एक कॉल गर्ल का इंटरव्यू

Sanjiv Kumar Sharma

(सिगरेट, शराब या असुरक्षित सेक्स प्राणघाती भी हो सकता है)

जहां इंटरव्यू होना था वह एक आलीशान कमरा था। फर्श पर बेहतरीन कार्पेट, दीवारों पर नायाब पेटिंग्स, छत पर टंगा भव्य झाड़फानूस और अनेक खूबसूरत लाइटें; साथ में भव्य सोफे और देवदार की कांच लगी नक्काशीदार दर्शनीय मेज। दीवार पर बनी लकड़ी की अल्मारियों में किताबें, शोपीस और खूबसूरत मूर्तियां।

जब अनीता जी इंटरव्यू के लिए आकर बैठी तो लगा कोई महारानी बैठी है। मैरून रंग की बेशकीमती सिल्क की साड़ी, मैचिंग स्लीवलेस ब्लाउज, गले में छोटा सा लेकिन रत्नजडि़त हार और एक हाथ में राडो की घड़ी तो दूसरे हाथ में सिर्फ एक हीरे का कंगन। तीखे नाक-नक्श और संतुलित मेकअप, करीने से कटे कंधों पर बिखरे घने बाल, व्यायाम से साधा हुआ सुगठित शरीर और साथ में इतनी गहरी मुस्कान कि पता लगाना मुश्किल, बनावटी है या असली।

देखिए जरा समय के पाबंद रहिए और समय से अपना इंटरव्यू खत्म कीजिए। मैं समय की भारतीय अवधारणा में विश्वास नहीं रखती, मेरे लिए एक-एक मिनट कीमती है। – अनीता जी ने घड़ी देखते हुए कहा। मुस्कराहट के साथ स्वर में ऐसी सख्ती दुर्लभ होती है।

मैंने पैड संभाला और मोबाइल का रेकॉर्डर चालू करके मेज पर रख दिया। मेज पर रखा कॉफी का कप उठा कर एक सिप लिया और पहला सवाल पूछा।

जी बिलकुल! तो मेरा पहला सवाल है कि आप इस प्रोफेशन में कैसे आयीं?

देखिए मेरा इस प्रोफेशन में आना कोई बड़ी घटना नहीं है। जब दुनिया मुद्रा, आई मीन करेंसी, के चारों ओर घूम रही है तो हर इंसान की ये मजबूरी है कि वह कोई ऐसा काम करे जिसके बदले में उसे पैसे मिलें वर्ना वो चाहे आईन्स्टीन हो या मोजार्ट उसे धकिया कर हाशिए पर फैंक दिया जाएगा। मुद्रा एक प्रतीक थी, सुविधा के लिए बनायी गयी थी। लेकिन प्रतीक की जगह वह खुद ही सब कुछ बन बैठी, जैसे आप अपने पिता की मूर्ति बना लें और उसे ही अपने बाप समझें। और पैसे मिलने का एक ही तरीका है कि हम अपना कुछ बेचें। जब हम बाजार में बेचने निकलते हैं तो ज्यादातर दुकानें कबाडि़यों की नजर आती है जो ’क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘रंगीली रातों’ को एक ही भाव खरीदते हैं। ऐसे में फिर आपके पास यही रास्ता बचता है कि आप धूर्त हो जाएं और वो बेचें जो आपके पास है ही नहीं या किसी और का छीनें। इसलिए मुझे लगा अपना जमीर बेचने से अच्छा है कि हम अपना जिस्म बेचें। कम से कम अपने खुद के सामने तो नजर उठा कर बात कर सकेंगे। मैंने इस प्रोफेशन में आने का डिसीजन लिया और मुझे इस पर गर्व है।

आपको गर्व है?? आपको किसी तरह का शर्म का अहसास नहीं होता?

क्या बकवास कर रहे हैं आप? इसमें शर्म की क्या बात है? शर्म की बात तो तब होती जब मैं किसी सरकारी नौकरी में जाकर देश की बर्बादी में हाथ बंटाती या लुटेरे कारपोरेट के समूह में शामिल हो जाती। मल्टी नैशनल कंपनी में अपना दिमाग बेचकर जिंदगी होम करने वाले हाइली पेड बंधुआ मजदूरों से मैं लाख गुना बेहतर हूं। अपनी मर्जी से काम करती हूं, अपनी शर्तों पर काम करती हूं। किसी को धोखा नहीं देती। मैं एक एन्ट्रप्रेन्योर हूं, इसमें शर्म की नहीं गर्व की बात है। कानूनी काम करती हूं और पूरा टैक्स भरती हूं।

कानूनी?

जी हां कानूनी! अगर आपकों कानूनों की जानकारी नहीं है तो पहले थोड़ा पढ़ कर आएं फिर इस पर बात करेंगे।

अच्छा ये बताइए आपकी धर्म और ईश्वर के बारे में क्या धारणा है? आप किसे मानती हैं?

निहायत वाफियात सवाल है। इससे बेहतर सवाल होता कि आप ये पूछते कि मैं कौन-सा सेनेटरी नैपकिन या किस कंपनी की हेयर रिमूविंग क्रीम इस्तेमाल करती हूं। देखिए, धर्म एक नितांत व्यक्तिगत चीज है और उसका कोई छोटे-से-छोटा भाग भी प्रकट हो रहा है तो वह अश्लीलता है।

आपने कभी शादी, परिवार के बारे में सोचा है?

जी हां कई बार सोचा है लेकिन हर बार मन नकारात्मक भावों से भर गया है। देखिए जिस ढंग से हमारे यहां शादियां होती हैं वो बड़ा घिनौना है। जाति, धर्म, लालच और अन्याय उसमें इस तरह भरा है कि किसी जागरुक व्यक्ति के लिए शादी करना आसान नहीं है। सामाजिक मान्यता प्राप्त और थोड़ी-बहुत सामाजिक सुरक्षा और पेंशन वगैरह की सुविधा प्राप्त वेश्याओं को पत्नी कहा जाता है। लेकिन उनके पास कॉल गर्ल्स जैसे अधिकार नहीं होते। रही परिवार की बात, तो मेरा परिवार बहुत बड़ा है और उसमें ज्यादातर सदस्य जैनेटिक रूप से नहीं जुड़े हैं। जैनेटिक परिवार तो मजबूरी और स्वार्थ की डोर से बंधे होते हैं।

देश के हालात पर आपकी राय?

देखिए इस सवाल की इतनी बेइज्जती हो चुकी है कि मैं इसका जवाब नहीं देना चाहूंगी। हर आदमी चाहे वो कितना ही जाहिल और निकम्मा क्यों न हो इस सवाल का जवाब एक्सपर्ट की तरह देता है।

समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी आप?

हमारे समाज के ऊपर दो सबसे बड़े घाव हैं – मौत और सेक्स। इन्हीं दो से भागता है और इन्हीं दोनों के फोबिया और मेनिया के बीच पेंडुलम की तरह झूलता रहता है। पूरी जिंदगी इन दो पाटों के बीच पिस कर रह गयी है। शायद इसे ही कबीर ने ‘दुई पाटन के बीच साझा बचा न कोय’ कहा है| जो इलाज किए गए वो बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक निकले। लोगों को नियंत्रित करने के लिए धर्म ने सेक्स का सहारा लिया और खाने, पीने, सोने जैसी साधारण और सहज चीज को टैबू करके उसे असाधारण ताकत दे दी और ‘फ्रैंकस्टीन’ बना दिया। नतीजा ये हुआ कि हमारी गालियों से लेकर विज्ञापनों या फिल्मों तक, मंदिरों से लेकर घरों तक हर चीज सेक्स से सन गयी। कभी आपने चूहों के स्ट्रिप शोज़ देखें हैं? हमारी पूरी पीढ़ी ही इन्टरनेट के सामने बैठ गयी दूसरों को सेक्स करता हुआ देखने के लिए। उससे भी तृप्ति नहीं मिली तो आज वीभत्स से वीभत्स तरीके खोज रही है सेक्स के। इन्टरनेट के लिए सैक्स कर रही है! मौत के लिए तो मैं कुछ नहीं कर सकती लेकिन सेक्स को लेकर बने इस कैंसर के लिए मैं कुछ सकारात्मक करने की कोशिश करती हूं। एक हीलर की तरह काम करती हूं। कई लोगों को मैंने ठीक किया है। सीनियर सिटीजन्स और डिफरेन्टली एबल्ड लोगों के साथ भी मैंने कई बार बिना किसी फीस के काम किया है।

बलात्कार के मामलों पर आपका क्या कहना है?

ये सवाल भी अपनी गरिमा खो चुका है। सब के सब या तो बलात्कार कर रहे हैं या बलात्कार पर अपनी राय दे रहे हैं। एक बीमार समाज का सबसे खास लक्षण बलात्कार होता है। जब बीमारी है तो लक्षण भी रहेंगे। फिलहाल बीमारी को दूर करने की मंशा मुझे तो कहीं दिखती नहीं।

अच्छा इंटरव्यू के लिए आपका धन्यवाद। मेरा किसी से अपायंटमेंट है, मुझे अब जाना होगा। आप कॉफी और लेंगे? – अनीता जी अचानक घड़ी देखते हुए बोलीं।

नहीं कॉफी तो नहीं! लेकिन मैडम कुछ सवाल रह गए हैं।

कोई बात नहीं! उन्हें अगली बार के लिए रखिए। नमस्ते। हैव अ नाइस डे।

Sanjiv Kumar Sharma

Editor, Ground Report India

An author, thinker, translator and a travel-enthusiastic visited almost all states of India in his wheelchair. He had polio paralysis of both the lower limbs at an early age and could not get into the formal system of education, ie schooling. On his own, he started with formal mainstream education at home, and appeared in few exams privately but soon realised about the inadequacy of traditional approach to education and started self-study in his way.

Sanjiv stayed in a room for more than 12 years and spent time in reading books, writing, translating and contemplating on vital issues of human life, society and religion. He has studied literature, philosophy, science, religion and psychology. He started writing during adolescent and continues to write till the date. He has written many articles, poems and stories which got published in various newspapers and magazines. With the area of social media, he also has turned into a prolific writer on the internet.

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