Tribhuvan
संजय लीला भंसाली चाहे कितने भी बड़े फ़नकार क्यों न हों, लेकिन दिलों को जीत लेना इस क़दर आसान नहीं होता। फ़िल्मकारों के पास प्रचार की बहुतेरी चालाकियां हुआ करती हैं, लेकिन ये चीज़ें सदा ही जादू की तरह काम नहीं करतीं। प्रचार के लिए शुरू की गई विवादों की अदाकारी में भी सौ कर्ब के पहलू निकल आते हैं। भंसाली ने “पद्मावत” का निर्माण पूरा करके बड़ी ही अदाकारी के साथ फ़न्काराना रोने की कोशिश की थी, लेकिन राजस्थान के राजपूतों के विरोध के बाद उनके आँसू बह निकले।
मैं कुछ दिन पहले अपनी दिल्ली यात्रा में “पद्मावत” देख चुका हूं। इस पर लिखने का काफ़ी मन था, लेकिन शनिवार की रात जब “चैंपियन” पर कमलेश ने कुछ चीज़ें छेड़ीं और साफ़ कहा कि इस तरह की फ़िल्में बननी ही क्यों चाहिए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने साफ़ तौर पर कहा कि किसी भी फ़िल्म या कृति पर रोक लगाना बहुत ग़लत है, लेकिन “पद्मावत” देखने के बाद मुझे लगता है कि न तो आम लोग किसी चीज़ का विरोध करते समय विवेक का इस्तेमाल करते हैं और न ही हमारे स्वनाम धन्य संपादक लोग राजस्थान के राजपूत शासकों का बुरी तरह उपहास उड़ाने वाली फ़िल्म की तारीफ़ें करते समय इतिहास के तथ्यों को ही याद रखते हैं।
“पद्मावत” फ़िल्म को लेकर जो बात एक सामान्य युवक कमलेश के विवेक पर प्रहार करती है, वह फ़िल्म देखकर सबसे पहले फ़तवा जारी करने वाले मौलानुमा संपादकों की बुद्धि से बहुत परे की बात है। कमलेश का तर्क है : यथार्थ जीवन में रणवीर और दीपिका प्रेमी-प्रेमिका हैं और जब भंसाली इन्हें फ़िल्म में अलाउद्दीन ख़िलज़ी और पद्मिनी की भूमिकाएं देता है तो इसके पीछे फ़िल्म के निर्देशक की काईयां बुद्धि का पता चलता है। वह शरारतन कहीं न कहीं यह दर्शाना चाहता है कि दोनों के बीच प्रेम का कोई अदृश्य रसायन बह रहा था।
और संभवत: यही वह बात थी, जिससे भंसाली के गाल पर पड़े थप्पड़ के पीछे का गुस्सा अंकुरित हुआ था। कमलेश और दूसरे बहुतेरे लोगों का मानना है कि भंसाली ने पद्मिनी के माध्यम से क्षत्रियों की प्रतिष्ठा से छेड़छाड़ की कोशिश की है और यह नाक़ाबिले बर्दाश्त है।
लेकिन फ़िल्म देखने के बाद मुझे बहुतेरा ऐसा आपत्तिजनक लगा, जो शायद फ़िल्म की तारीफ़ें करने वाले बुद्धिजीवियों की निगाह में सही रहा होगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भंसाली ने अलाउद्दीन ख़िलजी के रूप में जो पात्र गढ़ा और जितनी मेहनत उसे संवारने और जीवंतता प्रदान करने में खर्च की, उसका एक प्रतिशत भी राजस्थान की वीरता की शान रहे रत्नसेन के पात्र पर खर्च नहीं की।
ख़िलजी वाक़ई बहादुर और दुस्साहसी था, लेकिन रत्नसिंह की कद-काठी और उसके हावभाव ऐसे तो नहीं ही रहे होंगे, जैसे शाहिद कपूर के दिखाए गए हैं। भंसाली ने रत्नसिंह के पात्र को बुरी तरह कमज़ोर दिखाने के लिए ही शाहिद कपूर का चयन किया है, जो रणवीरसिंह अभिनीत अलाउद्दीन ख़िलजी के सामने दो कौड़ी का भी नहीं लगता।
ख़िलजी की कुश्ती का दृश्य बहुत ज़ोरदार ढंग से फ़िल्माया गया है और उसमें ख़िलजी की ताक़त को जीवंतता दी गई है। उसका डील-डौल और उसके शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन क्या कमाल है। उसकी भूमिका को वीरता और क्रूरता के चाक पर शरीर और अभिनय की मिट्टी से गूंथा गया है।
अल्लाउदीन के मुकाबले रत्नसेन का पात्र बहुत कमजोर गढ़ा गया है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि शौर्य और शक्ति की मिट्टी से बना रत्नसेन शाहिद कपूर जैसा रहा होगा, जो पद्मिनी की तलाश में सिंहल द्वीप चला गया? शूरवीरों की कद-काठी छोटी हो सकती है, लेकिन उनके ओज और तेज ऐसे तो नहीं हुआ करते। रत्नसेन को उनकी पत्नी जिस पद्मिनी को लाने के लिए ताना देती है, वह पद्मिनी किसी सुंदरी का नाम नहीं था, अपितु भारतीय कामशास्त्र की भाषा में सर्वाेत्तम मानी जाने वाली सुंदरी पद्मिनी थी। जैसे चित्रिणी, शंखिनी, हंसिनी आदि मानी जाती हैं। और शूरवीर तथा कामवेत्ता रत्नसिंह जब पद्मिनी की तलाश पूरी करके लौटता है तो क्या उसका संघर्ष कम रहा होगा?
इस फ़िल्म को देखकर तो लगता है कि राजपूतों से ज़्यादा अगर किसी को विरोध करना चाहिए था तो ब्राह्मणों को करना चाहिए था। इसमें राघव चेतन ब्राह्मण को न केवल फ़िल्म में देशद्रोही और विश्वासघाती बताया गया है, बल्कि उसे निकृष्टतम व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। राघव जैसा सुरीला और निष्णात बांसुरीवादक दिखाया गया है, अगर वह वाक़ई में संगीतज्ञ था तो द्रोही नहीं था और अगर द्राही था तो वह संगीतज्ञ नहीं हो सकता।
पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मानते हैं कि राजपूतों ने मानवीयता और अद्वितीय किस्म की निर्भीकता के कारण चालाक, निष्ठुर और अमानवीय आक्रमणकारियों से मात खाई। इसके अनुपम उदाहरण भी बिखरे पड़े हैं। लेकिन फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह अलाउद्दीन ख़िलजी रत्नसेन के महल में निर्भीकता से आता है।
इतना ही नहीं, अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़गढ़ के दुर्ग के चारों तरफ घेरा डाल रखा है और भीतर रत्नसेन और पद्मिनी कभी होली खेलते हैं और कभी दीपावली मनाते हैं। क्या सामान्य सा विवेक रखने वाले शासक के साथ भी ऐसा संभव है कि वह चारों तरफ शत्रु से घिरा रहे और किले के भीतर नीर बनकर बांसुरी बजाता रहे? भंसाली ने बहुत ही चालाकी से राजपूत वीर को निहायत ही कायर और मूर्ख चित्रित करने की कोशिश की है और यह इतिहास के सच के हिसाब से भी बहुत आपत्तिजनक है। एक जगह तो रत्नसेन अचानक अलाउद्दीन की सेना पर ऐसे समय हमला करता है जब सब लोग सोए पड़े हैं और कोई जगाकर अलाउद्दीन को हमले की सूचना देता है। मेरा ख़याल है कि राजपूत शासकों के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा निकृष्ट शासक हो, जिसने कभी किसी सोए हुए शत्रु पर हमला किया हो।
यह सही है कि अलाउद्दीन ख़िलजी के पात्र को इस फ़िल्म में बहुत क्रूर दिखाया गया है, लेकिन यह क्रूरता उसके प्रभाव में बढ़ोतरी पैदा करती है, न कि उसके पात्र को वीभत्स बनाती है।
पद्मिनी के पात्र में दीपिका का अभिनय बहुत कमज़ोर और निष्प्राण रहा है। उसका पात्र और उसके संवाद भी बहुत बचकाने गढ़े गए हैं। इसके विपरीत ख़िलजी की पत्नी मेहरुनिसा की भूमिका में अदिति राव का क्या शानदार अभिनय है। जिम सर्भ तो क़माल हैं।
दरअसल, यह फ़िल्म दिल्ली को केंद्र में रखकर गढ़ी गई है। दिल्ली अलाउद्दीन ख़िलजी और अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली। दिल्ली सदा सदा से ही ज़ुल्मत की प्रतीक रही है, लेकिन दिल्ली के वासियों के लिए यह अत्याचार सदा ही सदाचार रहा है।
मुझे लगता है कि रत्नसेन के बहाने भंसाली ने राजस्थान के आत्मदर्प को बहुत नीचा दिखाया है और ख़िलजी की शान में जमकर कसीदे पढ़े हैं। और यह बहुत आपत्तिजनक है। इसका बात का पता फ़िल्म देखकर ही लग सकता है और किसी भी फ़िल्म, पुस्तक और कलाकृति पर प्रतिबंध लगाना विवेक की अर्गलाएं बंद करने के समान है। ऐसा करना भंसाली की मानसिकता को आर्थिक फायदों से भर देना है। अगर विरोध इतना प्रखर नहीं होता तो यह फ़िल्म वाकई में बुरी तरह पिट जाती। लिहाजा, फ़िल्म का विरोध करने वाले तत्वों ने राजस्थान के दर्प का उपहास उड़ाने वाले भंसाली की परोक्ष रूप से जाने या अनजाने प्रचार में बहुत मदद की है।







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