लोहार

Vijendra Diwach

आज का जमाना मुझे कम ही जानता है कम ही पहचानता है,
आज मेरे पास लोहे का सामान कम ही खरीदा जाता है,
क्योंकि जमाना आधुनिक है और
अब कांच तथा स्टील ही मन को भाता है।

नहीं  मेरे कोई ठौर-ठिकाने,
गाता हूँ महाराणा प्रताप के गाने,
एक पल यहाँ ठहरना, फिर कहींओर जाना,
ना मैने कभी खुद को जाना,
पूर्वजों ने लोहा कूटा मैने भी लोहा कूटना जाना।

बनाता हूँ लोहे का चिमटा और फूंकनी,
आज भी चलाता हूँ,कूट कूट कर लोहे को ढूंकनी।

मौसम आते हैं, मौसम जाते है,
सर्दी मेँ झींगुरोँ से बचने की खुशी मनाते हैँ,
लेकिन रजाई से तारे नजर आते हैँ।
गर्मी मेँ खुशी मनाते हैँ कि खुले मेँ सब अकेले अकेले सोयेंगे ,
अंधङ-आँधियाँ हमारे तिरपाल उङाते हैँ।
फिर वही मेंढको की टर्र-टर्र,
रात मेँ झींगरों वाले मौसम आते हैँ।

बनाकर बङी सी रोटी
और लाल-हरी मिर्ची खाकर सोने का नाटक कर जाते हैँ,
धीरे-धीरे सो जाते हैँ।
सबकुछ विज्ञान के अनुसार अनुकुल हो जाता है,
हमारा शरीर एडीज जैसे मच्छरो को भी झेल जाता है।

डार्विन का संघर्षता का सिध्दान्त हम पर लागू हो जाता है,
कोई भूला-भटका ग्राहक हमारे पास आता है,
कुछ लेता है तो पूरा कुटुम्ब प्रसन्न होता है,
नहीँ तो वही पहले जैसा हाल होता है।

त्यौहारोँ पर लोग घरो मे रंग-पोतन का काम करते हैँ,
हम हमारा ठिकाना ही चेंज करते है।
दीवाली आती है
हमारी गाङी कही ओर जाती है।

आज हमारे बच्चे सूंघनी से नशा करते हैँ,
बेमौत हमसे दूर सो जाते हैँ,
दुःख होता है रोते हैँ,
फिर वही लोहा पीटते हैँ।

हैँ, हमारे काम के कलाकार है,
बस कद्रदान कोई नही,
ऐसी अनोखी जिन्दगी जीते हैँ,
किसी से कोई शिकवे-शिकायते नही करते है,
गम पीते हैँ,अपनी तकदीर को खेल मानकर जीते है।

Vijendra Diwach

पता है शिक्षा के अभाव मेँ सारे ये झमेले है,
इस भीङ मेँ हम अकेले है,
कोई तो हमेँ समझाये,
शिक्षा का महत्व बताये,
फिर देखना हम समाज की मुख्यधारा से कैसे जुङते है,
लोहे की तरह कडिया जोङकर समाज की अटूट बैल बनाते है।

हम पर ध्यान दो,
हमें प्यार दो,
इंसान हो,इंसान को पहचान दो।
छोङो जी अपने अपने काम पर ध्यान दो,
कश्मीर जल रहा है, इंसानियत पर ध्यान दो।।

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