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मंदिरों में व्यभिचार की घटनाएं देखकर उस वैदिक साधु ने तान दी थी विरोध के धनुष की प्रत्यंचा और ढेर कर दिया था अध्यात्म की गरिमा के हंताओं को

Tribhuvan

लोग उसे स्वामी विवेकानंद की तरह प्रेम नहीं करते, क्योंकि वह विदेशी भाषा में विदेशी लोगों को प्रसन्न करने के लिए विदेशी धरती पर नहीं गया था। उसे जब केशवचंद्र सेन ने कहा कि आप विदेश होकर आ जाएंगे तो भारत में आपको अपार सम्मान मिलेगा तो उसने कहा : पहले मैं अपने घर का अंधेरा दूर कर लूं। समय बचा तो वहां भी जाऊंगा। यह विचित्र साधु कोई और नहीं, दयानंद सरस्वती था। कबीर और मार्टिन लूथर के बाद यही साधु इस धरती पर हुआ, जिसने धार्मिक पाखंडों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। और साबित किया कि किस तरह मंदिर और मूर्तियां देश के पतन का कारण बन रही हैं।

वह इस देश के कोने-कोने में घूमा। अफ़गानिस्तान के उस किनारे से लेकर बर्मा की सीमा तक वह गया। वह हर धर्म के भीतर तक गया। ज्ञान की थाह ली। वह हर धर्मग्रंथ की थाह लेने की कोशिश करता रहा। उसने मंदिरों में ईश्वर को तलाशने की कोशिश की, लेकिन उन्हें हर जगह पतन और अंधेरे के दर्शन हुए। यह देखकर उनका खून खौल उठा और उन्होंने ऐसे समय में मंदिरों और मूर्तियों के खिलाफ़ आवाज उठाई जब देश में न आज जैसी चेतना थी और न हालात।

दयानंद सरस्वती ने 1875 के आसपास ही अपना प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश लिख दिया था। इसके 11वें अध्याय में उन्होंने मंदिरों और मूर्तियों को अध्यात्म के बजाय 16 बुराइयाों का कारण बताया और कहा कि ये विनाशकारी चीज़ें हैं। मंदिरों को उन्होंने भ्रष्टाचार और व्यभिचार का केंद्र बताया। उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर मंदिरों और साधुओं के हालात देखे और समझे थे और उनके बारे में बहुत खुलकर लिखा। हालांकि उनके इन विचारों के कारण ही एक रूढ़िवादी ब्राह्मण ने उन्हें दूध में शीशा पिघलाकर दे दिया था और उसी से स्वामी जी की मृत्यु हो गई थी। लेकिन आखिरी समय तक दयानंद सरस्वती ने मंदिरों-मूर्तियों के नाम पर चलने वाले गलत चीज़ों पर बहुत मुखर होकर आवाज़ उठाई थी।

स्वामी जी ने मंदिरों और मूर्तिपूजा की 16 बुराइयां भी गिनाईं, जिनसे देश आज भी दो-चार हो रहा है। उनका कहना था, इससे मन-मस्तिष्क में जड़ता आ जाती है। धन का अपव्यय और दुरुपयोग होता है। मंदिरों में अपार चढ़ावा और धन आने से व्यभिचरण और दुराचरण बेरोकटोक फैलता है। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में लिखा कि मंदिर-मूर्तियां देश की एकता को खंडित करने का कारण बन सकती हैं, जो कि हम राममंदिर-बाबरी मस्जिद प्रकरण में देख ही रहे हैं। उनका तर्क था कि इससे पर्यावरण का भारी विनाश होता है और लोगों के समय, संसाधन और शक्ति का तो यह अपव्यय है ही। सिर्फ़ इसे ही भक्ति का कारण मान लेने से मनुष्य सच्चे आध्यात्मिक मार्ग से दूर हो जाता है और इस तरह वह धर्म के मार्ग को छोड़कर अधर्म की राह पकड़ लेता है।

यह सही है कि मंदिर और मूर्ति के प्रति बहुत से लोगों की आस्थाएं जुड़ी होती हैं और सब मंदिरों में व्यभिचार भी नहीं होते। लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती ने आज से 143 साल पहले जो आशंका व्यक्त की थी, वह आसिफा जैसी सुकुमार बेटी के साथ हुए नृशंस कांड और शंभु की रामनवमी के दिन शोभा यात्रा की घटनाओं से बहुत सच साबित होती है। आखिर आसिफा के पिता ने भी तो सहज ही उत्तर दिया कि वे कितनी ही बार बेटी को ढूंढ़ते हुए मंदिर के पास से निकले, लेकिन यह सोचकर कभी भीतर नहीं गए कि इस पवित्र स्थल पर उसे कोई क्यों लेकर जाएगा! दयानंद का कहना था कि धर्म का उद्देश्य है अहंकारों और सभी तरह की बुराइयों का आत्म विसर्जन। न कि लोगों को लूटना-खसोटना। उनका कहना था कि मंदिरों के निर्माण से बेहतर है कि अाप सुदूर आबादियों में लोगों के भले के लिए ऐसे विद्यालय खोलें, जहां से विवेकी बनने की शिक्षा मिले। सत्यार्थप्रकाश में एक जगह जब कोई सनातन धर्म के सबसे बड़े उदघोष गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु वाला श्लोक पढ़ता है तो वे कहते हैं : गुरु कोई ब्रह्मा-व्रह्मा नहीं होता। गुरु अगर कामी-क्रोधी हो तो उसे समझाना, दंड देना और फिर भी न माने और कामुकता दिखाए तो मृत्युदंड दिलवा देना चाहिए। क्योंकि गुरु एक संस्था है।

उनके लिए धर्म एक पाखंड मुक्त जीवन जीने की पद्धति है। समस्त संसार से प्रेम करने की एक प्रक्रिया। अपने झूठ और असत्य का परित्याग करने की और सत्य और आलोक को अपने भीतर समेट लेने की। वे ख्याति और मूर्तिस्थापना के बहुत विरोधी थे। इसलिए उन्होंने कहा था कि आप सब मेरे पदचिह्नों पर मत चलो। सच की तलाश करो और उसे आत्मसात करो। उनका कहना था कि जिस तरह बिना मनुष्य ज्ञानेंद्रियों का उपयोग किए बिना अंधेेरे और अविद्या का शिकार हो जाता है, उसी तरह धर्म के नाम पर मंदिर और मूर्तियां मनुष्य को अंधकार और अविद्या के मार्ग पर ले जाती हैं। उन्होंने अपनी मूर्ति या चित्र प्रकाशित करवाने के लिए भी वर्जनाएं की थी। वह बुरे लोगों और बुराइयों से अंतिम क्षण तक लड़े। काशी में पंडितों को चुनौती दी तो हरिद्वार में पाखंड खंडिनी गाड़ी। लोगों ने उन्हें बहुत चेताया, लेकिन उनका कहना था कि बुराइयों का विरोध करने में तनिक भी पीछे नहीं हटना चाहिए। एक भी इंच नहीं। वे अंतिम समय के अंतिम क्षण तक जीवंत बने रहे और मंदिरों-मठों और मूर्तियों को धर्म के विनाश और मानवता के पतन का कारण बताते रहे।

मैं अपने पिता के पास बैठकर अपने स्कूली दिनों में सोचा करता था कि दयानंद के विचार रात के अंधकार में बिजली की कौंध की तरह हैं और वे भारत को सभी तरह के धार्मिक पापों से मुक्ति दिला देंगे। वे मेरी कच्ची उम्र के दिन थे। मुझे उन दिनों आर्यसमाज मंदिरों में आते साधु और विभिन्न भजनोपदेशक ऐसे बांस के पेड़ लगते थे, जिनसे कुछ दिनों में बांसुरियां बनेंगी और वे चेतना और विवेक की स्वरलहरियों से भारत की धरती को ही नहीं, समूचे विश्व को गुंजायमान बना देंगी। मेरे मानस पटल पर चेतना का आलोक झिलमिलाने लगा था। मुझे लगता था कि अभी कुछ ही समय बाद इस देश के समस्त कोने विवेक से दमक उठेंगे और समस्त शिक्षित लोग अंधेरों से लड़ रहे होंगे। लेकिन अब जब सच का वह स्वप्न भंग हुआ है तो देखता हूं कि जिस साधु ने मंदिरों, मूर्तियाें और सांप्रदायिकता (हिन्दी में यह शब्द सबसे पहले दयानंद सरस्वती ने ही प्रयुक्त किया था) के खिलाफ एक मुहिम छेड़ी थी, उसी के वनोद्यान के बांस आज मूर्तियों, मंदिरों और सांप्रदायिकों के हाथों की कुल्हाड़ियों के दस्ते बने हुए हैं। वे अगर बांसुरियां बने होते तो शायद आज किसी आसिफा के साथ देश की सबसे पवित्र भूमि के मंदिर में ऐसा न केवल ऐसा नहीं होता। ऐसा करने वालों के समर्थकों का तो तत्काल ही शिरोच्छेन ही कर दिया जाता!



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