चन्द्र सिंह गढ़वाली :: स्वाधीनता आन्दोलन में सांप्रदायिक सौहार्द की मिशाल पैदा करने वाला का एक नायक

विद्या भूषण रावत

अक्टूबर १ को पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की पुण्य तिथि थी लेकिन सतही तौर पर याद करने के अलावा उनके बारे में बहुत कुछ जानकारी न तो उपलब्ध है और न ही उनके जीते जी उन्हें सत्ताधारी इज्जत दे पाए क्योंकि चन्द्र सिंह हमेशा ही सत्ताधारियो से टकराए. वह आर्य समाजी थे और  गाँधी से भी बहुत प्रभावित थे लेकिन उनके विचार और एक्शन में वह इन दोनों ही विचारो से बहुत आगे थे . चन्द्र सिंह का जन्म १८९१ में गढ़वाल में हुआ था और २१ वर्ष के आयु में वह फौज में भर्ती हो गए. पहाड़ो में उन्होंने अथाह गरीबी देखी और इसी कारण अधिकांश युवा फौज में भर्ती होते थे . चन्द्र सिंह गढ़वाली ने द्वितीय विश्वयुध में ब्रिटिश सेना के की और से भाग लिया. चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी आज के सांप्रदायिक दौर में एक मिशाल है जिसे बार बार पढना और सुनाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की खुशियों को संप्रदायिक सौहार्द की खातिर कर दिया . आज जब हमारी सेनाओं और पुलिस प्रशाशन का सम्प्रदयिककरण हो रहा है तब देश के सैनिक, प्रशासक और पत्रकार भी ये पढ़े के क्यों इस देश की एकता और मजबूती के लिए चन्द्र सिंह की कहानी पढना जरुरी है और ये भी के पेशावर का विद्रोह केवल एक झटके में किया गया सैन्य विद्रोह नहीं था अपितु इसके पीछे चन्द्र सिंह की राजनैतिक समझ थी जो यह मानती थी के अंग्रेजी राज भारत में हिन्दू मुस्लिम विभाजन कर हमेशा के लिए शाशन करना चाहता था .

दुःख इस बात का है के इतिहासकारों और नेताओं ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के साथ अन्याय किया . उनके इतने बड़े विद्रोह को जिसके फल्वरूप गढ़वाल रायफल के जाबांज देशभक्त सिपाहियों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और अपने हथियार डाल दिए ताकि एक और जलियांवाला न हो/ चन्द्र सिंह गढ़वाली की वीरता को न तो चारण इतिहासकारों ने स्थान दिया न ही सत्ताधारियो ने क्योंकि उनके विचार बहुत क्रन्तिकारी थे. इस सन्दर्भ में हमें भारतीय साहित्य के पुरोधा राहुल संकृत्यायन का ऋणी होना पड़ेगा जिन्होंने १९५५ में चन्द्र सिंह गढ़वाली की आत्मकथा लिखी जो किताबमहल प्रकाशन ने छपी. महत्वपूर्ण बात यह के इस पुस्तक में जिस बारीकी से राहुल जी ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के जीवन के बारे में बात की है वो बहुत महत्वपूर्ण है खासकर इस सन्दर्भ में जब तथाकथित इतिहासकारों की नज़र से इतिहास गायब हो तो हमें ओरल हिस्ट्री का सहारा लेना पड़ेगा .

मैंने बचपन में चन्द्र सिंह गढ़वाली के बारे में सुना था क्योंकि वो मेरे ननिहाल के पास के थे . लेकिन मुझे उनकी महत्ता या महानता का अंदाज केवल तब हुआ जब मैंने राहुल जी द्वारा लिखित उनकी जीवनी पढ़ी और यही से मेरा ये गहन सोच है के घुम्म्क्कड़ लोग अगर चाहे तो न केवल बहुत बड़े साहित्य की रचना कर सकते हैं अपितु इतिहास को भी खोज निकालेंगे जिन्हें भारत के सन्दर्भ में ब्राह्मणवादी साहित्यकारों और नेताओं ने छुपाया है.

क्या यह शर्मनाक नहीं के गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे नेताओं ने जीवन पर्यंत चन्द्र सिंह गढ़वाली को न तो सम्मान दिया और न ही उन्हें उनके योगदान के लिए कोई आधिकारिक मदद. आज़ादी के बाद भी कुछ सालो तक उनको अपराधी ही माना जाता रहा .  चन्द्र सिंह आर्य समाज से प्रभावित थे और गाँधी जी की सभाओं में भी जाते थे लेकिन वो सेना में होने के बावजूद भी लोकतान्त्रिक थे.

चन्द्र सिंह गढ़वाली की ऐतिहासिक भूमिका के लिए हमें ये समझना पड़ेगा के पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम में पठानों के इलाके में खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें बादशाह खान के नाम से भी जाना जाता है, कांग्रेस और गाँधी जी के साथ मिलकर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे . पठानों ने इस अवसर पर कांग्रेस का साथ दिया था और ये बात सब जगह पता चल चुकी थी के अंग्रेज पठानों के इस विद्रोह को कुचल देना चाहते थे और उसके लिए उन्हें ऐसी बहादुर सैन्य टुकड़ी चाहिए थी जो बिलकुल उस इलाके न हो ताकि  सैनिक बिना किसी चिंता के बेशर्मी से विद्रोह को कुचल सके. ये निति तो अंग्रेजो के बाद भी सभी सरकारे करते हैं के किसी भी स्थान पर जन विद्रोह को दबाने के लिए वहा से दूर के सैनिको को बुलाया जाता है ताकि उनका कोई सहानुभूति स्थानीय लोगो के साथ न हो  और वो निर्दयिता से अपना काम करें . गढ़वालियो को पहाड़ से पेशावर या एबोटाबाद भेजने के पीछे अंग्रेजो की यही रणनीति थी के वे पठान विद्रोह को बेरहमी से कुचल देंगे लेकिन चन्द्र सिंह की जाति धर्म से ऊपर उठकर जन असंतोष को राजनितिक समझ आज के दौर में और भी प्रासंगिक है .

१९३० में पेशावर की उस घटना का चिंत्रण जो राहुल जी की पुस्तक में विस्तार पूर्वक है :

“२३ अप्रेल १९३० को कंपनी के ओहदेदारों और सिपाहियों को हुक्म हुआ : ‘ पांच मिनट के अन्दर फालिन हो जाए’. राइफ़ले, दूसरे सामान, और फौजी मोटरे सामने तैयार रखी गयी थी. रसौइयो को एक घंटे के अन्दर रोटी पका देने का हुकुम दिया गया था . ७ बजे से ८ बजे तक यह काम होते रहे. ‘ सुबह कप्तान रिकेट ने आदेश दिया : गढ़वाली बटालियन एडवांस’. गढ़वाली बटालियन आगे बढ़ो.

राष्ट्रीय झंडे के चारो और वीर पठान खड़े थे . मंच पर खड़े होकर एक सिख नेता ने कभी पश्तो में और कभी उर्दू में जोशीला व्याख्यान देना शुरू किया . लोगो से आवाज आती..नारे तकबीर : अल्लाह हो अकबर, महात्मा गाँधी की जय.

कप्तान रिकेट ने कहाँ , ‘ तुम लोग गोली से मारे जाओगे , नहीं तो गोली से मारे जाओगे. पठान जनता टस से मस नहीं हुई . गोली से खेलना वह नहीं भूली थी. अब कप्तान रिकेट ने हुक्म दिया : गढ़वाली तीन राउंड फायर. चन्द्र सिंह रिकेट के बाएं खड़े थे . उन्होंने जोर से बोला : गढ़वाली सीज फायर. गढ़वाली गोली मत चलाओ . हुकुम को सुनते ही गढ़वालियो ने अपनी अपनी राइफ़ले जमीन पर कड़ी कर दी . इसे कहने के आवश्यकता नहीं के गढ़वालियो ने देश के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखला दी . एक गढ़वाली सैनिक उदे सिंह ने अपनी बन्दूक को एक पठान के हाथ में देकर कहा : लो भाई, अब आप लोग हमको गोली मार दे .

जिस वक़्त पलटन १ और २ के सभी सिपाहियों ने अपने अपनी राइफ़ले जमीन पर रख दी, उसी समय नंबर ३ पलटन के कमांडर लुथी सिंह को यह सब नहीं देखा गया और उसने आगे बढ़कर फायर करने का हुकुम दिया और स्वयं से गोली भी चलाई. लेकिन पलटन ३ के लोग भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए . कप्तान रिकेट ने लाल लाल आंखे करके चन्द्र सिंह की और देख कर कहा : क्यों, यह क्या बात है ? चन्द्र सिंह ने कहा : ये सारे लोग निहत्थे हैं . निहत्थो पर गोली कैसे चलाये

इसके बाद वहा अंग्रेजो ने अपनी प्लाटून को भेजा जिसने लोगो पर फायरिंग कर दी जिसमे कई लोग मारे गए. सब जगह अफरा तफरी हो गयी और कप्तान रिकेट की भी मौत हो गयी . चन्द्र सिंह और उनके साथियो ने भी खुद को किसी तरह से बचाया क्योंकि अव्यवस्था में तो किसी को पता नहीं होता के कौन दोस्त हे ओर कौन दुश्मन.

( चन्द्र सिंह गढ़वाली : राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से )

पेशावर में अफरातफरी मच गयी . किसी तरह से सभी विद्रोही सिपाही बच कर अपनी बैरकों में आये और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया . चन्द्र सिंह को एबटाबाद जेल में भेजा गया. वह लगभग १४ वर्षो तक जेल में रहे . पूरे विद्रोह की खास बात यह थी के ये देश के पुर्णतः विचारिक था, देशभक्ति से ओतप्रोत था और अपने ही देश के निहत्थे नागरिको पर गोली चलाने को गलत मानता था. चन्द्र सिंह और उनके साथियो के लिए पेशावर जैसे जगह बिलकुल नयी थे, न ही उनके पास भागने के कोई रस्ते थे क्योंकि सभी पहाड़ो से आये थे इसलिए न तो भाषा और न ही खान पान उनके पसंद. वे सभी फौज के सिपाही थे और उस वक़्त अधिकांश लोग जो पढ़ लिख नहीं पाते थे फौज में ही जाते थे . लेकिन इन सबके बावजूद वे सांप्रदायिक सौहार्द के लिए इतनी बड़ी मिशाल पैदा करेंगे इसको समझना चाहिए. इससे भी अधिक ये चिंता के हमे ‘निहत्थो’ पर गोली नहीं चलानी है . आज के फौज और पुलिस के अधिकारियों और निति निर्माताओं के लिए ये बहुत बड़ा सबक है जो मुसलमानों को दुश्मन समझते हैं . जब पहाड़ो से आये लोग जहाँ मुस्लिम उपस्थिति न के बराबर थी और जहाँ ब्रिटिश भी नहीं पहुँच पाए वो लोग सेना में जाकर समय मिलने पर अपने देश के लोगो पे गोली चलाने से इनकार कर दे और वो भी उस स्थान पर जो कही से भी उनका नहीं था, न ही उनके समर्थन में प्रदर्शन करने वाले लोग वहा होते, ये बात इतिहास में बहुत कम मिलेगी लेकिन चालाक इतिहासकारों ने इस बात को हाशिये पे डाला.

आज़ादी के बाद चन्द्र सिंह भटकते रहे . सभी साथी जिन्हें कालापानी की सजा हुयी वे न्याय की आश में रहे लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला.  चन्द्र सिंह रिहाई के बाद सामाजिक राजनैतिक जीवन में सक्रिय हो गए लेकिन वह कभी चुनाव नहीं जीत पाए . कांग्रेस उनकी चाहत नहीं थी और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकेट पर वो चुनाव लडे परन्तु जनता का भरोषा नहीं जीत पाए आखिर जनता उन्हें चाहे क्यों ? उनके क्रन्तिकारी विचारो को अगर सुनेंगे तो पता चलेगा के जातिवादी जनता क्यों उन्हें चाहेगी ? उत्तराखंड में दलितों के प्रश्न पर उन्होंने जो कहा वो समझने वाला है और शायद जातिवादी पार्टियों और नेताओं को वो रास नहीं आया .

सह्श्रब्दियो से जिस जाति व्यवस्था ने हमारे देश की चौथाई मानवता को इस हीन् अवस्था में पहुँचाया, वह तब तक उन्हें उठने नहीं देगी जब तक उस व्यवस्था में भीतर आग नहीं लगा दी जाती और यह आग शिक्षा और बेहतर शिक्षा व्यवस्था से ही लगाईं जा सकती है .

 

उत्तराखंड के अन्दर दलितों के अधिकारों के विषय में चन्द्र सिंह गढ़वाली के विचार

जमींदारी प्रथा ख़त्म कर बंजर और जंगलो के जमीन उनको देनी चाहिए

नौकरियो में अनुपात के मुताबिक उनको जगह मिले

उनकी पढाई के लिए शिक्षा निशुल्क हो

अस्सेम्बलियो और कौंसिलो में उनके लिए अनुपात के मुताबिक सीटे दी जाए

उद्योगों में उन्हें प्रथम स्थान मिले

(राहुल जी की पुस्तक वीर चन्द्र सिंह गड्वाली) से साभार.

अब आप समझ सकते हैं इतने क्रन्तिकारी व्यक्ति को उत्तराखंड की ‘देवभूमि’ में दलितों के अधिकार की बात करेगा तो पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त या उसके बाद के सवर्ण नेता क्यों सम्मान करेंगे ? चन्द्र सिंह गढ़वाली जिन्दगी भर आर्थिक बदहाली में रहे . उनका ये दर्द हमेशा था के पेशावर काण्ड के क्रांतिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार ने कभी सम्मान नहीं दिया .

२० सितम्बर १९५४ को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक पत्र भेजा जिसमे उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का विवरण दिया था . उनकी झोपड़ी वर्षा से टूट चुकी थी और आमदनी के नाम पर उन्हें १६ रुपैये पेंशन मिलती थी. उनके ऊपर १४००० रुपैये का कर्ज था. खाने पीने के बर्तन भी नहीं थे . उन्होंने सरकार से अपनी मदद की अपील की . लगभग एक वर्ष बाद २५ जुलाई १९५५ को प्रदेश सरकार ने एक पत्र भेजकर ‘ख़ुशी’ जाहिर की के उन्हें आजीवन १४ रुपैये महीने पेंशन मिला करेगी.

( राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से )

शर्म की बात  यह के ६५ वर्ष की उम्र में देश के लिए इतनी कुर्बानियों के बाद भी और व्यक्तिगत तौर पर पत्र लिखने पर भी सरकार ने उन्हें १४ रुपैये लायक ही समझा ये दर्शाता है के भारत में स्वाधीनता के बाद गैर गांधीवादी विद्रोह के नायको के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया .अक्टूबर १, १९७९ में उनका निधन हो गया . आज अस्मिताओ के इस युग में चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम लेकर उनको स्मारकों में सीमित करने का प्रयास है लेकिन उनके विचारों से तो सामंतवादी जातिवादी सांप्रदायिक नेताओं और पार्टियों को कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि उनके विचारो और पेशावर कांड में उनकी ऐतिहासिक भूमिका के लिए वो आज भी याद किये जाने चाहिए . साप्रदायिक सौहार्द की मजबूती के लिए पेशावर के उनके विद्रोह को आज भी याद करना जरुरी है .

 

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