कैंसर पीड़ित महिला

Vandana Dave

(1)

असहनीय पीङा थी 
कहने से शरमाती थी
बढ़ता रक्तस्राव 
अश्रुओं में बह जाता था
कर घर के उपचार
काम में लग जाती थी
बगल की गाँठ
देखकर
अनदेखा कर देती थी
सीने पर लाल दानों को
अलइयाँ कहती थी
निप्पल से निकलते 
पदार्थ को बच्चे का
दूध समझती थी
इस अनहोनी से वह 
बिलकुल अंजानी सी थी
एक दिन आखिर 
डरते डरते उसने 
बतलाया 
लेकिन 
देर बहुत हो चुकी थी
मेहमान वो बस
कुछ ही दिनों की थी

(2)

वस्त्रों से अपने को 
ढँकना है
छूपाना नहीं

दर्द कहीं भी हो
तोङ दो सहने 
का सलीका 
सबकुछ बतलाना है

दिल की गाँठ
बगल में आते 
लगती नहीं है देर
अपने को हरदम 
टटोलना है

खूबसूरती सिर्फ 
चेहरे की नहीं 
स्वच्छता हर अंगों की 
जरूरी है

ये चुप्पी, ये शरम, ये हया
पल्लू के पीछे बढती
गाँठों के लिए नहीं है
झिझक तुम्हें तोङनी है
अपने को बचाना है!!!

श्रीमती वन्दना दवे
पेटलावद (झाबुआ) मप्र में जन्म। ग्रामीण जीवन जिया इसलिए कुछ फकीराना अँदाज है जीने का व सोचने का। इन्दौर के कस्तूरबा ग्रामीण संस्थान से ग्रामीण विकास एवं विस्तार में एमए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक। वर्तमान में भोपाल में निवासरत।

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