Vivek “सामाजिक यायावर”
संस्थापक व मुख्य-संपादक, ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया समूह
मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय-जर्नलिस्ट
उत्तरप्रदेश में संसदीय-उपचुनाव में बसपा द्वारा सपा प्रत्याशियों को समर्थन
संसदीय उपचुनावों के संदर्भ में बसपा की अघोषित नीति रही है कि अपवाद घटनाओं को छोड़कर संसदीय उपचुनावों में अपना प्रत्याशी खड़ा नहीं करती रही है। इसलिए हाल में ही उत्तरप्रदेश के संसदीय उपचुनाव में बसपा द्वारा अपना प्रत्याशी न खड़ा करना विशेष घटना नहीं थी। चूंकि बसपा की नीति रही है कि संसदीय उपचुनावों में प्रत्याशी खड़ा नहीं करना है इसलिए उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट स्थिति में सपा प्रत्याशी को समर्थन दे देने को मैं सपा-बसपा के मध्य लंबी दूरी के गंभीर व गठबंधन की संभावनाओं को कम से कम अभी तो नहीं ही देख पा रहा हूँ। उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट स्थिति में बसपा द्वारा सपा प्रत्याशी को समर्थन दे देने को मैं गठबंधन हो जाना भी नहीं मानता। अभी की स्थितयों में मैं इसे लोकसभा उपचुनाव व राज्यसभा के चुनाव से जोड़कर तात्कालिक राजनैतिक लेनदेन के रूप में देख रहा हूँ।
सपा-बसपा गठबंधन
सपा-बसपा गठबंधन के रास्ते में मुझे कई गंभीर व्यवहारिक दिक्कतें दीखती हैं। सपा-बसपा के साथ खड़े होने को मैं इन दोनों पार्टियों की सामाजिक, सामाजिक-न्याय के संदर्भ में परस्परता व गंभीर प्रतिबद्धता, विश्वसनीयता व राजनैतिक दूरदर्शिता की बजाय उत्तरजीविता की अतिगंभीर विकट परिस्थिति की विवशता के कारण होने वाला जुड़ाव मानता हूँ।
ऐसा भी नहीं है कि इन दोनों पार्टियों ने 2014 के बाद या 2017 की फरवरी के बाद सामाजिक-न्याय के लिए साथ मिलकर चलने की योजना के तहत जमीन पर अपने कार्यकर्ताओं से संवाद या कार्यशालाओं का घोषित/अघोषित संयुक्त अभियान चलाया हो, जिसके कारण समय लगा और अब दोनों पार्टियां जुड़ रही हैं। चुनाव जीतने की कवायद से इतर समाज के लोगों के लिए सपा-बसपा गठबंधन का सामान्य कार्यक्रम एजेंडा तक नहीं है, जो भविष्य में आम चुनावों में सरकार न बनने की स्थिति की बावजूद करते रहा जाए।
ऐसा भी नहीं है कि सपा-बसपा गठबंधन के कारण फेसबुक, व्हाट्सअप जैसे सोशल मीडिया में सपा-बसपा के कार्यकर्ताओं व समर्पित समर्थकों में वैचारिक परिपक्वता का विकास हुआ हो। दोनो ओर के ही लोग इसे सत्ता-प्राप्ति के लिए राजनैतिक चतुराई के रूप में देख रहे हैं। इसलिए उनके समर्थन व विरोध के केंद्र स्थानांतरित हो गए हैं। मतलब यह कि जैसे पहले सपा या बसपा का भी विरोध करना पड़ता था तो अब केवल कांग्रेस व भाजपा का विरोध करना है।
यह वैसे ही है जैसे बिहार में भाजपा समर्थकों के लिए नितीश कुमार अच्छे थे व लालू यादव के समर्थकों के लिए नितीश कुमार बुरे थे। जैसे ही यह दो धुरंधर विरोधी जुड़े तो लालू समर्थक नितीश कुमार की प्रशंसा करने लगे व भाजपा समर्थक नितीश कुमार को बुरा कहने लगे। जब नितीश कुमार ने लालू यादव से अलग होकर सरकार बनाई तो नितीश लालू समर्थकों के लिए बुरे व भाजपा समर्थकों के लिए अच्छे हो गए।
ऐसे ही आज सपा-बसपा में गठबंधन होने की संभावनाओं को देखते हुए बहुत लोगों को सामाजिक-न्याय व सोशल इंजीनियरिंग दिख रही है। यदि भविष्य में सपा व बसपा अलग हुए तो यही लोग एकदूसरे को बुरा कहने लगेंगे गरियाने लगेंगे।
खैर सामाजिक-न्याय, सामाजिक-प्रतिबद्धता व राजनैतिक दूरदर्शिता जैसे गंभीर व सूक्ष्म विषयों को परे रख कर सपा-बसपा गठबंधन के संदर्भ में कुछ व्यवहारिक तथ्यों पर गौर कर लिया जाए।
सपा-बसपा गठबंधन व लोकसभा-2019
उत्साही कार्यकर्ता व समर्थक लोग गठबंधन को बनाए रखने के लिए मायावती को प्रधानमंत्री व अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं। मुझे यह पूरी कवायद मायावती के अहंकार व महात्वाकांक्षा को सहलाते हुए गठबंधन को स्थापित करने के लिए लगती है। लेकिन मुझे यह कवायद लंबे समय के लिए व्यवहारिक रूप से सफल दीखती नहीं है क्योंकि मायावती कोई नौसिखिया खिलाड़ी नहीं है जो उनको प्रधानमंत्री वाले लालीपाप से बहलाया जा सकता है।
मूलभूत व्यवहारिक प्रश्न यह है कि मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी कैसे? बसपा व सपा उत्तरप्रदेश के बाहर हैं नहीं। इन दोनों ही पार्टियों ने कभी दूरदर्शिता व गंभीरता के साथ उत्तरप्रदेश से बाहर ठोस रूप से पांव फैलाने का प्रयास किया ही नहीं।
उत्तरप्रदेश के बाहर विधायकी की जो दो चार सीटें उत्तरप्रदेश में बसपा के सरकार में होने या सरकार बनाने की संभावनाओं के आभामंडल के कारण पहले कभी बसपा द्वारा जीतीं भी गईं थीं, समय के साथ वह सब भी एक तरह से खतम ही हो चुका है, हवा-हवाई भले ही कुछ-कुछ कहीं झाड़न-पोछन शेष हो।
2019 के लोकसभा आमचुनावों में पहली समस्या सीटों के बटवारे व किस पार्टी को कौन-कौन सी सीटें मिलें इत्यादि मसलों की आएंगी। दोनों पार्टियों का अपना भिन्न वोटबैंक है, अपने-अपने समर्पित कार्यकर्ता हैं, अपने-अपने क्षत्रप हैं।
अभी तक सपा बसपा पूरे राज्य में अपने लोगों को टिकट देतीं थीं। गठबंधन होने पर बहुत ऐसे लोगों को टिकट नहीं मिलेगा जिन्होंने अपनी-अपनी पार्टियों को अपना जीवन दिया होगा, अपने इलाके में पकड़ अच्छी है तथा पहले टिकट मिल चुके होंगे तथा बहुत ऐसे भी लोग होंगे जो पहले जीत भी चुके होंगे। ऐसे लोग गठबंधन के साथ दिल से कितना रह पाएंगे यह बड़ा मसला है। भाजपा इन लोगों को नहीं लुभाएगी इसकी क्या गारंटी है। मान लिया जाए कि ये लोग भाजपा के साथ नहीं भी जाएंगे तो गठबंधन के प्रत्याशी का कितना वास्तव मे साथ देंगे या दे पाएंगे यह भी बड़ा मसला है।
मान लेते हैं कि सीटों का बटवारा हो गया, कौन किस सीट से लड़ेगा यह भी तय हो गया। मान लेते हैं कि किसी क्षत्रप या कार्यकर्ता या समर्थक ने गड़बड़ नहीं की, सब के सब आदर्श अनुशासित रहे।
मान लेते हैं कि सपा बसपा के स्थानीय व क्षेत्रीय क्षत्रप टिकट न मिलने के बावजूद, भाजपा की लुभावनी रणनीतियों के बावजूद गठबंधन के प्रत्याशियों की जीत के लिए जान लड़ा देते हैं। तब भी ऐसा तो नहीं है कि भाजपा एक भी सीट नहीं जीतेगी। मान लेते हैं कि सबकुछ मानमाफिक होता चला गया तथा सपा बसपा के सितारे बहुत बुलंद रहे इसलिए दोनों मिलकर 60-70 सीटें जीत लेती हैं। यह भी मान लेते हैं कि सपा को उस समय भी मायावती को प्रधानमंत्री बनाने में कोई आपत्ति नहीं।
अब सवाल यह है कि 60-70 सीटों से आज की राजनैतिक परिस्थितियों व मानसिकता में प्रधानमंत्री कैसे बना जा सकता है। मान लीजिए कि देश के दूसरे राज्यों के क्षेत्रीय दलों का भानुमती का कुनबा जोड़ जाड़ कर किसी तरह केंद्र में सरकार बन भी गई और सभी क्षेत्रीय दल मायावती को प्रधानमंत्री मान भी लिए। तब भी 30-35 सांसदो वाली मायावती कितने दिनों तक प्रधानमंत्री रह पाएंगी।
लोकसभा चुनाव होंगे 2019 में और उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे 2022 में। क्या तीन साल तक 30-35 सांसदो वाली मायावती की केंद्र सरकार निर्बाध रूप से चलती रहेगी। मतलब यह कि भारत के नेता, कार्यकर्ता व लोगबाग रातोंरात परिपक्व हो जाएंगे।
यह तो बात हुई तब की जबकि मायावती प्रधानमंत्री किसी मिरैकल से बन जाएं।
अब भिन्न स्थिति की कल्पना करते हैं। मान लेते हैं कि सपा बसपा की सीटें 60-70 की बजाय 40-50 सीटें ही आ पाती हैं तो दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां अपने नेता को प्रधानमंत्री क्यों न बनाना चाहेंगी। जब विचार कर ही रहे हैं तो दोनों मिलकर 20-30 सीटें ही जीत पाएंगी ऐसी भी कल्पना करके विचार करना चाहिए।
सपा-बसपा गठबंधन व विधानसभा-2022
विधानसभा के लिए दो परिस्थितयां हो सकती हैं। मायावती 2019 में प्रधानमंत्री बन जाती हैं लेकिन कुछ महीने बाद या साल भर बाद या दो साल बाद ऐसी स्थिति आती है कि वे प्रधानमंत्री नहीं रहतीं हैं। तब क्या वे 2022 में उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहेंगीं?
इस प्रश्न से भी बड़ा व बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि 2019 में मायावती प्रधानमंत्री नहीं बन पाती हैं तो क्या वे 2022 में उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहेंगी। मायावती कोई छोटी बच्ची तो हैं नहीं जो उनको 2024 में प्रधानमंत्री होने का लालीपाप देकर बहलाया जा सकता है।
विधानसभा चुनावों में फिर सीटों के बटवारे का मसला आएगा। ऐसा भी तो होगा कि कार्यकर्ताओं को यह लगे कि सरकार तो बन ही रही है तो अपनी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपनी पार्टी की सीटों की संख्या अधिक करने के चक्कर में गठबंधन होने के बावजूद सहयोगी पार्टी के प्रत्याशियों पर ध्यान न दें या हरवाने का षड़यंत्र रचें।
भाजपा व संघ
भाजपा के पास केंद्र की सरकार है। देश के बहुत राज्यों में राज्य-सरकारें हैं। मीडिया है। संसाधन है। रणनीतियां है। देश भर में जमीनी व अनुशासित कैडर है। लोगों से संवाद स्थापित करने का व्यवस्थित व मजबूत ढांचा है। नरेंद्र मोदी व अमित शाह की विश्वसनीय व चुनावी-रणनीतिकार जोड़ी है।
भाजपा छोटी-छोटी पार्टियों को अपने साथ इसलिए जोड़ती है क्योंकि इन पार्टियों के कारण कुछ सीटों में कुछ हजार वोट भी मिल गए तो सीटें निकल जाती हैं। भाजपा किसी के साथ भी गठबंधन करे भाजपा का कैडर इतना अनुशासित है कि गठबंधन में किसी भी पार्टी के किसी भी व्यक्ति को टिकट मिले उसको जिताने में ताकत लगा देता है।
उत्तरप्रदेश से बाहर ही देश भर में भाजपा की लगभग 200 सीटें हैं। भाजपा की रणनीतियों के कारण अनेक राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां दिन ब दिन कमजोर होती जा रहीं हैं।
ऐसी स्थितियों में मायावती के प्रधानमंत्री बन पाने की संभावनाएं कितनी हो सकती हैं, कितने समय के लिए प्रधानमंत्री बन सकतीं हैं। इन बातों का प्रभाव उत्तरप्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव व सपा-बसपा गठबंधन में मूलभूत रूप से पड़ना है।