महावरी, सैनेटरी पैड से जुड़ी वर्जनाएं एवं हमारी नासमझी

Apoorva Pratap Singh

मेरा दोस्त है पारीक, उसने पिछले साल मुझे कहा था कि विडम्बना है कि सैनेटरी पैड की कम्पनी अपना नाम व्हिस्पर (फुसफुसाहट) रखती है ! मतलब टैबू मॉडर्निटी के संग संग चल रहा है । कुछ कुछ वैसी ही अक्षय की फिल्म है । अच्छी कोशिश है इससे इंकार नहीं ! खैर ! जब हम एड देखते हैं किसी sanitary पैड्स ब्रांड का उसमें कपड़े की कई प्रॉब्लम्स दिखाई जाती हैं और उनके प्रोडक्ट को बढ़िया दिखाया जाता है । जबकि इन सब ब्रांड्स की manufacturing यूनिट्स में कई स्टैंडर्ड्स का उल्लंघन किया होता है । एक नैपकिन में 80 प्रतिशत सामान प्रदूषित या संक्रमित होता है । उसकी खुशबू और सफा सफेदी देख कर हम उसे साफ़ मानते हैं । इन सबको हटा भी लें तो कुछ भी recyclable नही होता।

भारत में माहवारी सम्बन्धी स्वच्छता की कमी है, उसे भरने हेतु सैनेट्री नैपकिन्स की पहुँच बढ़ाने की मुहिम चल रही है। पर असल में हम सब धरती को नुकसान पहुंचा रहे हैं । हर महीने अकेले हमारे देश में ही 60 लाख बिलियन से ऊपर माहवारी सम्बन्धी कचरा पैदा होता है जो कि सैनिटरी पैड्स और टैम्पून्स की देन है । सभी को देश के वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का हाल मालूम है, यह इस्तेमाल किये हुए प्रोडक्ट्स बीमारियां बढाने में अभूतपूर्व योगदान देते हैं। इन कन्वेंशनल पैड्स के जन्मदाता अमेरिका और यूरोप इस प्रदूषण से बचने के लिए महिलाओं को कपड़े के पैड्स के लिए उत्साहित कर रहे हैं। जहां हम सैनिटरी नैपकिन रिवोल्यूशन की बात कर रहे हैं, वही वे इससे मुक्ति के लिये मुहीम चला रहे हैं क्योंकि उन्हें इसके हानिकारक परिणाम डरा रहे हैं।

Apoorva Pratap Singh

अभी बाजार मे Biodegredable पैड्स आ रहे हैं जो सस्ते हैं। रीयूजेबल भी हैं लेकिन इनकी सफाई अच्छे से सम्भव नहीं है क्योंकि ये कई परतों में सिले हुए होते हैं जिससे उनको धूप नही मिलती । इसीलिए सिर्फ एक बिना सिला सूती कपड़ा सबसे अच्छा ऑप्शन है, जिसके सारे फोल्ड्स को खोल कर में सुखाया जा सकता है या मेंस्ट्रुअल कप्स हैं। आप शायद कहेंगे कि यह आपकी दिनचर्या से मैच नही करता लेकिन अगर आप सोशल मीडिया इस्तेमाल कर रहे हैं तो अधिकतर बार सम्भव है कि आप के घर ऑफिस में टॉयलेट्स भी होंगे और जब ऐसा नही हो तो भी कई उपाय निकाले जा सकते हैं।

मेरा यह सब लिखने का कारण है जो सबसे प्रमुख वो है पर्यावरण का दूषित होना और आँखे मूंद कर बाजार की हर बात को सही मान लेना. दूसरा यह सोचिये कि हम अपने दूसरे टैबूज़ में से निकल कर एक नए टैबू, (कपड़ा इस्तेमाल करने से परहेज या योनि में कप फिक्स करने में हिचकिचाहट ) में तो नहीं घुस रहे । जैसे WASH जो एक NGO है एक रेड हट नामक पहल कर रहा है जिसमें वो औरते रहेंगी जो माहवारी से हैं !!! यह उस पुराने नियम से अलग कैसे हुआ, क्या यह अब पितृसत्तात्मकता को मॉड तरीके से सहलाना नही होगा !!! क्या हमारी जरूरतें बाजार तय कर रहा है? क्या पैड्स इकोनॉमिकली गरीब तबका अफोर्ड कर पायेगा और अगर फ्री में मुहैया करा भी दें तब भी वो हानिकारक है।

हमें खुद और दूसरों को, संग पढ़ने, काम करने वालियों को प्रेरित और जागरूक करना चाहिए ।