वर्तमान भारत में जाति का अंत करना ही असली समाजवाद

सामाजिक यायावर

मेरे पिता के एक ब्राह्मण मित्र ने चमार जाति की लड़की से शादी की। पति पत्नी दोनो लड़ते झगड़ते व प्रेम करते हुए संतानों को पालते पोषते एक दूसरे के साथ आर्थिक विपन्नता के बावजूद जीवन जीते आ रहे हैं। मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि उनमें से एक ब्राह्मण व एक चमार है, जबकि मैं लगभग एक वर्ष तक उन्हीं की गाय का दूध उनके घर से लाता रहा। आंटी जी गाय की देखभाल करती थीं और गाय को दुहतीं थीं। दूध का हिसाब किताब भी आंटी जी ही रखती थीं। अंकल जी तो फक्कड़ थे उनको पैसों का हिसाब किताब कभी समझ न आया। बहुत लोग उनको समाजवादी चूतिया कहते रहे, आज भी वही भाव रखते हैं भले ही मुंह से कहें नहीं। वर्षों बाद जब मैं बारहवीं कक्षा में पहुंचा तब अचानक किसी चर्चा के दौरान कुछ लोगों से यह बात मालूम हुई कि उनका विवाह अंतर्जातीय विवाह है।

मेरे अपने असल जीवन में मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो ब्राह्मण या शूद्र जाति के हैं और उनका पति/पत्नी शूद्र या ब्राह्मण है। एक-आध अपवादों को छोड़कर उनमें से किसी ने बहुत गहरी साजिश या ऊंचे दर्जे की महानता के कारण शादी नहीं किया। जानपहचान हुई, प्रेम हुआ और माता पिता परिवार को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह को धरातल में उतार लाए। माता पिता को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह करना सहज घटना है, अपनी जाति में भी प्रेम विवाह करने पर भी ऐसा झेलना पड़ता है।

मैं उन ब्राह्मणों को बहुत आदरणीय मानता हूं जिन्होंने अपनी शादी शूद्र के साथ की और उनके परिवार ने शूद्र को अपना दामाद या बहू स्वीकार किया। मैं उन शूद्रों को क्रांतिकारी मानता हूं जिन्होंने ब्राह्मणों से घृणा करने की बजाय उनको प्रेम करना सिखाया और पारिवारिक संबंधों की स्थापना की। ये भले ही छिटपुट घटनाएं हों लेकिन ये ही वे लोग हैं जो जाति का अंत करने जैसे महा-सामाजिक-आंदोलन के पथबंधु हैं।

जाति का अंत घृणा, तिरस्कार, उपेक्षा, प्रतिक्रिया आदि से नहीं बल्कि प्रेम, सहजता व सौहार्द से ही हो सकता है। हम माने या न माने लेकिन यह कटु यथार्थ है कि जाति का अंत सहज व प्रेमपूर्ण अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों से ही हो सकता है।

जो लोग यह दावा करते नहीं अघाते कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित दास व्यवस्था न होकर कर्म/व्यवसाय आधारित महान सामाजिक व्यवस्था थी। तो संस्कृति व महानता के ये दावेदार लोग अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों को क्यों नहीं पूरे जोरशोर से प्रोत्साहित व प्रयोजित नहीं करते हैं क्योंकि विज्ञान, उद्योग, लोकतंत्र व बाजार आदि ने तो कर्म/व्यवसाय के मायने व परिभाषाएं ही पूरी तरह से बदल दी हैं।

समाज का विकास व सामाजिक समाधान समाज के लोगों के आपसी सौहार्द व प्रेम से ही संभव है। किसी सभ्य व विकसित समाज में जो बुरा था/है उसे ईमानदारी व खुले मन से स्वीकारते हुए समझदारी के साथ बुराई को तिलांजलि दे देना ही उचित रहता है।

जाति व्यवस्था ने जितना नुकसान किया है उसका हिसाब किताब किया जाए तो हजारों वर्षों तक सरकारी व प्राइवेट नौकरियों व हर स्तर के शैक्षणिक संस्थानों में 70% से अधिक आरक्षण भी कम पड़ जाएगा। लेकिन यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आपस में प्रेम व सहज भाव से वैवाहिक संबंध स्थापित करने लगे तो अगली पीढ़ी से ही जाति का अंत दिखना शुरू हो जाएगा।

हम जाति नहीं मानते हैं जैसे फर्जी बातों व नारों से जाति का अंत कभी नहीं होगा, उल्टे अंदर की टीस व प्रतिक्रिया और बढ़ती जाएगी। समाज किसी भी राजनैतिक दल, धर्म व सरकार आदि से बहुत बहुत अधिक बड़ा होता है। जाति का अंत किसी धर्म, राजनैतिक दल या सरकार के बूते की बात नहीं। जाति का अंत करने का निर्णय समाज को लेना चाहिए और आज नहीं तो कल लेना पड़ेगा ही।

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