सच की रोशनी, झूठ के अँधेरे

Kanupriya

मृत्यु के साथ जुड़ी सबसे बड़ी बात ये होती है कि शव आपके सामने होता है, साक्षात सत्य की तरह, भ्रम की कोई गुंजाइश नही. सत्य के साथ सबसे बड़ी बात ये कि चाहे उसका स्वाद कैसा भी क्यो न हो वो स्वीकारा जा सकता है, उसे गले लगाकर जीवन मे पुनः लौटा जा सकता है. राम नाम सत्य है या नही पता नही, मगर सत्य एक बड़ी राहत होता है, झूठ और भ्रम में आप आशा निराशा के बीच झूलते रहते हैं, जूझते, लड़ते और पीड़ा में रहते हैं, ये सारी लड़ाई दरअसल सत्य के उद्घाटन के लिये है, फिर वो चाहे जैसा क्यो न बेहद शांति लेकर आता है.

इन दिनों जाने क्यों वेन्या की बहुत याद आई, डॉक्टर्स ने साफ कह दिया था कोई उम्मीद नही मगर मैं एक उम्मीद के लिये लड़ती रही, वो 24 घण्टे में से 18 घण्टे मेरी गोद मे होती और मैं इंटरनेट पर स्टेम सेल से लेकर जाने किन किन तकनीकों से ब्रेन की रिकवरी के बारे में पागलो की तरह पढती रहती, मैंने उसके ब्रेन डैमेज का सच जानकर भी स्वीकार नही किया. क्या होता अगर मैं इंटरनेट बन्द करके उससे ढेर सारी एकतरफा बातें करती, उसे बेहद प्यार करती, क्या इंटरनेट पर उसके लिये समाधान ढूँढती माँ उसे कितना प्यार करती है वो कभी जान पाई?

गहरी पीड़ाएँ, गहरी उदासी कभी कभी गहरे भ्रमों का द्योतक होती है. अफ्रीका में कपड़े के फुटबॉल से गन्दी झुग्गी में खेलते हुए बच्चो की खुशी और आनन्द का सिरा पकड़ने की कोशिश करती थी तो सोचती थी क्या हमारा समाज परम्परा से हमे भ्रमो में रहना सिखाता है? राम नाम सत्य कहने वाला समाज राम नाम पर कितना बड़ा भ्रम खड़ा करता है जो सिवा पीड़ा, तकलीफ और घृणा के कुछ पैदा नही करता, क्या सत्य कभी ये सबकुछ उतपन्न कर सकता है.

जिनकी जिंदगियों की प्रत्यक्षतः वाट लगी होती है उनके भीतर जीवन का वो कौनसा स्रोत होता है जो उनके चेहरे पर खुशी बनकर चमकता है, क्या वो बिना बड़े बड़े ज्ञानोपदेश पढ़े सत्य को स्वीकारने और गले लगाने जैसी सबसे कठिन साधना सरलता से अनजाने में साध चुके होते हैं?

हमारा समाज जाने कितने असत्यों का निर्माण करता है, जिंदगी जाने कितने भ्रम बुनती है, हमे परम्पराओ के टूटने से डर लगता है, धर्म की अवधारणा के खण्डित होने से डर लगता है, जाति का नियम टूटने से डर लगता है, हम व्यक्तिगत जीवन के भ्रमो के टूटने से डरते रहते हैं, और इस तरह एक समाज के तौर पर और व्यक्ति के तौर पर मानो किसी प्रेत योनि की तरह हम अनन्त जूझन, अंतहीन पीड़ाओं और व्यर्थ संघर्षों से गुजरते एक भ्रम से दूसरे भ्रम के बीच भटकते रहते हैं और राहत नही मिलती. हम अपने बनाये असत्यों के खण्डित होने और सत्य से जुड़ी पीड़ा से इतना डरते हैं कि उसके द्वार को खोलना स्थगित करते रहते है.

मृत्यु के बाद जीवन की अवधारणा सम्भवतः अनन्त पीड़ा के बाद पैदा हुए शिशु के सुंदर मुख की तरह है, जिसके बाद सारी पीड़ा भूल जाती है और उस प्रेम, सुख और शांति के लिए ज़रूरी है कि हम मृत्यु से, व्याप्त अवधारणाओं के खंडन से, सत्य का द्वार खोलने से डरे नही. भय से बड़ा सम्भवतः हमारा शत्रु कोई नही.

नोट: यह पोस्ट मृत्य से उपजी है मगर इस पोस्ट का अटल बिहारी जी की मृत्यु से कोई सम्बन्ध नही, न इसे केरल के बाढ़पीड़ितों के प्रति किसी असम्वेदना का द्योतक समझा जाये.

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