आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया

Shayak Alok

पढ़ते पढ़ते ही मैंने पाया कि मेरे प्रिय कई लेखक वगैरह अपने समकालीन दूसरे लेखकों-समीक्षकों-इतर साहित्यिकों को लेकर एक पूर्वग्रह-आक्रामक भाव में भी रहते हैं. कई बार वे मुखर उन्हें कोसते पीटते भी नजर आते हैं. मैंने पाया कि यह लक्षण मुझमें भी है. आशय कि मैं भी लीक पर पाया गया.

1.

समीक्षाओं आलोचनाओं से नहीं
न ही अफवाहों से
उस झूठ से भी नहीं जो तुम्हारे चेहरे को सफ़ेद करता है
न व्यंग्य के कहकहों से
मुझे शापित करती तुम्हारी आहों कराहों से
न ही गालियाँ बकने .. धमकाने से
न पीठ पर
चाक़ू खंजर चलाने से
दाखिल खारिज के खेल से भी नहीं
तुम्हें मारना हो अगर मुझे
मुझे तुम्हारे जैसा बना दो.

2.

मूर्ख पाठकों
और पूर्वाग्रही कवि मित्रों
को
रखो दो किनारों पर
और तौलो
बराबर की माप
‘क्या कहते हैं कि संतुलन’
दो चार कविताओं को
इधर उधर रख देने से आ जाएगा.

3.

मेरे लिखे शब्द
जब मुझे ही भ्रमित करते हैं
तब मेरा एक सींग निकल आता
है
इन्हीं मान्यताओं व शर्तों
पर
मैंने कुछ कवियों में एक
पूंछ को निकलते देखा है.

4.

मेरे वैचारिक
खूंटे से बंधी है मेरे समय की बकरी
जबकि उनके उनके हाथ
उनके समय के भेड़ियों की पीठ
सहलाते हुए
वे मरेंगे, भेड़िये मरेंगे या फिर बकरी.

5.

कवि,
वे पहले
तुम्हें अनदेखा करेंगे
वे फिर
तुम्हें सहलायेंगे .. शब्दों से बहलाएँगे
वे फिर तुम्हारी हाड़ मांस की कविताओं को चबायेंगे
अपने मुंह के खून तुम्हारी आस्तीन में छुपायेंगे
कवि, वे फिर तुमपर आरोप लगायेंगे
बहाने में कविता को कवि से बचायेंगे
सियारों की सियासत में
लोमड़ियों से भी सावधान रहना कवि
वक़्त की अदालत में इन सबके खाल उघाड़े जायेंगे ..

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