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  • “पद़मावत” के बहाने राजस्थान के आत्मदर्प का उपहास उड़ाते हैं भंसाली — त्रिभुवन

    “पद़मावत” के बहाने राजस्थान के आत्मदर्प का उपहास उड़ाते हैं भंसाली — त्रिभुवन

    Tribhuvan

    संजय लीला भंसाली चाहे कितने भी बड़े फ़नकार क्यों न हों, लेकिन दिलों को जीत लेना इस क़दर आसान नहीं होता। फ़िल्मकारों के पास प्रचार की बहुतेरी चालाकियां हुआ करती हैं, लेकिन ये चीज़ें सदा ही जादू की तरह काम नहीं करतीं। प्रचार के लिए शुरू की गई विवादों की अदाकारी में भी सौ कर्ब के पहलू निकल आते हैं। भंसाली ने “पद्मावत” का निर्माण पूरा करके बड़ी ही अदाकारी के साथ फ़न्काराना रोने की कोशिश की थी, लेकिन राजस्थान के राजपूतों के विरोध के बाद उनके आँसू बह निकले।

    Padmaavat

    मैं कुछ दिन पहले अपनी दिल्ली यात्रा में “पद्मावत” देख चुका हूं। इस पर लिखने का काफ़ी मन था, लेकिन शनिवार की रात जब “चैंपियन” पर कमलेश ने कुछ चीज़ें छेड़ीं और साफ़ कहा कि इस तरह की फ़िल्में बननी ही क्यों चाहिए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने साफ़ तौर पर कहा कि किसी भी फ़िल्म या कृति पर रोक लगाना बहुत ग़लत है, लेकिन “पद्मावत” देखने के बाद मुझे लगता है कि न तो आम लोग किसी चीज़ का विरोध करते समय विवेक का इस्तेमाल करते हैं और न ही हमारे स्वनाम धन्य संपादक लोग राजस्थान के राजपूत शासकों का बुरी तरह उपहास उड़ाने वाली फ़िल्म की तारीफ़ें करते समय इतिहास के तथ्यों को ही याद रखते हैं।

    “पद्मावत” फ़िल्म को लेकर जो बात एक सामान्य युवक कमलेश के विवेक पर प्रहार करती है, वह फ़िल्म देखकर सबसे पहले फ़तवा जारी करने वाले मौलानुमा संपादकों की बुद्धि से बहुत परे की बात है। कमलेश का तर्क है : यथार्थ जीवन में रणवीर और दीपिका प्रेमी-प्रेमिका हैं और जब भंसाली इन्हें फ़िल्म में अलाउद्दीन ख़िलज़ी और पद्मिनी की भूमिकाएं देता है तो इसके पीछे फ़िल्म के निर्देशक की काईयां बुद्धि का पता चलता है। वह शरारतन कहीं न कहीं यह दर्शाना चाहता है कि दोनों के बीच प्रेम का कोई अदृश्य रसायन बह रहा था।

    और संभवत: यही वह बात थी, जिससे भंसाली के गाल पर पड़े थप्पड़ के पीछे का गुस्सा अंकुरित हुआ था। कमलेश और दूसरे बहुतेरे लोगों का मानना है कि भंसाली ने पद्मिनी के माध्यम से क्षत्रियों की प्रतिष्ठा से छेड़छाड़ की कोशिश की है और यह नाक़ाबिले बर्दाश्त है।

    लेकिन फ़िल्म देखने के बाद मुझे बहुतेरा ऐसा आपत्तिजनक लगा, जो शायद फ़िल्म की तारीफ़ें करने वाले बुद्धिजीवियों की निगाह में सही रहा होगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भंसाली ने अलाउद्दीन ख़िलजी के रूप में जो पात्र गढ़ा और जितनी मेहनत उसे संवारने और जीवंतता प्रदान करने में खर्च की, उसका एक प्रतिशत भी राजस्थान की वीरता की शान रहे रत्नसेन के पात्र पर खर्च नहीं की।

    Alauddin Khilji (Ranveer Singh)

    ख़िलजी वाक़ई बहादुर और दुस्साहसी था, लेकिन रत्नसिंह की कद-काठी और उसके हावभाव ऐसे तो नहीं ही रहे होंगे, जैसे शाहिद कपूर के दिखाए गए हैं। भंसाली ने रत्नसिंह के पात्र को बुरी तरह कमज़ोर दिखाने के लिए ही शाहिद कपूर का चयन किया है, जो रणवीरसिंह अभिनीत अलाउद्दीन ख़िलजी के सामने दो कौड़ी का भी नहीं लगता।

    ख़िलजी की कुश्ती का दृश्य बहुत ज़ोरदार ढंग से फ़िल्माया गया है और उसमें ख़िलजी की ताक़त को जीवंतता दी गई है। उसका डील-डौल और उसके शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन क्या कमाल है। उसकी भूमिका को वीरता और क्रूरता के चाक पर शरीर और अभिनय की मिट्‌टी से गूंथा गया है।

    Ratnsen (Shahid Kapoor)

    अल्लाउदीन के मुकाबले रत्नसेन का पात्र बहुत कमजोर गढ़ा गया है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि शौर्य और शक्ति की मिट्‌टी से बना रत्नसेन शाहिद कपूर जैसा रहा होगा, जो पद्मिनी की तलाश में सिंहल द्वीप चला गया? शूरवीरों की कद-काठी छोटी हो सकती है, लेकिन उनके ओज और तेज ऐसे तो नहीं हुआ करते। रत्नसेन को उनकी पत्नी जिस पद्मिनी को लाने के लिए ताना देती है, वह पद्मिनी किसी सुंदरी का नाम नहीं था, अपितु भारतीय कामशास्त्र की भाषा में सर्वाेत्तम मानी जाने वाली सुंदरी पद्मिनी थी। जैसे चित्रिणी, शंखिनी, हंसिनी आदि मानी जाती हैं। और शूरवीर तथा कामवेत्ता रत्नसिंह जब पद्मिनी की तलाश पूरी करके लौटता है तो क्या उसका संघर्ष कम रहा होगा?

    इस फ़िल्म को देखकर तो लगता है कि राजपूतों से ज़्यादा अगर किसी को विरोध करना चाहिए था तो ब्राह्मणों को करना चाहिए था। इसमें राघव चेतन ब्राह्मण को न केवल फ़िल्म में देशद्रोही और विश्वासघाती बताया गया है, बल्कि उसे निकृष्टतम व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। राघव जैसा सुरीला और निष्णात बांसुरीवादक दिखाया गया है, अगर वह वाक़ई में संगीतज्ञ था तो द्रोही नहीं था और अगर द्राही था तो वह संगीतज्ञ नहीं हो सकता।

    पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मानते हैं कि राजपूतों ने मानवीयता और अद्वितीय किस्म की निर्भीकता के कारण चालाक, निष्ठुर और अमानवीय आक्रमणकारियों से मात खाई। इसके अनुपम उदाहरण भी बिखरे पड़े हैं। लेकिन फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह अलाउद्दीन ख़िलजी रत्नसेन के महल में निर्भीकता से आता है।

    Padmaavat Ratnsen

    इतना ही नहीं, अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़गढ़ के दुर्ग के चारों तरफ घेरा डाल रखा है और भीतर रत्नसेन और पद्मिनी कभी होली खेलते हैं और कभी दीपावली मनाते हैं। क्या सामान्य सा विवेक रखने वाले शासक के साथ भी ऐसा संभव है कि वह चारों तरफ शत्रु से घिरा रहे और किले के भीतर नीर बनकर बांसुरी बजाता रहे? भंसाली ने बहुत ही चालाकी से राजपूत वीर को निहायत ही कायर और मूर्ख चित्रित करने की कोशिश की है और यह इतिहास के सच के हिसाब से भी बहुत आपत्तिजनक है। एक जगह तो रत्नसेन अचानक अलाउद्दीन की सेना पर ऐसे समय हमला करता है जब सब लोग सोए पड़े हैं और कोई जगाकर अलाउद्दीन को हमले की सूचना देता है। मेरा ख़याल है कि राजपूत शासकों के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा निकृष्ट शासक हो, जिसने कभी किसी सोए हुए शत्रु पर हमला किया हो।

    यह सही है कि अलाउद्दीन ख़िलजी के पात्र को इस फ़िल्म में बहुत क्रूर दिखाया गया है, लेकिन यह क्रूरता उसके प्रभाव में बढ़ोतरी पैदा करती है, न कि उसके पात्र को वीभत्स बनाती है।

    Aditi Rao and Deepika Padkone

    पद्मिनी के पात्र में दीपिका का अभिनय बहुत कमज़ोर और निष्प्राण रहा है। उसका पात्र और उसके संवाद भी बहुत बचकाने गढ़े गए हैं। इसके विपरीत ख़िलजी की पत्नी मेहरुनिसा की भूमिका में अदिति राव का क्या शानदार अभिनय है। जिम सर्भ तो क़माल हैं।

    दरअसल, यह फ़िल्म दिल्ली को केंद्र में रखकर गढ़ी गई है। दिल्ली अलाउद्दीन ख़िलजी और अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली। दिल्ली सदा सदा से ही ज़ुल्मत की प्रतीक रही है, लेकिन दिल्ली के वासियों के लिए यह अत्याचार सदा ही सदाचार रहा है।

    मुझे लगता है कि रत्नसेन के बहाने भंसाली ने राजस्थान के आत्मदर्प को बहुत नीचा दिखाया है और ख़िलजी की शान में जमकर कसीदे पढ़े हैं। और यह बहुत आपत्तिजनक है। इसका बात का पता फ़िल्म देखकर ही लग सकता है और किसी भी फ़िल्म, पुस्तक और कलाकृति पर प्रतिबंध लगाना विवेक की अर्गलाएं बंद करने के समान है। ऐसा करना भंसाली की मानसिकता को आर्थिक फायदों से भर देना है। अगर विरोध इतना प्रखर नहीं होता तो यह फ़िल्म वाकई में बुरी तरह पिट जाती। लिहाजा, फ़िल्म का विरोध करने वाले तत्वों ने राजस्थान के दर्प का उपहास उड़ाने वाले भंसाली की परोक्ष रूप से जाने या अनजाने प्रचार में बहुत मदद की है।

    Tribhuvan

    Credits: Facebook profile of Tribhuvan

  • दलित-नट जाति की सरिता भारत व जाट जाति के वीरेंद्र क्रांतिकारी ने जातीय प्रपंचों को रचनात्मक क्रियाशीलता व सांगठनिक कौशल से समाज के बीच रहते हुए तोड़कर आदर्श स्थापित किया

    दलित-नट जाति की सरिता भारत व जाट जाति के वीरेंद्र क्रांतिकारी ने जातीय प्रपंचों को रचनात्मक क्रियाशीलता व सांगठनिक कौशल से समाज के बीच रहते हुए तोड़कर आदर्श स्थापित किया

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    सरिता भारत उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले के एक गांव की दलित नट जाति की हैं। वीरेंद्र क्रांतिकारी उत्तरप्रदेश के ही अमरोहा जिले के एक जाट बाहुल्य गांव सुल्तानपुर के जाट जाति के हैं। वीरेंद्र अक्खड़ व क्रांतिकारी प्रवत्ति के इसी कारण उनके मित्रों/सहपाठियों इत्यादि ने “क्रांतिकारी” कहना शुरू कर दिया। सरिता भारत भावुक व शोषित समाज व शोषित जाति के लोगों के लिए संवेदनशील। मेरी इन दोनों के साथ पहली मुलाकात लगभग चौदह (14) वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के एक गांव में हुई थी। यह तब की बात है जब स्वयं सरिता भारत व वीरेंद्र क्रांतिकारी भी नहीं जानते होंगे कि वे दोनों एक दूसरे के जीवन साथी बनेंगे, दूर-दूर तक ऐसी संभावना नहीं दीखती थी।

    अंतर्जातीय विवाह:

    भारतीय समाज में अंतर्जातीय विवाह करने वाले लोग हैं। इन उदाहरणों में से अधिकतर में पुरुष अपने से ऊंची जाति की लड़की से विवाह करते हैं। इनमें से भी अधिकतर पुरुष अच्छी सरकारी नौकरी करने वाले होते हैं या अच्छे वेतन की बेहतर नौकरी किसी अच्छी कंपनी में या अच्छा खासा व्यापार करते होते हैं। 

    आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें सरकारी अधिकारी दलित-पुरुष, प्रोफेसर दलित-पुरुष या राजनेता या पढ़े लिखे आर्थिक रूप से संपन्न पुरुष इत्यादि के साथ ब्राह्मण स्त्री ने विवाह किया। आपको कुछ ऐसे भी उदाहरण भी मिल जाएंगे जिनमें ब्राह्मण पुरुष ने दलित स्त्री से विवाह किया, इनमें भी अधिकतर घटनाएं ऐसी कि दलित स्त्री संपन्न व प्रतिष्ठित दलित परिवार से होती है।

    यदि इन उदाहरणों को ध्यान से देखा जाए तो इनमें एक महत्वपूर्ण उभयनिष्ठ-तत्व यह है कि इन अंतर्जातीय विवाहों में स्त्री पुरुष दोनों को ही समाज के उन दायरों में नहीं रहना पड़ता है जो जाति के इर्द गिर्द घूमते हैं। इन विवाहों में अधिकतर में पुरुष की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, सुरक्षित व बेहतर भविष्य व जीवन की आश्वस्ति होती है तथा पति-पत्नी किसी मेट्रो या बड़े शहर में निवास करते हैं। 

    चूंकि अच्छी नौकरी है, अच्छी आय का बेेहतर ढांचा है, मेट्रो या बड़े शहरों में रहना है जहां पड़ोसी से भी अभिवादन महीनों में होता है, इसलिए इन अंतर्जातीय विवाहों में पारिवारिक व सामाजिक विरोध का खास मतलब नहीं होता है। विवाह के पूर्व व बाद में कुछ समय तक पारिवारिक विरोध हुआ, चूंकि परिवार व समाज के साथ रहना नहीं होता, उनके ऊपर आर्थिक निर्भरता नहीं होती इसलिए उनके विरोध का ठोस दुष्प्रभाव जीवन में नहीं पड़ता है। कुछ समय पश्चात परिवार ऊपरी नौटंकी व ढोंग इत्यादि दिखाकर विवाह को स्वीकार भी कर लेता है, यदि नहीं भी करता है तो भी जीवन में बहुत अंतर नहीं आता है।

    लेकिन कुछ अंतर्जातीय विवाह अपवाद होते हैं, आदर्श होते हैं। इन विवाहों में जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने का चारित्रिक गुण होता है। सामाजिक मानदंडों को परिवर्तित करने का चरित्र रखते हैं। यह लेख ऐसे ही दम्पति की कहानी है।

    पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां प्रेम विवाह के कारण माताएं तक अपनी पुत्रियों की हत्याएं कर देतीं हैं। यह लेख इसी क्षेत्र के वीरेंद्र क्रांतिकारी व उनकी पत्नी सरिता भारत के विवाह के ऊपर है। इनका विवाह सही मायने में जाति को तोड़ने का आदर्श स्थापित करता है। यदि आप जाति व्यवस्था को नहीं स्वीकारते हैं तो आपको इनके विवाह के बारे में जानकर अच्छा लगेगा। इन दोनों ने अपना विवाह आम समाज के आम लोगों के समक्ष रचनात्मक तरीके से जाति व्यवस्था का समाधानात्मक विरोध करते हुए किया। ढंके की चोट पर समाज के सामने रचनात्मक तरीके से किए जाने के कारण तथा विवाह के बाद आम समाज के बीच में ही रहते हुए दाम्पत्य जीवन जीने के कारण प्रतिमान बन जाता है।

    विवाह के लिए आपसी सहमति:

    Virendra Krantikari and Sarita Bharat

    मार्च 2008 में वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने गांव में देश भर के कई राज्यों से लोगों को आमंत्रित करके एक बड़ा आयोजन किया। शहीद भगत सिंह की प्रतिमा स्थापित की। यहीं से आगे चलकर वीरेंद्र व सरिता का झुकाव एक दूसरे की ओर होने लगता है। दिसंबर 2008 में दोनों तय करते हैं कि विवाह करेंगे तथा शोषितों के लिए, गरीबों के लिए एक दूसरे के साथ जीते हुए मिलकर जीवन लगाएंगे।

    ये लोग चाहते तो बिना हंगामे के परिवार व समाज को बिना बताए चुपचाप विवाह करके सकून से दाम्पत्य जीवन जीते। चुपचाप वाले विवाह से जाति के घिनौनेपन में कोई प्रहार भी नहीं होना था, लोगों की मानसिकताएं भी नहीं टूटनीं थीं, एक तरह से जाति व्यवस्था के समक्ष समर्पण कर देने जैसी बात थी। वीरेंद्र क्रांतिकारी व सरिता भारत की क्रांतिकारी व सामाजिक न्याय वाली विचारधारा, जाति के कारण इस तरह की विवशता को स्वीकारने को तैयार नहीं थी कि चुपचाप विवाह किया जाए।

    Virendra Krantikari

    दिसंबर 2008 में विवाह का निर्णय लेने के बाद वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने परिवार को धीरे-धीरे तैयार किया। कुछ महीने चर्चाओं के दौर चले, विरोध झेलना पड़ा लेकिन वीरेंद्र ने अपने परिवार को इस विवाह के लिए तैयार कर लिया। समाज की सोच बदलने के लिए समय-समय पर जाति, समाज इत्यादि मु्द्दों पर चर्चाओं के कई आयोजन किए, एक तरह से गांव-समाज के बीच वैचारिक अभियान चलाया। 

    सरिता भारत हरदोई जिले की दलित-नट जाति से हैं। इस जाति की अपनी जाति पंचायत होती है, अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं, जिनको तोड़कर इस विवाह के लिए सहमति देना सरिता के परिवार के लिए संभव रहा भी नहीं होगा। सरिता भारत के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। पिता के गुजरने के बाद जाति पंचायत ने सरिता भारत की माता का विवाह उनके देवर, सरिता के चाचा, के साथ कर दिया। इस तरह सरिता का पालन-पोषण उनके सौतेले पिता/चाचा के द्वारा हुआ। 

    विवाह-समारोह:

    वीरेंद्र क्रांतिकारी ने अपने गांव, पड़ोसी गांवों व समाज के हजारों लोगों को आमंत्रित करते हुए विवाह का आयोजन किया।आर्यसमाज पद्धति से विवाह की रीति संपन्न हुई। लोगों को आमंत्रित करने के लिए बाकायदा पर्चा छपवाए, गांवों-गांवों में बांटे। गरीबों के मुद्दों के लिए काम करने के लिए सरिता व वीरेंद्र ने एक संगठन “भारतीय गरीब जन आन्दोलन” बनाया था, उसी के बैनर तले विवाह समारोह के लिए दो-दिवसीय जनसभा व सामाजिक चर्चा का आयोजन किया। अच्छी पुस्तकों व साहित्य को बांटा। 21 व 22 फरवरी 2009 के दो दिनों के इस आयोजन में 21 फरवरी को विवाह व सामूहिक भोज संपन्न हुआ, 22 फरवरी को जाति व अन्य सामाजिक मुद्दों पर खुलकर चर्चाएं कीं। विवाह में विभिन्न राज्यों व गांवों से आए दो हजार (2000) से अधिक लोगों ने भोजन ग्रहण किया।

    Virendra Krantikari and Sarita Bharat (Marriage Ceremony, the first day)

    Virendra Krantikari and Sarita Bharat (Marriage Ceremony, the second day)

    विवाहोपरांत दलित-नट जाति-पंचायत से दंडित होना:

    विवाह के बाद वीरेंद्र क्रांतिकारी व सरिता भारत दलित-नट जाति की जाति-पंचायत के सामने प्रस्तुत हुए तथा जाति-पंचायत की प्रक्रियाओं से गुजरे व जो दंड दिया गया उस दंड को स्वीकारा। अब इनका विवाह दोनों पक्षों के परिवारों की ओर से स्वीकृत है। इनकी एक संतान/पुत्र है जिसका नाम “संकल्प” है।

    Sarita Bharat, Virendra Krantikari with Sankalp

    सरिता भारत सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ शिक्षिका भी हैं। वीरेंद्र क्रांतिकारी पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, कहीं नौकरी नहीं करते हैं, कहीं से वेतन नहीं प्राप्त करते हैं। किसानों, जाति व साम्प्रदायिकता के मुद्दों पर उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा व अन्य राज्यों के गांवों में जमीन पर काम करते हैं। घर के कामकाज में खाना बनाने, कपड़े धोने व बच्चे की देखभाल तक सारे घरेलू कार्यों में पत्नी का पूरा सहयोग करते हैं।

    वीरेंद्र की माता को कैंसर है, उनकी देखभाल दोनों पति-पत्नी मिलकर करते हैं। 21 फरवरी को उनके विवाह की वर्षगांठ है, आप चाहें तो उनको इस लेख में कमेंट्स के द्वारा इनको शुभकामनाएं दे सकते हैं, आपकी शुभकामनाएं सरिता व वीरेंद्र तक ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया द्वारा ससम्मान व सप्रेम पहुंचा दी जाएंगीं। मेरी ओर से दम्पति को कोटि-कोटि शुभकामनाएं।

    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • संदीप वर्मा : एक आम आदमी की वैचारिक-यात्रा की बेतरतीब कहानी

    संदीप वर्मा : एक आम आदमी की वैचारिक-यात्रा की बेतरतीब कहानी

    Vivek “Samajik Yayavar”

    संदीप वर्मा के पिता के बचपन में ही उनकी माता का देहांत हो चुका था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण कभी इस रिश्तेदार के यहां, कभी उस रिश्तेदार के यहां भटकते हुए बिन माता के बालक संदीप के पिता का बचपन से किशोरावस्था का समय किसी तरह व्यतीत हुआ। किसी तरह दिल्ली पहुंचे, वहां जिन मुस्लिम व्यक्ति के यहां घड़ी सुधारने का काम सीखा, ताकि जीवन की गुजर बसर हो सके, आजीवन उनको अपना गुरू मानते रहे, पैर छूकर आदर देते रहे, गुरू शिष्य की परंपरा का निर्वाह करते रहे। सर्वधर्म सौहार्द का भाव व विनम्रता संदीप को उनके पिता से ही प्राप्त हुए।

    संदीप ने लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान की पढ़ाई की है। संदीप वर्मा की पढ़ाई उनके गांव व लखनऊ शहर के सस्ते सरकारी स्कूलों व लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई। संदीप को पत्रिकाएं पढ़ने का बहुत शौक था लेकिन खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे। इसलिए यहां वहां से उधार मांग कर जुगाड़ करते थे।

    पिछड़े जाति के होने का दंश भोगने व बचपन से ही शोषण व व्यवस्था की खामियां भोगते रहने के कारण भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होना है, करना है; कुछ ऐसी सोच बनी। संभवतः पत्रिकाएं व पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति के कारण जो ढोंग है, जो प्रायोजित है, उससे इतर भेद कर देखने की दृष्टि भी बननी शुरू हुई। 

    Sandeep Verma

    संदीप वर्मा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रति विशेष अनुराग व आदर का भाव रखते हैं। इसका कारण वीपी सिंह के द्वारा राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाना तथा मंडल कमीशन जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक न्याय के कार्य इत्यादि हैं। उस समय किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ रहे संदीप वर्मा राजनैतिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वीपी सिंह के आवाहन के साथ जमकर, परिश्रम करते हुए भरपूर सक्रियता के साथ जुटे पड़े थे।

    भारत में आम आदमी वह भी जो सरल आदमी हो, उसके लिए संभावनाएं नहीं रहतीं हैं, उल्टे शोषण तिरस्कार अपमान ही मिलता है। लेकिन मन के अंदर सामाजिक न्याय के लिए करते रहने की भावना कुछ न कुछ किसी न किसी मार्ग से करवाती रही। इसी प्रक्रिया में लगभग छः वर्ष पहले फेसबुक में आने के बाद संदीप वर्मा को महसूस हुआ कि सोशल मीडिया का सामाजिक न्याय व राजनैतिक चेतना के लिए बेहतर प्रयोग किया जा सकता है। संदीप लग गए वीपी सिंह की दलितों पिछड़ों व सामाजिक न्याय के प्रति सोच को लेकर। 

    सामाजिक न्याय व चेतना के प्रयासों को विस्तार देने के लिए लगभग तीन वर्ष पहले “जमावाड़ा” के नाम से सामाजिक चर्चाओं की सभाओं के आयोजन में। तीन लोगों से आरंभ हुआ जमावाड़ा आज पचास से अधिक लोगों का मंच है जो वैचारिक चर्चाएं करता है तथा घृणा की प्रचलित राजनीति के विपरीत जाकर प्रेम, सद्भाव और सहयोग के लिए प्रयास करता है। 

    मेरी मुलाकात:

    मैं लखनऊ गया हुआ था। फेसबुक से सूचना पाकर संदीप वर्मा मुझसे मिलने आए। शिक्षक हैं, लेकिन केवल मेरे साथ दिन बिताने के लिए अपना काम-काज छोड़कर साथ रहे, जबकि इनकी परिस्थिति रोज कुआं खोदना व रोज पानी पीने जैसी है। उनकी इच्छा थी कि मैं उनके घर चलकर रूखा-सूखा जो है वह भोजन करने चलूं, लेकिन उस दिन मेरी इतनी व्यस्तता थी कि संभव नहीं था। फिर भी संदीप भाई के ऊपर भोजन उधार है, जब भी भारत में कुछ दिनों के लिए पहुंचूंगा तब उधार वसूला जाएगा।

    बेहद विनम्र व सरलमना व्यक्ति। मेरी पहली मुलाकात थी। सोशल मीडिया में बहुत बार ऐसा होता है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का ठीक से अनुमान नहीं हो पाता। पूरा दिन साथ रहने के बाद मेरे अनुभव संदीप भाई के साथ बहुत अच्छे रहे। मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि एक आम आदमी जो सरलमना है, दांवपेच नहीं खेलता, मन में जो भाव हुआ उस आधार पर सोशल मीडिया पर अपनी बात रखता है। तब से मैंने संदीप भाई की फेसबुक पोस्टों व टिप्पणियों को अलग भाव व दृष्टि से देखना समझना शुरू किया, मुझे यह महसूस होना शुरू हुआ कि संदीप भाई संवेदनशीलता के साथ लिखते हैं।

    फेसबुक के माध्यम से मालूम हुआ कि संदीप भाई को कांग्रेस ने लखनऊ का विचार विभाग का दायित्व सौंपा है। संदीप जैसे आम आदमी, सरल आदमी जिसे राजनैतिक दांवपेच का ककहरा भी नहीं आता; कांग्रेस ने ऐसे बेहद सामान्य आदमी को लखनऊ जैसे आधुनिक शहर व उत्तर प्रदेश की राजधानी का विचार विभाग का दायित्व देकर, छोटा सा ही सही लेकिन कम से कम बदलाव का एक संदेश तो दिया ही है। 

    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • वेंटिलेटर पर देश के तकनीकी संस्थान व शिक्षा  — Anuj Agarwal

    वेंटिलेटर पर देश के तकनीकी संस्थान व शिक्षा  — Anuj Agarwal

    Anuj Agarwal

    यूं तो यह खबर उत्तर प्रदेश की है कि वहाँ के 32 इंजनियरिंग व मैनेजमेंट कॉलेज बंद हो रहे हैं, मगर कुछ ऐसी ही खबर देश के प्रत्येक राज्य में छप रही हैं। इस बर्ष एआईसीटीई से सम्बद्ध 10,300 कॉलेजो में से दस प्रतिशत यानि एक हज़ार से ज्यादा बंद हो रहे हैं। डायलॉग इंडिया ने अपने निजी संस्थानों के बार्षिक सर्वेक्षण : 2017 में यह खुलासा किया भी था कि अगले चार वर्षों में आधे से ज्यादा तकनीकी संस्थान बंद होने वाले हैं। सच्चाई यह है कि देश के लगभग 4000 तकनीकी शिक्षा संस्थान बंद होने के कगार पर है किंतू उनमें पढ़ रहे प्रथम , द्वितीय व तृतीय वर्ष के विद्यार्थियों का कोर्स बाकी है, इसलिए एकदम से बंद नहीं कर सकते। फिर सवाल सरकार की इज़्ज़त का है।

    ऐसा इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व रोजगार न दिला पाने के कारण भी हो रहा है। (देश के निजी विश्विद्यालयों ने भी परिदृश्य बदला है और इनमें से 5 लाख सीटे के भागीदार वे भी हैं और 2 से 3 लाख रोजगार भी।) वहाँ भी दिए जाने वाले रोजगार के मुकाबले दुगनी सीटें उपलब्ध हैं। एआइसीटीई खुद मानती है कि उससे संबद्ध संस्थानों में 37 लाख सीटें है किंतू प्रवेश केवल 20 लाख ही हो पाते हैं। ये भी माल कमाने के लालच में बच्चो व माता पिता को बहला फुसला कर, सब्जबाग दिखलाकर। इसी कारण अयोग्य विद्यार्थी प्रवेश तो ले लेता है किंतू कुछ समय बात ही पढ़ाई छोड़ देता है। ऐसे विद्यार्थियों की संख्या 7 लाख प्रतिबर्ष है यानि कुल प्रवेश का 35 प्रतिशत।

    अंदाज़ा लगाइए कितने बड़े सुनियोजित धोखे व लूट होती हैं नयी पीढ़ी के साथ। जैसे तैसे जो 13 लाख लोग डिग्री ले भी पाते हैं उनमें से आधे यानि 6 से 7 लाख नोकरी लायक नहीं होते और बेरोजगार रह जाते हैं। जिन 6-7 लाख विद्यार्थियों को नोकरी मिलती भी है उनमें से 1 से 2 लाख ही जॉब सेटिस्फेक्शन महसूस कर पाते है और बाकि कुढ़ते जलते संघर्ष करते रहते हैं।

    यह सरकारों के नीतिकारों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है कि जब देश को 6 से 7 लाख ही इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट पास लोग चाहिए तो 37 लाख सीटों का ढांचा जो लाखों करोड़ रुपये खर्चकर क्यों तैयार किया गया? फिर इतने संसाधनों व समय, धन व युवाओं की ऊर्जा क्यो बर्बाद की जा रही है? किसकी जबाबदेही है इस सुनियोजित सिंडिकेट की लूट व षड्यंत्र की?

    मजेदार बात यह है कि देश के हर नेता, नोकरशाह, उद्योगपति व व्यापारी की इन संस्थानों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पत्ती यानी हिस्सेदारी है। कितनी हास्यास्पद बात है कि हमारे देश मे एक करोड़ लोग इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं और देश का दो तिहाई हिस्सा आज भी अत्यधिक पिछड़ा है। बिना शिक्षा के भारतीयकरण के शोध, इन्नोवेशन, इंट्रप्रेनेरशिप, औधोगिकरण के अभाव के आयात आधारित अर्थव्यवस्था का यही हाल होना ही है। मोदी सरकार लाख मेक इन इंडिया का घंटा बजाती रहे।

    Anuj Agarwal

    Editor, Dialogue India
    General Secretary,
    MAULIK BHARAT

  • बिना ‘सेक्स’ सिर्फ ‘प्रेम’ महज ‘योगा’ है

    बिना ‘सेक्स’ सिर्फ ‘प्रेम’ महज ‘योगा’ है

    Ajay Yadav

    ज्यादा पुरानी नहीं, कुछ साल पहले की बात है। चाची की तबियत काफी बिगड़ गई थी, जब मैं हॉस्पिटल पहुँचा, कई डॉक्टर उन्हें घेरे हुए थे। वे अब कुछ बोल नहीं पा रही थीं। उन्होंने जब मुझे देखा तो लगा कि मेरी आँखों से वे अपने असहाय शरीर को निहार रही हैं। उनकी आंखें खत्म होती ज़िन्दगी की बेबशी कह रही थी। जब उनकी हथेलियों को मैंने अपने हाथ में लिया, उनके आंखों से आंसुओं की अशांत धारा बह निकली थी। उनकी हथेलियां खुरदुरी हो चुकी थी, हाथ-गाल और माथे में ठंढक तैरने लगी थी।

    बगल में चाचा खड़े थे। बीच-बीच में चाचा हंसते हुए बोल रहे थे- “क्या कह रही हैं?…कैसी हैं?”

    Ajay Yadav

    अपनी पत्नी से बात करने का यही तरीका था चाचा के पास! अगर मैं या डॉक्टर यहां से चले जाते तो चाचा भी चले जाते। अपनी ‘पत्नी’ के साथ अकेले खड़ा होना ‘चोरी’ पकड़े जाने-सा था। अपनी पूरी ज़िंदगी उन्होंने ऐसे ही जिया और ज़िन्दगी का यह तरीका उन्हें भी विरासत में ही मिला था। जब पूरी दुनियाँ सो जाएं तो लोग छिपते-झिझकते अपनी बीवियों के पास जाते थे और घर जागने से पहले निकल आते थे। चाचा, मेरे पिता, उनके पिता, पिता के पिता…ऐसे ही आते-जाते रहे, जीवन चक्र चलता रहा… हमारे समाज में बीवियां लाश की तरह अंधेरे में लेटी रहीं, कभी ठीक से एक-दूसरे के चेहरे निहार नहीं पायीं, कभी चरम अवस्था में पुरुष के उपर चढ़ नहीं पायीं, ‘चरित्रहीन’ समझे जाने से बचती रहीं…

    ऐसी ही ‘बचती हुई’ स्त्री आज ‘मृत्यु शैया’ पर लेटी हुई थी, लेकिन उसके साथ पूरी ज़िंदगी गुजार दिया ‘मर्द’ आज भी बात करने से झिझक रहा था। बहाने से करीब आने की कोशिश कर रहा था। बेचैन था, खुद को महज अभिभावक दिखाने की कोशिश कर रहा था। मैंने डॉक्टरों को वहां से जाने को कहा और चाचा के पास चला गया!

    “चाचा…चाची के पास बैठकर हाल-चाल कर लेंगे तो चाची को कितना अच्छा लगेगा!”

    चाचा का हाथ पकड़कर चाची के पास बैठा दिया। चाची की हथेलियाँ चाचा के हाथ में थमा दी। मैं जानता था कि अगर ऐसा नहीं करूंगा तो चाचा बुत की तरह बैठे रहेंगे। और चाचा ने एक बार चाची का हाथ पकड़ा तो पकड़े ही रहे…घंटों! जब चाचा ने कहा- “लगता है छोड़कर चली गईं..” चाचा अनाथ मासूम बन गए थे!

    बाद में चाचा जी भी गुजर गए, लेकिन चाची के गुजर जाने बाद मेरे दोस्त से बन गए थे। कई बार साथ सिगरेट भी पी। आज मैं सोचता हूँ कि कैसे लोग थे वे! सेक्स को परंपरा की तरह जिया, बच्चे पैदा किया, वो भी खुलकर प्रेम के इजहार के बिना! सच पूछिए तो ऐसे लोग ‘हस्तमैथुन’ से ज्यादा ज़िन्दगी ज़ी नहीं पाए। ‘बिना प्रेम का सेक्स’!!!

    लेकिन आज के जीन्स-टाप्स पहने, खुद को आधुनिक कहते लड़के-लड़कियों की भी हालत उनसे बहुत अलग नहीं है। ऐसे ढेर सारे लड़के-लड़कियों को मैंने अपनी ज़िंदगी में देखा, जो प्रेम को सेक्स से अलग करके ज़िन्दगी जीते रहे। प्रेम को ‘पवित्र’ कहते रहे और सेक्स को ‘गंदा’ मानते रहे। हाथों में गुलाब थामे, वेलेंटाइन डे मनाते ये लोग ‘सेक्स’ को टैबू बना लिए। अरे, ‘बिना सेक्स सिर्फ प्रेम’ महज ‘योगा’ ही है, उससे ज्यादा कुछ नहीं, और ये योगी आज भी कॉलेज, रेस्टोरेंट्स, पार्क, मॉल में योग करते घूम रहे हैं।

    इन सबसे बहुत आधुनिक तो अपने ‘शिव’ हैं, जिन्हें ‘अर्धनारीश्वर’ कहा जाता है। अर्धनारीश्वर का मतलब उस ‘परममिलन’ से है, जिसमें आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी/प्रेमिका का अहसास ग्रहण कर लेता है और आपकी पत्नी/प्रेमिका का व्यक्तित्व आपके अहसास को जीने लगता है। दोनों के भीतर जो रस और लीनता पैदा होती है, वही तो जीवन का चरम आनंद है, वही तो हमारे-आपके अस्तित्व का मूल है।

    और इसी सच का मूर्त रूप है ‘शिवलिंग’! अगर पुजारीवाद/पंडा-धंधावाद से मुक्त होकर सोचें तो ‘शिवलिंग’ से ज्यादा रियल कोई ‘प्रतिमा’ नहीं। पदार्थ और चेतना का सूत्र!!!

  • जब मै कहूँगा, प्रेम !

    जब मै कहूँगा, प्रेम !

    Kashyap Kishor Mishra

    जब मै कहूँगा, प्रेम !
    वो लाड़ होगा माँ का |
    स्नेह की गुनगुन से फदकता
    बोरसी में औटाये दूध सा सौंधा|

    बहन का नेह होगा,
    सुबह बम्बे का नरम जल
    ओस से भीगा कमल
    मृदु और कोमल |

    होगा वह नदिया का जल
    उज्जवल छलछल निर्मल |

    सुबह की धूप होगा,
    जिसकी नरम सेंक, मोहक |

    प्रेम !
    माँ की मालिश है,
    है भईया का दुलार|

    नाजुक, सुलगते कंडे से निकाली
    घी टपकाई मुलायम लिट्टी के साथ
    हिंग-जीरा का दाल में, अलग से बघार|

    Kashyap Kishor Mishra

    किसी डगर पर सावधान करती,
    एक अनजान काका की गोहार है, प्रेम |
    तो कभी, साहून काकी का दिया
    घलुआ अचार है, प्रेम |
    प्रेम, मंदिर में रहती
    परित्यक्त जलपा दादी
    का वो आशीष है,
    जो वो गावँ के हर बच्चे को देती है,
    अपने नाती-पोते सोचती है|

    भरी दुपहरी में मनुआ का
    टीप कर तोड़ा मीठा आम
    बारहा मिलता रहा,
    प्रेम के नाम |

    प्रेम,
    दादी की मनुहार होगा
    डांट फटकार होगा |
    और फिर धीरे से
    दी गई, आखिरी चवन्नी होगा |

    यूँ ही प्रेम कहते समझते,
    आखीर में तुमतक आऊंगा
    तुमसे पूछूँगा, प्रेम?
    और तुम कहोगी,
    धत, पागल!
    प्रेम बस किया जाता है।

  • प्रेम – असहमति

    प्रेम – असहमति

    Mukesh Kumar Sinha

    असहमतियां
    नही होती
    हर समय
    सहमति का विपरीत

    असहमति
    कई बार
    बस ये जताने के लिए भी
    होती है
    कि समझ पाए अहमियत ।

    विरोध
    वक़्त बेवक्त
    किया जाता है
    सबसे अपनों का

    विरोध
    में छिपा होता है
    सुझाव
    कि समझा करो
    या, ऐसे तो समझोगे न !

    प्रेम
    में भी कई बार
    करना पड़ता है
    ‘न’ का सामना

    प्रेम
    का उत्सव सरीखा
    किस डे/ हग डे
    में असहमतियां
    झिझक भी हो सकती है
    जो, प्रेम का विरोध तो नहीं

    प्रेम
    में बहते हुए
    प्रोमिस डे के दिन कहना
    कि प्रोमिस करो
    प्रेम करते रहोगे न
    शायद उम्मीदों का गुलाब ही तो है

    Mukesh Kumar Sinha

    प्रेम
    कितना चॉकलेटी होता है न
    तभी तो
    चुप्पियां सहमति समझी जाती है
    फिर भी चिल्ल्ला कर
    जताना चाहते हैं प्रेम

    प्रेम सिक्त नजरें
    मौन हो कर भी
    बता देती है
    हवाओं में गुलाबी सुगंध है ।

    असहमति
    भी प्रेम ही है
    समझे न
    माय वेलेंटाइन !!

  • मासूम बूंदों की फुहार

    मासूम बूंदों की फुहार

    Mukesh Kumar Sinha

    खिलखिलाहट से परे
    रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान,
    उदासियों में जब ओस की बूंदों से
    छलक जाते हों आंसू
    तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
    ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना
    कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की!

    खिलखिलाते हुए जब भी तुमने कहा
    मेरी पहचान तुम से है बाबू
    मैंने बस उस समय तुम्हारे
    टूटे हुए दांतों के परे देखा
    दूर तक गुलाबी गुफाओं सा रास्ता
    ये सोचते हुए कि
    कहीं अन्दर धड़कता दिल भी तो होगा ना
    मेरे लिए

    खिलखिलाहट और मेरी खीज
    अन्योनाश्रय संबंधो में बंधा प्रेम ही तो था
    जिस वजह से
    झूलती चोटियों के साथ तुम्हारी मुस्कुराती, गाती आँखें
    और चौड़ा चमकता माथा
    चमकीली किरणों सा आसमान एक
    जो फैलकर
    बताता सूर्योदय के साथ
    कि पकी बालियों सी फसल बस कटने वाली है

    सुनो मेरी खीज से परे
    बस तुम खिलखिलाना
    सौगंध है तुम्हें
    ताकि बस तुम हो तो लगे ऐसा कि
    मेरे आसमान में भी उगती है धनक,
    कभी न कभी
    बारिश के बाद निकलती है एक टुकड़ा धूप
    और खिलती है फ़िज़ा
    मेरे लिए

                 Mukesh Kumar Sinha

    सुनो कि बार बार हूँ कह रहा
    खूब खिलखिलाती रहना
    महसूस करना
    मेरे साथ बह रही एक नदी
    मचलती, बिफरती, डूबती, उतराती
    जीवंत खिलखिलाती नदी
    बेशक मुझपर पड़ती रहे
    मासूम बूंदों की फुहार …

    समझे ना !!

  • प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    Vidya Bhushan Rawat

    कल अंकित सक्सेना के पिता को टी वी पर देखा जहा एंकर महाशय उनको प्रणाम कर रहे थे लेकिन गुस्सा हो गए के केजरीवाल ने मुसलमानों को तो मौत पर अधिक पैसा दिया और हिन्दुओ के नहीं. सर्व प्रथम बात ये के अंकित को मार डाला गया और ये एक अपराध है और कानून के अनुसार अपराधियों के साथ जो होना चाहिए वो होने चाहिए. पुलिस ईमानदारी से काम करे और चार्ज शीट दाखिल करे ताकि न्याय हो सके.

    अंकित सक्सेना की मौत पर साप्रदायिक राजनीती की कोशिशे हो रही है और एंगल निकालने की कोशिशे भी जारी है. अभी तक नहीं मिल पाया है लेकिन बना दिया जाएगा क्योंकि चैनल इसी लिए है के अगर संप्रदायीकरण का मटेरियल नहीं मिल रहा तो उसे तैयार कर दिया जाना चाहिए.

    कुछ दिनों पूर्व मुझसे ये पुछा गया गया था के अंकित सक्सेना के पिता ने बहुत संयम से काम लिया है और उसकी सराहना की जानी चाहिए. मैं तो ये कहता हो को ऐसे मौके पर मीडिया को माँ बाप के मुंह में माइक लगाने के बजाये निष्पक्ष रिपोर्टिंग करनी चाहिए. हमें ये पता होना चाहिए के जिस किसी के घर में कोई असामयिक मौत होगी तो उसके घर वाले बहुत बिरले ही होंगे जो इमोशनल न हो और इन हालातो में वे अगर कुछ कह भी दे तो बहुत आश्चयर्य नहीं होना चाहिए.

    Vidya Bhushan Rawat

    अंतर जातीय या अंतर्धार्मिक रिश्तो में बहुत आवश्यक है के कुछ बाते समझी जाए. हम इन्हें लोकतान्त्रिक रिश्ते भी कह सकते है और ये तभी कामयाब हो पाएंगे जब हम एक दूसरे के ऊपर अपनी धार्मिक और भाषाई श्रेष्ठता न लादे. ये रिश्ते इसलिए मज़बूत होते है क्योंकि आप धर्म और जाति की सीमाओं को लांघकर इसे बनाते है इसलिए आप ये नए विचार की नीव रख रहे है जो संगठित धर्मो और जातियों से निकलकर बनता है जहा इंसान की श्रेष्ठता होती है, उसकी आज़ादी का सम्मान है और थोडा जगह विचारभिन्नता के लिए भी बची रहती है. कोई भी प्रेम सम्बन्ध तब तक नहीं चल सकता जब तक उसमे स्वतंत्रता को गुंजाइश न हो और कोई भी सम्बन्ध अनंत काल तक चलता रहे इसकी सम्भावना भी नहीं होती इसलिए संबंधो के बन्ने और बिगड़ने में जो कडुवाहट आती है उसका कारण यही है के हम कही लुटा हुआ महसूस करते है. कोई कहता है प्यार में डूब जाना चाहिए, लेकिन मुझे लगता है किसी को डूबने की जरुरत नहीं. अपने होश हवाश में रहिये और एक दूसरे की स्वयत्तता का सम्मान करेंगे तो अलग होने में कोई कडुवाहट नहीं होगी.

    जो लोग इसे लव् जिहाद का नाम दे रहे है वही लोग खाप पंचायतो के जातिगत फैसलों को संस्कृति और परंपरा के नाम पर सही ठहराते है. हकीकत ये है के प्रेम करना हमारे समाज में अपराध है और इसलिए प्रेम के अभाव में हमारा समाज हिंसक बन चूका है. ये हिंसा क्रूरता और बर्बरता में बदल चुकी है क्योंकि ये प्यार नहीं, ये प्यार में औरत को एक वस्तू समझ रहा है और जिस समाज की महिला प्यार में दूसरी और जाती है वह अपने को लुटा हुआ महसूस करता है. इसलिए अंकित के प्यार में उसकी प्रेमिका के माँ बाप की उनकी इज्जत खतरे में दिखाई दी. हम सब जानते है के प्रेम विवाह कितने मुश्किल है खासकर जब लड़का और लड़की दोनों का आर्थिक रुतबा बहुत बड़ा नहीं होता और वे दो स्वतंत्र व्यक्ति नहीं बन पाते और उनको अपने परिवार की मदद की लगातार जरुरत होती है. दो सफल व्यक्ति अपने समाज से दूर रहकर अपने रस्ते पर चल सकते है लेकिन जहाँ व्यक्ति समाज के रीति रिवाजो के अनुसार चलेंगे तो वे तो प्यार के रस्ते में रोड़ा अटकाएंगे ही.

    भारत में शादी की पवित्रता का सिद्धांत जाति से जुड़ा हुआ है और प्रेम विवाह जाति की सर्वोच्चता और शुद्धता के सिद्धांतो में सबसे बड़ी बाधा है. जैसे जैसे लोग जाति धर्म के बन्धनों से ऊपर उठकर निकलेंगे तो इनके नाम पर चलने वाली घृणा और नफ़रत की दुकानों के बंद होने की संभावनाए भी बढ़ जाएँगी. देश के युवा की उर्जा समाज निर्माण में लगनी चाहिए न के जाति धर्म की अँधेरी दीवारों को मज़बूत करने में. शायद धर्म के धंधेबाजो को इस बात का पता है के प्रेम की ताकत के अच्छे से अच्छे तानाशाह और राजा महाराजा भी हार गए.

    अंकित के दोस्तों ने एक विडियो बनाया और कहा के प्रेम किसी सेस भी हो सकता है. प्रेम कोई योजना बनाकर नहीं होता. योजना से तो दंगे करवाए जाते है या किसी की जासूसी करवाई जाति है और प्रेमी जोड़ो का क़त्ल और वो सब वो लोग करते है जिनकी जिंदगी से प्रेम गायब है. जिनकी जिंदगी में प्रेम है वो तो बस प्रेम की गंगा बहाते रहेंगे. अंकित की दोस्त शह्जादी ने लगातार ये बात कही के उसके माँ बाप गुनाहगार है. प्यार करने वालो को मजबूती से अपने विचारों पर खडा होना होगा क्योंकि प्यार भी एक विचारधारा है वैसे ही जैसे घृणा और नफरत भी एक नकारात्मक विचार है जो जातीय और धार्मिक सर्वोच्चता के अहंकार से पनपती है. इसलिए प्यार के विचार की जीत के लिए हमें कौशल्या जैसी प्रेमिकाओं की और देखना होगा जिसने जातिगत अहंकार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखी है और अपने पति शंकर के हत्यारों को जेल के सीखचों तक पंहुचाने के लिए अपने जद्दो जहद जारी रखी है. कौशल्या का मामला भी भी अंकित जैसा है वो तथाकथित ऊँची जाति से आती थी जिसका शंकर से प्रेम हो गया जो दलित था और ये बात कौशल्या के माँ बाप को पसंद नहीं थी और एक दिन कोयम्बतूर के बिजी चौराहे में शंकर की बेरहमी से हत्या कर दी गयी बिलकुल उसी तरह जैसे हम अंकित की हत्या देख रहे हैं. सड़क चलते लोग अपने काम में लगे रहे, कोइ विडियो बनाता रहा और कोई चुप देखता रहा लेकिन भीड़ निर्दोष को बचा नहीं पायी. शहजादी को कौशल्या से सीखना होगा और हत्यारों को जेल तक पहुचना होगा, अपने लिए न्याय की लड़ाई लडनी होगी और घृणा फ़ैलाने वाली मानसिकता से लड़ना होगा.

    भारत के भविष्य के लिए जरुरी है के जातियों का समूल विनाश नो क्योंकि ये देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है. ये जातीय फर्जी गौरवो के सिद्धांत पर चल रही है. अभी इलाहाबाद में दलित छात्र दिलीप सरोज की नृशंश हत्या केवल इसलिए कर दी गयी के उसका पैर किसी दबंग सवर्ण से टकरा गया. जाति के आधार पर भारत में विभाजन साफ़ दिखाई दे रहा है और पचासों उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर या बड़ी बड़ी फौजे बनाकर और हथियार बेचकर भी देश कभी मज़बूत नहीं बन सकता जब तक जाति के किले बचे रहेंगे. रोहित वेमुला से लेकर दिलीप सरोज तक सैंकड़ो छात्रो और युवाओं की बलि चढ़ चुकी है केवल इसलिए क्योंकि आपको अपनी जातीय सर्वोच्चता बनाये रखनी है. देश के बहुजन समाज को अशक्त करके कभी देश आगे नहीं बढ़ सकता. हिंसा हमारे समाज का एक नया नॉर्म बन चुकी है जो किसी भी समाज को मंदबुद्धि बनाएगी और हिंसा का प्रतिकार केवल हिंसा से करने को उत्प्रेरित करेगी.

    आज देश के युवाओं को देखना है के वे प्रेम की दुनिया को आगे बढ़ाना चाहते है या जातियों के दमघोटू ढांचे में कैद रहना चाहेगे. प्रेम में बहुत बड़ी ताकत है उन सारे पूर्वाग्रहों को तोड़ने की जिन्हें जाति की ढांचों ने बनाये है. आजदी के ७० वर्षो के बाद भी आज हम उन्ही पुराथान्पंथी जकडन में फंसे है तो कही न कही विचारात्मक द्वन्द है. जाति के नाम पर दूकान चलाने वालो और अपनी प्रभुत्व बनाये रखने वालो की साजिश को केवल युवा तभी तोड़ पायेंगे जब विवाह जैसी संस्था का लोकतान्त्रिककरण हो और वो तभी संभव होगा जब चाहत पर किसी का पहरा न हो. जिस दिन भारत में समाज का लोकतंत्रीकरण हो गया जैसा बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे, उसी दिन भारत दुनिया का सबसे मज़बूत लोकतंत्र होगा और सबसे बड़ा देश भी. समाज में लोकतंत्र के अभाव में हम अपनी ही औलादों को इज्जत के नाम पर मारते रहेंगे और तमाशा देखते रहेंगे. अभी भी समय है, चेतने का, समाज के नव निर्माण का और देश को बचाने का. जातियों के जाल में जकड़ा देश कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा और केवल घृणा और नफ़रत के ब्यापारियो के नियंत्रण में रहेगा. जातियों का उन्मूलन तभी हो पायेगा जब हमारे युवाओं को अपना साथी चुनने की स्वतंत्रता होगी नहीं तो उदंडता और जबरदस्ती ही हमारे समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखेंगे और कानून का पालन करने वाले केवल देखते रहेंगे क्योंकि संविधान केवल बहस करने का एक दस्तावेज होगा, हमारे जीवन मूल्यों को निर्धारित करने का नहीं. ये अंतर्द्वंद अंतत उन ताकतों को मज़बूत बना रहा है जो चाहते ही नहीं के समाज लोकतान्त्रिक हो क्योंकि इस प्रक्रिया में उनकी बहुत से जातीय विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे लेकिन बदले में सबको जो मिलेगा वो अप्रतिम होगा, एक लोकतान्त्रिक समाज ही देश को मज़बूत और एकजुट रख पायेगा जिसके लिए हमें बड़ी तोपों और टैंको की जरुरत नहीं होगी.

  • संबंधों में उक्ताहट

    संबंधों में उक्ताहट

    Pratima Jaiswal[divider style=’right’]

    कड़ाके की ठंड में घर में एक ही छोटा-सा पलंग था. वो रात में बीच-बीच में उठकर देखता रहता था कि कहीं उसे पैर तो नहीं लग रहा है, कहीं उसकी चादर तो नीचे नहीं गिर गई है. वो खुद ये बातें जब बताती थी, तो लगता था कि कितना प्यार करता है इसका पति. लेकिन उस वक्त मुझे झटका लगा जब मैंने उसे किसी दूसरे लड़के के साथ मेट्रो स्टेशन पर दूसरे अंदाज में देखा. लड़के के जाने के बाद मैंने उससे धोखे की वजह पूछी तो बोली ‘मुझे उसके प्यार में पिता वाली फीलिंग आती है, फैंटेसी चाहिए मुझे, जो उसे देखकर नहीं आती.’

    ये बेतुकी बात सुनकर मैंने उसे कोई ज्ञान नहीं दिया और अपना रास्ता नापने में ही भलाई समझी. अपने आसपास कई बार ऐसी कहानियां देखती हूं जिन्हें देखकर लगता है कि समाज, परिवार तो प्रेम के दुश्मन बाद में हैं. पहले तो ये लोग प्रेम के सबसे बड़े दुश्मन हैं.

    एक और दोस्त है, जिन महाशय ने अपनी प्रेमिका को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वो मां की तरह उसका ख्याल रखती है. हमेशा उससे प्रेम के इजहार का कोई मौका नहीं छोड़ती. उनके मुताबिक वो वैसी अट्रैक्टिव लड़की नहीं है, जैसी उसे चाहिए थी. उसका मन और नजरें इसलिए काबू नहीं रह पाती. प्रेमिका वैसी हो, जिसके सामने आते ही सारी दुनिया को भूलकर उसके साथ दिन बिताने का मन करने लगे.

    उसकी बातें सुनकर ऐसा लगा जैसे किसी टीनएजर से बात कर रही हूं. जबकि उसकी उम्र 30 साल के आसपास है. कभी हमें लगता था कि मन का भटकाव और नायक-नायिका पूजा, फैंटेसी दुनिया एक उम्र का पड़ाव है. एक उम्र बाद प्रेम की गंभीरता समझ आने लगेगी.

    लेकिन मैंने तो ऐसे लोगों को भी देखा है जो सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं और दुनिया भर को ज्ञान देते हैं, लेकिन खुद कई लड़कियों को एक-साथ शादी के भ्रम में रखे हुए हैं. शादी अपने प्रेम से नहीं बल्कि अपने भविष्य से करेंगे. जिसके साथ पैसों की तंगहाली वगैरह जैसी दिक्कतें नहीं आए. लाभ-हानि के बही खाते को खोलकर अपने लिए आदर्श प्रेम चुनते हैं. कोई प्रेम से इतना ऊब चुका है कि जीवनसाथी के प्रेम की न ही परवाह है न ही उसकी मौजूदगी का महत्व. https://karensingermd.com/ उन्हें बस अटेंशन चाहिए. उनके लिए किसी एक को छोड़कर सब महत्व रखते हैं. उन्हें कोई एक नहीं सब चाहिए.

    वहीं कुछ लोग ऐसे हैं, जो भूतकाल में जी रहे हैं, जबकि जीवन में नए प्यार को स्वीकार कर चुके हैं फिर भी उन प्रेम कहानियों में जी रहे हैं, जिसके किरदारों ने उन्हें कभी महत्व नहीं दिया. नया प्यार क्योंकि मिल चुका है इसलिए खोने का कोई डर नहीं है. कई जोड़े ऐसे भी हैं, जिनमें एक प्रेम में डूबा और तो दूसरा प्रेम से ऊबा हुआ है. जिंदगी में परेशानियां किसे नहीं आती लेकिन उनके लिए प्रेम भटकाव है और सारी परेशानियों का मूल प्रेम या उनका पार्टनर ही है. ऐसा कुछ वक्त बाद महसूस करने लगते हैं.

    Pratima Jaiswal

    कुछ प्रेम कहानियों में किसी तीसरे को एंट्री दे दी जाती है. कहने को दोस्त है खास है लेकिन हर पल किसी दूसरे का हक मारे बैठा है. दो के बीच में कोई तीसरा आ जाए, तो दो रह सकते हैं क्या? ऐसे लोग खुद अपना घर तोड़ते हैं. इतिहास के पन्ने पलट लीजिए.

    कुल मिलाकर समाज, परिवार से लड़ना तो बाद में है, पहले खुद साथ रहना और दोनों तरफ से प्रेम बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है. आधुनिकता का एक घाटा ये भी है कि लोग प्रेम से ऊबने लगे हैं. उसपर भी अगर किसी में प्रेम बचा भी है, तो साथी की बेरूखी, अनदेखापन उसे भी प्रेम से एक दिन ऊबा देगा. धीरे-धीरे सब खत्म हो जाएगा. प्रेम कहानियां और किरदार हर रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं.

    इन सब बातों से अलग अगर आपके पास कोई ऐसा साथी, ऐसा प्यार है, जिसके लिए आप दुनिया में सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं. आपको देखते ही सारी थकान, परेशानियां भूलकर चेहरे पर मुस्कुराहट आ  जाती है या आपको स्पेशल फील कराने या मुस्कुराने के मौके तलाशता रहता है, तो उसके महत्व को समझिए. जाने मत दीजिए संभालकर रखिए उसे. आप सच में खुशकिस्मत है. प्यार है तो प्रेम बना रहना चाहिए और अगर नहीं है तो किसी कहानी के किरदार मत बनिए, न कभी किसी के प्रेम का तिरस्कार कीजिए और न कभी खुद को तिरस्कृत होने दीजिए.

    बाकी आपका नजरिया है.