जीवन मझदार

एक भी नाव नहीं है मेरे पास
लकड़ी की या कागज़ की
और तुम कहते हो
कि दो नावों पर सवार हूँ मैं

देख ही रहे हो
३२ साल से एक नदी को
पार नहीं कर पा रहा हूँ
बीच धार में चिल्ला रहा हूँ
मुझे बचा लो
कोई आता भी नहीं बचाने अब किसी को

कितनी नावों में कितनी बार
बैठने की हसरत लिए
मर नहीं जाऊंगा एक दिन

वैसे अच्छा ही हुआ कोई नाव नहीं है
क्या पता उसमे एक छेद होता
और डूब जाता मैं
या नाव ही उलट जाती .

अब बहुत अँधेरा है पहले से अधिक
बहुत तेज़ आंधी
खून खून चारों तरफ दीवारों पर

सच कहता हूँ
अब दम घुटने लगा है
आपस में ही उलझ गए हम
एक दूसरे को दुश्मन मान बैठे हैं
अब तो लगता है
यह नाव भी अब नाव कहाँ है
जब बुलेट ट्रेन चलने की बात हो रही है
मुल्क में

एक भी नाव नहीं है
एक भी सायकिल नहीं
नंगे पाव् ही चलना है
रेत में
फिर क्या कहना
कि पाँव जल रहे हैं मेरे
कृपया मेरे इस त्याग को दर्ज कर लिया जाये इतिहास में

Comments

One response to “जीवन मझदार”

  1. विजेन्द्र दीवाच

    बहुत खूब।

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