जाति-व्यवस्था और राजनीति

“मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”
साभार- सामाजिक यायावर की किताब (पृष्ठ संख्या 260-261)
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हमें एक बात समझने का प्रयास करना होगा कि भारत में लोकतंत्र ठीक से स्थापित हो पाता, इसके पहले ही लोकतंत्र को भारत के लोगों ने ही उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। शोषक जातियों ने राजतंत्र व कबीलातंत्र खत्म होते ही आजादी के बाद भरपेट मलाई खाने में खुद को व्यस्त किया और भ्रष्टाचार की शुरुआत करके उसे नए आयाम, नयी दिशायें व नयी ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया।  यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो भारत में भ्रष्टाचार की उत्पत्ति नहीं होती।  जाति-व्यवस्था के कारण परंपरा में ही शोषण करना और शोषितों के पुरुषार्थ का हक येनकेन प्रकारेण अपने पास ही रखना, सिखाया गया। यही सामाजिक अनुकूलन 1947 की राजनैतिक आजादी के बाद भ्रष्टाचार का प्रमुख आधारभूत कारक बना। राजनैतिक आजादी के बाद संवैधानिक-आरक्षण मिलने के कारण शोषित जातियाँ हजारों सालों के लगातार भीषण व घिनौने शोषण के बाद पहली बार, खुद को कुछ कुछ मनुष्य जैसा समझने के युगांतर नशे में कई दशक तक जीतीं रहीं। तब तक शोषक जातियों ने राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक व शैक्षणिक सत्ता की खूब मलाई खायी, खूब भ्रष्टाचार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास लगातार कमजोर हुआ।

समय के साथ जब शोषित जातियाँ खुद को कुछ कुछ मनुष्य समझने के युगांतर नशे से बाहर आयीं। तो उन्होंने राजनैतिक सत्ता में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरू की और संख्याबल के कारण धीरे-धीरे शोषित जातियाँ राजनैतिक सत्ता प्राप्ति का आधार बनती गयीं। जब तक शोषित जातियाँ शोषक जातियों के लिए  राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति में पिछलग्गू रहीं, तब तक शोषक जातियों को असुविधा नहीं हुई।  उनको समाज में, देश में, व्यवस्था तंत्र आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं दिखा, या यूं कहा जाए कि भयंकर रूप से हो रहे भ्रष्टाचार को देखने की आवश्यकता नहीं लगी।

1947 की राजनैतिक आजादी के बाद, शोषक जातियों ने शोषित जातियों को अपना पारंपरिक दास मानते हुए उनको राजनैतिक सत्ता से दूर रखा।  संवैधानिक आरक्षण के कारण जब शोषित जातियों के लोग सरकारी तंत्र में प्रवेश करने लगे और राजनैतिक सत्ता के महत्व को समझने लगे तब शोषक जातियों ने शोषित जातियों को बरगला कर अपना पिछलग्गू बनाकर राजनैतिक सत्ता की मलाई का भोग किया। किंतु समय के साथ-साथ ज्यों ज्यों राजनैतिक समझ आने के कारण जब शोषित जातियों ने अपनी राजनैतिक ताकत पहचान कर राजनैतिक सत्ताओं में अपनी सीधी व स्पष्ट दावेदारी पेश करनी शुरु की;  त्यों त्यों शोषक जातियों को व्यवस्था तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। शोषक जातियों को देश में सामाजिक परिवर्तन और ईमानदारी की आवश्यकता भीषण रूप से महसूस होने लग गयी और समय के साथ राजनैतिक व सामाजिक क्रांति की भीषण आवश्यकता की बातें होने लगीं। 

शोषक जातियों को जाति-व्यवस्था नासूर व सडांध लगने लगी और जातिविहीन समाज की आवश्यकता दिखाई पड़ने लगी। सामाजिक परिवर्तन की लंबी लंबी बातों की आवश्यकता पड़ने लगी। जब तक शोषक जातियाँ आजाद भारत में राजनैतिक सत्ता की मलाई खातीं रहीं;  तब तक उन्हें भारतीय व्यवस्था तंत्रों में हजारों वर्षों से गहरे से व्याप्त न तो भ्रष्टाचार दिखा और न ही भारत की 1947 की राजनैतिक आजादी झूठी लगी।  किंतु ज्यों ज्यों शोषित जातियों ने राजनैतिक सत्ताओं में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरु की और मलाई में अपने हिस्से की दावेदारी पेश करनी शुरू की;  शोषक जातियों को भारत की आजादी झूठी लगने लगी और तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ और इन्हीं के ही इर्द-गिर्द घूमने वाले तत्वों आदि की लिखापढ़ी वाली तथाकथित ईमानदारी तक जबरन लोगों के दिलो दिमाग को संकुचित कर दिया गया।  जबकि भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ आदि तत्वों जैसे अति-संकुचित दायरे में रखकर बिलकुल भी नहीं समझा जा सकता।  न ही इन तत्वों की शुद्धता के ढकोसलों से सामाजिक परिवर्तन ही किया जा सकता है और न ही इन ढकोसलों से भ्रष्टाचार ही समाप्त किया जा सकता है।

भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनाने या लागू करने से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलाने से या धरना करने से भ्रष्टाचार नहीं खतम होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज की विशेषाधिकृत जातियों का लगभग हर आदमी करप्ट है, और इस आदमी को भ्रष्ट बनाया “जाति-व्यवस्था” ने। भारतीय समाज में व्याप्त कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरियों में एक तत्व यह भी है, कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है;  और अधिकतर “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” को स्थापित व महिमामंडित करने पर ही आधारित है। इसीलिए समाज की मानसिकता को मनचाही दिशा में अनुकूलित करने के लिए कोई भी तर्क व परिभाषाएं तामझाम करके स्थापित की जा सकती हैं।  इसी चरित्र ने भ्रष्टाचार को संकुचित करने वाली परिभाषाएं गढ़ने में सरलता प्रदान की। जाति-व्यवस्था ही भारत में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार की मूलभूत जनक है और जाति-व्यवस्था सबसे हिंसक सामाजिक-तानाशाही है – यह समझने व स्वीकारने का भ्रूण भी नहीं उत्पन्न होने दिया और भ्रष्टाचार की प्रायोजित संकुचित परिभाषा में ही जड़ कर रख दिया।

सामाजिक जड़ता भारतीय समाज का मूलभूत चरित्र है।  बहुत लोगों को एक बहुत बड़ी गलतफहमी रहती है कि भारत में तंत्र सफल है या सफल जैसा कुछ है, तभी आजादी के बाद इतने दशकों के बाद भी तंत्र चल रहा है और समाज की स्वीकार्यता के साथ चल रहा है।

जो जैसा प्रायोजित हो गया उसका वैसे ही बिना प्रासंगिकता मूल्यांकन के चलते जाना, तंत्र के प्रति समाज की स्वीकार्यता न होकर वास्तव में सामाजिक जड़ता होती है। यह सामाजिक जड़ता वाला चरित्र हजारों सालों की वीभत्स व विद्रूप जाति-व्यवस्था का उत्पाद है, जिसमें जन्म-आधारित तिरस्कारों, शोषणों व दासता को दैवीय दंड-विधान मानकर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है। या जन्म-आधारित व्यवस्था के आधार पर स्वयं का दूसरों से श्रेष्ठ, पूजनीय व गौरवशाली होना दैवीय पुरस्कार मान कर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है।

जाति-व्यवस्था से मुक्त होते ही भारतीय समाज के शोषक व शोषित दोनों ही प्रकार के वर्गों की जातियों में चारित्रिक व गुणात्मक परिवर्तन हो जायेगा। भारत, भारत के लोग व भारतीय समाज सभी वास्तव में स्वतंत्र होगें और खुली हवा में सांस ले पायेंगें। जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना भारत में कभी भी चारित्रिक बदलाव नहीं किया जा सकता है। यदि कोई जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना, भारत में सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक समाधान व विकास की बात करता है तो वह या तो नासमझ है या सामाजिक धोखा देता है, क्योंकि यह बिलकुल ही असंभव है।

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