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  • स्त्री का शरीर व शरीर के अंग भड़काऊ नहीं होते, स्तन व योनि जैसे यौनांग भी नहीं

    सामाजिक यायावर

    शुचिता के नाम पर, संस्कार के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, शालीनता के नाम पर, सौंदर्य के नाम पर स्त्रियों के पहनावे आदि पर सवाल खड़े करना बहुत अधिक आम बात है। यहां तक कि बलात्कार, छेड़खानी व बदतमीजी आदि का ठीकरा भी स्त्री के पहनावे पर ही फोड़ दिया जाता है।

    बकवास, कुतर्क, मानसिक विकृति, वैचारिक विकृति व बेहूदगी के आवेश/आवेग में कहा कुछ भी जाए लेकिन यह एक तथ्य है कि यदि कोई पुरुष स्त्री को भोग्या के तौर पर नहीं देखता है तो उसके सामने यदि स्त्री निर्वस्त्र भी खड़ी है तो उस पुरुष में कामवासना का भाव नहीं आएगा। वह स्त्री के शरीर को एक साधारण वस्तु के रूप में सहजता से ही स्वीकारेगा।

    जब बचपन से ही लड़कों के अंदर लड़की को यौन रूप से पुरुष के द्वारा भोग्या और लड़कियों के अंदर खुद को यौन भोग्या माने जाने के रूप में जबरन ठूंस दिया जाता है। तो लड़के की मानसिक कंडीशनिंग लड़की को भोग्या के रूप में देखने की और लड़की की मानसिक कंडीशनिंग खुद को भोग्या के रूप में देखने की हो जाती है। बहुत गहरे अंदर अवचेतन में यह कंडीशनिंग पैठ बना लेती है और मन के भावों व विचारों को नियंत्रित करने लगती है।

    स्त्री के पहनावे आदि की बात की जाती है। किंतु जिनको स्त्री को भोग्या के रूप में देखना होता है वे पूरे कपड़े पहने स्त्री को भी ऐसे देखते हैं जैसे कि कपड़ों को भेदकर स्त्री का हर अंग देख लेगें और पकड़ कर भंभोड़ डालेंगें। इसको समझने के लिए के लिए बहुत बड़ी बहस की जरूरत नहीं है, सहजता से समझा जा सकता है। 

    स्त्री के स्तन जो ब्रा व ब्लाउज से ढके रहते हैं, ऊपर से पल्लू रहता है तब भी देखने वाला पुरुष ऐसे देखता है जैसे सबकुछ दिख रहा है। स्तनों को मसलने तक की कल्पनाएं कर लेता है। ब्रा, ब्लाउज व पल्लू आदि की बात छोड़िए। स्त्री यदि रजाई से ढकी भी लेटी हो और उसका कोई अंग न दिख रहा हो, केवल पुरुष को यह मालूम पड़ जाए कि रजाई के अंदर स्त्री है तब भी उसके सारे अंगों की कल्पना वैसे ही करेगा जैसे कि सामने देख रहा हो। सारे यौनांगों की कल्पनाएं कर डालेगा। स्त्री पैंटी पहने होगी, पैंटी के ऊपर सलवार या पैंट या साड़ी या लहंगा या कुछ और। लेकिन देखने वाला पुरुष स्त्री द्वारा पहने गए दो तीन परतों के कपड़ों को भेदकर भी योनि व चूतड़ों को देखने और भभोड़ने की कल्पना कर लेता है।

    यदि स्त्री के यौनांग पुरुष में कामुकता पैदा करते हैं तो एक नवजात बच्ची की योनि के द्वारा या एक बहुत वृद्ध महिला के अंग भी कामुकता पैदा करने चाहिए। किशोर व युवा उम्र की स्त्रियों के अंगों से कामुकता पैदा होती है ऐसा क्यों?

    यदि स्तन व योनियां पुरुष में कामुकता पैदा करती हैं तो गाय, भैंस, बिल्ली, बकरी, भेंड़, कुतिया, गदही, घोड़ी, हथिनी, ऊंटनी आदि पशुओं की मादाओं के पास भी स्तन व योनियां होती हैं और ये मादाएं बिना कपड़े पहने खुलेआम घूमती रहती हैं, तब पुरुषों में कामुकता क्यों नहीं पैदा होती है जबकि इन पशु-मादाओं की योनि की बाहरी बनावट लगभग मनुष्य स्त्री की योनि के जैसी होती है। 

    पुरुष अपनी बकरियों, भैंसों, गायों, भेड़ों, घोड़ी, गदही, ऊँटनी आदि को पशु पुरुष के पास गर्भाधान के लिए लेकर खुद जाता है, पशु उसके सामने ही यौन क्रिया करते हैं इसके बावजूद पुरुष के अंदर बकरी, भैंस, गाय, भेंड़, गदही, घोड़ी आदि से सेक्स करने की इच्छा क्यों नहीं पैदा होती है जबकि उसकी आंख के सामने ही पशु मादा की योनि में पशु पुरुष अपने शिश्न को प्रवेश कराता है, यौन क्रिया करते हुए योनि के अंदर वीर्यपात करता है।   

    मैं ऐसे कई आदिवासी समाजों से मिल चुका हूं जहां आज भी स्त्रियां अपने स्तनों को नहीं ढकती हैं। उन समाजों के पुरुषों के अंदर तो स्त्री के स्तन देखकर कामुकता या वासना नहीं पैदा होती है। आदिवासी समाज में बलात्कार नहीं होते हैं। आदिवासी समाज में छेड़खानी नहीं होती है। जबकि स्त्री तो अर्धनग्न रहती है। स्त्री पुरुष दोनो दारू पीते हैं। स्त्री अर्धनग्न, स्त्री पुरुष दोनो दारू के नशे में लेकिन फिर भी नहीं बहकते हैं, बलात्कार नहीं होते हैं, यौन छेड़खानी की बेहूदीगियां नहीं होती हैं। जो पुरुष स्त्री को भोग्या के रूप में न देखकर अपने ही जैसे मनुष्य के रूप में देखता है उसको क्या फर्क पड़ता है कि स्त्री ने कपड़े पहने हैं या नहीं पहने हैं।

    वास्तविक तथ्य तो यही है कि वासना मानसिक होती है। वासना किसी शारीरिक अंग के आकार प्रकार पर निर्भर नहीं होती है। दरअसल पुरुष के द्वारा स्वयं की वासना कामुकता के लिए स्त्री को गुलाम बनाने या प्रतिबंधित करने की जरूरत नहीं है। यदि जरूरत है तो खुद के अंदर स्त्री को अपने जैसा ही मनुष्य स्वीकारने की, स्त्री के स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकारने की।  

    स्त्री को यौन भोग्या के रूप में देखना, स्त्री शरीर के प्रति कामुक बने रहना मानसिक यौन विकृति है। वैसे ही जैसे मानसिक यौन विकृत पिता अपनी पुत्री व भाई अपनी बहन से संभोग करता है। हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं भले ही इन घटनाओं के सच को दबा दिया जाता हो।

    मैं तो कहता हूं कि जिन लोगों को यह लगता है कि स्त्री के अंग स्तन व योनि कामुकता बढ़ाते हैं उन लोगों को बकरी, कुतिया, घोड़ी, गदही, भेंड़, भैंस व गाय आदि के साथ भी यौन क्रिया करना चाहिए। योनि ही तो है क्या फर्क पड़ता है किस प्रजाति के जीव की है। सभी योनियां चमड़ी, नसों व धमनियों आदि से ही तो निर्मित होती है। 

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  • दिल्ली जिंदा लाशों का मरता हुआ जहरीला शहर है

    सामाजिक यायावर

    लगभग 11 वर्ष पूर्व सन् 2005 की बात है। मैं दिल्ली के बसंतकुंज इलाके में एक वैज्ञानिक मित्र के यहां अतिथि था। पास के बाजार में गया हुआ था। वहीं एक व्यापारी के यहां अचानक ही चर्चा शुरू हो गई, चर्चा को मोड़कर मैं पानी पर ले आया। मेरे अतिरिक्त चार-पांच लोग थे, सभी अमीर व पढ़े लिखे, करोड़ों का कारोबार करने वाले लोग।
     
    इन सबका कहना था कि सरकार कुछ नही करती। इनका मानना था कि पानी के समाधान के लिए धरती के अंदर खूब गहरे से पानी निकाल लाने वाली मशीनों का इंतजाम होना चाहिए। यदि ऐसी मशीने नहीं हैं तो ऐसी मशीने खोजी जाएं। वैज्ञानिक व इंजीनियर किसलिए हैं। तो यह थी इन लोगों की पानी के मुद्दे पर समझ।
    जबकि बहुत गांवों के गरीब व अनपढ़ लोग अपने छोटे छोटे प्रयासों से धरती के अंदर पानी की मात्रा बढ़ा रहे थे, पानी पैदा कर रहे थे।
     
    दिल्ली जो दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है। जहां पेड़ पौधे वैसे भी न के बराबर हैं। वहां के लोग हर साल पेड़ों को छटवाते हैं, डालें कटवाते हैं वह भी केवल इस बहाने से कि बिजली का तार गुजरता है।
     
    पेड़ों को काटने के इस संगठित काम को अंजाम देती है दिल्ली महानगरपालिकाएं। दिल्ली महानगरपालिकाएं हर साल पेड़ काटती व छाटती है। दिल्ली में तो ऐसे ऐसे लोग हैं कि यदि नगरपालिका उनके इलाके में पेड़ काटना भूल जाती है तो दबाव डाल कर पेड़ कटवाते हैं।
     
    मरते हुए शहर को आखिर कब तक देश की राजधानी के तौर पर घसीटा जा सकता है। बिना तैयारी के किए जाने वाले आड-इवेन जैसे अदूरदर्शी प्रचार टोटकों से किसी मुर्दा शहर को जीवित नहीं किया जा सकता है। तभी तो मरते हुए जहरीले शहर के लोग आड-इवेन के नियम की काट के तौर पर दो-तीन सप्ताहों में ही 60 हजार नईं कारों को खरीद लेते हैं।
     
    भारत की राजधानी आज नहीं तो कल दिल्ली से हटनी ही है। सवाल यह खड़ा होता है कि जिस दिन दिल्ली राजधानी नहीं रहेगी उस दिन दिल्ली का आदमी करेगा क्या, क्योंकि तब तो प्रापर्टी की कीमतें आसमान की जगह जमीन छू रही होगीं तब भी कोई लेने वाला न होगा। दिल्ली का अधिकतर आदमी तो दिल्ली के राजधानी होने के कारण आसमान छूती कीमतों की प्रापर्टी व राजधानी होने के सुविधाओं को ही खा रहा है।
     
    भारत की आजादी के समय दिल्ली में सैकड़ों वाटर बाडीज थीं। उफनाती यमुना नदी थी और जंगल थे। प्रापर्टी से पैसे बनाने के लालच में वाटरबाडीज व जंगलों को नष्ट करके कंक्रीट की बिल्डिंगें खड़ी कर दी गईं। और तो और जब कुछ नहीं बचा तो यमुना नदी को भी पाटना शुरू करके बिल्डिंगें बनानी शुृुरू कर दीं।
     
    सबसे बड़ा सवाल तो भारत देश के लोगों के लिए है जिनके खून पसीने की कमाई से देश की राजधानी चलती है, कि –
    क्या किसी सभ्य देश की राजधानी इतनी ही सड़ियल व जहरीली होनी चाहिए…….
     
     
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  • वर्तमान भारत में जाति का अंत करना ही असली समाजवाद

    सामाजिक यायावर

    मेरे पिता के एक ब्राह्मण मित्र ने चमार जाति की लड़की से शादी की। पति पत्नी दोनो लड़ते झगड़ते व प्रेम करते हुए संतानों को पालते पोषते एक दूसरे के साथ आर्थिक विपन्नता के बावजूद जीवन जीते आ रहे हैं। मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि उनमें से एक ब्राह्मण व एक चमार है, जबकि मैं लगभग एक वर्ष तक उन्हीं की गाय का दूध उनके घर से लाता रहा। आंटी जी गाय की देखभाल करती थीं और गाय को दुहतीं थीं। दूध का हिसाब किताब भी आंटी जी ही रखती थीं। अंकल जी तो फक्कड़ थे उनको पैसों का हिसाब किताब कभी समझ न आया। बहुत लोग उनको समाजवादी चूतिया कहते रहे, आज भी वही भाव रखते हैं भले ही मुंह से कहें नहीं। वर्षों बाद जब मैं बारहवीं कक्षा में पहुंचा तब अचानक किसी चर्चा के दौरान कुछ लोगों से यह बात मालूम हुई कि उनका विवाह अंतर्जातीय विवाह है।

    मेरे अपने असल जीवन में मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो ब्राह्मण या शूद्र जाति के हैं और उनका पति/पत्नी शूद्र या ब्राह्मण है। एक-आध अपवादों को छोड़कर उनमें से किसी ने बहुत गहरी साजिश या ऊंचे दर्जे की महानता के कारण शादी नहीं किया। जानपहचान हुई, प्रेम हुआ और माता पिता परिवार को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह को धरातल में उतार लाए। माता पिता को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह करना सहज घटना है, अपनी जाति में भी प्रेम विवाह करने पर भी ऐसा झेलना पड़ता है।

    मैं उन ब्राह्मणों को बहुत आदरणीय मानता हूं जिन्होंने अपनी शादी शूद्र के साथ की और उनके परिवार ने शूद्र को अपना दामाद या बहू स्वीकार किया। मैं उन शूद्रों को क्रांतिकारी मानता हूं जिन्होंने ब्राह्मणों से घृणा करने की बजाय उनको प्रेम करना सिखाया और पारिवारिक संबंधों की स्थापना की। ये भले ही छिटपुट घटनाएं हों लेकिन ये ही वे लोग हैं जो जाति का अंत करने जैसे महा-सामाजिक-आंदोलन के पथबंधु हैं।

    जाति का अंत घृणा, तिरस्कार, उपेक्षा, प्रतिक्रिया आदि से नहीं बल्कि प्रेम, सहजता व सौहार्द से ही हो सकता है। हम माने या न माने लेकिन यह कटु यथार्थ है कि जाति का अंत सहज व प्रेमपूर्ण अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों से ही हो सकता है।

    जो लोग यह दावा करते नहीं अघाते कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित दास व्यवस्था न होकर कर्म/व्यवसाय आधारित महान सामाजिक व्यवस्था थी। तो संस्कृति व महानता के ये दावेदार लोग अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों को क्यों नहीं पूरे जोरशोर से प्रोत्साहित व प्रयोजित नहीं करते हैं क्योंकि विज्ञान, उद्योग, लोकतंत्र व बाजार आदि ने तो कर्म/व्यवसाय के मायने व परिभाषाएं ही पूरी तरह से बदल दी हैं।

    समाज का विकास व सामाजिक समाधान समाज के लोगों के आपसी सौहार्द व प्रेम से ही संभव है। किसी सभ्य व विकसित समाज में जो बुरा था/है उसे ईमानदारी व खुले मन से स्वीकारते हुए समझदारी के साथ बुराई को तिलांजलि दे देना ही उचित रहता है।

    जाति व्यवस्था ने जितना नुकसान किया है उसका हिसाब किताब किया जाए तो हजारों वर्षों तक सरकारी व प्राइवेट नौकरियों व हर स्तर के शैक्षणिक संस्थानों में 70% से अधिक आरक्षण भी कम पड़ जाएगा। लेकिन यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आपस में प्रेम व सहज भाव से वैवाहिक संबंध स्थापित करने लगे तो अगली पीढ़ी से ही जाति का अंत दिखना शुरू हो जाएगा।

    हम जाति नहीं मानते हैं जैसे फर्जी बातों व नारों से जाति का अंत कभी नहीं होगा, उल्टे अंदर की टीस व प्रतिक्रिया और बढ़ती जाएगी। समाज किसी भी राजनैतिक दल, धर्म व सरकार आदि से बहुत बहुत अधिक बड़ा होता है। जाति का अंत किसी धर्म, राजनैतिक दल या सरकार के बूते की बात नहीं। जाति का अंत करने का निर्णय समाज को लेना चाहिए और आज नहीं तो कल लेना पड़ेगा ही।

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  • देव भूमि उत्तराखण्ड में नववर्ष चैत्र नवरात्र साधना

    सर्वदलीय गौरक्षा मंच

    सर्वदलीय गौरक्षा मंच के राष्ट्रिय अध्यक्ष ठाकुर जयपाल सिंह ”नयाल सनातनी” ने आज प्रेस विज्ञप्ति में बताया की देव भूमि उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिल्ले में पहली बार भव्य राम लीला, कृष्ण लीला का मंचन वृन्दावन के रासलीला मण्डली द्वारा 8 अप्रेल चैत्र नवरात्र प्रतिपदा से 16 अप्रेल 2016 महा दश्मी तक होगा। जिसमे ब्रह्मचारी संत श्री ज्ञानानन्द जी महाराज व्यास पीठ पर विराजमान होकर भगवती माता एवं गौ माता की मानव को  मुक्त कर देने वाली दिव्य कतः का रसपान कराएँगे। संत श्री ज्ञानानन्द जी महाराज लगभग 14 वर्ष तक पथमेड़ा में स्वामी दत्त शरणानन्द जी महाराज के महान गौ कार्य में अपनी सेवा दिए है, अब हल्दी घाटी की पुण्य भुमि ”श्रीनाथद्वारा ” मे एक कुटीया बना कर तपश्या रत हैं। सिर्फ भगवती जगतजननी गौमाता और श्रीमद भागवत की कथा हेतु ही बहार निकलते है।

    सनद रहे श्रीनाथद्वारा पुष्टिमार्गीय वैष्‍णव सम्‍प्रदाय की प्रधान (प्रमुख) पीठ है। इस 9 दिवसीय देव कार्य में हल्द्वानी नैनीताल स्थित कार्यकर्म की मुख्य प्रायोजक ‘श्री गिरधर गोपाल गौशाला समिति’ अल्मोड़ा जिल्ले में भी एक नये गौशाला का भूमि पूजन ( शिलान्यास ) वरिष्ठ संतों के पावन सानिंध्य में रखा गया है। जिसमे देश भर के अनेक संतों का आगमन सुनिश्चित है।  नित्य ही 9 दिनों तक यज्ञं-हवन, रुद्रा अभिषेक और संतों के आशीष वचनों का कार्यकर्म भी है। इस पूरे देव कार्य का आयोजन स्थानीय 14 गावों की समिति ‘देव भूमि उत्तराखण्ड रामलीला कमेटी’ है। इस अवसर पर भव्य गौ-जनजागरण यात्रा, कलश यात्रा एवं नित्य भव्य झांकी का आयोजन भी है। कथा की पूर्णाहुति के अगले दिन से 3 दिवसीय देव भूमि के 5 शक्ति पीठो के दर्शन, सरयू तट पर श्री बागेश्वर नाथ के दर्शन, जमीन के निचे पाताल भुवनेशवर के दिव्य दर्शन, कौशानी से नगाधिराज के दर्शन ,गरुड़,बैजनाथ,एवं ज्योतिर्लिंग जागेश्वर नाथ के दर्शन पूजन भी मुख्य है।

     इस कार्यकर्म हेतु स्थानीय रामलीला कमेटी एवं मुख्य संयोजक ठाकुर जयपाल सिंह ”नयाल सनातनी” ने देश भर के गौ-गोपाल प्रेमियों को एक बार सेवा का अवसर देने की प्रार्थना की है।

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  • आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया

    Shayak Alok

    पढ़ते पढ़ते ही मैंने पाया कि मेरे प्रिय कई लेखक वगैरह अपने समकालीन दूसरे लेखकों-समीक्षकों-इतर साहित्यिकों को लेकर एक पूर्वग्रह-आक्रामक भाव में भी रहते हैं. कई बार वे मुखर उन्हें कोसते पीटते भी नजर आते हैं. मैंने पाया कि यह लक्षण मुझमें भी है. आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया.

    1.

    समीक्षाओं आलोचनाओं से नहीं
    न ही अफवाहों से
    उस झूठ से भी नहीं जो तुम्हारे चेहरे को सफ़ेद करता है
    न व्यंग्य के कहकहों से
    मुझे शापित करती तुम्हारी आहों कराहों से
    न ही गालियाँ बकने .. धमकाने से
    न पीठ पर
    चाक़ू खंजर चलाने से
    दाखिल खारिज के खेल से भी नहीं
    तुम्हें मारना हो अगर मुझे
    मुझे तुम्हारे जैसा बना दो.

    2.

    मूर्ख पाठकों
    और पूर्वाग्रही कवि मित्रों
    को
    रखो दो किनारों पर
    और तौलो
    बराबर की माप
    ‘क्या कहते हैं कि संतुलन’
    दो चार कविताओं को
    इधर उधर रख देने से आ जाएगा.

    3.

    मेरे लिखे शब्द
    जब मुझे ही भ्रमित करते हैं
    तब मेरा एक सींग निकल आता
    है
    इन्हीं मान्यताओं व शर्तों
    पर
    मैंने कुछ कवियों में एक
    पूंछ को निकलते देखा है.

    4.

    मेरे वैचारिक
    खूंटे से बंधी है मेरे समय की बकरी
    जबकि उनके उनके हाथ
    उनके समय के भेड़ियों की पीठ
    सहलाते हुए
    वे मरेंगे, भेड़िये मरेंगे या फिर बकरी.

    5.

    कवि,
    वे पहले
    तुम्हें अनदेखा करेंगे
    वे फिर
    तुम्हें सहलायेंगे .. शब्दों से बहलाएँगे
    वे फिर तुम्हारी हाड़ मांस की कविताओं को चबायेंगे
    अपने मुंह के खून तुम्हारी आस्तीन में छुपायेंगे
    कवि, वे फिर तुमपर आरोप लगायेंगे
    बहाने में कविता को कवि से बचायेंगे
    सियारों की सियासत में
    लोमड़ियों से भी सावधान रहना कवि
    वक़्त की अदालत में इन सबके खाल उघाड़े जायेंगे ..

  • क्या सच में ही भारतीय समाज में कर्म को महान मान कर जिया जाता है ….

    सामाजिक यायावर

    जब मैं बालक था तब मुझे रटाया गया कि कर्म ही पूजा है, कर्म ही प्रधान है, कर्म ही ईश्वर है। खूब किस्से कहानियां सुनाए गए, नैतिक शिक्षा में रटाया गया। जब स्वतंत्र चिंतन शुरू किया तो पाया कि भारतीय सामाजिक ढांचे में कर्म का तो कोई महत्व ही नही है, उल्टा कर्म तिरस्कारित है। सबसे महत्वपूर्ण तो जाति है। जो जाति जितना अधिक कर्मशील है वह उतना ही नीच मानी जाती है, वह उतना ही अधिक अछूत है। आधुनिक काल में भी यही दिखाई दिया कि जो जितना अधिक कर्म करता है वह उतना ही अधिक शोषित है।

    लगभग 17 साल पहले रात में 9 से 12 का मूवी शो देखने जा रहा था। मिथुन चक्रवर्ती की कोई मूवी थी। जिस रिक्शे में मैं बैठा था उसको एक किशोर चला रहा था। उससे यूं ही कर्म पर बातचीत शुरू हो गई। वह बोला कि कर्म ही पूजा है, कर्म ही ईश्वर है। 

    मैंने कहा कि आपके पिता क्या करते थे, बोला कि वे पूरा जीवन रिक्शा चलाते रहे। मैंने पूछा कि रिक्शा चलाना कर्म है कि नहीं, बोला बहुत ज्यादा कर्म है। मैंने कहा कि आपके पिता पूरा जीवन कर्म किए, आप कर्म कर रहे हैं आपके पिता ने किसी का शोषण नहीं किया होगा, आप भी शोषण नहीं करते होगें। फिर भी आपका जीवन कष्ट से भरा है। 

    आपको तो बड़े व प्रतिष्ठित मंदिरों में  घंटों लाईन में धक्के खाते हुए भगवान की मूर्ति के दर्शन दूर से होते होगें जबकि बड़े व्यापारी को, बड़े नेता को, बड़े नौककशाह को, पुजारी को मंदिर में विशिष्ट व्यवस्था दी जाती है। जबकि कर्म को ईश्वर कहा गया है, इसलिए आपको विशिष्ट माना जाना चाहिए।  

    मैंने कहा कि एक नौकरशाह ने केवल कुछ किताबें रटकर किसी परीक्षा में कुछ अंक लाकर इतना बड़ा कर्म कर लिया कि उसको पूरा जीवन कुछ भी करने की जरूरत नहीं, आजीवन मौज ही मौज। यहां तक कि उसके पति/पत्नी व बच्चों को भी कोई कर्म करने की जरूरत नहीं। सबकी मौज और खूब मौज। 

    किताब रटना कर्म हो गया इतना बड़ा व महान कर्म हो गया कि केवल साल दो साल कुछ किताबें रट लीं और आजीवन की मौज, दूसरों का शोषण करने का अधिकार, दूसरों की मेहनत पर कानूनी हक भी मिल गया। जबकि रात दिन हाड़तोड़ मेहनत करना कर्म नहीं हुआ। बाप हाड़तोड़ मेहनत करता रहा, बेटा भी करता रह गया। फिर भी आजीवन शोषण, तिरस्कार व दुत्कार। वह भी उस समाज में जहां सबको रटाया जाता है कि कर्म ही पूजा है, कर्म ही ईश्वर है।

    मैंने पूछा कि टैक्सी खरीदने वाला अधिक कर्म करता है या टैक्सी को रात दिन चलाने वाला ड्राईवर। जवाब आया ड्राईवर, मैंने पूछा कि तब ड्राईवर टैक्सी के साथ मुफ्त क्यों मिलता है और पूरा लाभ बिना कर्म किए ही टैक्सी खरीदने वाले के पास क्यों जाता है और ड्राईवर को उसी के द्वारा कमाई गई रकम में से बहुत ही कम रकम वेतन के रूप में साथ में गाली गलौच व तिरस्कार बोनस में मिलता है।

    ऐसे ही उदाहरण भरे पड़े हैं। रिक्शावाला किशोर बोला कि क्या कर्म से कुछ नहीं होता। मैने पूछा कि अमीर अधिक कर्म करता है कि गरीब, जवाब आया कि गरीब अधिक कर्म करता है। पूछा कि अमीर का बच्चा अधिक कर्म करता है कि गरीब का बच्चा, जवाब आया कि अमीर का बच्चा को कोई काम न करना पड़े यही तो अमीरी है। 

    मैंने कहा कि इन सब असल जीवन के लाखों जीवंत उदाहरणों से क्या संदेश मिलता है। किशोर बोला कि यह संदेश मिलता है कि गरीब अधिक कर्मशील है और अमीर बहुत ही कम कर्मशील है। मैंने उससे कहा कि हर बात को रटने के पहले उसको वास्तविकता में तौल कर देखिए। नहीं तो हजारों सालों तक पिता व पुत्र रिक्शा ही चलाता रहेगा और तिरस्कारित व शोषित भी होता रहेगा। 

    मैंने कहा कि भारत सिर्फ कर्म की महानता का नारा लगाने का ढोंग करता है जबकि कर्म को बेइंतहा तिरस्कारित करने की परंपरा चलती आई है। जरूरत है कि कर्म को नारेबाजी से इतर वास्तव में प्रतिष्ठित किए जाने की। कर्म को यदि भारतीय समाज सच में ही महान मानता और तिरस्कारित नहीं करता होता तो इस समाज में न जाति होती, न दहेज और न ही हर स्तर पर भ्रष्टाचार। 

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  • बच्चे को स्वावलंबिता पैदा होने के दिन से सिखाई जाती है

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    मैं, जोनाथन और मेरी जीवन साथी

     

     

     

     

     

     

     

    मैं सोफे पर पसरा पड़ा हुआ था, कहीं जाने का मन नहीं था, कुछ देर आराम करने का मन था। जोनाथन जो मेरी साली साहिबा के पुत्र हैं मेरे पास मेरा एक चप्पल लेकर आए फिर दूसरा लेकर आए। फिर मेरी उंगली पकड़ते हैं और बच्चों के खेलने के लिए बने पार्क में चलने के लिए खींचते हैं।

    एक डेढ़ वर्ष का शिशु जो ठीक से बोलना नहीं जानता है, उसने इतने प्यार से सेवा करते हुए साथ चलने के लिए आमंत्रित किया तो अस्वीकार करना संभव न हो पाया। छोटे से शिशु का सहज भाव से बिना शब्दों के संवाद करना आनंदित कर गया।

    जोनाथन अभी जनवरी महीने में कुछ दिन पहले ही डेढ़ वर्ष की आयु के हुए हैं। इनके माता पिता का घर समुद्र के बहुत निकट है, इसलिए इनके क्षेत्र में सड़कों पर ढाल व चढ़ाई हैं। जोनाथन ढाल व चढा़ई पर भरपूर दबंगई से उतरते व चढ़ते हैं। रास्ते में चलते हुए फूल, पत्ती, कार आदि के बारे में उंगली से दिखते हुए अपनी भाषा में जानकारी देने का काम करते हुए चलते हैं। कहीं कुत्ता व बिल्ली दिख गए तो कुछ देर तक वहीं खड़े रहते हैं ताकि उनसे मित्रता का कोई जुगाड़ जम सके। फिर आगे बढ़ लेते हैं। इनके चलने की शैली फोटो में देखी जा सकती है। अभी इनका मन है तो उंगली पकड़े हैं नहीं तो जनाब उंगली भी नहीं पकड़ते हैं और ढाल व चढ़ाई पर उतरते व चढ़ते हैं।

  • जाति-व्यवस्था और राजनीति

    “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”
    साभार- सामाजिक यायावर की किताब (पृष्ठ संख्या 260-261)
    www.books.groundreportindia.org

    हमें एक बात समझने का प्रयास करना होगा कि भारत में लोकतंत्र ठीक से स्थापित हो पाता, इसके पहले ही लोकतंत्र को भारत के लोगों ने ही उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। शोषक जातियों ने राजतंत्र व कबीलातंत्र खत्म होते ही आजादी के बाद भरपेट मलाई खाने में खुद को व्यस्त किया और भ्रष्टाचार की शुरुआत करके उसे नए आयाम, नयी दिशायें व नयी ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया।  यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो भारत में भ्रष्टाचार की उत्पत्ति नहीं होती।  जाति-व्यवस्था के कारण परंपरा में ही शोषण करना और शोषितों के पुरुषार्थ का हक येनकेन प्रकारेण अपने पास ही रखना, सिखाया गया। यही सामाजिक अनुकूलन 1947 की राजनैतिक आजादी के बाद भ्रष्टाचार का प्रमुख आधारभूत कारक बना। राजनैतिक आजादी के बाद संवैधानिक-आरक्षण मिलने के कारण शोषित जातियाँ हजारों सालों के लगातार भीषण व घिनौने शोषण के बाद पहली बार, खुद को कुछ कुछ मनुष्य जैसा समझने के युगांतर नशे में कई दशक तक जीतीं रहीं। तब तक शोषक जातियों ने राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक व शैक्षणिक सत्ता की खूब मलाई खायी, खूब भ्रष्टाचार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास लगातार कमजोर हुआ।

    समय के साथ जब शोषित जातियाँ खुद को कुछ कुछ मनुष्य समझने के युगांतर नशे से बाहर आयीं। तो उन्होंने राजनैतिक सत्ता में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरू की और संख्याबल के कारण धीरे-धीरे शोषित जातियाँ राजनैतिक सत्ता प्राप्ति का आधार बनती गयीं। जब तक शोषित जातियाँ शोषक जातियों के लिए  राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति में पिछलग्गू रहीं, तब तक शोषक जातियों को असुविधा नहीं हुई।  उनको समाज में, देश में, व्यवस्था तंत्र आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं दिखा, या यूं कहा जाए कि भयंकर रूप से हो रहे भ्रष्टाचार को देखने की आवश्यकता नहीं लगी।

    1947 की राजनैतिक आजादी के बाद, शोषक जातियों ने शोषित जातियों को अपना पारंपरिक दास मानते हुए उनको राजनैतिक सत्ता से दूर रखा।  संवैधानिक आरक्षण के कारण जब शोषित जातियों के लोग सरकारी तंत्र में प्रवेश करने लगे और राजनैतिक सत्ता के महत्व को समझने लगे तब शोषक जातियों ने शोषित जातियों को बरगला कर अपना पिछलग्गू बनाकर राजनैतिक सत्ता की मलाई का भोग किया। किंतु समय के साथ-साथ ज्यों ज्यों राजनैतिक समझ आने के कारण जब शोषित जातियों ने अपनी राजनैतिक ताकत पहचान कर राजनैतिक सत्ताओं में अपनी सीधी व स्पष्ट दावेदारी पेश करनी शुरु की;  त्यों त्यों शोषक जातियों को व्यवस्था तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। शोषक जातियों को देश में सामाजिक परिवर्तन और ईमानदारी की आवश्यकता भीषण रूप से महसूस होने लग गयी और समय के साथ राजनैतिक व सामाजिक क्रांति की भीषण आवश्यकता की बातें होने लगीं। 

    शोषक जातियों को जाति-व्यवस्था नासूर व सडांध लगने लगी और जातिविहीन समाज की आवश्यकता दिखाई पड़ने लगी। सामाजिक परिवर्तन की लंबी लंबी बातों की आवश्यकता पड़ने लगी। जब तक शोषक जातियाँ आजाद भारत में राजनैतिक सत्ता की मलाई खातीं रहीं;  तब तक उन्हें भारतीय व्यवस्था तंत्रों में हजारों वर्षों से गहरे से व्याप्त न तो भ्रष्टाचार दिखा और न ही भारत की 1947 की राजनैतिक आजादी झूठी लगी।  किंतु ज्यों ज्यों शोषित जातियों ने राजनैतिक सत्ताओं में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरु की और मलाई में अपने हिस्से की दावेदारी पेश करनी शुरू की;  शोषक जातियों को भारत की आजादी झूठी लगने लगी और तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ और इन्हीं के ही इर्द-गिर्द घूमने वाले तत्वों आदि की लिखापढ़ी वाली तथाकथित ईमानदारी तक जबरन लोगों के दिलो दिमाग को संकुचित कर दिया गया।  जबकि भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ आदि तत्वों जैसे अति-संकुचित दायरे में रखकर बिलकुल भी नहीं समझा जा सकता।  न ही इन तत्वों की शुद्धता के ढकोसलों से सामाजिक परिवर्तन ही किया जा सकता है और न ही इन ढकोसलों से भ्रष्टाचार ही समाप्त किया जा सकता है।

    भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनाने या लागू करने से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलाने से या धरना करने से भ्रष्टाचार नहीं खतम होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज की विशेषाधिकृत जातियों का लगभग हर आदमी करप्ट है, और इस आदमी को भ्रष्ट बनाया “जाति-व्यवस्था” ने। भारतीय समाज में व्याप्त कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरियों में एक तत्व यह भी है, कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है;  और अधिकतर “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” को स्थापित व महिमामंडित करने पर ही आधारित है। इसीलिए समाज की मानसिकता को मनचाही दिशा में अनुकूलित करने के लिए कोई भी तर्क व परिभाषाएं तामझाम करके स्थापित की जा सकती हैं।  इसी चरित्र ने भ्रष्टाचार को संकुचित करने वाली परिभाषाएं गढ़ने में सरलता प्रदान की। जाति-व्यवस्था ही भारत में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार की मूलभूत जनक है और जाति-व्यवस्था सबसे हिंसक सामाजिक-तानाशाही है – यह समझने व स्वीकारने का भ्रूण भी नहीं उत्पन्न होने दिया और भ्रष्टाचार की प्रायोजित संकुचित परिभाषा में ही जड़ कर रख दिया।

    सामाजिक जड़ता भारतीय समाज का मूलभूत चरित्र है।  बहुत लोगों को एक बहुत बड़ी गलतफहमी रहती है कि भारत में तंत्र सफल है या सफल जैसा कुछ है, तभी आजादी के बाद इतने दशकों के बाद भी तंत्र चल रहा है और समाज की स्वीकार्यता के साथ चल रहा है।

    जो जैसा प्रायोजित हो गया उसका वैसे ही बिना प्रासंगिकता मूल्यांकन के चलते जाना, तंत्र के प्रति समाज की स्वीकार्यता न होकर वास्तव में सामाजिक जड़ता होती है। यह सामाजिक जड़ता वाला चरित्र हजारों सालों की वीभत्स व विद्रूप जाति-व्यवस्था का उत्पाद है, जिसमें जन्म-आधारित तिरस्कारों, शोषणों व दासता को दैवीय दंड-विधान मानकर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है। या जन्म-आधारित व्यवस्था के आधार पर स्वयं का दूसरों से श्रेष्ठ, पूजनीय व गौरवशाली होना दैवीय पुरस्कार मान कर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है।

    जाति-व्यवस्था से मुक्त होते ही भारतीय समाज के शोषक व शोषित दोनों ही प्रकार के वर्गों की जातियों में चारित्रिक व गुणात्मक परिवर्तन हो जायेगा। भारत, भारत के लोग व भारतीय समाज सभी वास्तव में स्वतंत्र होगें और खुली हवा में सांस ले पायेंगें। जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना भारत में कभी भी चारित्रिक बदलाव नहीं किया जा सकता है। यदि कोई जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना, भारत में सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक समाधान व विकास की बात करता है तो वह या तो नासमझ है या सामाजिक धोखा देता है, क्योंकि यह बिलकुल ही असंभव है।

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  • जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के विद्रूप स्तर तक पहुंचाया है

    सामाजिक यायावर

    सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के विद्रूप स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक जातियों के लोग अपने विद्रूप अहंकारों और स्व-केंद्रित-स्वार्थ को जीवन का परम-लक्ष्य मानने के कारण, अब भी यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय समाज भीषण रूप से जड़ हो चुका है, सड़ांध से भरपूर है। और इस सड़ांध के पराकाष्ठा तक पहुंचाने और समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, मूल्यों व भावों को जड़ करने व जड़ता में ही बनाए रखने में केवल और केवल जाति-व्यवस्था की परम्परा का ही हाथ रहा है।

    शोषक जातियों को बिना वास्तविक पुरुषार्थ के ही उपलब्ध समस्त विलासिताओं को भोगने की बड़ी भयंकर लिप्सा हमेशा से रही है और आज भी है। और इसी लिप्सा-भोग प्राप्ति के लिए  किए जाने वाले विभिन्न प्रायोजनों को हम सामाजिक परिवर्तन, समाज निर्माण व देश का विकास आदि के लुभावने नामों से प्रायोजित करते आए हैं। यह लिप्सा ही सामाजिक आरक्षण अर्थात् जाति-व्यवस्था का मूलभूत कारण रही और आज भी हमारे समाज की जड़ता के मूलभूत कारकों में से है।

    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक मानने वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील मानने वाले लोगों में, जो शोषक जातियों के हैं, अपने स्वार्थ की लिप्सा व जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिए  घृणा का भाव रखते हैं, क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करने लगा है और शोषक जातियों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करने लगा है।

    बिना सामाजिक ईमानदारी के “जाति-व्यवस्था” का पत्ता भी नहीं हिलने वाला। शोषक जातियों की ओर से जब भी जाति-व्यवस्था के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- “ संवैधानिक-आरक्षण “ और “ जाति-व्यवस्था की राजनीति “।  दोनों ही मुद्दे शक्ति व सत्ता प्राप्त करने के अवयव हैं।

    यदि शोषक जातियाँ सच में ही सामाजिक ईमानदार होतीं और जाति-व्यवस्था को खतम करने के लिए थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करतीं तो जाति-व्यवस्था कब की खतम हो गई होती।  शोषक जातियों को केवल अपने अंदर से जाति-व्यवस्था की भावना वास्तव में खतम करनी है। इसके लिए बिना ढोंग के जीवंत रूप में जाति-व्यवस्था की भावना को गहरे से खींचकर खतम करने की जरूरत है। जो ईमानदार व मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने अंदर गहरे जमी हुई घृणा व जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता के छुपे हुए अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालने से ही संभव है।

    जाति-व्यवस्था लोगों के मन में बहुत गहरे स्थापित है जो शाब्दिक भाषणों, परिभाषाओं, लिखावटों आदि से खतम नहीं होगी।  जाति-व्यवस्था का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ ईमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है। यह समाधान ही नए समाज, नए देश व नए सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर व वास्तविक होगें और बिना कपट व धूर्तता के होगें।

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  • रोहित वेमुला को मेरी श्रद्धांजलि – आखिर कितनी मौतों के बाद हम सामाजिक संवेदनशील व ईमानदार होगें

    सामाजिक यायावर

    तब तक हम जाति के घिनौनेपन से नहीं लड़ सकते हैं और परंपरा में अगली पीढ़ियों के बच्चों की हत्याओं या आत्महत्याओं द्वारा समाज की विभूतियों को खोते रहेंगें। शाब्दिक, तात्कालिक व क्षणिक भावुकता से कुछ देर के लिए अपने बच्चों की हत्याओं व आत्महत्याओं पर आंसू बहा देने भर से कोई समाधान नहीं होने वाला। वास्तव में जाति-व्यवस्था ही हमारे समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है।

    जब तक हम यह बिना किसी लाग लपेट के यह नहीं मानेंगें कि भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी और है। क्योंकि परंपरागत ऐसी घिनौनी गुलामी जिसमें गुलाम स्वतः ही अपनी पैदाइश से ही अपने ही माता-पिता, अभिभावकों व रिश्तेदारों द्वारा मानसिक रूप से स्वयं को गुलाम मानने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। कभी भी किसी भी परिस्थिति में कर्म आधारित व्यवस्था हो ही नहीं सकती है। कोई भी बेहतर सामाजिक व्यवस्था बिना स्वयं उस व्यवस्था में ही निहित घिनौने बीजों के जाति व्यवस्था जैसी जन्म घिनौनी व धूर्त सामाजिक व्यवस्था की परिणति तक पहुंच ही नहीं सकती।

    भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए, हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है।

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