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  • किसानों की आत्मनिर्भरता को खत्म करते दिशा निर्देश एवं नीतियां

    किसानों की आत्मनिर्भरता को खत्म करते दिशा निर्देश एवं नीतियां

    Prem Singh​​​​


    सन सत्तर के दशक तक अर्थात हरित क्रांति के पूर्व तक बुंदेल खंड के गावों मे खेतों (उत्पादन एवं उत्पादकता ) एवं किसानों की हालत बताने वाली पीढ़ी आज भी जीवित है। मार (black cotton soil) जमीनों मे 8से 10 कुंतल प्रति एकड़ बिर्रा,तिफरा,10 से 12 कु.प्रति एकड़ चना या मसूर,इसी प्रकार रांकड़ या पंडुवा खेतों मे खरीफ की फसलें ली जाती थीं,जिससे 10 से 12 कु. प्रति एकड़ तक, ज्वार, अरहर, मूंग, तिल, उड़द आदि सब मिलकर हो जाता था। बिशेष बात यह थी, कि यह सम्पूर्ण उत्पादन लागत शून्य था। प्रत्येक घर मे 10-20 पशु थे, बीज, खाद, जुटाई, बुवाई आदि समस्त कृषि क्रियाओं मे आत्म निर्भर थे, बाज़ार से कुछ भी नहीं आता था। प्रत्येक घर मे समृद्धि थी, जो स्वस्थ पशुओं एवं घर मे सोना चाँदी के आधार पर आँका जाता था। आपस मे विश्वास और सहयोग था। यह स्थिति छोटे-बड़े सभी कास्त कारों की थी।


    बुंदेल खंड मे हरित क्रांति का विस्तार 80 के दशक मे हुआ, सरकार ने कृषि विश्वविद्यालय, रिसर्च  इंस्टिट्यूट  एवं कृषि  विभाग बनाकर भौतिक वादी, लालच आधारित खेती को किसानों के मध्य भय/प्रलोभन के सहारे प्रचलित कराया। तर्क राष्ट्रिय खाद्यान्न उत्पादन मे आत्मनिर्भरता का दिया। जिसको पूरा हुआ भी बताया जाता है।आज इस आत्म निर्भरता के वाहक किसान एवं उसके खेतों का हाल बुरा है।


    सर्व प्रथम, रासायनिक उर्वरक, जिनमे डीएपी/यूरिया प्रमुख थी,किसानों तक पहुंचाया गया । ब्लॉक स्तर पर कर्मचारी सक्रिय किए गए, रसायन न बेच पाने पर उनके वेतन से पैसा काटा गया । कृषि  अधिकारी किसानों के खेतों मे छल पूर्वक, चोरी से डाल कर इनका आदी बनाया। गाँव मे आज भी ऐसे लोग जीवित हैं,जिन्होने दबाव मे पैसा (उस समय एक बोरी dap और एक बोरी यूरिया के लिए 35 रुपया) कटवा दिया किन्तु यह रसायन नहीं खरीदा, क्योंकि वे यह जानते थे,कि इसके प्रयोग से तात्कालिक लाभ तो होगा पर आगे चल कर हमारी ज़मीनें कम उत्पादक या बंजर हो जाएंगी। उनके इस कृषि ज्ञान एवं दूरदर्शिता को पिछड़ा पन बताया गया।


    रासायनिक उर्वरकों के बाद, भारी मशीनों ट्रेक्टर, हारवेस्टवेर आदि के लिए प्रेरित किया,जिससे किसानों की पुस्तईनी कमाई,सोना-चाँदी घर से बाहर निकल गई। मशीन बनाने वाली कंपनियों/बिक्रेता, बैंक एवं सरकार का नापाक गठबंधन बना, कर्ज आसान और अनिवार्य किए गए। यही ट्रैक्टर कालांतर मे किसानों के प्राण संकट साबित हुये और आत्महत्या का वायस बने, जिसमे KCC (किसान क्रेडिट कार्ड) ने आग मे घी का कम किया। किसान पशु विहीन हो गए, उर्वरता अलग प्रभावित हुई।


    इसी बीच 80 के दशक मे ही उन्न्त बीजों के नाम पर,किसानों के हजारों वर्षों से सँजोये गए, हर मौसम के अनुकूल परीक्षित, बीजों को प्रचलन के बाहर किया। यह कह कर कि सरकारी उन्न्त बीज ज्यादा उत्पादन देते हैं, जो कालांतर मे झूठा साबित हुआ। (यह बीज बिना रासायनिक उरवरकों,अधिक पानी के बिना कुछ भी पैदा नहीं होता, जबकि हमारे देसी बीज बिना लागत के भी उत्पादन देते थे। यह रसायन बेचने की साजिश है।) इसके लिए अलग से बिभाग बनाया गया, बड़े-बड़े गोदाम बनाए गए। साथ मे यह बीज बुवाई के समय 2 से कई गुने अधिक दामो पर सरकाई गोदामो से ही बेंचे जाते हैं। इसने भी किसानों के ऊपर लागत का अनावस्यक बोझ बढ़ाया। बीजों के प्राक्रतिक स्वाद एवं पौष्टिकता चली गई वो अलग।


    पशुओं के नस्ल भी, अधिक दूध का लालच देकर, कृत्रिम गर्भाधान से बिगाड़ दिये, इनमे जेनेटिक्स के नियमों का पालन भी नहीं किया गया। जिसका परिणाम औसत से भी कम दूध देने वाली गायें एवं जुताई के अयोग्य बछड़े पैदा हुए, जिनको भूसे एवं सार्वजनिक चरने योग्य ज़मीनों के अभाव मे (जिनका सरकारों द्वारा ही ब्यक्तिगत पट्टा कर दिया गया ) किसानों को छुट्टा छोंडना पड़ा। इस अन्ना प्रथा ने किसानों के लिए किसानी दूभर कर दी है। इसकी भी मूल जिम्मेवार भी सरकार ही है।
    इस तरह पशु शक्ति के प्रचलन बाहर होने से एवं रासायनिक खेती के प्रयोग से किसान को डीजल, पेट्रोल, बिजली के भरोसे होना पड़ा। इनका मूल्य सुरसा के मुह की तरह किसानों के उत्पादन से बड़ा ही रहता है। इन की कीमत सत्तर के दशक की तुलना मे आज सत्तर गुना बढ़ी हैं।


    एक भ्रम ने जो किसानों के मध्य प्रचलित किया गया, ने किसानों की एवं उनकी जमीनों की उर्वरता की  कमर ही तोड़ दी वह है एक तरह की खेती करना (monocroping) से अधिक उत्पादन होता है। जबकि बुंदेलखंड मे किसान खरीफ मे 5 से 6 फसले, रवि मे 3 से 4 फसलें एक साथ ले लेते थे। इससे जमीन की उर्वरता बनी रहती थी,मौसम से सुरक्षा थी,किसी न किसी फसल का बहुत बढ़िया उत्पादन हो जाता था और बाज़ार मे भी किसी न किसी फसल को अच्छी कीमत मिल जाती थी,अर्थात किसान सब तरह से सुरक्षित रहता था।


    इस तरह सरकार प्रायोजित खेती करने से,किसान की लागत मे अनावश्यक वृद्धि हुई, आत्मनिर्भरता समाप्त होकर खाद, बीज, मशीनों, डीजल ,पेट्रोल, कीटनाशक, बिजली, पानी, श्रम आदि सबमे निर्भर हो गया। इनके मूल्य और किसानों के उत्पादों के मूल्य ,जो की सरकार ने ही अपने हाँथ मे ले रखे हैं, मे कोई अनुपात नहीं है। एक तरफ लागतों का मूल्य निर्धारण अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों के आधार पर किया जाता है,जबकि किसानों के उत्पादों के मूल्य निर्धारण हेतु आज भी सरकारी बिभाग बना रखे हैं, यह भी सरकार की किसानों के प्रति नियति के उपर प्रश्न चिन्ह है। हमारे किसान आंदोलनो को मूल नीतिगत मुद्दों से हटाकर बिजली, पानी, मूल्य, सब्सिडि आदि के भ्रामक तथ्यों मे उलझा कर समाप्त कर दिया जाता है। और किसानों को जाति,वर्ण,पार्टी आदि मे बांटे रह कर संगठित नहीं होने दिया जाता।


    परिणाम स्वरूप,एक तो, आज किसान कर्ज ग्रस्त है और खेती के लिए बाज़ार आश्रित। इस दशा मे पहुंचाने का काम किसने किया? यह मूल प्रश्न है। दूसरे,जमीन की उत्पादकता,जो बुंदेल खंड की मार जमीने औषतन 10 से 12 कु./एकड़ उत्पादन देती थीं, वह भी बिना किसी बाहरी लागत के, आज भारी लागत लगाने के बाद भी, 4से 5 कु/एकड़ से अधिक नहीं है। इसी प्रकार खरीफ़ मे पूरे बुंदेलखंड मे ज्वार,बाजरा,मूंग,उड़द,तिल आदि इतनी अधिक मात्रा मे होता था कि ज्वार के खरीद दार न होने कि वजह से किसान भूसे मे मिला कर जानवरों को खिला देते थे,आज नदारद है। धान जो केन कैनाल के किनारे बुंदेल खंड के कुछ हिस्से मे होता था, 20कु/एकड़ तक गुरमटिया, लकड़ा, बाबा धान आदि, वह भी बिना रासायनिक के प्रयोग के, लेकिन आज सब गायब है। अब मूल प्रश्न यह है, कि यदि किसानों के खेतों की उर्वरता ही नष्ट हो गई है, उत्पादन ही घट गया है,तो किसान दे कहाँ से? जो थोड़ा बहुत पैदा भी होता है, उससे पूरा भर पेट खाना भी नहीं चलता, ऊपर से बढ़ी हुई लागतों एवं बैंक की साहूकारी प्रव्रत्ति की ब्याज का बोझ, मंहगी शिक्षा, महंगी स्वस्थ्य सुबिधाए, महंगा न्याय और भ्रस्ताचर के अंतिम शिकार हम किसान ही हैं। ऊपर तक पहुँचने वाली घूस अंततः किसान (उत्पादक)से ही वसूली जाति है, कोई भी अपनी कमाई से नहीं देता। इन सबका ज़िम्मेवार कौन है? क्या यह किसानों कि प्रायोजित हत्या नहीं है? ऐसे मे हम क्या करें जब न्यायालय भी हमारे विरुद्ध है। क्या अकेले किसान ही दोषी हैं? या सरकार और आधुनिक कृषि  विज्ञान भी है?


    इस देश के जिम्मेदार लोगो, सांसदो, न्यायालयों, राज नैतिक दलों से विनम्र अनुरोध है, कि हम किसानों को, जो कि आज़ादी के बाद 85 प्रतिशत थे, घटकर 50 प्रतिशत रह गए हैं ( यह 35% स्वावलंबी किसान ही टूटकर मजदूर बन गए हैं और हर बड़े शहर के किनारे तथा कथित बिकास को आईना दिखते हुए झुग्गियों मे रहते हैं।) उनको बचाने के लिए आगे आए। यह जो बुंदेल खंड मे (वही सरकार जो हमारी इस दशा कि जिम्मेदार है) बैंक के साथ मिल कर समूहिक किसानों के नर संघार की ओर बढ़ रही है, को रोके। न्यायालयों को तर्क दें एवं न्याय दिलाएँ। अन्यथा समय माफी नहीं देगा। ऐसा भारत के बाहर कई देश की सरकारें किसानों को खत्म करने का काम कर चुकी हैं, उसके परिणाम भी विश्व , विश्व युद्ध और मंदी के रूप मे भोग चुका है। आज भी पूरा यूरोप  और अमेरिका इसी मंदी का शिकार हैं। हमारा देश,आज भी किसानों की अधिकता, बहुत उत्पादन के विकल्पों एवं उनके आत्म निर्भर परम्पराओं के कारण उक्त मंदी की चपेट से बचा हुआ है। । किसानों को बचाना ही देश को बचाना है।


    एक आखिरी अंतर विरोध यह भी है कि जिन किसानों के बल बूते सरकार खाद्यान्न उत्पादन मे अपने को आत्म निर्भर बताती है, उन्ही किसानो को क्या फांसी देना चाहती है? क्या यही नैतिकता है? और यदि ऐसा है तो हमारे हजारों वर्षो से परीक्षित ज्ञान, बीज, पशु, सामाजिक अंतर संबंध, कौशल आदि का क्या होगा? क्या पूरा देश किसानो को इस संकट काल मे अकेला कर देगा?
    यह लेख किसी विशेष सरकार के लिए नहीं है, वरन सभी सरकारें इस प्रकार कि खेती को प्रोत्साहित करती रही हैं। अतः किसानो कि इस दशा के लिए सभी जिम्मेदार हैं।


    Prem Singh

  • कुछ छोटी कविताएँ

    कुछ छोटी कविताएँ

    Veeru Sonker[divider style=’right’]

    [१]

    ‘निरुत्तर’

    मैंने गंभीरता ओढ़ कर
    एक हलकी सी मुस्कुराहट के सहारे
    वह कई प्रश्न,
    जो मुझे फसा सकते थे
    उन्हें वापस प्रश्नकर्ताओ की ओर लौटा दिया.

    अब वह फसे थे और मैं गंभीर था

    मुस्कुराहट के निहितार्थों में
    वह एक जायज उत्तर तलाश रहे थे.

    और मैं तैयार था
    उन उत्तरो पर एक बार फिर
    गंभीर मुद्रा में मुस्कुराने को.

    [२]

    ‘तरीका’

    मैंने सोचा
    मेरा तरीका सबसे सही है.
    अपनी मूर्खता के हर जिक्र पर
    मेरा ठठा कर हँस देना
    या
    बेबाकी से हर बात को स्वीकार करना.

    मैं उनसे बेहतर था
    जो सोच कर हँसते थे
    नकारने की तमाम कोशिशो के बाद स्वीकारते थे.

    खुद को हर बार सही न ठहराने का
    मेरा तरीका सही था!

    [३]

    ‘उबालना’

    इससे पहले जब
    मैं उबलते पानी सा बिलबिलाया था

    तब जाना था
    पतीले से बाहर आने का मतलब
    बिखर कर दुबारा उबलने के लायक न बचना.

    इसके बाद मैंने
    पतीले में बने रह कर उबालना सीखा.

    [४]

    ‘अजीब’

    वह अजीब लोग थे
    वह अजीब से सवालो के साथ थे
    और अपने हिसाब से
    वह अजीब लोगो के बीच थे.

    उनकी दुनिया
    एक सरसरी नजर में बेहद सामान्य थी.

    कुछ लोग चुप थे
    यह चुप लोगो के हिसाब से अच्छा ही था.
    चुप रहने से वह मानते थे
    कि
    उनकी वह दुनिया
    एक सरसरी नजर में बेहद सामान्य थी.

    अजीब लोगो के लिए
    यह बेहद अजीब बात थी!

    Veeru Sonker

    [५]

    ‘लोग’

    उन्होंने पूछा!

    वह कौन थे
    और उन्होंने ने क्यों खोजी भाषा
    व्याकरण और बोलने की विभिन्न स्वर-लहरियाँ.

    वह कौन थे
    जिन्होंने संकेतो को अपर्याप्त माना.

    वह कौन थे
    जिन्हें मौन रहना पसंद नहीं आया.

    उन्होंने पूछा
    क्या वह लोग अब भी मौजूद है ?

    जिन्होंने पूछा
    वह आईने के सामने रो रहे थे!

  • एक लक्ष्य: मानसिक उन्नति के निहितार्थ

    एक लक्ष्य: मानसिक उन्नति के निहितार्थ

    Dr. Anita Chauhan[divider style=’right’]

    जिधर देखो उधर समाज में आर्थिक उन्नति की होड़ तो लगी हुई है लेकिन मानसिक उन्नति की प्रतियोगिता कहीं नहीं, किसी के पास ये सोचने का वक्त नहीं है कि हम किस दिषा में जा रहे हैं। हम ये हर पल सोचते हैं कि हम फलां-फलां से समृद्ध कैसे हों लेकिन ये नहीं सोचते कि हम अमुक व्यक्ति से अधिक उदार, विनम्र, सहिश्णु, दयावान, परोपकारी एवं गुणवान कैसे हों आर्थिक धु्रवीकरण ने हमें दिनों दिन मानसिक दिवालिया बना दिया है। सद्गुणों के अभाव में कोरी आर्थिक उन्नति हमें नितान्त अहंकारी बनाती है, उसका परिणाम ये होता है कि हमें अपने आसपास रहने वाले लोगों के अच्छे गुण भी दिखाई नहीं देते। यदि कोई व्यक्ति सच्चा एवं सरल है तो हम उसे भी मूर्ख समझ लेते हैं उसकी विनम्रता को कायरता निस्वार्थ सेवा भावना को कुटिलता की दृश्टि से देखना प्रारम्भ कर देते हैं। इस तरह की सोच हमें और भी तुच्छ एवं विशैला बनाती है जो कि न सिर्फ हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है बल्कि समाज के लिए भी घातक है। जिस तरह से हम अतीत में किए हुए भौतिक समृद्धिपूर्ण कार्यों को अपनी उपलब्धियों के रूप में देखते हैं और भविश्य में किए जाने वाले कार्यों की योजना बनाते हैं। उसी तरह यदि हम अपनी मानसिक उन्नति के लिए भी एक योजना बनाकर कार्य करें तो हम भी अपने अन्दर एक श्रेश्ठ मानवता की नींव रख सकते हैं ऐसा मेरा पूर्ण विष्वास है।

    जीवन में जब भी हमारा सामना स्वार्थी, कुटिल, असत्यभाशी, छल-प्रवच्छना से भरे हुए क्षुद्र मानसिकता वाले लोगों से होता है, वो हमारे भीतर के सद्गुणों को बुरी तरह से झकझोरते हैं। सच में देखा जाए तो वही पल हमारे अन्दर की अच्छाइयों के लिए सबसे बड़ी चुनौती खड़ी करता है। जब हमें ऐसा लगने लगता है कि हम उनसे कमजोर पड़ रहे हैं और अन्दर से टूटने लगते हैं किन्तु सावधान ऐसे लोग पहले अपनी कुटिलता से आपको अपने स्तर पर लाएंगे बाद में अपने अनुभव से आपको हरा देंगे। पर यदि हम थोड़ा आत्म मन्थन करें कि यदि वह अपने अन्दर की बुराइयों को हमारी अच्छाइयों के लिए नहीं त्याग सकता तो हम उसके लिए वर्शों से सतत् साधना से अर्जित की हुई अच्छाइयां कैसे छोड़ सकते हैं।

    Dr. Anita Chauhan

    रेगिस्तान मं जब तूफान आता है तो सब कुछ अपने साथ उड़ा ले जाता है। सिर्फ वही लोग बच पाते हैं जो किसी खूंटे या पत्थर को मजबूती से पकड़ लेते हैं। हमारी जिन्दगी में भी कई बार ऐसे तूफान आते हैं लेकिन यदि हम अपनी पूरी आत्मषक्ति के साथ अपने अन्दर के सद्गुणों के सम्भल को मजबूती से थामे रहते हैं तो हम विकृत होने से बच जाते हैं।
    महान षायर इकबाल ने कहा था कि ‘‘यूनान, रोम, मिस्र सब मिट गए जहां से। किन्तु उन्होंने उनके मिटने का कारण नहीं बताया। जहां तक मैं समझती हूं कि इन संस्कृतियों ने आर्थिक उन्नति तो बहुत की, भोग्य वस्तुओं के निर्माण में तो महारथ हासिल की किन्तु भोग करने वाले चरित्रों का निर्माण करने से चूक गए। भारत की विष्ववारा भूमि ने अमर चरित्रों को जना है। भारत का इतिहास ऐसे महापुरूशों के सद्गुणों से देदीप्यमान है। यही कारण है कि हमारी हस्ती नहीं मिट पाई। हमारे समाज एवं देष को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए हमें आर्थिक उन्नति के साथ-साथ मानसिक उन्नति पर भी पूरा ध्यान देना होगा। क्योंकि स्वस्थ एवं सुखी मन से ही स्वस्थ एवं सुखी समाज की कल्पना की जा सकती है।

    अच्छे विचारों एवं अच्छी भावनाओं का एक उदाहरण हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे ही हमारे मन में किसी के प्रति दुर्भावना आती है वैसे ही आप एक अंधेरे में घिर जाते हैं, मन क्रोधवष जलने लगता है। पूरा का पूरा षरीर उत्तप्त हो उठता है, यह वो सजा है जो हमारी अन्तर्रात्मा हमें देती है, इसके विपरीत जब भी हम दूसरों की मदद करते हैं कुछ भला करने का सोचते हैं तो यह सकारात्मक भावना मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। हमारा मन षीतल हो उठता है, मन का कोई कुसुम पूर्णतः पल्लवित होकर खिल जाता है। ये वो पुरस्कार है जो हमारी आत्मा हमें हमारी अच्छाइयों के बदले देती है। जिसके सामने संसार के सारे वैभव व्यर्थ हैं।

    इन्हीं सद्गुणों की सुद्वीर्घ यात्रा करके कितने ही मानव साधारण से असाधारण और असाधारण से महात्म्य और महात्म्य से देवत्व को प्राप्त कर चुके हैं।

  • अब वक़्त है सवाल हमारे हो और जवाब पितृसत्ता के

    अब वक़्त है सवाल हमारे हो और जवाब पितृसत्ता के

    Pooja Priyamvada


    सालों पहले जब एक कोर्स कर रही थी Discourse in Film and Media तब देखी थी राजकुमार संतोषी की फिल्म लज्जा एक डिस्कोर्स की तरह , उस फिल्म में लाख खामियां थीं लेकिन पहली बार सवाल पूछे जा रहे थे औरतों के जिस्मों,उनके शख्सियतों उनके अस्तित्व के बारे में इतने बड़े परदे पर , उस समय की बड़ी बड़ी हीरोइनें पूछ रही थीं अपने किरदारों में ये सवाल।

    तबसे आदत हो गयी मानो , बल्कि बीमारी जैसी ही फिल्मों को डिस्कोर्स की तरह देखने की। तुम्हारी सुलु और सीक्रेट सुपरस्टार कल एक ही दिन में टीवी पर देखी।

    तुम्हारी सुलु – मिस्टर एंड मिसेज अशोक की कहानी इस देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय दम्पतियों की कहानी है। छोटी खुशियां और बड़ी महत्वाकांक्षाएं और उन्ही के बीच कहीं घिसते-पिसते रोज़मर्रा की नौकरियों और गृहस्थी की चक्की में औरत और मर्द। लेकिन ये एक और कहानी भी है , उस औरत की कहानी जिसका अपना पहला परिवार (पिता कर बहनें ) उसे अपमानित करने का कोई मौका नहीं जाने देते (intimate emotional abuse), जिसे समाज एक हाउसवाइ, ”साड़ी वाली भाभीजी” cliche में बांध चुका है (social pressures to confirm)। एक “लेट नाईट” (जो अब भी इस देश में नैतिक पतन का दूसरा नाम है) रेडियो शो जिसमें वो लोगों (मर्दों) से (अक्सर डबल मीनिंग) बातें करती है male gaze का बेहतरीन उदाहरण है , सबसे ज़रूरी यही है कि मर्द क्या चाहता है , अगर वो पति/पिता है तो वो क्या करने और क्या न करने की इजाज़त देता है या नहीं और यदि वो कोई और मर्द भी है तो वो हर समय औरतों का मूलयांकन करने में लिप्त है, जबकि उस औरत के लिए चाहे वो टैक्सी चलाती हो , रेडियो शो करती हो या और कुछ सिर्फ काम है , नौकरी है।

    Sex इस देश में taboo क्यों है – क्यूंकि यहाँ शादियों तक में इस पर तवज्जो न के बराबर है , सिर्फ पुरुष की मर्ज़ी या चाह मान कर इसे अलमारी में किसी भूले ख्वाब की तरह तय करके रख दिया जाता है, जब औरत पहल करती है तो आज भी यहाँ उसे एक सामान्य बात नहीं माना जाता। बहुत ही सहजता से थकी हुई पत्नी के पैर तक दबाने वाले मॉडर्न मर्यादा पुरुषोत्तम भी उसके बारे में किसी अनजान मर्द के कटाक्ष से विचलित हो जाते हैं , बच्चे की ज़िम्मेदारी मूलतः माँ की है और बच्चे का किसी भी तरह से भटकना या गिरना माँ का अपने गरिमायी सिंहासन से अपदस्थ होना ही है।

    फिर भी सवाल पूछे गए हैं , बराबरी की चाह की गयी है , नैतिकता के ठेकेदारों फिर चाहे वो अपना परिवार ही क्यों न हो उसे आँख से आंख मिला कर ललकारा गया है , ये अच्छी शुरुआत है।

    सीक्रेट सुपरस्टार इनज़िया की कहानी है, युवतियों के सपनों की कहानी है जिन्हे अपने पिता जैसे बीवी को बात -बेबात पीटने और घर से उठा कर फ़ेंक देने वाले मर्द से शादी नहीं करनी , आज्ञाकारी सीता जैसी बेटी नहीं बनना , सवाल करने हैं , अपने लिए , अपने से पहली पीढ़ी की अपनी माँ के लिए जो उसे गर्भपात से तो बचा लेती है लेकिन खुद पर हो रही घरेलु हिंसा के दाग अपने बच्चों पर लगने से उन्हें नहीं बचा पाती , ये इस देश की उन लाखों औरतों की कहानी है जिसके सबसे बड़ा डर आज भी दाल में नमक कम हो जाना या अपनी मर्ज़ी से कुछ खरीद लेना है , जो तलवार नहीं बन पाती और ढ़ाल बनने की कोशिश में ज़िन्दगी निकल देती है।

    वो बेटी उससे भी पहली पीढ़ी के बड़ी आपा के हिस्से के सवाल भी करती है जो बेबस हैं अपने सामने , अपने परिवार में मर्दों के अत्याचार की मूक दर्शक बने रहने के लिए , उस अगली पीढ़ी के गुडडू के सवाल भी जो बचपन से देखता है एक हिंसात्मक पिता और अक्सर वैसा ही मर्द बन जाने के दबाव और अपेक्षा में बड़ा होता है।

    लेकिन इस कहानी में और तरह के मर्द भी हैं , दो बार तलाक़शुदा , बेहूदा कपड़े पहनने वाला कर उससे भी बेहूदा गाने गाने वाला शक्ति और इन्जु के स्कूल का दोस्त चिंतन जो उसके साथ उसके सपने देखते हैं

    दोनों फ़िल्में कुछ एहम सवाल उठती हैं , मुझे सवाल पसंद हैं , औरतों के सवाल पूछने का वक़्त आ गया है और ये क्लिप न तुम्हारी सुलु से है , न सीक्रेट सुपरस्टार से , पर ये उस दशकों पहले देखि फिल्म लज्जा से है जो राम से अग्निपरीक्षा मांगने के सवाल हैं, फिर चाहे वो सीता हों, माधुरी दीक्षित, विद्या बालन, ज़ायरा वसीम या कल ही इस दुनिया से गयी #श्रीदेवी , अब वक़्त है सवाल हमारे हों और जवाब पितृसत्ता के !

    Pooja Priyamvada

  • जल-उपवास : वास्तविक शारीरिक व मानसिक फिटनेस तथा उम्र व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना, कैंसर अल्सर ट्यूमर डायबिटीज जैसी बीमारियों में अद्वितीय लाभ

    जल-उपवास : वास्तविक शारीरिक व मानसिक फिटनेस तथा उम्र व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना, कैंसर अल्सर ट्यूमर डायबिटीज जैसी बीमारियों में अद्वितीय लाभ

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    शारीरिक व मानसिक फिटनेस

    इससे पहले कि मैं जल-उपवास की चर्चा करूं, मैं अपने शरीर की चर्चा करना चाहता हूं। मैंने पूरा जीवन अपने शरीर का बहुत ही आड़े-तेड़े तरीके से प्रयोग किया है। मैं बहुत कम सोता हूँ। सोने का मेरा औसत महज चार से पांच घंटे है। मैंने बहुत बार बिना सोए हुए 72 घंटों या इससे भी कुछ अधिक लगातार काम किया है, वह भी मानसिक काम। लेकिन कभी मस्तिष्क या शरीर ने धोखा नहीं दिया।

    कभी दिन में तीन बार नहाया तो कभी भीषण गर्मियों में भी कई-कई दिन नहीं नहाया या भीषण सर्दियों में ठंडे पानी से कई बाल्टी नहा लिया। गर्म के पहले ठंडा, ठंडा के पहले गर्म जब जो जैसा मिला वैसा खा पी लिया। भीषण सर्दियों में फ्रिज से पानी निकाल कर पी लिया, फ्रिज से ठंडा खाना निकाल बिना गर्म किए खा लिया। कहावत है कि रात में मूली नहीं खानी चाहिए। मैंने अपने जीवन में मूलियां अधिकतर रात में ही खाईं हैं। आप मुझे कोई भी कंद मूल कभी भी खाने को दीजिए, मैं खा लेता हूँ। कभी शरीर ने कोई असहमति नहीं प्रकट की।

    बहुत लोगों को मैंने देखा है कि वे आठ-नौ घंटे सो चुकने के बावजूद, जगने के बाद पंद्रह से आधा घंटा या अधिक समय तक ले लेते हैं, पूरी तरह से चैतन्य होने में। मैं भले ही कई दिनों से दो से तीन घंटे की ही नींद ले पा रहा होऊं, लेकिन यदि आप मुझे एक घंटे की नींद के बाद भी जगाएं तो मैं आपको जगने के पल से ही पूरी तरह चैतन्य मिलूंगा। इधर आंख खुली, उसी पल से पूरा शरीर व मस्तिष्क जागृत, कोई झोल नहीं, कोई बहाना नहीं, चाय-काफी किसी चीज की कोई तलब नहीं।

    मैंने जब से अपने हिसाब से अपना जीवन जीना शुरू किया तबसे अपने जीवन में सोने व खाने की कभी कोई व्यवस्थित दिनचर्या नहीं बनाई। जब मिला या जब जरूरत हुई तब खा लिया, जब जरूरत हुई सो लिया। यहां सिडनी, आस्ट्रेलिया में भी खाने व सोने की कोई व्यवस्थित दिनचर्चा नहीं है। किसी दिन सुबह सात बजे डटकर खा लिया तो किसी दिन शाम को पांच बजे नास्ता किया। 

    मैं कई-कई घंटे पेशाब बहुत आराम से रोक लेता हूं। बहुत तेज पेशाब आई होगी लेकिन यदि कुछ लिख रहा हूँ या किसी काम में व्यस्त हूँ तो कई-कई घंटे पेशाब रोक कर काम करते रह लेता हूँ। वर्षों हो गए ऐसा करते हुए, आजतक कभी पेशाब पैंट में नहीं छूटी।

    मैंने हजारों किलोमीटर की पदयात्राएं की हैं। औसतन 20 से 50 किलोमीटर प्रतिदिन चलते हुए वह भी बहुत बार दिन में केवल एक बार भोजन प्राप्त करते हुए, वह भी ग्रामवासियों व अनजान लोगों से जो भी प्रेम व श्रद्धा से मिल गया। वाहन यात्राएं भी बहुत करता आया हूँ, जहां जो मिला वह खाया, जो पानी मिला वह पिया। सोने को कुछ नहीं मिला तो सड़क किनारे ही सिर के नीचे पत्थर रख कर सो गया।

    मैंने बहुत बार 20-20 घंटों से अधिक लगातार गाड़ी चलाई है, वह भी ऊबड़ खाबड़ रास्तों में, भीड़ वाले रास्तों में। मालूम नहीं होता कि कब कु्त्ता या बकरी या गाय या सुअर या कोई बच्चा या साइकिल चलाता कोई आदमी अचानक से रास्ते पर आ जाए, इसलिए हर पल चाक-चौबंद रहते हुए गाड़ी चलाना। 

    इन सब क्रियाकलापों का भी कोई व्यवस्थित ढांचा नहीं। मालूम पड़ा कि कई महीने गाड़ी की स्टियरिंग भी नहीं छुई और अचानक कई-कई दिन 20-20 घंटे गाड़ी चला रहा हूँ, वह भी केवल दो से तीन घंटे सोकर। जीवन में लगभग 100,000 (एक लाख) किलोमीटर कार व लगभग 300,000 (तीन लाख) किलोमीटर मोटरसाइकिल चला चुका हूँ, कभी कोई सड़क दुर्घटना नहीं हुई, कभी किसी को मेरी ड्राइविंग के कारण खरोच तक नहीं पहुंची। 

    कई-कई महीनों तक कोई शारीरिक अभ्यास नहीं करता, फिर अचानक एक दिन सुबह उठकर 100 दंड बैठक लगाता हूँ, दो-दो घंटे तक 5-5 किलो के डम्बेल लेकर खूब एक्सरसाइज करता हूँ। ऐसा कुछ दिन किया, फिर बंद कर दिया, फर कभी मन हुआ तो फिर शुरू कर लिया। बेतरतीब, शरीर भी आदी हो गया है, प्रतिक्रिया नहीं देता।

    2004 में जब 18 दिनों का जल-उपवास किया था तब पीठ पर लगभग 20 किलो का भारी बैग लाद कर ट्रेन के जनरल डिब्बों में लंबी यात्राएं भी कर रहा था। भीड़ भरी सरकारी ग्रामीण बसों में धक्के खाते यात्राएं कर रहा था। शरीर व मस्तिष्क की ओर से कोई शिकवा-शिकायत नहीं। 

    मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि इतना बेतरतीब जीवनशैली होने के बावजूद, मेरे शरीर व मस्तिष्क की क्षमता दुरुस्त है। मैं शरीर व मस्तिष्क का बिना चिंता किए मनचाहा इस्तेमाल कर लेता हूँ। अब जबकि मेरी आयु 40 वर्ष से अधिक है, तब भी अभी तक ठीकठाक ही चल रहा है। बीमार नहीं पड़ता। दवाएं नहीं खाता। विटामिन की गोलियां नहीं खाता। सप्लीमेंट्स नहीं लेता। जबकि मांस मछली नहीं खाता, शाकाहारी हूँ। मुझमें शराब, काफी, चाय इत्यादि की कोई भी लत नहीं, कभी नहीं प्रयोग करता। पिछले दो सालों से तो काफी भी नहीं पी, जबकि पहले महीने में एकाध बार काफी पी लेता था। 

    मैंने अपने जीवन में लंबे समय तक बहुत अधिक शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक प्रताड़नाएं झेली हैं। इसके बावजूद मुझे आजतक न तो डायबिटीज है, और न ही उच्च या निम्न किसी प्रकार का ब्लड-प्रेशर ही है।

    मेरा मानना है कि मेरा शरीर फिट है। भले ही मैं मैराथन नहीं दौड़ता होऊं, तैराकी नहीं करता होऊं, जिमनास्ट न होऊं। फिटनेस का मतलब केवल खेलकूद करना ही नहीं होता। मेरा मानना है कि फिटनेस का सही मायने यह है कि आप विभिन्न स्थितियों परिस्थितियों में लंबे समय तक व अचानक बिना किसी पूर्व नोटिश के भी सहजता से बिना शरीर व मस्तिष्क का आपा खोए हुए रह सकते हैं।

    मैं अपनी शारीरिक व मानसिक फिटनेस का श्रेय जल-उपवास करने की जीवन-शैली को देता हूँ। यदि आप चाहें तो जल-उपवास से होने वाले लाभों के बारे में इस लेख में आगे पढ़ सकते हैं। यहां जल-उपवास का मतलब कम से कम पांच दिन की अवधि का जल-उपवास। 


    जल-उपवास : परिचय

    यदि आप अपने शरीर के प्रति गंभीर हैं और जल-उपवास करना चाहते हैं। आपको कम से कम पांच दिन का जल-उपवास करना चाहिए। जल-उपवास का मतलब पानी के अलावा कुछ भी नहीं ग्रहण करना। पानी के अतिरिक्त फल, सब्जी, अनाज इत्यादि किसी भी रूप व मात्रा में नहीं, जूस भी नहीं। स्पष्ट रूप से यह समझिए कि केवल और केवल पानी।

    यदि आपको डायबिटीज है। इतना तय मानिए कि यदि आप जल-उपवास कर लिए तो आपको बहुत आराम मिलेगा। जल-उपवास शरीर में इन्सुलिन का तंत्र बेहतर करता है। लेकिन डायबिटीज होने के कारण पहली बार जल-उपवास कैसे करेंगे यह जानकारी प्राकृतिक शैली वाले किसी जेनुइन विशेषज्ञ चिकित्सक से ले लीजिए। यदि आपकी इच्छा हो तो मैं आपका संपर्क बेहतरीन प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञों से करवा सकता हूँ। आप उनसे परामर्श ले सकते हैं।

    हममें से बहुत लोग एक दिन भी बिना भोजन किए या कुछ न कुछ खाए नहीं रह सकते हैं। उनके दिलोदिमाग में ऐसा बैठ गया है कि यदि नहीं खाया गया तो बहुत नुकसान होगा, कुछ लोग तो यहां तक सोचते हैं कि नहीं खाने से मर जाएंगे। बहुत भ्रांतियां हैं। जिन लोगों ने एक या दो दिनों का जल-उपवास रखा भी है तो भी उनको पांच दिवसीय या अधिक दिनों के जल-उपवास के लाभों व अनुभवों के बारे में अंदाजा नहीं होगा, इन लोगों को भी कई भ्रांतियां रहतीं हैं। 

    जब आप शरीर को केवल पानी पर रखते हैं। तो पहले के दो से तीन दिनों तक आपका शरीर भोजन वाले मोड में ही रहता है। आपके शरीर में उपस्थित विषाक्त पदार्थों व तत्वों की मात्रा व प्रकार के आधार पर आपका शरीर भोजन के लिए भयंकर मांग रखता है या एक तरह से कह लीजिए कि छटपटाता है। शरीर को लगता है कि मांग करने पर आप उसकी मांग पूरी करेंगे ही, इसलिए वह पूरी ताकत के साथ भोजन के लिए अपनी मांग रखता है। मेरा मानना है कि अधिकतर यह मनोवैज्ञानिक कारणों व कंडीशनिंग के कारण होता है, शरीर की अपनी विशुद्ध मांग उतनी नहीं होती है जितनी प्रतीत होती है या जितना शरीर हल्ला-गुल्ला मचाता है।

    मेरी स्थिति तो यह है कि मैं शरीर को बता देता हूँ कि अब भोजन नहीं मिलेगा, तुम्हारे पास जो है उसी से काम चलाओ। शरीर बहुत हीला-हवाला नहीं करता है, आदेश मान लेता है। यह आपके अपने शरीर के ऊपर निर्भर करता है कि आपका शरीर दो दिनों बाद या तीन दिनों बाद भोजन के लिए बाहरी मांग करने की बजाय, शरीर में ही उपस्थित तत्वों से काम चलाना शुरू कर देता है।


    नए ऊतकों का निर्माण, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना, पाचन तंत्र की मरम्मत व नवीनीकरण

    आपका शरीर जब बाहरी मांग करने की बजाय शरीर के भीतर उपस्थित तत्वों के प्रयोग करने के मोड में आता है तो वह कुछ मूलभूत प्रक्रियाओं को करता है। ऊर्जा बचाने के लिए शरीर में उपस्थित फालतू व विषाक्त द्रव्यों, तत्वों को बाहर करना शुरू करता है। आपके शरीर में जो फालतू चर्बी जमा होती है, उसको पिघला कर प्रयोग करना शुरू करता है। इससे आपके शरीर का अतिरिक्त वजन मतलब आपका मोटापा भी घटता है।

    शरीर अपने भीतर के तत्वों से काम चलाने के मोड में जब आ जाता है और चूंकि आप केवल जल ही ग्रहण कर रहे होते हैं इसलिए शरीर को भोजन को पचाने के लिए प्रयोग होने वाली आग नहीं दहकानी पड़ती है। शरीर के तत्वों व ऊतकों इत्यादि का जलाव नहीं होता है। मतलब यह कि शरीर की बहुत बड़ी ऊर्जा व मशीनरी का प्रयोग केवल भोजन को गलाना, जलाना व फिर विभिन्न भंडारगृहों में पहुंचाना इत्यादि कार्यों में नहीं हो रहा होता है। शरीर अपनी ऊर्जा का प्रयोग नए ऊतकों व कोशिकाओं के निर्माण में लगाता है। परिणामस्वरूप पाचन प्रक्रिया व अंगों के पूरे तंत्र का नवीनीकरण होता है। 


    विभिन्न बीमारियों का इलाज व उनके द्वारा हुई क्षति की मरम्मत तथा आयु का बढ़ना 

    ऊर्जा का प्रयोग शरीर के ढांचो की मरम्मत होने के कारण शरीर के विभिन्न आंतरिक अंगों में सूजन में कमी आती है। ऊतकों व कोशिकाओं के नवीनीकरण के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। तनाव घटता है तो रक्तचाप अपनेआप संतुलित होने लगता है। शरीर बेहतर जीवंतता व सुगमता की ओर बढ़ता है। चूंकि शरीर में पानी के अलावा कुछ और जाता ही नहीं है इसलिए इन्सुलिन तंत्र की संवेदनशीलता भी बढ़ती है। डायबिटीज में लाभ पहुंचता है।

    शरीर के पाचन तंत्र वाले अंग व तंत्र फुर्सत में रहते हैं तो नए ऊतकों इत्यादि का निर्माण करते हैं, मरम्मत करते हैं। इन सब प्रक्रियाओं में गास्ट्रिटिस, आंतों में तनाव, कब्ज, दस्त, अपच, इत्यादि का तो शर्तिया इलाज शरीर खुद ही बिना किसी टालमटोल के कर लेता है।

    शरीर की आयु बढ़ती है, मस्तिष्क की क्षमता व उम्र बढ़ती है। ह्रदय संबंधित बीमारियों के होने की संभावना कम होती है तथा बीमारियों का प्रतिरोध होता है।


    कैंसर, अल्सर, ट्यूमर जैसी बीमारियों में अद्वितीय लाभ

    ऊर्जा को व्यर्थ में नष्ट होने से बचाने के लिए तथा अपने भीतर ही उपस्थित तत्वों को इस्तेमाल करने के आटोमेशन के कारण नए बेहतरीन ऊतकों का निर्माण करता है। चूंकि शरीर विषाक्त व रद्दी कोशिकाओं व तत्वों को बाहर निकालने व नए बेहतरीन ऊतकों के निर्माण की प्रक्रिया में लग जाता है। इसलिए जिनको कैंसर है उनकी कैंसर कोशिकाओं के विस्तार व प्रसार को रोकता है। केंसर कोशिकाओं के प्रसार में रोक लगने व नई बेहतर कोशिकाओं के निर्माण के कारण कैंसर जैसी बीामरियों में भी लाभ पहुंचता है। जिनको कैंसर नहीं है, उनको कैंसर होने की संभावना क्षीण होती है।

    चलते-चलते: 

    शरीर के साथ छेड़खानी न कीजिए। शरीर का तंत्र हमारी आपकी कल्पना से बहुत ही अधिक परे आटोमैटिक, व्यवस्थित व अद्वितीय है। शरीर के साथ सद्भाव में रहने से शरीर बहुत ही आज्ञाकारी, विश्वसनीय व बेहतरीन साथी के रूप में आपके लिए जीता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • अव्यवस्थित सुनहरी भावनाओं को समेटती- मेरी प्रेम कविताएं

    अव्यवस्थित सुनहरी भावनाओं को समेटती- मेरी प्रेम कविताएं

    Mukesh Kumar Sinha[divider style=’right’]

    अव्यवस्थित
    सुनहरी भावनाओं को
    बेवजह समेटने की कोशिश भर हैं
    मेरी प्रेम कविताएं

    जिसकी शुरूआती पंक्तियां
    गुलाबी दबी मुस्कुराहटों के साथ
    चाहती हैं
    हो जाएं तुम्हें समर्पित

    पर स्वछंद हंसते डिंपल से जड़ी मुस्कान और
    तुम्हारे परफेक्ट आई क्यू के कॉकटेल में
    कहीं खोती हुई ये कविता
    प्रेम की चाहत को जज़्ब करती है
    जैसे जींस के पीछे के पॉकेट में बटुए को दबाये
    तुमसे कहना चाहती है
    ‘आज तो कॉफी का बिल तुम ही भरना’
    प्रेम भी तो अर्थव्यवस्था का मारा हुआ है आखिर
    पर कैफे कॉफी डे के कॉफी पर
    बना दिल
    पीता हूँ ऐसे, जैसे
    प्रेम को आत्मसात करा हूँ
    बूंद दर बूंद।

    सारी वैचारिक्ताएं शहीद हो जाती है
    जब तुम कॉफी हाउस में
    टेबल पर उचककर
    चाहती हो मेरे आँखों में झांकना
    लेकिन मेरी फिसलती नज़र
    मौन होकर भी पूछती है
    तुम्हारे टीशर्ट का साइज़ एक्सएल है न?
    बिना इतराये, ख़ार खाये
    कहती हो तुम, शोख मुस्कराहट के साथ
    ‘ओये! ऊपर देख।’

    मैं भी, तब
    इस ‘ओये’ पर चाहता हूँ
    हो जाऊं कुर्बान
    पर पढ़ा है, अब मजनूं मरते नहीं
    बेहोश भी कहाँ होते हैं
    बस एक तीक्ष्ण मुस्कुराहट भर
    रह गया है ये प्यार
    है न

    Mukesh Kumar Sinha

    वैसे
    मेरा तुम्हारे लिए आकर्षण
    तुम्हारा मेरे प्रति झुकाव
    हम दोनों के बीच
    पनपता रहस्यमयी अहसास
    जैसे जेम्स हेडली चेज़ का जासूसी उपान्यास
    अंतिम पन्ने से पता चलेगा
    प्रेम ही तो है,
    अनबिलिवेबल प्रेम!

    नहीं मेरे अहमक!
    वी आर ओनली फ्रेंड्स
    – तुम्हारे मादक होंठ काँपे थे

    कोई न,
    दोस्त तो हैं न!
    टचवुड!

  • 11 फरवरी 2018 से 15 फरवरी 2018 तक चले पांच दिवसीय जल-उपवास में मेरी दिनचर्या –सामाजिक यायावर

    11 फरवरी 2018 से 15 फरवरी 2018 तक चले पांच दिवसीय जल-उपवास में मेरी दिनचर्या –सामाजिक यायावर

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    मैंने अपने जीवन में बहुत उपवास किए हैं। महीने में कई बार उपवास करना, मेरे जीवन की सामान्य चर्या रही है। मैंने अपने जीवन में सबसे लंबा उपवास 18 दिवसीय किया। इस उपवास में सातवें दिन से नींबू व नमक लेना शुरू कर दिया था, छठवें दिन तक केवल पानी। सन् 2004 में इस उपवास के बाद मैंने उपवास करना लगभग बंद कर दिया। कई-कई महीनों में वर्ष में एक दो बार, कभी कभार एक से दो दिन के उपवास करता रहा लेकिन लंबे उपवास नहीं किए। दो दिवस से अधिक लंबा उपवास लगभग 14 वर्षों बाद फरवरी 2018 में किया। 

    11 फरवरी 2018 से 15 फरवरी 2018 तक चले पांच दिवसीय जल-उपवास की दिनचर्या: (कुछ फोटो भी हैं)

    पहला दिन

    दूसरा दिन

    तीसरा दिन

    चौथा दिन

    पांचवा दिन

    योजना है कि हर महीने पांच दिन तक जल-उपवास किया जाए। जल-उपवास का अर्थ केवल जल ग्रहण करना और कुछ भी नहीं। अगला उपवास 3 मार्च 2018 से 7 मार्च 2018 तक चलेगा।

    (*आदि मेेरी एकमात्र संतान हैं, जिनकी आयु सत्रह महीने की पूरी हो चुकी है।)

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • तमाशा –अपूर्वा प्रताप सिंह

    तमाशा –अपूर्वा प्रताप सिंह

    Apoorva Pratap Singh

    खूँटे में एक औरत एड़ियों से बंधी पड़ी है। उसके पति ने पैर से उसका गला दबा रखा है और डंडे से पीट रहा है। वो दोनों हाथों से अपना गला छुड़ाने की असफल कोशिश कर रही है। जब-जब उसके शरीर पर डंडा पड़ता है , उसका शरीर ऐंठ जाता है। गला दबा है तो चीख नहीं पा रही। यही उसका प्रतिरोध है और यही उसकी प्रतिक्रिया।

    वहाँ वो अकेली नहीं है। खूँटे के किनारे लोग खाट लगाकर बैठे हैं। तमाशा चल रहा है। हर उम्र के लोग हैं। देख कर लगता है जैसे कोई एडल्ट्री का मामला है। छोटे-छोटे बच्चे पूरे उत्साह में हैं औरहाथ मे डंडियाँ लिए हुए हैं। औरत का पति पूरी ताकत से वार कर रहा है। जैसे ये उसकी मर्दानगी का इम्तिहान हो। ज़ाहिर करना चाहता है कि वो मजबूत और स्वस्थ है…. तेज ‘वार’ करता है वो।

    Apoorva Pratap Singh

    आस-पड़ोस की औरतें मार खा रही औरत को उलाहना दे रही हैं । बाकी लोग उसके पति को उत्साहित कर रहे हैं। अब उस आदमी ने कमर से बेल्ट निकाल ली है। औरत के मुँह पर लगातार बेल्ट मार रहा है। मारते-मारते थक चुका है पर स्वीकार नहीं करना चाहता कि वो ‘थकता’ भी है।

    इसके आगे नहीं देखा। मन नहीं हुआ। पर इतना जरूर समझ आया कि उस तमाशे में सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं से बंधे थे। जितना कठिन उस औरत के लिए पिटाई से बच पाना था , उतना ही कठिन उसके पति के लिए उसको पीटने से बच पाना था। पिटती औरत को उलाहना देने वाली औरतें भी उसको उलाहना देने से नहीं बच सकती थीं।

    इस तमाशे की स्क्रिप्ट तैयार होने में हज़ारों साल लगे हैं।

  • लेबेन्स्रॉम – “रहने और विकास के लिए जगह”

    लेबेन्स्रॉम – “रहने और विकास के लिए जगह”


    Skand Shukla

    बन्दर : “तुझे अब डरने की ज़रूरत नहीं उससे। उन्होंने उसे मार डाला !”
    बन्दरिया : “किसने ? किसे ?”
    बन्दर : “वह तेंदुआ जो इस पेड़ पर अक्सर आता था। इंसानों ने।”
    बन्दरिया : “पर क्यों ?” 
    बन्दर : “वह मानवों के शहर लखनऊ में घुस गया था।”
    बन्दर :”मूरख कहीं का ! उसे वहाँ जाने की क्या ज़रूरत थी !”
    बन्दर : “समस्या तो यही है। हममें से कोई कहीं नहीं जाता। केवल इंसान जाता है।”
    बन्दरिया :”मतलब ?”
    बन्दर : “हिटलर का नाम सुना है तूने ?”
    बन्दरिया : “नहीं। कोई जानवर है ?”
    बन्दर : “जानवर कहकर जानवरों को गाली न दे तू। वह एक इंसान था। इन्हीं की बिरादरी का।”
    बन्दरिया : “उसने क्या किया।”
    बन्दर : “उसने लोग मारे। साथी इंसान।”
    बन्दरिया : “पर क्यों ? इंसान तो इंसान नहीं खाते !”
    बन्दर : “इंसान भूख के लिए ज़्यादातर काम नहीं करता। उसे ताक़त चाहिए होती है।”
    बन्दरिया : “कैसी ताक़त है यह जो मारने से मिलती है !”
    बन्दर : “गुरूर की ताक़त।”
    बन्दरिया : “तो क्या आदमियों को मारकर हिटलर बहुत बड़ा और मोटा हो गया ताक़त के साथ ?”
    बन्दर : “नहीं। उतना ही रहा। उसे लेकिन लगा … “
    बन्दरिया ( खिन्नता की हँसी हँसते हुए ) : “उसे लगा … उसे लगा ! इंसान को लगता बहुत है !”
    बन्दर : “और होता कुछ नहीं।”
    बन्दरिया : ” तू मुझे उस इंसान हिटलर की कहानी बता। आगे ?”
    बन्दर : “उसे लेबेन्स्रॉम चाहिए था। लेबेन्स्रॉम जानती है ?”
    बन्दरिया ‘न’ कहते हुए गरदन हिलाती है। 
    बन्दर : “रहने और विकास के लिए जगह।”
    बन्दरिया : “इंसानों के पास अब भी जगह की कमी है ? पूरी धरती कब्ज़ा लेने के बाद भी ?”
    बन्दर : “उन्हें लगता है। उनमें से कुछ को लगता है। उनमें से कुछ को लगता रहेगा।”
    बन्दरिया : “तो उस आदमी हिटलर से हमारे इस तेंदुए का क्या ताल्लुक़ ?”
    बन्दर : “क्योंकि हर आदमी में एक हिटलर होता है। जो कभी भी जाग सकता है अपने लेबेन्स्रॉम की माँग लिए।”
    बन्दरिया : “जब साथ के इंसान उसने नहीं छोड़े , तो हम जैसे जानवरों की क्या बिसात।”
    बन्दर : “जीवन में किसी की बिसात छोटी नहीं होती। समय-समय का फेर है।”
    बन्दरिया :”कहना क्या चाहता है तू ?”
    बन्दर : “देखती जा। इंसानों का यह कुनबा अचानक जाएगा इस दुनिया से।”
    बन्दरिया : “अरे, पर उसके पहले संसार में न कोई तेंदुआ बचेगा और न कोई बन्दर। अपने लेबेन्स … लेबेन्स्रॉम के लिए ये हिटलर सबका हक़ छीन लेंगे।सबको मार देंगे।”
    बन्दर : “उनको उनके हिस्से की ज़मीन हमेशा कम पड़ेगी।”
    बन्दरिया बन्दर को दोनों हाथों से स्पर्श करती है। 
    बन्दर : “वे किसी के लिए धरती नहीं छोड़ेंगे।”
    बन्दरिया उसे धीरे से हिलाने लगती है। 
    बन्दर : “तेंदुआ कहीं नहीं गया था। इंसान उसके इलाक़े में आये थे।”
    बन्दरिया उसे ज़ोर से झकझोरती है। 
    बन्दर : ” वह इंसान बनने की कोशिश के साथ लेबेन्स्रॉम तलाशने निकला था ! भूल गया कि इंसानों-सा कमीना कोई हो नहीं सकता ! उतनी नीचता दुनिया के किसी जानवर के पास नहीं !”
    बन्दरिया ज़ोर से उसे बदहवासों-सी नोचने-खगोटने लगती है। 
    बन्दर : “हम सब मारे जाएँगे ! मारे जाएँगे ! लेकिन आख़िर में कोई हिटलर भी नहीं रहेगा ! कोई नहीं ! कोई नहीं !” 
    ( कहते हुए बन्दर पेड़ से नीचे गिर जाता है। उसका पेड़ छूट गया है। तेंदुए-सी ग़लती की शुरुआत उसने भी अन्ततः कर दी है। )

    Skand Shukla

  • लोहार

    लोहार

    Vijendra Diwach[divider style=’right’]

    आज का जमाना मुझे कम ही जानता है कम ही पहचानता है,
    आज मेरे पास लोहे का सामान कम ही खरीदा जाता है,
    क्योंकि जमाना आधुनिक है और
    अब कांच तथा स्टील ही मन को भाता है।

    नहीं  मेरे कोई ठौर-ठिकाने,
    गाता हूँ महाराणा प्रताप के गाने,
    एक पल यहाँ ठहरना, फिर कहींओर जाना,
    ना मैने कभी खुद को जाना,
    पूर्वजों ने लोहा कूटा मैने भी लोहा कूटना जाना।

    बनाता हूँ लोहे का चिमटा और फूंकनी,
    आज भी चलाता हूँ,कूट कूट कर लोहे को ढूंकनी।

    मौसम आते हैं, मौसम जाते है,
    सर्दी मेँ झींगुरोँ से बचने की खुशी मनाते हैँ,
    लेकिन रजाई से तारे नजर आते हैँ।
    गर्मी मेँ खुशी मनाते हैँ कि खुले मेँ सब अकेले अकेले सोयेंगे ,
    अंधङ-आँधियाँ हमारे तिरपाल उङाते हैँ।
    फिर वही मेंढको की टर्र-टर्र,
    रात मेँ झींगरों वाले मौसम आते हैँ।

    बनाकर बङी सी रोटी
    और लाल-हरी मिर्ची खाकर सोने का नाटक कर जाते हैँ,
    धीरे-धीरे सो जाते हैँ।
    सबकुछ विज्ञान के अनुसार अनुकुल हो जाता है,
    हमारा शरीर एडीज जैसे मच्छरो को भी झेल जाता है।

    डार्विन का संघर्षता का सिध्दान्त हम पर लागू हो जाता है,
    कोई भूला-भटका ग्राहक हमारे पास आता है,
    कुछ लेता है तो पूरा कुटुम्ब प्रसन्न होता है,
    नहीँ तो वही पहले जैसा हाल होता है।

    त्यौहारोँ पर लोग घरो मे रंग-पोतन का काम करते हैँ,
    हम हमारा ठिकाना ही चेंज करते है।
    दीवाली आती है
    हमारी गाङी कही ओर जाती है।

    आज हमारे बच्चे सूंघनी से नशा करते हैँ,
    बेमौत हमसे दूर सो जाते हैँ,
    दुःख होता है रोते हैँ,
    फिर वही लोहा पीटते हैँ।

    हैँ, हमारे काम के कलाकार है,
    बस कद्रदान कोई नही,
    ऐसी अनोखी जिन्दगी जीते हैँ,
    किसी से कोई शिकवे-शिकायते नही करते है,
    गम पीते हैँ,अपनी तकदीर को खेल मानकर जीते है।

    Vijendra Diwach

    पता है शिक्षा के अभाव मेँ सारे ये झमेले है,
    इस भीङ मेँ हम अकेले है,
    कोई तो हमेँ समझाये,
    शिक्षा का महत्व बताये,
    फिर देखना हम समाज की मुख्यधारा से कैसे जुङते है,
    लोहे की तरह कडिया जोङकर समाज की अटूट बैल बनाते है।

    हम पर ध्यान दो,
    हमें प्यार दो,
    इंसान हो,इंसान को पहचान दो।
    छोङो जी अपने अपने काम पर ध्यान दो,
    कश्मीर जल रहा है, इंसानियत पर ध्यान दो।।