दिल्ली जिंदा लाशों का मरता हुआ जहरीला शहर है

सामाजिक यायावर

लगभग 11 वर्ष पूर्व सन् 2005 की बात है। मैं दिल्ली के बसंतकुंज इलाके में एक वैज्ञानिक मित्र के यहां अतिथि था। पास के बाजार में गया हुआ था। वहीं एक व्यापारी के यहां अचानक ही चर्चा शुरू हो गई, चर्चा को मोड़कर मैं पानी पर ले आया। मेरे अतिरिक्त चार-पांच लोग थे, सभी अमीर व पढ़े लिखे, करोड़ों का कारोबार करने वाले लोग।
 
इन सबका कहना था कि सरकार कुछ नही करती। इनका मानना था कि पानी के समाधान के लिए धरती के अंदर खूब गहरे से पानी निकाल लाने वाली मशीनों का इंतजाम होना चाहिए। यदि ऐसी मशीने नहीं हैं तो ऐसी मशीने खोजी जाएं। वैज्ञानिक व इंजीनियर किसलिए हैं। तो यह थी इन लोगों की पानी के मुद्दे पर समझ।
जबकि बहुत गांवों के गरीब व अनपढ़ लोग अपने छोटे छोटे प्रयासों से धरती के अंदर पानी की मात्रा बढ़ा रहे थे, पानी पैदा कर रहे थे।
 
दिल्ली जो दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है। जहां पेड़ पौधे वैसे भी न के बराबर हैं। वहां के लोग हर साल पेड़ों को छटवाते हैं, डालें कटवाते हैं वह भी केवल इस बहाने से कि बिजली का तार गुजरता है।
 
पेड़ों को काटने के इस संगठित काम को अंजाम देती है दिल्ली महानगरपालिकाएं। दिल्ली महानगरपालिकाएं हर साल पेड़ काटती व छाटती है। दिल्ली में तो ऐसे ऐसे लोग हैं कि यदि नगरपालिका उनके इलाके में पेड़ काटना भूल जाती है तो दबाव डाल कर पेड़ कटवाते हैं।
 
मरते हुए शहर को आखिर कब तक देश की राजधानी के तौर पर घसीटा जा सकता है। बिना तैयारी के किए जाने वाले आड-इवेन जैसे अदूरदर्शी प्रचार टोटकों से किसी मुर्दा शहर को जीवित नहीं किया जा सकता है। तभी तो मरते हुए जहरीले शहर के लोग आड-इवेन के नियम की काट के तौर पर दो-तीन सप्ताहों में ही 60 हजार नईं कारों को खरीद लेते हैं।
 
भारत की राजधानी आज नहीं तो कल दिल्ली से हटनी ही है। सवाल यह खड़ा होता है कि जिस दिन दिल्ली राजधानी नहीं रहेगी उस दिन दिल्ली का आदमी करेगा क्या, क्योंकि तब तो प्रापर्टी की कीमतें आसमान की जगह जमीन छू रही होगीं तब भी कोई लेने वाला न होगा। दिल्ली का अधिकतर आदमी तो दिल्ली के राजधानी होने के कारण आसमान छूती कीमतों की प्रापर्टी व राजधानी होने के सुविधाओं को ही खा रहा है।
 
भारत की आजादी के समय दिल्ली में सैकड़ों वाटर बाडीज थीं। उफनाती यमुना नदी थी और जंगल थे। प्रापर्टी से पैसे बनाने के लालच में वाटरबाडीज व जंगलों को नष्ट करके कंक्रीट की बिल्डिंगें खड़ी कर दी गईं। और तो और जब कुछ नहीं बचा तो यमुना नदी को भी पाटना शुरू करके बिल्डिंगें बनानी शुृुरू कर दीं।
 
सबसे बड़ा सवाल तो भारत देश के लोगों के लिए है जिनके खून पसीने की कमाई से देश की राजधानी चलती है, कि –
क्या किसी सभ्य देश की राजधानी इतनी ही सड़ियल व जहरीली होनी चाहिए…….
 
 
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