार करने वाले दयानंद सरस्वती से पूछेंगे कि क्यों तूने इस्लाम पर तो सिर्फ चार पन्ने लिखे और हिन्दू धर्म पर पूरा सत्यार्थप्रकाश ठोक मारा और काशी में पाखंड खंडिनी भी गाड़ दी! क्यों न तुझे दूध में शीशा पिघलाकर दे दिया जाए?

    क्या हिंट्स फॉर सेल्फ कल्चर जैसा ग्रंथ लिखने वाले क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने कभी सपने में भी सोचा होगा कि उनके महान देश के महान वैभव को खत्म करने पर आमादा और बौद्धिक रूप से कंगाल लोग दुनिया की इस श्रेष्ठतम धरती को बेहूदा विचारों और जंगलीपन से भर आप्लावित कर देने के लिए एक दिन गली-गली डिंडिंम घोष करेंगे? और अगर उनसे किसी ने तर्क करने का प्रयास किया तो वे उसे देशद्रोही कहकर गाली देंगे?

    कोई चाहे कुछ करे, लेकिन चरैवेति-चरैवेति का घोष करने वाले इस देश में विवेकशीलता और परिवर्तनशीलता सदैव जीवित और जीवंत रहेगी। जैसा कि दयानंद सरस्वती ने कहा था : मनुष्य स्थावर वृक्ष नहीं, वह जंगम प्राणी है। चलना मनुष्य का धर्म है। जिसने इस धर्म को छोड़ दिया, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। समस्त देवता और राक्षस इसी धरती पर हैं। जो चलना छोड़ देते हैं, घृणाओं में जलते हैं। जो चलते रहते हैं, करुणा के सागर बने रहते हैं। मुनष्यता वहीं निवास करती है।

    Credits: Facebook posts of Tribhuvan

  • कोरी राष्ट्रपति, घांची प्रधानमंत्री…हिन्दुत्ववादियों के सामाजिक न्याय का नया मॉडल और कांग्रेसी-कम्युनिस्टों-समाजवादियों से लेकर ब्राह्मणवादियों तक के समवेत रुदन का समय

    रामनाथ कोविंद देश के राष्ट्रपति हो गए हैं। वे अनुसूचित जाति से होने के कारण राष्ट्रपति बनाए गए हैं। जिस देश में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सर्वोच्च जातियां मानी जाती हों और इन जातियों के बड़ी तादाद में लोगों के भीतर जातिगत श्रेष्ठता का झूठा और अमानवीय अहंकार भरा हो, उस देश में यह एक अच्छी बात है। और सबसे अच्छी बात ये है कि जिस दल और जिस विचारधारा को आज तक अपनी नामसझी के कारण इन ऊंची जातियों के लोग समर्थन देते रहे हैैं, उनकी आंखें खुलने का भी यह समय है।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राजनीति और समाज के भीतर पैदा हुए छोटे-छोटे अदृश्य आंदोलनों ने कुछ एेसे मूल्य और मानदंड स्थापित कर दिए हैं, जो किसी भी धार्मिक और राजनीतिक कट्‌टरता को निचोड़ कर रख देते हैं।

    नरेंद्र मोदी को मैं वैचारिक रूप से पहले ही दिन से खारिज करता रहा हूं और वे मेरी पसंद के प्रधानमंत्री नहीं हैं। लेकिन मुझे मेरे देश का लोकतंत्र और लोकतांत्रिक समाज प्रिय है, इसलिए अच्छा लगता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद मोदी भारी जन समर्थन हासिल कर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले पहले व्यक्ति हैं। पंडित नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कई प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इनमें से हरेक के साथ सहज और नैसर्गिक प्रधानमंत्रित्व का गुण नहीं जुड़ा था। शास्त्री बहुत कमज़ोर प्रधानमंत्री थे और बहुत मज़बूरी में बनाए गए थे। इंदिरा गांधी नेहरू की बेटी होने के कारण प्रधानमंत्री बनी थीं। माेरारजी जनता पार्टी की एक लाचार और अशक्त अभिव्यक्ति थे। वीपी सिंह बहुत शातिराना ढंग से प्रधानमंत्री बने। उन्होंने कांग्रेस की समस्त धूर्तताओं को मात दे दी थी। जिस सफाई से वे पूरे चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री नहीं बनने का दावा करते रहे और स्वयं को फ़कीर बताते रहे, उसी सफाई से वे प्रधानमंत्री भी बन गए और चंद्रशेखर इसके विरोध में उतरे। वाजपेयी बहुत शालीन और बड़ी अाबादी की पसंद थे, लेकिन उनके साथ लोकबल नहीं था। यह लोक बल अगर कोई बटोर पाया तो वह नरेंद्र मोदी हैं। यह अलग बात है कि शासन करने की क़ाबिलियत और समाज या देश का सकारात्मक ट्रांस्फोरमेशन कम ही लोगों के बूते की बात होती है। यह तत्व हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री में नहीं दिखता है।

    मैं उस समय बड़ी प्रसन्नता का अनुभव करता हूं, जब ब्राह्मणवादी अहंकार के साथ जीने वाले मेरे मित्र अपने साथ के लोगों को तेली-तमोली और न जाने क्या-क्या कहकर गरियाते हैं और उनके घरों में जाने तक को पसंद नहीं करते; लेकिन अपनी फेसबुक पर सारा दिन घांची जाति के नरेंद्र मोदी की तसवीर लगाकर गर्व का अनुभव करते हैं। यही वह शिफ्ट है, जो भारतीय समाज में होना चाहिए था। यह शिफ्ट आना तो चाहिए था गतिशील और प्रगतिशील ताकतों के कारण, लेकिन यह बदलाव आ रहा है एक कूढ़मगज, दकियानूसी और प्रतिगामी सोच को लेकर चलने वाली राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक विचारधारा के कारण। आपको हीरा तो मिल रहा है, लेकिन वह कीचड़ में लिपटा हुआ है। दरअसल समाज को बदलाव चाहिए, बदलाव ला कौन ला रहा है, उसका चेहरा तलाशने की ज़रूरत नहीं है।

    भाजपा ने पृथकतावादी पीडीपी से समझौता किया है। उसके साथ सरकार चलाई है। यह ऐसी ही बात है, जैसे कोई पहले तो कुलवधू होने का दावा करे और फिर अचानक से कॉलगर्ल हो जाए। लेकिन नख़रे वही कुलवधू के! जो पार्टी चीन से अपनी मातृभूमि का एक-एक इंच वापस नहीं लेने तक संसद में प्रवेश नहीं करने के संकल्प ले और जब स्वयं के पास शासन आए और चीन आपके विमान को भी मार गए और धौंस भी दिखाए तब भी आप उसके राष्ट्रपति के लिए लाल कालीन बिछाएं, अपने परम पुरुष की प्रतिमाएं उसके यहां से बनवाएं और वह बुलाए तो आप राष्ट्रीय स्वाभिमान पर द्विराष्ट्रीय रिश्तों की परवाह करने लगें तो इससे अच्छा बदलाव और क्या होगा! लेकिन ज्यादा अच्छा ताे तब है जब आप देश की सड़कों पर विनम्र दिखाई दें।

    क्या यह हिन्दूवादी और ब्राह्मणवादी पार्टी के भीतर कम कमाल की बात है कि जो लोग अपने चौके-चूल्हे पर जिस जाति के नादान बच्चे तक के चढ़ जाने पर गंगाजल से स्नान करते हैं और गंगाजल से चौका-चूल्हा धोते हैं, उस सड़ी हुई सोच और अमानवीय विचारधारा के लोगों को अपने हृदय में बसाना पड़ता है। मुझे लगता है, यह बदलाव है और बड़ा बदलाव है, जिसे सामाजिक न्याय की राजनीति के दबाव से आना पड़ा है। आप यकीन मानिए, यह बदलाव अभी और विस्तार लेगा और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को खत्म करके एक ऐसा हिन्दुत्व खड़ा करेगा, जिसमें 90 प्रतिशत पिछड़ी और दलित जातियों की भूमिका है। संघ आजकल इसी सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रहा है और इसीलिए जल्द से जल्द वह अपने प्रांतों की कमान इस वर्ग के लोगों को सौंप रहा है। यह अनचीन्हा आरक्षण है, जिसकी संघ के लोगों ने भी कभी कल्पना नहीं की होगी।

    यह इसलिए भी बड़ा बदलाव है, क्योंकि भारतीय राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के दोनों पद आज ऐसी जातियों के दो लोगों के पास हैं, जो आम समाज में बेहद अप्रतिष्ठित और दीनहीन बनाकर रख दी गई हैं। अगर जातिगत प्रतीकों से सामाजिक बदलाव आता है तो भाजपा सामाजिक बदलाव का यह संदेश देने में सफल रही है। कांग्रेस के पास दलित मीराकुमार पहले भी थी और ज़हीन-शहीन प्रतिभावान गोपाल गांधी भी कब से थे, लेकिन कांग्रेस को इनकी याद कभी नहीं आई। उसने विवशता में ये नाम ऐसे समय चुने, जब हार तय थी।

    दरअसल जाति आधारित सामाजिक न्याय का जो सिद्धांत कांग्रेसी, कम्युनिस्ट और समाजवादी लेकर आए थे, वह एकदम झूठा साबित हुआ और यह थियरी लोगों को न्याय नहीं दिला पाई। न लोकतंत्र बलशाली हुआ और न बंधुता ही कायम हुई। समता और स्वतंत्रता का तो प्रश्न ही नहीं है, इस मोहिनी सिद्धांत ने गरीब को गरीब नहीं समझा और उसकी जाति पूछना जरूरी समझा।

    हमारे देश में जिस समय जातिवादी और धर्मांधतावादी ताकतें मज़बूत हो रही हैं, उस समय अगर सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद पर कोई तीखा प्रहार हो रहा है तो वह इसी हिन्दुत्व की राजनीति से होता दिख रहा है।

    हिन्दुत्ववाद के ध्वजवाहकों को तो नहीं, लेकिन उसके चुनीदा रणनीतिकारों को अब यह समझ आ गया है कि वे अपना धार्मिक राज्य ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के बलबूते पर नहीं कर सकते। इसलिए इन जातियों को नींव में दबाकर अब दलित-पिछड़ा वर्ग, जिसकी भारतीय समाज में तादाद 90 प्रतिशत है, उन्हें अग्रणी रखकर ही हिन्दू भारत बनाना संभव है। लेकिन आप सदियों पुरानी इस कहावत को याद रखें कि लोहा लाेहे काे काटता है और ज़हर ही ज़हर को मारता है। इसलिए जो लोग ज़हर उलीच रहे हैं, उसे कंठ में धारण करने वाला कोई शिव तो हमारे आसपास नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह विष जातिवादी और ब्राह्मणवादी सोच के अंगों को तो नीला करके खत्म कर ही देगा।

    कोरी जाति के रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति और घांची जाति के नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने का साफ़ सा अर्थ यह है कि हिन्दुत्ववादी राजनीति के रणनीतिकारों ने भारी शिफ्ट किया है और अब वे जिस राह पर चल पड़े हैं, उसमें कम्युनिस्टों, समाजवादियों और कांग्रेसी लोगों के लिए संभावनाएं बहुत क्षीण पड़ गई हैं। वे अगर कोई क्रांतिकारी फार्मूला या रणनीति लेकर आगे नहीं बढ़ पाए तो इस राजनीतिक युद्ध में उनका पराभव सौ प्रतिशत तय है। राजनीतिक लोगों को यह समझ आ चुका है, लेकिन उनके आसपास मंडरा रहे मीडियाई और विश्वविद्यालयीय बुद्धिजीविता के भ्रम को पाले बैठे लोगों को यह समझ नहीं आया है और वे अपने आकाओं से ज़्यादा हल्ला करते हैं। गवाह चुस्त हैं और मुद्दई सुस्त हैं।

    और आप जल्द ही आने वाले चुनावों में बहुत स्पष्टता से देखेंगे कि हिन्दुत्ववादी राजनीति के रणनीतिकार आने वाले समय में ब्राह्मणवाद के अवशेषों को किस तरह धू-धू कर जलाते हैं। जो लोग अब तक आरक्षण की सरकारी नीतियों से परेशान थे और सुबह-शाम उस नीति को गरियाकर भाजपा-आरएसएस का दामन थाम रहे थे, उनके रुदन के दिन बहुत निकट है। हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद भले अभी मुस्लिमों को डरा रहा हो, लेकिन आप देखेंगे कि संघ और भाजपा के ये कोविंद जैसे सजावटी दीए कुछ दिन बाद ब्राह्मणवादियों और सवर्णवादियों को भी डराने लगेंगे; क्योंकि इनके साथ ही अब इन पदों से सदा के लिए कथित ऊंची जातियों के नेताओं की छुट्टी होने वाली है।

    यह अलग बात है कि ट्रांस्नेशनलिज़्म, कॉमन मार्केटिज़्म, कांपीटीटिव डेमाक्रेटिक इकोनॉमी और नई टेक्नाेलॉजिकल इंस्पीरेशंस के दबाव किसी भी देश में कट्टरतावादियों, रूढिवादियों और प्रतिगामी शक्तियों को कामयाब नहीं होने देंगे। एक तरह से एक बार अंधेरा गहराएगा और उसमें से एक नई दुनिया का साफ़ और सुंदर चेहरा दिखाई देगा।

  • हत्यारा किसान, दयालु चोर और क्रांतिकारी शासक!

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    चंपूद्वीप के गर्तखंड में एक किसान के खेत में कुछ लोग घुस आए। वे गन्ने तोड़ने लगे। सरसों उजाड़ने लगे और गाजरें नष्ट करने लगे। किसान ने ऐतराज किया तो वे नहीं माने। किसान ने आव देखा न ताव, हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मारो-मारो-चोरों को मारो।

    किसान की आवाज़ सुनकर आसपास के किसान भाग-भागकर आने लगे। वे भी शोर मचाने लगे : चोर-चोर।

    चोर डरकर भागने लगे। खेत में काम कर रहे एक मजदूर ने एक भागते चोर को पकड़ने की कोशिश की। चोर ने मजदूर को गोली मार दी। मजदूर मर गया। पूरे इलाके में हल्ला हो गया।

    घटना होते ही पुलिस आई। दो-चार दिन जांच की और आख़िर किसान को असली हत्यारा बताकर पकड़ ले गई। पूरी फ़र्द तैयार की और किसान जांच रिपोर्ट में हत्यारे को उकसाने के आरोप का दोषी पाया गया; क्योंकि किसान के “चोर-चोर! भागो चोर-चोर!!! मारो चोरों को!!!” बोलने के बाद ही चोर ने मजदूर को मारा था और चालाक चोरों ने हल्ला मचाते किसान के विडियो अपने मोबाइल फ़ोन में बना लिए थे।

    अंतत: किसान हत्या का दोषी ठहराया गया और उसे चालानी गार्ड जेल ले जाने लगे तो वहां एक और ही दृश्य था, जिसने किसान की आंखों में पानी ला दिया।

    पुलिस, प्रशासन, विधायिका, कार्यपालिका आदि आदि ने देखा कि सारे चोर जार-जार रोए जा रहे थे। किसान इन रोते हुए चोरों को एकटक देख रहा था और हैरान हो रहा था।

    पुलिस, प्रशासन, विधायिका, कार्यपालिका आदि के प्रतिनिधियों ने चोरों के प्रति सहानुभूति जताई और पूछा : अरे, तुमने हत्या की और फिर भी तुम्हें साफ बचा लिया। अब क्यों रोए जा रहे हो? मीडिया तुम्हारी तारीफें लिख रहा है, किसान की आलोचना कर रहा है, अदालत ने तुम्हारे बारे में कुछ पूछा ही नहीं, क्योंकि पुलिस की फर्द में तुम्हारे बारे में जो कुछ था, सब हटा दिया गया था। यहां तक कि किसान को किसान ही नहीं माना गया क्योंकि जमीन उसके नाम ही नहीं चढ़ी थी, वह तो पुराने जमींदार के ही नाम कागजों में बोल रही थी। किसान ने जींस पहन रखी थी और उसने एक चश्मा लगा रखा था, जिसे हमने रेबेन का साबित कर दिया था। उसके यहां रोजड़ों को भगाने के लिए सूतली बम रखे थे, पुलिस के आईओ ने सूतली शब्द हटाकर उसे बम कर दिया था और किसान सिर्फ़ हत्या ही नहीं, देशद्रोह के आरोप में भी जेल में है। पूरी सरकार तुम्हारे साथ है। अब क्यों रो रहे हो?

    सारे चोर और ज़ाेर-ज़ोर से रोने लगे और एक साथ बोले : आप जैसे न्यायकारी, दयालु, राष्ट्रभक्त, परोपकारी, सहिष्णुकारी और मानवतावादी पुलिस अफसर, मींडियाकर्मी, न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारी नहीं रहेंगे तो इस देश का क्या होगा!

    सारे चोर और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। किसान प्रसन्न था कि इस देश का भविष्य स्वर्णिम है; भले न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया से करुणा और न्याय नदारद हो जाएं, कम से कम वह कुछ आंसुओं के रूप में चोरों के हृदय में तो अक्षुण्ण है!

    Credits: Tribhuvan’s Facebook Wall

  • गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

     

    देश में हिंसक और बेकाबू होते आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस के अफ़सर क्यों विफल हो रहे हैं? क्यों अपने ही लोगों पर अपने ही लोगों को गोलियां चलानी पड़ती हैं? ऐसा क्या है कि नारेबाजी या प्रदर्शन करते लोगों पर आम लोगों के वही बेटे अपने ही लोगों पर गोलियां दागने लगते हैं, जिनसे उन्हें बहुत उम्मीदें होती हैं? क्या पुलिस को वाकई ऐसा नहीं बनाया जा रहा है? और क्या इसके लिए सिर्फ़ आज की सरकारें ही दोषी हैं?

    हम अगर लोगों के उग्र आंदोलनों को टटोलें तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। आज़ादी के अांदोलन में जलियांवाला बाग नरसंहार को याद करें तो हम आम तौर पर किसी जनरल ओ डायर को कोसते हैं। हक़कीत ये है कि ये काम जनरल ओ डायर ने नहीं, कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने किया था। यह ब्रिटिश सेना का अधिकारी था और उसे अस्थायी तौर पर अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल लगाया गया था। वह संकीर्ण राष्ट्रवादी ब्रिटिशर्स के लिए एक नायक था, लेकिन उदारवादी ब्रिटिश इतिहासकारों आैर तटस्थ प्रेक्षकों ने उसे खलनायक बताया और उसकी निंदा की। कुछ ने उसे भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने वाली घटना का प्रणेता भी घोषित किया, लेकिन अत्याचारों के प्रति सदा से सहिष्णु हम भारतीयों ने इस नृशंस कांड को भी बर्दाश्त किया और ब्रिटिश शासन को 28 साल तक बर्दाश्त किया। नहीं किया तो उस किशोर ने जिसे शहीदे आज़म भगतसिंह कहा जाता है।

    लेकिन प्रश्न ये है कि क्या गोली कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने चलाई थी? नहीं गोलियां हमारे ही लोगों ने हमारे ही लोगों पर चलाईं और 1500 नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। ये हमारी ही भारतीय सेना के लोग थे। ये 9वीं गुरखा बटालियन के फौजी थे और बंदूकों के साथ-साथ खुखरियों तक से लैस थे। उनके अलावा सिख, बलौच और दूसरी बटालियनों के फौजी थे। वह अंग़रेजी शासन शैली थी और यह समझ आता है कि उनके लिए ऐसा करना जरूरी था। लेकिन आजादी के बाद हमारे शासकों ने आज तक इस नीति को नहीं बदला है। वही प्रशासनकीय शैली है और वही पुलिसीय। ऐसी कितनी ही घटनाएं बताती हैं कि स्वतंत्र भारत में हमारे शासकों ने पुलिस को वही पुलिस रहने दिया है और लोगों के प्रति नीति को भी वैसा ही।

    न जाने यह कब समझ आएगा कि हमारे अपने ही लोगों पर अपने ही पुलिस अधिकारियों को गोलियां क्यों चलानी चाहिए? हमारे शासकों को चाहिए कि वे आंदोलनों के प्रबंधन में भी अपने अफ़सरों और पुलिस के जवानों को दक्ष बनाएं और इसके लिए विश्व भर से और अपने अनुभवों से सीखने की जरूरत है। आज हमारे जवानों की न केवल ऊर्जा व्यर्थ जाती है, बल्कि उन्हें वीवीआईपी सुरक्षा के नाम पर घंटों तपना पड़ता है। हम देखते हैं कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रेदेऊ एक रेस्तरां में बैठकर गपशप कर सकते हैं, लेकिन हमारे यहां के नेताओं ने पिछले 70 साल में ऐसी संस्कृति बना दी है कि वे दुनिया के सबसे दुर्लभ नगीने हैं।

    यह समय की मांग है कि हम अपने किसानों को या आम नागरिकों को भी यह सिखाएं कि आंदोलन किए कैसे जाते हैं? आम नागरिकों में इस शिक्षा का प्रचार होना चाहिए और खासकर किसान संगठन चलाने वाले या अन्य संगठनकर्ताओं को यह प्रशिक्षण दिया जाना देशहित में है कि आंदोलन हिंसक न हों और वे एक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से सरकारी तंत्र पर दबाव बनाने में सफल रहें। भारतीय राजनेताओं बहुत चालाक हैं और वे यह नहीं चाहते कि ऐसी कोई विधि विकसित हो, क्योंकि इससे उन्हें ही नुकसान होता है, लेकिन लोकहित में आम लोगों को ऐसी लोकनीति के लिए सरकारी तंत्र पर दबाव बनाना चाहिए और कहना चाहिए कि आप वैज्ञानिक और तकनीकी प्रतिभाओं के सहयोग से ऐसे गोले या कारट्रिज विकसित करें, जिससे किसी का नुकसान नहीं हो, लेकिन वे नियंत्रित भी रहें। लाेगों को अपनी आवाज़ मुखरता से उठाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए और ऐसी संस्कृति विकसित हो कि आंदोलन से पहले ही वार्ताओं के रास्ते खुलें और आंदोलकारियों के नेताओं से बातचीत की जाए।

    सनद रहे कि गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall.

  • जय जवान – जय किसान :: सत्ता की दुकान

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    आप किसानों को पुलिस की गोलियों से मरवा दो। आप जवानों को आतंकवादियों की गोलियों से मरने को मजबूर कर दो। आप जय जवान और जय किसान के नारे लगाते रहो।

    आप साठ हजार और सत्तर हजार करोड़ रुपए के युद्धक विमान खरीदते रहो और जवानों को यों ही मरने उनके हालात पर छोड़ दो! आप अमेरिका और फ्रांस की हथियार कंपनियों को लाखों करोड़ रुपए लुटवाते रहो, लेकिन न इस देश के जवानों की चिंता करो और न किसानों की। आप किसानों को मूर्ख बनाते रहो, वोट लेते रहो और अपनी सरकारें स्थापित करते रहो।

    आप 15 अगस्त 1947 से ऐसा का ऐसा कर रहे हो। आपकी सत्ता की दुकान वही की वही रहती है और हर पांच, दस या पंद्रह साल में एक बार उस दुकान का बोर्ड बदलते हो। सत्ता की आपकी यह दुकान किसी राज्य में किसी के नाम से चलती है और किसी राज्य में किसी से। आप कभी किसी निरीह गाय पर दांव खेल जाते हो और कभी किसी बकरी को बादाम खिलाकर अपने सत्ता प्रतिष्ठान की दुंदुभियां बजाते रहते हो।

    किसान अपना हक मांगे तो अापकी पुलिस उसे कानून और व्यवस्था के नाम पर गोलियों से ऐसे भून देती है जैसे जनरल डायर ने हमारे ही लोगों को भून दिया था। जवान अगर अपने खाने में खराबी को लेकर ठेकेदार की शिकायत भर कर दे तो अाप बदनामी से डरकर उसकी नौकरी छीन लेते हो। आप तो आप हैं। आप और आपके चमचों के अलावा इस देश में सबके सब देशद्रोही हो जाते हो। अाप सत्ता में इतने अंधे हो जाते हो कि आप अपने ही लोगों को पार्टी द्रोही बताकर उन्हें राम की तरह बनवास जैसी हालत में फेंक देते हो, क्योंकि आपकी सत्तावादी राजनीति की आत्माओं में मंथराएं विराजती हैं।

    आप कभी कांग्रेस, कभी जनता दल, कभी कम्युनिस्ट पार्टी, कभी माले और कभी बसपा, कभी सपा, कभी अकाली, कभी आम आदमी और कभी अनाद्रमुक, द्रमुक और कभी आप शिवसेना हो जाते हो। आप कभी यह तो कभी वह का रूप धारण कर लेते हो। आप गिरगिट की तरह रंग बदलते हो और गिरगिट आपके सामने लज्जित हो जाता है। आप जब सत्ता से बाहर होते हो तो आप अपने पास अमृत कुंड रखने का दम भरत हो और जैसे ही आप सत्तासीन होते हो तो आप अपने सोने के घड़ों को विष से भर लेते हो। प्रभु, आप का यह कौनसा रूप है? आप सफेद, हरे, लाल, नीले, आसमानी और न जाने कैसे-कैसे हो जाते हो। आप तिरंगे होते हैं तो आपकी आत्मा का कालापन साफ दिखता है, लेकिन आप जब केसरिया होने की कोशिश करते हैं तो आपका हृदय केसर की क्यारियां खिलाने वाले लोगों को देखकर डरप उठता है।

    आप राजस्थान के घड़साना में किसानों को गोलियों से भून देते हो। आप आंदोलन कर रहे 70 गुर्जरों को एक साथ गोलियों से धराशायी कर देते हो। आप कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और उड़ीसा में आंदोलनकारियों के रक्त से स्नान करते हो। आप लोकतांत्रिक युग में हो और आदिम युग का सा विकल्प लेकर प्रस्तुत होते हो। आप चुनावों में ऐसे प्रस्तुत होते हैं, मानो आप ही भगवान राम और श्रीकृष्ण के अवतार हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता में आप आते हो और लोग आंदोलन करते हैं तो आपका भी स्वरूप वही पुरानी सरकार सा विकराल नजर आता है और आपकी सरकार नरमुंड धारण करने को उत्कंठित किसी काली का स्वरूप नजर आती है, लेकिन लोकतांत्रिक युग के प्रभुओ, सुनो कि काली दुष्टों का दमन करके उनके नरमुुंड पहनती थी कि न कि अपनी ही प्रजा के। वह प्रजा को सताने वालों को दंडित करती थी, लेकिन आपकी माया अनूठी है मेरे प्रभु। आप तो सताए हुओं के नरमुंडों की माला पहनते हो।

    अाप कैसे राजनेता हैं? आख़िर इस देश के राजनेता किस दिन ऐसी नीतियां बनाएंगे कि न इस देश के जवानों का रक्त बहे और न किसान का। कब हमारे राजनेता ऐसे देश का निर्माण करेंगे कि सीमा पर हमारे जवान के युद्ध आभूषण देखकर शत्रु निगाहें नीची कर ले और किसान सीना तानकर चले। कब कश्मीर में शांति लौटेगी और कब सरहद पर हम रक्तस्नान बंद करेंगे? भगवान् महावीर और बाबा नानक के इस देश में कब कोई देश के नागरिकों से प्रेम करने वाला अपना सा शासक आएगा? https://geembi.com कब कोई भगवान बुद्ध की शिक्षा लेकर इस देश के आम नागरिक के साथ उसके आंसू पौंछने और उसके क्लेश मिटाने आएगा? कब कोई भगवान राम की इस मर्यादा को इस देश में स्थापित करेगा कि किसी के मन को पीड़ा पहुंचाकर सत्ता प्राप्त करना मैं अपनी ठोकर के बराबर मानता हूं और कब इस देश में ऐसे राजसी लोग होंगे, जो सत्तासीन होने वाले भरत के साथ नहीं, वनगमन को जाते राम का साथ गहेंगे।

    आखिर क्यों हमारे देश का किसान दो रुपए किलो टमाटर और ढाई रुपए किलो प्याज बेचने को मजबूर है? नोटबंदी के दिनों में किसानों ने मुफ़्त में अपनी मटर, गोभी, आलू और अन्य फसलें मुफ्त तक कटवा डालीं। क्या किसी व्यापारी ने कभी ऐसा किया है? क्या देश में कभी ऐसे हालात बन हैं कि कारोबारियों ने घाटा खाकर चीजें बेची हों। आखिर किसान को ही आत्महत्या करने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है? क्यों ऐसा है कि चुनाव जीतने के लिए यूपी के किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाते हैं और शेष देश के किसान तड़पकर रह जाते हैं? आप क्यों ऐसी चालें चलते हैं कि एक जगह जो चीज ठीक है, वही दूसरी जगह एकदम गलत हो जाती है। आपके लिए राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों का किसान उसी कर्जमुक्ति का पात्र क्यों नहीं बनता जो आप उत्तरप्रदेश में सहज ही बना देते हैं।

    आखिर कब वह समय आएगा जब इस देश को भगवान राम जैसा कोई शासक मिलेगा, जो अगर झूठे ही किसी की शिकायत सुन ले तो अपनी प्राण प्रिया को निकाल बाहर करे या सत्ता को ठोकर मार कर चल दे। बन-बन भटकता फिरे और सबसे कमजोर लोगों में ऐसी ताकत भर दे कि वे उफनते समुद्र पर पुल बना दें और राक्षसी सत्ता का सर्वनाश कर दें। न कि वे अपने ही भाई बंधुओं सहनागरिकों और सह शासकों को झूठे बदनाम करके अपनी मैली आत्माओं को सबसे सुवासित घोषित करने के शासकीय आदेश जारी कर दें। यह कब तक होता रहेगा?

    राजनीतिक दलों का यह रवैया कब बदलेगा कि वे खुद तो सुरक्षित होते रहें और इस देश के जवान और किसान को बेहाल मरने के लिए छोड़ दें। कभी वह अपने ही नागरिकों को यह बना दे या वह बना दे और खुद एक कड़े सुरक्षा घेरे में सदा मौज करे? सिर्फ बातों ही बातों का कारोबार करके आप कब तक यह खतरनाक खेल खेलते रहेंगे? कब तक ऐसा होगा कि किसान सिसकेगा और नेता हंसेगा? कब तक ऐसा होगा कि जब प्रदूषण फैलाने वाले कंप्यूटर अौर गैजेट्स अाएंगे तो आप उनका स्वागत करते हुए धन्य होंगे और किसान के लिए कोई बेहतरीन बीज आएगा तो आप जीएम का नाम लेकर किसानों को डरा देंगे और पेस्टीसाइड लॉबी ठटाकर आपकी मूर्खता पर हंसती रहेगी! आखिर कब तक? आखिर कब तक आप लोगों के साथ ऐसा करेंगे? आप कब तक भारतीय नागरिक को उसके धर्म और उसकी जाति में बांटकर भारत माता के हृदय की वाहिनियों में विष भरते रहेंगे? आप तक भारत माता के पुत्रों में किसान और पुलिस का फर्क करके उनके दमन की राहें प्रशस्त करेंगे? क्या सत्ता में प्रजा का कोई स्थान नहीं है? प्रिय शासको, यह हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हैं और आपका यह फर्ज है कि आप आज किसानों के साथ वही न्याय करो, जिसकी आप विपक्ष में रहकर मांग करते रहे हैं और विपक्ष तो आज कहीं प्रश्न करने को भी प्रस्तुत नहीं है, इसलिए उसके लिए कहा भी क्या जाए!

    हे मेरे शासकीय राजनेता, तू 15 अगस्त 1947 से जो अपने ही नागरिकों के रक्त से स्नान कर रहा है, वह कब तक करेगा और कब तक इसे राष्ट्रप्रेम घोषित करता रहेगा?

    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से

     

     

  • यह दुनिया ग़ज़ब है भाई

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    लालू यादव का भक्त कबीला इन दिनों नीतीशकुमार की क्या ग़ज़ब ख़बर ले रहा है। जैसे नीतीशकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भोज पर जाकर और सोनिया गांधी के भोज पर न जाकर मानो ऐसा कर दिया हो कि वे अभी गंगाजी जाने वाले थे, लेकिन अचानक से धर्म बदलकर मक्का चल दिए और हाज़ी हो गए। अरे दोस्तो, आपकी स्मृति को क्यों काठ मार गया। ये वही नीतीशकुमार हैं, जो कुछ समय पहले तक भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला रहे थे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इन्हें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने से पहले नरेंद्र मोदी से बेहतर संभावित प्रधानमंत्री घोषित किया था। लालू के साथ नीतीशकुमार हो तो वह घटिया और वही नीतीशकुमार अगर नरेंद्र मोदी या भाजपा के साथ चला जाए तो पापात्मा। क्या कमाल है!

    मायावती और उनका भक्त-संप्रदाय आजकल भाजपा पर टूटकर पड़ रहा है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि दलितों की इस महान् उम्मीद ने ही उत्तरप्रदेश में सबसे पहले भाजपा से गठजोड़ करके भाजपा के हिन्दुत्वाद पर मुहर लगाई थी। यह वह समय था जब वामपंथी दलों और कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग करते हुए जनांदोलन खड़ा किया था। उस जनांदोलन के कई हरावल दस्ते के कई नेता आजकल नरेंद्र मोदी के यशोगान कर अपने आपको उपकृत समझ रहे हैं।

    कुछ लोग हैं, जो एक इनसान को गोमांस रखने के नाम पर नृशंस ढंग से मारकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं, मानो इस देश में इनसानियत नाम की चीज़ ही नहीं रह गई है। कांग्रेस इस पर बढ़चढ़कर हल्ला मचाती है। लेकिन अचानक हम देखते हैं कि यही पार्टी एक निरीह और निरपराध मूक प्राणी, जो दुर्भाग्य से एक कारुणिक गाय है, सार्वजनिक रूप से काटकर अपने भीतर छुपी हिंसक नृशंसता को ला बाहर करती है।

    हमारे लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र को दूषित करने पर आमादा राजनीतिक दलों, राजनीतिक लोगों और इस देश के राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों के मानस में एक विषैलापन भरता जा रहा है। छोटी-छोटी घटनाएं इसकी सबूत हैं।

    लाल यादव को लोग एक बार फिर मौका देते हैं, लेकिन वह सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय आज भी पारिवारिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक ऐसा नेता है, जिसने स्वार्थाें के वशीभूत अपने साहसिक गुणों को तिरोहित करके अपने आपको लगभग डुबाे दिया है।

    मायावती के पास दलितों का एक ऐतिहासिक बल आता है, लेकिन वह सत्ता के दंभ, धन एकत्र करने और महज सीटें जीतने के लिए एक धर्मविशेष के दिखावटी प्रेम का ऐसा मूर्ख प्रदर्शन करती हैं, दूसरे धर्म के चालाक कट्टर लोग उसे चौकड़ी भुला देते हैं।

    कुछ दिन पहले एक प्रयोग हुआ आम आदमी पार्टी का। इस आम आदमी ने आम आदमी के नाम पर राजनीतिक शुचिता, व्यवहार गत ईमानदारी और सिद्धांतिप्रियता के पेट में जिस तरह छुरा घोंपा, वह तो शायद ही किसी ने किया हो।

    ये मानसिकता प्रदर्शित करती है कि एक ही व्यक्ति को ये लोग एक ही समय में महान् लोकतांत्रिक घोषित कर सकते हैं और अगले ही पल उसे फासीवादी।

    मेरी चिंता सिर्फ़ इतनी सी है कि हमारी नई पीढ़ी की नवांकुरित प्रतिभाओं के मानस पटल पर यह अविवेकीपन लाया जा रहा है।

    मुझे लगता है, हमारी नई पीढ़ी को तटस्थ होकर चीज़ों का विश्लेषण कर सोच की एक नई राह बुननी चाहिए, ताकि हम एक सबल, सुसभ्य और सुलोकतांत्रिक समाज की ओर से बढ़ सकें। ऐसे समाज की तरफ जो विवेकशील मानवतावाद से भी आगे बढ़कर प्राणि-प्रकृति प्रियता को आत्मसात कर सके।

    दरअसल, इस सबके लिए अगर कोई कुसूरवार है तो हम लोग हैं। हम अवाम। हम भारत के लोग। हम किसी के कांग्रेस के पीछे लगते हैं तो 70 साल लगे ही रहते हैं और अगर नरेंद्र मोदी हमें भाता है तो फिर ऐसा भाता है कि उसकी हिमालय जैसी भूल भी राई जितनी नहीं दिखती। हम पर कभी नेहरू का चश्मा चढ़ता है और कभी इंदिरा का। कभी हमें राजीव गांधी चमत्कृत करते हैं और कभी हमें वीपी सिंह जैसा कोई लगता ही नहीं।

    हम भारत के लोग लोकतंत्र की नसों में जो विनाशकारी तेज़ाब डाल रहे हैं, वह तो दुनिया में कहीं दिखता। हमारे सैनिक मारे जाते हैं, हमारे नागरिक मारे जाते हैं और हमारे सपने मारे जाते हैं। हम हल्ला करते हैं, लेकिन हमारी नींद नहीं उड़ती। हम जैसे बोस्निया-हर्जेगोविना बनने को उतावले हैं। हमारे सत्ताधीश आयातुल्लाह खुमैनी बनकर हमें पाकिस्तान, ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान और सीरिया बनाने की राहें उलीकते हैं तो हमें दिखता नहीं। वह फिर इंदिरा गांधी हों या नरेंद्र मोदी! वह बंगाल को नारकीय हालात में बदलने वाला कम्युनिस्ट शासन हो या केरल के मतदाताओं को प्रसन्न करने के लिए सार्वजनिक रूप से गाय काटने वाली कांग्रेस। हम सब सेना होते हैं और हम सब पत्थर फेंकते हैं अपने ऊपर!

    हम एक प्रहसन बनने को उतावले हैं। अपने घर को सपनों का घर और अपने देश को सपनों का देश बनाने के लिए जैसे हमें कोई सरोकार ही नहीं। हम अपनी महान् सांस्कृतिक थाती को तिरोहित होते कब तक देखते रहेंगे?

    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall

  • मेरे शहर के हिस्ट्रीशीटर

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    उन दिनों एसपी हुआ करते थे बीजू जॉर्ज जोसेफ़। क्या हिम्मती बंदा था। खूब पढ़ाकू और खूब लड़ाकू। थानेदार थर-थर कांपते थे और बंदे को देखो तो हर समय पसीने से लथपथ। एसपी जैसा एसपी।

    मज़ाल कि कानून और व्यवस्था को कोई धता बता दे। थानेदार भले ढीले पड़ जाएं, सीआई चाहे कहीं छुप जाएं और डीवाईएसपी चाहे किसी कंदरा में ओझल हो जाएं, अपराधियों को खुद ही धर लेता था। कमज़ोर एसपीज के समय में जो कानून अपराधियों के सामने साए की तरह ज़मीन पर रेंगता है, उसमें अच्छे एसपी सूरमे सांप की सी जुंबिश और फुफकार भर देते हैं। बीजू ने उन दिनों यही किया था।

    एक क्राइम रिपोर्टर के रूप में मैं थाने में थानेदार के सामने था तो एक कॉल आई और थानेदार सावधान की मुद्रा में आ गया कुर्सी से कूदकर। पता चला, बीजू का फ़ोन है। मज़ा आया।

    बीजू के साथ मैंने कई पुस्तकें एक्सचेंज करके पढ़ीं। अरुंधति रॉय की “दॅ गॉड ऑव स्मॉल थिंग्स” उन्हीं दिनों आई थी और मुझे मिल नहीं रही थी। यह उपन्यास मैंने उन्हीं से लेकर पढ़ा। बीजू के आग्रह पर मैंने शायद उन्हें नीरद सी चौधरी की “दॅ ऑटोबायोग्रैफी ऑव अन अननॉन इंडियन” पढ़ने को दी थी। यह सिलसिला काफ़ी चला। लेकिन ज़ल्द ही उनका तबादला हो गया और वे चले गए। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन बहुत यादगार।

    तो ख़ैर, शहर के एक बहुत नामी उद्योगपति की उनके अपने ही सगे भाई ने जेल से पैरोल पर आए एक ख़तरनाक अपराधी से दिन दहाड़े हत्या करवा दी थी। इस हत्याकांड से शहर में सनसनी फैल गई थी, लेकिन बीजू ने इसे कुछ घंटे बाद ही पंजाब बॉर्डर क्रॉस करते हुए धर दबोचा था।

    इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग बहुत रोमांचकारी रही। गर्भनाल के रिश्ते खून से आलूदा हो चुके थे। जिस समय अदालत से फैसला आया, मारे गए व्यक्ति की पत्नी हत्या के असली अभियुक्त को सज़ा दिलाने से पीछे हट गई और एक नेपाली नौकर के बयानों के अाधार पर अदालत ने अपराधियों को सख़्त सजा सुनाई। औरत का पतन देखो, पैसा मिल गया; पति के असली हत्यारे को बख्श दिया। शहर में चर्चा थी कि देवर और भाभी में भारी डील हुई है।

    इस घटनाक्रम ने मन उचाट कर दिया। क्या कोई सगा भाई पैसे के लालच में इतना नीचे गिर सकता है? क्या कोई पत्नी इतना पतित हो सकती है? लेकिन उस समय और भी शर्म आई, जब पता चला कि पूरे शहर ने उस शख्स को सिर पर बिठा लिया है, जिसने मर्डर करवाया था।

    खैर, हत्यारे की गिरफ्तारी की जिस समय खबरें की जा रही थीं, मेरे पास जेल से नंबरदार का फोन आया। वह बोला : एक बात करनी है आओ। मैं जेल पहुंचा। जेल में नंबरदार सबसे सीनियर और लीडर बंदे को कहते हैं। इसने कोई न कोई खतरनाक अपराध किया होता है।

    मैं गया तो वह बोला : यार, इससे मिलो। ये हैं करतारसिंह। मैं बोला : तो हुआ क्या?

    करतारसिंह बोला : वो सेठ के मर्डर में जिस संजय को पकड़ा है। पुलिस ने 302 की जगह 303 लगाई है। ये ग़लत है। रोंग है। बिलकुल रोंग। मैंने इस धारा के बारे में पहली बार उसी समय सुना था।

    दरअसल, आईपीसी की एक धारा है 303, जो ऐसे मर्डरर पर लगाई जाती है, जो पहले से आजीवन कारावास की सजा काट रहा हो। इसमें फांसी के अलावा और कोई सजा नहीं है।

    करतारसिंह, जिस पर कई लाेगों के मर्डर का आराेप था और जो एक ठेठ देसी किसान था, बोला : हू एवर बीइंड अंडर सेंटेंस ओफ इंप्रीजनमेंट फोर लाइफ, कमिट्स मर्डर, शैल बी पनिश्ड विद डैथ।

    वह बोला : ध्यान देणा भाई साब। शैल बी पनिश्ड विद डैथ। लेकन गल ये है कि मिट्‌ठूसिंह और भगवान बख्श सिंह के केसों में भाई साहब सुप्रीम कोर्ट ने एटीफोर से पहले ही आईपीसी के इस सेक्शन को स्ट्रक डाउन कर दिया था। इसे वोइड और अनकंस्टीट्यूशनल भी करार दिया था जी।

    अब पूरी कहानी समझ आई कि पुलिस ने जिस मर्डर मामले में ये सेक्शन लगाया है, उसमें तो कोर्ट ने भी पीसी रिमांड दिया है। मैंने कहा तो करतारसिंह बोला : देखो, अजकल, कनून दे बारे न जजां नूं पता, न पुलिस अफसरां नूं। कनून दा पता हुंदा तां अज्ज ऐने लोक बेकसूर ही जेलां विच नहीं सड़दे।

    मैंने कहा : यार तुमने तो खुद मर्डर किया है। तुम सजा काट रहो, सड़ नहीं रहे हो!

    वह बोला : बताओ किसका किया?
    मैं बोला : अब तुम्हीं बता दो।
    करतार ने कहा : मेरे घर की एक लड़की को कोई बुरी नजर से देख रहा था। वह हद पार होने लगा तो समझाया। नहीं माना तो दो चार बार और समझाया। नहीं माना और अपनी हद से गुजरा तो उसकी गर्दन उतारकर मैंने उसके चबूतरे पर रख दी। …. की मैं गलत कीता? https://remotepilot101.com/ देख वीरा, मेरे दिल विच देख। मेरी बहन प्रसन्न है और मेरे दिल से इनसाफ़ की महक आ रही है।

    ……वह बोला : मैं कोई कमीना कातिल नहीं हूं!

    मैं अनुत्तरित था।


    फेसबुक वाल से साभार