तथाकथित ईश्वर की सरंचना – ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह –Sanjay Jothe

Sanjay Shramanjothe

भारत की सँस्कृति में 'उर्ध्वमूल अश्वत्थ' की धारणा है, जो कहती है कि जगत परमात्मा का पतन है, इसलिए जागतिक ज्ञान भी ईश्वरीय ज्ञान का पतन है, ईश्वरीय ज्ञान सब कुछ है.

अब ईश्वरीय ज्ञान इतना हवा हवाई और सब्जेक्टिव है कि उसे किसी भी दिशा में किसी भी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. इतिहास बताता है कि धर्म-धूर्तों ने उसे कैसे इस्तेमाल किया है. उनके पास एक कर्मकांड या यहाँ तक कि एक मन्त्र पढ़कर भी इस ईश्वरीय ज्ञान को घोटकर पी जाने के उपाय हैं. वहीं वे धूर्त ये भी कहते हैं कि ये तो जन्मो जन्मों की साधना से मिलता है.

जन्मों जन्मों के पुरुषार्थ के परिणाम में ये ज्ञान मिलता है तो लोग इस बात से डर जायेंगे, लेकिन उनके पास ईश्वरीय ज्ञान का क्रेश-कोर्स भी है. चार पुडिया खाकर भी आप परम स्वास्थय का लाभ ले सकते हैं. सिर्फ एक मन्त्र, एक दीक्षा एक कान फुन्कवाई या तीसरे नेत्र पर एक छूवन और आप इश्वरी ज्ञान के महल में अंदर!

तब असल खेल शुरू होता है. अगर ईश्वरीय ज्ञान चुटकी बजाते मिल सकता है तो 'नीच' जागतिक ज्ञान की किसे और क्यों जरूरत है? वे ईश्वरीय ज्ञान का ढोल बजाकर लौकिक या भौतिक जगत के ज्ञान को दुत्कारते रहे हैं. ये एक भयानक पैरालिसिस है भारतीय मन का, इसने भारत मे सभ्यता के विकास को रोक रखा है.

प्राचीन यूरोप में भी यही बीमारी थी, ज्ञान का फल चखना हव्वा और आदम का सबसे बड़ा अपराध माना गया है. लेकिन बाद में उस फल की फसल बोना, काटना और उसका अचार मुरब्बा जेली इत्यादि बनाना उन्होंने ठीक से सीख लिया और जिस इश्वर ने उन्हें अदन के बगीचे से निकाला था उसी इश्वर को उन्होंने अब अपने इंसानी बगीचे से धक्के देकर बाहर निकाल दिया है. नतीजा सामने है. अब ईश्वरीय ज्ञान के ठेकेदार जागतिक और भौतिक ज्ञान में अपने लिए समर्थन खोजते फिरते हैं.

भारत में भी बाबाजी लोग क्वांटम फिजिक्स बखानते रहते हैं. वेद वेदान्त में घुसने से ठीक पहले क्वांटम फिजिक्स उनका अनिवार्य पड़ाव है. उन्हें पता है कि अब भौतिकशास्त्र इस स्तर पर आ गया है कि जगत और जीवन की उत्पत्ति सहित परम निर्वात पर भी बहुत ठोस जानकारी दे पा रहा है. वे इसी जानकारी का पूरा इस्तेमाल अपनी जहरीली इबारत लिखने में करते हैं. और आधुनिक विज्ञान जहां बात खत्म करता है या जिन प्रश्नों को भविष्य के लिए छोड़ देता है उन्ही प्रश्नों को आधार बनाते हुए हमारे जगतगुरु लोग भौतिक ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान से जोड़ देते हैं. पश्चिम के वैज्ञानिक ही नहीं पूरा पश्चिमी समाज इन पर हंसता है लेकिन इन्हें ज़रा शर्म नहीं आती.

यूरोप के विपरीत भारत में इश्वर लगातार मजबूत हो रहा है. पूरब पश्चिम को एक करने की बात करने वाले अरबिंदो घोष से लेकर जोरबा दी बुद्धा की अजीब बहस चलाने वाले ओशो रजनीश और उनके बाद न जाने कहाँ कहाँ के सद्गुरु और विश्वगुरु अभी भी बहुत प्रभावशाली बने हुए हैं. इसका सीधा परिणाम भारत की शिक्षा व्यवस्था ही नहीं बल्कि शिक्षा और ज्ञान की मूलभूत अवधारणा के पतन में ही साफ़ नजर आता है.

भारत के उपनिषद् ही नहीं बल्कि धार्मिक कानून (धर्मशास्त्र और स्मृतियाँ) ब्रह्म और ब्रह्मज्ञान की इस व्यर्थ की बहस से भरे पड़े हैं. उपनिषद् काल में एक ही ढंग का आदमी हुआ है जिसने इस पूरी परम्परा को कड़ी टक्कर दी थी.

छान्दोग्य उपनिषद् के उद्दालक ने कार्य कारण और जीवंत प्रेक्षण के आधार पर जगत और जागतिक प्रक्रियाओं की व्याख्या का पहला वैज्ञानिक प्रयास किया था, जिसे पोंगा पुराण रचने वालों ने बर्बाद कर दिया. भारतीय दार्शनिक साहित्य में उस समय में और उसके बाद भी उद्दालक और याज्ञवल्क्य का आपसी विरोध बहुत महत्वपूर्ण है.

उद्दालक ने हवा हवाई ज्ञान के खिलाफ कार्य कारण आधारित ज्ञान का पक्ष लिया था. लेकिन बाद के वर्षों में उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु के एक संवाद को इस तरह से रचा गया की उद्दालक के मुंह से ही ईश्वरीय ज्ञान की महिमा बुलवा ली गयी. यह कबीर के मुह से रामानन्द बुलवाने जैसी चाल है. ये कथा रची गयी की श्वेतकेतु जब गुरुकुल से घर लौटता है तो उसका पिता उद्दालक उसे ब्रह्मज्ञान सीखने को प्रेरित करता है. इस कथा को ओशो रजनीश ने बड़ी कुशलता से इस्तेमाल करते हुए हवा हवाई ब्रह्मज्ञान की महिमा को फिर से स्थापित किया है.

यही उद्दालक, आधुनिक भारत के महान दार्शनिक देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय की नजरों में भारतीय भौतिकवाद के आदि पुरुष बन जाते हैं.और इन्ही को ओशो रजनीश जैसे पोंगा पंडित ब्रह्मज्ञानी बना डालते हैं. देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय ज्ञान के जिस फल की पूरी फसल को संरक्षित करके भारत के गरीबों में बाँट देना चाहते हैं उसे ओशो रजनीश जैसे लोग फिर से ईश्वरीय लोक के अदृश्य समन्दर में फेंक आते हैं.

अभी भारत में शिक्षा ही नहीं बल्कि ज्ञान मात्र का जो तिरस्कार हो रहा है उसे समझना इतना आसान नहीं है. आपको ये समझने के लिए याज्ञवल्क्य जैसे ब्राह्मणवाद के पुराने चैम्पियंस को और ओशो रजनीश जैसे नये ब्राह्मणवादी चैम्पियंस को भी ठीक से समझना होगा.

ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के दुश्मनों का ये एक सीधा, धीमा और जहरीला प्रवाह है. ये जहरीली नदी अगर बहती रहती है तो भारत की शिक्षा व्यवस्था याज्ञवल्क्य और ओशो रजनीश के मानस पुत्रों द्वारा बार बार बर्बाद की जायेगी. जब तक इस ईश्वरीय ज्ञान की बकवास को बंद नहीं किया जाता तब तक भारत सभ्य नहीं हो सकेगा.

भारत की शिक्षा की दुर्दशा स्वयं में बड़ा विषय है लेकिन ये खुद भी अपने आपमें कहीं बड़ी बीमारी का लक्षण भर है.

Sanjay Shramanjothe

लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

Tagged . Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *