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  • कथा कामरेडों की….

    कथा कामरेडों की….

    Sunny Kumar Choudhary

    भारतीय फेसबुक समाज में एक विशिष्ट प्रकार का जीव पाया जाता है जो आपस में अपने को कॉमरेड बुलाते हैं. ये सभी एक दूसरे को प्रगतिशील मानते हैं और जो ठीक इनके टाइप के लाल नाक वाले नहीं हैं उनको ये तिरस्कृत करते हैं. गजब का गिरोह है. कहीं भी एक साथ टूटते हैं. इनके पास ढेर सारे सर्टिफिकेट होते हैं. मौका मिलते ही मुहर मारकर आपको पकड़ा देंगे. खैर,इनकी प्रगतिशीलता कुछ नमूने देखिये.

    एक कॉमरेड ने किसी की फेसबुक वॉल पर टिप्पणी की कि ‘संघी लड़के- लड़के में मजा लेकर खुश रहते हैं’. एक अश्लील आत्मविश्वास के साथ. मैंने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अभी आपको ‘गे-राइट’ पर लिखने दे दिया जाए तो पन्ना लाल कर देंगे लिख लिख के?गुस्सा गए कॉमरेड. बद्तमीज कहा और ताकीद कि तुम मुझे जानते नहीं इसलिए ऐसा कह रहे हो. मैं उनकी वॉल पर गया तो ‘तालाब सूखा’ और ‘झील में पानी कम हुआ’ टाइप के कुछ लेख ,जो अखबारों में छपे थे, दिखाई पड़े. मैं देखकर वापस आ गया कुछ कहा नहीं लेकिन उतना पर्यावरण पर ज्ञान मुखर्जीनगर में फोटो स्टेट वाला भी दे देता है. खैर, बुजुर्ग थे तो दुआ सलाम करके बात खत्म कर दी.

    फेसबुक पर कुछ कॉमरेड दिनभर फेमिनिज्म का झंडा बुलंद किये रहते हैं.ऐसा लगता है ये न हों तो महिलाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा. कुछ दिन पहले कन्हैया से जाने अनजाने एक डिबेट में गाली निकल गई.अब बेगूसराय के भूमिहार से ऐसा हो जाना कोई अचरज की बात नहीं पर आश्चर्य की बात यह कि किसी फेमिनिस्ट कॉमरेड ने इस पर आपत्ति नहीं जताई कि आखिर स्त्रीसूचक गाली का प्रयोग करते हुए कन्हैया प्रगतिशील कैसे बने रह सकते हैं? यह काम अगर किसी गैर कॉमरेड नेता ने की होती तब आप फेसबुक पर स्त्री विमर्श देख रहे होते.लेकिन गिरोह चुप रहा अपने बिरादरी की बात थी.

    गुजरात में इस बीच ‘एंटी मुस्लिम रायट’ को बदलकर ‘रायट’ के नाम से पढ़ाने का हुक्म आया. अब सेकुलर कामरेड परेशान कि ऐसा अनर्थ कैसे? भाई भोले, क्या सोचते हैं एंटी मुस्लिम का मुहावरा खेलते रहेंगे आप और एंटी हिंदू का जुमला आते ही सेकुलरवाद की केंचुल में घुस जाएंगे? आतंकवाद का धर्म नहीं होता कहेंगे और कोई ‘हिंदू आतंकवादी’ पकड़ में आ जाए तो उसका नाम घुमाएंगे. बिहार की हिंसा से दुखी हो जाएंगे और बंगाल पर मौन साध लेंगे. यकीन मानिये सेकुलरवाद की आपकी ये सुविधाजनक परिभाषा साम्प्रदायिकता को बढ़ाती ही है. हां, आप मुहर मारकर सर्टिफिकेट देते रहिये कि कौन सेकुलर और कौन कम्युनल.

    बाकी विद्वान तो कॉमरेड फेसबुक अकाउंट बनाते ही हो जाते हैं. क्या इतिहास क्या राजनीति विज्ञान सबपर एक समान पकड़. विज्ञान से लेकर रहस्यवाद तक पर विशेषज्ञता हासिल. और किसी पर भी टिप्पणी नहीं करते बल्कि उनका आग्रह होता है इसे शोध निष्कर्ष की तरह लिया जाए.सवर्ण कामरेडों को जाति विमर्श बहुत लुभाता है. जब मौका लगे बाभन ठाकुर का लाभ ले लीजिये बाकी समय डी-कास्ट होने का सुख भोगिये.

    आज इतना ही. शेष कथा इंटरवल के बाद सुनाई जाएगी. तब तक के लिए लाल सलाम.

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    Sunny Kumar Choudhary

  • सरल नहीं है जगदीश उपासने हो जाना  –Manoj Kumar

    सरल नहीं है जगदीश उपासने हो जाना –Manoj Kumar

    Manoj Kumar

    एक पत्रकार से एक सम्पादक हो जाना बहुत कठिन नहीं है लेकिन एक सम्पादक से किसी महनीय विश्वविद्यालय का कुलपति हो जाना मुश्किल सा था. और इस मुश्किल को बड़ी ही सहजता से जिसने पाया उसका नाम है जगदीश उपासने. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति बनाये जाने पर मध्यप्रदेश स्वयं को जितना गौरवांवित महसूस करता है, उतना ही गर्व छत्तीसगढ़ को है. यह होना लाजिमी है क्योंकि 15 बरस पहले छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था तब दो राज्यों का कोई भेद नहीं था. इस नाते पत्रकारिता के वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक जगदीश उपासने सबके हैं और सब उनके हैं. जगदीश उपासने का जगदीश उपासने बने रहना सरल क्यों नहीं है, इस पर कुछ विमर्श किया जा सकता है.

    आज दोनों राज्यों के पास अपने अपने पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय है. ऐसे में यह सवाल जायज है कि छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी उपासनेजी को क्यों नहीं दी गई? जिन दिनों सच्चिदानंद जोशी कुलपति पद से भारमुक्त हो रहे थे तब उपासनेजी से बेहतर चयन कोई दूसरा नहीं हो सकता था. लेकिन बहुत कम लोगों को इस बात की भनक है कि इसके पहले ही उन्हें एमसीयू के कुलपति बनाने की चर्चा चली थी, जब पूर्व कुलपति बीके कुठियाला अपना पहला कार्यकाल पूरा कर चुके थे लेकिन स्वयं उपासने जी की इच्छा नहीं थी सो कुठियालाजी यथावत बने रहे. जोशी के कुलपति पद से भारमुक्त होने के बाद उन्होंने स्वयं ही छत्तीसगढ़ जाने से मना कर दिया था. उपासने जी को जो लोग व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, वह यह भी जानते हैं कि वे हमेशा एक पत्रकार के रूप में रहे हैं और इसी रूप में वे अपनी सक्रियता बनाये रखना चाहते हैं.

    यह ठीक है कि उनकी पृष्ठभूमि संघ की है लेकिन इस पृष्ठभूमि को उनकी पत्रकारिता से घालमेल नहीं किया जा सकता है. जनसत्ता और इंडिया टुडे जैसे प्रकाशनों में उनकी जिम्मेदार भूमिका किसी खास विचारधारा को पोषित नहीं करती है और ना ही उन्हें अवसर देती है. वे निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार के रूप में अपने दायित्व का निर्वहन करते रहे हैं. कुलपति के रूप में उपासनेजी को यह दायित्व इसलिए नहीं मिला कि वे एक खास विचारधारा के हैं अपितु उनकी पत्रकारिता के प्रति निष्ठा एवं समर्पण ने उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त समझा. हां, वर्तमान में वे आर्गनाइजर गु्रप के सम्पादक थे और संघ के प्रति उनकी व्यक्तिगत सोच भी उनके कुलपति बन जाने में सहायक हो सकता है लेकिन पत्रकारिता में उनका योगदान ही उनके चयन का आधार बना.

    इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि 25 वर्ष पुराने एमसीयू बीते वर्षों में विवादों से कारण-अकारण घिरा रहा. इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन जो छवि एमसीयू की थी, उसे धक्का लगा. इस बात से इंकार करना मुश्किल है. इस बात को लेकर संघ और सरकार में भी विमर्श हो रहा होगा और उन्हें अपने बीच से लेकिन पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध चेहरे के रूप में चयन का अवसर मिला तो उपासनेजी से बेहतर कोई नहीं हो सकता था. 8 वर्ष पहले देश के एक अन्य ख्यातनाम पत्रकार एवं सम्पादक अच्युतानंद मिश्र को जब एमसीयू की जिम्मेदारी सौंपी गई तो देशभर के पत्रकार जगत में स्वागत हुआ था और आज जब उपासनेजी को यह दायित्व मिला है तो एक बार फिर वैसा ही उत्साह है. इस बात को याद रखना चाहिए कि श्री मिश्र ने जब एमसीयू की जवाबदारी सम्हाली तो वे महानिदेशक बनकर आए क्योंकि तब एमसीयू संस्थान था और जब वे पद से मुक्त हुए तो कुलपति के रूप में क्योंकि तब माखनलाल पत्रकारिता संस्थान से माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का स्वरूप ग्रहण कर चुका था. उपासनेजी ने स्पष्ट कर दिया है कि एमसीयू पत्रकारिता एवं संचार का विश्वविद्यालय है और यहां पर इसी दृष्टि से अध्ययन-अध्यापन को बढ़ावा दिया जाएगा. वे किसी पर विचारधारा सौंपने के खिलाफ हैं. यह सोच एक पत्रकार की हो सकती है और इस सोच में वे सबसे अलग और आगे दिखते हैं.

    सहजता और सरलता उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा है. आडम्बरों से परे रहने वाले उपासने जी से मेरा अग्रज और अनुज का रिश्ता है. मेेरे द्वारा आरंभ किया गया रिसर्च जर्नल ‘समागम’ के प्रति उनका आरंभ से अनुराग रहा है. जब जब उनसे आग्रह किया और उन्होंने अपनी व्यस्तताओं के बीच समय निकालकर लिखा. यह हिस्सा इसलिए लिख रहा हूं कि वे पत्रकारिता के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं, यह जान लें. 2012 की बात होगी. चुनाव के संदर्भ में ‘समागम’ का अंक संयोजित कर रहा था. मेरे आग्रह पर पेडन्यूज के बारे में उन्होंने बेबाकी से आलेख के स्थान पर रिपोर्टिंग की तर्ज पर लिखा. साथ में उन्होंने कहा कि लगे तो छापना, नहीं तो बिलकुल नहीं. गुरु जैसे मेरे अग्रज के लिखे को ना छापूं, यह दुस्साहस तो मैं नहीं कर सकता था. अंक प्रकाशित हुआ और इसकी प्रति सुपरिचित कवि एवं राजनेता श्री बालकवि बैरागी को प्रेषित किया. अंक मिलते ही उनका फोन आया-‘ॠकमाल करते हो यार, इतने वर्षों से पत्रिका निकाल रहे हो और मुझे भेजा भी नहीं. कितने साहस रखते हो भाई. जगदीश उपासने ने जो लिखा, उसे आपने छाप दिया. बधाई. उनका मोबाइल नंबर देना, मैं बात करता हूं.’ शायद तत्काल उन्होंने उपासनेजी को फोन घुमा दिया और वही बातें उनसे की होंगी. बाद में उपासनेजी से बात होने पर उन्होंने बैरागीजी से हुई चर्चा के बारे में बताया था.

    Jagdish Upasane

    कुलपति बन जाने के बाद जब मैं उपासनेजी से सौजन्य भेंट करने पहुंचा तो वही बात निकल आयी. कहने लगे-‘बैरागी चाहे जिस विचारधारा के हों, बचपन से हम उन्हें पढ़ते और सुनते आए हैं. अब उस पीढ़ी के चंद लोग बच गए हैं जो बेबाकी से अपनी बात कहते हैं.’ यह एक और मिसाल है कि उनकी पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्ध रहने की. सरलता, सहजता उनका व्यक्तित्व है लेकिन अब सामने जो संकट है वह है पत्रकारिता जगत का बड़ी उम्मीदें जग जाना. पर्दे के पीछे कुछ सक्रिय भी होंगे और कुछ साथ खड़े भी होंगे क्योंकि एक वर्ग को तो इस बात का इल्म ही नहीं था कि वे पत्रकारिता के किस कद-काठी के व्यक्तित्व हैेंं. उनका कद तो इस बात से आंका जा रहा था कि उनकी पृष्ठभूमि क्या है? हां, यह बात सुनिश्चित है कि समूचा पत्रकारिता जगत उनके साथ होगा और यही साथ माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सपनों को सच करने में सहायक होगा.

  • राष्ट्र के नाम खुला  आपातकालीन ख़त : 100 वर्ष पुराने पटना संग्रहालय को बचाने की अपील –Pushpraj

    राष्ट्र के नाम खुला आपातकालीन ख़त : 100 वर्ष पुराने पटना संग्रहालय को बचाने की अपील –Pushpraj

    Pushpraj

    Patna Museum

    100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय का स्वामित्व सोसायटी (ट्रस्ट) को सौंपना भारत की सांस्कृतिक संपदा पर बड़ा हमला है। यह हमला राज्य सृजित राष्ट्रीय आपदा है. हम इसकी मुखालफत करते हैं।

    पटना संग्रहालय बचाओ समिति

    Patna, Bihar

    Patna Museum, Bihar

    100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध पटना संग्रहालय को बचाना क्योँ जरुरी है –

    1. ब्रिटिश शासन काल में 1917 में स्थापित पटना संग्रहालय अविभाजित भारत के पुरातन संग्रहालयों में तीसरा पुरातन संग्रहालय है ,जो अपनी स्थापना का 100 वर्ष पूरा कर रहा है .यह आश्चर्यजनक सत्य है कि इस प्रसिद्ध राष्ट्रीय संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में राजकीय स्तर पर होनेवाले  शताब्दी वर्ष के श्रृंखलाबद्ध आयोजनों पर विराम लगाकर इस संग्रहालय को विस्थापित किया जा रहा है .

    2. सितम्बर – अक्टूबर 2017 में एक माह ले लिए  संग्रहालय को बंद करने की सूचना को (संग्रहालयों की सुरक्षा के सन्दर्भ में अंतरराष्ट्रीय मानदंड के अनुसार)विज्ञापित किए बिना पटना संग्रहालय को एक माह के लिए बंद कर दिया गया .इस दौरान पटना संग्रहालय के अधिकारिओं की शक्ति को अपने अंकुश में लेकर विश्व प्रसिद्ध कृति यक्षिणी सहित हजारों पुरावशेष और कला -कृतिओं को पटना संग्रहालय से स्वायत्त संस्था बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित किया गया .

    3. बिहार संग्रहालय 1860 के सोसायटी एक्ट से निर्मित एक स्वायत्त संस्था “बिहार म्यूजियम सोसायटी “ के द्वारा संचालित है ,जिसके मुख्य प्रवर्तक बिहार के मुख्य सचिव अंजनी सिंह हैं .अंजनी सिंह इस ट्रस्ट के नॉडल ऑफिसर हैं .बिहार म्यूजियम सोसायटी के संचालन का सर्वाधिकार नॉडल ऑफिसर के पास केन्द्रित है .बिहार संग्रहालय के निर्माण को माननीय पटना उच्च न्यायालय ने “ नोट इन पब्लिक इंटरेस्ट “ कहा था .बिहार संग्रहालय के निर्माण स्थल पर 6 हैरिटेज बंगले मौजूद थे ,जिसे तोड़ने से बचाने के लिए मुख्यमंत्री से देश के इतिहासकारों ने गुहार की थी .

    4. पटना के कुछ प्रमुख इतिहासकारों ,संग्रहालय विषेशज्ञों,विशिष्ट बुद्धिजीविओं ने 2015 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेजकर पटना संग्रहालय के पुरावशेषों को ट्रस्ट के तहत संचालित ,निर्मित बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरण की योजना को अवैधानिक बताते हुए पटना संग्रहालय को बचाने की अपील की थी. इस पत्र पर बिहार के प्रथम संग्रहालय निदेशक हरिकिशोर प्रसाद, प्रो.हेतुकर झा, प्रो.अरुण कुमार सिन्हा, प्रो .जयदेव मिश्र, प्रो .राजेन्द्र राम, प्रो.शत्रुघ्न शरण, पद्मश्री उषा किरण खान, पद्मश्री गजेन्द्र नारायण सिंह और नव-नालंदा संग्रहालय के पूर्व-निदेशक भूपेन्द्र नाथ सिंह ने हस्ताक्षर किए थे .

    5. बंगाल से बिहार के अलग होने के बाद संविधान सभा के अध्यक्ष, “ बिहार निर्माता “ डॉ .सच्चिदानंद सिन्हा ने बिहार –उड़ीसा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर के पटना निवास पर आयोजित बैठक में 15 जनवरी 1917 को पटना में संग्रहालय के निर्माण का प्रस्ताव दिया था .बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के निर्देशन में अप्रैल 1917 को पटना उच्च न्यायालय के भवन के एक हिस्से में “पटना संग्रहालय” की स्थापना की गयी.1929 के जनवरी माह तक पटना संग्रहालय पटना उच्च न्यायालय के भवन में कार्यरत रहा . भारतीय स्थापत्य कला के बेहतरीन प्रतीक INDO-SARACENIC “ इंडो-सारासेनिक शैली “ से निर्मित खुबसूरत भवन में पहली फ़रवरी 1929 से पटना संग्रहालय को नया आयाम प्राप्त हुआ . कालांतर में उड़ीसा के अलग होने के बाद बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी  बिहार रिसर्च सोसायटी में परिणत हो गया .पटना संग्रहालय के संचालन के लिए पटना म्यूजियम मैनेजिंग कमिटी गठित था,जिसके अध्यक्ष पटना उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश होते थे .1961 तक पटना संग्रहालय मैनेजिंग कमिटी के द्वारा संचालित होता रहा .1961 के 25 अप्रैल से बिहार सरकार ने बिहार के पुरातात्विक स्थलों और सभी संग्रहालयों को पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के प्रशासकीय नियंत्रण में लिया तो पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी का अधिकार समाप्त हो गया .

    6. बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी की स्थापना एशियाटिक सोसायटी की  अवधारणा पर हुई थी .बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी इतिहास – पुरातत्व के अंतराष्ट्रीय अध्ययन ,शोध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण  के आधार पर कार्यरत महत्वपूर्ण संस्था थी .बिहार रिसर्च सोसायटी को पटना संग्रहालय के संस्थापक Mother- organization की तरह देखना चाहिए .भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के संस्थापकों में थे ,जिन्होंने बिहार रिसर्च सोसायटी को आगे बढाने के साथ –साथ 1926 से 1937( मृत्युकाल ) तक पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी के अध्यक्ष की जिम्मेवारी निभाई. पटना संग्रहालय के संस्थापकों में एडवर्ड गेट, वाल्स, प्रो.जे.एन समादार, डॉ.सच्चिदानंद सिन्हा, के .पी जायसवाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, एस .ए.शेर, ए.एस अल्तेकर की भूमिका को शताब्दी वर्ष में स्मरण करना और उनकी भूमिका का  दस्तावेजीकरण आनेवाली पीढ़ीओं के लिए प्रेरणादायी होता .दुःखद आश्चर्य यह है कि विगत 2 दशक से ज्यादा समय से बिहार रिसर्च सोसायटी की सभी गतिविधिओं को पूर्णतः बंद कर दिया गया .एक सरकार ने आर्थिक सहायता बंद कर बिहार रिसर्च सोसायटी में एक दशक से ज्यादा वक्त तक ताला लगा दिया था दूसरी सरकार ने इस संस्थान को पटना संग्रहालय का अधिकृत हिस्सा बनाकर संस्थान को नौकरशाही व्यवस्था का अंग बना दिया .इन्डियन हिस्ट्री कांग्रेस ने 1997 में बिहार रिसर्च सोसायटी के अस्तित्व को बचाने के लिए प्रताव पारित किया था .बिहार रिसर्च सोसायटी का पटना संग्रहालय के साथ विलयन के बाद विलयन अधिनियम के प्रावधान के अनुसार “परामर्शदात्री समिति“ का गठन आवश्यक था, जो एक दशक बीते अब तक गठित नहीं हुआ .

      महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत से लाई गयी हजारों पाण्डुलिपिओं की वजह से यह संस्थान बिहार के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्व विद्यालयों से ज्यादा महत्व रखता है लेकिन अफ़सोस कि बिहार में कभी बिहार रिसर्च सोसायटी के गरिमा की पुनर्वापसी को सांस्कृतिक-राजनीतिक सामाजिक मुद्दा नहीं बनाया गया. (गौरतलब है कि महापंडित के द्वारा रखी पाण्डुलिपिओं में ऐसी जानकारी निहित है ,जिससे बिहार और भारतीय इतिहास की दृष्टि बदल सकती है .)

    7. भारतीय संस्कृति और मानवता की विकास यात्रा  के महानतम अध्येता महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय अतीत के साथ जुड़े बौद्ध संस्कृति के विकास  की खोज के लिए तिब्बत की कई कष्टपूर्ण एतिहासिक यात्राएं की और तिब्बत से दुर्गम रास्तों से 22 खच्चरों  पर ढो कर साथ लाए बौद्ध साहित्य और कलाकृतिओं से(कुल 6000से ज्यादा पाण्डुलिपियां और कला कृतिया ) पटना संग्रहालय को समृद्धि प्रदान किया था.राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत और विश्व यात्रा से लाए गए अमूल्य धरोहर पटना संग्रहालय के एक्शेसन रजिस्टर में 1933 से 1956 तक महापंडित से दान स्वरूप प्राप्त होने का प्रमाण है . राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लाए गए पाण्डुलिपिओं को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के लिए उपयोगी मानकर स्थानान्तरण चाहती थी  पर काशी प्रसाद जायसवाल जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान के हस्तक्षेप से पाण्डुलिपि को बिहार रिसर्च सोसायटी में सुरक्षित बचाया गया .काशी प्रसाद जायसवाल ने उन पांडुलिपिओं का अपनी देखरेख में अनुवाद शुरू कराए थे ,जो काशी प्रसाद जी की असामयिक मौत की वजह से आगे नहीं बढ़ सका . रॉयल नीदरर्लैंड एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साईंस ने ERNST STEINKELLNER के द्वारा बौद्ध संस्कृति और तिब्बत में राहुल सांकृत्यायन के द्वारा खोज किए गए ज्ञान भंडार पर किए गए शोध प्रबंध को 2003 में A Tale of Leaves on Sanskrit Manscripts in Tibet their Past and their Future प्रकाशित किया है .यूरोप के विश्व विद्यालयों में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा किसी भारतीय राजनेता से ज्यादा है .थंका कलाकृतिओं के बारे में राहुल जी ने अपनी जीवनयात्रा में खुद लिखा है कि जर्मनी ,फ़्रांस ,लन्दन और श्रीलंका में थंका को प्राप्त अप्रत्याशित प्रतिष्ठा के बावजूद उन्होंने पटना संग्रहालय को ही क्योँ प्राथमिकता दी .यूरोप के किसी देश में 4 -5 थंका कला कृति के लिए मिले बहुत बड़े धन के प्रस्ताव के बाद राहुल जी को इनकी कीमत का अंदाजा लगा और उन्होंने तय किया कि इतनी कीमती कलाकृति को अपने राष्ट्र की धरोहर के रूप में संरक्षित करना ही आनेवाली पीढियो के लिए उपयोगी होगा .  पटना संग्रहालय विकास के कालक्रम में अपने साथ 4 संस्थानों को इकट्ठे जोड़ता है .पुरातात्विक धरोहरों के अद्भुत संग्रहों वाला पटना संग्रहालय,राहुल सांकृत्यायन गैलरी और संग्रहालय की बुनियाद “बिहार रिसर्च सोसायटी “. काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान भी संग्रहालय परिसर में ही स्थित है .यह संस्थान बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के द्वारा संचालित है .67वर्ष पूर्व स्थापित इस संस्थान को अब तक अपना भवन तक नसीब नहीं हुआ है .शोध और अध्ययन के प्रति बिहार सरकार की उदासीनता का यह बेहतरीन सबूत है .

    8. पटना संग्रहालय की स्थापना अखंड भारत की ब्रिटिश सरकार के द्वारा की गयी थी इसलिए इस संग्रहालय को एक राज्य सरकार अगर  “ राज्य संपदा” की तरह कब्जे में लेती है तो यह नीतिसंगत नहीं है .तत्कालीन पुरातत्वप्रेमी ब्रिटिश प्रशासकों के सहयोग से पटना संग्रहालय के संस्थापकों ने हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से लेकर अखंड भारत के पाकिस्तान ,बांग्ला देश , रावलपिंडी,तमिलनाडु,आन्ध्र प्रदेश ,उड़ीसा सहित अलग –अलग हिस्सों में बिखड़े पुरातत्व के महत्व की सामग्री को इकट्ठा किया .पटना म्यूजियम की मैनेजिंग कमिटी के आग्रह पर प्राचीन भारतीय मुद्राओं के संकलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने उच्च स्तरीय क्वायंस कमिटी गठित की थी ,जिसके प्रयास से पटना संग्रहालय के पास प्राचीन दुर्लभ  मुद्राओं का संग्रह प्राप्त हुआ .स्थापना काल के उत्तरार्ध में मौर्यकालीन पुरातत्व के लिए प्रसिद्ध हुए पटना संग्रहालय के लिए राहुल सांकृत्यायन ने दुनियां के देशों की यात्रा के दौरान “सांस्कृतिक –राजदूत “ की भूमिका निभाई और पटना संग्रहालय को दुनियां के देशों में बौद्ध कालीन पुरातात्विक संग्रहों वाले “ बौद्ध संग्रहालय “ की पहचान प्राप्त हुई .बौद्ध कालीन पुरातत्वों में भगवान बुद्ध के अस्थि कलश ,मौर्य कालीन दीदारगंज यक्षिणी और जैन तीर्थंकर से जुड़े पुरातत्वों ने इस संग्रहालय को भारत के अन्य संग्रहालयों के मध्य विशिष्टता प्रदान की .

    9. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री जया सांकृत्यायन पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में विस्थापन की सूचना से विचलित हुईं और उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 12 सितम्बर 2017 को आपातकालीन पत्र भेजा. बिहार के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में पटना संग्रहालय के धरोहरों के स्थानांतरण के विरुद्ध उन्होंने स्पष्ट लिखा. ”आज के स्वाधीन भारत में राहुल जी की प्रिय कर्मभूमि बिहार में उनकी देन ,उनकी सोच का मान ना रखना ,उनके प्रति निरादर है. इस विद्या मंदिर को निर्जीव और वीरान ना किया जाए. ”इस पत्र के आलोक में मुख्यमंत्री ने सांकृत्यायन परिवार से कोई वार्ता तो नहीं की पर इस पत्र का सकारात्मक असर यह हुआ कि राहुल सांकृत्यायन गैलरी का स्थानान्तरण रुक गया .

    10. स्मरणीय है कि भारत सरकार के लेखा महानियंत्रक (CAG) ने वर्ष 2014 में पटना संग्रहालय के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट में इस बात पर गहरी आपत्ति जताई है कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लायी गयी 6 हजार तिब्बती पाण्डुलिपिओं का वैज्ञानिक तरीके से रखरखाव और प्रबंधन नहीं हो रहा है .सीएजी ने अब तक उन पाण्डुलिपिओं के अनुवाद और प्रकाशन नहीं होने के सवाल पर नौकरशाही की कार्यशैली पर सवाल उठाया है .सीएजी ने पटना संग्रहालय में पुरातत्वों के रख्ररखाव के प्रति लापरवाही को देखते हुए अमूल्य पुरातत्वों के साथ भविष्य में असुरक्षा और गायब होने के की संभावना प्रकट की है .भारत सरकार की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में एक सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर पटना संग्रहालय के पुरातत्वों की हिफाजत के लिए उच्च स्तरीय जाँच कमिटी के गठन करने की जरूरत थी .लेकिन बिहार सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट की अनदेखी करते हुए गैर क़ानूनी तरीके से पटना संग्रहालय के सबसे महत्वपूर्ण पुरावशेषों और कला–कृतिओं को  स्थानान्तरित करने की भूमिका निभाई . ​

    11. जिस पटना संग्रहालय को अखंड भारत में भारतीय संग्रहालय की तरह विकसित किया गया ,उस संग्रहालय को मुख्यमंत्री ने राज्य की सम्पदा / अपनी निजी संपदा की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश क्योँ की ?जाहिर है कि राष्ट्रीय धरोहर मानकर ही 80 -90 के दशक में केंद्र सरकार ने पटना संग्रहालय को अपने अधीन में लेने की प्रक्रिया शुरू की थी पर तत्कालीन बिहार सरकार ने अंतिम समय में किसी तरह का राजनीतिक अड़चन लाकर केंद्र सरकार की कोशिश को रोक दिया था .

    12. बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 23 अक्टूबर 2017 को पटना संग्रहालय की यात्रा की और पटना संग्रहालय के अस्तित्व को कायम रखने की घोषणा  की .मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय में मौजूद 1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित करने की बार –बार घोषणा कर रहे हैं. मुख्यमंत्री के द्वारा पटना संग्रहालय में 3 घंटे बिताने के बाद 24 अक्टूबर 2017 को टाईम्स ऑफ़ इण्डिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार पटना संग्रहालय से 39 हजार पुरावशेषों को स्थानांतरित किया जाएगा .बिहार सरकार के संस्कृति सचिव ने गत वर्ष  इसी अख़बार में 50 हजार पुरावशेषों के स्थानांतरण की बात की थी.
      (https://m.timesofindia.com/city/patna/Patna-Museum-on-the-verge-of-losingsheen/articleshow/54769499.cms)

      मुख्यमंत्री ने बिहार संग्रहालय के लोकार्पण के अवसर पर पटना संग्रहालय से  1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित होने के बाद पटना संग्रहालय को “ मॉडर्न आर्ट गैलरी “ के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी. मौर्यकालीन, बौद्धकालीन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय से उसकी पहचान बने प्रसिद्ध यक्षिणी सहित हजारों पुरावशेषों को हटाकर “ मॉडर्न आर्ट गैलरी “ परिवर्तित करने से भारतीय इतिहास, भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान संपदा का जो नुकसान हो रहा है ,उसकी भरपाई नामुमकिन है.

      मुख्यमंत्री ने  पटना संग्रहालय को पुनर्गठित करने को घोषणा की है .इस  घोषणा के आलोक में पटना संग्रहालय को पूर्णतः वातानुकूलित करने और करोडो की लागत से जापान की कंस्ट्रक्सन कम्पनी माकी की मदद से भवन निर्माण कराने और पटना संग्रहालय को सोसायटी में बदलने की प्रक्रिया को अंतिम मंजूरी दिया जाना है. भारतीय स्थापत्य के बेहतरीन प्रतीक  “इन्डियन सारासेनिक शैली “ से निर्मित हैरिटेज इमारत के साथ जापान की कंस्ट्रक्सन कपनी के द्वारा निर्माण की योजना अविवेकपूर्ण प्रतीत होता है .भारतीय स्थापत्य की विशेषज्ञता वाले  आईआईटी रूडकी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की उपेक्षा क्योँ? 100 वर्ष प्राचीन राजकीय संग्रहालय को सोसायटी के द्वारा संचालित करने की योजना लोकतंत्र विरोधी कदम साबित होगा. यह फैसला सांस्कृतिक संपदा पर  राज्य प्रदत्त आपदा है .

    13. सीएजी ने पटना संग्रहालय के पुरातत्वों की असुरक्षा पर जो संदेह प्रकट किए थे ,इस आधार पर पटना संग्रहालय से पुरावशेषों के स्थानान्तण के बाद क्या उन पुरातत्वों की तस्करी का  रास्ता ज्यादा सुगम हो जाएगा? सोसायटी एक्ट से संचालित बिहार संग्रहालय में पुरातत्वों की सुरक्षा के लिए मौजूद भारतीय पुरातत्व संरक्षण कानूनों की सख्ती बेअसर होगी .सोसायटी एक्ट से संचालित ट्रस्ट को निजी स्वामित्व वाले कम्पनी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.बिहार संग्रहालय का  इस्तेमाल मुनाफे के व्यापार में बदल जाए तो आम लोगों के लिए बिहार संग्रहालय में प्रवेश मुश्किल हो जाएगा .

    14. विश्व की यह संभवतः पहली घटना है ,जब किसी प्राकृतिक-अप्राकृतिक आपदा के बिना एक मुख्यमंत्री और एक मुख्य सचिव के निर्णय से 100 वर्ष पुरातन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय को स्थानांतरित किया जा रहा हो. शोध, अध्ययन की प्रक्रिया से जुड़े अध्येताओं के समक्ष यह सवाल उपस्थित होता है कि पटना संग्रहालय के 100 वर्षों के कालक्रम में दुनियां की तमाम भाषाओँ में अब तक हुए शोध में जिन अभिलेखों, पुरावशेषों, कलाकृतिओं को पटना संग्रहालय में दर्शाया गया था, उन हजारों पुस्तकों, जर्नल को पढ़ते हुए निराशा मिलेगी और नए अध्येताओं के समक्ष पुराने विद्वान झूठे साबित होंगें .

    15. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना संग्रहालय से पुरावशेषों के स्थानान्तरण को अपनी बड़ी उपलब्धिओं की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं .पटना संग्रहालय बचाओ समिति को  देश के कई प्रतिष्ठित इतिहासकारों,पुरातत्ववेत्ताओं और संग्रहालय विशेषज्ञों का समर्थन प्राप्त है .हमलोग चाहते हैं कि मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय को राष्ट्रीय धरोहर स्वीकार करते हुए इस संग्रहालय से स्थानान्तरित सभी पुरावशेषों ,कला –कृतिओं को अतिशीघ्र पटना संग्रहालय में वापस करने की व्यवस्था करें .बिहार के मुख्यमंत्री के समक्ष भारत के सभी विश्व विद्यालयों के इतिहास के प्राध्यापकों के द्वारा यह प्रश्न खड़ा करना चाहिए कि पटना संग्रहालय के पुरावशेषों के सन्दर्भ में 100 वर्षों में हुए हजारों शोध दस्तावेजों,पुस्तकों को असत्य साबित होने से बचाया जाय . एक विश्व  प्रसिद्ध राष्ट्रीय संग्रहालय के स्थानान्तरण से भारतीय इतिहास –पुरातत्व के अध्ययन –शोध की प्रक्रिया किस तरह प्रभावित होगी,इस बात पर देश के तमाम इतिहास के अध्येताओं,शिक्षाविदों और छात्रों के बीच चर्चा होनी चाहिए .

    16. इस घटनाक्रम से सबक लेते हुए पुरातत्वों की सुरक्षा के प्रति भारत सरकार को कड़े कानून बनाने चाहिए और देश के तमाम संग्रहालयों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा के लिए गृह मंत्रालय को खास तरह का  सतर्कता सेल गठित करना चाहिए .पुरातत्व का व्यापार,तस्करी जब कभी होता है तो अधिकतम मुनाफा के लिए पुरातत्व को देश से बाहर पहुँचाया जाता है .भारतीय पुरातात्विक सामग्री यूरोपीय देशों में लाखों –करोड़ों डालर /पौंड में बिकते हैं. पुरातत्व को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा प्राप्त है .जिसे सरकार राष्ट्रीय धरोहर स्वीकार कर रही है ,उसकी सुरक्षा की गारंटी के लिए सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून अब आवश्यक हो गया है.

    17. बिहार के मुख्यमंत्री अगर पटना संग्रहालय से पुरातत्वों के विस्थापन को जायज मानते हैं तो इस मसले पर पटना में इन्डियन हिस्ट्री कांग्रेस का विशेष अधिवेशन बुलाने की चुनौती स्वीकार करें .मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय के विस्थापन की वजह से प्रभावित हो रही सरकार की छवि को सुधारने के लिए बिहार में स्थित सभी संग्रहालयों की यात्रा कर रहे हैं .इतिहास के अध्येताओं को बिहार के मुख्यमंत्री से यह सवाल पूछना चाहिए कि नीतीश कुमार स्वाभाविक रूप से अगर इतिहास,संस्कृति और संग्रहालयों के प्रेमी हैं तो इनके 12 वर्षों के कार्यकाल में पटना संग्रहालय की संस्थापक बिहार रिसर्च सोसायटी की शोध प्रक्रिया को क्योँ धनाभाव में बंद कर दिया गया ?नीतीश कुमार के कार्यकाल में महापंडित के द्वारा लाई गयी तिब्बती पाण्डुलिपिओं के अनुवाद –प्रकाशन को क्योँ महत्त्व नहीं दिया गया?

    18. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को भारतीय संस्कृति का रक्षक घोषित करते हैं तो इस सवाल का जवाब भी मुख्यमंत्री को देना चाहिए कि पटना संग्रहालय के संस्थापकों में शामिल ब्रिटिश प्रशासकों की प्रतिमा पटना संग्रहालय में अगर स्थापित है तो पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में संस्थापकों में अग्रणी भारतीय प्रतीकों की उपेक्षा क्योँ, बिहार निर्माता डॉ .सच्चिदानंद सिन्हा, काशी प्रसाद जायसवाल और महापंडित सांकृत्यायन की इस शताब्दी वर्ष में पटना संग्रहालय परिसर में ऊँची प्रतिमा क्योँ नहीं ???

    पटना संग्रहालय के अस्तित्व को बचाना भारतीय इतिहास, पुरातत्व के साथ–साथ भारतीय ज्ञान संपदा को बचाने की शिद्दत है. संपादकों, पत्रकारों, बुद्धिजीविओं, शिक्षकों, छात्रों, राजनेताओं से अपेक्षा है कि वे इस मुद्दे को गंभीरता के साथ समझने की कोशिश करें और पटना संग्रहालय को बचाने के सवाल को बिहार का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करें .

    निवेदक

    • प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद, पूर्व राज्यपाल त्रिपुरा (संरक्षक, पटना संग्रहालय बचाओ समिति)
    • पुष्पराज, लेखक –पत्रकार (संयोजक,पटना संग्रहालय बचाओ समिति), संपर्क – 9431862080. 

    पटना संग्रहालय को बचाने के पक्ष में –

    • इरफ़ान हवीब (प्रसिद्ध इतिहासकार,अलीगढ ),
    • रोमिला थापर (प्रसिद्ध इतिहासकार ,दिल्ली ),
    • डॉ .डी.एन.झा (प्रसिद्ध इतिहासकार ,दिल्ली ),
    • डॉ.इम्तयाज अहमद (अ .प्रा.निदेशक, खुदा बख्स लाईब्रेरी, पटना ),
    • प्रोफ़ेसर चमनलाल (जेएनयू),
    • मेधा पाटकर( प्रसिद्ध समाज सेविका ),
    • एस .एस .विश्वास (अ.प्रा.महा.नेशनल म्यूजियम,दिल्ली ),
    • हरिकिशोर प्रसाद (अ.प्रा .प्रथम निदेशक, संग्रहालय बिहार ),
    • मधु सरीन( वरिष्ठ पत्रकार, न्यूयार्क ),
    • जॉन ग्लेस्बी (शिक्षाविद बर्मिघम),
    • जेम्स लोंग्चे वांग्लत ( अरुणाचल प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री ),
    • डॉ. मैनेजर पाण्डेय (प्रख्यात आलोचक ,दिल्ली ),
    • डॉ. मुरली मनोहर प्रसाद सिन्हा (दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष),
    • डॉ.रेखा अवस्थी(संपादक ,नया पथ ,दिल्ली ),
    • शेखर पाठक ( इतिहासवेत्ता एवं संपादक,पहाड़ ,नैनीताल ),
    • राजीव लोचन साह (संपादक ,नैनीताल समाचार ),
    • डॉ.चौथीराम यादव (वरिष्ठ आलोचक एवं  अ.प्रा.विभागाध्यक्ष, बीएचयू),
    • डॉ .विजय बहादुर सिंह (वरिष्ठ आलोचक ,भोपाल ),
    • प्रोफ़ेसर एजाज हुसैन (इतिहासकार, शांति निकेतन ),
    • पद्मश्री गिरिराज किशोर (व्यास सम्मान प्राप्त वरिष्ठ लेखक, कानपुर ),
    • कृष्ण कल्पित (अ.प्रा.अपर महानिदेशक ,प्रसार भारती ,दिल्ली ),
    • डॉ.हितेंद्र पटेल (प्राध्यापक ,रवीन्द्र भारती विश्व. प .बंगाल ),
    • डॉ .खगेन्द्र ठाकुर ( बिहार सरकार का शिखर सम्मान प्राप्त आलोचक ),
    • मदन कश्यप (प्रसिद्ध कवि),
    • दिनेश मिश्र (प्रख्यात नदी विशेषज्ञ एवं सदस्य नमामि गंगा परियोजना, भारत सरकार ),
    • डॉ. जगन्नाथ मिश्र (पूर्व मुख्यमंत्री ,बिहार ),
    • मार्शल डॉ.विमल सूर्य चिमणकर (केन्द्रीय संगठक,समता सैनिक दल .नागपुर ),
    • भंते रेवत दीक्षाभूमि(प्रसिद्ध बुद्धिस्ट,महाराष्ट्र ),
    • विकास नारायण राय ( अ.प्रा.पुलिस महा. हरियाणा ),
    • कुमार प्रशांत (वरिष्ठ पत्रकार एवं सचिव ,गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली),
    • डॉ.रविभूषण (वरिष्ठ लेखक एवं स्तंभकार),
    • जयप्रकाश धूमकेतु (संपादक, अभिनव कदम; सचिव, राहुल सांकृत्यायन पीठ मऊ, ऊ.प्र.),
    • के .के शर्मा (अ.प्रा.क्यूरेटर ,पटना संग्रहालय ),
    • सुधांशु रंजन (वरिष्ठ पत्रकार ,दिल्ली ),
    • सोनिया जब्बर (लेखिका ,दिल्ली ),
    • गौरीनाथ (संपादक ,बया ),
    • अंशुल छत्रपति (सम्पादक ,पूरा सच ,सिरसा ),
    • लेखराज ढ़ोठ (वरिष्ठ अधिवक्ता ,सिरसा ),
    • ए.के जैन ( प्रसिद्ध व्हिसिल ब्लोवर ,दिल्ली ),
    • आशुतोष मिश्र (अधिवक्ता,सुप्रीम कोर्ट ,दिल्ली ),
    • आशा काचरू (अ.प्रा.प्रो.जर्मनी ),
    • तरसेन पाल (कृषक नेता ,जम्मू ),
    • जीत गुहा नियोगी ( श्रमिक नेता ,छत्तीसगढ़ मुक्तिमोर्चा ,दल्ली राजहारा ),
    • कर्नल बी .सी लाहिरी (प्रतिष्ठित कवि-लेखक,कोलकाता),
    • विजय शर्मा (लेखक ,कोलकाता ),
    • स्वदेश दास अधिकारी (कृषक नेता ,नंदीग्राम ),
    • पलाश विश्वास (वरिष्ठ पत्रकार ,कोलकाता ),
    • कपिल आर्य (वरिष्ठ लेखक ,कोलकाता ),
    • सरुर अहमद (वरिष्ठ पत्रकार ,पटना ),
    • रणजीव (नदी विशेषज्ञ,पटना ),
    • कुणाल (राज्य सचिव, भाकपा (माले, बिहार),
    • अवधेश कुमार (राज्य सचिव, माकपा, बिहार),
    • सत्यनारायण सिंह (राज्य सचिव ,भाकपा, बिहार ),
    • अरुण सिंह (राज्य सचिव, एसयूसीआई, (कम्युनिस्ट) बिहार )
    • अशोक सिन्हा (केदार दास श्रम एवं शोध संस्थान,पटना ),
    • सुमंत (भारतीय सांस्कृतिक सहयोग मैत्री संघ,पटना ),
    • जया सांकृत्यायन, प्रो .जेता सांकृत्यायन,
    • अनिल जायसवाल ( पटना उच्च न्यायालय में अधिवक्ता एवं प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल के पौत्र ),
    • प्रो .एस .के गांगुली (अ .प्रा .केमेस्ट्री ,पटना वि.)
    • शाह आलम (पीपुल्स फिल्म मेकर, चम्बल ),
    • पुखराज (टेलीविजन पत्रकार, हैदराबाद ),
    • डॉ .राजेन्द्र प्रसाद सिंह (संपादक, तीस्ता हिमालय, सिल्लीगुड़ी)

    Patna Museum, Bihar

    Pushpraj

  • समाजवादी पार्टी व बहुजन समाजवादी पार्टी गठबंधन बनाम लोकसभा-2019 व विधानसभा-2022

    समाजवादी पार्टी व बहुजन समाजवादी पार्टी गठबंधन बनाम लोकसभा-2019 व विधानसभा-2022

    Vivek “सामाजिक यायावर”
      संस्थापक व मुख्य-संपादक, ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
    मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय-जर्नलिस्ट

    उत्तरप्रदेश में संसदीय-उपचुनाव में बसपा द्वारा सपा प्रत्याशियों को समर्थन

    संसदीय उपचुनावों के संदर्भ में बसपा की अघोषित नीति रही है कि अपवाद घटनाओं को छोड़कर संसदीय उपचुनावों में अपना प्रत्याशी खड़ा नहीं करती रही है। इसलिए हाल में ही उत्तरप्रदेश के संसदीय उपचुनाव में बसपा द्वारा अपना प्रत्याशी न खड़ा करना विशेष घटना नहीं थी। चूंकि बसपा की नीति रही है कि संसदीय उपचुनावों में प्रत्याशी खड़ा नहीं करना है इसलिए उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट स्थिति में सपा प्रत्याशी को समर्थन दे देने को मैं सपा-बसपा के मध्य लंबी दूरी के गंभीर व गठबंधन की संभावनाओं को कम से कम अभी तो नहीं ही देख पा रहा हूँ। उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट स्थिति में बसपा द्वारा सपा प्रत्याशी को समर्थन दे देने को मैं गठबंधन हो जाना भी नहीं मानता। अभी की स्थितयों में मैं इसे लोकसभा उपचुनाव व राज्यसभा के चुनाव से जोड़कर तात्कालिक राजनैतिक लेनदेन के रूप में देख रहा हूँ।

    सपा-बसपा गठबंधन

    सपा-बसपा गठबंधन के रास्ते में मुझे कई गंभीर व्यवहारिक दिक्कतें दीखती हैं। सपा-बसपा के साथ खड़े होने को मैं इन दोनों पार्टियों की सामाजिक, सामाजिक-न्याय के संदर्भ में परस्परता व गंभीर प्रतिबद्धता, विश्वसनीयता व राजनैतिक दूरदर्शिता की बजाय उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट परिस्थिति की विवशता के कारण होने वाला जुड़ाव मानता हूँ। 

    ऐसा भी नहीं है कि इन दोनों पार्टियों ने 2014 के बाद या 2017 की फरवरी के बाद सामाजिक-न्याय के लिए साथ मिलकर चलने की योजना के तहत जमीन पर अपने कार्यकर्ताओं से संवाद या कार्यशालाओं का घोषित/अघोषित संयुक्त अभियान चलाया हो, जिसके कारण समय लगा और अब दोनों पार्टियां जुड़ रही हैं। चुनाव जीतने की कवायद से इतर समाज के लोगों के लिए सपा-बसपा गठबंधन का सामान्य कार्यक्रम एजेंडा तक नहीं है, जो भविष्य में आम चुनावों में सरकार न बनने की स्थिति की बावजूद करते रहा जाए।

    ऐसा भी नहीं है कि सपा-बसपा गठबंधन के कारण फेसबुक, व्हाट्सअप जैसे सोशल मीडिया में सपा-बसपा के कार्यकर्ताओं व समर्पित समर्थकों में वैचारिक परिपक्वता का विकास हुआ हो। दोनो ओर के ही लोग इसे सत्ता-प्राप्ति के लिए राजनैतिक चतुराई के रूप में देख रहे हैं। इसलिए उनके समर्थन व विरोध के केंद्र स्थानांतरित हो गए हैं। मतलब यह कि जैसे पहले सपा या बसपा का भी विरोध करना पड़ता था तो अब केवल कांग्रेस व भाजपा का विरोध करना है।

    यह वैसे ही है जैसे बिहार में भाजपा समर्थकों के लिए नितीश कुमार अच्छे थे व लालू यादव के समर्थकों के लिए नितीश कुमार बुरे थे। जैसे ही यह दो धुरंधर विरोधी जुड़े तो लालू समर्थक नितीश कुमार की प्रशंसा करने लगे व भाजपा समर्थक नितीश कुमार को बुरा कहने लगे। जब नितीश कुमार ने लालू यादव से अलग होकर सरकार बनाई तो नितीश लालू समर्थकों के लिए बुरे व भाजपा समर्थकों के लिए अच्छे हो गए।

    ऐसे ही आज सपा-बसपा में गठबंधन होने की संभावनाओं को देखते हुए बहुत लोगों को सामाजिक-न्याय व सोशल इंजीनियरिंग दिख रही है। यदि भविष्य में सपा व बसपा अलग हुए तो यही लोग एकदूसरे को बुरा कहने लगेंगे गरियाने लगेंगे।

    खैर सामाजिक-न्याय, सामाजिक-प्रतिबद्धता व राजनैतिक दूरदर्शिता जैसे गंभीर व सूक्ष्म विषयों को परे रख कर सपा-बसपा गठबंधन के संदर्भ में कुछ व्यवहारिक तथ्यों पर गौर कर लिया जाए।

    सपा-बसपा गठबंधन व लोकसभा-2019

    उत्साही कार्यकर्ता व समर्थक लोग गठबंधन को बनाए रखने के लिए मायावती को प्रधानमंत्री व अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं। मुझे यह पूरी कवायद मायावती के अहंकार व महात्वाकांक्षा को सहलाते हुए गठबंधन को स्थापित करने के लिए लगती है। लेकिन मुझे यह कवायद लंबे समय के लिए व्यवहारिक रूप से सफल दीखती नहीं है क्योंकि मायावती कोई नौसिखिया खिलाड़ी नहीं है जो उनको प्रधानमंत्री वाले लालीपाप से बहलाया जा सकता है।

    मूलभूत व्यवहारिक प्रश्न यह है कि मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी कैसे? बसपा व सपा उत्तरप्रदेश के बाहर हैं नहीं। इन दोनों ही पार्टियों ने कभी दूरदर्शिता व गंभीरता के साथ उत्तरप्रदेश से बाहर ठोस रूप से पांव फैलाने का प्रयास किया ही नहीं।

    उत्तरप्रदेश के बाहर विधायकी की जो दो चार सीटें उत्तरप्रदेश में बसपा के सरकार में होने या सरकार बनाने की संभावनाओं के आभामंडल के कारण पहले कभी बसपा द्वारा जीतीं भी गईं थीं, समय के साथ वह सब भी एक तरह से खतम ही हो चुका है, हवा-हवाई भले ही कुछ-कुछ कहीं झाड़न-पोछन शेष हो।

    2019 के लोकसभा आमचुनावों में पहली समस्या सीटों के बटवारे व किस पार्टी को कौन-कौन सी सीटें मिलें इत्यादि मसलों की आएंगी। दोनों पार्टियों का अपना भिन्न वोटबैंक है, अपने-अपने समर्पित कार्यकर्ता हैं, अपने-अपने क्षत्रप हैं।

    अभी तक सपा बसपा पूरे राज्य में अपने लोगों को टिकट देतीं थीं। गठबंधन होने पर बहुत ऐसे लोगों को टिकट नहीं मिलेगा जिन्होंने अपनी-अपनी पार्टियों को अपना जीवन दिया होगा, अपने इलाके में पकड़ अच्छी है तथा पहले टिकट मिल चुके होंगे तथा बहुत ऐसे भी लोग होंगे जो पहले जीत भी चुके होंगे। ऐसे लोग गठबंधन के साथ दिल से कितना रह पाएंगे यह बड़ा मसला है। भाजपा इन लोगों को नहीं लुभाएगी इसकी क्या गारंटी है। मान लिया जाए कि ये लोग भाजपा के साथ नहीं भी जाएंगे तो गठबंधन के प्रत्याशी का कितना वास्तव मे साथ देंगे या दे पाएंगे यह भी बड़ा मसला है।

    मान लेते हैं कि सीटों का बटवारा हो गया, कौन किस सीट से लड़ेगा यह भी तय हो गया। मान लेते हैं कि किसी क्षत्रप या कार्यकर्ता या समर्थक ने गड़बड़ नहीं की, सब के सब आदर्श अनुशासित रहे।

    मान लेते हैं कि सपा बसपा के स्थानीय व क्षेत्रीय क्षत्रप टिकट न मिलने के बावजूद, भाजपा की लुभावनी रणनीतियों के बावजूद गठबंधन के प्रत्याशियों की जीत के लिए जान लड़ा देते हैं। तब भी ऐसा तो नहीं है कि भाजपा एक भी सीट नहीं जीतेगी। मान लेते हैं कि सबकुछ मानमाफिक होता चला गया तथा सपा बसपा के सितारे बहुत बुलंद रहे इसलिए दोनों मिलकर 60-70 सीटें जीत लेती हैं। यह भी मान लेते हैं कि सपा को उस समय भी मायावती को प्रधानमंत्री बनाने में कोई आपत्ति नहीं।

    अब सवाल यह है कि 60-70 सीटों से आज की राजनैतिक परिस्थितियों व मानसिकता में प्रधानमंत्री कैसे बना जा सकता है। मान लीजिए कि देश के दूसरे राज्यों के क्षेत्रीय दलों का भानुमती का कुनबा जोड़ जाड़ कर किसी तरह केंद्र में सरकार बन भी गई और सभी क्षेत्रीय दल मायावती को प्रधानमंत्री मान भी लिए। तब भी 30-35 सांसदो वाली मायावती कितने दिनों तक प्रधानमंत्री रह पाएंगी।

    लोकसभा चुनाव होंगे 2019 में और उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे 2022 में। क्या तीन साल तक 30-35 सांसदो वाली मायावती की केंद्र सरकार निर्बाध रूप से चलती रहेगी। मतलब यह कि भारत के नेता, कार्यकर्ता व लोगबाग रातोंरात परिपक्व हो जाएंगे।

    यह तो बात हुई तब की जबकि मायावती प्रधानमंत्री किसी मिरैकल से बन जाएं।

    अब भिन्न स्थिति की कल्पना करते हैं। मान लेते हैं कि सपा बसपा की सीटें 60-70 की बजाय 40-50 सीटें ही आ पाती हैं तो दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां अपने नेता को प्रधानमंत्री क्यों न बनाना चाहेंगी। जब विचार कर ही रहे हैं तो दोनों मिलकर 20-30 सीटें ही जीत पाएंगी ऐसी भी कल्पना करके विचार करना चाहिए।

    सपा-बसपा गठबंधन व विधानसभा-2022

    विधानसभा के लिए दो परिस्थितयां हो सकती हैं। मायावती 2019 में प्रधानमंत्री बन जाती हैं लेकिन कुछ महीने बाद या साल भर बाद या दो साल बाद ऐसी स्थिति आती है कि वे प्रधानमंत्री नहीं रहतीं हैं। तब क्या वे 2022 में उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहेंगीं?

    इस प्रश्न से भी बड़ा व बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि 2019 में मायावती प्रधानमंत्री नहीं बन पाती हैं तो क्या वे 2022 में उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहेंगी। मायावती कोई छोटी बच्ची तो हैं नहीं जो उनको 2024 में प्रधानमंत्री होने का लालीपाप देकर बहलाया जा सकता है।

    विधानसभा चुनावों में फिर सीटों के बटवारे का मसला आएगा। ऐसा भी तो होगा कि कार्यकर्ताओं को यह लगे कि सरकार तो बन ही रही है तो अपनी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपनी पार्टी की सीटों की संख्या अधिक करने के चक्कर में गठबंधन होने के बावजूद सहयोगी पार्टी के प्रत्याशियों पर ध्यान न दें या हरवाने का षड़यंत्र रचें।

    भाजपा व संघ

    भाजपा के पास केंद्र की सरकार है। देश के बहुत राज्यों में राज्य-सरकारें हैं। मीडिया है। संसाधन है। रणनीतियां है। देश भर में जमीनी व अनुशासित कैडर है। लोगों से संवाद स्थापित करने का व्यवस्थित व मजबूत ढांचा है। नरेंद्र मोदी व अमित शाह की विश्वसनीय व चुनावी-रणनीतिकार जोड़ी है।

    भाजपा छोटी-छोटी पार्टियों को अपने साथ इसलिए जोड़ती है क्योंकि इन पार्टियों के कारण कुछ सीटों में कुछ हजार वोट भी मिल गए तो सीटें निकल जाती हैं। भाजपा किसी के साथ भी गठबंधन करे भाजपा का कैडर इतना अनुशासित है कि गठबंधन में किसी भी पार्टी के किसी भी व्यक्ति को टिकट मिले उसको जिताने में ताकत लगा देता है।

    उत्तरप्रदेश से बाहर ही देश भर में भाजपा की लगभग 200 सीटें हैं। भाजपा की रणनीतियों के कारण अनेक राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां दिन ब दिन कमजोर होती जा रहीं हैं।

    ऐसी स्थितियों में मायावती के प्रधानमंत्री बन पाने की संभावनाएं कितनी हो सकती हैं, कितने समय के लिए प्रधानमंत्री बन सकतीं हैं। इन बातों का प्रभाव उत्तरप्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव व सपा-बसपा गठबंधन में मूलभूत रूप से पड़ना है।

    About author: 
    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • पुनर्जन्म

    पुनर्जन्म

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    मेरा पहला पुनर्जन्म था 
    जब मैंने तोड़े थे बंधन बोल के
    महीनों की चुप्पी के बाद रोया 
    था पूरी जान से।

    उसके बाद मैं मरता रहा निरन्तर बिना किसी जन्म के
    मरता रहा किसी धर्म के नाम पर खुद को बांध कर
    कभी जाति के नाम पर बांध कर। 
    संस्कार, मूल्य जो मेरे नहीं थे वे भी मारते रहे मुझे निरन्तर
    मोक्ष, ईश्वर, प्रेम के नाम पर भी जिया मैंने
    मरे हुए नामों को।

    मेरा दूसरा पुनर्जन्म था
    जब मैंने देखा इन सब सड़ांध मार चुकी चीजों को अपने जीवन में।
    यह जन्म आसान न रहा वर्षों जमी हुई फंगस रेशे दर रेशे निकलनी थी
    डराते हुए
    स्व को पार करती हुई।

    खुद के खालीपन, भावुकता के छलावों का सामना कब आसान था,
    कौन चाहता है खुद को क्रूर कहलाना।
    मैंने फिर मृत्यु को जिया,
    जब मैंने चाहा खुद को वह बनते देखना जो मैं नहीं था
    और अपने उन सब व्यक्तित्व से लड़ना जो मैं था।

    मेरा तीसरा पुनर्जन्म था
    जब मैंने देखा कि केवल विचार पुनर्जन्म की सिद्धता नहीं है 
    न ही केवल कर्म। 
    समझ और कर्म दोनों संग-संग के साथी
    एक भ्रम है दूसरे के बिना 

    मैंने फिर मृत्यु को जिया
    जब मैंने मान लिया कि मेरा हर पुनर्जन्म झूठा था।

    मेरा चौथा पुनर्जन्म था
    जब मैंने देखा इस मृत्यु में छिपे सच को,
    इस पुनर्जन्म में महसूस हुए हर सांस पर होने वाले पुनर्जन्म।
    हर पल नए होते सूरज, धूप, धरती।
    नए जीवन में सृजित होते पानी, हवा, पत्ते।

    याद आया किसी बुद्ध ने कहा था कुछ भी अंतिम सत्य नहीं हैं
    इस पुनर्जन्म में जिया मैंने अपने बारम्बार शून्य होने को।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • खतरे में सामाजिक न्‍याय –गंगा सहाय मीणा

    खतरे में सामाजिक न्‍याय –गंगा सहाय मीणा

    Ganga Sahay Meena

    भारतीय लोकतंत्र अपनी इंद्रधनुषी छवि के कारण दुनिया का अनोखा और खूबसूरत लोकतंत्र है। सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों में विभिन्‍न तबकों की हिस्‍सेदारी इस लोकतंत्र की आत्‍मा है। इस हिस्‍सेदारी को सुनिश्चित करने हेतु संविधान में प्रावधान किये गए हैं। इस तरह की संवैधानिक व्‍यवस्‍था दुनिया के कई देशों में है जिसके माध्‍यम से ऐतिहासिक रूप से वंचित तबकों की लोकतंत्र और उसकी संस्‍थाओं में हिस्‍सेदारी सुनिश्चित की जाती है। भारत की आरक्षण व्‍यवस्‍था अपने लक्ष्‍य समावेशी लोकतंत्र को पाने की दिशा में लगातार अग्रसर है।

    शिक्षा सामाजिक बदलाव का सशक्‍त माध्‍यम है इसलिए सरकारी शैक्षिक संस्‍थाओं में वंचित तबकों की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु विभिन्‍न प्रावधान किये गएजैसे- अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए प्रवेश योग्‍यता में रियायतविभिन्‍न स्‍कॉलरशिप और फैलोशिपविभिन्‍न श्रेणियों के लिए संविधानसम्‍मत सीटें आरक्षित करना आदि. इसी क्रम में अन्‍य क्षेत्रों की तरह शैक्षिक क्षेत्र की सरकारी नौकरियों में सभी श्रेणियों को अवसर देने के लिए आरक्षण के प्रावधान किये गए हैं। इनमें भी उच्‍च शिक्षा का क्षेत्र सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण है। यह सामाजिक न्‍याय की नीति के तहत किये गए संवैधानिक प्रावधानों का ही प्रतिफल है कि देश के तमाम विश्‍वविद्यालयों में वंचित तबकों के विद्यार्थियों के अलावा शिक्षक भी दिखाई देने लगे हैं। ये शिक्षक अपनी मेहनत और लगन से अपने विश्‍वविद्यालयों में विशिष्‍ट स्‍थान बना रहे हैं।

    अभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में में वंचित तबकों के लोग दिखने ही लगे थे कि अकादमिक क्षेत्र की नौकरियों में संविधान प्रदत्त आरक्षण-व्‍यवस्‍था पर बड़ा खतरा आ खड़ा हुआ है। UGC ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के कहे अनुसार मार्च को एक चिट्ठी लिखी है जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के शिक्षकों की भर्ती में आरक्षण के रोस्टर को विभागवार लागू करने का आदेश दिया है। इस आदेश के अनुसार विभाग में भी आरक्षण कैडर (असिस्‍टेंट प्रोफेसर, एसोशिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर) आधारित होगा। यानी पहली बात तो यह कि अब संस्था को एक इकाई मानने के बजाय विभाग को इकाई माना जाएगा और उसमें भी संबंधित कैडर में जब किसी श्रेणी की बारी आएगीतभी उसके लिए एक पोस्ट आरक्षित हो पाएगी। 

    विभाग को इकाई मानकर 13 पॉइंट रोस्टर लागू करना आरक्षण व्यवस्था की हत्या जैसा है। इसको इस प्रकार समझिए- कल्पना कीजिए कि किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में शिक्षकों के कुल 200 पद हैं। संविधान प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था के अनुसार उनमें से 56 पद (27%) ओबीसी के लिए, 30 पद (15%) अनुसूचित जाति के लिए और 15 पद (7.5%) अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होने चाहिए। अभी तक जारी रोस्टर (200 पॉइंट) पद्धति के अनुसार ऊपर दी गई संख्या के आसपास सीटें विभिन्न श्रेणियों की बन जाती थी। संबंधित कॉलेज/विश्वविद्यालय भले ही बहाने बनाकर उन्हें पूरा नहीं भरते थेलेकिनसीटें तो उतनी ही बनती थी। अब नई पद्धति के अनुसार 13 पॉइंट रोस्टर होगा। विभागवार। यानी विभाग को एक यूनिट मानकर कैडर आधारित संबंधित श्रेणी के आरक्षण में प्रतिशतानुसार देर सवेर सीट बनेगी। कॉलेज या विश्वविद्यालय में भले ही कुल पद 200 होविभागवार अगर 4 या 5 या 6 सीटें ही अनुमोदित हैं और उनमें भी मान लीजिए असिस्‍टेंट प्रोफेसर की 3 सीटें हैं, एसोशिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर की 1-1 सीटें हैं तो एसोशिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर कैडर में 1-1 सीट होने के कारण कभी कोई आरक्षित सीट नहीं बन पाएगी. असिस्‍टेंट प्रोफेसर में भी पहली बार की नियुक्तियों में अजा, अजजा और ओबीसी को किसी विभाग में कोई सीट नहीं मिलेगी। 3 असिस्टेंट प्रोफेसरों में से किसी एक के रिटायर होने पर ओबीसी को एक सीट मिलेगी। अजा  को अध्यापकों के रिटायर होने के बाद पहली सीट मिलेगी और अजजाको 13 अध्यापकों के रिटायर होने के बाद पहली। यानी इस पद्धति में सभी आरक्षित श्रेणियों का उचित प्रतिनिधित्व रेगिस्तान के सागर की तरह ही रहेगा। सबसे ज्यादा खामियाजा अजजा को उठाना पड़ेगा। जिन विभागों में तीनों कैडर में एक-एक, यानी कुल ही पद अनुमोदित हैंउनमें किसी सीट पर कभी कोई आरक्षण नहीं हो पाएगा। अगर ज्‍यादा पद अनुमोदित हुए भी तो आरक्षित श्रेणियों को उचित प्रतिनिधित्‍व कभी नहीं हो पाएगा. अनुसूचित जाति की सीट बनते-बनते तो मुमकिन है पूरी एक सदी लग जाए। तब तक कोई नई पद्धति आ जाएगी और इस तरह नए आदेशानुसार प्रकारांतर से उच्‍च शिक्षण संस्‍थानों में आरक्षण-व्‍यवस्‍था पूरी तरह निष्‍प्रभावी हो जाएगी। एक तो अभी तक हजारों आरक्षित सीटों को वर्षों से भरा नहीं गया है, ऊपर से यह आदेश! विश्‍वविद्यालयों को सरकार विभागवार अनुदान नहीं देती, इसलिए विभागवार रोस्‍टर अतार्किक है। यूजीसी का ही एक पुराना आदेश (2006 के आदेश का 6-C) पूरे विश्‍वविद्यालय या कॉलेज की पोस्‍टों की ग्रुपिंग की वकालत करता है, जबकि ताजा आदेश उसका विरोधी प्रतीत होता है. इससे इसके निहितार्थों पर प्रश्‍न उठता है।    

    यही वजह है कि जब से यूजीसी का यह आदेश आया है, देशभर के विश्‍वविद्यालयों में शिक्षक आंदोलित हैं. दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के शिक्षक सुरेन्‍द्र कुमार एक हफ्ते से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। संसद में इस आशय के सवाल पूछे जा रहे हैं. आर टी आई के माध्‍यम से सूचनाएं एकत्रित की जा रही हैं। 12 मार्च को संसद की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्‍याण समिति ने संबंधित तीन-चार मंत्रालयों के साथ बैठक कर यूजीसी चेयरमेन की अध्‍यक्षता में इस मामले में सरकार की भूमिका की संभावनाएं पता करने हेतु एक समिति बना दी है। गत 15 मार्च को दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय शिक्षक संघ की अगुवाई में विभिन्‍न कॉलेजों और विश्‍वविद्यालयों के हजार से ऊपर शिक्षकों ने दिल्‍ली के मंडी हाउस से जंतर मंतर तक प्रदर्शन किया. इसमें तमाम विचारों और विभिन्‍न सामाजिक तबकों के प्राध्‍यापक शामिल थे। इससे निश्चिततौर पर सरकार पर दबाव पड़ा है। विभिन्‍न पार्टियों के वंचित नेता एक होने लगे हैं और स्‍वयं सरकार के भीतर से भी यूजीसी के आदेश के विरोध में स्‍वर उठने लगे हैं।

    निश्चित तौर पर प्रथम दृष्टया यह मामला कानूनी है। इस पर न्‍यायालय की मुहर है इसलिए इसका हल भी उच्‍चतम न्‍यायालय के माध्‍यम से निकलेगा। हां, केन्‍द्रीय सरकार को सामाजिक न्‍याय और समावेशी लोकतंत्र के हक में इस कठिन समय में देश के वंचितों के साथ खड़े होना चाहिए। इससे देश के वंचितों की लोकतंत्र में आस्‍था मजबूत होगी। 

    Ganga Sahay Meena PhD

    Associate Professor
    Centre of Indian Languages
    Jawaharlal Nehru University
    New Delhi-67
    INDIA

  • संजीबा की कविता – नवरात्रि

    संजीबा की कविता – नवरात्रि

    Sanjeeba 

    कभी बेलन से पीट दिया
    कभी मुगरी से 
    ठोक दिया,


    कभी बाल पकड़कर
    दीवाल पर दे मारा,
    जब कुछ नही मिला 
    तो 

    Sanjeeba


    हरामज़ादी कुतिया 
    ही बोल दिया,
    फिर भी ये सालभर
    अपने ही घरों में
    खामोश कैद रहती हैं
    क्योंकि


    नवरात्रि में ये लड़कियां
    अपने सगे मां- बाप से
    नौ दिन दही पेड़ा खाकर
    टॉफी के लिए
    शायद 


    कुछ पैसा ले लेती हैं….

  • वीडियो: सामाजिक न्याय – वाराणसी सम्मेलन 2018 मार्च 17-18

    वीडियो: सामाजिक न्याय – वाराणसी सम्मेलन 2018 मार्च 17-18

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    Vivek Umrao Glendenning “SAMAJIK YAYAVAR”

    He is an Indian citizen & permanent resident of Australia and a scholar, an author, a social-policy critic, a frequent social wayfarer, a social entrepreneur and a journalist;He has been exploring, understanding and implementing the ideas of social-economy, participatory local governance, education, citizen-media, ground-journalism, rural-journalism, freedom of expression, bureaucratic accountability, tribal development, village development, reliefs & rehabilitation, village revival and other.

    For Ground Report India editions, Vivek had been organising national or semi-national tours for exploring ground realities covering 5000 to 15000 kilometres in one or two months to establish Ground Report India, a constructive ground journalism platform with social accountability.

    He has written a book “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” on various social issues, development community practices, water, agriculture, his groundworks & efforts and conditioning of thoughts & mind. Reviewers say it is a practical book which answers “What” “Why” “How” practically for the development and social solution in India. 

  • दुःख – अपर्णा अनेकवर्णा

    दुःख – अपर्णा अनेकवर्णा

    Aparna Anekvarna

    १.
    दुःख में अवश्य 
    मर जाती होंगी औसत से अधिक कोशिकाएं 
    झुलस जाता होगा रक्त भी तनिक 
    ठहरता होगा जीवन-स्पंदन हठात 
    सब औचक की ठेस से सन्न 
    उस पार निकलने को बेचैन 
    फिर 
    ऊब जाता होगा मन बंधे-बंधाये से 
    आक्रोश भी बाँध-बाँध कर बाग़ी मंसूबे अंततः ढह जाता होगा 
    निश्चय ही कुछ ऐसा होता होगा जब दुःख आता होगा

    २.
    दुःख में 
    चुपचाप एक सदी बीत जाती है भीतर 
    बाहर बस एक निश्वास मात्र 
    सो भी ‘नाटकीय’ हो जाने से आँखें चुराते 
    अपने घटते जाने की ग्लानि में पुता हुआ

    ३.
    तुम 
    मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख 
    और सबसे बड़ा दुःख दोनों ही हो

    ४.
    तटबंध दरक जाते हैं चुपचाप 
    लगती ही है अदबदा कर चोट पर चोट 
    ख़त्म होने लगता है हांफता हुआ संवाद 
    चौकस हो पढ़ने लगता है मन 
    उस ओर की हर आनन फानन 
    और ऐंठ जाता है एकबारगी 
    लुप्त ऊष्मा की स्मृति से लज्जित होकर

    ५. 
    दुःख बासी हो उठा सुख है

    Aparna Anekvarna


    दुःख दुःख है 
    पर उस एक से ठगा जाना 
    दुःख का अंतिम छोर है..
    उस चरम से जो बचे 
    वो बदल गए थे 
    किसी रासायनिक परिवर्तन के तहत

    ७. 
    सुख में ऐसी मग्न थी 
    दुःख में निपट अकेली हुई
    पता भी नहीं चला 

  • आनलाइन क्रांति और आनलाइन पिज्जा – आलोक पुराणिक

    आनलाइन क्रांति और आनलाइन पिज्जा – आलोक पुराणिक

    Alok Puranik

    हर आइटम इस कदर आनलाइन हो गया है कि क्रांति से लेकर पिज्जा तक आप आनलाइन ले सकते हैं।

    एक मित्र हैं एक लैपटाप के जरिये कई क्रांतियां संभाले रहते हैं। वक्त बदल गया है। क्रांति के लिए पुराना वक्त ज्यादा मुफीद था, जब कम से कम क्रांति आफलाइन ही होती थी। अब कार्ल मार्क्स कहते-दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, तो एक सवाल तो यही आ सकता है कि क्या आनलाइन एक हो जाने भर से काम चल जायेगा ना। आनलाइन ग्रुप बना लेने भर से काम चल जाये, ऐसी क्रांति की भीषण डिमांड है। पहले आम और पर बंदे एक ही क्षेत्र में क्रांतिकारी होते थे, पर आनलाइन ने यह सुविधा दे दी है कि एक ही बंदा एक ही समय में बहुआयामी क्रांतियों में अपना योगदान दे सकता है।

    एक दोस्त के मृत-पिताजी की फोटू को लाइक मिले, किसी ने रात को दारु पीते हुए इस फोटू को लाइक कर दिया, यानी शोक संवेदना की कार्रवाई हो गयी। लाइक यानी काम खत्म। पारदर्शिता का तकाजा है कि फेसबुक यह भी बताये साफ-साफ कोई बंदा शोक-संवेदित हो रहा है, तब वह कर क्या रहा है और वह हैं कहां। कोई अगर सन्नी लियोनी की फिल्म देखते हुए आनलाइन शोक-संवेदित हो रहा है, तो ऐसे संवेदित होने को शोक-संवेदना और सन्नी लियोनी दोनों के साथ ही अन्याय माना जाना चाहिए।

    Alok Puranik

    शोक दिखाने की बुनियादी तमीज यह है कि बंदा शोकशुदा दिखे भी। अभी एक केस मैंने देखा -एक बंदे ने फेसबुक मैसेज ठोंका-चेक्ड-इन स्टारबक्स, यानी कि भाई स्टारबक्स नामक ठिकाने पर काफी पीने को घुसा और वहीं से शोक-संवेदित हो गया। स्टारबक्स में काफी थोड़ी महंगी मिलती है, इसलिए बहुत सस्ते किस्म के लोग यह सबको बताने में घणा फख्र महसूस करते हैं कि हम स्टारबक्स में आये हैं। फेसबुक पर कई बार बंदा बताता है कि चेक्ड-इन इंदिरा गांधी एयरपोर्ट। अरे भाई कहीं जा रहे अपने काम से जा रहे हो, इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के जरिये जा रहे हो या बिल्लोचपुरा स्टेशन के जरिये जा रहे हो,बताने की क्या जरुरत। पर फेसबुक के जरिये यह बताना जरुरी है, एक कम-जानकार महिला ने मुझसे यहां तक पूछा कि अगर हम ऐसा नहीं बतायेंगे तो क्या हम पर फाइन हो सकता है।

    फेसबुक यह भी विकल्प दे कि पता चल जाये कि कोई बंदा शोक-संवेदित हो रहा है, तब वह कर क्या रहा है। शोक-संवेदित एट बालाज डिस्को डांसिंग विद फ्रेंड्स, इस आशय के मैसेज भी फेसबुक पर दिखने लगें, तो पारदर्शिता पूरी हो जाये। शोक संवेदित एट मंडी हाऊस हैविंग समोसा विद फ्रेंड, यह मैसेज भी फेसबुक पर दिखे, तो सबको पता लग जाये कि कौन किस स्तर का शोक-संवेदित है।

    हालांकि पता अब भी सबको सब होता है कि कौन किस स्तर का शोक-संवेदित है, बस फेसबुक इसे थोड़ा साफ तौर बता और दे, तो आत्म-नंगापन हम एकैदम साफ तौर पर देख पायेंगे।