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अब वक़्त है सवाल हमारे हो और जवाब पितृसत्ता के

Pooja Priyamvada


सालों पहले जब एक कोर्स कर रही थी Discourse in Film and Media तब देखी थी राजकुमार संतोषी की फिल्म लज्जा एक डिस्कोर्स की तरह , उस फिल्म में लाख खामियां थीं लेकिन पहली बार सवाल पूछे जा रहे थे औरतों के जिस्मों,उनके शख्सियतों उनके अस्तित्व के बारे में इतने बड़े परदे पर , उस समय की बड़ी बड़ी हीरोइनें पूछ रही थीं अपने किरदारों में ये सवाल।

तबसे आदत हो गयी मानो , बल्कि बीमारी जैसी ही फिल्मों को डिस्कोर्स की तरह देखने की। तुम्हारी सुलु और सीक्रेट सुपरस्टार कल एक ही दिन में टीवी पर देखी।

तुम्हारी सुलु – मिस्टर एंड मिसेज अशोक की कहानी इस देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय दम्पतियों की कहानी है। छोटी खुशियां और बड़ी महत्वाकांक्षाएं और उन्ही के बीच कहीं घिसते-पिसते रोज़मर्रा की नौकरियों और गृहस्थी की चक्की में औरत और मर्द। लेकिन ये एक और कहानी भी है , उस औरत की कहानी जिसका अपना पहला परिवार (पिता कर बहनें ) उसे अपमानित करने का कोई मौका नहीं जाने देते (intimate emotional abuse), जिसे समाज एक हाउसवाइ, ”साड़ी वाली भाभीजी” cliche में बांध चुका है (social pressures to confirm)। एक “लेट नाईट” (जो अब भी इस देश में नैतिक पतन का दूसरा नाम है) रेडियो शो जिसमें वो लोगों (मर्दों) से (अक्सर डबल मीनिंग) बातें करती है male gaze का बेहतरीन उदाहरण है , सबसे ज़रूरी यही है कि मर्द क्या चाहता है , अगर वो पति/पिता है तो वो क्या करने और क्या न करने की इजाज़त देता है या नहीं और यदि वो कोई और मर्द भी है तो वो हर समय औरतों का मूलयांकन करने में लिप्त है, जबकि उस औरत के लिए चाहे वो टैक्सी चलाती हो , रेडियो शो करती हो या और कुछ सिर्फ काम है , नौकरी है।

Sex इस देश में taboo क्यों है – क्यूंकि यहाँ शादियों तक में इस पर तवज्जो न के बराबर है , सिर्फ पुरुष की मर्ज़ी या चाह मान कर इसे अलमारी में किसी भूले ख्वाब की तरह तय करके रख दिया जाता है, जब औरत पहल करती है तो आज भी यहाँ उसे एक सामान्य बात नहीं माना जाता। बहुत ही सहजता से थकी हुई पत्नी के पैर तक दबाने वाले मॉडर्न मर्यादा पुरुषोत्तम भी उसके बारे में किसी अनजान मर्द के कटाक्ष से विचलित हो जाते हैं , बच्चे की ज़िम्मेदारी मूलतः माँ की है और बच्चे का किसी भी तरह से भटकना या गिरना माँ का अपने गरिमायी सिंहासन से अपदस्थ होना ही है।

फिर भी सवाल पूछे गए हैं , बराबरी की चाह की गयी है , नैतिकता के ठेकेदारों फिर चाहे वो अपना परिवार ही क्यों न हो उसे आँख से आंख मिला कर ललकारा गया है , ये अच्छी शुरुआत है।

सीक्रेट सुपरस्टार इनज़िया की कहानी है, युवतियों के सपनों की कहानी है जिन्हे अपने पिता जैसे बीवी को बात -बेबात पीटने और घर से उठा कर फ़ेंक देने वाले मर्द से शादी नहीं करनी , आज्ञाकारी सीता जैसी बेटी नहीं बनना , सवाल करने हैं , अपने लिए , अपने से पहली पीढ़ी की अपनी माँ के लिए जो उसे गर्भपात से तो बचा लेती है लेकिन खुद पर हो रही घरेलु हिंसा के दाग अपने बच्चों पर लगने से उन्हें नहीं बचा पाती , ये इस देश की उन लाखों औरतों की कहानी है जिसके सबसे बड़ा डर आज भी दाल में नमक कम हो जाना या अपनी मर्ज़ी से कुछ खरीद लेना है , जो तलवार नहीं बन पाती और ढ़ाल बनने की कोशिश में ज़िन्दगी निकल देती है।

वो बेटी उससे भी पहली पीढ़ी के बड़ी आपा के हिस्से के सवाल भी करती है जो बेबस हैं अपने सामने , अपने परिवार में मर्दों के अत्याचार की मूक दर्शक बने रहने के लिए , उस अगली पीढ़ी के गुडडू के सवाल भी जो बचपन से देखता है एक हिंसात्मक पिता और अक्सर वैसा ही मर्द बन जाने के दबाव और अपेक्षा में बड़ा होता है।

लेकिन इस कहानी में और तरह के मर्द भी हैं , दो बार तलाक़शुदा , बेहूदा कपड़े पहनने वाला कर उससे भी बेहूदा गाने गाने वाला शक्ति और इन्जु के स्कूल का दोस्त चिंतन जो उसके साथ उसके सपने देखते हैं

दोनों फ़िल्में कुछ एहम सवाल उठती हैं , मुझे सवाल पसंद हैं , औरतों के सवाल पूछने का वक़्त आ गया है और ये क्लिप न तुम्हारी सुलु से है , न सीक्रेट सुपरस्टार से , पर ये उस दशकों पहले देखि फिल्म लज्जा से है जो राम से अग्निपरीक्षा मांगने के सवाल हैं, फिर चाहे वो सीता हों, माधुरी दीक्षित, विद्या बालन, ज़ायरा वसीम या कल ही इस दुनिया से गयी #श्रीदेवी , अब वक़्त है सवाल हमारे हों और जवाब पितृसत्ता के !

Pooja Priyamvada

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