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  • जाति, आरक्षण, योग्यता व हमारी धूर्तता व ढोंग

    विवेक ‘नोमेड’
    सामाजिक यायावर

    जब तक जाति जैसी सबसे पुरानी व सबसे घिनौनी सामाजिक दास व्यवस्था का समूल नाश नहीं होता| तब तक भारत में संवैधानिक आरक्षण खतम नहीं किया जा सकता है| भले ही पूरे देश को गृह युद्ध की आग में झोंक दिया जाए, तब भी नहीं| गृह युद्ध में 70-80 प्रतिशत शारीरिक मजबूत व संघर्ष करने वाले लोगों के समक्ष 25-30 प्रतिशत लोग कैसे ठहर पाएंगे। इसकी कल्पना भी दिलचस्प है।

    महज सरकारी नौकरी व सुविधा व भ्रष्टाचार की नदियों में डुबकी लगाने की अय्याशी के भोग के लिए संवैधानिक आरक्षण का विरोध करने वालों को जाति व्यवस्था में स्वयं को शूद्रों की कैटेगरी में रख कर उन परंपरागत जुल्मों के बारे में भी सोचना चाहिए जो शूद्रों पर लगातार किए गए और आज भी किए जा रहे हैं| चंद सरकारी नौकरियों के न मिलने पर रात दिन आरक्षण को गाली देने वाले धूर्तों की सोच की इतनी छोटी सी भी हैसियत नहीं कि वे जाति व्यवस्था में शूद्रों की स्थितियों की कल्पना तक कर पाएं|

    मुद्दा यदि योग्यता का है, तो आजादी के बाद सरकारी नौकरी के सर्वोच्च पदों व नीति निर्माता स्तर की नौकरशाही में रहते हुए भी देश व समाज के विकास में क्या योगदान रहा इसकी भी खुली बहस होनी चाहिए| योग्यता का मतलब परीक्षा में अंक पाना नहीं होता| शिक्षक कौन हैं, शिक्षा प्रणाली क्या है, परीक्षाओं के मापदंड क्या हैं ऐसी बहुत से गंभीर मसलों पर भी बहस होना चाहिए| योग्यता को साबित करने का दारोमदार टुच्ची व ओछी परीक्षाओं व उनमें प्राप्त अंकों तक ही सीमित करना सामाजिक खणयंत्र के सिवाय कुछ भी और नहीं। यदि मामला योग्यता का है तो बिना सरकारी नौकरी पाए, बिना सरकारी सुविधा पाए देश व समाज का विकास किया जा सकता है, तो दिखाइए योग्यता| या फिर योग्यता का मानदंड व कसौटी सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरी व सुविधा व भ्रष्टाचार की ऐशबाजी तक ही सीमित है|

    देश को आरक्षण ने बहुत कुछ दिया है, शोषण कम हुआ है, जाति की अभेद्य दीवारों पर धक्के लगे हैं। जिन लोगों को परंपरा में नालियों में रहते हुए जीवन यापन करने के लिए विवश किया गया उनने बेहतर स्थानो में बेहतर घर बनाए। जिन लोगों को परंपरा में शिक्षा का अधिकार नहीं दिया गया, उनने लिखना पढ़ना सीखा। जिन लोगों को परंपरा में कुंठित किया गया उनको दो कौड़ी की परीक्षाओं में प्राप्त अंकों को योग्यता का आधार व सबूत मानकर अयोग्य बताना नीचता व धूर्तता व बेशर्मी है।

    योग्यता का लक्ष्य सरकारी नौकरी की अय्याशी भोगने तक ही क्यों सीमित रहती है। वैसे भी सरकारी नौकरियां लगातार घटाई जा रहीं हैं। योग्यता तो दिखावटी बहाना है, मामला तो सत्ता शक्ति व ऐशबाजी में भागीदारी न देने का है। देश के सर्वोच्च नौकरशाही स्तर के पदों पर कितने दलित पहुंचे, इस पर बहस होनी चाहिए। किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी योग्यता के द्वारा प्राप्त की जाती आई है, यह कहना बेहूदी धूर्तता व बेहूदा मजाक के अलावा कुछ भी और नहीं।

    भारत में जातिवादी धूर्तता की नीचता व टुच्चई की इंतहा यह है, कि यहां आज तक कभी भी एक पल के लिए भी आरक्षण का स्वागत अशूद्रों द्वारा नहीं किया गया। आरक्षण के विरोध के लिए बेशर्म व धूर्त तर्क दिए जाते हैं और साबित किया जाता है कि आरक्षण से देश व समाज का कितना नुकसान होता है। यह सारा खेल केवल और केवल सरकारी नौकरी को भोगने व सत्ता शक्ति के लिए ही किया जाता है।

    सरकारी नौकरी व सत्ता शक्ति को भोगने की कड़ी में हजारों लाखों अशूद्र लोगो द्वारा आजादी के बाद से ही फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवा कर फर्जी तरीके से सरकारी नौकरियां को पाकर शूद्रों का शोषण किया गया है, उनका संवैधानिक हक मारकर संवैधानिक अपराध किया गया है। ऐसे धूर्त व नीचता भरे लोगों व समाज से वास्तविक संवेदनशीलता की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

    वैसे यदि किसी सरकार में, किसी मीडिया में, किसी व्यापारी में, किसी में बिना जाति का समूल नाश किए संवैधानिक आरक्षण हटाने का बूता हो तो हटा दे। फेसबुक, व्हाट्सअप आदि में फर्जी बकवास करके खुद को कर्मशील, क्रांतिकारी व परिवर्तनकारी समझने वाले लोग यदि गृह युद्ध की विभीषिका पीढ़ी दर पीढ़ी झेल सकते हों तो भी आरक्षण को नहीं हटाया जा सकता है।

    धूर्तता, नीचता, ढोंग व हिंसा से जबरिया सामाजिक समाधान मिलने के युग अब जा चुके हैं। समाज को अपनी वास्तविकता व वास्तविक हैसियत व क्षमता कभी नहीं भूलना चाहिए। सामाजिक समाधान के लिए सामाजिक ईमानदारी अब जरूरी है। हमें अपनी नीचता, टुच्चई, धूर्तता, कपटता व कमीनीपंथी भरे ढोंग से बाहर आने का प्रयास करना चाहिए।

  • छात्राओं व छात्रों के लिए 100 रुपए प्रतिमाह की कम से कम 12 महीने की अवधि के लिए छात्रवृत्तियों के लिए सूचना

    छात्रवृत्तियों की संख्या = 15 या अधिक
    छात्रवृत्तियों की राशि = 100 रुपए प्रतिमाह कम से कम 12 महीने या अधिक

    छात्रवृ्त्तियों का वर्गीकरण –

    अनुसूचित जन जाति व अनुसूचित जाति वर्ग की छात्राओं के लिए = 5 छात्रवृत्तियां या अधिक
    अन्य वर्ग की छात्राओं के लिए = 5 छात्रवृत्तियां या अधिक
    सभी वर्गों के छात्रों के लिए = 5 छात्रवृ्त्तियां या अधिक

    छात्रवृत्तियों के लिए शैक्षिक योग्यता = 9वीं, 10वीं, 11वीं व 12वीं की छात्रा या छात्र

    • छात्रवृत्तियाँ “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” किताब के लेखक विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग ‘सामाजिक यायावर’ की ओर से दी जा रही हैं।
    • लेखक व पुस्तक के संदर्भ में अधिक जानकारी के लिए आप वेबसाइट   http://www.books.groundreportindia.org   को देखने का कष्ट उठा सकते हैं।

     

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  • न्यायालयों को महिलाओं से काम करने के लिए पूछना चाहिए बजाय पतियों को रहरखाव का भुगतान करने का आदेश देने के

    Rajesh Vakharia

    आपने पितृसत्ता (patriarchy) को महिलाओं पर अनेक तरह की पाबन्दी लगाने और नुक्सान पहुँचाने के बारे में शायद सुना होगा परन्तु अभी पुरुषों के अधिकार में काम करने वाले कार्यकर्ता भी पितृसत्ता के खिलाफ अपनी आवाज़ उठा रहे हैं उकना मानना यह है कि आज कल के कोर्ट महिलाओं को आधुनिक विशेषाधिकार तो दे चुके हैंपरन्तु पुरुषों को पितृसत्तात्मक (patriarchal) भूमिकाओं में बाँध रखा है |

    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति को पत्नी के रखरखाव के भुगतान के लिए व्यवस्था करनी होगी भले ही उसके पास कोई नौकरी नहीं हो | “कभी कभीदलील(बैलवास्तव में पति कहता है कि उसके पास पत्नी के रखरहव के लिया कोई साधन नहीं है,क्योंकि उसकी नौकरी चली गइ है या उसका व्यवसाय अच्छी तरह से नहीं चल रहा है यह केवल बुरे बहाने है जिन्हे कानून स्वीआर नहीं करता |” बेंच ने कहा।

    सुप्रीम कोर्ट को समझना चाईए कि भारत के अधिकतर पुरुषों के पास सरकारी नौकरी करने वालों की तरह स्थायी नौकरी नहीं हैजिसमे नियमित रूप में वतन मिलता हो अदालतों का चक्कर काटकेकाटके पुरुषों की नौकरीआं चली जाती है उसके बाद वह जो काम लेते हैउसमे उनकी पहले से काम कमाई होती है |

    भारतीय न्यायपालिका अपनी इस सोच में बहुत पारंपरिक जिसके अनुसार पुरुष का कर्त्तव्य प्रदाता का हैऔर महिला का कर्त्तव्य घर पे रहना हमने अदालतों को कभी यह पूछते हुए नहीं देखा कि एक औरत बहार जाएअपनी जीविका खुद कमाए |

    धारा ४९८अ (498a) के लिए नौकरी खोते पुरुष

    अब एक दिनअक्सर महिलाएं अपने पति और ससुराल वालों को परेशान करने और पैसे निकलवाने के लिए खंड 498a (४९८अजैसे आपराधिक कानूनों का दुरूपयोग करती हैंअदालतें उसे महीनों या वर्षों तक ज़मानत नहीं देती हैजिसके कारण उसे और परिवार जनों को वकीलोंपुलिस आदि के आगेपीछे घुमते हुए खूब परेशानियां उठानी पढ़ती हैंअंत मेंवह अपनी ज़मानत करने के चक्कर में अपनी सारी बचत और नौकरी भी खो देता हैन्यायालय इस पहलु पर कभी भी विचार नहीं करते और उसे पत्नी के रखरखाव का भुगतान करने का आदेश देता हैं यद्यपि वह न्यायपालिका के काम करने के तरीके की वझे से बेरोजगार है|

    खंड 498a के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के निचले न्यायपालिका के बहरे कानों पर गिर गया है। अबअदालतों एक मात्र झगड़ा या पत्नी के साथ मतभेद के लिए हत्या के प्रयास मामला पुरूषों पर दर्ज कर रही है|” , राजेश वखारियासेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन के अध्यक्ष (SIFF) कहते हैं।

    वह कहते हैं कि कई ऐसे उदहारण है जिसमे आदमी को देश एक छोर से दूसरे छोर ज़मानत की सुनवाई में भाग लेने के लिए १० बार आनेजाने की ज़रूरत पढ़ीइन सब का कारन यह था की अदालतों ने ज़मानत देने का फैसला स्थगित कर दिया था|

    सुप्रीम कोर्ट को यह बात सुनिश्चित करनी चाहिए जमानत की सुनवाई के स्थगन द्वारा उत्पीड़न की वजह से नौकरियों ना चली जाए|

    सुप्रीम कोर्ट को पहले जमीनी वास्तविकताओं और अदालतों के चक्कर काटते गरीबमध्यम वर्ग के लोगों की परिशानियों की ओऱ ध्यान देना चाइये नाकि सिर्फ परंपरागत कर्तव्यों की याद दिलाने की बजाये|

    कानून की भी अत्यंत पारम्परिक व्याख्या

    लाखों महिलाएं आज परंपरागत कर्तव्यों से मुक्त होना चाहती है और अदालतों नें इस आधुनिक सोच को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। परन्तु रखरखाव कानूनों की सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या आज भी अत्यंत पारंपरिक और पितृसत्तात्मक है। आज के आधुनिक युग में जब एक ओर महिलाओं के विकल्प और स्वतंत्रता के बारे में बात की जा रही है वहीँ अदालतों का पुरुषों से अपनेअपने पारंपरिक कर्तव्यों को पूरा करने की उम्मीद रखना दोहरा मापदंड है|

    ” न्यायपालिका को पुरुषों को पारंपरिक कर्तव्य से पुरुषों को मुक्त करना होगा अगर वोह महिलाओं की आकांक्षाओं के प्रति गैरपरंपरागत दृष्टिकोण रख रही हैमहिलाओं के लिए आधुनिक विशेषाधिकार देनाजबकि पुरुषों को पारंपरिक उम्मीदों से बंधे हैं– ये दोहरे मापदंड हैं।“, ज्योति तिवारीसेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन के प्रवक्ता कहती हैं।

    हाल ही मेंभारत के विधि आयोग ने कानून मंत्रालय को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसमे यह सुझाव था कि हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन किया जाये कि यदि पति विकलांग है या पत्नी को बनाए रखने के लिए कमाने में असमर्थ हैतो तलाक के दौरान युवा महिला के रखरखाव उपलब्ध कराने का दैत्व्य वृद्ध ससुराल वाले उठाये|

    पुरुषों समाज पर सभी पारंपरिक बोझ क्यों डाले जाये जबकिसमाज और न्यायपालिका महिलाओं को आधुनिक विशेषाधिकार देने में लगी है ?”, ज्योति तिवारी पूछती है|

    अधिकांश पश्चिमी देशों में परिवार न्यायालय एकमुश्त महिलाओं के लिए रखरखाव की अवधारणा को ख़ारिज कर चुकी हैयह सही समय हैभारतीय सरकारों और परिवार अदालतें पारंपरिक पितृसत्तात्मक सिद्धांतों का अभ्यास करना बंद करेंपुरुषों आधुनिक बनने और पितृसत्तात्मक उम्मीदों को पूरा करने के दबाव से बहुत परेशान है| ” कहती है ज्योति |

  • भारतीय-दाम्पत्य जीवन व परिवार के व्यवहारिक मूल्य

    सामाजिक यायावर

    जैसे हम मानव-निर्मित ईश्वर को वास्तविक ईश्वर माने हुए हैं, माने हुए हैं कि हमारी सभ्यता विश्व की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता है। वैसे ही और भी बहुत कुछ हम यूं ही माने हुए हैं और माने हुए को मनवाने के लिए दूसरों को अपशब्द कहते हैं, अपमानित करते हैं। अपने द्वारा माने हुए को जबरन तथ्यपरक सिद्ध करने के लिए  दूसरों के प्रति स्वयं को हिंसक भी बनाते हैं। बिलकुल ऐसे ही हम, बस यूं ही मान बैठे हैं कि भारतीय संस्कृति के परिवार व पारिवारिक मूल्य विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि, बस यूं ही मान लेने की अनुकूलता व बंद-दिमाग की जिद से बाहर आकर परिवार व पारिवारिक मूल्यों का ठोस धरातल पर मूल्यांकन किया जाए; तो परिवार की नीव हिंसा, ढोंग, झूठ, बाजारूपन व उपभोक्तावाद से भरी हुई दिखती है।

    हम समाज व देश निर्माण, विश्वगुरू होने की संस्कृति आदि का दावा करते हैं लेकिन मनुष्य व समाज को जीवन मूल्य व संस्कार देने वाली मूलभूत ईकाई परिवार के प्रति कतई गंभीर व जिम्मेदार नहीं होते हैं। हमने परिवार व परिवार की मूलभूत ईकाई विवाह को बाजारू बना रखा है जो मनुष्य में जीवन मूल्यों व संस्कारों को समृद्ध करने के बजाय संभावना के भ्रूण को भी नष्ट करता है।

    हम अपने जीवन साथी तक के चुनाव में अंदर से ईमानदार नहीं होते जबकि हम समाज व देश के निर्माण, विकास व समृद्धि की बात करते हैं। हम भूल जाते हैं कि देश व समाज का निर्माण मनुष्यों के निर्माण से होता है और मनुष्य के निर्माण की मूलभूत इकाईयाँ परिवार व विवाह हैं। जहां परिवार नहीं, वहां समाज नहीं; जहां समाज नही, वहां देश नहीं। खोखलेपन, दोहरेपन व सतहीपन आदि से व्यक्ति, परिवार, समाज व देश कुछ भी न तो निर्मित होता है और न ही समृद्ध होता है।

    यदि ईमानदारी व सूक्ष्मता से पारिवारिक मूल्यों के तत्वों को देखा जाए तो देश व समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की नीव जाति-व्यवस्था के साथ-साथ भारतीय परिवार भी है।

    परिवार में संस्कार व संस्कृति के मायने :

    संस्कृति बोलचाल की भाषा, कपड़े पहनने व भोजन करने के तौर तरीको, त्योहारों व पूजापाठ के कर्मकांडो आदि तक ही संकुचित होती है। वास्तविक जीवन मूल्यों व आंतरिक भाव संवेदना का कोई औचित्य नहीं होता है, उल्टे तिरस्कृत किए जाते हैं।

    संस्कारित स्त्री का तात्पर्य कि निर्धारित किए गए कपड़े पहने, किसी पुरुष से मित्रता न करे, प्रेम की स्वतंत्रता की मांग न करे। किसी पुरुष से कल्पना में भी भावात्मक प्रेम भी न करे। विवाह अर्थात् माता पिता जिस पुरुष से शारीरिक संभोग करने के लिए  निर्धारण करें केवल उसी पुरुष से शारीरिक संभोग करे और उस पुरुष के लिए  संताने पैदा करे। बचपन से विवाह तक माता पिता व भाई आदि की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले और विवाह पश्चात् अपने सास ससुर व पति की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले।

    संस्कारित पुरुष का तात्पर्य कि पुरुष परिवार के लिए  संपत्तियां अर्जित करे और सुविधाएं एकत्र करे और संपत्तियों व सुविधाओं से अपने माता पिता, पत्नी व संतानों की देखभाल करे। बचपन से लेकर युवा होने तक माता पिता ने देखभाल किया है इसलिए   पुत्र अपने माता पिता की मृत्यु तक उनकी देखभाल करे और आज्ञाकारी बन कर रहे। केवल संपत्ति व सुविधा अर्जित करने के तौर तरीको में विशेषज्ञता प्राप्त करे और माता पिता जिस स्त्री से विवाह कर दें, उसी स्त्री के साथ शारीरिक संभोग करे और उस स्त्री का प्रयोग अपने लिए  संताने उत्पन्न करने के लिए  करे।   

    माता पिता द्वारा तय किया गया विवाह :

    माता-पिता द्वारा तय किए गए विवाह में लड़की व लड़के को सभ्यता व संस्कारों के मूल्यों की कसौटी में मूल्यांकन करने का जबरदस्त प्रचलन है, इस प्रचलन को लड़का या लड़की को परिवार व समाज की संस्कृति की रक्षा व समृद्धि के लिए  ठोंक बजाकर चुनना कहा जाता है; इस प्रक्रिया में बहुत सारी लड़कियां व लड़के अस्वीकृत किए जाते हैं, ताकि अपने पुत्र के लिए  सेवाभावी संस्कारी पत्नी और पुत्री के लिए  देखभाल करने वाला प्रतिष्ठित पति खोजा जा सके।

    पुत्रवधू के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़की अपने ही धर्म व जाति की हो, लड़की स्वर्ग की अप्सरा जैसी सुंदर हो, बहुत अमीर घर की हो या अच्छे वेतन व सुविधा वाली सरकारी या गैर सरकारी नौकरी करती हो या दोनो, मुंहमागा दहेज लेकर आए, भाई न हों तो और बेहतर ताकि माता पिता की चल-अचल संपत्ति में हिस्सा भी मिले, प्रतिष्ठित परिवार की हो ताकि लड़के वालों का सामाजिक कद भी बढ़ जाए आदि आदि प्रकार की सभ्यता व संस्कारों से संपन्न गुणी लड़की को पुत्र की पत्नी होने के लिए  प्राथमिकता दी जाती है।

    ऊपर बताए गए मानकों की सभ्य व संस्कारी लड़की मिलने पर उसको चलाकर देखा जाता है ताकि उसके लंगड़ेपन की जांच हो सके, गाना गवाकर देखा जाता है ताकि उसके गूंगेपन की जांच हो सके, किसी प्रकार जुगत लगाकर लड़की के शरीर के आंतरिक अंगों को भी किसी विश्वसनीय महिला द्वारा देखे जाने का प्रयास किया जाता है ताकि शरीर में दाग-धब्बे आदि की जानकारी हो पाए, कुछ संस्कृतिवान लोग तो लड़की के अंतः वस्त्र तक उतरवा कर जांच करना चाहते हैं ताकि शरीर में छुपे हुए दाग व धब्बों की पूरी जानकारी मिल सके और वे लड़की के परिवार वालों से ठगा हुआ न महसूस करें।

    जामाता के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़का अपने ही धर्म व जाति का हो।  लड़के के माता पिता के पास चल अचल संपत्ति हो या लड़का ऊंचे वेतनमान व सुविधाओं की सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करता हो या दोनो। लड़का सुंदर हो किंतु यदि लड़का बहुत अमीर है और बदसूरत है तो उसकी अमीरी के कारण उसको सुंदर और सुपात्र मान लिया जाता है। लड़का इकलौता हो तो और अच्छा, लड़के की बहन न हो तो और अच्छा। लड़का ऊपरी कमाई वाली सरकारी नौकरी में हो तो सबसे अधिक संस्कारी और सुपात्र माना जाता है।

    माता पिता द्वारा तय किए गए विवाहों को परंपरा में केवल इसलिए   सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है क्योंकि इसमें लड़का या लड़की अपना जीवन साथी अपनी विचारशीलता व समझ के आधार पर नहीं बल्कि अपने माता पिता की इच्छा के आधार पर चुनते हैं।

    प्रेम विवाह :

    चूंकि परंपरा में प्रेम को स्त्री पुरुष के मध्य यौन संभोग तक ही संकुचित कर दिया गया है; इसलिए   माता पिता के द्वारा तय किए गए विवाह और प्रेम विवाह में केवल एक ही अंतर रह पाता है, वह यह कि एक में माता पिता द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है जबकि दूसरे में अपने द्वारा पसंद किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है। बाकी सब कुछ समान ही रहता है।

    परिवार में सहज प्रेम व पारस्परिक विश्वास की जीवंतता न होने से युवक या युवती को सहज प्रेम की अनुभूति नहीं होती। परिवार में यौन से संबंधित चर्चा बच्चों व किशोरों के लिए  प्रतिबंधित होती है, अश्लीलता माना जाता है।

    माता पिता आपस में यौन संभोग करते हैं किंतु यह मानने को तैयार नहीं होते कि स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर व शारीरिक क्रियायें प्राकृतिक हैं, कुछ भी बुरा नही, कुछ भी छुपाने लायक नहीं। स्त्री के अंगों को अश्लील मानते हैं, छुपाने लायक मानते हैं।

    उचित जानकारी के अभाव में किशोर यौन कुंठित हो जाता है, इसलिए   अपवाद को छोड़कर प्रेम विवाह में भी सहज प्रेम प्रस्फुटित नहीं हो पाता है; प्रेमी प्रेमिका सहज प्रेम व यौन आकर्षण में अंतर ही नहीं कर पाते परिणामस्वरूप उनका प्रेम विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण व वासना तक ही संकुचित हो जाता है।

    यही कारण है कि बहुत मामलों में लड़की अपने प्रेमी को एक झटके में केवल इसलिए छोड़ देती है कि उसके माता पिता द्वारा खोजा गया लड़का उसके प्रेमी की तुलना में अधिक अमीर और कमाऊ है; और ऐसा करते ही उस लड़की को उसके माता पिता व परिवार द्वारा समझदार, तीव्रबुद्धि व संस्कारी मान लिया जाता है। प्रेमी के साथ यौन संबंधो के बावजूद उस लड़की को चरित्रवान व संस्कारी लड़की माना जाता है।

    ऐसा ही लड़के के लिए  भी है; जब वह माता पिता द्वारा खोजी गई अमीर लड़की, दहेज व सुविधाओं आदि के लिए  अपनी प्रेमिका को एक झटके में छोड़ देता है।

    प्रेम विवाह व माता पिता द्वारा तय किए विवाह का चरित्र बिलकुल एक सा ही होने के बावजूद प्रेम विवाह सामाजिक रूप से केवल इसलिए   तिरस्कृत होता है क्योंकि प्रेम विवाह में जाति या धर्म के बाहर का मनुष्य प्रेमी या प्रेमिका हो सकता है और माता पिता के द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के बजाय अपनी पसंद के मनुष्य के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं और संतानोत्पत्ति की जाती है।

    परिवार में पति पत्नी  :

    अपवादों को छोड़कर विवाह होने के पश्चात् कुछ दिनों तक दोनों पक्षों की ओर से सामंजस्य, संतुलन आदि का ढोंग चलता है। लेकिन समय के साथ-साथ जब पति पत्नी अपने वास्तविक चरित्र के साथ जीना शुरू करते हैं, तो आपसी टकराहटें शुरू होतीं हैं। ऐसी स्थिति आने पर जो पति पत्नी अपने स्वार्थ व अहंकार से बाहर आकर संतुलन नहीं कायम कर पाते हैं, वे अपने वैवाहिक जीवन को नर्क बनाते हैं।

    दरअसल लड़का, लड़की, माता, पिता आदि यह भूल जाते हैं कि उनमे अच्छाई व बुराई दोनों ही हैं और वे समाज व परिवार की अनुकूलता के ही उत्पाद हैं; जैसे वे खुद हैं वैसे ही उनकी पत्नी, पति, बहू, दामाद, पुत्र, पुत्री आदि भी हैं।

    ये लोग स्वार्थ, लिप्सा व बाजारू भोग के नशे के अंधेपन में यह भूल जाते हैं कि विचार, संस्कार, विनम्रता, शुद्धता, प्रेम, समर्पण, त्याग आदि मूल्य जीवन में जीवंतता से जिए जाते हैं।  ऐसे लोगों की ईमानदारी, विश्वास व प्रेम का कोई ‘वास्तविक जीवन मूल्य’ नहीं होता।  ऐसे लोग पूरा जीवन रोते झींकते गुजारते हैं और समय के साथ-साथ परिवार व समाज में जाने अनजाने ऋणात्मकता ही बढ़ाते हैं।

    परंपरा में विवाह संस्था में सहज व स्वतंत्र जीवन सहचरत्व का मूल्य विकसित करने के बजाय स्त्री व पुरुष के यौन संबंध से संतान पैदा करने व पैदा की गई संतान को अपने जैसा ही संकुचित, अनुकूलित, कुंठित व परतंत्र बनाने वाली संस्था बना दिया गया है; जिसमें मनुष्य के भावों, प्रेम व स्वतंत्रता आदि का कोई स्थान व महत्व नहीं है। सब कुछ बने बनाए ढांचे से ही तय होता है।

    परिवार में बच्चे :

    चूंकि विवाह संस्था के ढांचे में ही सहज प्रेम उपेक्षित व तिरस्कृत किया जाता है, इसलिए   बच्चों का पालन पोषण भी ढांचे की अनुकूलता के संकुचित प्रभाव क्षेत्र के दायरे में ही होता है। अनुकूलता के प्रभाव क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करना ही संस्कृति व संस्कार का ध्वस्त होना मान लिया जाता है।

    माता पिता व परिवार द्वारा बच्चों में स्वतंत्र व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना तक की भ्रूण हत्या की जाती है। बच्चे  स्वतंत्र अस्तित्व वाले चेतनशील जीवंत मनुष्य के बजाय माता पिता की व्यक्तिगत संपत्ति माने जाते हैं; यही कारण है कि माता पिता व बच्चों के संबंध सहज व मौलिक प्रेम के बजाय अनकही किंतु तीव्र अपेक्षाओं के व्यापाराना लेनदेन पर आधारित होते हैं।

    ऐसी अनुकूलता व कुंठित वातावरण मनुष्य व समाज का विकास व चेतनशीलता अवरुद्ध कर देते हैं और बचपन से ही मानसिकता दूषित व कुंठित कर देते हैं।  बच्चा मौलिकता व स्वतंत्रता के बजाय व्युत्पन्न अनुकूलता की परतंत्रता की ओर बढ़ता जाता है और इन्ही के सख्त व संकुचित दायरों में आजीवन कुंठित होकर रह जाता है। ऐसे ही चक्रों के कारण कुंठा व मानसिक परतंत्रता पीढ़ी दर पीढ़ी और गहरे व्याप्त होती चली जाती है।   

    चलते-चलते :

    परिवार व विवाह संस्था के भावों व मूल्यों को अपनी जरूरत के अनुसार परिभाषित करके प्रायोजित करते हुए कुंठित व परतंत्र मानसिकता के व्यापाराना ढांचे को संस्कृति का नाम दे दिया गया है। यही कारण है कि वास्तविक जीवन-मूल्य, संस्कार, संस्कृति, स्वतंत्रता व चेतनशीलता आदि अपवाद परिवार में ही परिलक्षित होता है।

    साभार – “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” किताब के एक खंड से लिया गया.

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  • सुठारी गाँव में मनाया गया नदी संरक्षण दिवस

    14 मार्च 2015 को सुठारी मे अंतराष्ट्र्रीय नदी संरक्षण दिवस के अवसरपर सुठारी एवम सुराना के हिंड्न जल बिरादरी के सद्स्यों ने हिंड्ण नदी के जिर्णोधार एवम प्रदुषण मुक्ती हेतु श्पथ ली | और दुषीत भू जल के दूषपरिणामो पर चर्चा भी की | जल बिरादरी सद्स्य अवनीष यादव ने बताया कि इंसान अपने तुछ लाभों के लिये प्रकृति यानी नदी, तलाबों, जंगलों का अधाधुंध विदोहन कर रहा है, जिस कारण आज वह प्रकृति के कोप भाजन का भी पात्र बन रहा है | उन्होंने बताया कि गाजियाबाद का बदला मौसम मिसाज इसका उदाहरण है | बिन मौसम बरसात आज गाजियाबाद के ग्रामीणों की फसलों को बर्बाद कर रही है तो उसकी वजह खुद किसान भी है| आज किसान, नदी केबाढ क्षेत्र व विभिन्न जलमग्ण भूमि को नदी से छीन कर अवैध रूप से खेत बनाना चाह्ता है बिना यह समझे कि प्रकृति से किया गया खिलवाड उसके खेतों की फसलों के साथ उसको भी बर्बाद कर देगा | जल बिरादरी सद्स्य रामपाल यादव ने बताया कि नदियां पृथ्वी रुपी हमारी धरती मां की जल-धमनियां है, यदि इन धमनियों यानी नदी व इसके जल क्षेत्र को नुकसान पहुचाया जायेगा तो हमारी धरती मां बिमार पड जायेगी और फसलों के रुप में हमारा पालन पोषण करने वाली हमारी धरती मां, हमें कुछ भी देने में असमर्थ हो जायेगी | आकाल, सुखा, महमारी वे जरीयें से जिनसे प्रकृति हमारे द्वारा पैदा किये असुंतलन को दुरुस्त करती है | अत: इन सबसे बचने का एक हि उपाय है कि हम सभी ग्रामीण प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरुक बने | इस हेतु हिंड्न जलबिरादरी सतत प्रयास कर रही है और आप भी इन प्रयासों का हिस्सा बने |

    सौभग्यवश सुठारी खेडा का स्थाप्ना दिवस भी 14 मार्च को होने के कारण जलबिरादरी साथियों सहित सुठारीवासी युवाओं ने केक काट कर इस दिन को यादगार बनाया | सुठारी ग्राम वासीयुवा राहुल यादव ने बताया कि सुठारी वासियों की वंशावली भाटों द्वारा सुरक्षित रखीजाती है | इसके आधार पर ही हमें पुरातत्विक ग्राम सुठारी के स्थाप्ना की सही तारीख का ज्ञान हुआ | दीपक यादव ने बतायाकि सुठारी 14 मार्च 1452 ई. को सोहनगढ के जाग्सी द्वारा अपनी पत्नी मोहनदेयी (बुलद्शहर निवासी) के साथ हिंड्न नदी के निकट के ऊच्चे टीले पर बसाया जो आज भी वही विद्यमान है | हिंड्न नदी के जल ने कितने ही गांवों को बाढ से लीला हो लेकिन सुठारी हमेशा हिंड्न की कृपा का पात्र बना रहा है | अत: हिंड्न नदी के समुचित सम्मान एवम संरक्षण का दायित्व भी सुठारी वासियों का ही बनता है | इसी उद्देशय से हम सुठारी खेडा का स्थाप्ना दिवस व अंतराष्ट्र्रीय नदी संरक्षण दिवस अब हर साल एक साथ14 मार्च को बनाते रहेंगे ताकि हमारी आने वाली और आज की पीढी हमारी संस्कृति तथापर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील बने |अन्य साथीयों मेंअमित, सचिन, विकास, जितेंदर, अंकित, लोकेश, जयपाल, योगिंद्र, उपेंद्र, सन्नी, छोटू आदि मौजूद रहे|

  • ‘Enjoy & Be Happy…’ लिखकर पति ने कर ली आत्‍महत्‍या

    Rajesh Vakharia

    पति अपनी पत्‍नी से प्रताडि़त होकर सुसाइड करने से पहले परिजनों, दोस्‍तों और प्रशासन के लिए सुसाइड नोट छोड़ गया है। जो कि कुछ इस प्रकार है- भारत में इस तरह का कानून क्‍यों बना, जिसमें एक लड़की के मौखिक बयान को सच मानकर संबंधित सभी लोगों को परेशान किया जाता है। दूसरे पक्ष को तो अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया जाता है। लड़की के सिर्फ मौखिक बयान पर ही दूसरों को आरोपी बना दिया जाता है। पति कहता है कि, कोई नहीं, एंज्‍वॉय एंड बी हैप्पी इन योर लाइफ। लास्ट रिक्वेस्ट, प्लीज लीव माई ऑल फैमिली मेंबर्स।’

    झांसी. दहेज प्रथा के मामले में एक बैंक कर्मचारी अवधेश ने फांसी लगाकर आत्‍महत्‍या कर ली। पति अपनी पत्‍नी से प्रताडि़त होकर सुसाइड करने से पहले परिजनों, दोस्‍तों और प्रशासन के लिए सुसाइड नोट छोड़ गया है। जो कि कुछ इस प्रकार है- भारत में इस तरह का कानून क्‍यों बना, जिसमें एक लड़की के मौखिक बयान को सच मानकर संबंधित सभी लोगों को परेशान किया जाता है। दूसरे पक्ष को तो अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया जाता है। लड़की के सिर्फ मौखिक बयान पर ही दूसरों को आरोपी बना दिया जाता है। पति कहता है कि, कोई नहीं, एंज्‍वॉय एंड बी हैप्पी इन योर लाइफ। लास्ट रिक्वेस्ट, प्लीज लीव माई ऑल फैमिली मेंबर्स।’

    आत्‍महत्‍या करने से पहले पति द्वारा लिखा गया सुसाइड नोट।

    सुसाइड नोट में लिखा है कि, जिस दरवाजे कभी पुलिस नहीं आई, अब वहां हर दिन पुलिस आती है। मेरे माता-पिता को पुलिस थाने उठाकर ले जाती है। दफ्तर में मेरी इज्‍जत सभी के सामने उछाल दी गई। पति ने लिखा है कि वह सुबह 9 बजे से रात 8 बजे तक के काम को बेहद पसंद करता था। शादी से पहले जीवन खुशियों से भरा था, लेकिन शादी होते ही जिंदगी नर्क बन गई।

    पति ने अपने सुसाइड नोट में यह भी लिखा है कि उसकी पत्‍नी उन्‍नति और भाई अभिषेक ने उस पर दहेज के झूठे आरोप लगाए। वे कहते हैं कि शादी में 20 लाख रुपए नकद और अन्‍य कीमती सामान लिए गए, जो कि झूठ है। मेरे पिता पर यौन शोषण का आरोप लगाने की धमकी दी गई। मेरे चेहरे पर तेजाब से हमला करने की भी धमकियां मिली। इतना कुछ होने के बाद भी कानून ने कुछ नहीं किया।

    सुसाइड नोट में अंतिम में लिखा है कि- मम्‍मी-पापा प्‍लीज मुझे माफ कर देना और अपना ख्‍याल रखना। यदि आप लोग खुश नहीं रहेंगे तो मेरी आत्‍मा को कभी शांति नहीं मिलेगी। किसी के भी आंखों में आंसू मुझे सदैव तकलीफ देते रहेंगे। मैं उन लोगों को हमेशा याद रखूंगा, जो मेरे बुरे वक्‍त में भी मेरे साथ थे। इस सुसाइड नोट में महिला थाना, सीओ, एसएसपी, डीआईजी, आईजी, मानवाधिकार और महिला आयोग को भी नामित किया गया है।

  • देव भूमि उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले में बन रहा सभी सुविधाओं से संपन्न ”आदर्श गौ निवास”

    ”नयाल सनातनी” एवम् सर्वदलीय गौरक्षा मंच

    सर्वदलीय गौरक्षा IMG-20150208-WA0031मंच की प्रेस विज्ञप्ति बताया गया है की ”माँ नन्द एवं नैना देवी” के पुण्य भूमि नैनीताल जिल्ले के हल्द्वानी में मंच की ओर से आदर्श गौ-निवास ”श्री गिरधर गोपाल गौशाला” रजिस्टर्ड का निर्माण कार्य बहुत तेजी से हो रहा है। जल्द ही उत्तरखंड के मुख्य मंत्री जी से इस गौ-निवास के उद्घाटन की कोशिस जारी है। गौशाला में वर्तमान में तीन सेड बन चुके है, जिनके लगभग 100 गौवंश के लिए पर्याप्त स्थान है। साथ ही सहयोग से आगे 45 x 30 का  पक्का गौ-निवास भी बनाने का विचार है जिसमे पहले माले पर 16 संस्कार केंद्र एवं गौ आधारित प्रसिक्षण केंद्र स्थापना की योजना है । साथ ही कुट्टी- हरा -सुखा चारे हेतु एक बड़े कमरे का निर्माण भी पूर्ण हो चूका है।  गौशाला में एक सुन्दर रेम्प बना कर उच्च स्थान में श्री गिरधर गोपाल भगवान का पहाड़ की आकार का सुन्दर मंदिर निर्माण चल रहा है, जो गौशाला के साथ-साथ गौभक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा। गौशाला समिति के अनुसार गौशाला में पहाड़ की देशी गौवंश को संग्रक्षित करने के आलावा यहाँ पर देश भर की 28 प्रजाति की देशी गौवंश की ब्रिड को संग्रक्षित करने पर भी विचार किया जा रहा है। इस आदर्श गौशाला के प्रारम्भ के बाद जल्द ही ”सर्वदलीय गौरक्षा मंच” पुरे उत्तराखण्ड के हर जिल्ले में एक आदर्श गौ-निवास की स्थापना की योजना पर भी कार्य कर रही है ताकि आवारा और ग्राम वासियों के लिए बेकार गौवंश को संगरक्षण दिया जा सके। पुरे देश में गौवंश पर हो रहे अत्याचार की तरह यहाँ पहाड़ में भी गौवंश को गावं से निकाल कर जंगलों में छोड़ दिया जा रहा है। यह छोड़ा हुआ गौवंश या तो बाघ शेर का निवाला बनाता है,या कसाई इन्हें उठा ले जाते है। कुछ घटनाएँ तो येसी सुनने में आई खेतो का नुकसान होता देख ग्राम वासी गौवंश को जंगल में किसी पेड़ पर कस कर बाध कर आ जाते है जिससे गौवंश भूख प्यास से अपने प्राण त्याग देते है। इस सब परिस्तिथियों को देख कर ही मंच ने अब पहाड़ में गौ सेवा का कार्य सुरु किया है क्योकि शहर में सेवा और सहयोगी बहुत हो जाते है पर गावँ में सहयोग ही महान पुण्य का कार्य है।

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    देव भूमि उत्तराखण्ड की गिरधर गोपाल गौशाला को करें यथा शक्ति सहयोग आपका 100 रुपये का भी सहयोग एक विशाल गौशाला बनाने और गौसेवा में मददगार होगा …. …

    सनातनी विचार !

    गौ-निवास-गोष्ठ एवं आदर्श गौशाला ( 33 करोड़ देवी – देवताओं का देवालय ) जहाँ सिर्फ देश, भारतीय प्रजाति के गौवंश हो में किया गया सतकर्म करोड़ों-करोड़ों गुना आधिक फल देता है। ”गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं” !

    जैसे —–

    1 – पुंसवन संस्कार ! गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। यह ”पुंसवन संस्कार” अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ -शाला में अनेको गौमाताओं और नंदी बैल, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

    2 –  सीमन्तोन्नयन संस्कार !  सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

     यह ”सीमन्तोन्नयन संस्कार” अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

    3 – नामकरण ! जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं। नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है। अगर यह ”नामकरण संस्कार” स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी बैल भगवान , एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों  गुना पुण्य दायी होता है। 

    4 – निष्क्रमण संस्कार ! दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश निष्क्रमण का अभिप्राय है। 

    बाहर निकलकर इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन, 33 कोटि देवी देवताओं को धारण करने वाली गौमाताओं का दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण कराया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। विद्द्वानो के मतानुसार इस संस्कार के बाद माँ के दूध के आलावा गौमाता का दूध भी दिया जाना सुरु किया जाता है।

    इस ”निष्क्रमण संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

    5 – अन्नप्राशन संस्कार ! इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर अपनी माता एवं गौमाता के दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। गौ दुग्ध से बनी खीर और मिठाईयां शिशु के अन्नग्रहण में अत्यधिक शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है। इस ”अन्नप्राशन संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

    6 – चूड़ाकर्म संस्कार ! चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ-माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार अगर किसी पवित्र वातावरण वाले गौष्ठ या गौनिवास में सम्पन्न हो तो बहुत उत्तम माना गया है।

    इस ” चूड़ाकर्म संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। 

    7 – विद्यारम्भ संस्कार ! विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये। इस ”विद्यारम्भ संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में कराएँ तो बालक अनेकों गुना विद्द्वान विद्यार्थी होता है। 

    8 –  कर्णवेध संस्कार ! हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।

    यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।इस ”कर्णवेध संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है।

    9 –  यज्ञोपवीत संस्कार ! यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में ब्रह्मलीन पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी आदि अनेको विद्द्वानो ने भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध किया है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है। इस पवित्र ”यज्ञोपवीत संस्कार” की सुरुवात अगर स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में विद्वान आचार्य अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होता  है। 

    10  – वेदारम्भ संस्कार ! ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

    इस अति महत्वपूर्ण ”वेदारम्भ संस्कार”  की सुरुवात विद्द्वान आचार्य महोदय के श्रीमुख से स्वच्छ, सुन्दर वातावरण वाली गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य  हो तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी माना गया है। क्योकि सनातन धर्म के अनुसार ”गौमाता” के सानिंध्य में किया गया वेद पाठ 33 करोड़ देवी-देवताओं के सानिंध्य में किया गया पाठ माना जाता है। 

    11 – केशान्त संस्कार ! गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

    पहले गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ”केशान्त संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है। 

    12 – समावर्तन संस्कार !  गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें गौ-मूत्र, गंगा-जल,गुलाब-जल, सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

     पहले तो गुरुकुलों में ही बड़ी-बड़ी गौशालाएं हुआ करती थी पर अब वह समय नहीं रहा इस लिए इस  ”केशान्त संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों  के पवित्र सानिंध्य में करायें तो करोड़ों गुना पुण्य फलदायी होजाता है। 

    13 –  विवाह संस्कार ! प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।

    हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। हमारे देवभूमि उत्तराखण्ड के अलावा भी आज देश भर में कई प्रान्तों में रात्रि तमाम गोष्ठ यानि गौनिवास में शादी-विवाह करते है। ताकि 33 कोटि प्रत्यक्ष देवी-देवताओं का (गौमाता ) आशीर्वाद इस विवाह को मिल सके। जो सुसंस्कारी परिवार है उन्होंने ये परम्परा आज भी नहीं छोड़ी है। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है। पहले प्रतेक घर में एक गोष्ट या गौ निवास होता था पर अब समय बदल गया है इसलिए इस ”विवाह संस्कार” को अगर विद्द्वान आचार्य स्वच्छ, सुन्दर गौ-शाला में अनेको गौमाताओं, नंदी भगवान, एवं बछड़े – बछियों के पवित्र सानिंध्य में ”सात फेरे” करायें तो विवाह गठबंधन सात जन्म तक सुरक्षित रहता है यह मान्यता है हमारे सनातन शास्त्रों की जो सदा सत्य ही होती है।  

    14 – अन्त्येष्टि संस्कार ! यहाँ तक की अंतिम संस्कार में भी बैतरणी पार करने हेतु गौ-दान और ”गौमाता” के पूछ पकड़ा कर मृतक शरीर को गौ-लोक धाम की, वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति करायी जाती है। जिससे जीव की आत्मा फिर 84 के फेरे में यानि ”पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनं”

    भज गोविन्दं, भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते !!  आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने लिखा —

    बार-बार जन्म लेने का दुःख, बार-बार मरने का दुःख और बार-बार माँ के पेट में रहने का दुःख क्यों भोग रहा है ? अरे मूढ़मति !! (इन दुखों को समाप्त करने के लिए) 33 करोड़ देवी-देवताओं का शुद्द निवास स्थान गौशाला में बैठ कर श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, श्रीकृष्ण का स्मरण कर, या अपने-अपने इष्ट को भजों। —

     इस तरह सनातन धर्म के प्रतेक संस्कार में गौमाता एवं गौवंश का अतिमहत्वपूर्ण स्थान था, है, रहेगा। यहाँ तक की किसी कारण वस किसी के पितर नीच योनी में चले गयें है,या प्रेत योनी में गये अपने ही पितर पुरे परिवार को परेशान करते है तो सनातन शास्त्रों के अनुसार एक नंदी बैल को छोड़ा जाता है। गौदान किया जाता है। पर आज के समय में नंदी बैल को खुला छोड़ने का मतलब कसाई- गौहत्यारों को दावत देना और पाप को मोल लेना है। इसलिए आज का मानव भी अपने पितरों की तारण-तरन के निमित गाय, बछिया, बछड़े  या नंदी बैल का दान किसी सुरक्षित,पवित्र, स्वच्छ, सुन्दर गौशाला में करें तो वही पुण्य प्राप्त कर सकता है जो वेद पुराणों में वर्णित है । इसीलिए कहाँ गया है ”गाय के विना गति नहीं, वेद के विना मति नहीं” —–

  • किताब की प्रस्तावना :: देश व समाज का निर्माण मनुष्य का दायित्व है

    मनुष्य के बिना देश हो ही नहीं सकता, और जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहां देश होगा ही होगा। मनुष्य बड़ा है देश से, क्योंकि मनुष्य बनाता है देश। देश की सत्ता, मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही बनाता व निर्धारित करता है। मनुष्य है तो देश है, बिना मनुष्य के देश का कोई अस्तित्व नहीं। यही सहज सामाजिक तथ्य है, शेष तर्क व परिभाषायें राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने वर्तमान अस्तित्व के लिये तोड़मरोड़ कर उनके अपने निहित-स्वार्थों के लिये थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिये देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है जिसका निर्माता मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़ गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की किताबों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा।

    यही बदलाव का दिन वास्तविक व व्यापक परिवर्तन का दिन होता है। सत्ता को चलानें वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है, इस यथार्थ को समझना व चारित्रिक रूप से जीना ही मनुष्य का लोकतांत्रिक होना है। मनुष्य की इस लोकतांत्रिकता के द्वारा ही उसका देश लोकतांत्रिक बनता है। किसी देश को उस देश को बनाने वाले मनुष्य लोकतांत्रिक बनाते है, दूसरे शब्दों में लोकतांत्रिक मनुष्य ही देश को लोकतांत्रिक बनाता है, न कि देश का कानून, संविधान व सत्ता प्रणाली। सत्ता प्रणाली राजतंत्रीय होते हुये भी देश व देश का मनुष्य लोकतांत्रिक हो सकता है।

    मनुष्य देश का निर्माण करता है। देश का निर्माण धार्मिक समूहों, राजनैतिक समूहों व आर्थिक तंत्रों आदि पर न तो निर्भर करता है और न ही इन सब से देश निर्माण की अपेक्षा ही की जानी चाहिये।

    देश निर्माण मनुष्य की जिम्मेदारी है। धार्मिक समूह, राजनैतिक समूह व आर्थिक तंत्र आदि मनुष्य द्वारा निर्मित देश के विभिन्न अवयव होते हैं, जिनको वर्तमान प्रासांगिकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है। मनुष्य देश निर्माण की प्रक्रिया में विभिन्न अवयवों का निर्माण करता है, फिर उन्हें परिवर्तित करता है। अवयवों के निर्माण व परिवर्तन की प्रक्रिया में वह सीखता है और बेहतर निर्माता बनता है। और यही बनाना और सीखना ही मूलरूप में लोकतांत्रिक होना होता है…. यही है लोकतंत्र का मूलभाव।

    देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचनात्मकता है। इसलिये जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।

    सत्ताओं में व्यापक-सामाजिक-परिवर्तन का कोई सामाजिक-अवतार नहीं होता
    सामाजिक-अवतार राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम-मनुष्य के समाज में होते हैं

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भीसामाजिक-अवतार नहीं होता जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। सामाजिक-अवतार तो आम समाज से अंकुरित व पुष्पित होते है और मनुष्य निर्मित सत्ताओं के बिना रहते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्ही तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जानें का साहस व दृष्टि हो ही नही सकती है।  इसीलिये तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते है, ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिस्थापित किये गये हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह वास्तव में आम मानव का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह होती है, जिसमें सबसे नीचे का आधार सबसे चौड़ा और सबसे ऊपर की चोटी सबसे नुकीली और सबसे कम चौड़ी होती है।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाकर व दबाये रहते हुये ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिये मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, व्यापक-समाधान की दृष्टि नही रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    विश्व में अ-आयुधनिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलकर ही हुये हैं।

    यह किताब धन, मोहकता व मीडिया आदि के प्रायोजन के कारण बड़े दिखने वाले अदूरदर्शी व तात्कालिक लक्ष्य वाले कामों की चर्चा को नहीं करेगी या अत्यधिक प्रासांगिक होने पर ही करेगी। किताब मे ईमानदार व दूरदृष्टि वाले प्रयासो की चर्चा की गई है। जिनसे वास्तव मे समाज का वास्तविक विकास हो सकता है, दिखा है, हुआ है। इनमें से लगभग सभी कामों को या तो मैने नजदीक से देखा है, या मै खुद सक्रिय रूप से भागीदार रहा हूँ। यह किताब उद्योगपति, नौकरशाह, किसान, सामाजिक-संस्था आदि के द्वार आम-मनुष्य के तौर पर किये गये कार्यों व प्रयासों की बात करती है, जिनने देश व समाज को उत्तमता की ओर बढ़ने की दिशा दी, प्रेरित किया, गति दी।

    यह किताब उन लोगों के लिये बहुत कुछ लिये हुये है, जो लोग भारतीय समाज के विकास व समाधान के लिये ईमानदार सोच व प्रतिबद्धता रखते हैं।

    यह किताब ऐसे ही मनुष्यों को समर्पित है, ऐसे ही लोगों की चर्चा करती है, जो संज्ञानता या बिना-संज्ञानता के देश के निर्माण, पोषण व उत्तमता की ओर ले जाने के लिये विचार करते हैं, प्रयास करते हैं, कर्म करते हैं।

    —–
    द्वारा
    विवेक ग्लेंडेनिंग उमराव ‘नोमेड’
    www.nomadhermitage.groundreportindia.org

  • 7 नवम्बर गौ मैराथन में दिल्ली चलो

    सर्वदलीय गौरक्षा मंच

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    7 नवम्बर गौ मैराथन में दिल्ली चलो ! ये सभी गौ-भक्त, संत – महंत शंकराचार्यों के आलावा हजारों लोग पधारेंगे जंतर मंतर पर 1966 के गौ भक्तों शहीदों को श्रधांजलि देने ..

    गौ-प्राण संत गोपाल दास जी महाराज एवं अनेक संत 30 अक्टूबर से ही दिल्ली जंतर-मन्त्रर पर गौ माता के लिए पूर्ण रूप से अनसन पर बैठ जा रहे है। 7 नवम्बर को या उससे पहले भी जो वहां कभी भी उस तीर्थ में आना चाहे रात्रि को भी दिल्ली में स्थान ना मिलने के कारण तो वहाँ रह सकते है टेंट के अन्दर। यह वह स्थान है, जहाँ हमारे हजारों संतो, गौ-भक्तों को तत्कालीन सरकार ने 7 नवमबर 1966 को गौ-माता का हक़ मांगने पर शहीद कर दिए था। यह द्रश्य २०१३ का है जब भी हम यहाँ धरने पर थे गौ माता को राष्ट्रिय प्राणी घोषित कराने और सभी देश भर के गौ-भक्त संत वहां पधारें थे जिनको गौमाता की पीड़ा दिखती है।

    विश्व के इतिहास में पहली बार एक दौड़ गौमाता के लिए पुरा हिंदुस्तान दौडे़ंगा गौ माता के लिए 7 नवंबर 2014 दिन शुक्रवार को गौभक्त शहीद दिवस के उपलक्ष्य में और देश के गौ वंश को बचाने के लिए जन जागरूकता अभियान एवं गौ मैराथन दौड़ का आयोजन किया जा रहा है जिसमें पुरा देश एक सन्देश के साथ दौड़ेगा गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित करो “गौ वंश को बचाना है और देश को आगे बढ़ाना है”।

    7 नवम्बर को गौ मैराथन !

    ठीक 8 बजे सभी गौ-प्रेमी मित्रों जन्तर मन्तर से गौ-मैराथन शुरू होगी और भगवान दास रोड,तिलक रोड,मंडी हॉऊस, बाराखम्बा रोड होकर जंतर – मन्त्रर पर गौ-भक्त शहीद स्थल पर पहुचंगे और गौ-भक्त शहीदों को अपनी श्रधा सुमन अर्पण करने के बाद जंतर-मंतर पर जगद गुरु शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज जी एवं संत गोपाल दास जी महाराज के पवित्र सानिंध्य में गौ-माता के प्रति अपने – अपने उद्गार रखंगे एवं प्रेस के माध्यम से सरकार के सामने गौ-माता को राष्ट्रिय प्राणी ( राष्ट्र माता) का दर्जा दिया जाय यह मांग रखेंगे . इसके ठीक दस बजे सर्वदलीय गौ रक्षा मंच का एक प्रतिनिधि मंडल माननीय प्रधान मंत्री एवं महामहिम राष्ट्रपति जी एवं गृह मंत्री जी को ज्ञापन देंगे …10721281_10204937565816695_1447144588_n

    संत गोपाल दास जी महारा?

    मैं भी दौडुंगा गौ माता के लिए, आप भी दौडे़ंगे गौ माता के लिए, हम सब दौडे़ंगे गौ माता के लिए, पूरी दिल्ली दौडे़ंगी गौ माता के लिए, पुरा देश दौड़ेगा गौ माता के लिए।

    वन्दे गौ मातरम् गौ रक्षा परमो धर्मः जय गौमाता की।

    निवेदक सर्वदलीय गौरक्षा मंच
    हमें चाहिए गौ हत्या मुक्त हिंदुस्तान

  • आप और मैं

    आप और मैं

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मैं तब भी मेहनत करता था
    मैं आज भी मेहनत करता हूं

    आप तब भी वादे करते थे
    आप आज भी वादे करते हैं

    नियति 
    आपने जबरन बनाई
    या
    आपके बनाये ईश्वर ने बनाई

    कुछ तो है 
    जो 
    मेहनतकश को नीचे रखता है
    मेहनतकश को कुचलने वाले को ऊंचे रखता है

    विज्ञान आपका
    बाजार आपका
    तकनीक आपकी
    मुद्रा आपकी

    कानून आपके
    राष्ट्र आपके
    सेना आपकी
    संविधान आपके

    जीवन मूल्य आपके
    धार्मिक किताबें आपकी
    मंदिर आपके
    पुरोहित आपके 

    अपराध की परिभाषाएं आपकी
    अपराध को लिये नियत दंड आपके
    अपराधी आपके 
    न्यायालय आपके
    न्यायाधीश आपके

    सबकुछ आपका
    केवल एक को छोड़कर
    और वह एक है
    मुझ जैसा ‘मेहनतकश’

    पता नहीं क्यों 
    आप 
    मेहनतकश को अपना नहीं मानते

    पता नहीं क्यों 
    आप 
    भयभीत रहते हैं मेहनतकश से

    जो सहज प्राकृतिक नियमों
    को इतर रखकर
    आपनें सबको असहज करने
    के तंत्र बनाये

    आपनें डरकर तंत्र बनाये
    खुद को सहज करने को
    लेकिन खुद को घोर
    असहजता ही दी।

    कभी सोचा आपने
    कि
    वास्तव में आपको
    भयभीत
    मुझसे होना था
    या
    खुद अपने आपसे। 

    बस यही कहना था
    और 
    हजारों साल के 
    शोषण व अन्याय
    के बावजूद
    यह कह पाने की
    हिम्मत
    आज भी है
    मुझमें।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India.