Rajneesh Sachan
Founder, MadhyaMarg
Editor, Ground Report India (Hindi)
जिन दो किसानों के खेत एक दूसरे से लगे हुए होते हैं उन दोनों किसानों के खेतों के बीच में एक मेढ़ होती है, जो दोनों के लिए साझी होती है,और वह पतला सा ज़मीन का टुकड़ा दोनों का साझा होता है । कुछ अपवाद मामलों को छोड़कर अधिकतर किसान खेत जोतते समय हर बार थोड़ी थोड़ी मेढ़ खुरचते जाते हैं। एक समय ऐसा आता है कि मेढ़ के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगता है। फिर दोनों किसान आपसी सहमति से दोबारा मेढ़ बनाते हैं। जो खेत सड़क किनारे होते हैं या नहर किनारे होते हैं उन खेतों के मालिक किसान हर बार जुताई करते हुए थोड़ी सड़क या नहर की तरफ की ज़मीन या खेत से लगी कोई भी सार्वजनिक ज़मीन खुरचते जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि दो चार इंच ज़मीन से पैदावार में कोई अंतर आता है। लेकिन मामला मानसिकता का है।
कस्बों में शहरों में लोग जब अपने घर बनाते हैं तो जो ज़मीन उन्होंने खरीदी होती है, उस ज़मीन के बिलकुल बाहरी छोर पर दीवार खड़ी करने की कोशिश करते हैं। कोशश तो यह होती है कि जहाँ तक संभव हो दीवार बाहर खड़ी कर लो। पार्कों और गलियों में कब्ज़ा कर लेना बहुत सामान्य घटना है। घर के आगे सड़क तक की ज़मीन तो अपनी ही होती है उसपर कोई शक नहीं होता किसी को।
बेचारे फ़्लैट वाले ज़मीन कब्ज़ा नहीं पाते तो हवा में जितना संभव हो स्ट्रक्चर बढ़ा कर कुछ नहीं तो गमले ही रख लेते हैं।
कुल मिलाकर कहना यह है कि हम लोग; सार्वजनिक ज़मीन या साझे की ज़मीन या वह ज़मीन जो किसी भी तरह से विवादित है या जिस पर किसी का एकाधिकार नहीं है या जिसकी है वह कमज़ोर है मजबूती से अपना दावा नहीं कर पा रहा; ऐसी हर उस ज़मीन पर कब्ज़ा ज़माना अपना अधिकार समझते हैं। और यह सच सिर्फ ज़मीन तक सीमित नहीं है, यह हर तरह की चल अचल संपत्ति, वस्तुओं, लोगों आदि सब के लिए उतना ही सच है।
हम अभी तक एक समाज के तौर पर सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक जिम्मेदारी की सोच का विकास नहीं कर पाए हैं। एक देश की तरह सोचना तो बहुत दूर की बात है। हमारे लिए देश/प्रदेश/जिले आदि ज़मीन का टुकड़ा मात्र हैं।

He is an engineer, social thinker, writer and journalist.
He is a founder of MadhyaMarg and an editor of the Ground Report India (Hindi).


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