प्रेम – असहमति

Mukesh Kumar Sinha

असहमतियां
नही होती
हर समय
सहमति का विपरीत

असहमति
कई बार
बस ये जताने के लिए भी
होती है
कि समझ पाए अहमियत ।

विरोध
वक़्त बेवक्त
किया जाता है
सबसे अपनों का

विरोध
में छिपा होता है
सुझाव
कि समझा करो
या, ऐसे तो समझोगे न !

प्रेम
में भी कई बार
करना पड़ता है
‘न’ का सामना

प्रेम
का उत्सव सरीखा
किस डे/ हग डे
में असहमतियां
झिझक भी हो सकती है
जो, प्रेम का विरोध तो नहीं

प्रेम
में बहते हुए
प्रोमिस डे के दिन कहना
कि प्रोमिस करो
प्रेम करते रहोगे न
शायद उम्मीदों का गुलाब ही तो है

Mukesh Kumar Sinha

प्रेम
कितना चॉकलेटी होता है न
तभी तो
चुप्पियां सहमति समझी जाती है
फिर भी चिल्ल्ला कर
जताना चाहते हैं प्रेम

प्रेम सिक्त नजरें
मौन हो कर भी
बता देती है
हवाओं में गुलाबी सुगंध है ।

असहमति
भी प्रेम ही है
समझे न
माय वेलेंटाइन !!

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