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  • सूदखोरी व छेड़खानी के खिलाफ सड़क पर उतरीं महिलाएं : रैली निकालकर मनचलो व सूदखोरों पर कठोर कार्यवाही की किया मांग

    सूदखोरी व छेड़खानी के खिलाफ सड़क पर उतरीं महिलाएं : रैली निकालकर मनचलो व सूदखोरों पर कठोर कार्यवाही की किया मांग

    Nandlal Master

    रोहनिया, राजातालाब स्थित डाक बंगला पर गुरूवार को दोपहर 12 बजे मनचलो और सूदखोरों के खिलाफ कठोर कार्यवाही की माँग को लेकर गुरुवार को हजारों महिलाएं सड़क पर उतरी। लोक समिति द्वारा आयोजित धरना प्रदर्शन कार्यक्रम में छेड़खानी,सूदखोरी महिला हिंसा के खिलाफ आराजी लाइन और सेवापुरी ब्लाक के दर्जनों गाँव से आयी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने ढोल नगाड़ों के साथ जोरदार रैली राजातालाब बाजार से तहसील तक निकाली तख्ती बैनर लिए महिलाएं नारा लगा रही थी। सूदखोरों के खिलाफ कार्यवाही करो, महिला हिंसा बंद करो, छेड़खानी पर रोक लगाओ, शराब बेचना बंद करो, आदि कई प्रकार के स्लोगन लिखे तख्ती के साथ पूरे राजातालाब बाजार का भ्रमण किया। इस दौरान जी टी रोड पर अफरातफरी का माहौल बन गया सड़क के दोनों किनारो गाड़ियों की लंबी लाइन लग गयी और घंटो जाम की स्थिति बन गयी।

    रैली ब्लॉक मुख्यालय से होते हुए राजातालाब तहसील पर पहुँचा मुख्य गेट पर महिलाओं ने जोरदार प्रदर्शन किया।  तहसील पहुँचते ही लोगों ने छेड़खानी करने वालो व सूदखोरों के खिलाफ नारे लगाए और उपजिलाधिकारी ईसा दुहन को दस सुत्रीय ज्ञापन के माध्यम से कार्यवाही की मांग किया। रैली के उपरान्त सिंचाई डाक बंगला में महिला हिंसा के खिलाफ महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया । कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि लोक चेतना समिति की निदेशिका रंजू सिंह तथा विशिष्ट अतिथि तनुजा मिश्रा तथा लोक समिति के संयोजक नन्दलाल मास्टर ने दीप जलाकर किया। इस अवसर पर आयोजित सभा में महिलाओं ने महिला हिंसा को जड़ से मिटाने का संकल्प लिया। महिला चेतना समिति कि निदेशिका रंजू सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन बलिया जिला में जजौली गाँव में सूदखोरों ने दलित महिला को जिन्दा जलाकर मार डाला लेकिन दोषियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नही हुआ यह केवल एक घटना नही है बल्कि हर गाँव में सूदखोरों और फर्जी फाइनेंस कम्पनियों के जाल में बहुत से गरीब परिवार तबाह हो रहा है इनके खिलाफ सख्त से शख्त कार्यवाही किया जाना चाहिए। गरीब महिलाओ को उनके चंगुल से अविलम्व मुक्त कराया जाय समाजिक कार्यकर्ती तनुजा मिश्रा ने कहा कि महिलाओं और लड़कियों के साथ आये दिन छेड़खानी और बलात्कार की घटनाएँ हो रही है।नतीजन पनियरा गाँव की बेटी को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा ।इसलिए हमे अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं अपनी हाथ में लेनी होगी। मुहीम संस्था की स्वाती सिंह ने कहा कि गाँव ज्यादातर लोग शराब में डूब चुके है ।और इसका खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है महिलाओं के उपर होने वाली घरेलूहिंसा,उत्पीड़न,बलात्कार,मारपीट,आदि का सबसे बड़ा जिम्मेदार शराब है। शराब को पूरे प्रदेश में बिहार की भांति बंद करने की मांग की।

    सभा के अंत में महिलाओं ने तय किया कि गांव गाँव में सूदखोरों और मनचलों के खिलाफ महिला दस्ता बनाकर अभियान चलाया जायेगा। धरने में मुख्य रूप से रंजू सिंह,तनुजा मिश्रा, विनीता सिंह, अनीता सरिता सोनी, आशा, मधुबाला, शमबानो, प्रेमा, चन्द्रकला, आशा, ममता, मैनम, कुसुम पूजा, सितारा सुमन, प्रीति, नीतू, सुषमा, नन्दलाल मास्टर, अमित, श्यामसुन्दर, विजय, रामबचन, सुनील आदि लोग शामिल रहे। धरने का नेतृत्व अनीता पटेल, संचालन सोनी, अध्यक्षता सरिता और धन्यवाद ज्ञापन आशा ने किया।


    Nandlal Master

  • आईआईटी कोचिंग पिछले जन्म से –आलोक पुराणिक

    आईआईटी कोचिंग पिछले जन्म से –आलोक पुराणिक

    Alok Puranik

    आईआईटी उर्फ इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलोजी के एंट्रेस एक्जाम की कोचिंग का लगातार पतन हो रहा है, पहले बच्चे दसवीं क्लास के बाद आईआईटी की तैयारी करते थे। अब मामला दसवीं क्लास से और गिर गया है, पांचवी क्लास के बाद ही बच्चे को आईआईटी एक्जाम की कोचिंग में लेफ्ट-राइट करा दिया जाता है।

    आईआईटी कोचिंग का और पतन हुआ, तो मामला गिरकर नर्सरी क्लास तक आ जायेगा। बच्चा नर्सरी में पढ़ने के बाद नाक पोंछता, लालीपौप खाता हुआ आईआईटी कोचिंग के लिए जायेगा।

    आईआईटी कोचिंग का और ज्यादा पतन हुआ, तो वह सीन सोचकर ही मुझे डर लगने लगता है-नवजात शिशु का डाइपर बदलते हुए उसकी मां उसे धमकायेगी-बेबी,आज तुमने आईआईटी एक्जाम की तैयारी नहीं की।

    इस मुल्क में आईआईटी जितनी जगह दिखता है, उससे बहुत ज्यादा है आईआईटी।

    आईआईटी में जाना जीवन का महती नहीं, एकमात्र उद्देश्य है। कुछेक आईआईटी फोकस्ड पेरेंट्स को मैं जानता हूं जो नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह को सिर्फ एक कारण से रिजेक्ट करते हैं कि उनके जीवन में आईआईटी का कहीं कनेक्शन नहीं है।

    Alok Puranik

    आईआईटी कोचिंग से त्रस्त एक बच्चे ने मुझे महाभारत के अभिमन्यु की अलग कथा सुनायी, उसने बताया-अर्जुन अपने पुत्र अभिमन्यु को गर्भ में ही आईआईटी की तैयारी करवा रहे थे। अंदर अभिमन्यु बोर हो गया। बाहर आकर उसने जब आईआईटी का एंट्रेस एक्जाम दिया, तो फेल हो गया और शर्म से मर गया।

    मुझे लगता है कि बहुत जल्दी आईआईटी-फ्रेंडली रेस्टोरेंट, बस, आटो बनेंगे, बच्चा सफर करते में , रेस्त्रां में खाने खाते में आईआईटी के एंट्रेस एक्जाम के फार्मूले, समीकरण देखेगा।

    जल्दी हो सकता है कि ऊपर बच्चे एसोसियेशन बनाकर भगवान से डिमांड करें-कहीं भी भेज दो, युगांडा, इथियोपिया, यहां तक पाकिस्तान तक में, पर इंडिया में ना भेजना, नीचे जाते ही पेरेंट्स पिल पड़ेंगे कि लग बेटा आईआईटी की तैयारी में।

    कोई बच्चा भगवान से कहेगा-सर मेरे मां-बाप तो चाहते थे कि मैं पिछले जन्म से ही आईआईटी की तैयारी करके आऊं। मेरे पैदा होते ही मेरे इंजीनियर बाप ने मुझसे भूकंप-रोधी बिल्डिंग का स्ट्रक्चरल डिजाइन पूछ लिया। मैं सदमे में ढेर हो गया। प्लीज इंडिया मत भेजो, आपको मेरी जिंदगी की कसम।

    उफ्फ आईआईटी कोचिंग।

  • विटामिनों, उपचार आदि के नाम पर ठगी

    विटामिनों, उपचार आदि के नाम पर ठगी

    Skand Shukla

    इंटरनेट पर आजकल झोलाछपई चल रही है। उसे अँगरेज़ी में परोसा जा रहा है। लोग फँस रहे हैं। उन्हें अँगरेज़ी में कहा गया कुछ भी अर्थपूर्ण लगता है।

    कैंसर से वे बहुत डरते हैं। इसलिए अँगरेज़ी देवी की शरण में जाते हैं। यह ग़लत इष्ट की उपासना का मूर्खतापूर्ण उद्यम है। कैंसर से लड़ने के लिए इष्ट विज्ञान है। विज्ञान के मूल में तर्क की सोच है। तर्क के लिए अफवाहों को जाँचना ज़रूरी है। कौवे जिनके कान ले जाते हैं , वे हिंसक वनैले जानवरों से न लड़े हैं , न लड़ पाएँगे।

    आपको मुझे कुछ बेचना है तो मैं उसे विटामिन कह दूँगा। और फिर यह जोड़ दूँगा कि इससे कैंसर ठीक होता है। एक साल में मैं आपको टोपी पहनाकर अरबपति हो जाऊँगा।

    एमिग्डालिन आज-कल चर्चा में है। नाम नहीं सुना आपने ? जी , बिलकुल न सुना होगा। सच्चे नाम नीरस होते हैं और क्लिष्ट भी। आपके कानों को मुलायम झूठों की आदत जो है। इसी को आजकल बी 17 विटामिन बताकर इंटरनेट पर धुआँधार प्रचारित किया जा रहा है। और दावे किये जा रहे हैं कि इससे कैंसर ठीक हो जाता है।

    एमिग्डालिन की कहानी आज से नहीं चल रही ; यह 1950 से प्रचलन में है। इससे कोई कैंसर-वैंसर ठीक नहीं होता। बल्कि इसमें वह सायनाइड पाया जाता है , जिसके बारे में आपने सुन रखा होगा। हाँ , यह इतना ज़हरीला नहीं कि इसे चखने भर से आपका दम निकल जाए : लेकिन इसे महीनों खाने से सायनाइड की विषाक्तता आपको निश्चय ही हो सकती है।

    सेबों , खुमानियों और आडुओं के बीजों में भी एमिग्डालिन पाया जाता है। आप कहेंगे कि फिर हम सेब का बीज खाकर मरते क्यों नहीं। सायनाइड भी अनेक तत्त्वों से जुड़ा रहता है और हर बार वह इस तरह नहीं मौजूद होता कि लिट्टे वालों की तरह आपने जीभ पर सेब का बीज धरा और प्राण निकले। हाँ , फिर वही बात कि लगातार महीनों-सालों सेब के बीज-ही-बीज खाने पर यह सायनाइड आप पर अपना ज़हरीला असर ज़रूर दिखाएगा।

    एमिग्डालिन के कैंसर-उपचार पर ख़ूब काम हो चुका। अमेरिका-यूरोप में शोधपत्र छपे , कुछ सकारात्मक नहीं निकला। उलटा इसमें सायनाइड होने के कारण पश्चिम के बहुत से देशों में इसे प्रतिबन्धित कर दिया गया।

    Skand Shukla

    भोलापन , मूर्खता और मूढ़ता एक ही स्पेक्ट्रम पर पायी जाने वाली तीन मनोदशाएँ हैं। भोले पर आप स्नेह बरसाते हैं क्योंकि उसमें बचपन दिखता है। मूर्खता पर चिढ़न के साथ हँसते हैं। मूढ़ता पर आपकी आँखें चढ़ जाती हैं क्योंकि वह आपकी सही बात पर भी कुतर्क करता है।

    लेकिन आप भारतवासी भोलू हैं। विटामिन , हर्बल और कैंसर तीनों एक जगह जमा करके मैं आपको उल्लू बनाना जानता हूँ। अरे अभी आप हिन्दू-मुसलमान से ऊपर नहीं उठ पाये , एमिग्डालिन और सायनाइड तक क्या ख़ाक पहुँचेंगे ! मैं आपकी जेब काटता रहूँगा , मुनाफ़ा बनाता रहूँगा। मुझे बाज़ार का रुख़ पता है , आप केवल धर्म-धर्म जपिए और जेबें ढीली करिए।

    सुकरात होना सहज-सुलभ नहीं। उन्होंने अज्ञान को ही विकार माना। अज्ञान ही बुरा है। और कुछ बुरा है ही नहीं। और अगर आप सुकरात से भी ऊपर उठ पाएँगे तो सम्भवतः आपको बहुत सी मूर्खताएँ और मूढ़ताएँ भोलापन बनती जान पड़ें।

    सबसे बड़ा ईश्वर पैसा है संसार में। यह सच मैं बाज़ार का लुटेरा उद्योगपति जानता हूँ। आप अपने ईश्वरों को लिए मर-खपिए। मैंने आपकी जेबों में सुराख बना दिये हैं।

  • जब नेहरू ने फ़िराक़ से पूछा- ‘अब भी नाराज़ हो..’

    जब नेहरू ने फ़िराक़ से पूछा- ‘अब भी नाराज़ हो..’

    Anil Janvijay


    किस्सा मुम्बई का है। वहाँ फ़िराक़ के कई दोस्त थे। उनमें से एक थीं मशहूर अभिनेत्री नादिरा। उस दिन फ़िराक़ सुबह से ही शराब पीने लगे थे और थोड़ी देर में उनकी ज़ुबान खुरदरी हो चली थी। उनके मुँह से जो शब्द निकल रहे थे वो नादिरा को परेशान करने लगे थे। जब वो फ़िराक़ के इस मूड को हैण्डिल नहीं कर पाईं तो उन्होंने इस्मत चुग़ताई को मदद के लिए फ़ोन किया।
    जैसे ही इस्मत नादिरा के फ़्लैट में घुसीं, फ़िराक़ की आँखों में चमक आ गई और बैठते ही वो उर्दू साहित्य की बारीकियों पर चर्चा करने लगे। नादिरा ने थोड़ी देर तक उनकी तरफ़ देखा और फिर बोलीं, “फ़िराक़ साहब आपकी गालियाँ क्या सिर्फ़ मेरे लिए थीं?”
    फ़िराक़ ने जवाब दिया, “अब तुम्हें मालूम हो चुका होगा कि गालियों को कविता में किस तरह बदला जाता है.” इस्मत ने बाद में अपनी आत्मकथा में लिखा, ‘ऐसा नहीं था कि नादिरा में बौद्धिक बहस करने की क्षमता नहीं थी. वो असल में जल्दी नर्वस हो गईं थीं.’ फ़िराक़ की शख़्सियत में इतनी पर्तें थी, इतने आयाम थे, इतना विरोधाभास था और इतनी जटिलता थी कि वो हमेशा से अध्येताओं के लिए एक पहेली बन कर रहे हैं. फ़िराक़ बोहेमियन थे… आदि विद्रोही, धारा के विरुद्ध तैरने वाले बाग़ी. अदा अदा में अनोखापन, देखने-बैठने-उठने-चलने और अलग अंदाज़े-गुफ़्तगू, बेतहाशा गुस्सा, अपार करुणा, शर्मनाक कंजूसी और बरबाद कर देने वाली दरियादिली, फ़कीरी और शाहाना ज़िंदगी का अद्भुत समन्वय… ये थे रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी.

    जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एमेरिटस शमीम हनफ़ी और फ़िराक़ गोरखपुरी का करीब दस सालों का साथ रहा है. हनफ़ी कहते हैं, “साहित्य की बात एक तरफ़, मैंने फ़िराक़ से बेहतर कनवरसेशनलिस्ट- बात करने वाला अपनी ज़िंदगी में नहीं देखा. मैंने उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य के चोटी के लोगों से बात की है लेकिन फ़िराक़ जैसा किसी को भी नहीं पाया. इस संदर्भ में मुझे सिर्फ़ एक शख़्स याद आता डाक्टर सेमुअल जॉन्सन जिन्हें बॉसवेल मिल गया था, जिसने उनकी गुफ़्तगू रिकॉर्ड की। अगर फ़िराक़ के साथ भी कोई बॉसवेल होता और उनकी गुफ़्तगू रिकॉर्ड करता तो उनकी वैचारिक उड़ान और ज़रख़ेज़ी का नमूना लोगों को भी मिल पाता। “शुरू में फ़िराक़ को उर्दू साहित्य जगत में अपने आप को स्थापित करवा पाने में बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी. शमीम हनफ़ी कहते हैं, “शुरू में फ़िराक़ साहब की शायरी के हुस्न को लोगों ने उस तरह नहीं पहचाना क्योंकि वो रवायत से थोड़ी हटी हुई शायरी थी. उसमें एक तरह की नाहमवारी मिलती है. उनकी शायरी का बयान बहुत हमवार नहीं है लेकिन यही खुरदुरापन नए लोगों को अपील करता है.” वो आगे कहते हैं, “जब उर्दू में नई ग़ज़ल शुरू हुई तो उन्होंने फ़िराक़ की तरफ़ ज़्यादा देखा, असग़र, हसरत, जिगर और फ़ानी के मुकाबले में… नई ग़ज़ल के जो सबसे बड़े शायर हमारे यहाँ कहे जाते हैं वो है नासिर काज़मी। वो फ़िराक़ साहब के बहुत क़ायल थे। उनको लोगों ने देर से स्वीकारा लेकिन उनके मुकाबले में फ़िराक़ साहब को जल्द ही स्वीकार लिया। “दिलचस्प बात ये थी कि फ़िराक़ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाया करते थे. हिंदी साहित्यकारों से उनकी शिकायत ये थी कि वो ऐसे शब्द क्यों लिखते हैं जो सिर्फ़ कोशों में दफ़न रहते हैं? उनकी भाषा जनमानस के करीब क्यों नहीं रहती?

    जानेमाने हिंदी साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी को भी फ़िराक़ को नज़दीक से जानने का मौका मिला था। त्रिपाठी याद करते हैं, “मैंने उनको पहली बार तब देखा जब वो इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की क्लास ले रहे थे. ज़्यादतर वो बी०ए० की क्लास को पढ़ाते थे. देव साहब उनको एम- ए० की क्लास पढ़ाने नहीं देते थे क्योंकि वो क्लास में शायरी की बातें ज़्यादा करते थे, कोर्स कम पढ़ाते थे।” वो बताते हैं, “मैंने देखा कि वो सिगरेट पी रहे थे और घूम घूम कर विद्यार्थियों से कुछ बातें कर रहे थे. कुछ समय बाद मैं उनसे मिलने उनके घर गया. उन्होंने मुझसे पूछा कहाँ से आए हो? मैंने कहा बनारस से आया हूँ. उन्होंने पूछा क्या पढ़ते हो? जैसे ही मैंने कहा मैं हिंदी पढ़ता हूँ, फ़िराक़ साहब बोले हिन्दी में कुछ सरल सुगम कविता की कुछ पंक्तियाँ सुनाइए. मैंने सुनाई लेकिन उन्होंने मेरी खिंचाई शुरू कर दी।”

    “उस पहली मुलाकात में ही उन्होंने हिन्दी वालों को बहुत गालियाँ दीं. कुछ दिनों बाद जब मैं उनसे फिर मिलने गया तो उन्होंने हिन्दी वालों के लिए ऐसा विशेषण इस्तेमाल किया जिसे मैं यहाँ नहीं कहना चाहता. मैंने उनसे कहा कि आप सब को गाली दीजिए लेकिन मेरे गुरु आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी को गाली मत दीजिए. लेकिन तब भी वो नहीं माने.” “मैंने फ़िराक़ साहब से कहा कि मैं आपको ढेला मार कर भागूँगा और आप मुझे पकड़ नहीं पाएँगे। फ़िराक़ साहब ये सुनते ही मेरे पास आए, मेरे कन्धे पर हाथ रखा और बहुत ज़ोर से हँसे और बोले — पंडितजी, तुम तो असली हिन्दी वाले मालूम पड़ते हो.” हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों के बारे में फ़िराक़ साहब कहा करते थे कि उनके एक पेज पर दस बार भिन्न भिन्न शब्द का प्रयोग ऐसा लगता है जैसे एक साथ बहुत सी मक्खियाँ भिनभिना रही हों

    हिंदी साहित्यकारों में सिर्फ़ निराला से उनकी बनती थी। फ़िराक़ के अज़ीज़ दोस्त और साहित्य सचिव रहे रमेश चंद्र द्विवेदी अपनी किताब ‘मैंने फ़िराक़ को देखा था’ में लिखते हैं, “फ़िराक़ की पत्नी मुझे बताती थीं, फ़िराक़ और निराला में दोस्ती तो थी, लेकिन जम कर लड़ाई भी होती थी. बाबूजी नौकर से निराला के लिए रिक्शा मंगवाते और गेट तक उन्हें छोड़ने जाते. वो रिक्शेवाले को पैसा पहले ही दे दिया करते थे.” “बाबूजी खुद ही निराला से कविता सुनाने के लिए ज़िद करते और जब निरालाजी कविता पढ़ना बंद कर देते तो बाबूजी उनकी कविता में ख़ामियों का बयान करते. निरालाजी पहले तो सुनते और फिर जब उनसे न रहा जाता तो बरस पड़ते और फिर तो छतें हिलने लगतीं.” “एक बात और मज़ेदार है. कभी कभी निरालाजी अंग्रेज़ी में लड़ाई लड़ते मगर फ़िराक़ उनका जवाब हिंदी में देते थे. जब भी निराला आते नौकर को भेज कर एक बोतल महुए की शराब मंगाई जाती. निरालाजी के लिए कोरमा, कबाब, भुना हुआ गोश्त, पुलाव, मिठाइयाँ सब कुछ रहता. फ़िराक़ अंदर आकर बार बार चिल्ला जाते- ख़बरदार कुछ कम न पड़ने पाए.”

    फ़िराक़ की याद्दाश्त कंप्यूटर की तरह थी. बड़ी बड़ी आँखें थीं उनकी. वो बेहद मूडी किस्म के इंसान थे. शमीम हनफ़ी याद करते हैं, “फ़िराक़ से ज़्यादा मुँहफट मैंने किसी को नहीं देखा. आंखे गड़ाकर जब वो कोई बात बोलते थे तो आपकी आखें ख़ुद ब ख़ुद झुक जाती थीं. जब वो अपनी गरजदार आवाज़ में अपने नौकर को पुकारते थे तो कटरे में लक्ष्मी टाकीज़ के पास उनकी आवाज़ सुनाई देती थी.” फ़िराक़ जवाहरलाल नेहरू की बहुत इज़्ज़त करते थे. 1948 में जब नेहरू इलाहाबाद आए तो उन्होंने फ़िराक़ को मिलने के लिए आनंद भवन बुलवा भेजा. फ़िराक़ के भांजे अजयमान सिंह, उन पर लिखी अपनी किताब, “फ़िराक़ गोरखपुरी-ए पोएट ऑफ़ पेन एंड एक्सटेसी’ में लिखते हैं, “फ़िराक़ को उस समय बहुत बेइज़्ज़ती महसूस हुई जब रिसेप्शनिस्ट ने उनसे कहा कि आप कुर्सी पर बैठें और अपना नाम पर्ची पर लिख दें. ये वही घर था जहाँ उन्होंने चार सालों तक नेहरू के साथ काम किया था. इस बार वो पहली बार प्रधानमंत्री के तौर पर इलाहाबाद आए थे और उन्हें उनसे मिलने के लिए इंतज़ार करना पड़ रहा था.” “फ़िराक़ ने पर्ची पर लिखा रघुपति सहाए. रिसेप्शनिस्ट ने दूसरी स्लिप पर आर सहाए लिख कर उसे अंदर भिजवा दिया. पंद्रह मिनट इंतज़ार करने के बाद फ़िराक़ के सब्र का बाँध टूट गया और वो रिसेप्शेनिस्ट पर चिल्लाए. मैं यहाँ जवाहरलाल के निमंत्रण पर आया हूँ. आज तक मुझे इस घर में रुकने से नहीं रोका गया है. बहरहाल जब नेहरू को फुर्सत मिले तो उन्हें बता दीजिएगा… मैं 8/4 बैंक रोड पर रहता हूँ.” “ये कह कर वो जैसे ही उठने को हुए नेहरू ने उनकी आवाज़ पहचान ली. वो बाहर आ कर बोले, रघुपति तुम यहाँ क्यों खड़े हो? अंदर क्यों नहीं आ गए. फ़िराक़ ने कहा, घंटों पहले मेरे नाम की स्लिप आपके पास भेजी गई थी. नेहरू ने कहा, पिछले तीस सालों से मैं तुम्हें रघुपति के नाम से जानता हूँ. आर सहाए से मैं कैसे समझता कि ये तुम हो? अंदर आकर फ़िराक़ नेहरू के स्नेह से बहुत अभिभूत हुए और पुराने दिनों को याद करने लगे. लेकिन एकदम से वो चुप हो गए. नेहरू ने पूछा, तुम अभी भी नाराज़ हो? फ़िराक़ , मुस्कराए और शेर से जवाब दिया- “तुम मुख़ातिब भी हो, क़रीब भी हो तुमको देखें कि तुम से बात करें”

    इसी तरह नेहरू एक बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में भाषण दे रहे थे. रमेश चंद्र द्विवेदी जोकि वहाँ मौजूद थे लिखते हैं, “पंडितजी अपने भाषणों में अक्सर विश्व इतिहास की घटनाओं का ज़िक्र कर ही बैठते थे. भाषण जैसे ही पूरा हुआ मशहूर इतिहासकार डाक्टर ईश्वरी प्रसाद उठ खड़े हुए और पंडितजी की भूल बताते हुए कहने लगे कि फ़लाँ वाकया इस सन में नहीं उस सन में हुआ था. फ़िराक़ ने भी रहा नहीं गया. वो खड़े हो कर अपनी भरपूर आवाज़ में चीख़ पड़े, “सिट डाउन ईश्वरी, यू आर ए क्रैमर ऑफ़ हिस्ट्री एंड ही इज़ ए क्रियेटर ऑफ़ हिस्ट्री.” फ़िराक़ गोरखपुरी अक्सर इलाहाबाद के कॉफ़ी हाउस में बैठा करते थे. शमीम हनफ़ी याद करते हैं, “वो दोपहरे एक बजे के करीब काफ़ी हाउस पहुंचते थे. उनके घुसते ही लोग अपनी कुर्सियाँ खींच कर उनकी मेज़ के पास ले आते थे. फिर दुनिया के हर मौज़ू पर फ़िराक़ अपने विचार रखते थे. उस ज़माने में इलाहाबाद का काफ़ी हाउस बुद्धिजीवियों का गढ़ होता था. वहाँ पर कभी कभी फ़िराक़ बातचीत करते करते लड़ भी बैठते थे. लेकिन बहुत से लोग तो सिर्फ़ उन्हें सुनने काफ़ी हाउस जाया करते थे.” 

    Anil Janvijay


    एक बार फ़िराक़ के साथ एक मज़ेदार घटना हुई जो बताती है कि वो कठोर होने के साथ साथ कितने विनम्र भी हो सकते थे. अजयमान सिंह लिखते हैं, “एक बार जब फ़िराक़ दिल्ली गए तो सेना के एक रिटायर्ड अधिकारी कर्नल ख़ाँ के यहाँ ठहरे. कुछ सालों बाद वही कर्नल उनके इलाहाबाद वाले घर पर तशरीफ़ लाए. फ़िराक़ उन्हें पहचान नहीं पाए. जब कर्नल ने उन्हें बताया कि वो दिल्ली से आए हैं तो फ़िराक़ ने उनसे पूछा क्या आप वहाँ किसी कर्नल ख़ाँ को जानते हैं?” “कर्नल ने कहा मैं वहीं शख़्स हूँ जिसके साथ आप एक हफ़्ते दिल्ली में ठहरे थे. फ़िराक़ ने उनसे कहा, आप दरवाज़े के पास पड़ी चप्पल उठाइए. हतप्रभ कर्नल ने चप्पल उठा ली और पूछा मैं इसका क्या करूँ? फ़िराक़ ने उनके सामने अपना सिर झुकाया और कहा, मेरी गुस्ताख़ी के लिए मेरे सिर पर ये चप्पलें आप तब तक मारिए जब तक आप थक न जाएं. मैं इतना अभद्र कैसे हो सकता हूँ कि आपकी मेहमान नवाज़ी भूल जाऊँ!”

  • तेल और पानी – कहानी

    तेल और पानी – कहानी

    Gourang

    रेहाना अपनी अम्मी को लेकर तहसील के अस्पताल पर गई। कोई नया डाक्टर आया है। कुछ लोगों ने बड़ी तारीफ की, लगभग जबरन ही भेजा पड़ोस के आबिदा खाला ने। गोया, ‘बड़ा नेक बंदा है, बातें तो इतनी मुहब्बत से करता है कि आधा मर्ज तो वहीं काफ़ुर हो जाता है। जाने किस घर का रौशन चिराग है। दिल से दुआ निकलती है ऐसे बच्चे के लिए। काश कि ये अपना बेटा होता।’ आबिदा खाला के जोड़ों की दर्द को अब बहुत आराम था। फिर रुककर कहती, ‘वहीदा तेरी बेटी से बोल, कम-अज-कम एक बार दिखा तो ले, शाम को भी अस्पताल में बैठता है। आखिर हर्ज क्या है! नहीं तो फिर बड़े शहर के बड़े अस्पताल तो हैं ही।’

    एक तो सरकारी अस्पताल, रेहाना को क्या भरोसा होता। पर तारीफ के इतने लंबे पूल बांधे कि रेहाना के लिए टालना मुश्किल ही हो गया। फिर अम्मी को खाँसी रह रह कर हो रही थी। अब्बू के गुजर जाने के बाद बस अम्मी ही थी, इक सहारा। आखिर आज जल्द ही स्कूल से लौट अम्मी को लेकर निकल पड़ी। रास्ते में वहीदा ने फिर वही पुराना राग अलापना शुरू किया – “निकाह कर लेती तो जिंदगी का सहारा होता।”। “छोड़ो भी अम्मी, फिर वही पुरानी रिकार्ड न बजाया करो।” रेहाना का वही एक ही जवाब होता। “क्यों न बजाऊँ? दुनिया के हर इंसान एक से तो नहीं होते। इरफान से तलाक हो गया तो जिंदगी खत्म तो न हो गई।” वहीदा के समझाने की कोशिश में कोई फर्क न आता। “समझ लो तुम्हारी बेटी में ही ऐब हैं। फिर किस्मत भी एक चीज है। वैसे अगर तुम मुझसे आजिज़ आ गई तो जुदा बात है।” अनमने से रेहाना जवाब देती। यह रोजाना का सबब था। दिन भर में एक बहस इस पर होनी ही थी। दोनों जानते थे, निकल कर कुछ नहीं आता, पर होनी थी। रेहाना ने दूसरी बार निकाह करने से इंकार कर दिया था और अपनी जिद्द पर कायम थी। आबिदा अभिमान से रेहाना को देखी फिर चुप हो गई।

    Gourang

    रेहाना को अफसोस हुआ, पर बात तो जुबान से निकल गई थी, वापस क्या होना था। धीरे से बोली – “नाराज न हो अम्मी। मैं कोई बच्ची तो नहीं। हो सकता है, तुम सही हो, हर शख्स इरफान नहीं। पर एक दूसरा इरफान मेरी ज़िंदगी में नहीं आयेगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं। फिर तुम भी जानती हो, तलाक़शुदा औरतों को मर्दों से वह इज्जत हासिल नहीं होती। बस चैरिटी के लिहाज से ये शादियाँ होती हैं, जैसे कोई खैरात की बात हो। रुतबा गालिब के खातिर किसी लाचार पर जैसे इमदाद की बात हो। फिर सौ बातों की एक बात, मेरी अम्मी को इस उम्र में अकेली छोड़ मैं कहाँ जाऊँ? अल्लाह बड़ा कारसाज़ है कि जिंदगी गुजर की जुगाड़ में टीचरी थमा दिया। इतना ही काफी है। माफ करो, अब मैं यह जुआ खेलने को तैयार नहीं।” “बेटी, कुछ तजुर्बा मेरी भी कहती है कि तू अब भी उस गैर मजहबी को भूल नहीं पाई है। इसलिए अब भी ऐसी दलीलें रखती है। पर जिंदगी को आगे देखना चाहिए, पीछे में कुछ नहीं रखा है।” आबिदा ने फिर समझाया।

    रेहाना अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि रिक्सा थम गया। अस्पताल आ गया। ओ पी डी में काफी चहल पहल थी। बीस-पच्चीस लोग कतार में बैठे थे। रिक्सा वाले ने ही बताया, यह नया डाक्टर शाम को भी ओ पी डी में आता है। रेहाना को बड़ा ताज्जुब हुआ, कुछ खुशी भी। रेहाना किसी तरह अम्मी को एक जगह बैठा, नाम लिखाने गई। कंपाउंडर ने बाईस नंबर दिया और कहा, मैडम, आधा घंटा से ऊपर लग जाएगा। पर निराश होने की जरूरत नहीं,वे जरूर देखेंगे।

    रेहाना की बड़ी इच्छा हुई कि वह डाक्टर को एक झलक देखे। आगे आ डाक्टर के कमरे में झाँकी। रेहाना का दिल बैठ गया। अल्लाह, इतने दिनों बाद इस तरह फिर वह दिखा!! या रब्बा, तेरी मर्जी क्या है!! बरसों पहले की बात रेहना के दिमाग में घूम गई। उफ, जैसे यादों का सैलाब आ गया। रेहाना लौट गई उन पुराने दिनों में……..

    “अम्मी, बस एक दिन की ही तो बात है।” रेहाना मनाती हुई अपनी अम्मी से बोली। 
    “दिन नहीं, रात की बात है। और फिर अगर बात बन गई तो शहर से बाहर चार-पाँच साल अकेले दिन रात रहने की भी बात है।” वहीदा बोली। 
    “सो तो है। कोई यूं ही तो कामयाबी पैरों में पड़ी नहीं मिलती।” रेहाना अपनी अम्मी को पीछे से दोनों हाथों जकड़ती बोली। 
    “रहने दे यह लाड़, मुझसे न हो सकेगा।” वहीदा ने सब्जियों को धोते हुए कहा। 
    “अम्मी, मेरा वादा है, मैं कामयाब बनकर दिखाऊँगी।” रेहाना अम्मी के पीठ में मुँह रगड़ती बोली। 
    “वह लड़का कौन है?” अचानक कुछ खामोशी के बाद ओवेन पर रखी कड़ाही में तेल डालती वहीदा पूछी। 
    “कौन?” रेहाना शरमाकर उल्टे पूछी। वहीदा के नजरों में राज उजागर हो गया। वहीदा सोचने लगी और मसाले डाल भूनने लगी। 
    “कहीं वही तो नहीं, जिससे उस दिन परीक्षा के टिफिन में मुलाक़ात हुई थी?” कुछ सोचती सी वहीदा पूछी। 
    “बहुत ज़हीन है। मंसूबे भी बहुत ऊँचे। मुझे यकीन है, एक दिन बहुत कामयाब होगा।” चहकती हुई रेहाना बोली। 
    “तो इसी के सदके तू भी कामयाबी के मंसूबे पाल रही है। भले ज़हीन है पर गैरमजहबी है।” 
    “गैरमजहबी होना कोई ऐब है?” 
    “ऐब तो नहीं पर बन्दिशें भी जाहिर है।”
    “अब तुम्हें कैसे समझाऊँ अम्मी।”
    “समझाना क्या? तू समझ ले।” 
    “फिर कहने को क्या रह गया। मैं सोचती थी, बचपन में पढ़ने लिखने की बात बस कहने भर को नहीं कही गई थी।” 
    “तुझे नहीं लगता कि तेरे अब्बा की मंजूरी भी उतनी ही जरूरी है?” वहीदा पूछी। 
    “अम्मी, उस लॉक गेट को ही खोलना है।” 
    “कौन सा? पढ़ने जाने का या उसके आगे आने वाले अंजामों का? वहीदा ने सब्जियों को कड़ाही में डाल दिया। 
    “एक अच्छी नौकरी। एक मनचाहा जिंदगी। अम्मी, तेरी लाडो के लिए तेरे दिल में ये ख्वाब नहीं पलते?” 
    “पलते हैं, पलते है मेरी रानी बिटिया। पर तू मुझे जिस तरफ इशारा कर रही है, वह मुझे खौफ का मंजर दिखाता है।” वहीदा ने सब्जी में नमक डाला। 
    “मैं यकीन दिलाती हूँ अम्मी कि हम इतने कामयाब होंगे कि तुम्हारे इज्जत पर कोई हर्फ न आयेगा, और यह डर बेतुका साबित होगा।” वहीदा ने रेहाना के आँखों में चमक देखी। उसे डराया। 
    “यह हिंदुस्तान है। यहाँ बातों का बताना बनने में पल भी नहीं लगता। अब इस किस्सा को बंद कर।”
    “अम्मी!” 
    “बंद कर।” 
    “क्या क्या बंद करूँ अम्मी? लड़की हूँ इसलिए? अगर लड़का होती तो यही फख्र की बात हो जाती।”
    “तो फिर सुन। मेरी रजा नहीं मिलती। तू दीवार फाँद ले, गर हिम्मत है तो। ताला न खुले।” कलछुल चलाती अम्मी बोली। 
    “सिर्फ इसलिए न, कि वह गैर मजहबी है। पर सच तो यह है कि वह ज्यादा भरोसेमंद है।” 
    “तुझसे सर्टिफिकेट किसने मांगी?” 
    “सर्टिफिकेट? सर्टिफिकेट का क्या? ये जो सब्जी से भीनी खुशबू आ रही है, इसकी कोई सर्टिफिकेट है? खुशबू ही खुद में सर्टिफिकेट है।” 
    “और यह खुशबू अभी कितनी दूर तक फैली है?” पैनी नजर रेहाना पर गड़ गई। 
    गमगीन हो गई रेहाना। बोल न फूटे। दरवाजा पर पीठ टिकाये खड़ी रही। 
    आखिर सब्जी में थोड़ी सी पानी मिला अम्मी बोली – “जिंदगी फिल्म नहीं है, जज़्बातों से नहीं चलती। ऐसे अहमकाना फैसलों को अपने दिमाग से दरकिनार करो।” 
    “जिस जिंदगी की दुहाई दे रही हैं, आप वही मुझसे मांग भी रही हैं।” रेहाना अपने पैरों के अँगूठों को देखती धीरे से बुदबुदाई। 
    “तकाजा यही है। शरीफ लड़कियाँ अपने वालदैन के लिए दुश्वारी नहीं बनते।” 
    “शरीफ? सच में शरीफ?” 
    “कहना क्या चाहती हो?” 
    “शरीफ बनकर फरेबी बन जाती हैं लड़कियाँ। खुद की नजरों में गिरकर कीमत चुकाती हैं लड़कियाँ। जिंदगी भर ढोती रहती हैं अपने दिल के बोझ को।” 
    “बंद कर तेरा किताबी फलसफा। इससे हकीकत की जिंदगी नहीं चलती।” 
    “अम्मी मान भी जाओ। आँखें बंद कर लेने से दुनिया बंद नहीं हो जाती।” 
    “यह नामुमकिन है।” 
    “सोच का फर्क है। समझ का फर्क है। दो जमाना में बड़ा फर्क आ गया है। अब लड़कियाँ खुदमुख्तारी की हिमायती हैं। हद है, आप हमें खुद सोचने कहती हैं, फिर अपने तई फैसले लेने को सीखने के पैरोकार भी हैं और फिर इतनी भी आजादी देने की मंशा नहीं। न पढ़ाया होता को-एड स्कूलों में, मदरसों में निपटा लिया होता।” 
    “इसके मतलब ये तो नहीं थे कि अपने दायरे भूल जाओ। मनमानी करने लगो।” वहीदा ने फिर से ढक्कन खोला और कुछ बारीक धनिया पत्तों को खौलते सब्जी में डाल ओवेन बंद कर दिया। 
    “अम्मी यह इतना संगीन मसला नहीं है। हजारों लड़कियाँ घर से बाहर पढ़ने के लिए जाती हैं। उनमें से भले कम गिनती के हो पर हममजहब भी जाती ही हैं।” रेहाना ने फिर कोशिश की।
    “पढ़ने जाना एक बात है और किसी गैरमजहाबी के साथ बसर के मंसूबे पालना एक जुदा मसला है। तेरे अब्बू इसकी इजाजत कतई नहीं देंगे। फिर दुनियादारी है, रिश्तेदारी है। कुछ समझती भी है?”
    “अम्मी!!” 
    “देख सब्जी में, तेल अलग तैर रहे हैं, लाख कलछुल चलाने पर भी पानी से नहीं मिलते। मैं महज नहीं कह रही, तजुर्बा कहता है।” वहीदा ने फिर ढक्कन खोल सब्जी में एक बार कलछुल चलाया और कहा। 
    “अम्मी यह तेल पानी वाली मिसाल मेरी अक्ल नहीं मानती। मजहब तो दुनिया में बहुत बाद में आया, इंसान का वजूद तो बहुत पहले से ही था। फिर इस रास्ते पर हम दुनिया के पहले इंसान नहीं है और न आखरी होंगे।” रेहाना के आवाज में कुछ तल्खी थी। 
    “ऐसी बातें जुबानदराज़ी के मिसाल में आती हैं, इतनी समझ की काबिलियत तो है तेरी।” उससे ज्यादा ही तल्खी से वहीदा ने जवाब दिया। 
    रेहाना खामोश तो हो गई पर नाखुशी भी पूरी जाहिर थी। आखिर चंद पल के खामोशी के बाद रेहाना पलटकर चली गई।

    तभी रेहाना ने देखा, अम्मी बुला रही थी – “चल नंबर आ गया। कहाँ खो गई?” 
    खुद को किसी तरह तैयार कर रेहाना बोली – “हाँ, चलो।” 
    अंदर घुसते ही डाक्टर ने सर उठाकर देखा और वह चौंक गया – “तुम?” 
    खुद को संभालती मुस्कुराकर ठंडी सी रेहाना बोली – “नमस्ते। अम्मी को खूब खाँसी हुई है।” 
    डाक्टर संयत हो गया। इतनी समझ की उम्र थी ही। वहीदा को देखा मुस्कुराया। फिर धीरे और मीठी बातों से डाक्टरी में लग गया।

    उधर रेहाना के दिल में तूफान उठे थे। बेचैनी का आलम अंदर में था, बस बाहर जो शांत दिख रही थी। फिर एक बार अम्मी को देखी। अम्मी डाक्टर से बड़ी मुतास्सिर दिखी। वह नब्ज टटोल कर कह रहा था – “इतनी भी गंभीर नहीं है, मेडिसीन दे रहा हूँ। दो तीन दिन में आराम हो जाएगा। फिर पखवाड़ा भर में आप पूरी तरह ठीक हो जाएंगी। मगर इसके बाद मनमानी मत करने लगिएगा। थोड़ा संभलकर रहिएगा, एकदम फिट रहेंगी आप।” कहकर दराज से कुछ दवाईयाँ निकाल कर दिया।

    वहीदा खुश होकर बोली – “बेटा आबिदा ठीक ही कहती है, आधी बीमारी तो तुमसे बातें करके ही दूर हो गई। हमारी दुआ है, खुश रहो तुम। तुम्हारे बाल बच्चे भी तुम्हारे ही जैसे हों।”
    डाक्टर हँसा। फिर बोला – “बाल बच्चे? वो कैसे हो? हमारी तो शादी ही नहीं हुई।” 
    “अरे? आखिर ऐसा क्या हो गया? अच्छा खासा कमाते हो, जवान हो।” वहीदा अचरज से पूछी। 
    डाक्टर चोर नजर से एक बार रेहाना को देखा, फिर बोला – “अपनी अपनी किस्मत है। लड़की तो बहुत मिलती है पर मर्जी नहीं होती शादी की।” 
    “अरे, तुम नौजवानों को आखिर क्या हो गया है समझ नहीं आता। एक मेरी बेटी है, वह भी शादी से इंकार करती है। तलाक हो गया तो क्या हुआ? लाखों लोग दूसरी जिंदगी शुरू करते हैं, पर ये है कि मानती ही नहीं। अल्लाह जाने, क्या मंसूबे हैं।” आबिदा बड़बड़ाई। 
    डाक्टर से रेहाना की नजरें फिर मिली। रेहाना की आँखें डबडबाई। किसी तरह खुद को संभाल वह बोली – “बहुत शुक्रिया आपका। अम्मी ठीक तो हो जाएंगी न! अम्मी के अलावा हमारा और कोई नहीं।” 
    “बिलकुल।” डाक्टर बोला। फिर अम्मी की तरफ देख बोला – “आप निश्चिंत रहिए। ईश्वर की इच्छा से आप जल्द ही स्वस्थ हो उठेंगी।”

    वापस घर लौट वहीदा चहक रही थी। मुँह से फुलझड़ी झड़ रहे थे। बोली – “क्या हुनरमंद लड़का है! जैसे फरिश्ता है। आबिदा सही कहती थी बेटी, भले घर का रौशन चिराग है। अल्लाह करे उसे ढेरों खुशियाँ मिले। उसकी हर मुरादें पूरी हों।”
    धीरे से बिस्तर पर बैठती रेहाना बोली – “इतनी भी खुश मत हो जाओ अम्मी, वह गैर मजहबी है।” 
    वहीदा अचरज से रेहाना को देखने लगी।

  • पुस्तक समीक्षा : सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज  –विद्या भूषण रावत

    पुस्तक समीक्षा : सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक सावित्रीबाई फुले के महत्वपूर्ण दस्तावेज –विद्या भूषण रावत

    Vidya Bhushan Rawat

    सावित्री बाई ज्योति बा फुले भारतीय इतिहास में सर्वोत्तम युगल के तौर पर कहे जा सकते है. भारतीय समाज में यदि फुले दम्पति के कार्यो को भली प्रकार से समझ लिया और अपना लिया तो अहिंसात्मक  क्रांति अवस्यम्भावी है. पिछले कुछ वर्षो में ज्योति बा फुले के विचारो के विषय में विभिन्न लोगो ने लिखा है लेकिन सावित्री बाई फुले के विचारो और कार्यो के बारे में बहुत कम जानकारी है. अधिकांशतः लोग उन्हें ज्योतिबा फुले की पत्नी के तौर पर जानते है हालाँकि ये उनके विशाल व्यक्तित्व के साथ अन्याय है. 

    सामाजिक आन्दोलनों को समर्पित हमारी अम्बेडकरवादी साथी रजनी तिलक को इस बात के लिए धन्यवाद देना पड़ेगा के उन्होंने सावित्री बाई फुले की रचनाओं, लेखो और ज्योति बा फुले को लिखे उनके पत्रों को संकलित कर ‘सावित्रीबाई फुले रचना समग्र’ नमक पुस्तक के तौर पर प्रकाशित की है जो हिंदी के पाठको के लिए बहुत ही अनमोल है. इस संकलन में सावित्रीबाई फुले द्वारा रचित कवितायें है, फिर उनके ज्योतिबा को लिखे तीन पत्र और उनके पांच महत्वपूर्ण भाषणों की शामिल किया गया है.

    इस संकलन को पढ़कर सावित्रीबाई फुले की बहादुरी और उनकी सैधान्तिक ताकत की जिसने उन्हें भारत की सबसे क्रन्तिकारी सामाजिक कार्यकर्त्ता बनाया. उनकी कविताएं हमें उनके विचारो की विशालता का दर्शन कराते है जिनमे न केवल अन्धविश्वास के विरुद्ध उनकी लड़ाई है अपितु लोगो से उसको मुक्त करने हेतु उनके सुझाव भी हैं. शुद्रो को अन्ध्विशाश छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए और उसके लिए आवश्यक है अंग्रेजी भाषा का ज्ञान . उस ज़माने में भी एक साधारण शिक्षा प्राप्त महिला ये समझ चुकी थी के भारतीय शिक्षा शुद्रो को शोषित रखने का एक षड़यंत्र है. उनकी कविताओं को पढ़कर हम उनकी वैचारिक क्षमता और उनके चिंतन की दिशा को समझ सकते है . अपनी कविता अज्ञानता में वह कहती है:

    ‘ एक ही दुश्मन अपना,

    खदेड़ दे उसे हम, सब मिल कर,

    उससे ज्यादा खतरनाक न कोई,

    खोजो खोजो मन की भीतर झांको,

    बताओ तो खोजा क्या अपना दुश्मन,

    खोजो तो कहाँ है वह हमारा दुश्मन,

    सोचो सोचो बताओ बच्चो,

    क्या नाम है उसका ?

    नहीं पता कौन है दुश्मन ?

    क्या तुमने प्रयास किया,

    क्या तुम्हारा प्रयास विफल हुआ,

    क्या तुमने खुद ही मान ली हार,

    चलो चलो मैं बताती हूँ,

    उस दुष्ट खतरनाक दुश्मन की पहचान,

    ध्यान से सुनो उस दुश्मन का नाम,

    उस दुश्मन को कहते हैं अज्ञान’

    मैं समझता हूँ को आज के दौर में जब दुश्मन शब्द पर इतना जोर है, जब दुश्मन के माने पाकिस्तान, मुसलमान, दलित, आदिवासी बना दिए गए हो तो सावित्रीबाई फुले ये शब्द क्रांति से कम नहीं है और आज भी इसको दोबारा से हमारे बच्चो और बुजुर्गो के दिमाग में डालने की जरुरत है. ऐसी कितनी ही कविताएं इस संकलन में हैं जो आज के समाज को दिशा देने में बहुत सहायंक हो सकती है और शायद फुले दम्पति को भी भली प्रकार से समझने में काम आये.

    अपने पति, मित्र, गुरु ज्योति बा फुले को सावित्री बाई के तीन पत्र इस संग्रह में शामिल किये गए है उनको प्रेम के अप्रतिम भेंट कह सकता हूँ. उनके पत्रों में केवल और केवल समाज की चर्चा है. वो इतने भावविभोर कर देने वाले है के आप अंदाजा लगा सकते है के दोनों के मध्य कितना मधुर सम्बन्ध था और कैसे सावित्री बाई ने अपने पति का कर कदम पर साथ दिया और कैसे ज्योति बा उनके साथ खड़े रहे. दूसरो को बदलने से पहले अपने घर में वो परिवर्तन नज़र आना चाहिए और वो कार्य ज्योतिबा फुले ने किया और सावित्री बाई फुले ने उस महान कार्य को आगे बढ़ाया. बेहद की खुबसूरत इन पत्रों में आप उन भावनाओं को समझिये जो सावित्रीबाई व्यक्त कर रही है.

    २९ अगस्त १८६८ को नाथ् गाँव खंडाला, जिला सतारा से ज्योतिबा को लिखे अपने पत्र में सावित्री बाई गाँव की एक घटना का जिक्र करते हुए कहती है :

    गांव में गणेश नाम का पुरोहित अक्सर आता था. वह गाँव गाँव क़स्बा कस्बा घूम घूम कर ग्रामीणों को पंचांग पढ़ कर सुनाता था, भविश्यवाणी करता था, नक्षत्र देखकर अनपढ़ लोगो को उनकी किस्मत देखता था और अच्छे बुरे बता कर दक्षिणा लेकर, पूजा पाठ करके उनसे पैसे लेकर अपना पेट पालन का काम करता था.

    हमारे गाँव की हाल ही में युवा अवस्था में कदम रखने वाली सारजा नाम की युवती उससे आकर्षित हो गयी और उसकी बातो में आकर उससे प्रेम कर बैठी. न केवल दोनों प्रेम कर बैठे बल्कि उन दोनों ने शारीरिक सम्बन्ध बना लिए जिसके चलते लड़की छः माह की गर्भवती हो गयी.  सारजा के शारीरिक बदलाव को देखकर लोगो के बीच कानाफूसी होने लगी. दोनों के बीच सम्बन्ध का आभास होते ही गाँव के दुष्ट किस्म के मनचलों ने दोनों पर हमला बोल दिया. सरे आम दोनों को घेर कर उनकी अव्नामानना की उनकी निर्दयता से पिटाई की. गाँव की सडको पर दौड़ा दौड़ा कर उनकी दुर्गति कर डाली यहाँ तक कि उन लोगो ने जान से मार डालने की कोशिश की. जैसे ही मुझे इस घटना का पता चला मैं सब काम छोड़ कर उधर ही दौड़ कर पहुंची. मार काट पर उतारू लोगो के बीच मैं खड़ी हो गयी और उन्हें अंग्रेजो के शासन और कानून के बारे में बताया . मैंने उन्हें डराया के इनकी हत्या करने पर तुम्हे सजा मिलेगी. तरह तरह से समझाते हुए  मैंने क्रूर भीड़ को हत्या करने से रोका. इस कुक्र्त्य से उनका मन शांत करके उधर से ध्यान हटाया . मेरे बीच बचाव के बाद गाव के सदु भाई ने दोनों को धमकाते हुए अपना फैसला सुनाया के , ‘ सरजा ने इस पुरोहित वामन की बातो में आकर ने केवल अपनी इज्जत मिटटी में मिला दी बल्कि इसने गाँव की इज्जत भी मिटटी में मिला दी. अतः हमारा ये फैसला है के दोनों हमारा गाँव छोड़ कही भी चले जाएँ . उसके इस फैसले को स्वीकार कर लिया गया . हालाँकि गाँव वालो ने उन दोनों की जान बचा लेने के मेरे प्रयास पर हैरानी जताई.

    सरजा और पुरोहित अपनी रक्षक, काल के मुंह से निकालने वाली आदि माता समझ कर मेरे पांवो पर गिर कर बहुत रोये. उनका रुदन थम नहीं रहा था. मेरे समझाने पर दोनों थोड़े संयत हुए. मैंने दोनों को आपकी शरण में भेज दिया है.उम्मीद है इस घटना की जानकारी मिलने के बाद आप उनकी कही रहने की व्यवस्था कर देंगे. अंत में बस इतना ही मैं आपको बताना चाहती थी.”

    ये पत्र पढ़ कर आप अंदाज लगा सकते हैं के सावित्री बाई और ज्योति बा का रिश्ता कैसा था और किस प्रकार से दोनों की इंसानी रिश्तो और उनके मानवाधिकारों के प्रति गहन निष्ठां थी. सावित्रीबाई और ज्योति बा ने ब्राह्मणवाद के पुरे तंत्र का पर्दाफास किया लेकिन अपनी मानवीय मर्यादाओं में उन्होंने गरीब और उत्पीडित ब्राह्मणों की रक्षा करने में कोई कोताही नहीं की. इस पत्र में ब्राह्मण युवक के खिलाफ वह कोई जहर नहीं उगलती अपितु उसकी करतूतों की आलोचना करते हुए भी दोनों लोगो को ज्योति बा के पास भेज देती है. आज से करीब १५० वर्ष पूर्व एक महिला दो व्यक्तियों के चाहत के लिए समाज के सामने खड़ी हो गयी और उसके पति ने उसका पूरा साथ दिया, ये दिखाता है के दोनों के मध्य कितना प्रेम और विश्वास था तथा भीड़ के न्याय देने की कोशिश का सावित्रीबाई ने कैसे विरोध किया . आज जब प्रेम विवाहों पर हमारी खाप पंचायतो के फतवे चल जाते है और लोग अपने ही बच्चो को जान से मार देने में कोई शर्म और अपराध नहीं महसूस करते, उन्हें सावित्री बाई से सीखना चाहिए के लोगो का जीवन बचाने के लिए क्या किया जाए. ऐसा विश्वास केवल उन लोगो में हो सकता है जो ईमानदारी से अपने कार्य कर रहे है और जिन पर लोगो का भरोषा होता है. आज समाज में ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी है क्योंकि वैचारिक ताकत नहीं है और छोटे छोटे पद, पैसे के लालच में हम वो ताकत नहीं ला सकते जो सावित्रीबाई ने दिखाई. इस महत्वपूर्ण प्रत्र से ये भी पता चलता है के सावित्री बाई मात्र गाँव में स्कूल नहीं चलाती थी अपितु समाज को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थे और उनकी राजनैतिक और सामाजिक समझ बहुत परिपक्व थी.  

    एक अन्य पत्र में सावित्री बाई अपने मायके का जिक्र करती है के कैसे उनका भाई ज्योति बा की आलोचना करता रहता है और बताता है के अछूतों के लिए कार्य करने का कारण समाज ने आपका बहिष्कार किया क्योंकि आप पाप कर्म कर रहे हो.’ साधारणतः ऐसे वाकये हमारे घरो में आते है जब हमारे नाते रिश्तेदार हमारी सोच का विरोध करते है लेकिन आपका अपना भाई या पिता विरोध करे तो बेहद दुःख होता है. सावित्री बाई इस पत्र में ज्योति बा को बता रही है कैसे उन्होंने अपने भाई को बदला. अपने भाई के लिए वो लिखती है , ‘ आपकी मति ब्राह्मणों की चाल की शिकार हो गयी है . उनकी घुट्टी पी पी कर, उनके पाखंडी उपदेश सुन कर आपकी बुद्धि दुर्बल हो गयी है और इसी करान आपके स्वयं के विवेक ने काम करना बंद कर दिया है, एक तरफ आप इतने दयालु बनते है के बकरी गाय को खूब प्यार करते है, उन्हें दुलारते है, नागपंचमी के त्यौहार में विषैले सांपो को दूध पिलाते है, ये कृत्य आपके लिए धर्म सम्मत है और महार मांग अपने जैसे इंसानों को तुम इंसान नहीं समझते. उनसे तुम परहेज करते हो, उन्हें अछूत, अस्पर्श्य समझ कर दुत्कारते हो. क्यों करते हो ऐसा. क्या तुम नहीं जानते के ब्राह्मण लोग तुम्हे भी अछूत ही समझते है. हमारे स्पर्श से भी उन्हें नफरत है.’

    ये पत्र पढ़कर आप समझ जाईये के ज्योतिबा की एक एक बात सावित्री बाई ने अपने मनमस्तिष्क में रख ली और उन्हें अपने पति को अपने कार्य को बताते हुए असीमित ख़ुशी और कौतुहल है . कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इन पत्रों के अन्दर छुपी भावनाओ को समझेगा तो बदलाव आएगा. और ये सब पूरे १५० वर्ष पूर्व और वह महिला जिसने ने विद्यालय देखा था न कुछ और.

    इस पत्र में वह आगे लिखती है :  ‘ मैंने अपने भाई से यह भी कहा के मेरा पति तुम्हारे जैसे लोगो में से नहीं है, जो धर्म यात्रा के नाम पर पंढरपुर तक पैदल हरी नाम जपते हुए चलता जाए और अपने लिए पुण्य कमाने का ढोंग करे. वे असली और सच्चा काम करते है, मानवता को जिन्दा रखते है, अनपढो को पढ़ा लिखाकर, उन्हें ज्ञान देकर उनके जीवन में रौशनी भरते है, उनमे स्वाभिमान जगा कर जीने की राह दिखाते है . यही सच्चा रास्ता है. उनका ध्येय अब मेरा भी ध्येय बन गया है . लोगो को शिक्षित करने में मुझे बहुत शांति मिलती है, स्त्रियों को पढ़ाने से मुझे खुद को प्रेरणा, प्रोत्साहन और उर्जा मिलती है . यह काम मुझे ख़ुशी देता है . इससे मुझे सुख शांति, आत्मतृप्ति मिलती है . ये ही वो काम है जिसमे इंसानियत और मानवता दीख पड़ती है’.

    इस पत्र से साफ़ दीखता है के सावित्री बाई पर ज्योतिबा का कितना प्रभाव है और विश्वास है. ये भरोषा सबसे बड़ी चीज है किसी रिश्ते को मज़बूत करने में जब आपके रिश्तेदार, आपका अपना भाई भी आपका विरोधी हो जाए और आपके सामाजिक सरोकारों का मजाक उडाये लेकिन अगर सावित्री बाई के उत्तर देखे तो वो हरेक को निरुत्तर कर देती है. उनके में ज्ञान देने के लिए बड़ी बड़ी बाते नहीं है अपितु नैतिकता, ईमानदारी की वो बाते है जो हम सब जानते है लेकिन करते नहीं है. दूसरी बड़ी बात ये के दोनों आन्दोलन के साथी है इसलिए वो जो देखे उसी आधार पर बात रख रहे है. जिस प्रेम पूर्वक वह अपनी पूरी बातो को ज्योति बा के सामने रख रही है वो दिखाता है उन्हें अपने पति पर कितना गर्व है और उससे भी जरुरी के उनकी समझ कितनी पैनी और साफ़ हो चुकी है. आज अगर हर परिवार में पहले स्वयं को बदलने की चाहत होती तो हमारा समाज बहुत बदल गया होता.

    इस पुस्तक में सावित्री बाई फुले के पांच भाषणों को भी शामिल किया गया है जो नितांत जरुरी है. ये बहुत साधारण भाषा में, जो गाँव के किसान, मजदुर, महिलाओं की समझ आ सकती है. अगर हम उनकी पूरी सोच को देखे तो वह निहायत ही व्यवहारिक है. उनके विचारो में ब्राह्मणवाद पर कुठारघात है तो अपने समाज को बदलने के लिए भी तैयार कर रही है. वो लोगो की पूजा विधि पर हमला नहीं करती लेकिन अन्धविश्वास को लेकर लोगो को समझाती है और धर्म के नाम पर पाखंड को वह बहुत साधारण भाषा में लोगो को समझा देते है. वह लोगो को मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है :

    काम धंधे, उद्यमशीलता ज्ञान व् प्रगति का प्रतीक है. इस कार्य में सामूहिक श्रम का महत्व है तो आलस्य, भाग्य विधाता, किस्मत, प्रारब्ध का निशेध उद्योगी इन्सान अपने सुख सुविधा  में बढ़ोतरी करते हुए, अन्य लोगो को भी सुखी करने का प्रयास करता है. ठीक इसके विपरीत देव देवतावादी, भाग्यवादी, किस्मत और भगवान के भरोसे जीने वाला व्यक्ति आलसी व् मुफ्तखोर होने के कारण हमेशा के लिए दुखी रहता है तथा वह अन्य लोगो की सुख शांति को मिटटी में मिलाने का काम करता है. आलस्य ही गरीबी का पर्याय है. ज्ञान, धन, सम्मान का आलस्य दुश्मन होता है. आलसी आदमी को कभी भी  धन, ज्ञान और सम्मान नहीं मिलता. लगातार परिश्रम, इच्छा शक्ति, सकारात्मक सोच बल पर ही सफलता मिलेगी, निश्चित रूप से मिलेगी, ऐसा मेरा यकीन है .

    अपने एक भाषण विद्या दान में वह  कहती है :

    परम्पराओं और पुरखो से मिले ज्ञान को अर्जित कर जिन कारीगरों ने श्रमजीवी मेहनतकश जनता ने, अपने कार्य में महारत हासिल कर भारत देश को समृद्ध बनाया है, उन लोगो की कुशलता, वास्तु निर्माण का ज्ञान एवं कलात्मकता आदि गुणों की अनदेखी कर  राजाओं ने राज किया, अपनी तिजोरी भरी किन्तु शुद्र अतिशुद्र जनता की उन्नति की और कतई ध्यान नहीं दिया. शुद्र अतिशुद्र जाति के लोग स्वाभाव से सीधे सादे एवं अनपढ़ होने की वजह से वे निहायत मुर्ख बने हुए है. उन्हें यदि न समझाया जाए और उपदेश न दिया जाए तो  वे आप होकर आगे बढ़कर खुद के दिमाग, हिम्मत एवं होसले से कोई भी उद्योग करने से कतराते है. उनका स्वाभाव भी मिलनसार न होकर बुरा होता है. . उन्हें अपने व्यक्तित्व में किस प्रकार सकारात्मक सुधार किया जाये, किस तरह अपनी प्रगति एवं विकास योजना बनाकर उस पर अमल करे , इस बात का ज्ञान जानकारी एवं प्रशिक्षण न होने के कारणों से  वे अज्ञानता की वजह से आधे भूखे रहने हेतु तो कभी कभी पूर्ण रूप से भूखे रहने के लिए विवश है. शुद्र अति शुद्र जनता हेतु सम्मानजनक आजीविका का रास्ता सरकार को पहल लेकर खोजना होगा.  

    सावित्री बाई फुले ने ज्ञान, उद्योग, कर्म, व्यसन, नेक आचरण आदि सभी बातो पर लोगो को आगाह किया. जहाँ उन्होंने सरकार से अपने अधिकारों को लेने की बात कही वही समाज में भी बदलाव की बात की. किसानो को वो कर्जदारी से दूर रहने की सलाह देती है और कहती है के कर्ज लेना सभी अनर्थो का मूल है और कर्ज अच्छे भले इंसान को समग्र रूप से दिवालिया बना देता है.’

    क्या हम कभी सोच सकते है के ग्रामीण परिवेश में बढ़ी हुई महिला जिसने स्कूल भी न देखा हो इतनी परिपक्वता से बात करते हो और वो भी आज से पूरे १५० वर्ष पूर्व. फूले दम्पति हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा आदर्श है के कैसे पति पत्नी मिलकर समाज बदलाव में सबसे बड़ा योगदान दे सकते है. मैं समझता हूँ सावित्री-ज्योति बा के प्रेम की कहानी शायद किसी भी सीरी-फरहाद या लैला मजनूँ से बड़ी प्रेम कहानी है क्योंकि उनकी प्रेम कहानी में रोमांस सामाजिक क्रांति से है. वो किसी सरकार का तख्ता उलट देने की कहानी नहीं कह रहे, वो किसी के प्रति घृणा और नफ़रत नहीं फैला रहे अपितु वो अज्ञानता को दूर करने के लिए साथ मिलकर लड़ रहे है. दोनों आपस में इतने बड़े विश्वास और प्रेम से जुड़े है के समाज के हर कटाक्ष या चुनौती को सीधे से झेलने को तैयार है.

    फुले दम्पति ने समाज के हर तबके तो छुआ क्योंकि वे जानते है के समाज का विकास सबके बदले विना हो नहीं सकता. जहाँ सावित्री बाई फुले ने उस्मान शेख की बहिन् फातिमा शेख को शिक्षा प्रचार प्रसार में शामिल किया वही काशीबाई नामक एक ब्राह्मण विधवा महिला के बच्चे को गोद लिया और बड़ा कर समाज में सम्मान दिलवाया. इन सभी कार्यो में जो महत्वपूर्ण बात है वह है सकारात्मक सोच और समाज से जुड़ने के लिए रचनात्मक कार्यो में पहल. आज के दौर में रचानात्मक कार्यो को भुलाकर जो जुमलेवाजी चल रही है वो समाज को कही भी आगे नहीं ले जायेगी. लोग समाज तक नहीं पहुँच रहे है और केवल इवेंट मैनेजमेंट से प्रसिधी पाने का जरिया ढूंढ रहे है. समाज बदलाव से प्रसिधी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है. सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले की जिंदगी हम सब के लिए एक बहुत बड़ा उदहारण है.

    रजनी तिलक ने सावित्रीबाई फुले के जीवन के इन उनछुये पहलुओ को हमारे सामने लाकर एक बहुत बड़ा काम किया है. बहुत सी बाते केवल मराठी तक सीमित थी और उनका हिंदी अनुवाद श्री शेखर पवार ने किया है इसलिए उनका बहुत आभार. पुस्तक को द मर्जिनलाइज्द पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है. सामाजिक आन्दोलनों के सभी साथियो को जिनकी सामाजिक न्याय और बदलाव में गहन निष्ठां है उन्हें ये पुस्तक पढनी चाहिए क्योंकि ये बहुत विशाल काय ग्रन्थ नहीं है अपितु बहुत ठोस है और सावित्री बाई की कविताएं, उनके पत्र और उनके भाषण आपके दिलो को छू जाते है. ये सभी दस्तावेज हमारी बहुत बड़ी धरोहर है जिनका इस्तेमाल हमें अपने सामाजिक आन्दोलनों में लोगो में चेतना जगाने हेतु करना चाहिए. पुनः पुस्तक प्रकाशन से जुड़े सभी साथियो को बहुत शुभकामनायें .

    पुस्तक का नाम : सावित्रीबाई फुले रचना समग्र

    संपादक : रजनी तिलक

    प्रकाशक : द मर्जिनलाइजद पब्लिकेशन, वर्धा

    मूल्य : रुपैया १६०

    About Author

    Vidya Bhushan​ Rawat

  • आज सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस है। आइये इस महान विभूति को नमन करें -Sanjay Jothe

    आज सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस है। आइये इस महान विभूति को नमन करें -Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe​​​​


    आज सावित्री बाई फुले का स्मृति दिवस है। आइये इस महान विभूति को नमन करें।

    यह दिन भारत की महिलाओं और विशेष रूप से दलितों, ओबीसी, और आदिवासी, मुसलमान महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

    भारत के इतिहास में पहली बार किसी स्त्री ने शुद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए स्कूल खोले और उन्हें पढ़ाने के लिए संघर्ष किया। सावित्री बाई जब अपने स्कूल में पढ़ाने जातीं थी तब उस दौर के संस्कारी हिन्दू ब्राह्मण उन पर गोबर, कीचड़, पत्थर और गन्दगी फेकते थे। सड़कों पर और चौराहों पर रोककर उन्हें धमकाते थे।

    Savitribai Phule

    वे कई बार रोते हुए घर लौटतीं थीं लेकिन उनके पति और महान क्रांतिकारी ज्योतिबा फुले उन्हें हिम्मत बंधाते थे। ये ज्योतिबा ही थे जिन्होंने ये स्कूल खोले थे और एक शुद्र और अछूत तबके से आते हुए भी संघर्ष करके लड़कियों को पढ़ाने का संकल्प लिया।

    इस दौरान फूले दंपत्ति छोटे छोटे काम करके घर खर्च चलाते थे। एक ब्राह्मणवादी हिन्दू समाज में इन्हें कोई अच्छा रोजगार मिल भी नहीं सकता था। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई ने सब्जियां बेचीं, फूल गुलदस्ते बेचे, कपड़े सिले, रजाइयां सिलकर बेचीं, और ऐसे ही छोटे छोटे अन्य काम किये लेकिन भयानक गरीबी से गुजरते हुए भी उन्होंने भारत का पहला शुद्र बालिका विद्यालय खोला और विधवाओं के निशुल्क प्रसव और बच्चा पालन हेतु आश्रम भी चलाया।

    उस दौर के अंध्वविश्वासी बर्बर हिन्दू समाज में विधवाओं और परित्यक्ताओं को पुनर्विवाह की आजादी नहीं थी। ऐसे में विधवाओं को एक गाय बकरी की तरह घर के एक कोने में पटक दिया जाता था और ब्राह्मण परिवारों में तो उन्हें देखना छूना उनके साथ बात करना भी पाप माना जाता था।

    अक्सर ऐसी युवा विधवाओं का बलात्कार उनके रिश्तेदार या समाज के लोग ही करते थे, या उन्हें किसी तरह फुसला लेते थे। ऐसे में गर्भवती होने वाली विधवाओं को ब्राह्मण परिवारों सहित अन्य धार्मिक सवर्ण द्विज परिवारों द्वारा घर से बाहर निकाल दिया जाता था।

    ऐसी कई विधवाएं आत्महत्या कर लेती थीं। असल में ये बंगाल की सती प्रथा का एक लघु संस्करण था जिसमे स्त्री को पति के मर जाने के बाद खुद भी लाश बन जाने की सलाह दी जाती है। ऐसी आत्महत्याओं और शिशुओं की हत्याओं ने ज्योतिबा और सावित्री बाई को परेशान कर डाला था।

    आज ये बातें इतिहास से गायब कर दी गईं हैं। तब इन दोनों ने भयानक गरीबी में जीते हुए भी ऐसी विधवाओं के लिए आश्रम खोला और कहा कि अपना बच्चा यहां पैदा करो और न पाल सको तो हमें दे जाओ, हम पालन करेंगे।

    फुले दम्पत्ति ने ऐसे ही एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंत को अपने बेटे की तरह पाला था।

    इन बातों से अंदाज़ा लगाइये असली राष्ट्रनिर्माता, शिक्षा की देवी और राष्ट्रपिता कौन हैं? उस दौर के धर्म के ठेकेदार और राजे महाराजे, रायबहादुर और धन्नासेठ इस समाज को धर्म, साम्प्रदायिकता और अंधविश्वास में धकेल रहे थे और फुले दम्पत्ति अपनी विपन्नता के बावजूद समाज में आधुनिकता और सभ्यता के बीज बो रहे थे।

    सावित्रीबाई को डराने धमकाने और अपमानित करने वाले लोग आज राष्ट्रवाद, देशभक्ति और धर्म सिखा रहे हैं। देश की स्त्रियों के रूप में उपलब्ध 50% मानव संसाधन की, और शूद्रों दलितों के रूप में 80% मानव संसाधन की हजारों साल तक हत्या करने वाले लोग आज वसुधैव कुटुंब और जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी का पाठ पढ़ा रहे हैं।

    इन पाखण्डियों का इतिहास उठाकर देखिये आपको भारत के असली नायकों और दुश्मनों का पता चलेगा।

    जब जब भी गैर ब्राह्मणवादी नायकों ने ब्राह्मणवाद और हिन्दू ढकोसलों के खिलाफ जाकर कोई नई पहल की है, समाज को नई दिशा देने की किशिश है तब तब इन नायकों को सताया गया है। बुद्ध, कबीर, फुले, पेरियार, अंबेडकर इत्यादि को खूब सताया गया है। खैर इतना तो हर समाज में होता है लेकिन भारतीय सनातनी इस मामले में एक कदम आगे हैं।

    भारतीय पोंगा पंडित समाज में बदलाव आ चुकने के बाद एक सनातन खेल दोहराते हैं। वे सामाजिक बदलाव और सुधार के बाद असली नायकों को इतिहास, लोकस्मृति, शास्त्रों पुराणों से गायब कर देते हैं और किसी ब्राह्मण नायक को तरकीब से इन बदलावों का श्रेय दे देते हैं। हजारों पंडितों की फ़ौज हर दौर में नए पुराण और कथा बांचती हुई गांव गांव में घुस जाती है और इतिहास और तथ्यों की हत्या कर डालती है।

    ये भारत की सबसे जहरीली विशेषता है। इसी ने भारत के असली नायकों और राष्ट्रनिर्माताओं को अदृश्य बना दिया है।

    आज सावित्रीबाई फुले के स्मृति दिवस पर उस बात पर विचार कीजिये और देश के असली नायकों और बुद्ध, कबीर, फुले, अंबेडकर जैसे असली क्रांतिकारियों के बारे में खुद पढिये और समाज को मित्रों को रिश्तेदारों को जागरूक करिये।

    ये सन्देश हर घर तक पहुंचाइये।

    Sanjay Jothe

  • बेसन पूड़ी, इमली की चटनी व खुली कड़ाही सब्जी

    बेसन पूड़ी, इमली की चटनी व खुली कड़ाही सब्जी

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    बेसन पूड़ी:

    बेसन व बेसन की मात्रा की दुगुनी मात्रा में गेहूं का आटा अलग-अलग ले लीजिए। जीरा, सौफ, खड़ी धनिया व अजवाइन को इतनी मात्रा में तवे पर भून कर ओखली में पीस लीजिए कि बेसन व गेहूं के आटे दोनो के लिए बराबर मात्रा में हो जाए। जीरा, सौफ आदि कि भूनने के बाद आग बंद करके गर्म तवे पर हल्दी पाउडर, सोंठ पाउडर, हींग पाउडर को भून लीजिए। इनकी मात्रा भी उतनी हो कि बेसन व गेहूं के आटे दोनो के लिए हो जाए।

    एक कड़ाही में थोड़े से तेल में बेसन को हल्का भूरा होने तक भूनिए। जब बेसन हल्का भूरा होने लगे तब इसमें ओखली में पिसी हुई सौंफ, जीरा, धनिया व अजवाइन तथा हल्दी, सोंठ व हींग मिला दीजिए। स्वादानुसार नमक भी मिला लीजिए। जब बेसन हल्का होने तक भुन जाए तब इसको किसी खुले पात्र में रख कर ठंडा होने के लिए रख दीजिए।

    गेहूं के आटे में ओखली में पिसी हुई सौंफ, जीरा, धनिया व अजवाइन तथा हल्दी, सोंठ व हींग मिलाकर गूंथिए। ठीक से गूंथने के बाद कपड़े से ढककर रख दीजिए।

    ठंडे हो चुके बेसन में तेल मिलाइए फिर थोड़ा-थोड़ा पानी डाल कर गूंथिए। गेहूं के आटे से जितनी लोइयां बन सकती हों उतनी लोइयां बेसन की भी बना लीजिए।

    गेहूं के गुंथे हुए आटे की लोइयां बनाइए। आटे की लोई को हाथों से बड़ा करके उसके बीच में बेसन की लोई रखकर आटे की लोई को चारों ओर से अच्छी तरह बंद कर बेलिए। 

    कड़ाही में तेल गर्म कीजिए और मध्यम आंच में इन पूड़ियों को तलिए। यदि आटे व बेसन की गुथाई अच्छी तरह से हुई होगी तो आपकी पूड़ी दोनो ओर से फूलेगी।

    बेसन पूड़ी जैसे ही आप सत्तू पूड़ी भी बना सकते है। सत्तू पूड़ी थोड़ी आसान रहती है क्योंकि सत्तू पहले से ही भुना होता है इसलिए उसको भूनने की जरूरत नहीं रहती, चाहें तो कड़ाही में थोड़ा गर्म कर सकते हैं। शेष बेसन पूड़ी जैसे ही।

    इमली व गुड़ की चटनी:

    इमली को गर्म पानी में डालकर दो मिनट तक गर्म करते रहें। फिर 15-20 मिनट के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ दीजिए। खूब अच्छी तरह मसल दीजिए।

    जीरा भून व ओखली में कूट लीजिए, सोंठ का पाउडर, पिसी लाल मिर्च, कुटी हुई खड़ी धनिया, खुशबू के लिए कुछ देर तक भुनी हुई फिर ओखली में कुटी हुई थोड़ी सी सौंफ, हींग मिलाकर रख लीजिए।

    जितनी इमली ली, उसका आधा गुड़ ले लीजिए। इमली में नमक डालकर फिर से धीमी आंच में गर्म करिए, गुड़ डाल दीजिये और गुड़ के पिघल कर मिलने तक चलाते रहिए। पिघलने तक गुड़ को टुकड़ों को चम्मच से तोड़ते व मसलते रहिए। गुड़ पिघलने के बाद आंच बंद कर दीजिए तथा मसाले अच्छी तरह मिलाने के बाद ठंडा होने तक रख दीजिए।

    इस चटनी को खाते ही आप समोसा के साथ होटलों में मिलने वाली इमली चटनी को भूल जाएंगे।

    बेसन पूड़ी, इमली-गुड़ चटनी व खुली कड़ाही सब्जी

    खुली कड़ाही में पकाई गई सब्जी:

    फोटो में जो सब्जी (आलू, प्याज, लहसुन, फली, मटर इत्यादि) है उसकी भी खासियत है। खासियत यह है कि लोहे की कड़ाही में पकाई गई है वह भी लगातार तेज आंच में बिना ढके हुए खुली कड़ाही में पकाई गई है। इस पद्धति में सब्जी को लगातार चलाते रहना पड़ता है। थोड़ा अटपटा है लेकिन सब्जी में स्वाद बहुत रहता है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • मैं एक अजीब औरत हूँ

    मैं एक अजीब औरत हूँ

    Pooja Priyamvada[divider style=’right’]

    मैं वो अजीब औरत हूँ
    जिसे दुनिया में सबसे पहले इश्क़ हुआ
    अपनी भूरी आँखों से
    जिसने ज़रूरी नहीं समझा कभी भी
    छुपाना अपने जिस्म या रूह को
    या उन दोनों की चाहनाओं को

    मैं वो अजीब औरत हूँ
    जिसे कभी पसंद नहीं था अपना नाम
    लेकिन उसने कभी बदला नहीं
    जिसने चूमीं दरवेशों की चौखटें
    रूह के नरम लबों से बिना छुए ही
    और हर बच्चे में एक बुद्ध देखा

    मैं वो अजीब औरत हूँ
    जिसने कभी नहीं रखी
    रिश्तों में शर्तें,कसमें
    और हर बार लौट जाने दिया
    हर महबूब को
    दोबारा लौटने के वायदे के बगैर

    मैं वो अजीब औरत हूँ
    जिसने अपने दिल की सारी सुर्ख नरमी
    और अपनी रूह की तमाम ख्वाहिशें
    लिख दी एक अनलिखी वसीयत में
    उसके नाम जिसने भी मोहब्बत से
    मेरा नाम लिया मैं वो अजीब औरत हूँ
    जिसने हमसफ़र होना कबूल किया
    और फिर चलती रही अकेले ही
    बिना पीछे मुड़े उसे देखने के लिए
    जो राह बदल चुका

    Pooja Priyamvada

    मैं वो अजीब औरत हूँ
    जिसने माफ़ कर दिया
    अपने उन अजन्मी औलादों को भी
    जिन्होंने इंकार कर दिया मेरी कोख को
    बख्शना अपनी मुस्कराहट
    और फिर भी बिना माँ होने के अहम् के
    उनकी नन्ही हथेलियों में रख दी
    अपनी सारी दुआएँ मैं वो अजीब औरत हूँ
    जो मर कर भी ज़िन्दा रही
    दर्द जितना बढ़ा बढ़ाती रही उसका हौंसला
    उतनी बड़ी मुस्कराहट से
    जिसने नदियों के घिसे हुए
    गोल पत्थरों में क़ायनात देख ली
    अपने ग़म पर कभी न बहाये दो अश्क़ लेकिन
    किसी अजनबी के अनजान दुःख के लिए
    महबूब-ए -इलाही से शिकायतें हज़ार कीं

    मैं वो अजीब औरत हूँ
    जो चाहती है किसी समंदर केआगोश में दफ़न होना
    कि जो मंदिरों में पूजी जाती हैं
    या कब्रों में दफ़्न हैं
    जिनके लिए घर बनाये हैं
    शायरी लिखी है दुनिया ने
    वो तो आम अच्छी औरतें हैं

    मैं एक अजीब औरत हूँ

  • वामपंथ के किलों में भाजपा ने वैसे ही सेंध लगा दी है, जैसे मध्यकाल में अफ़ीम के नशे में डूबे भारतीय शासकों को आक्रमणकारियों ने अपनी रणनीति और आधुनिक हथियारों से उखाड़ फेंका था- त्रिभुवन

    वामपंथ के किलों में भाजपा ने वैसे ही सेंध लगा दी है, जैसे मध्यकाल में अफ़ीम के नशे में डूबे भारतीय शासकों को आक्रमणकारियों ने अपनी रणनीति और आधुनिक हथियारों से उखाड़ फेंका था- त्रिभुवन

    Tribhuvan

    त्रिपुरा के चुनाव नतीजों का संदेश बहुत साफ़ है। आदिवासी कहे जाने वाले लोगों ने बहुत चौंकाने वाला फ़ैसला सुनाया है। त्रिपुरा के परिवर्तन से दिल्ली और शेष देश के स्वयं भू प्रगतिशील खेमे में वाक़ई हाहाकार मच गया है; क्योंकि त्रिपुरा के लाेक ने एक अलग तरह का निर्णय दिया है। यह निर्णय मुझे भी हत्प्रभ करता है, लेकिन यह बदलाव कई संदेश भी देता है। सच बात तो यह है कि वामपंथ के किलों में भाजपा ने वैसे ही सेंध लगा दी है, जैसे मध्यकाल में अफ़ीम के नशे आैर सुरा-सुंदरियों के वैभव में डूबे भारतीय शासकों को आक्रमणकारियों ने अपनी रणनीति और आधुनिक हथियारों से उखाड़ फेंका था। वामपंथियों के पास सुंदरियां तो नहीं, लेकिन वाग्विलास ज़रूर है। वामपंथी बुद्धिजीवी अब तक कांग्रेस सरकारों के माध्यम से वह सब हासिल करते रहे हैं, जो शायद उन्हें माकपा या भाकपा की सरकार बनने पर सपने में भी हासिल नहीं हो सकता। कांग्रेसी शासन संस्कृति ने गांधी जी के जमाने से ही बुद्धिजीवियों को नैतिक पथ से विचलित होना और इसके बावजूद गरजना बहुत सलीके से सिखा दिया था।

    त्रिपुरा की 60 सदस्यीय विधानसभा में पिछले 25 साल से यानी साल 1993 से ही मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा की सरकार थी। पिछले 20 साल से राज्य की बागडोर एक बेहद ईमानदार, नेकनीयत मुख्यमंत्री माणिक सरकार के हाथों में थी। पांच साल पहले 2013 में भाजपा ने इस राज्य में 50 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी और उसे महज 1.87 फ़ीसदी वोट मिले। वह एक सीट तक नहीं जीत सकी। माकपा को उस समय 49 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 10 सीटें। इससे साफ़ पता चलता है कि भाजपा के नेता कुछ कर गुजरने के उत्साह से लबालब भरे हैं और कांग्रेस का नेतृत्व आत्मघाती निकम्मेपन का शिकासर है।

    माकपा मध्ययुगीन क्षत्रिय शासकों के अवतरण में आ गई है। उसके नेताओं को इस बात की कोई परवाह ही नहीं है कि कौन उनके किले में सेंध लगा रहा है और कौन उनके प्रवेशद्वार पर आकर तोपें तान चुका है। वे दिल्ली के अपने किलों में सुरापान और वाग्विलास में डूब चुके हैं। अगर आप अपने हीरे को कूड़े के ढेर पर फेंकेंगे तो पड़ोसी उसे उठाकर अपने यहां सजा ही लेगा। माणिक सरकार जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति को इतने साल तक क्यों त्रिपुरा में ही जर्जर होने दिया गया? क्यों राज्यों की बेहतरीन प्रतिभाओं को केंद्र में नहीं लगाया गया? अत्यधिक केंद्रीयकरण की शिकार अगर माकपा को लोग सत्ता से बाहर नहीं करेंगे तो कौन करेगा? क्या भाजपा ने अपने नेतृत्व को नहीं बदला? अगर भाजपा अपनी सबसे बेहतरीन प्रतिभा नरेंद्र मोदी को केंद्र में ला सकती है तो यह काम माकपा क्यों नहीं कर सकती?

    Tribhuvan

    सच बात तो यह है कि माकपा में अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मारने वाले और जिस डाल पर बैठे हैं, उसे ही काटने के लिए आधुनिक आरे लेकर बैठे नेताओं का बहुत बड़ा जमावड़ा दिल्ली में हो गया है। वर्तमान भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को 2013 में प्रधानमंत्री पद का दावेदार चुना और मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनकर गुजरात से दिल्ली की राजनीति में सबसे ताकतवर पद पर बैठ गए। लेकिन यह मौक़ा भाजपा और मोदी से 18 साल पहले 1996 में अपनी बर्बादियों से अनजान कम्युनिस्टों को मिला था, जब यूनाइटिड फ्रंट ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री लगभग घोषित कर दिया। लेकिन माकपा के कूढ़मगज और यथास्थितिवादी जड़ता के शिकार नेताओं ने इसे मानने से इन्कार कर दिया और ज्याेति बसु का विरोध किया। अब अगर ऐसी पार्टी भारतीय राजनीति से तिरोहित नहीं होगी तो कौन होगा?

    माकपा का दिल्ली नेतृत्व पिछले कुछ वर्षों से बहुत समझौतापरस्त रहा है। यह मैंने स्वयं देखा है कि राजस्थान में अमराराम जैसे नेता किस तरह कोई आंदोलन खड़ा करते हैं और जब सत्ता को उसकी ज्यादा आंच सताती है तो दिल्ली से एयरपोर्ट पहुंचे माकपा नेता वीवीआईपी लाउंज में ही मुख्यमंत्री से बातचीत करके किस तरह ऐसे आंदोलनों का मृत्युपत्र लिख देते हैं। क्या अमराराम, श्योपतसिंह, योगेंद्रनाथ हांडा से लेकर कई बड़े जमीनी लड़ाकों का जन्म अपनी गलियों के लिए ही हुआ है? क्या इनके हाथ में कभी दिल्ली की कमान नहीं आ सकती थी? या इन्हें कोई नेतृत्वकारी पद नहीं मिल सकता था? क्या उत्तर भारत में ऐसे प्रतिभाशाली नेता कम हुए हैं? लेकिन केंद्रीयतावादी माकपा बहुत लंबे समय से आत्मघाती खोल में जी रही थी और अब उसकी परिणति सामने आ गई है।

    आज भी माकपा अपनी पुरानी जड़ता भरी मार्क्सवादी सोच से चिपकी हुई है और अपने भीतर बदलाव को तैयार नहीं है। कोई पूछे कि सीताराम येचुरी और प्रकाश कारात ने ऐसा क्या किया है, जो ये लोग आज भी केंद्रीय कमान संभाले हुए हैं? क्यों इनकी जगह ऊर्जा से भरे और भारतीय समाज के बदलाव के तत्पर राज्य स्तरीय नेताओं को केंद्र में लाया जाता? यह पार्टी कब तक दकियानूसी सादगी से चिपकी रहेगी? मोबाइल फाेन तक का इस्तेमाल न करने वाले कम्युनिस्ट नेताओं को आज का मतदाता क्यों कर चाहेगा? नई तकनीक से आप कब तक दूरी बनाएंगे? इसका साफ़ सा मतलब है कि भारतीय मतदाता ने अपनी जागरूकता के हिसाब से फ़ैसला किया है और उसने ईमानदार मुख्यमंत्री के नेतृत्व में काम करने वाली एक निकम्मी सरकार को उखाड़ फेंका। निकम्मेपन ने मध्यकालीन इतिहास के कौनसे गुण को बचने दिया था?

    भारतीय जनता पार्टी की जीत का इसे अच्छा संकेत कहा जाए कि कश्मीर के बाद इस पार्टी का दूसरा खतरनाक पाखंड, समझ नहीं आता। जैसे कश्मीर में भाजपा ने अलगाववादियों के साथ सरकार बनाई है, उसी तरह वह त्रिपुरा में भी वामपंथी किले को ढहाने के लिए उस आईपीएफटी से गठबंधन में चली गई है, जो त्रिपुरा के अल्पसंख्यकवादी जनजातीय लोगों के एक अलग राज्य की मांग कर रही है। अगर यह भाजपा की सोच में आया बदलाव है तो यह स्वागत योग्य है, लेकिन अगर यह सिर्फ़ राजनीतिक चालाकी और सत्ता हासिल करने भर का कुटिल खेल है तो इसके नतीजे घातक निकलेंगे। इस पूरे चुनाव परिणाम का एक सबक ये है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व सिर्फ़ देश में बुरा होने की बाट जोह रहा है। भाजपा के शासन में बड़ी से बड़ी खामियां हों और सत्ता के बेर उसकी झाेली में आ गिरें। यह बहुत ख़तरनाक़ और बुरी सोच है, जो कांग्रेस का मूच चरित्र है। आंदोलनहीन और बिना जिस्म में जुंबिश लाए, ये जिस तरह की राजनीति करती है, वह देश के लिए ख़तरनाक़ है।

    Credits: Tribhuvan’s Facebook profile